Friday 29 April 2022

छत्तीसगढ़ी व्याकरण-"भूतकाल

 *// छत्तीसगढ़ी व्याकरण-"भूतकाल"//*========०००=======


*परिभाषा :- जऊन वाक्य म कर्ता द्वारा करे गए क्रिया ले बीते समय के बोध होथे | तऊने ल "भूतकाल" कहे जाथे* |


 भूतकाल के ४ प्रकार होथे :-

(अ) सामान्य भूतकाल |

(ब) अपूर्ण भूतकाल |

(स) पूर्ण भूतकाल |

(द) पूर्ण अपूर्ण भूतकाल |

*(सामान्य भूतकाल):-*

*जऊन वाक्य के क्रिया ले बीते समय के बोध होथे | तऊने वाक्य ल सामान्य भूतकाल कहे जाथे |*

*जैसे :-*( लिखना क्रिया ले निर्मित वाक्य )

१. मैंने लिखा |

    *(मैं लिखेंव)*

२. तुम ने लिखा |

    *(तैं लिखे)*

३. हम ने लिखा |

     *( हमन लिखेन)*

४. राम ने लिखा |

    *( राम ह लिखीस)*

५. उन्होंने लिखा |

     *( ओ मन लिखीन)*

*टीप :- शब्द उच्चारण के आधार पर लिखिस के बदले "लिखीस" अउ लिखिन के बदले "लिखीन" होना चाही का ?*

*(ब)-अपूर्ण भूतकाल :-* *जऊन वाक्य के क्रिया ले बीते समय के बोध होथे,लेकिन कार्य जारी रहिथे, पूर्ण नइ हो पाए रहै | ओ ला "अपूर्ण भूतकाल" कहे जाथे*

*जैसे:-*

१. मैं लिख रहा था |

    *( मैं लिखत रहेंव)*

२.तुम लिख रहे थे | 

      *(तैं लिखत रहे)*

३. हम लिख रहे थे |

     *(हमन लिखत रहेन)*

४. राम लिख रहा था |

    *(राम ह लिखत रहिस)*

५. वो लिख रहे थे |

     *( ओ मन लिखत रहिन)*

*टीप- अपूर्ण भूतकाल के क्रिया ल निरंतर जारी दर्शाए बर लिखत,पढ़त,खेलत के बदले -लिखते, पढ़ते,खेलते शब्द के प्रयोग ठीक रहिही का ?*

*(स) पूर्ण भूतकाल :- जऊन वाक्य के क्रिया ले बीते समय ल दर्शाथे अउ कार्य पूर्ण हो चुके रहिथे | तऊने ला "पूर्ण भूतकाल" कहे जाथे*|

*जैसे:-*

१. मैं लिख चुका था |

     *( मैं लिख डरे रहेंव)*|

२. तुम लिख चुके थे | 

  *( तैं लिखे डरे रहे)*

३. वे लिख चुके थे | 

    *ओ मन लिख डरे रहिन)*

४. हम लिख चुके थे | 

    *( हमन लिख डरे रहेन)*

५. राम लिख चुका था | 

     *( राम लिख डरे रहिसे)*

*टीप:- इहां डरे शब्द के बदले "डारे" लिखना/बोलना ठीक रहिही का ?*


*(द) पूर्ण-अपूर्ण भूतकाल:-*

      *जऊन वाक्य के क्रिया ले बीते समय के बोध होते अउ काम लगातार जारी रहिथे | तऊने ल "पूर्ण अपूर्ण भूतकाल" कहे जाथे |*

*जैसे :-*

१. तीन घंटे से पानी बरस रहा था |

*( तीन घंटा ले पानी बरसतेच रहिसे)*

२. वह दो घंटे से गीत गा रहा था | 

*( ओ ह दू घंटा ले गीत गातेच रहिसे)*

३. मैं पांच घंटे से पढ़ रहा था | 

*( मैं पांच घंटा ले पढ़तेच रहेंव)*

४. तुम दो घंटे से गा रहे थे |

   *तैं ह दू घंटा ले गातेच रहे)*

५. वे लोग दो घंटे से रामायण पढ़ रहे थे |

*(ओ मन दू घंटा ले रामायण रहिन)*

टीप:- इहां गातेच, पढ़तेच,लिखतेच)ठीक होही का ,?


गया प्रसाद साहू

"रतनपुरिहा"

दि. २८.४.२०२२

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गजब बिटामन भरे हे छत्तीसगढ़ के बासी म...


 

गजब बिटामन भरे हे छत्तीसगढ़ के बासी म...

    छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा डाॅ. खूबचंद बघेल जी के एक मयारुक कविता हे-

  बासी के गुण कहुँ कहाँ तक,

  इसे न टालो हाॅंसी में.

  गजब बिटामन भरे हुये हैं,

  छत्तीसगढ़ के बासी में..

    पहिली उंकर ए कविता ल हमन अपन परंपरा के संरक्षण-संवर्धन खातिर लिखे गे मयारुक रचना समझत रेहेन. फेर जब ले वैज्ञानिक मन बासी उप्पर शोध कारज करिन हें अउ बताइन हें, के बासी खाए ले ब्लडप्रेशर ह कंट्रोल म रहिथे, गरमी के दिन म बासी खाए ले लू घलो नइ लगय, एकर ले हाइपर टेंशन घलो कंट्रोल म रहिथे. गरमी के दिन म बुता करइया मन के  देंह-पाॅंव के तापमान ल घलो बने-बने राखथे. संग म पाचुक होए के सेती हमर पाचन तंत्र ल घलो बरोबर बनाए रखथे. जब ले ए वैज्ञानिक शोध ल जानेन तबले अपन पुरखा मन के वैज्ञानिक सोच अउ अपन परंपरा ऊपर गरब होए लागिस.

    आज अचानक ए बात के सुरता ए सेती आवत हे, काबर ते हमर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ह अब ले 1 मई श्रमिक दिवस ल बोरे-बासी के महत्व ल जन-जन म बगराए अउ एला अपन पारंपरिक गरब के रूप म जनवाए खातिर 'बोरे-बासी' डे के रूप म मनाए के अरजी करे हे.

    वइसे हमर संस्कृति म 'बासी' खाए के एक रिवाज हे. भादो महीना के तीजा परब म जब बेटी-माई मन अपन-अपन मइके आए रहिथें, तब उपास रहे के पहिली दिन करू भात खाये के नेवता दिए जाथे अउ तीजा के बिहान दिन बासी खाये के नेवता देथें. फेर ए नेंग ह सिरिफ तीजहारिन मन खातिर ही होथे. आज बासी के महत्व ल समझे के बाद मोला अइसे लागथे, के अभी जेन 'बोरे-बासी' डे मनाए के बात सरकार डहार ले होवत हे, वोला 'बासी उत्सव' के रूप म मनाए जाना चाही. जइसे आने उत्सव के बेरा जगा-जगा वो उत्सव ले संबंधित आयोजन करे जाथे, ठउका वइसनेच जगा-जगा बासी पार्टी या बासी खवाये के भंडारा आयोजन करे जाना चाही. 

    अब तो बासी खवई ह सिरिफ परंपरा या रोज के भोजन ले आगू बढ़के सेहत अउ रुतबा के घलो प्रतीक बनत जावत हे, तभे तो फाइवस्टार होटल मन म घलो एला बड़ा शान के साथ उहाँ के  मेनू म शामिल करे जाथे, अउ लोगन वतकेच शान ले एला मंगा के खाथें घलो.

मोला अपन चार डांड़ के सुरता आवत हे-

  दिन आगे हे गरमी के, नंगत झड़क लव बासी

  दही-मही के बोरे होवय, चाहे होवय तियासी

  तन तो जुड़ लागबेच करही, मन घलो रही टन्नक

  काम-बुता म चेत रइही, नइ लागय कभू उदासी

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

माते मुनगा के फूल**


 

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    **माते मुनगा के फूल**

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      मुनगा के रुख ल फूल म माते देख के भगवन्तीन हर गदगद् हो जावत रहय। घेरी-बेरी मुनगा ल निहारय अउ मने-मन कुलकुल्ला होवय, मुनगा फूल के बड़े-बड़े झोत्था हर छानही ल छुवत रहय तेला देख के ओकर छाती जुड़ावत रहय, कुल मिला के ओकर खुशी के कोनो ठिकाना नइ रहय। 

      भगवन्तीन हर मने-मन म कइनो प्रकार ले सोंचत रहय, येसो तो मुनगा हर फरही त कोनो ल एक्को ठन नइ देंव; सब्बो ल बेंचिहँव, पइसा आही त हाथ के कड़ा हर टूटे हे तेला बदलिहँव। भिनसरहा उठय त सब ले पहिलि मुनगा कति ल देखय। अँगना म कहूँ मुनगा फूल हर थोरको गिरे दिख जाय त ओकर मन हर हदर जाय, सब फूल ल एक-एक ठन बीन दारय अउ साग रांध दारय। जब मुनगा के फूल हर फर धरे लागिस त फर धरत देख के भगवन्तीन के खुशी के ठिकाना नइ रहय, खुशी के मारे फूले नइ समावत रहय। फर मन ल गिने के शुरु कर देथे। एक झोत्था ल गिने के शुरु करीस त गिने नइ सकीस, तभो ले पाँच कोरी कस गिन दारथे। 

      अब भगवन्तीन हर हिसाब लगावत रहय, एक झोत्था म दू सौ घलाव निकल जाही; तभो बहुत ये। एक पउवा म पाँच ठन घलाव चढ़ही अउ पच्चीस रुपया पउवा बेंचिहौं त एक ठन हर पाँच रुपया परही। अब एक-एक ठन फर हर ओला पाँच-पाँच रुपया अस लागत रहे। घेरी-बेरी अपन हाथ ल देखय-संवारय, ओला अभी ले नावा कड़ा पहिरे के एहसास होवत रहय। भगवन्तीन हर सोंचथे; कड़ा ल बदलिहँव त ओमा तो जादा पइसा मिलाय बर नइ लागय, एक ठन काम करिहँव, अपन कनिहा बर चाँदी के करधन घलाव ले लिहौं, मोर अब्बड़ शौंक रहीस करधन पहिरे के फेर कभू पहिरेच नइ पांय, ये दारी के मोर शौंक हर पूरा होही, करधन ले घलाव बाँचही त फेर घेंच बर पीपर पत्ती लिहौं कम-से-कम एको फर के, कलदार ल बेंचे रहेन तब ले घेंच हर दूच्छा परे हे, सोजहे काँच के मोती के माला ल पहिरे हँव, येही म एक ठन पीपर पत्ती डरवा लिहौं।

      भगवन्तीन के जी हर कब मुनगा हर पोठाय त कब बेचंव तइसे होवत रहय। रास्ता म कोनो मिलय तउने ल पूछय; तुमन मुनगा खाथा नहीं; मोर मुनगा फरही त लाहौं हंय; खा के देखिहा, मोर मुनगा कइसे मिठाथे, एक घंव खाहा त फेर बार-बार लिहा। बक्सा के ताला हर जून्ना हो गे रहय, जंग लगत रहय, बजार ले नावा ताला ले आनीस, तारा-कुची हर पोट रहना चाही त पइसा कौडी़ धरे बर बने रही। बक्सा म पइसा कौड़ी हर रही अउ मैं हर मुनगा बेचें बर चल दिहौं त कोनो आके ताला ल झन टोर देवैं। सोवत जागत भगवन्तीन के जी मुनगा म लगे रहय। जउन बखत म मुनगा फरथे तउने बखत म गर्रा-धुँका घलाव हर आथे, भगवन्तीन हर मने-मन म ओही ल डरावत रहय। 

      एक दिन संझा बेरा भगवन्तीन हर अँगना म माची म बईठे रहय तभे कती ले गर्रा-धुँका आगे। भगवन्तीन हर धरा-रपटा घर भीतर म हमा गे अउ फईरका ल दे दीस। धांय-धांय हवा चलत रहय, फईरका मन खट-पट होवत रहंय, टीना-टप्पर मन फेंकावत रहंय, भगवन्तीन के जी धुकुर-पुकुर करत रहय। 

      आज तो मुनगा हर एक्को नइ बाँच जाय सप्फा फूल हर झर जाही तइसे लागत हे। तभे रट ले कछु टूटे के आवाज आथे, मुनगा के कोनो बड़े डारा हर टूट गे सोंच के भगवन्तीन के जी हर धक-धकाय लगथे। रात भर नींद नइ अइस। भिनसरहा उठ के अँगना ल देखथे, देख के भगवन्तीन के आँखी म आंसू आ जाथे, अँगना हर मुनगा के फूल अउ डारा म पटाय रथे। भगवन्तीन हर डारा-पाना ल हटाय के शुरु करथे, आँखी ले आंसू के धार बोहावत रहे। अपन अंचरा म आंसू ल पोंछत रहय अउ ऊपर पेंड़ ल देखय, काल तक ले फूल म लदाय रहीस डारा नइ दिखत रहीस तेहर आज ठूंठ भर दिखत रहय, आधा मुनगा नइ बांचे रहय।

       अँगना ल जतन के नहा-धो के आगे, खाना-पीना नइ सुहात रहय। अँगना के भिथिया म एक ठन छोटे से बजरंगबली के मंदिर बने रहय। भगवन्तीन हर ओही बजरंगबली ल मानय। कछु होय त ओही ल मनावय। भगवन्तीन हर जाके बजरंगबली के आघु म हाथ जोड़ के खड़े हो जाथे अउ बजरंगबली ले शिकायत करथे; हे बजरंगबली, हे पवनदेव, मोर गरीबीन के धन ल काबर उजार देहा अतके तो मोर धन-दौलत ये, कतका का-का सोचे रहें, सब मनसुबहा ल पानी म बोर देहा।

बजरंगबली अब ये जऊन कुछ बाँचे हे तेहर तुंहरेच ये अब येला बँचावा के उजारा सब तुंहरे सेथा ये, अब ये सब ल तुंहला संउपत हंव। अब भगवन्तीन हर आश्वस्त रहय, अब सब बजरंग बली के ऊपर हे ओही हर रक्षा करहीं, मैं हर अब सब ल ओही ल संउप दे हँव। 

     भगवन्तीन हर दिन म कई फईत मुनगा के पेंड़ ल निहारय। मुनगा हर बनेच फर धर दारे रहय, बजरंग बली  ल हाथ जोड़य; बजरंग बली अतका ल बचा दिहा त कम से कम मोर हाथ के कड़ा हर तो बदला जाही।  मुनगा झींकी मन ल बाढ़त देख के  थोरकन मन हर जुड़ावत रहय अउ दुख हर थोरकन कम होय लागीस। एक दिन भगवन्तीन हर पड़ोसी के घर म बईठे रहय त लईका मन आ के बताथें तोर घर म बिकट कन बेंदरा आय हे कइके,भगवन्तीन हर दंउड़त भागथे; अपन घर कती, घर के ताला खोलथे अउ सीधा अँगना म जाथे, आठ-दस ठन बेंदरा मन आ के मार उधम मचाय रहें। मुनगा के डारा-पाना ल सुलर-सुलर के खावत रहंय अउ अँगना  म टोर-टोर के गिरावत रहंय, छानही के खपरा ल उलट-पुलट देहे रहें। भगवन्तीन हर एक ठन सूंटिया ल धर के ओमन ल मारे बर दंउड़इस त एक ठन बेंदरा हर ओही ल मारे बर दंउड़ीस, भगवन्तीन हर सूंटिया ल फेंक के घर भीतर घूसर गे अउ फईरका ल दे दिस।

     बजरंग बली ल याद करके हाथ जोड़थे बजरंगबली अब जउन करिहा तुंहरे सेथा ये बचावा के उजारा। खटिया म बईठ के अपन हाथ ल संवारत रहय। मुनगा ल फूल म माते देख के का का सोंच दारे रहें। कड़ा ल बदलिहँव, करधन लिहँव, पीपरपत्ती पहिरिहँव कहत रहें। मोर अभागीन के भाग म अतको नइ हे; त बजरंगबली हर काय करहीं, अइसने रही त साग खाय बर घलाव नइ मिलही तइसे लागत हे। अँगना म सब शांत-शांत लागीस त बेंदरा मन चल देहें लागत हे कइके भगवन्तीन हर फइरका ल थोरकन खोल के झाँकथे, बेंदरा मन चल देहे रहंय। भगवन्तीन हर मुनगा के रुख ल देखथे, फर मन लटकत रहे तेला देखथे, बजरंग बली कती ल देख के हाथ जोड़थे,   महराज, बाँचे खोंचे हर सब तुंहरे सेथा ये कहेन त सब अपन सेना मन ल बुलवा लेहा। भगवन्तीन हर मने-मन मुचमुचाथे अउ बजरंगबली ल देखथे अइसे लागथे जइसे बजरंगबली घलाव ओला देख के मुचमुचावत हें। 


**अंजली शर्मा **

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ).

कहानी-शब्दभेदी बाण चन्द्रहास साहू

 शब्दभेदी बाण


                     चन्द्रहास साहू

                   मो 8120578897


"ददा ! मेहां गाँव के खेत अऊ घर ला बेचहू।''

अफसर बेटा शब्द के बाण चला दे रिहिस।लइका के गोठ सुनिस तब सियान ठाड़ सुखागे। लाहर-ताहर होगे। अब्बड़ कुछु गोठियाये के उदिम करिस फेर मुँहु ले बक्का नइ फुटिस। ससन भर देखिस बहु बेटा ला अऊ खोर कोती निकलगे।

                    अँजोर इही तो नाव हाबे सियान के। काया बिरबिट करिया जइसे लोहा के बने हाबे। घाम- पानी,दुख-पीरा जम्मो ला सहि लेथे। ......फेर लोहा कतको पोठ राहय जंग तो लग जाथे। संसो के दियार हा चुनत हाबे तरी-तरी। दुख गरीबी मजबूरी के अँधियारी मा तौरत-बूड़त हाबे अँजोर हा।

               अँजोर,बड़का आय। पाँच बहिनी अऊ एक भाई। ददा रिहिस थोकिन बने रिहिस फेर चारो बहिनी के बिहाव मा जैजात झर गे। बाचीस ते परसाडोली के पाँच एकड़ अऊ माता देवाला के एक एकड़ के खेत हा। ददा घला छेना के आगी बरोबर खपगे नत्ता-गोत्ता के मान-गौन मा। .........अब, अँजोर के पारी हाबे। तेहाँ जम्मो कोई ले नान्हें हरस बिमला बहिनी जतका पढ़बे ओतका पढाहू-पढ़िस ससन भर बिमला हा। अब बिहाव करत हाबे। भलुक सुरसा के मुँहु कस अब्बड़ महँगाई बाढ़त हाबे फेर महाबीर ऊप्पर जतका भरोसा हाबे ओतकी भरोसा हाबे अँजोर ला अपन फड़कत बाँहा अऊ ओगरत पसीना ऊप्पर। सुरता कर-कर के हियाव करत हे अँजोर अऊ गोसाइन सीता हा।अदौरी बरी तक ला कमती नइ करत हाबे बिहाव के जोरा-जारी मा। ....फेर ? हड़िया के मुँहु ला तोप डारतिस अँजोर हा फेर बहिनी के मुँहु ला कइसे तोपे  ?

"भइयां ! हमर जम्मो बहिनी के बिहाव करके ददा दाई हा सिरागे। अब तिही हाबस मोर ददा बरोबर - बड़े भाई। मेहां कुछु माँगहु तब देबे न ....?''

बहिनी बिमला के आँखी कइच्चा होगे। अँजोर घलो दंदरत हाबे।

"बता मोर दुलौरिन ! अपन मन के गोठ ला। सगा बनबे तभो तोर मान- गौन मा कमती नइ होवय बहिनी !...... मोर  तो डेरउठी मा हाबस तब  मोर जिम्मेदारी हरे तोर सपना पूरा करे के...। मेहां तोर साध ला पूरा करहुँ।'' 

अँजोर घला राजा दशरथ बरोबर वचन हार गे।

बिमला माइके मा हाबस तब तक अधिकार हाबे। सगा बन जाबे तब मांग के घला नइ खा सकस। बिमला के मइलाहा मन अऊ अंतस के बीख जुबान मा आये लागिस।

"इक्कीसवी सदी के मोबाइल कप्यूटर के जबाना मा पले बढ़े सबल नारी आव भइयां। जतका बेटा के अधिकार ओतकी बेटी के- समान अधिकार। सब ला पढ़े हावन। भइयां ! भलुक ए सी झन दे, टीवी के साइज ला नान्हे कर दे फेर ......... मोला, मोर बर सोन के रानी हार अऊ तोर दमाद बाबू बर फटफटी चाहिए।''

बिमला अपन होंठ के एक कोर ला चाबके किहिस। मुचकावत रिहिस रानी कैकयी कस, करू मुचकासी। रानी कैकयी के आगू मा लाचार रिहिस राजा दशरथ हा वइसने लाचार हाबे अँजोर हा।

"नोनी ! मेहां तीर ले घला नइ देखे हव ओ रानी हार ला फेर अतका जानथो फटफटी अऊ रानी हार के कीमत बर पहाड़ कस पइसा कुढोये ला परही। कहाँ ले आनहु अतका पइसा....?''

" ले ठीक हे भइयां !संगी-संगवारी,सास-ससुराल के मन गरीब घर के बेटी आय कहि मोला.........। बाप नइ हे तेला तो जानतेच हाबे जम्मो कोई।''

बिमला किहिस अऊ अपन कुरिया मा खुसरगे, रोवत। अँजोर समझाये के उदिम करिस फेर कपाट नइ उघरिस। अँजोर घला घेक्खर आय- एक जबनिया।

" अपन नस के लहू ला बेचके पूरा करहुँ तोर साध ला।''

 संदूक ले कुछु कागजात निकालिस अऊ झोला मा धरके रेंगे लागिस।

"काहाँ जावत हस मार तरमिर-तरमिर ?''

"उँहिन्चे....। सब ला बेच दुहुँ। खेत खार ..?''

"ताहन हमर एकलौता बेटा हा भीख माँगही ...?''

 अँजोर के गोसाइन सीता आय। बरजे लागिस। 

"इही परीक्षा के घड़ी आय सीता ! मोर ऊप्पर भरोसा राख। आज तक तोर गोड़ मा कांटा गड़न नइ देये हँव तब आगू घला नइ देव। धनहा खेत ले जादा मोर चाक ऊप्पर भरोसा हाबे। मोर कलाकारी ऊप्पर भरोसा राख। ईमान से मोर लइका के पढ़ई- लिखई मा कोनो कमती नइ होवन देवव।''

          सीता तो सिरतोन के सीता आय सुख अऊ दुख मा गोसाइया के पंदोली देवइया। दुनो कोई गिस शहर के सेठ दुकान मा अऊ बेच दिस परसा डोली के चार एकड़ खेत ला। बिसा डारिस फटफटी अऊ रानी हार ला।

 सीता हा चमकत सोनहा रानी हार ला देखे कभु  तब कभु सेठ के अँगना के मिट्ठी आमा मा गहादे अमरबेल ला।

बिहाव होगे धूमधाम ले अब।


जम्मो ला सुरता कर डारिस अँजोर हा।


              चाक किंजरत हाबे गोल अऊ माटी के लोई माड़े हे बीच पाटा मा। कोंवर लोई माटी के जौन बनाबे तौन बन जाही - चुकी-चाकी,पोरा करसा कलोरी भगवान के मूर्ति। फेर अँजोर तो अभिन करसा-कलोरी बनावत हाबे। गाँव मा भागवत पुराण होवइया हे। कलश  अऊ शोभा यात्रा निकलही। पंच कका ले एडवांस झोंक डारे हाबे। सीता घला पंदोली  देथे। 

         परिया ले माटी खनके मुंधेरहा ले आनथे। सुखोथे कुचरथे फुतकी बना के चलनी मा छानथे। पथरा गोटी ला निमारके  लोई बना के चाक मा मड़ाथे। लोई के फुनगी ला अँगठा मा मसक के  हाथ मा थपट के फूलोथे। जब बन जाथे  तब ओला पकोथे आगी आंच मा।

"थोकिन सुरता लेये कर संजय के बाबू ! अब तबियत पानी घला ऊँच नीच रहिथे।''

"का सुरताबे सीता ! भगवान के मूर्ति बनाये के हे ओ। भागवत ठउर मा रामजानकी दरबार के मूर्ति मड़ा के पूजा करही।बेरा मा जम्मो ला बनाये ला परही। आ तहुँ हा मोर संग बुता करे ला लाग।''

गोसाइन सीता के गोठ सुनके किहिस अँजोर हा। कोंवर माटी ला बेलके साँचा मा ढ़ाल के  थपट-थपट के बनाये लागिस अँजोर हा। आसीस देवत  प्रभु श्री राम लक्ष्मण माता जानकी अऊ माथ नवाके माड़ी मा बइठे लंगुरवा हनुमान जी के मूर्ति। जम्मो मूर्ति सौहत दिखत हे अब रंग रोगन अऊ सवांगा चढ़िस  तब। नहा धोके आइस आरुग कपड़ा पहिनिस अऊ पूजा के थारी सजा के करिया सादा पालिस ला ब्रश लगाके भगवान के आँखी उघारे लागिस अँजोर हा अऊ गाँव के सियान मन जय बोलाइस,पूजा करिस। 

सियावर राम चन्द्र की जय।।

                    आज सिरतोन मन अब्बड़ गमकत हाबे अँजोर के। पाछू दरी भागवत होइस तब पोथी पुराण ला बोहो के संकल्प लेये रिहिस अँजोर हा। लइका के नोकरी लग जाही ते रामदरबार के मूर्ति ला फोकट मा दुहुँ अइसे। आज देवत हाबे बना के। भलुक मूर्ति के दान करे ले नोकरी नइ लगे फेर लइका संजय हा घलो अब्बड़ मिहनत करे रिहिस। ददा के संग कुम्हारी बुता मा पंदोली  देके पढ़े। टाइम मैनेजमेंट करके पढ़िस तभे तो मंत्रालय मा नोकरी लगिस। ....अऊ सरकारी नौकरी लगिस तब  बेटी देवइया सगा के का दुकाल ....? शहरिया नेता हा तियार होगे अपन बेटी ला देये बर। 

                   अँजोर ला अइसे लागिस कि जिनगी के जम्मो अँधियारी भगा गे जइसे। सिरतोन मातादेवाला खेत हा अभिन दू तीन बच्छर ले अब्बड़ धान उछरत हाबे। अऊ दू रुपिया किलो सरकारी चाउर....। गरीबी के अँधियारी मा जोगनी बरोबर अँजोर करत हे।

          अँजोर हा चाक चला के दू पइसा कमा लेथे । अऊ अपन कला देखाके के घला नाचा गम्मत मांदरी नृत्य पंथी करमा सरहुल देखाके। दफड़ा मंजीरा बाँसरी मोहरी रुंजु तमुरा बांस गीत भजन गाके दू पइसा सकेल लेथे अँजोर हा। अँजोर हा तो कलाकार आय मुँहु फटकार के कभु नइ किहिस पइसा बर। वो तो लोगन के थपोली पाके उछाह मनाये फेर संस्था वाला ले भलुक पइसा मिल जाये तौन चाहा पानी के पुरती हो जावय। सिरतोन अँजोर के गरीबी दुरिहाये लागिस। अब्बड़ उछाह अऊ धूमधाम ले लइका संजय के बिहाव करिस।

           बारात परघाये के बेरा तो अँजोर बइहागे नाचे बर। समधी भेट करिस अऊ माथ मा बरत दीया मड़ाके झूमर-झूमर के मटक-मटक के नाचीस। भुइयाँ मा घोण्डे लागिस फेर दीया नइ बुताइस। जस गड़वा बाजा ताल देवय तस अँजोर के कलाकारी दिखे। कप मा चाउर अऊ चाउर मा कपड़ा सीले के सूजी । सूजी के सूचकी अगास कोती कप ले बाहिर कोती निकले हे। अँजोर दफड़ा बाजा बजाके आँखी के पलक ले उठाये के उदिम करिस। फेर बाजा के ताल नइ बिगड़ीस। एक बेरा...... दू बेरा..... अऊ अब  सिरतोन उठा डारिस। दुनो आँखी के पलक मा फँसे हे सूजी हा। देखइया जम्मो कोई थपोली मारिस। अँजोर अब्बड़ उछाह मा हाबे। बहुरिया ला परघा के लाने बर गिस तभो अब्बड़ नाचीस अँजोर हा।

"का सुरता करत हस मने मन अब्बड़  मुचकावत हस ।'' 

गोसाइन सीता आवय अँजोर ला मुचमुचावत देखके किहिस। अँजोर सुरता के तरिया ले निकलिस।अऊ अब भागवत ठउर मा चल दिस। 

             व्यास गद्दी मा बइठइया महाराज हा भलुक जम्मो कोई बर महाराज जी होही फेर गाँव के आधा जवनहा मन बर गुरुबबा आय। गाय बजाए नाचे कूदे जम्मो कलाकारी ला सीखोये हे अऊ अखाड़ा के करतब ला घला। सरलग पन्दरा सोला बच्छर ले गाँव मा आथे भागवत पढ़थे अऊ कला के अँजोर बगराथे। कुम्हार अँजोर घला सीखे हे।

            आज राजा दशरथ अऊ श्रवण कुमार के कथा ला सुनाइस व्यास गद्दी मा बइठे महाराज जी गुरु बबा हा। कइसे शब्दभेदी बाण चला देथे राजा दशरथ हा बेटा श्रवण कुमार ऊप्पर...।  दाई ददा के तड़पना....।  देखइया, सुनइया के ऑंसू निकलगे। .....अऊ ये का  ? दस ठन गिलास, गिलास मा घुँघरू ला डोरी ले बँधवइस मंच के चारो खूँट। अइसे तकनीक कि डोरी ला जइसे हलाथे वइसने घुँघरू ले आरो आतिस । 

"भक्त वत्सल श्रोता समाज हो ! शब्द भेदी बाण कला के जानकार राजा दशरथ अऊ राजा पृथ्वीराज चौहान  ला रिहिस। शब्द माने आवाज- जिहाँ ले उत्पन्न होवत हे उँही ला लक्ष्य मानके, निशाना लगाके भेदना ही शब्द भेदी बाण कला आय। महुँ हा साधना करके सीखे हँव तौन ला देखावत हँव।''

महाराज जी किहिस। आँखी मा पट्टी बाँधिस अऊ धनुष बाण ला संघार करके सुमिरन करिस।  मंच मा तीन बेरा परिक्रमा करिस। गाँव के सियान डोरी ला तीरे अऊ आरो आय गिलास मा बँधाये घुँघरू ले। निशाना लगाये लागिस आरो कोती- उत्ती बुड़ती रक्सहु भंडार। धनुष ले छुटे बाण छुई......ले करत जातिस

.....अऊ  ठप्प...ठन्न..... के आरो के संग गिलास कट के गिर जावे। देखइया मन श्री रामचन्द्र की जय बोलावय। एक ...दू... तीन....नौ ....दस ....। जम्मो निशाना भेद डारिस महाराज हा। दस बाण दस निशाना। जम्मो कोती जयकारा होये लागिस।

"अँजोर ! ले बेटा अब तेहाँ देखा अपन कला ला।''

गुरुजी किहिस अऊ भजन गाये लागिस। बाजा पेटी गुरतुर धुन निकालिस।

माथ मा लोटा, लोटा मा बरत दीया अऊ झूमर-झूमर के नाचे लागिस अँजोर हा। अब भुइयाँ के लोटा मा ठाड़े होगे। लोटा मा फुलकांछ के परात

। परात के बारा मा ठाड़े होगे अब। मुड़ी मा कुंटल भर ले आगर गाड़ा चक्का ला बोहाइस अब संगी मन। गाड़ा चक्का मा जगर-बगर करत ओरी-ओरी दीया। भजन के बाजा गाजा बाजत हाबे अऊ अँजोर के मटकना सिरतोन नटराज के आसीस सौहत दिखत हाबे। तभे तो लोटा परात अऊ गाड़ा चक्का संग कोन नाच सकही...?

सीता तो अघागे अँजोर ला देख के। 

"हाय दई ! कतक सुघ्घर नाचथे ओ बाबू हा !''

परोसी भौजी हा किहिस अऊ सीता लजा जाथे।

अखाड़ा दल वाला मन संग  मुड़ी मा चाहा बनाके गुरुजी ला चाहा पियाथे। कोनो छाती मा पथरा ला फोड़थे अऊ कोनो गघरा भर पानी ला दांत मा चाब के उठावत हे....। कतका सुघ्घर साधक हाबे ये गाँव मा। जम्मो के मन गदके लागिस। 

                जम्मो कोई थपोली मार के अँजोर अऊ वोकर संगवारी मन ला मान दिस। अऊ गुरुजी आसीस दिस।

"बेटा ! तोर साधना मा थोकिन कमी हाबे रे। शब्द भेदी बाण चलाये बर सीखत तो हस फेर निशाना चूक जावत हे।....अऊ मिहनत कर बेटा।''

"हांव गुरूबबा !''

"भागवत कथा के अंतिम दिन गीता पाठ अमृत वर्षा के पाछू जम्मो श्रोता समाज के बीच मा कला के प्रदर्शन करबे तेहाँ। वो दिन तोर संग फगवा सालिक अऊ परदेसी घला शब्दभेदी बाण चलाके अपन कला देखाही। अपन मन ला एकाग्र करके अभ्यास कर। मोर आसीस हे लक्ष्य ला जरूर अमराबे।''

"जी गुरु बबा ! पैलगी।'' 

गुरुबबा के डंडासरन होके पांव परिस अँजोर हा अऊ अपन घर लहुटगे।

   उदुप ले घर के मोहाटी चढ़त फेर सुरता आगे बेटा के गोठ हा।

ददा! मातादेवला खेत ला बेचहू। अब शहर मा रहिबोन जम्मो कोई। नवा फोरव्हीलर गाड़ी तो होगे हे लोन मा.... । अब, नवा बंगला घला हो जाही...। खेत ला बेचके बिसाबो नवा रायपुर के कॉलोनी मा बंगला। बेटा मुचकावत केहे रिहिस फेर ददा अँजोर के कलेजा कांप गे।  बहिनी के बिहाव के बेरा  महतारी कस परसा डोली बेचाइस अऊ अब मातादेवाला बर बानी लगा दे हे । 

"दुसर के लइका तो जुआँ चित्ती खेले बर खेत ला बेच देथे। मंद महुआ भांग पीये खाये बर जैजात ला बिगाड़ देथे । हमर संजय तो शहर मा बंगला बिसाये बर ......? गाँव के ला थोकिन बिगाड़  के शहर मा सिरजाही ते..... उछाह के गोठ आय न संजय के बाबू।''

सीता समझाये लागिस गोसाइया अँजोर ला। अऊ संजय....? ओ तो अब्बड़ सपना देखाये लागिस।  

भलुक बहिनी के बिहाव के बेरा के पाछू किरिया खाये रिहिस नानचुन भुइयाँ के बिगाड़ नइ करो अइसे फेर ......? अब अँजोर तियार होगे खेत बेचे बर। मोल भाव होगे सेठ संग।

          आज घलो बहु बेटा गाँव आये हे शहर ले। मन अब्बड़ गमकत हाबे कलाकार अँजोर के। अपन धनुष मा रंगबिरंगी फुन्द्रा बाँध डारिस। बाण ला सजा डारिस। दिनभर उपास रहिके  दसो बेरा अभ्यास करिस। सीता कतको बेरा किहिस खाये बर फेर अँजोर तो ढीठ आवय।

"आज मोर साधना के परीक्षा आवय सीता ! मोला झन जोजिया खाये बर। आज मोर कला ला जम्मो गाँव वाला के आगू मा देखाहु अऊ प्रसाद के संग आसीस लुहुँ गुरुबबा ले।...... तब खाहु।''

अँजोर मुचकावत किहिस। सिरतोन आँखी मा पट्टी बाँधके आज जतका बेरा अभ्यास करिस वोतका बेरा लक्ष्य नइ चूकिस। गुरुबबा कस दस बाण अऊ दस लक्ष्य ला साध डारिस अँजोर हा। मुचकावत नवा धोती पहिरिस। कनिहा मा लाल गमछा बाँधिस। महाबीर के पूजा करिस अऊ धनुष बाण ला खाँध मा अरोइस । सुमरन करत घर ले बाहिर निकले लागिस फेर.......अब पनही ला खोजत हाबे। अँगना दुवार फुला पठेरा जम्मो ला खोजिस।..... नइ मिलिस। अब बहु बेटा के कुरिया के आगू के पठेरा मा खोजे लागिस। 

बहुरिया के हाँसे के आरो आवत हे अऊ दुलरवा बेटा संजय के खिलखिलाये के। 

"तोर कंजूस ददा ला खेत बेचे बर राजी करके बने करेस। आने बड़का साहब के गोसाइन मन बरोबर अब  महुँ हा रानी हार पहिरके इतराहु। जम्मो संगी संगवारी लरा-जरा ला देखाहु। तोरो माथ उच्चा अऊ छाती चाकर हो जाही। ....मोला कतका सुघ्घर फबही..... ? कतका सुघ्घर दिखहूँ....?''

अँजोर के बहुरिया गमके लागिस अऊ बेटा संजय मुचकावत हे।

"सिरतोन गोदभराई के दिन रानीहार बिसा के दुहुँ तोला तब सास ससुर घला देखते रही जाही.....। कतका मान सम्मान बाढ़ जाही मोर.....? सास ससुर बर बेस्ट दमाद बाबू बन जाहू मेहाँ। मोर सोना ! मेहाँ तोला नौलखा रानीहार दुहुँ सधौरी के दिन अऊ तेहाँ मोला सुघ्घर लइका के गिफ्ट देबे बेरा मा। सिरतोन मजा आ जाही....हा.... हा..... हा.......।''

अम्मल वाली गोसाइन के पेट ला चूमे लागिस संजय हा। अब दुनो जुगजोड़ी खिलखिलावत हाँसे लागिस। 

              अँजोर कभु काखरो गोठ ला लुका के नइ सुने फेर आज सुन डारिस सौहत शब्द के  बीख बाण ला । झिमझिमासी लागिस। लहू के संचार बाढ़गे। सांस उत्ता-धुर्रा चले लागिस। मुँहु चपियागे । धड़कन बाढ़गे। जइसे शब्द भेदी बाण मा करेजा छलनी होगे। 

"बहुरिया तो पर के कोठा ले आये हे .....! बेटा....! तेहाँ अपन लहू होके मोला ठगत हस रे....। मोला खेत बेचवा के बहुरिया बर रानी हार बिसाये के योजना बनावत हस रे ....! लबरा.. । तेहाँ बोदरा निकलगेस रे.... मोर दाऊ.......!  मोर बर मइलाहा भाव राखेस रे...  ? ..लहू के संचार के संग शब्द के बीख नस-नस मा दउड़े लागिस। अइसे लागिस अँजोर ला जइसे ऋषि दुर्वासा बरोबर श्राप दे देव सर्वस्व नाश के ....? सिरतोन कुछु केहे के उदीम करत दुनो हाथ उठाइस अँजोर हा । 

"तोर लइका तुंहर दुनो के नाव के अँजोर करे रे अऊ  श्रवण कुमार बरोबर जतन करे तुंहर दुनो के । मोर आसीस हाबे।''

 अँजोर किहिस अब्बड़ मुश्किल ले। छाती मा पीरा उठिस एक उरेर के... अऊ गिरगे दुवारी  मा। 

         कोनो ला आरो नइ होइस अँजोर गिरीस तेहाँ । बहु बेटा के कुरिया मा टीवी ले फ़िल्मी गाना बाजत हाबे अब। अऊ गाँव के भागवत पंडाल ले गीता पाठ के आरो। तुलसी वर्षा के बीच गंगा राम शिवारे के भजन  सुनावत हे।

चोला माटी के हे राम , एकर का भरोसा चोला माटी के हे राम.......।।

द्रोणा जइसे गुरू चले गे...।

करन जइसे दानी संगी, करन जइसे दानी.. ।।

बाली जइसे बीर चले गे...।

रावन कस अभिमानी ....।

रावन कस अभिमानी संगी रावन कस अभिमानी ....।।

चोला माटी के हे राम

एकर का भरोसा, चोला माटी के हे राम.....।।

              

              सीता के भाग मा फेर गोसाइया ले वियोग लिखा गे अँजोर के अँगना मा। अऊ शब्द भेदी बाण ....? कभु अबिरथा गेये हे का......?

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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

पिन 493773

मो. क्र. 8120578897

Email ID csahu812@gmail.com

Saturday 23 April 2022

कहानी-करमजली**

 **कहानी-करमजली**

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      एड़हा कबे त बेड़हा रेंगय, सीधा बात के उलटा जवाब। जऊन मेर रही हाँव-हाँव, काँव-काँव। नानपन ले अइसने हे।  कोनो ल कभू सीधा मुँह बात नइ करीस। पूस के महीना म जनम लीस त नाव रखीन पुसउतीन!  जनमते ले पूस के ठंडी धर लीस त फेर कभू देंह नइ पइस। जइसने बाढ़त गइस तइसने चिड़चिड़ावत रहय। कोनो आवाज दे; पूसउतीन , त कहे; का पुसउतीन, का होगे पुसउतीन ल, काय देत ह पुसउतीन ल, जेला देखबे ते पुसउतीन कहत रहीं। अब तो लईका मन घलाव ओला जंगवाय बर धर लें। मुठा भर के ओकर शरीर ल देख के कोनो टेटकी कहंय, त कोनो ओकर टेंगराही देख के टेंगरहीन कहंय, त कोनो झगरहीन कहंय, जइसने ओकर काम तइसने तइसने ओकर नाम। ओकर दाई हर समझाय सब ले बने हिलमिल के रहे कर बेटी; सब ले बढ़िया गोठ बात करे कर। अपन दाई बर कउआ जाय। जा तो ओमन ल समझाबे मोला कछू कछू कहत रथें तेमन ल। दाई हर कहे; ये करमजली हर रे! बने सीखाबे त उलटा कथे। ओकर दाई ल ओकर बहुते फिकर होवय।

     जइसने-जइसने बाढ़त रहय वइसने वइसने अउ लड़ंकनीन होवत रहय। स्कूल गइस त जइसने गइस वइसने वापस,  स्कूल म घलाव सब ल लड़ झगड़ के आगे घर म आके बस्ता ल फेंक दीस मोला नइ पढ़ना हे मैं नइ जांव स्कूल! भाई- बहिनी मन ल बोलथे जावा तुमन बड़का पुलिस-कलेक्टर बनिहा। अब गाँव म तो अइसे हे या तो हाथ म स्लेट बत्ती कलम दवात धर नइ तो छेना थाप। पुसउतीन ल छेना थापे जादा भा गे। छेना थापे म ओकर कोनो मुकाबला नइ कर सकंय। ओकर दाई हर कहय कम से कम अपन नाव-गाँव लिखे के पुरता तो पढ़ दारतीस, ये करमजली हर कइसे करही येकर का होही मोर समझ म नइ आय। भाई- बहिनी मन के शादी-बिहाव होगे। बहिनी मन अपन ससुराल जल दिन, घर म भौजाई मन के डेरा होगे। भतीज- भतीजी होके सब रेंगे ल धर लीन अउ बाड़ के स्कुल जाय ल शुरु कर दीन। अब तो संग जंवरिहा सब अपन अपन घर द्वार अपन अपन काम धंधा म लगे रहंय। गाँव म नावा नावा बहु धिया, नावा नावा लोग लइका मन होगे रहंय ओकरे संग म अब ओकर पुसउतीन नाव घलाव नन्दा गय रहय अब तो सब ओला करमजली ही कहंय। अब कोनो करमजली कइके हांक पारय घलव त काये कहय। 

    माँ-बाप के जइसे-जइसे उमर होवत जात रहय, ओमन ल करमजली के चिंता सतावत रहय, हमर बाद येकर काय होही; कोन येला पूछही येकर मुँह देख के। दाई हर ओकर ददा ल कथे, येकरो बर कोनो कती देख के येकरो बर-बिहाव कर देतेन, ददा हर कथे चिंता तो महुं ल हावय महुं वही सोंचत हंव जे तैं सोंचत हस पर येकर अनमिठात रुप रंग अउ अनसुहात गोठ बात कोन बिहाव करही। करमजली के दाई हर कथे;  कोनो मेर दूजहा-मूजहा दिखतीस तभो ले बन जातीस।  पता चलथे गाँव के तीरे म एक दू गाँव के आड़ म एक ठन गाँव रहय तिहें के एक झन बने किसान हे ओहर दू ठन बिहाव कर दारे हे फेर एको झन लोग लइका नइ हे, ओहर तीसरइया खोजत हे। अँधरा ल आँखी नीक, करमजली के दाई-ददा ल लागीस के एही मौका बने हे, तुरंत खबर भेज के ओमन ल बुलवा दारिन, चार झन सियान मन ल जोर के सब कुछ तय होगे आनन-फानन चारे दिन म करमजली अपन ससुराल म। 

         भरे-पूरे घरद्वार कछू के कमी नहीं। कमिया-कमेलीन, नौकर-चाकर, जउन खाना हे जइसे पहिनना ओढ़ना हे, जइसे मन परिस तइसे करे बर सब छुट हे। पति अउ दूनो सउत ल तो ओकर से येही आस हे कि ओकर एक दू ठन लोग लईका हो जाय, घर ल वारिस मिल जाय बाकि ओला जइसे रहना हे रहय का फरक परत हे। करमजली घलाव खुश। अव्वल तो ओला इहां कोनो करमजली नइ कहंय, दूसर जउन मन परे तउन खा पी, रंग-रंग के नावा-नावा लुगरा, पोलका, आनी-बानी के गहना गुठा सब पहिरे बर मिलत रहय। अब तो मइके म घलाव ओकर पूछ पूछारी बढ़ गे। मइके ले ददा हर भाई भतीजा मन संग ओला लेवाय बर आय हे, ससुराल म मइके वाला मन के मान सम्मान तो होईस ससुराल ले करमजली के बिदाई घलाव बड़ा मान-सम्मान के साथ होईस। बड़की सउत हर ओकर हाथ म पइसा देके कथे ये ले अपन भाई-भतीज मन बर कछु ले देबे, सब ल दू दी चार चार पैसा दे देबे अउ जल्दी आ जाबे। करमजली अपन सउत के अतका बात ल सुन के गदगद हो जाथे। मइके जाथे उहाँ सब ओकर रस्ता देखत रहंय। मइके म ये दारी बड़ मान सम्मान मिलीस। गाँव भर ओकर पूछ पूछारी बढ़ गे। कइसे पंद्रह दिन हर कट गे कछु पता नइ चलीस अउ ओकर बिदाई के तियारी शुरु होगे। खुरमी ठेठरी पपची अइरसा गुझिया लड्डू अउ किसिम किसिम के बनत रहय। करमजली आज अपन करम ल संहरावत रहय जतका के गुने नइ रहीस ततका ओला मान-सम्मान मिलत है। ससुराल ले लेवाल आगे   त ओकर दूसर बिदाई घलव होगे। 

       जइसे-तइसे तीन बछर होगे, तीज-तिहार म आना-जाना लगे रहीस अउ दिन हर कइसे निकल गे पता नइ चलीस। येती ओकर सउत मन दिन गिनत रहंय, तीन बछर होगे अभी ले कछू नइ दिखय कइसे! येती करमजली के दाई ददा ल घलाव फिकर होवत रहय, तीन बछर होगे कइसे अभी तक कछू पता नइ चलीस, लोग लइका खातिर ले गे हें, अतक मया दुलार म राखे हें, नइ होही त का होही कहिके चिंता होवत रहय। एक कति ससुराल वाला मन निराश होवत रहंय त एक कति मइके वाला मन ल चिंता होवत रहय। अब धीरे-धीरे ससुराल वाला मन के ब्यवहार घलाव हर ओकर प्रति बदलत रहय। पहिली जउन बात म मया दुलार दिखय वही बात म अब सब रुक्खा रुक्खा लागय।

      करमजली के दाई ल बहुत चिंता होवत रहय, महतारी के मया बेटी के बसे बसाय घर हर ऊजर जाही अइसे सोंच के मन बईठत जात रहय। बेटी ल बने पूजा पाठ करे, सोला सोमवार करे बर कथे। कईनो झन बईगा गुनिया के नाव लेथें जा के बने देखवा सुनवा कथें त कोनों बैद डॉक्टर ल बताय बर कथें। सब करवा दारथें। 

      अब सोला सोमवार के महिमा के बैद डॉक्टर के प्रभाव या कि बईगा गुनिया के किरपा जो भी हो अब्बड़ दिन म सही फेर भगवान चिनहीस करमजली ल। एक बार फेर सब हाथों हाथ लेवत रहंय, पूछ परख बढ़ गे। नव महीना तो सुग्घर कट गे, घर म खुशी के ठिकाना नइ रहय। दिन आगे सब बेटा के आस लगाय रहें फेर करमजली के फूटहा करम येहू मेर नइ छोंड़िस। सब ओला अइसे सुनावत रहंय जइसे ओहर अपन लईका ल जानबूझ के अपन पेट भीतर मार दारिस। करमजली अपन दाई के संग म मईके आगे, ये दारी के अइस त इहें के होगे र गे। ससुराल ले कोई बुलावा नइ अइस। अब फिर वही पहिली जइसे हाल होगे बल्कि पहिली से भी बदतर। अब तो दाई ददा घलव सियान होगे रहंय बुढा़पा के शरीर सम्हलत नइ रहय त बेटी ल काय सम्हालतीन लेकिन बेटी के मया छोंड़ भी नइ सकय। भाई-भौजी के सियानी फेर भाई भौजी के अपन बेटा- बहु नाती-पोता सब भरे-पूरे। दूनों बेरा चाय- रोटी, खाना-पीना मिल जावत रहय ओही म खुश रहय।

       धीरे-धीरे समय बीतत गइस करमजली के ददा स्वर्ग सिधार गे त ओकर दाई घलाव खटिया धर लीस अउ एक दिन ओहू स्वर्ग सिधार गे। दाई-ददा के गए ले करमजली अधर होगे। अब फिर वही चिड़चिड़ापन। जइसे-जइसे ओहर चिड़चिडा़वय लईका मन अउ जंगवाय। भिनसरहा ले उठ के गाय गरुवा मन ल देखना, कोठा के गोबर कचरा साफ करना, खोल गली बहारना रोज के बूता रहय। सब ल बेरा ऊअत ले सुतय देखे त कलल - कलल करे लागथे। ओकर भौजी कहय ये कलकलही हर बिहान ले कलल-कलल शुरु कर देथे, ये करमजली ल न अपन नींद आवय न दूसर ल सूतन दे। कलकलही कहत सुनय तंह ले आगी बर जाय   हमन कलकलही अन, तुमन सरोत्तर अ, हमन करमजली अन, तुंहर भाग हर फहरावत हे। रात भर नींद नइ आवय, बिहान ले बहारना-बटोरना, ग्यारह- बारह बजय तंह ले मूड़ ल धर ले पीरावत हे कह के, ओकर-ओकर ले दवाई पूछय! कोनो कहय जाना ओदे कनेर हर फरे हे दू ठन टोर के खा ले, कोनो कहय धतुरा फर ल खा के सूत जा। सुन के जंगमान हो जाय, दवई पूछबे त रोगहा मन धतुरा फर, कनेर फर ल बताथें, जावा तुमन खा लेवा कनेर फर, धतुरा फर ल, देखिहा रे रोगहा हो तुंहरो समय आही मोर ले अउ बित्तर होइहा अइसने-अइसने कथें त मोर एड़ी के रीस तरुआ म चढ़ जाथे। गाँव म कोनो ल नइ पतियाय सिर्फ चंदु ( चंद्रशेखर ) भर ल पतियाय जब कछू जरुरत होय रेंगे-रेंगे ओकरे करा जावय। कभू बोट डारे नइ जावय, कहय हमन ल काय मिलही अपन-अपन घर ल भरहीं रोगहा मन, पाहीं त धरहीं संदुक-बक्शा म तारा-कुची म, चल बोट डारे कथें, हमन नइ जात हन। 

      एक दिन करमजली के नाव ले के घर म बने लड़ई-झगड़ा होगे त ओकर भाई हर करमजली ल कइ दिस तैं जा तो कोनो कति ए मेर ले टर दे। करमजली ल भाई के बात हर अतेक लाग दिस एकर पहिली ओकर भाई हर ओला कभू कछू नइ कहे रहीस, दाई-ददा के जाय के बाद एक झन ओही तो रहीस जउन ओकर पक्ष ले के बोलय आज ओहू कइ दिस। ओहर ओमेर ल चल दिस, थोड़े देर बाद झगड़ा शांत होगे अउ सब अपन-अपन काम धंधा म लग गइन। मझनिया बेरा जब खाय के बेरा होइस जब सब खाय बर बइठीन त ओकर भौजी हर कथे वो कलकलही कहाँ हे रे! कछु खईस हे के नहीं। तब सबके ध्यान अइस, सब डहर खोज दारिन कहीं पता नइ चलीस, शाम होगे त सब ल चिंता होइस। गाँव म सब घर खोज दारिन कहीं नइ रहय। बिहान होइस त ओकर ससुराल म जाके देख अइन उहां भी नहीं। ममा घर, फूफू घर, मोसी घर अउ जहाँ-जहाँ अंदेशा रहीस सब जगह खोज दारिन कहीं नइ मीलिस। 

      बड़े भतीजा के एक्सीडेंट होगे लंबा चौड़ा ईलाज चलीस दो- दो, तीन-तीन ऑपरेशन, लंबा-चौड़ा खर्चा, खेत बेचे के नौबत आगे। खेत के सौदा होगे लेकिन खेत के रजिस्ट्री नइ होइस पुसउतीन के हस्ताक्षर लगही! फिर एक बार खोज-खबर जोर पकड़ लीस। खेत बेंचना जरुरी रहय, रजिस्ट्रार बिना पुसउतीन के रजिस्ट्री नइ करत रहय। तभे कोर्ट  ले एकठन अउ नोटिस आथे पुसउतीन उर्फ करमजली के नाम से। ओकर नाव के नोटिस, कोर्ट म अनिवार्य रुप से उपस्थित होना हे। ससुराल म पति के मृत्यु अउ दूनों पहिली पत्नी मन के खतम होय के बाद कोर्ट हर उहाँ के जमीन जायदाद सारी चल-अचल संपत्ति जेकर कीमत लगभग पाँच करोड़ ले ऊपर रहय तेकर अकेला वारिस पुसउतीन उर्फ करमजली ल बनाय रहय। गाँव गाँव, शहर-शहर खोजत रहं, ओकर खोज म पुलिस लगे रहय। अखबार म फोटो, रेडियो, टीवी, सिनेमा हाल, बस स्टैंड, रेल्वे स्टेशन, का जमीन खा गे या आसमान निगल गे। येती जमीन के रजिस्ट्री नइ होवत रहय, ओती कोर्ट हर माने बर तैयार नइ रहय। अगर जिंदा नइ है त मृत्यु प्रमाण पत्र चाहिये कहत रहय। कोर्ट हर साफ कइ दे रहय यदि पुसउतीन उर्फ करमजली हर उपस्थित नइ होही त सब जमीन जायदाद ल राजसात कर लिये जाही जेमा गाँव म चार ठन खार म चार-चार एकड़ के चक रहय, चार एकड़ के तलाव कुआं-बावली, गाँव म बाड़ा रहय जेकर करोड़ों म कीमत रहय। पाँच-सात करोड़ के मालकिन आज पता नहीं कोन कति भटकत रहय। आज सब के मन म ग्लानि होवत रहय। जहाँ बइठे वहीं ले ओला उठा दें त ओहर कहय; कुकुर बना दारे हें हर जगह ले दुर्रावत रथें। हमर ठऊर नइ हे कोनो मेर। आज मथुरा, वृंदावन, हरिद्वार, हर ठऊर म ओकर खोज होवत हे कहीं तो मिलय ये करमजली हर!


**अंजली शर्मा **

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

कारक रचना //*

 *// छत्तीसगढ़ी व्याकरण- कारक रचना //*

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जऊन शब्द के सहायता से वाक्य म  संज्ञा या सर्वनाम के संबंध म जानकारी होथैं, ओ ला "कारक" कहिथैं |

      हिन्दी म कारक के संख्या ८ माने गए हवंय | तईसनेच छत्तीसगढ़ी भाषा म कारक ८ होथैं  :--

*१. कर्ता कारक -"ने"*

  उदाहरण- सोहन ने परीक्षा उत्तीर्ण की |


  *छत्तीसगढ़ी व्याकरण*

*कर्ता-"ह"*

उदाहरण-सोहन ह परीक्षा पास करिस/ होईस


*२. कर्म कारक-"को"*

सोहन ने मोहन को बुलाया |

*छत्तीसगढ़ी व्याकरण*

*कर्म -"ल"*

सोहन ह मोहन ल बुलाईस |


*३. करण कारक- "से"*

सोहन से मोहन गोरा है |

*छत्तीसगढ़ी व्याकरण*

*करण कारक-"ले"*

सोहन ले मोहन गोरिया/गोरा हवय |


*४. सम्प्रदान कारक- "को के लिए"*

मोहन ने सोहन के लिए साइकिल खरीदी |

*छत्तीसगढ़ी व्याकरण*

*संप्रदान कारक- "बर, खातिर, वास्ते*

मोहन ह सोहन बर साइकिल खरीदीस/बिसाईस |


*५ अपादान कारक-" से"*

मोहन से सोहन अलग रहता है |

*छत्तीसगढ़ी व्याकरण*

*अपादान-"ले"*

मोहन ले सोहन अलग रहिथे |


*६. संबंध कारक-" का के की"*

मोहन का चस्मा काला है |

गीता की चस्मा नीली है | 


*छत्तीसगढ़ी व्याकरण*

*संबंध कारक-"के"*

मोहन के चस्मा काला हे/हवय | 

गीता के चस्मा नीला हे/हवय |


*७. अधिकरण कारक-"में पर"*

मोहन का घर बिलासपुर में है |

चिड़िया डाल पर बैठी है | 


*छत्तीसगढ़ी व्याकरण*

*७. अधिकरण-"म"*

मोहन के घर बिलासपुर म हे/हवय |

चिरई डगाली म बैठे हे/हवय |


*८. संबोधन कारक-हे हो अरे !*

हे बालक ! तुम्हें कैसे चुप कराऊं ? 

अरे मूर्ख ! तुम्हें कैसे समझाऊं ? 

ओ हो ! यह तो बहुंत दुखद घटना है !


*छत्तीसगढ़ी व्याकरण*

*८ -संबोधन कारक-"अरे ! हे राम ! हाय राम ! ओ हो !*

अरे लईका ! तोला कैसे चुप करावौं ? 

अरे मूरख ! तोला कैसे समझावौं ? 

ओ हो ! ए तो बहुत दुखद घटना आय !

हे राम ! ओकर आत्मा ल शांति दे ! 


*गया प्रसाद साहू*

  "रतनपुरिहा"

Friday 22 April 2022

छत्तीसगढ़ी व्याकरण : वाच्य*

 


.      *छत्तीसगढ़ी व्याकरण : वाच्य*

                             ( 1 )


परिभाषा- *क्रिया के रूपान्तरण* *ला वाच्य कहिथें।* एकर ले ये पता चलथे कि वाक्य म काकर प्रधानता हे ? - *कर्ता* के, *कर्म* के या फेर *भाव* के।


      छत्तीसगढ़ी व्याकरण के मानकीकरण म *वाच्य* ला सबले महत्वपूर्ण माने जा सकत हे; काबर कि क्रिया के रूपान्तरण  ले ही छत्तीसगढ़ी के रद्दा आन भाषा ले अलग-बिलग होवत हे। एला छोटकुन उदाहरण ले समझे जा सकत हे-


 *हिन्दी*- मैं जाता हूँ। / मैं जाती हूँ।

 *अंग्रेजी*- I go.

 *छत्तीसगढ़ी*- मैं जाथौं।


 *हिन्दी*- वह जाता है। / वह जाती है। 

 *अंग्रेजी*- He goes. / She goes.

 *छत्तीसगढ़ी*- वोह जाथे।


    उपर के उदाहरण ले ये स्पस्ट हे कि *छत्तीसगढ़ी* के क्रिया पद म परिवर्तन *लिंग* के आधार म नि होवत हे; जबकि *हिन्दी* के क्रिया पद म परिवर्तन ( जाता / जाती ) अउ *अंग्रेजी* के *सर्वनाम* ( He / She ) म परिवर्तन *लिंग* के आधार म होवत हे।....... *सबो बोली/भाषा मन एही तरा अपन रद्दा अलग- बिलग करथें।*



.       *वाच्य के तीन भेद होथे*-


1) कर्तृवाच्य

2) कर्मवाच्य

3) भाववाच्य


1) *कर्तृवाच्य*- जब क्रिया रूप म परिवर्तन *कर्ता* के कारण होथे या वाक्य म *कर्ता* के प्रधानता के बोध होथे; तब ओला कर्तृवाच्य कहिथन। जइसे-


# मैं दुकान *गे रहेंव*। ( मैं दुकान गया था। )

# वोह दुकान *गे रहिस*। ( वह दुकान गया था / गई थी। ) 


      इहाँ कर्ता ( मैं / वोह ) के कारण क्रिया पद म परिवर्तन होवत हे। एकर कारण इहाँ *कर्तृवाच्य* होही। 


2) *कर्मवाच्य*- जेन वाक्य म *कर्म* के प्रधानता रहिथे या *कर्म* के कारण *क्रिया रूप* म परिवर्तन होथे, ओला *कर्मवाच्य* कहिथन। जइसे-


# किताब पढ़े गइस।( पुस्तक पढ़ी गई।) 

     ये वाक्य म *कर्म* ( किताब/पुस्तक) के प्रधानता हे अउ ओकरे अनुसार क्रिया पद म परिवर्तन होवत हे। एकर कारण इहाँ *कर्मवाच्य* होही।


3) *भाववाच्य* - वाक्य म जब *भाव* के प्रधानता होथे अउ ओकर कारण *क्रिया* पद म परिवर्तन होथे; तब ओला *भाववाच्य* कहिथन। जइसे-


# सीता ले दूध नि/नई पिये जात हे। ( सीता से दूध नहीं पीया जा रहा है।)

     ये उदाहरण म *भाव* ( पीया जाना ) के प्रधानता हे। एकर कारण इहाँ *भाववाच्य* होही।


                            ( 2 )


                  *क्रिया के प्रयोग*


कोनो भी वाक्य म क्रिया काकर अनुसरण करत हे'- *कर्ता, कर्म* या *भाव* के ? - एहर महत्वपूर्ण हे। ये आधार म क्रिया के तीन प्रकार के प्रयोग माने जाथे-

1) *कर्तरि प्रयोग*

2) *कर्मणि प्रयोग*

3) *भावे प्रयोग*


1) *कर्तरि प्रयोग*- छत्तीसगढ़ी म क्रिया के वचन कर्ता के अनुसार होथे। जइसे-


# महिमा आमा खाथे। ( महिमा आम खाती है।)

- ये उदाहरण म *कर्ता* ' महिमा ' *एकवचन* हे अउ *क्रिया* ( खाथे ) ओकर अनुसरण करत हे।


# ओ लोगन मन आमा खाथें। ( वे

 लोग आम खाते हैं।) 

- ये उदाहरण म *कर्ता* ' ओ लोगन मन ' *बहुबचन* हे अउ *क्रिया* ( खाथें ) ओकर अनुसरण करत हे।


  *हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी म अन्तर*

    हिन्दी म कर्ता के लिंग के आधार म क्रिया के लिंग के परिवर्तन होथे। जबकि छत्तीसगढ़ी म कर्ता के लिंग के क्रिया उपर कोई प्रभाव नि पड़े। जइसे- 


# राम आमा खाथे।( राम आम खाता है।)

# सीता आमा खाथे। ( सीता आम खाती है।)


    उपर के दुनों उदाहरण ल देखव। *हिन्दी* म *कर्ता* ' राम या सीता ' के लिंग के अनुसार *क्रिया* के लिंग ' खाता/खाती ' म परिवर्तन होवत हे जबकि छत्तीसगढ़ी म *क्रिया* ' खाथे ' स्थिर हे।



2) *कर्मणि प्रयोग*- *हिन्दी* म क्रिया के *लिंग* अउ *वचन* कर्म के अनुसरण करथें। एही ला कर्मणि प्रयोग कहे गे हे। जइसे-


# मोहन ने किताब पढ़ी।( मोहन किताब ला पढ़िस।)


# मोहन ने किताबें पढ़ीं। ( मोहन किताब मन ला पढ़िस।)


      - उपर के उदाहरण ला देखव अउ गुनव।.....  हिन्दी म ' *किताब* ' ( स्त्रीलिंग, एकवचन ) व *किताबें* ( स्त्रीलिंग, बहुवचन ) के अनुसार क्रिया के रूप क्रमशः ' *पढ़ी*' अउ ' *पढ़ीं*' परिवर्तित होय हे। जबकि छत्तीसगढ़ी म क्रिया के रूप ( *पढ़िस*) स्थिर हे  अर्थात ओमा कोनो बदलाव नि आय हे।


 *निष्कर्ष*- हिन्दी म कर्मणि प्रयोग होथे जबकि छत्तीसगढ़ी म कर्मणि प्रयोग नि होय।


3) *भावे प्रयोग*- जब वाक्य म *क्रिया* के लिंग अउ वचन *कर्ता* के अनुसरण नि करे अउ सदैव एक समान ( *एकवचन,* *पुल्लिंग*) रहिथे; तब ओला भावे प्रयोग कहिथन। जइसे-


# राम ले पढ़े नि जाय।( राम से पढ़ा नहीं जाता।) 


# सीता ले पढ़े नि जाय।( सीता से पढ़ा नहीं जाता।)


# टूरा मन ले पढ़े नि जाय।( लड़कों से पढ़ा नहीं जाता।)


     उपर के तीनों उदाहरण ला देखव अउ गुनव। तीनों उदाहरण म क्रिया ( *जाय/जाता* ) *एकवचन* अउ *पुल्लिंग* हे  अउ ओह कर्ता ( *राम/सीता/लड़कों/टूरा मन*) के अनुसरण नि करत हे अर्थात कर्ता के अनुसार क्रिया के पद परिवर्तन नि होवत हे।


 *निष्कर्ष*- हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी दुनों म भावे प्रयोग एक समान होथे।


   *संप्रति*( कुल मिला के ), *हिन्दी* अउ *छत्तीसगढ़ी* भाषा म *क्रिया* के प्रयोग के तुलनात्मक विश्लेषण करे म  निम्न बात सामने आथे-


1) *कर्तरि प्रयोग* - हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के कर्तरि प्रयोग म अन्तर हे।


2) *कर्मणि प्रयोग*- हिन्दी म कर्मणि प्रयोग होथे; छत्तीसगढ़ी म कर्मणि प्रयोग नि होय।


3) *भावे प्रयोग*- हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी म भावे प्रयोग एक समान होथे।


         डाॅ विनोद कुमार वर्मा

   कहानीकार, समीक्षक, संपादक

                 बिलासपुर


मो.:     98263-40331

ईमेल: vinodverma8070@gmail.com

छत्तीसगढ़ी व्याकरण : क्रिया*


 

.     *छत्तीसगढ़ी व्याकरण : क्रिया*

                         ( 1 )


 *परिभाषा-* जेन शब्द ले कोनो काम के होना या करना समझे जाय या  व्यक्त हो, ओला क्रिया कहिथें। जइसे- 

 *खाबो* ( खाना ), *पीबो* ( पीना ), *पढ़बो* ( पढ़ना ), *लिखबो* ( लिखना ) आदि।


     वास्तव म क्रिया विकारी ( परिवर्तित ) शब्द हवय अर्थात मूल शब्द म विकार या परिवर्तन होय ले क्रिया शब्द बनथे। जइसे- *पढ़*  मूल शब्द हवय अउ ओमा विकार उत्पन्न होय के बाद ' *पढ़त ( पढ़ना ) '* शब्द बनथे। एही शब्द ला *क्रिया* कहिथें। 


 *धातु*- क्रिया के मूल रूप ला धातु कहिथें अर्थात धातु ले ही क्रिया पद के निर्माण होथे। जइसे-

  ' मैं पढ़त हँव।'- एमा *पढ़त* शब्द *पढ़* धातु ले बने हे।


 *धातु के दू भेद होथे-*

अ) मूल धातु  

ब) यौगिक धातु


अ) *मूल धातु*- एहा स्वतंत्र होथे  अउ कोनो आन शब्द उपर निर्भर नि रहे। जइसे- *जा, खा, पी, रह, चल, पढ़* आदि।


ब) *यौगिक धातु*- एकर रचना मूल धातु म प्रत्यय लगाके, कई धातु ला संयुक्त करके या फेर संज्ञा अउ विशेषण म प्रत्यय लगाके बनाए जाथे। जइसे- *जाना, खाना, पीना, रहना, चलना, पढ़ना* आदि।


 *_यौगिक धातु के रचना तीन प्रकार ले होथे-_* 


अ) *प्रेरणार्थक क्रिया ( धातु )* - जेन क्रिया ले कर्ता स्वयं कार्य नि करके कोनो दूसर मन ला काम करे के प्रेरणा देथे, ओला प्रेरणार्थक क्रिया कहिथें।


 *मूल धातु     मूल क्रिया     प्रेरणार्थक क्रिया* 


उठ             उठना           उठाना, उठवाना

उड़             उड़ना          उड़ाना, उड़वाना

चल             चलना        चलाना, चलवाना


ब) *यौगिक क्रिया (धातु )* - दू या दू ले जादा धातु के संयोग ले यौगिक क्रिया बनथे।

जइसे- उठ जाना, खा लेना आदि ।


स) *नाम धातु*  - संज्ञा या विशेषण ले बनइया धातु ला नाम धातु कहिथें। जइसे-

 *संज्ञा ले*          हाथ       हथियाना

                      बात       बतियाना

 *विशेषण ले* चिकना      चिकनाना

                      गरम      गरमाना


.

 *मूल शब्द(धातु) नाम धातु    यौगिक धातु*   


दुख            दुखाना        दुख देना

बात            बतियाना     बात करना

गोठ            गोठियाना    गोठ बात करना

बिलग         बिलगाना     बिलग करना


                          ( 2 )

                      

*रचना के दृष्टि ले क्रिया के दू भेद होथे-* 

1) सकर्मक क्रिया

2) अकर्मक क्रिया


1) *सकर्मक क्रिया* ( Transitive Verb ) - जेन क्रिया फल के साथ आथे ओला सकर्मक क्रिया कहिथें। जइसे-

    '  कविता रोटी खावत हे/हवय। '


इहाँ *खावत* ( खाना ) क्रिया शब्द हे अउ *रोटी* कर्म हे।


2) *अकर्मक क्रिया* ( *Intransitive* )-  जब क्रिया के फल कर्ता म ही निहित रहिथे तब ओला अकर्मक क्रिया कहिथें ।जइसे-

         ' मधु हाँसत हवय। '


इहाँ क्रिया शब्द *हँसना/हाँसना* के फल कर्ता ( मधु ) म ही निहित हे।


                         ( 3 )


*क्रिया के कुछ अउ भेद होथे-* 


1) सहायक क्रिया ( Helping Verb )

2) पूर्णकालिक क्रिया ( Absolutive Verb )

3) नामबोधक क्रिया ( Nominal Verb )

4) द्विकर्मक क्रिया ( Double Transitive Verb )

5) संयुक्त क्रिया ( Compound Verb )

6) क्रियार्थक क्रिया ( Verbal Noun )


1) *सहायक क्रिया ( Helping Verb )*

      मुख्य क्रिया के साथ मिल के वाक्य ला पूरा करे अउ अर्थ ला स्पस्ट करे म सहायक शब्द ला सहायक क्रिया कहिथें।

     ( हिन्दी म ' *हूँ, है, हैं, था, थे, थी '* सहायक क्रिया हवय। )

जइसे-

# वोह/ओह घर जावत *हे*। ( वह घर जा रहा *है*- हिन्दी )


      ये उदाहरण म ' *हे*/ *है* ' सहायक क्रिया माने जाही काबर कि मुख्य क्रिया ' *जाना* ' के साथ मिलके वाक्य ला पूर्ण अउ अर्थ ला स्पस्ट करत हे।


# वोह/ओह घर जावत *रहिस*।( वह घर जा रहा *था*।- हिन्दी )


        ये उदाहरण म ' *रहिस/था*' सहायक क्रिया माने जाही काबर कि मुख्य क्रिया ' *जाना*' के साथ मिलके वाक्य ला पूर्ण अउ अर्थ ला स्पस्ट करत हे।


नोट- हिन्दी के शब्द ' *रहा था* ' के स्थान म छत्तीसगढ़ी म ' *रहिस*' शब्द के प्रयोग के बाद वाक्य पूर्ण होवत हे अउ अर्थ घलो स्पस्ट होवत हे।.....छत्तीसगढ़ी म ' *रहिस*' शब्द ला सहायक क्रिया माने जाही जबकि हिन्दी म केवल ' *था*' शब्द ला सहायक क्रिया माने जाथे- ' *रहा था* ' ला सहायक क्रिया नि माने जाय।

     *अइसने छोटे-बड़े* *अन्तर एक भाषा ले दूसर भाषा* *ला अलग करथे*। *संज्ञा* शब्द मन के अपभ्रंस ( *डराइबर, कम्पोटर, मुबाइल,* *किरोना, परकिरिती,* *ससकिरिती, परधानमंतरी, रास्टरपति)* बनाय ले कोनो भाषा बिलग नि होय बल्कि दहरा म बोजा के खत्म हो जाथे!!


2) *पूर्णकालिक क्रिया* ( *Absolutive Verb* ) -

        जब कर्ता एक क्रिया ला खतम कर दूसर क्रिया ला शुरू करथे, तब पहिली क्रिया ला पूर्णकालिक क्रिया कहे जाथे। जइसे-


# राम *खाना खाय* के बाद सोये बर चल दिस। ( राम *खाना खाने* के बाद सोने के लिए चला गया। )

    ये उदाहरण म ' *खाना खाना*' पूर्णकालिक क्रिया माने जाही; जेला पूरा करे के बाद दूसर क्रिया ( सोना ) सम्पन्न होवत हे।


3) *नामबोधक क्रिया*( *Nominal Verb )*-


 # *संज्ञा* या *विशेषण* के साथ क्रिया जुड़े ले नामबोधक क्रिया बनथे। जइसे-


 *संज्ञा*+ *क्रिया*         =    *नामबोधक क्रिया*  


लाठी + मारना          =    लाठी मारना

हाथ + चलाना          =    हाथ चलाना


# काम ला तुरते पूरा करे बर जल्दी-जल्दी *हाथ चलावा*।


- ये उदाहरण म ' *हाथ चलावा*' नामबोधक क्रिया हे; जेकर मूल रूप ' *हाथ चलाना*' हे।


4) *द्विकर्मक क्रिया*( *Double  Transitive Verb* )-

जेन क्रिया ले दू कर्म होवत हे ओला द्विकर्मक क्रिया कहे जाथे। जइसे-


# गुरूजी ह विद्यार्थी मन ला गणित पढ़ाइस। ( अध्यापक ने विद्यार्थियों को गणित पढ़ाया।)

- ये उदाहरण म दू ठिन कर्म होवथ हे :


अ) गुरूजी ह *विद्यार्थी* मन ला पढ़ाइस।

ब) गुरूजी ह *गणित* पढ़ाइस।


ये तरा ' *_विद्यार्थी_* ' अउ ' *_गणित_* ' दू कर्म होइस।


5) *संयुक्त क्रिया* ( *Compound Verb* ) -


  जब कोनो क्रिया दू क्रिया के संयोग ले बनथे, तब ओला संयुक्त क्रिया कहे जाथे।जइसे-


# तैं *आत-जात* रहिबे। ( तुम *आते-जाते* रहना। )


- ये उदाहरण म *आना* अउ *जाना* दू क्रिया मन आपस म जुड़ गय हें। एकरे बर *आत-जात*  संयुक्त क्रिया माने जाही।


6) *क्रियार्थक संज्ञा*( *Verbal noun* )-


जब कोनो क्रिया शब्द ला संज्ञा जइसन प्रयोग म लाये जाथे, तब ओ क्रिया ला क्रियार्थक संज्ञा कहिथें। जइसे-


# *पैदल चलना* स्वास्थ्य बर फायदेमन्द होथे। ( *पैदल चलना* स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। )


- ये उदाहरण म ' *पैदल चलना* ' के प्रयोग संज्ञा के रूप म होय हे; ते पाय के वोह *क्रियार्थक संज्ञा* माने जाही।


       डाॅ विनोद कुमार वर्मा

   कहानीकार, समीक्षक, संपादक

                बिलासपुर


मो. :     98263-40331

ईमेल : vinodverma8070@gmail.com

Friday 15 April 2022

निश्चयवाचक सर्वनाम *यह* (छ.ग.)के कारक रचना रूप

 *निश्चयवाचक सर्वनाम *यह* (छ.ग.)के कारक रचना रूप*



*कारकचिन्ह* *एकवचन* *बहुवचन*



कर्ता- ए, एहर, एही । एमन, इही मन, एही मन। 

कर्म- एला । ए मन ला, एही मन ला। 

करण- एकर ले। एकर मन ले।

सम्प्रदान- एकर बर । एकरे मन बर, एकर मन बर।

अपादान- एकर ले । एकर मन ले।

संबंध- एकर । एकर मन के, एकरे। 

अधिकरण- एमा, एकर ऊपर । एकर में, एकर ऊपर 


(अउ सुने बर मिलते जइसे- एन मन, इन मन ला, इन मन ले, इन मन बर, इन मन के, इँकर ऊपर) 


कृष्ण कुमार चन्द्रा

छत्तीसगढ़ी उपन्यास- रामनाथ साहू


 




                       सोनकमल

                   -------------

              (छत्तीसगढ़ी उपन्यास )



-रामनाथ साहू




                       *अध्याय -1*

                       ----------------


                         जल कुँवर देखत हे,  आज अगास हर  बड़  जगर -मगर करत हे । आज एके पइत कइसन अतेक तारा  मन  उपला गय हें अगास म !  ये कइसन गोरस के धार बोहात हे अगास म ...! ये गोरस के धार म वोहर तउरत हे बने मजा के । ये गोरस के धार कहाँ ले आवत अउ कहाँ जावत ,पता नइये । अब तो वोहर ये तारा- जोगनी मन ल  कुदा- कुदा के अपन ओली म धरत जाथे ; फेर येमन तुरंतेच वोकर ओली ल बाहिर निकल जावत हें । फेर वोहर तो कुदातेच हे, अब तो ये तारा -जोगनी मन घलव वोकर संग म खेले बर लग गईंन हें , वोमन खुद येला छकात हें । देखते- देखत  वोहर कतेक न कतेक बड़े हो गिस हे अउ ये गोरस कस सेत वरन धार हर  अभी तो वोकर भीतर म   बोहाय लागिस हे । सब ल देखत हे वोहर पांच-परगट ! ये सेत वरन धार भीतर म लाख लाख  -करोड़ ठीक वईसनहेच चमकत सितारा  मन चमकत हें । वोमन के गति के आगु म सब फीका हे । अतेक तेज फेर कतेक सुहावन हे येमन के ये गति हर ।  कतेक न कतेक गझिन  लागत हे, ये जगहा हर । ये तारा मन के डहर म एकझन जोगनी हर बइठे हे । तभे एकझन सबले बड़े  बलवान अउ तेज अउ तेज तारा हर  अइस हे अउ टप्प ले वो जोगनी के हाथ ल धर के वोकर भीतरी म समा गिस हे  अउ ...अउ ये का  ! वोहर अब  कोंन कोती आ गिस हे ।


             ये अब कइसन वोहर घन वन -डोंगरी भीतर पहुँच गय ! चारो कोती कट कट... हरियर । अतेक कटकटात हरियर के, हरियर के  छोड़ अउ आन कुछु नई दिखत हे , फेर वो तो ये गहिल अउ गहिल जाते -जात हे । जावत हे  वोहर फेर अब  गहिल  -अंधियार ले ये नावा अंजोर कोती आ गय हे ।  फूल अउ फूल...तितली अउ... तितली ! जतेक वरन के फूल हाँवे, वोतकी  वरन के तितली -फिलफिली ! अउ वोकर तो बस वोइच बुता - अब कुदा -कुदा के ये तितली मन ल धरई । फेर वोमन हाथ नि आवत यें ।   तभो ले वोहर ये एकठन बड़ सुंदर तितली ल धर डारिस हे । अउ वो तितली वोकर अंचरा तीर म आइस हे । अउ अब  तो  वोहर ,वोकर अंचरा म आ गिस हे...! अरे  येहर तो अंचरा के भीतर जावत- जावत वोकर अंतस म समा गिस हे अउ बड़ मजा लेवत उहाँ जा बइठ लागिस हे । 


           जलकुंवर के आँखी बक्क ले खुल गय । ये बबा रे ...! का न का देंख लेंय मंय आज । वो मन म कहिस फेर वोला अब अपन देंहे हर बड़ गरु लागत रहिस।  कइसन लागत हे आज मोला, अइसन तो कभु नई लागे रहिस । मोर आँखी के आगु म अभी ले घलव पांच -परगट दिखत हें वो बलखरहा तारा अउ पीत वरन जोगनी के भेंट हर ...! वो वोकर अन्तस् म समात वो तितली हर...! का देख डारिस वोहर ! अब तो वोला एकठन डर मिंझरा अचंभा हर धर डारे रहिस । 


          अब तो जलकुंवर के नजर तीर म बिना कुछु भय  -फिकर के पोठ  केरोटीं लेके सुतत अपन गोसांन आत्माराम के ऊपर पर गय । वोला अइसन देख के जलकुंवर मने मन हाँसिस । दिन भर के थके -बिताय मनखे बर ये निद्रावती हर वरदान ये । मनखे , सुतही नही त अउ का करही । जलकुंवर अइसन कह तो दिस फेर अब वोकर आँखी ले नींद हर परा गय रहिस । परछी म बरत बिजली  के अँजोर हर येती आय के सेती ,येती हर तो अँजोरेच रइथे । 

             कुरिया म बढ़िया मंजा के जमा के राखे गय वोकर दईजाही समान मन दिखत रहिन । चल तीनेच साल म जुन्ना थोरहे हो जाहीं येमन...! कुछु -कुछु जिनिस मन तो  जिनगी भर के सौदा रइथें । जिनगी भर का बेटा पुता  नाती परिया के आत ल चलथें । बेटा पुता नाती परिया...! जलकुंवर खुदे लजा गय । वोमन तो अभी दुइक- दुवा हें, फेर ये बेटा पुता नाती परिया कहाँ ले आ गय । अपन म एके झन लजावत जलकुंवर खुद केरोटीं बदल के अपन गोसान कोती ल अंते मुंह ल कर लिस ।


           अभी तो  तीनेच बच्छर होवत हे, वोला इहें आय । एक परकार ले वोकर विहोतरा रंग -गुलाल के चिन्हा -बूंदा  मन घलव ये कुरिया अउ आन -आन  जगहा म दिख जाथें ;काबर कि वोकर बिहाव के बाद फेर नावा रंग -रोगन तो होय नई ये घर म । 


           वो दिन हाँसी -दिल्लगी म ए बच्छर दशहरा -दिवाली के बखत नावा रंग-रोगन के गोठ चल निकलिस , तब ये सुतईया महाराज जी कहत रहिन कि कुछु उछा-मंगल करे के मउका दे , फिर अभी हो जाही नावा रंग -रोगन । इंकर अइसन भेदहा गोठ ल सुनके तो वोहर चुरू -मुटु हो गय रहिस । उछा -मंगल के मउका खोझत हें येहर ! काय उछा-मंगल करिहीं...! 


              वह दिन वो तीर ल नाहकिस ,तब वोकर ससुर वोकर मुँहू ल बनेच गहिल नजर करत देखत रहिस । तेकर बाद वोमन के फुसुर -फिया गोठ बात हर मन म सन्देह भर दिस । का गोठियात रहिन , वोमन वोकर बारे म । वोहर छेवर के गोठ ल सुने पाय रहिन । सास महतारी हर डॉक्टर -बईद कहत रहिन , तब ससुर जी हर हाँसत बईगा -गुनिया के  नांव धरत रहिन । बईद -डॉक्टर, बईगा -गुनिया फेर काकर बर ...!


              अरे ! ये का गुनत रह गंय  मैं । एती भिनसरहा हो गय !  सास  अघवा जाहीं , तब छरा-छिटका ल धर लिहीं । येहर एक परकार ले वोकर बर , खुद वोहर  एक अच्छा बात,   नई माने । चल ...उठ जलकुंवर ! वोहर खुद कहिस, फेर तन हर आज कइसन गरु लागत हे ।


        जलकुंवर कइसन भी करके उठिस । चल देव- धामी मन ल जोहार हे। सास , अभी नई उठिन यें । फेर आज बेर हर  बनेच हो गय हे । अगास के सबो तारा -जोगनी मन तो अब लुका गिन हें, बस एकठन ये बट...बट निहारत बटर्रा सुकुवा तारा भर हर  दिखत हे अगास म अउ परछर अगास हर ललछईंया दिखे के शुरू हो गय हे ।


            जलकुंवर पानी के छींटा अपन मुँहू म मारत हाथ -मुँहू धो डारिस । तहाँ ले कोठा कोती ल गोबर लान के छरा -छिटका देये के शुरू कर दिस  अउ अंगना -खोल ल बाहरे के शुरू कर दिस । शुरू का करिस , वोहर ये बाहरे-बटोरे के बुता ल छेवर कर दिस । 

"देख तो आज कइसे मरे असन सुत भुलांय मंय ! " सास बिरीज बाई कहिस ।

"लेवा, कांही कुछु नि होइस ये ।" जलकुंवर हाँसत कहिस ।

"तभो ले बेटी , जल्दी उठबे तब सब उजियार आय ।" सास बिरीज बाई कहिस ।

"उजियार वाला तो , वोदे निकलत हावे अपन महतारी के कोरा ले ।" जलकुंवर कह तो दिस उवत सुरुज -नरायन ल देखत, फेर अपन मुख ले अइसन सियानी गोठ कहत वोहर थोरकुन लजा घलव गय ।


             अब अतका  बेर  म  सुरुज हर थोरकुन फरिया के ऊपर चढ़ गय रहिस । सुरुन निकलत हे महतारी के कोरा ले ...महतारी अउ कोरा...! ये का का निकल जाथे,  वोकर मुख ले ये पइत तो ।  जलकुंवर जल्दी -जल्दी अउ आन आन बुता विहना के मन ल  करे लागिस । कतको कमेलिन गोबरहेरिन हावें, तब ल तो रसोई म वोइच ल  जाय बर लागथे । ससुर वोपरा तो कुछु ल भी खा दिहीं, फेर ये तो ठहरिन बिरीज बाई छोटे गौटिन ! इनला,  साग म फोरन के बघार उबकना चाहिये; नहीं बस छू के छोड़ दिहीं... पच ये कहत ।  वो बुताक़री पोई के रांधे - पसाय ल घलव मनवाथें । भले ही तेल -फूल चुपराय के बखत...राहन दे राहन दे बेटी अभी गोड़ -हाथ चलत हे कहत  मना ही कर दिहीं, फेर थारी म इनला सातों-सवांगा चाहिए ।  जतकी चुटुर-मुटुर चटनी अचार बरी, वोतकी ये खुश ! चल अब तो इंकर बर विहना के सवांगा करे के बेरा आ गय हे । बेरा ल खरका के कुछु भी करबे , तउन हर काम के नि ये ।


          जलकुंवर जल्दी -जल्दी नहाय धोय बर नहानी -खोली कोती जावत रहिस,तब अंगनैया के वो छोट बुटी फुलवारी म फुले फूल अउ उड़ियात तितली - फिलफिली मन ल देख के वोला अपन ये भिनसरहा के सपना के सुरता फिर आ गय...वो तारा अउ जोगनी के भेंट अउ...अउ  उड़ियात वो तितली के वोकर कोरा म आके वोकर देहें म समई...! चल सपना, हर तो सपना आय! वोकर  मुहँ म हाँसी के लोर तउर उठे रहिस ।


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                       अध्याय 2

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              जलकुंवर ल  ये पइत कइसन जादा जाड़-जाड़ लागत हे, ये पाय के वोहर अपन कान म कनचिपी ल बांधेच रइथे । अइसन करे ले बड़ आराम मिलत हे । फेर येती मन आय तब न...

"ये का ये बहु, दिन भर कनचिपी ल बाँधेच रईथस ये बखत म...!" सास बिरीज बाई कहिस ।

" तब का होवत हे, दाई ! मंय तो बांधे हंव । अइसन करे ले मोला बने लागत हे ।" जलकुंवर , घलव वईसनहेच कहिस ।

"बेटी, मंय मना नि करत आँव..."

" मना नि करत अव,तब फेर ,का हो गय  ।"

" अइसन बाँधे रथस , तब मोर आँखी म बीमार असन दिखतस , तेकरे बर कहत हंव ।" सास बिरीज बाई फोर के बता दिस अपन गोठ ल ।

"हाँ...!"येला सुनके जलकुंवर हाँस भरिस ।

"हाँसत हस तँय,फेर मोर मन हर जुड़ात नि ये ।

छोर तोर कनचिपी ल अउ बढ़िया मुड़- कान गथा, मोर जइसन हे तइसन तेल -साबुन चुपर अउ सबले चिक्कन -चन्दा रह !" सास हर फेर  डपटत रहिस,जलकुंवर ल।

"फेर ,काबर दई...?"

"अरे अब्बर लइका ! का कहों -तोला ? भगवान हर रंग -रूप दिस हे, तोला छानही टोर के, फेर वोइच दाता हर थोरहे आही, तोर मुड़ -कान ल जतने बर ।" बिरीज बाई तो अब सिरतोन म जंगाय के शुरू हो गय रहिस ।


         फेर येला सुनके जलकुंवर हाँस भरिस । 

"दई -ददा हर भगवान के रूप आंय। ये पाय के अब तूं नि गांथिहा मोर मुड़ ल।" वो कहिस ।

"हाँ, अब मंय गांथिहा तोर मुड़ ल। लान , वो तेल-फुलेल के शीशी मन ल, कंघी-दरपन ल।"

"ओहो ...!"

"अरे वनजकली, तँय तोर बर झन कोर -गंथा, फेर मोर बर तो गंथा ।" बिरीज बाई अबले घलव कड़कतेच रहिस, फेर ये कड़कई हर मया के रस म पागे गय रहिस ,तब जनाथिस कइसे ।

" चलव , मंय मुड़ कोरत हंव ।" जलकुंवर कहिस, "कइसे कोरों मुड़ ल..."

" जइसे जइसे तँय इहाँ आय रहे कोर गथा के तइसन , दुलपुतरी बरोबर ।"

"का मंय सबेच दिन अइसन दुलपुतरी बनेच रहाँ माँ...?"

"हाँ...!" बिरीज बाई वोइच दे, तुरन्त कह दिस, "हाँ, मोर जीयत ल तँय अइसनहेच रह ;जइसे अभी डोला ले उतरे हावे, अइसन ।" 


              येला सुनिस, तब जलकुंवर के गहा हर भर गय । कइसन भागमानी  मंय आँव, जउन हर अइसन सास पाय हंव । वो अब आगु बढ़के , अपन सब साज-सिंगार ल बगरा के बने सवांगा करिस । एकघरी के गय ल जब वो ,अपन जघा ल उठिस, तब सास बिरीज बाई के नज़र वोकर चेहरा ल हटबे, नई करत रहिस -बस, अइसनहेच दिखत रह , सदाकाल ! मोर अशीष हे !


        येला सुनिस, तब जलकुंवर अमर के वोकर पांव ल पर लिस ।

"मोर बेटी मोर बहु ,सदाकाल दुलपुतरीच कस दिखत रहव तुमन ...!" बिरीज बाई कहिस , "फेर एकठन बात हे,नोनी !"

"वो का बात ये , दई ।"

"तोर ससुर तो अब असकटात हे अउ कउआत  घलव हे,एक परकार ले ।" सास कहिस ।

"वो का बात बर दई...?"येला सुनके जलकुंवर सिरतोन म थोरकुन चमक उठे रहिस । 

" का मोर रंधना -पसाना नइ मिठावत ये उनला ।"

"नहीं ...नहीं , ओ गोठ नोहे ।" सास कहिस ।

"तब का मोर पिंधना -ओढ़ना नई बने लागत ये उनला ।"

"तोर पिंधे -ओढ़े म वोमन ल ,मोर से जादा मतलब हे, ये बात ल झन भुलाबे । वो रमौतीन डोकरी ,उँकर कुटुम्बदारी के भौजाई मोर जेठानी अउ तोर  बर बड़ी सास...! रमौतीन गौटिन के ताना...चल तो दुलरू !आन दे तोर बहु-बोहासिन ल , तब मंय देखहाँ ,कइसन राखबे तँय वोला ,तउन ल !"

"ये बबा रे! " जलकुंवर तो खलखलाके हाँस भरिस । 

"तँय हाँसत हस, नोनी । वो अउ हम बरोबरी के हिस्सादार ! कुछु जिनिस म , वोकर ल हम  कम नहीं । हाँ, कुटुम्बदारी म वो हमन ल बड़े ये, येकर सेथी सदाकाल शीश हर तो नवेच रहही ।" सास बिरीज बाई झरझरात कहिस ।

"त का हो गय, दई..."

"कुछु ,नई होइस बेटी ! फेर वोकर बोहासिन नन्दिनी के सुघराई ! छै बच्छर हो गय, दु लइका के महतारी , फेर अभी डोला ले उतरे हे कहु लागही देखबे तब ।" बिरीज बाई तो अब गोठ के रौ म  बोहा गय रहिस ।

"होही, दई , काबर नि होही ।" जलकुंवर हाँसत कहिस ।

"फेर मोर जलकुंवर के आघु म वो ठहर नई पाय ...!" बिरीज बाई , जलकुंवर के कुंवर गाल ल समारत कहिस ।

" तेकरे बर तूँ मोला, येदे पिंधे- ओढ़े बर कहत रहा ।"

"हाँ, अउ हाँ...! मोर बहु , गांव म सबले ऊंच रहे ! तोर ससुर के संगे -संग महुँ घलव बस आइच चाहत हावन बस्स !" सास बिरीज बाई जइसन आखिरी सच ल उगल दिस ।


    अब तो जलकुंवर के हाथ हर दुनों झन बर जुड़िच गय रहिस, भले ही येमन अपन पन बर वोला चिक्कन -चंदा देखन चाहत हैं, तभो ले येहर निकता गोठ आय । फेर शरीर हर तो आज बनेच गरु लागत हे ...


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            संझाती बेरा ,जलकुंवर देखिस कि वोकर ससुर बलराम गौटिया के संग बड़खा झोला धरे अउ लम्मा टीका लगाये, एकझन  नावा अनचिन्हार मनखे आवत हे । गौटिया , अघवा के  घर भीतर आके गौटिन बिरीज बाई करा फुसुर-फिया गोठ करिस हे । 


         अब तो बिरीज बाई ,गौटिन कांस के बड़खा लोटा म पानी निकाल के , वो मनखे के आगु म जाके मढाईस हे अउ आगु म दण्डाशरन पांव परे बर लागिस हे । वो नावा मनखे घलव उठव...उठव...गौटिन  कहे लागिस हे, मुच मुच हाँसत । कोन ये येहर ! अउ काबर येहर आए हे । अपन होके आय हे कि येला लाने हें येमन । सँग म अवई अउ आदर -सत्कार ल देखे ले तो, बरोबर लागत हे कि ससुर जी , वोला लेके आये हाँवे ; फेर अतेक बड़े झोला...! ये झोला म का हावे ;कनहुँ लइकाधरा थोरहे ये, येहर ।

"बहु, चल तहुँ, भेंट-पैलगी कर ले ।" सास बिरीज बाई तीर म आवत कहिस ।

"हाँ,दई । फेर येहर कोन ये ।"जलकुंवर पुछिच बईठिस ।

ससससस...! चुप...! चुप रहे के इशारा करत गौटिन अब्बड़ धीरन्त सुर म  कहिस -चुप... ! येहर बईगा महाराज ये । तोला देखाय -सुनाय के नांव म येमन ल बड़ धुरिहा ल तोर ससुर लेके आईन हें ।

" मोला, देखाय के नांव म येमन ल धर के लानत हव, अउ मोला  शोर -पता  तक नइये कि, मोला का लागत हे।" जलकुंवर तो जइसन अकबका गय रहिस ।

"अरे ...धीरे गोठिया । तोला का लागत हे,तउन ल तँय का जानबे, वोला मंय जानहाँ, तोर ससुर जानहीं। चल चल पांव- पलोटी पर अउ भूले -चुके कनहुँ ल झन बताबे,कि हमन येमन ल बलांय रहेन । वो असतनिन रमौतीन ल तो बिल्कुल भी झन बताबे ।"सास वोला समझाय असन कहिस ।

" मंय पांव काबर नई परिहंव व मनखे के जउन ल तुँ मानत हंव ,फेर , दई ,मोला का लागत हे , तउन ल तो बताव ।" जलकुंवर तो जइसन कलप उठिस ।

"तँय ठढिहा गय हस ।  तीन बच्छर हो गय, तोर इहाँ आय , अउ आज ले अंचरा हर सुक्खा के सुक्खा हे , तेकर बर तोर नहान ल बन्धवाय बर ये बईगा महाराज ल तोर ससुर लेके आईन हें ।" सास बिरीज बाई, एके सुवासा म सब ल कह दिस,फेर वोइच फुसुर -फिया ।

"मोर नहान ल बन्धवाय बर, एमन ल बलवाय हावा, फेर , मोर नहान तो ठीक हे, दई...!"

"अरे असतनिन चल, भेंट- पैलगी कर ! तँय का जान बे , काहर ठीक हे अउ काहर  ठीक नई ये तउन ल। घोड़ा छांदन नाहके होबे कभु,सग्यान होय के बाद म ।"

"तुँ का का कहत हावा, तउन ल मैं, एको नई समझत आँव ।" 

"अउ , समझ घलव झन ; फेर जइसन कहत हंव, तइसन कर ।" सास बिरीज बाई, एक परकार ले वोला डपटत कहिस ।


           अब तो जलकुंवर हाँस भरे रहिस । वाह रे विधाता ! इहाँ कोन ल , का तकलीफ हे, तेकर वोला खुद पता नई ये , अउ येमन ये बईगा-गुनिया ले आनिन न । चल भई, ठीक हे । तन मन सब तो अर्पण हे,पति के चरण म ;ये सास -ससुर के चरण म  , तब  का के नहीं ।


              जलकुंवर पूरा मुड़ ढांक के आगु अइस, अपन सास के संग । वो भी ठीक , वइसन दण्डाशरन पांव परिस।

"बइठ जा, बेटी...!" बइगा महाराज कहिस ,"ले  अब अपन डेरी हाथ मोर कोती दे ।"


              जलकुंवर सुनिस, तब वोहर सास के मुँहू कोती ल देखिस । सास इशारा म वोला, वईसनहेच करे बर कहिस ।


             बइगा नाड़ी ल छुइस, फेर वोकर चेहरा म मधुर मुस्कान तउर उठिस - तेज , भारी हंस के चाल चलत नाड़ी । गौटिन, अगर मंय गलत नई आँव, तब तुंहर बगिया म फूल हर डोहणु -कली धर  दारे हे । महुँ ल बइदई करत उम्मर कटत हे । ये लइका हर गरभवास म हो गय हे ।

 

         येला सुनिन, तब सब के सब के मुँहू हर फरा गय । फेर बइगा कहिन- येकर डॉक्टरी जांच करवा के मोला बताइहा, गौटिया । चला , मोला अमरा के आवा । कुछु  आम -लीम नई रहही, तब पाछु आन दिन देखबो । वइसे सोलह आना पक्का हंव , मंय ।

"तुँहर,मुँहू म दूध-भात , महाराज ...!" सास बिरीज बाई,  तो फेर दण्डाशरन पर गय रहिस भुइँया म ।


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                             अध्याय 3

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            अभी चार दिन नई होय ये,दई हर सधौरी रोटी खवा के गय हे तउन हर अब अउ ये का का जिनिस मन ल वोला खाय के साध लागत हे । कबे त लाज अउ नई कबे त नवा अवइया पहुना हर लरही -लरहा निकल।जाही । महतारी हर सतरा पईत चेता के गय हे , बेटी राख -छुही-माटी झन खाबे , अउ येमन के छोड़ अउ आन कुछु  खाय के मन करही, तब सास महतारी ल पहिली बताबे । वो पूरा करिही नही त मंय फेर कनहुँ करा ल लानहाँ...

"फेर दई, तँय तो सधौरी -रोटी खवा के चल देवत हस ।" जलकुंवर कहे रहिस ।

"त का होइस । अरे ! येहर नेंग-नाता आय । येला करेच बर लागथे । फेर येकर मतलब ये नई होइस कि मंय अउ तोर ददा अब इहाँ अउ नई आय सकन । इहाँ आबो...हज़ार बार आबो । बेटी रूप म जी ल देय हावन , तब काबर नई आबो ।" दई हर कहिस ।येला सुनके जलकुंवर के आँखी मन ले दु बूंदी चुइच गय रहिस ।

दई , तोरेच असन दूसर महतारी घलव इहाँ रथे...!तोला साध पुरोय बर आय बर नई लागे ।फेर अभी तो वोला डूमर खाय के साध लागत हे । डूमर खाबे नोनी...फेर गप्प ले ,फोरबे झन कभु वोला । वो कहे कलामति वोकर नानपन के संगवारी ।फेर वर -विहा  के बडोरा म उड़िया के तँय कहाँ गिरे हस अउ मंय ये कहाँ परे हांवव ! तँय तीर म रथे , त कलेचुप मोर बर डूमर जरूर ले आनथे । फेर अपन साध अपने आप बुताय बर लागही , नही त फेर वोई लरही -लरहा हो जाही येहर ! जलकुंवर अपन भराय कनिहा ल छुवत कहिस !

"दई, मोर महतारी मन आय रहिन अउ चल घलव दिन ।"जलकुंवर , सास विरीज बाई के तीर म आके कहिस ।

"वो तो वोला चांटी चाबत रहिस नोनी , तोर महतारी ल ओ ! हाथ -बहाँ धरके मंय नई रोकत रहंय का...अउ दु चार दिन रहले नोनी कहत ।"सास विरीज बाई झरझरात कहिस ।

"नोनी कि समधिन ...?" जलकुंवर हाँसत कहिस वोकर करा ।

" तोर दई हर मोर ले कच्चा उम्मर के हे बहु, वोहर मोला समधिन असन लागबे  नई करय ;अपन हक्क छोटे बहिनी कालिंदी असन लागथे ।" सास विरीज बाई कहिस ।

"ओहो...! कालिंदी मौसी असन मोर दई हर ...!मौसी हर तो चिलकत हे , अभी ।" 

"त  तोर महतारी ल का हो गय हे ...! एमे हमी अब सकलात हन बेटी । फेर राम के ये दुनिया म सबो दिन छाता असन थोरहे तने रबे , धीरे -धीरे  मनखे हर भराथे, अउ ठीक वइसन धीरे धीरे सँकलाथे ।"

"हाँ, दई ...!" जलकुंवर अपन सास करा कहिस ,फेर वोकर गोठ पुर नई पाय रहिस , जेकर बर वोहर अपन सास ल ओझियाय रहिस ।

" तोर महतारी नोनी हर नोनी अब ले भी अतेक चिक्कन -चांदो हे कि एक बूंदी पानी म नह लिही अउ पानी घलव नई सिराय । अउ तहुँ घलव वईसनहे रह !अपन दई करा ल सीख ! " 

"दई वो सब मंय कर लिहां, पहिली ये बोझा हर तो टरे !" जलकुंवर फेर अपन कँनिहा कोती ल छुवत कहिस ।

"असतनीन ...! बोझा कहिथस ! तोर महतारी के कोख म रहे होबे , तब का तोर महतारी तोला , अइसनहेच बोझा कहत रहिस होही ।"  बिरीज बाई तो थोरकुन जंगा गय रहिस । फेर येती जलकुंवर अपन मन के बात ल बताय के पोल पाबे नई करत रहिस ।

"तोर  करा का मांगत हे येहर ...?"विरीज बाई,अब फिर जलकुंवर ल कहिस ,"बोझा कहत हे,असतनीन ...!"

"येहर का न का मांगत हे ,मां ...!"

"का मांगत हे, चीटिक महुँ तो सुंनव ।"

"येहर डूमर मांगत हे ।"

"का...का कहे ? "

"डूमर...!"

"डूमर ...डूमर , हाँ, अब समझें ।वाह रे मोर ललहीन के ललहा ...! का अस तँय...! फेर ये तँय का मांग लेय अपन महतारी करा ।" अबके पइत विरीज बाई एकदम गम्भीर हो गय रहिस । गरभवती के इच्छा हर...राजा के हुकुम ले बढके आय ।

      

           अब येती जलकुंवर सुछिंधा हो गय रहिस , चल सास के कान म अपन गोठ ल बता दिस हे अब तो समझ ले वोहर डूमर ल खा डारिस । जलकुंवर तोला अपन जीभ के सुआरथ नई चाही , येहर बड़ अच्छा गोठ आय , फेर जउन देव-धामी, पितर गोत्र तोर कोख म रचे बसे हे तेकर बर आय ,ये तिलसा के बुताय के जिनिस हर !


                 सास विरीज बाई , जलकुंवर ल वोइच करा छोड़के आगु दूसर परछी म आ गय , जउन करा  कमेलिन सेतबाई अउ नरबदिया सरोता म खचाक- खचाक आमा ल पउलत रहें अचार बोरे बर ।दु ठन टुकना म आमा मन माढ़े रहिन ।

"बड़े दई ,बता कोन ल कइसन करना हे,तउन ल ।" नरबदिया पूछिस ।

"पउलिच डारे न अउ मोला पूछत हावस ।"विरीज बाई, थोरकुन जंगावत कहिस ।

"त का बिगड़ गय हे , हर बच्छर अइसनहेच तो बनवाथस । ये लोढ़हा आमा के चानी अचार अउ ये सेंदरी आमा के चार फाली वाला फ़ंकिया अथान ।"

"ठीक हे !ठीक हे ...चलव येला पूरा करव । ये बच्छर के अचार -अथान मन बढ़िया बनना चाहिए, मईनसे-तइनसे , पहुना -पाही आहीं अभी ।" विरीज बाई वो दुनों श्रमिक महिला मन ल ललकारत कहिस  । वोहु मन हाँस के वोकर जवाब दिन । उछा -मंगल के तो हमू मन ल अगोरा  हावे बड़े दई ...नरबदिया हर कह घलव दिस । अब तो विरीज गौटिन घलव हाँसत वोला अपन तीर म बलाइस ।


          नरबदिया तीर म गिस , तब बिरीज गौटिन वोकर कान म मुँहू जोर के फुसुर -फिया करिस ।नरबदिया घलव हां...हूँ कहत रहिस मुड़ ल डोलावत , जाने -माने वोहर गोठ ल समझत रहिस  हे ।

"देख तो रे ! ये कपटाही बड़े दई ल । अभी तीनेच झन हावन ये करा, का गोठ ये तउन ल  महुँ ल बताथिस, तब  का होथिस !" सेत बाई रिसाय कस करिस ।

"अरे कुछु नोहे रे छोकरिया !तोर बुता ल कर चेत करके । मोर करा बनेच फंद करथा तुमन ! वो रमौतीन गौटिन करा वोकर मनखे मन बात नई करे सकें , अउ इहाँ तुमन मोला नाच नचवा देथा ।" विरीज गौटिन  कहिस । 

"वो सब ठीक ये, फेर का ये तउन ल मोला बताबेच कर , नहीं त मोर पेट पिराही;अउ मोर पेट पिराही, तब तोरो पेट हर पिराही ।" सेत बाई अबले भी नांनकन लइका कस ठुनकत रहिस ।

"चल चुप चुप ,मंय तोला बता दिहां । आखिर म दुनों झन ल चुपे चाप जाय बर कहे हावे ,बड़े दई हर ।" नरबदिया कहिस ।


                तभो ले सेतबाई बड़ विचित्तर भाव लेके वो दुनों के मुहँ ल देखत रहिस ,जाने- माने कुछु चीज वोकर ले छूट जावत है ।

"अरे जावा घलव, एइच करा ठेमेल-ठामल करत हावा । जावा , आके फोरिहा ये आमा मन ल । ये बुता हर भाग तो नि जात ये ।" बिरीज गौटिन , एक पइत फेर वोमन ल डपटिस । अब वो दुनों उठ के ठाढ़ हो गईन , अउ गौटिन वो जगहा ले परा गिस । फेर अबले भी सेतबाई भकचकाय ठाढे रहिस ।

"अब चल तो देती, मोर संग ..." नरबदिया ,वोकर हाथ ल तीरत कहिस , अउ वो नान बुटी टुकनी अउ बोइर झोरे के बड़खा डांग ल खोज लानिस ।

"बोइर झोरे जाबो...?"सेतबाई पूछिस ।

"तोर मुड़...चल ,चुपे चाप मोर संग ।"नरबदिया घलव वोला डपटत कहिस ।

" हरे नरबदिया ! तँय मोला काबर डपटत हावस । का फुसुर -फिया ये , तउन ल तईचं तो सुने हावस ओ दई ...!" ए पइत सेतबाई घलव थोरकुन खर हो गय रहिस ।

"चल न आगु , तब  बतांहु कुछु गुपुत बात नोहे रे । "

नरबदिया कहिस ।

"अरे कुछु गुपुत बात होही, तब ले भी , वोहर तोर करा गुपुत रहे नही ओ नोनी । तँय उगलीच दार बे वोला । अउ...कुछु गुपुत बात ल तोला गौटिन बड़े दई हर बताबेच नई करे ।

" मारतेच लंहाँ छोकरिया । बड़ सार -चेत बनथस ।"

नरबदिया, वोकर संग प्रेम-कलह करत मारे बर दौडाइस ।

"अब तो बता दे ओ ,मोर रानी ।ले तोर ये गुलगुल गाल ल छू देत हंव ।" सेतबाई, कहिस अउ सिरतोन म वोकर गाल ल छुए के नांव म हुदक दिस ।


             अब तो नरबदिया, सेतबाई के कान म फेर वईसनहेच फुसुर-फिया करिस । येला सुनके ,

सेटबाई खलखलाके हाँस परिस डहर म ...ओ हो ओ...! 

"तँय डांग ल धरे ,तब तो मंय बोइर के अंदेशा करे रहंय ।फेर इहाँ तो आने जिनिस निकल आइस ।"सेतबाई, अब ले भी हाँसतेच रहिस ।

"हाँस झन , न कनहु ल बताबे झन, वो रमौतीन बई ल तो बिल्कुल भी नहीं, नही त गौटिन दई जंगाही , समझे न !"नरबदिया कहिस । अउ येती सेतबाई, स्वीकारत मुड़ ल हलाइस ।



                                *


 "आ गेया ओ फुरफुन्दी मन ! ले आना कहे रहें, तउन जिनिस ल ।" विरीज गौटिन पूछिस । 

"हाँ, बड़े दई ...!"  नरबदिया कहिस अउ टुकनी ल उतार दिस ।

"ये बबा रे ! अतेक न अतेक ल ले आना रे , जकलाही मन ! जाने- मने   माई-पिल्ला सब झन खाबो ।" विरीज गौटिन हांस भरे रहिस । 

"येई तो बड़े दई करा मरना ये । थोरकुन लाने रथेन, तब काबर थोरकुन लाना कहे  रथिस,अब बने ले आने हावन , तब जादा काबर लाना कहके कहत हावे ।"  ये पइत सेतबाई, ओझी देय रहिस ।


         ये किलबोल ल सुनिस, तब जलकुंवर घलव ए कोती आ गय ।वो देखिस टुकनी कोती ल । ए बबा रे...!टुकनी भरभर कंईचा-पाका डूमर...!  वोकर आँखी बटरा गय , फेर दूनों फुरफुन्दी असन कईना-

सेतबाई अउ नरबदिया वोला देखके , भेदहा मुचमुचावत रहिन ।



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              अध्याय  4

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" बहु के चेहरा -मुंदरा ,नेत -नमूना हर तो बने हे ,डोकरी , देख डारे हंव मंय । " अइसन खरखर गोठियावत रमौतीन बड़े गौटिन अपन निज पत्तो नन्दिनी ल  धर के जलकुंवर ल देखे आवत रहिस ।

"ये आ...आ, दीदी  आ...!" विरीज बाई छोटकी गौटिन उठ खड़ा हो गय, अउ रमौतीन गौटिन के चरण छुवत पांव -पलोटी परिस । अउ नन्दिनी घलव जथाजोग  सबके भेंट -जोहार करिस । नन्दिनी के संग वोकर बेटी शिखा अउ बेटा  गजपाल घलव रहिस ।  पांच बच्छर के शिखा अउ  तीन बच्छर के गजपाल । ये रमौतीन दंगल हर आज बुले किंजरें के नांव म इहाँ आय रहिन ।


              आते साथ शिखा अउ गजपाल अंगना म शुरू हो गय रहिन । वो दुनों के किलबोल ,विरीज गौटिन ल बड़ सुहात रहिस ।

"रा गौटिन , धीरज धर, तोरो घर म ये किलबोल चीं-पों शुरू हो जाही। अरे , लइका आंय, त एको  घरी के ये चीं-बों हर सुहाथे, फेर चौबीसों घण्ठा बस, वोइच बुता करहीं, तब भला कौन एमन ल भल पतियाही !"रमौतीन गौटिन बनेच लम्मा धर दिस, गोठ बात ल ।

"दीदी, लइका तो लइका होथें । कोन रोके सकहीँ वोमन ल..."

"रा ना , यह दे दिन हर आवत हे, जावत नई ये ।तहुँ गम पा जाबे, येमन के गंगा नहाई ल ।"रमौतीन के गोठ हर अबले भी खर रहिस । ये पइत विरीज बाई कुछु नि कहिस ।

"दुलरू कहाँ हे, नई दिखत ये ?" रमौतीन ,गौटिन पूछ बईठिस ।

" दीदी ,तोर आइच गोठ म तो मोहनी भराय हे ओ । येती चुन्दी -मुड़ी पाक गय,दांत -कान झर गय, तब ले वोमन तोर बर दुलरुच आंय ।" विरीज बाई खुश होत कहिस ।

"दुलरू माने दुलरू , छोटकी, तोर गोंसिया हर मोर देवर आय ,जब मंय विहा हो के इहाँ आंय , तब तो  येहर लइकाच रहिस न ।" रमौतीन तो गोठ के रौ म बोहा गय रहिस ।

" बनेच सुरता राखे हस दीदी !" विरीज बाई कहिस।

"हाँ, अउ नही त का, लईकई म येहर सुटुर -सुटुर रेंग देय,कभु भी ऊंच मुड़ी करके नई देखे ...निच्चट लचकुरहा ! येकर आइच बानी के कारण येहर मोला आज ले बड़ मयारुक लागथे नोनी ।" रमौतीन गौटिन अब ले भी वईसनहेच झरझरात रहिस ।


        फेर येती नन्दिनी अउ जलकुंवर के गोठ हर घलव फदक गय रहिस । लइका मन के किल्ली गोहार हर परतेच रहिस ।

"हरे नोनी नरबदिया , एती आना बेटी ।" विरीज बाई , बनिहारिन नोनी नरबदिया ल हाँक पारिस । तब...का ये बड़े दई ? कहत नरबदिया तीर म आ गय ।

"बेटी, बड़े गौटिन पहुना आय हे, वोकर आदर -सत्कार करबे कि नि करबे ।" विरीज गौटिन कहिस ।

"करबो बड़े दई , काबर नि करबो ओ !तँय हुकुम दे।"

"पहिली वो खिरसा ल लान , सब झन बर, तेकर एक घरी के गय ले , बड़े गौटिन बर बढ़िया चहा चुरोबे ।"विरीज गौटिन,नरबदिया ल समझाइस ।

" रा रे नोनी , एईच मन बर लांनबे,मोर बर झन । अभी एक्काईसी नई पूरे होही,मंय बिन एक्काईसी पूरे आज तक ल गोरस ल नई च खाँव ।"रमौतीन कहिस ।

"तब तो ओ बड़े दई, तँय ये खिरसा ल खाएच बर नई पास । एक्काईसी के पुरत ल गोरस हर फरिया जाथे, वोहर पीयूष थोरहे रइथे ।"नरबदिया कहिस ।

"बनेच गोठियाथस रे नोनी ...!"रमौतीन कहिस,तब बोपरी नरबदिया थोरकुन संकला गय । अउ जइसन वोला कहे गय रहिस , तइसन वोहर  करिस । फेर येती गजपाल हर शिखा के बांटा ल घलव खा दिस ।एक पइत फेर किल्ली-गोहार पर गय ।

"बड़की गौटिन ल पांयलागी हे...!"अइसन कहत छोटे गौटिया बलराम  अपन घर  हमाइस ।

"कइसे दुलरू,हमन तोर घर बुले -बइठे आय हावन , अउ तँय वोती- वोती किंजरत हस , भाई ।"रमौतीन गौटिन फेर खर गोठियाइस ।

"बड़े गौटिन के धुरा ल बोहे बर, यह  दे छोटकी गौटिन नइ हे, महतारी !" बलराम गौटिया हाथ जोड़ के खड़ा हो गय ।

"चल तहुँ बइठ हमन के संग म..." रमौतीन गौटिन तो पूरा रुआब म आ गय रहिस ।

"महतारी के तीर बेटा ल सूखे -सुख माँ !"बलराम गौटिया कहिस अउ तीर के खाली कुर्सी म बइठ गय ।

"बस,दुलरू बेटा, अब मोला देखके लजाबे झन , तोर -हमर अब चौथा पन आ गय न ...! "येला सुनिस, तब बलराम गौटिया सिरतोन म लजा के लाल हो गय;अऊ वो जगहा ल उठ पराइस ।

"देखे, जउन ल बरजत हंव, तउन बुता ल ये लइका करत हावे ।" रमौतीन कहिस ।

"दीदी, ये तोर लइका हर कतेक उम्मर के होही , ओ!" ये पइत विरीज बाई चुहल करिस ।

"कुछु भी नई होही, तब ले मोर ले दस बच्छर के छोटे होही , मंय दूसर पठोनी आंय, तब येकर मुँह म मिसिर के  रेख तक नई रहिस । अउ दऊ हर मोर उम्मर सत्तर तीन तिहत्तर बच्छर लिखवाय हावे, वो दिन वो गांव के मास्टर के का के फारम म ...!"रमौतीन गौटिन ,बिना भेदभाव के बगरात रहिस अपन गोठ ल ।

"कस ओ नरबदिया ! तोर चहा अभी ले नि चूरे ये ?"बिरीज गौटिन थोरकुन जंगावत कहिस ।

"बड़े दईं, ये बड़की गौटिन हर लाल चाय पीये नही, अउ घर म गोरस छेवर..."नरबदिया बात ल बता दिस।

"सिरतोन कहे नोनी, जा कूद कूद हमर घर कोती अउ बने ले आंनबे गोरस ल ।" रमौतीन गौटिन कहिस ।

                  येला सुनिस तब नरबदिया ,बिरीज गौटिन कोती ल देखे लागिस । तब बिरीज गौटिन वोला जाय के इशारा कर दिस । 

"पत्तो नि सकत ये, तब ये  दुनों टुरी बाड़ी मन रांधत होंही । कोन जानी कइसन रांधत होहीं त येमन, गोठ हर तो पोठ रइथे , येमन के । येमन ल भारी सिखो-पढ़ो के राखे हावस, छेंक के कइसनो भी पूछबे, तब फिर कुछु भी नई बताँय येमन ;बस हाँस -मुस्कुरा के छरट आहीं । का मजाल हे, के एको पद अगरिहा गोठिया दें ।


             येला सुनिस, तब बिरीज गौटिन के छाती हर फूल गय, फेर येती घर कोती घुसरे सेतबाई के कान हर खड़ा हो गय । वोहु हर अंगनैया कोती निकल के बड़की गौटिन फेर छोटकी गौटिन दूनों झन के पांव पर लिस । बड़की गौटिन घलव वोला  जल्दी फुले-फरे के बढ़िया आशीर्वाद दिस ; फेर वोकर आशीर्वाद सेतबाई ल बिल्कुल भी नि भईस,अइसन लागत रहिस,वोकर मुहँ कान ल देखे ले ।

                अतका बेर ल नरबदिया के चहा चूर के कप प्लेट म सज के आ गय  । वोहर आके बड़खा गौटिन ल प्लेट धराइस - अरे बेन्दरी, तँय येला जान डारे कि मंय लाल चाय नि पिंयव तउन ल ,तब तोला ये भी जाने बर लागही अब,कि बड़की गौटिन हर कप -पिलेट म चाय नई पीये, वोहर गिलास म पीथे ।"

"फेर गिलास म तो एक कप चाय हर पेंदी डसना नई होय ...!"

"तब तोला कोने कहत हे कि तँय एके कप ल लान ।जा अउ आधा गिलास लेके आ चाहे कई कप होय वोहर ..."

"चाहे बनाय बर फिर लाग जाय..."नरबदिया हाँसत कहिस ।

"तोला कोन मना करे हावे ओ 

गोठकारिन, जा बुता कर के आ ।"रमौतीन ,वोला थोरकुन जंगावत कहिस ।

"...माने चहा लनई हर बेर हो जाथे ," नरबदिया कहिस अउ फिर एके रंच म पीतल के गिलास म आधा ल ऊपर गाढ़ा गोरस के चाय बना के रमौतीन गौटिन ल धरा दिस ।

"जुग जुग जी बेटी..." 

"बस... बस बड़े दई,फुले -फरे के अशीष झन देबे अभी ले ।" नरबदिया-हाँसत कहिस अउ वी करा ले परा गय ।


            सियानीन मन के रकम रकम के गोठ, फेर रमौतीन के हर गोठ पोठ अउ बिरीज बाई के शेवर के शेवर...!

"छट्ठी बरही हर बेरा च म होथे, तब मन हर परछर रथे, छोटे गौटिन !सब ल बेर के बेर करत जाबे ।"

"हाँ, दीदी...!"

"तिल ढूढ़ही,तिल- लाड़ू तहुँ बनवा ले, वोकर मइके च के भरोसा म झन रह ।"

"हाँ, दीदी...।"

" पंचकूल,दशमूल काढ़ा के व्यवस्था कर डार ।"

"हाँ, दीदी ।"

"अउ सुन , सकत भर ल घरेच म तर जाथिस, सरकार दुआर ,अस्पताल ले जाय बर झन लागथिस, तब बहुत बढ़िया ।" रमौतीन गौटिन वईसनहेच झरझरात कहत हे, फेर ये गोठ के ओझी म बिरीज बाई चुपे रहिस...


       लइका मन अँगना म फदक गय हें, खेले बर । रंग -रंग के खेल खेलत हें, किलबोल होत हे । लइका मन खेलत खेलत तक गईन , तब अपन महतारी नन्दिनी कोती कुदिन । नन्दिनी , जलकुंवर के मुड़ गांथत हे ...! चुन्दी तो जलकुंवर के घलव बनेच लम्बा हे, फेर चुन्दी मन बड़ कुंवर हें, मुठा भर भर धरे नन्दिनी गोठियावत हे घलव अउ गुनत घलव हे । वोकर अपन चुन्दी, येकर ले जादा घन हे, अउ करिया घलव हे । नन्दिनी बढिया वोकर मुड़ ल गांथ के पाटी पार दिस हे अउ अपन माथा म रगबगात बिंदी ल निकाल के जलकुंवर के माथा म लगा दिस हे वोकर कुंवर चिक्कन गाल ल समारत -जुग जुग ले  जीयत रह बहिनी...कहत ! फेर लइका गजपाल का समझिस हे न का...अउ तीर म आइस हे, अउ जलकुंवर ल हाथ उबा के मारे- मारे करिस हे ; एक दु पइत के हाथ हर तो जलकुंवर के पेट म घलव परिस हे ।

"ये छोकरा बाड़ा...!" नन्दिनी डपटिस हे, येला देखके रमौतीन गौटिन तीर म आ गिस हे, अउ गजपाल ल जाके अपन गोदी म उठा लिस ।

"नई मारें, बेटा अइसन , इहाँ नान बुटी नोनी बइठे हे ,तोरे असन ...!"रमौतीन गौटिन , लइका ल समोखत कहिस, तब बिरीज बाई गौटिन के संग जलकुंवर के मुँहू हर फरा गय ।



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                         अध्याय 5

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                       रेहचुली चलत है चाकी चाकी...! एक कोती सोनकमल बइठे हे अउ दूसर कोती गजपाल !अउ येती शिखा ,   भुइँया म अपन दुनों डेना ल बगरा के वोइच चाकी  चाकी भँवरी राजा घर के दंवरी... कहत चक्कर लगात हावे । पहिली एक कोती सोनकमल अउ दूसर कोती शिखा बइठे रहिन,फेर गजपाल आके अपन बहिनी शिखा ल उतार दिस,अउ वोकर जगहा म खुदे बइठ गय । वोहर सोनकमल ल एकर बर उतारे नई सकिस, काबर के ये रेहचुली हर सोनकमल के मुँहटा म गढ़े हावे, अउ वोकर बाप  आत्माराम नावा गौटिया हर गड़ियाय हे ;तब तो वोकर पहिली हक्क हे,वोमे बइठे के । 


         फेर येती सोनकमल के हरू -गरु भार हर गजपाल ल दमोरे बर कम पर जात हे, येकर सेथी वोला मजा नई आवत ये,ये सोनकमल के संग झूले म...

"हरे ये टुरी बाड़ी,उतर तो तँय,अउ येला बइठन दे अपन जगहा म ।"गजपाल आखा -बाखा ल देखत कहिस, वोला ये रेहचुली के स्वामित्व के बिल्कुल गम- पता रहिस ;तेकर सेती वोहर ये देखत रहिस कि वोकर ये गोठ ल कनहुँ सुनत तो नइये ।

"ले भइया ,मंय उतर गंय  । आ शिखा दीदी,बइठ जा पहिली कस ।" सोनकमल , रेहचुली ल उतरत कहिस ।

"हरे टुरा,ये रेहचुली ल सोनकमल बर गढ़ियाय हे,नावा कका हर कि तोर बर गड़ियाय हे रे !"शिखा, थोरकुन जंगावत कहिस ।

"अरे बइठ जा न थोरकुन , इहाँ का न का गोठियाथस ।"गजपाल , मुँहू ल ऐंठत कहिस ।

"मंय नई बईठंव अइसन, तोर कहे के कहे ।"

"का कहे, मोर कहे के कहे नई करस । भुला गय वोतका बेर के पिटान ल ...!" गजपाल, आँखी गुरेरिस ,तब येती शिखा ल सिरतोन डर चढ़ गया अउ वो चुपचाप , वो रेहचुली म बइठ गय ।

"चल रे टुरी, अब तँय किंजार हमन ल।"गजपाल , सोनकमल ल आँखी म अंखियात वो रेहचुली ल किंजारे बर कहिस ।

"ले दीदी,ले भईया ...!"सोनकमल कहिस,अउ बल भर के वो रेहचुली ल किंजारे लागिस । वोकर अइसन ताना -घिना तनातनी ल देखिस , तब शिखा हर उतर गय  वो रेहचुली ले...दई, देखही,तब काकी हर बनेच जंगाही , ये नानबुटी लइका करा रेहचुली ढकेलवात हे कहत ...!

"अरे बइठ, कोनो कुछु नई कहें ।" गजपाल ,वोला ललकारत कहिस ।

"कोनो, कुछु नि कहें, तब ले भी , ये नानकुन लइका करा हम झुलुवा नई झुलुवान , दाऊ ...!" शिखा कहिस,अउ वो जगहा ल अंते जाय लागिस ।

"अरे , बइठ न , बने लागत रहिस ;ये रेहचुली के खेल हर बने मचत रहिस,तब तँय गोल -मोल कर देय ।"गजपाल ,जंगावत अपन बहिनी ल कहिस , फेर वोहर वोकर गोठ ल नई सुनिस ।अउ वो जगहा ले अंते जाय लागिस ।


                   शिखा तो चल देय रहिस,फेर गजपाल वोइच जगहा म रहि गय । अब तो सोनकमल अकेला वोला घुमाय कस करिस । एक -दु भांवर बनिस,फेर बाद म गजपाल असकटाइस अउ उतर के सोनकमल ल सरलग चार  पांच रहपट तान तान के जमा दिस , फेर एती सोनकमल कुछु नि कहिस , रोवई तो धुरिहा ...! फेर ये बुता ल महतारी जलकुंवर   थोरकुन धुरिहा ले बरोबर देखत रहिस ! लईका आंय ...खेल खेलवारी म सब होथे, फेर निरपराध लइका ल अतेक मनभरहा रहपट दे देवत हे , ये लइका हर ।


             वोतकी बेरा नन्दिनी घलव येती आ गय अपन पूत गजपाल ल खोझत खोझत...

"नन्दिनी दीदी, मोर लइका हर तोर लइका करा ,जब वोहर पेट म रहिस,तब ले मार खातेच हे ओ !" जलकुंवर, नन्दिनी ल सरेखत कहिस ।

"कइसे का हो गय ...!"

" तँय खुद देख ले , अपन आँखी म ..." जलकुंवर कहिस अउ अब वोहर सोनकमल ल बलाइस अपन तीर म । सोनकमल तीर म अइस, तब वोकर फ्रॉक ल ऊपर करके ,वोकर पीठ अउ गाल ल दूनों झन देखिन...सिरतोन वोमन म  बगबग ले लोर उबके रहय ।

"डोकरी के  मुड़ म चढ़ाय ये, बहिनी !  ये साला कुकुर हर कोन जानी का करही, आगु चलके ।" पीठ के लोर ल देखिस,तब नन्दिनी हर रो डारिस । वोला अइसन रोवत देखिस,तब सोनकमल वोकर तीर म फिर चल दिस -बड़े माँ, का हो गिस ओ !

"कुछु नई होय ये ,बेटी !" वो कहिस ।

" तब फिर तँय काबर रोवत हावस ...?"सोनकमल वोला पूछिस,तब नन्दिनी हर वोला रपोट के अपन कोरा म ले लिस ।

"कइसे दीदी,कुछु कहत रहे काय ?ये लइका मन के किलबोल म गोठ हर आन -तान हो गय ।" जलकुंवर , नन्दिनी ल कहिस ।

"हाँ,जलकुंवर ! मंय तोर वो सोनार ,जउन हर चांदी के घलव बुता करे रहिस, तोर पैंरी ल नई ढारे रहिस,वोकरे पता -ठिकाना पूछत रहंय ।"  नन्दिनी,जलकुंवर करा अपन  आय के कारण बताइस ।

" वो तो ये कटौद के सोनार ये, फेर वोहर सोन के बुता ल जादा करथे ।"जलकुंवर कहिस ।

"फेर तोर चांदी ल तो करिस न ...?"

"हाँ, करे बर तो करिस हे ।"

"तोर चांदी ल करिस हे, अउ बढ़िया करिस हे ! तोर ये पैंरी मन रे बहिनी, बड़ निकता  ढरांय हें । देखबे , येमन ल त सुख लागत हे ।"

"दीदी, तोला अतेक पसन्द हें येमन ,तब  फेर येमन ल तँय ले ले अउ मोर बर नावा ढरवा दे ।" जलकुंवर हाँसत कहिस ।

"ले लेथें,फेर एमन मोर पांव के ये मेंरुआ मन म थोरकुन छोटे हो जाहीं ।"

"हाँ, ये तो हे ! " जलकुंवर कहिस अउ बने नजर गड़ियाके नन्दिनी के पिर्री मन ल देखीस ।उठत- बइठत  भी देखे हे वोहर , नन्दिनी के शरीर के बनोरी ल । चकरेठी...दोहरी काठी के नन्दिनी ! तब अतेक ठोस भार ल साधे बर ,विधाता ल वोकर इर्री-पिंर्री ल घलव , मोखा चकरेठी बनायेच बर लागे हे । ये नन्दिनी दीदी, अभी अइसन हे ,कि एको तिल कोई जगहा के निकाल देबे, तब देखईया हर तुरतेच मना कर दिही , राहन दे खँड़िया हो जाही कहके ।

"का देखत हस बहिनी...अतेक । ये दोखही रुं*  मन  कतेक लगरबे घसरबे ,तब ले भी जस के तस यें ।"नन्दिनी,थोरकुन सकुचावत कहिस ।

"राहन दे दीदी, येमन तो अंग के शोभा आंय,अउ येमन सोन के घलव बने हें न ।"अब तो अइसन कहत जलकुंवर घलव थोरकुन हाँस भरिस । 

"तँहू ओ जलकुंवर,कहाँ करा मोर देंहे के रुं* मन सोन के बने हें,भला ।"नन्दिनी, खुश घलव होत रहिस ।

"दीदी,एमन पांच-परगट दिखत हें ,तब तो मंय कहत हंव "जलकुंवर अब ले भी मुचमुचातेच रहिस ।

"चल रे तँय सलांगी मछरी असन   पतरेंगी...

चिक्कन-चांदो , तब कुछु भी कहले । देख तो तोर पांव अउ पैंरी ल ।" नन्दिनी कहिस अउ वोकर पैंरी ल फिर छू के देखिस ।

"बनोरी-गढ़ा  हर भी बढ़िया अउ  चांदी हर तो पिकी चांदी आय , नोनी , तभे उबके हे तोर गोड़ म ।" नन्दिनी  के आँखी म एक पइत फेर,वो पैंरी अउ वोकर बनईया बर सत्कार के भाव तउर उठिस ।

"दीदी, चल, काम के बात करी । जब तोला ये बनोरी हर पसन्द हे, तब फ़ेर वो सोनार  ल , इहें बलवाबो अउ अपन आगु म ठीक अइसन पैंरी ढरवाबो । मंय सोनकमल के बाबू ल , वो सोनार के शोर पता लेय बर कह दिहाँ । "

"आही वोहर ...?"

"आही ,काबर नि आही । येहर तो वोकर बुताच आय , अउ वोकर मेहनताना तो पाबे करिही ;कुछु मुफ़त के तो बात नई ये न ।" जलकुंवर, बल लगाके कहिस ।

 

                येती नन्दिनी अउ जलकुंवर के गोठ -बात माते रहिस,अउ वोती लइका मन के रेहचुली फेर चें...चूँ बोले लागिस । ये पइत फेर दुनों भई -बहिनी गजपाल अउ शिखा बइठे रहिन रेहचुली म अउ सोनकमल वोमन ल फेर किंजारत रहिस । फेर वोहर  अपन सकत -सिरे ही तो किंजारे सकिही , ये दुनों अपन ले बड़े मन ल  । अब तो बने नई चलिस , झुलुवा हर तब फिर गजपाल उतर के वोला दु थपरा अउ लगा दिस...


            फेर सोनकमल हर अबले घलव नई रोवत रहिस...वो विसनहेच एके झन शिखा ल झुलाय के कोशिश करत रहिस । फेर महतारी जलकुंवर छिटकत... नन्दिनी ल अपन जगहा म छोड़ के ये करा आ गय रहिस ।

"रे लइका, तँय जनम के कुटही हो गय । कोनो कतको मारथें, तब ले तँय रोबे नई करस । अउ अउ ये लइका हर तो तोला, पेटे भीतर ल धंसात  हे ।" जलकुंवर कहिस अउ बमफ़ार के रो बईठिस । अउ नन्दिनी के  मुहुँ हर सुक्खा हो गय रहिस ।



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                         अध्याय 6

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" दई, दई ...! लइका हर कइसे करत हे ।चला तो देखिहा ! " जलकुंवर हँफरत अइस अपन सास बिरीज बाई करा । तब कइसे का हो गय ...कहत  वो कुदिस बहु के खोली कोती । पलंग म लइका सोनकमल नोनी परे रहय अउ लंबा -लंबा सांस तीरत रहय । देहें हर घलव चट करत हे । ये बबा गा ! बिरीज बाई के मुँह के निकल गय । अभी घर म येकर सियान आत्मा बेटा घलव नई ये । कइसे करि येकर देहें तो चट ल करत हे अउ साँस हर घलव ऊपर सँसू फेंकत हे...!

"का हो गय दई , लइका ल ! " जलकुंवर तो रोये के शुरू कर देय रहिस ।

"चुप चुप अउ लइका कोती चेत करी । येला डाभा हो गय अइसन लागत हे ।"  दादी बिरीजबाई  सोनकमल के छाती ल समारत कहिस । 

" मंय मनखे देखत हंव ,डाक्टर - बईद बर,फेर तँय अभी तड़ाका ये बुता कर...बाँस कामठी के आगी सुलगा अउ करू तेल म येला जनाय के लइक सेंक ! चट चट बइठार हाथ ल पूरा गला घेंच पीठ पेट छाती सब कोती । बाँस कामठी नई मिलत ये , तब ये जुन्ना झउहा ल काट के बार दे । "बिरीज बाई एके सांस म जलकुंवर ल सब समझा दिस ।


                जलकुंवर घलव ठीक वईसनहेच करिस ।तीपत -तीपत सेकई होइस पसीना के फुटत ल दुनों झन बर, सेकने वाली महतारी अउ सेंकात लइका दुनों झन बर ;तब फेर सोनकमल थोरकुन बने सांस लिस । येला देखीस तब महतारी के जी म जी आइस । वोहर वोला भर अँकवार पोटार लिस ।

"मंय सन्देश पठो देय हाँवो, आत्माराम करा वोहर बोर घर ले टेक्टर धर के आवत हे । येहर डाभा आय, भले ही अभी बने  लागत हे,फेर रात -विकाल के फिर दुख दे सकत हे।" बिरीज बाई कहिस सोनकमल ल समारत ।

"बई...!"सोनकमल अब दादी ल हाँक पारिस ।

"हाँ, बेटी  ! "

"कहाँ गय रहे तँय ?"

" मंय कहाँ जाहाँ बेटी, यह दे  अभी तोरेच तीर म बइठे हंव ।" बिरीज बाई कहिस, फेर वोहर वोकर देंहे ल बरोबर समारतेच रहिस ।देहें हर अबले भी बढ़ तीपत हे । अइसन करइ हर दुनों झन ल बढ़िया लागत हावे । 

"दई...!" सोनकमल फेर कहिस   अपन दादी ल ।

"हाँ, बेटी ! "

"काल मंय तरिया म गज्जू भैया अउ  शिखा दीदी ,दुनों झन ल दु दी पइत तउरे म हराय हंव ।" सोनकमल कहिस ।

"बेटी , वो दुनों झन ल जादा खाथस तो घलव अउ अब वोमन ल बड़े दिखत तो घलव हस ।" बिरीज बाई कहिस ।

"तुमन सब झन काल मरत ल पनखत्ती म डुबके हावा अउ येदे तोला पलइ -अजार चिपत हे ।अउ वोमन मंजा के खेलत हांवे, वोहु ल काबर नई गुनत अस , सोनकमल महारानी ! "ये पइत, दादी के जगहा म महतारी कहिस ।

"खेलन दे न ,खेलईया मन ल ! "सोनकमल कहिस, फेर वोतकी बेर वोकर बाबू आत्माराम आ गय कूदत -धांवत । सब गोठ ल समझ के वोहर वोला शहर के डॉक्टर करा देखाय के जोम करिस ।

" जल चल ,थोरकुन धुरिहा तो शहर अउ हमर मोटर हमर ट्रेक्टर ! " आत्माराम कहिस छोटकुन बोचका ल जोरत ।

"चला ...!" जलकुंवर कहिस ,ट्रेक्टर ट्राली म बइठत । फेर वोतकी बेरा गर्रा -बड़ोरा असन दुनो लइका शिखा अउ गजपाल आगिन अउ ट्रेक्टर ट्राली म चढ़ गिन । अउ फेर वोहु मन सोनकमल सँग शहर जाय के जिद करिन ।

"अरे लइका हो,सोन हर कुछु मेला -ठेला चना- चरबनी खाय नई जावत ये , वो तो शहर म सूजी लगवाय जाथे ।"  सोनकमल के बाबू आत्माराम कहिस । येला सुनिस तब गजपाल हर चुपे -चाप ट्राली ल उतरिस अउ वी करा लें  भाग पराइस , फेर शिखा हर मंय जाहुँच चाचा के रट लगा दिस अउ  उतरे के नांव नई लिस ।

"दई , कह देबे बड़े दई ल शिखा के बारे म !" आत्माराम अपन महतारी बिरीज बाई ल कहत ट्रेक्टर ल चालू कर लिस ।


               येती इलाज -माटी करा के आवत ल बनेच बेरा हो गय रहिस । शिखा हर तो अब ले  संग म रईबे  करे रहिस , फेर वोहर आज कुछु जिनिस के मांग नि करे रहिस । वोहर एक- दु पइत अउ आय हावे ऐ कका के संग म तब का लेबे शिखा कहके पूछे ले सदाकाल आइस क्रीम के नांव धरे हावे फेर आज तो कका हर सोनकमल ल तो आइस क्रीम तो खान देय नहीं अउ वो अकेला चोरी -लुका खाय नही । तबले चाचा हर यह दे बनेच अकन फूटे चना अउ छीन -छोहारा ल लान दिस हे अउ कहिस हे कि अइसन सुक्खा जिनिस मन ल खाय बर । चल आज एईच मन ल खाय जाय...फेर पहिली ये सोनकमल खाही तब न ! अउ इंतजार करे बर नई लागिस, सोन कमल फूटे चना ल चाबे के शुरू कर दिस ।

"तुँहर ये लइकामन हर काल सुदधा भर तरिया म नहाइन हाँवे, अउ ये लइका ल यह दे डबल - निमोनिया हो गय कहत हे डॉक्टर हर ।घर हमर शहर के तीर ये तब बन जात हे ।" जलकुंवर अपन गोसांन आत्माराम ल कहिस । आत्माराम येकर उत्तर म तुरन्त कुछु नई कहिस ।खाली मुचमुचा के रह गय ।

"कइसे का मंय ठठा -लबारी कहत हंव  !" जलकुंवर कहिस थोरकुन जंगावत ।

"तब मंय का कहत हंव । चला अब घर चली ।" आत्माराम कहिस फेर तुरतेच लइका मन कोती देखत पूछिस - चला जी नोनी मन , अउ बतावा ठंढा जिनिस मन के छोड़ अउ आन कुछु खईहा का ?" 

"नहीं...!"शिखा कहिस ।

" देखा नही ,डाक्टर हर भर्ती होय बर कहत रहिस । फेर वोइच दे , घर जाय बर घलव कह दिस ; फेर लक्षण तो निमोनिया के ही बताय हे न । " /जलकुंवर , थोरकुन जंगाय असन कहिस ।

"जल जंगा झन , लईकई म तहुँ अइसन करेच होबे ।"आत्माराम थोरकुन हाँसत कहिस ।

"करे होबो फेर सुरता नई आवत ये ।" जलकुंवर वइसनहेच कहिस । अब तो वोहर सोनकमल ल गुर्रत रहिस - अतेक पानी म नई नाचे रथे, तब काबर तोला सर्दी होय रथिस ।

"माँ , मोर संग तो ये दीदी घलव नहाय हे, वोला काबर सर्दी नई होइस ?" सोनकमल , मुँहू बनात अपन महतारी करा पूछिस ।

" सेंका -बोजा दवई -माटी चले हावे तब गोठिया ले रे  नोनी, नही त विहना कइसन मुड़ ल ओरमा    देय रहे ।" जलकुंवर ,वोला फेर  झेलिस गोठ म ।

"चला चला , नही त फेर डाक्टर करा भर्ती  करे बर लाग जाही, अबके पइत एकझन ल  नहीं ,सबो झन ल भर्ती होय बर लाग जाही ।" आत्माराम गौटिया कहिस ।


             सब के सब घर फिर आईन । ट्रेक्टर ल फिरत देखिस तब गजपाल कूद के आ गय , वोमन के तीर म अउ बांचे खाजी के मोटरी ल छीन के भाग पराइस अउ वोला छेवर करके ही  तीर म आइस । अबके पइत फिर दूसर गठरी ल तिरिस  काकी जलकुंवर के हाथ ले ...

"ये लइका ,येमन दवई ,ओखद -माटी आंय । लाना- लाना वोमन ल ...!" जलकुंवर जोर से चिल्लाइस फेर गजपाल वो गठरी ल ले पराइस । फेर थोरकुन  धुरिहा म वोमन ल खोल के देखत आक ...थू कहत वापिस फेर जलकुंवर करा फेंक दिस । येला देखिन ,तब सब हाँस भरिन ।

"खा -खा  टुरा बाड़ा ! येहू मन ल गप्प ल खा न । काबर फेंक देय ।"ये पइत शिखा कहिस ।

"रा न तुमन ल बतात हंव , मंय । "गजपाल मन म कहिस ।


                 आत्माराम गौटिया ट्रेक्टर ल वोकर जगहा कोती ठिकाना लगाय बर ले गिस ।येती मैदान खाली  दिखिस , तब गजपाल फेर कूद के तीर  म आ गय अउ साँय साँय दु थपरा अपन बड़े बहिनी शिखा ल लगा दिस अउ ठीक वईसनहेच दू थपरा सोनकमल ल भेंट कर दिस ।  शिखा हर किलबिला गय अउ बम फार के रो बईठिस ,फेर सोनकमल कुछु नहीं कहिस सदाकस अउ वोहर खुद शिखा के पिथे ल बनेच बेर ल समारत रहिस ।

"ये कुकुर हर अइसनहेच करथे । येहर जाय रथिस न सँग म हमन के अउ बाजे रथिस मुहँ म । को येला मना करत रहिस । संग म गिस भी नही अउ येदे मारा -पीटा करत हावे । "शिखा हर तो अबले रोतेच रहिस ।

" रा तोला अउ लगाहूँ ... बड़का मोर ले तउरे म अघवाने वाली बने हस ।" गजपाल बमकत रहे अउ  वोकर बड़खा दई रमौतीन गौटिन खुस खुस खुस... खुस  हाँसत रहिस ।







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                    अध्याय 7

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"बेटी, सब लइका मंझनिया के खाना -खया  छुट्टी म घर आ गिन,फेर तँय काबर नि आय आज ?" बड़खा  दई  बिरीज बाई, अपन नतनिन सोनकमल ल पूछिस ।

"अईसनहेच नई आंय बई, भूख घलव नि लागत रहिस ।"सोनकमल कहिस ।

 

               वोकर ये जवाब ल सुनके दादी हर वोला तरी ले ऊपर बनेच नज़र गड़ा के देखीस , कांहीं कुछु  हो तो नि गिस कहत ...! फेर येहर तो विसनहेच सोंगर-मोंगर दिखत हावे , जइसन जाय के बेरा म रहिस । तभो ले अभी भुखन हर परछर दिखत हे येकर चेहरा म  येला देखके वोहर खुद रसोई घर म घुसर गिस अउ नतनिन बर तिपत चीला लहुटाय के के उजोग म लग गय ।

"चल बई मंय खुद बना लिहां मोर बर अउ तोर बर ।" सोनकमल कहिस अउ बई ल घुचा के खुद भीड़ गय चीला बनाय बर ।


             चीला बनिस अउ नतनिन -बूढ़ी दुनों खांइन जइसन भी बनिस तइसन, तभे वो जगहा म जलकुंवर  आ गिस  ।

"ये ...! महुँ ल नई देवा जी सोनकमल । " वो कहिस अपन बेटी ले ।

"अब तँय काल खाबे खुद बनाके । अतका बेर ल आये नई अस अउ अभी छेवर म आके रोटी मांगत हस , आना बई ।" सोनकमल अपन महतारी ल कहिस।

"वइसे तँय कहाँ गय रहे अभी ? "सोनकमल , अपन  महतारी ल फेर पूछिस ।

"मंय खेतवाही डहर गय रहें, नोनी ।" महतारी कहिस सोनकमल ल ।

"फेर तोला खेत -खार डहर जाय बर कोन कहिस ।" सोनकमल महतारी करा प्रेमकलह करे बर 

भिड़ गय ।

"तोर ददा ।"

"वो काबर ओ?"

"अब बइठ के खाय के रंगीन जमाना चल दिस,  नोनी ,जउन कमाही तउन खाही ।"

"तोर मतलब तँय खेत म कमात रहे ? कइसन कमाय चीटिक महुँ ल तो बता ।"

"नवमीं -दशमी म आ गय टुरी बाड़ी फेर गज्जू करा लें पिटान खवइ हर नई छुटिस ।अउ येती बड़े- बड़े बात करथस ।" महतारी जलकुंवर हाँसत कहिस । 

"वो तो मोर बड़े भाई आय ।"

"तोर बड़े भाई आय, तब तोला उठत बइठत अइसन कुटतेच रहही ।"

"ले कती के गोठ ल कती किंदार दारिस न ।" सोनकमल हांसे के शुरू कर दिस ।

"खा अउ मार खा...!  वोकर बूढ़ी मई वोला सढ़वा ढीले हे तब तो सिंग मारबेच करिही ।"

"तँय वोकर दई -ददा ल काबर अमरत हस ओ ।"

"वोकर दई-ददा ल कुछु नई कहत हंव ।वोमन म दोष नई ये । जउन कुछ भी हे तउन हर ये डोकरी के देंहे म भराय हावे । "

"वोकर देंहे म तँय का पा गय ।"

"अपन बर ऊंच- पीढ़ा ! तोला जब भी वो लइका हर थपरा -लात जमाय हे न , तब-तब वोहर गंगा नहाय के सुख पाय हे ।  न हरके न बरजे , बस मुच मुच हाँसत रहही डोकरी ।"

" ले जान -जुआन दे , महतारी ! "

"कोन ल...!"

" गज्जू भैया अउ वोकर घर के बड़की दादी ल ।"

"खा न भई मार खा , सुद्धा भर मार खा ।"

"मंय कभु गुंनथव कि सब्बो दिन के ल एके थपरा म निकाल  दँव कहके फेर मंय चुप रही जाथंव ।मोर एके थपरा म वोला दुनों सुरता आ जाहीं रमौतीन अउ वो का नांव हे तउन ।" सोनकमल हाँसत 

कहिस ।

"तोर एईच गोठ हर बने लागिस हे , अब मोर पेट भर गय ।" जलकुंवर हाँसत कहिस, " ...वो का नांव हे तउन ?कोन नोनी ?"

"वोकर दादी अउ नानी ।"

"शश चुप कर न । वोकर नानी नई ये बेटी । वो तो देवलोक चल देय हावे । जउन कुछ कलदब वाली हे, तउन हर ये बस चहा पीई रमौतीन डोकरी म भराय हावे ।"

"बस महतारी !अतकिच भासन मार ! अउ तोर चूल्हा -चुकिया कोती ल देख । का रांधबे का गढ़बे तउन

 ल ।" सोनकमल वोला थोरकुन जंगवाय असन मुँहू अईठत कहिस ।

"करबो ओ दई,तोर का तँय बइठ जाबे, ये दे प्रेक्टिकल बनावत हंव कहके तब तोर काम चल।जाही, फेर हमर काम तो नई चलय ।" जलकुंवर , अइसन कहिस अउ वो जगहा ल जाय लागिस ।

"  रा...रा महतारी ! खेत म तँय का बुता करत रहय तउन ल नई बताय ओ ।" सोनकमल एक पइत फेर अपन महतारी ल जंगवाय बर कहिस ।

"तोर मुड़...! खेत म उतरके करबे तउनेच हर बुता थोरहे आय । मेड़ म बइठ के बनिहारिन- बनिहार मन करा मुँहा -चाही करत रईबे तब बुता हर बने उसरथे । अउ ये बुताल तोर बाबू कभु नई जानींन ।"

"वोहर तोरे कस लपरहा -लपरहीन नोहे न ! " 

" टुरी बाड़ी , अतका तो तोर महतारी ल मंय आजतक झेल के नई गोठियाय आँव  अउ तँय तो बोकर बर  पानीच नई पियत अस । सिरतोन तो कहत हे,  जउन होइस तउन होइस ; अब बाढ़ती उम्मर  आ गय, अब काकरो हाथ -बहाँ ल कोई ल छुए के जरूरत नई ये । अउ का दाऊ का नोनी पिला सबले थोरकुन  धुरिहा रह अउ बार -बांच कर । " बड़खा दई हर एके पइत उलद दिस, जउन हर अतेक बेर ल संकेलाय रहिस ।

"ठीक हे बई, तोर गोठ हर बने लागिस हे..." सोनकमल कहिस ।

"अउ मोर हर का हो गिस ?" महतारी जलकुंवर तमक के कहिस ।

"तोर हर रेन्दाही -झगड़ाही गोठ ये ।"

"ये बबा रे !"

" हाँ, अउ नही त का ।" 

"रेंदाही -झगड़ाही गोठ नोहे बेटी ! सब ल अपन कोख ले निकले औलाद प्यारा होथे । अउ अपन आँखी आगु म वोकर अपमान, वोला काकरो हाथ ले पिटान खात कोई भी माँ-बाप नई देख सँकय ।"

सियानीन बिरीज बाई कहिस ।

"येकरे बर मोला घेरे हावा ।" सोनकमल कहिस।

"त जा न भई, जिंदगी भर काकरो लात खात रह ।" महतारी जलकुंवर कहिस ।

" वईसनहेच आशीर्वाद देबे तब नि होही ।"सोनकमल कहिस ।

"सोनकमल माने सोनकमल ! वोकर आगु म वोकर ल चार पांच साल बड़े कनहुँ उटरी -बुटरी शिखा के बुटरू गजपाल कुछ भी नई यें । ये दुनों लइका एको  झन नन्दिनी दीदी के पानी नई पाइन ।  अउ एमन  अब सोनकमल के आगु म खड़ा झन होंय ।" जलकुंवर अभी ले भरभरातेच रहिस ।

"बुटरी हावे त , तोला का करत हे शिखा दीदी हर ।" सोनकमल अपन महतारी करा फिर भिड़ गय।

"तँय कनहुँ ल नई सकस ओ महारानी ! मोइच भर ल सकबे, बस !!" जलकुंवर खुद रोनरोंनहु हो गय ।


          येला देखिस,तब खुद सोनकमल चुप पर गय ।वोहर कूद के जाके अपन महतारी के मुहँ ल अपन चाकर हथौरी म धर लिस अउ वोकर चिक्कन गाल ल छुए छुए करिस । वोला अइसन करत देखिस ,तब  जलकुंवर थोरकुन लजा गय  अउ फिर थोरकुन हाँसत कहिस -छोड़ ओती ! 


           महतारी ल अइसन रोवत फेर हाँसत देखिस तब तो वोला हँसवाय बर सोनकमल ताली पीटत जोर जोर से कहे लागिस-ये दे रोवत लइका हाँस दारिस रे ! ...हाँस दारिस रे !

" बेटी,तोला ठठा -मसखरी होय हे ! निज पूत आवे झन कोउ आंच...! "दादी बिरीज बाई कहिस ये पइत , " हमन तोला कभु ये तो नई कहे अन कि धर तो सोनकमल,अउ धंसा कनहुँ ल । फेर रमौतीन तो अतकिच म अपन शान समझ्ते कि वोकर लइका हर आन मन के लइका ल ठठात हे । "

"बई, तँय अभिच्चे कहे हस... निज पूत आवे झन कोउ आंच , फेर मंय तो पूत नोहों  मंय तो पुती आँव ! तब तँय मोर बर काबर अतेक रो मरत हस ।" सोनकमल अइसन कहके चुप पर गय ।

"तँय तो अकबकवा देय बेटी, ये प्रश्न के उत्तर म कुछु भी कहबो तउन हर बदरा -खखरा हो जाही ।महतारी वोई बाप वोई कोख वोई फेर आज ले घलव शिखा हर आने चाल चलन के हे अउ तोर गज्जू हर आन हे । "

"ये...! मोर गज्जू...!! " सोनकमल हाँसत कहिस ।

"चल हम सब के गज्जू । फेर वोहर गलत संस्कार पावत हे डोकरी के 

चलते ।" बिरीज बाई कहिस ।

" चल चल खाना निकाल ! अतेक मयारुक बनत हावस त अब ।"सोनकमल महतारी के कनिहा ल रपोटत कहिस ।

"चल चल ...!" जलकुंवर कहिस फेर अब ले भी वोहर सोनकमल के कष्ट ल सुमिरत बढिया नइ होय रहिस । भूख के बेर म ये लइका म भूख नइये , दु -चार थपरा ल गनत नइये । कइसन बाढ़त हे ये लइका ! न पहनें ओढ़े के फिकर न खेले खाए के चाव कइसन करत हे  येहर । हाँ...रंग रूप म आँखी चुंधिया जात हे डोकरी रमौतीन के अउ मास्टर मन घर म आके बनेच पढोय बर घलव कहत हें ।


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                     अध्याय 8

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                         जिहाँ तक ल नज़र जाथे यह तक ल ये कांशी के फूल मन भद ...भद ले फुलिच मरे हांवे ।अउ तो अउ तरी नदिया म जउन माटी के टीला निकल आंय हांवे,वोहु मन ऊपर म कन्सी पिकी निकाल के ये बंद  मन अपन फूल ल बगरा देय हावे । 


                   सोनकमल थोरकुन अउ आघु गिस ,  तब तो ये फूल मन अउ गझा गय रहिन । ठोस एकदम ठोस सादा रंग हर सुरुज के अंजोर म चिलकत रहिस । वोहर एक पइत अगास कोती ल देखिस, ठीक मुड़ ऊपर म सादा कपसिला बादर मन  घलव ठीक अइसनहेच बड़े -बड़े कूड़हा म जमें हांवे , वोहु मन नज़र के जात भर ल । अब तो सोनकमल एक पइत ऊपर बादर मन ल देखे , तब फिर भुइँया म खमखम ले ठाढ़े कांशी फूल मन ल । अभी धुंका हर घलव शांत हावे, येकर चलते ये फूल मन लसरत नइये अउ बादर जइसन ही खमखम ले दिखत हें ।


                  सोनकमल खेतवाही खेत-खार के रास्ता म मां ,बाबू अउ  खुद अपन के कलेवा सँग म छह बनिहारिन मन के  भी कलेवा धर के अमराय जावत हे । दु तावा अंगाकर , चटनी,पीये बर पानी अउ बरसाती  पन्नी । ये पन्नी तो दु काम म आथे...पानी गिरगय तब ओढ़ ले अउ सूखा -पाखा हे, तब देख -ताक के बिछा ले अउ कोई भी जगहा म बइठ जा । अतका सब जिनिस मन ले लद -फंद के वो अपन खेत के रस्ता म जावत हे , फेर स्कूल ड्रेस ल पहन पारें हे । सादा पजामा अउ अगास कस नीला कुर्ती अउ सादा दुपट्टा । खेत खार के रस्ता म बरसात के दिन म बड़े बड़े मुहीं फूटे रइथे । वो सब मन ल अलाँगत- फलाँगत वोहर अपन रस्ता म बढ़त हे, फेर  मुड़ ऊपर पानी के छोट बुटी भाँड़ा होय के बाद भी वोहर अगास के दृश्य ल देख लेत हे । वो सुंदरताT देख के वोकर मन म आनन्द उत्साह भर गिस । 


            आगु म खेत के मुंही म ले नाहक़त पानी म अपन पांव ल बोरिस, तब वोकर पांव करा नान नान मछरी मन आ गिन अउ वोकर पांव ल छुए लॉगिन ।

चला रे मछरी हो...तुमन संग भुलांहा ,तब वोती कलेवा पहुंचाय बर बेर हो जाही । फिरती बखत तुमन संग एको घरी खेलहां ! सोनकमल  मनें मन कहिस अउ आगु के रस्ता ल लिस । खेत म दुन निंदई के बुता चलत हे ये पायके खेत -खार हर अभी गझिन हे । सबो खेत में म मनखे मन बगरे हें । दुन-निंदई म का करथें माँ...वोहर अपन महतारी ल पूछे रहिस वो दिन -

"तँय खुद आके देखबे अपन आँखी म तब अच्छा ले समझबे ,वो बुता ल।"

"तभो ले कुछु बता दे,पइसा -कौड़ी तो नई लागही बताय बर ।"

"तँय मोर करा सोझ मुँहू बात करबे कि निहीं , तउन ल पहिली बता ।"

"ले भला बतावा गा सियान मन मंय, येकर से कइसन टेढ़ा मुँहू बात करत हंव ।"वोहर महतारी ल वो दिन  बनेच बेलबेलवाय रहिस । सोनकमल येला सुरता करत  हाँस परिस ।

"बेटी, दुन निंदा म खेत के बन्द कचरा ल एक पइत फेर सफा करथें ।" महतारी के जगहा म  दादी बिरीज बाई उत्तर दिस ।

"सियान , तुँहर परभुता म तुमन खेत -खार के मुखला नई देखे आ , तबले भी तुमन के दिन कट गय ।तुँहर पांव म चिखला नई लोटिस ये ।" महतारी जलकुंवर कहिस ,"फेर अब आने जमाना गय । तुँहर घर म कतको भरे -बोजाय रहही,  तब ले तुंहला बनिहार मन सो बुता लेय बर लागही,तब तुंहला ओमन के संगे -संग रहे बर लागही ।"

"हाँ, बेटी ! तँय डहक- विकल होवत खेत -खार म अब किंजरत हस ।धीरे बानी कर के सबो खेत ल चिन्ह डारे हस अउ हम तो पांच टेपरी ल भी चिन्हारी करे नई सकबो वोमन के ।"

"खेत के मेढ म छाता ओढ़ के बइठे ले असकट घलव लागथे, तेकर सेथी तो अब मंय घलव  खेत म उतर जाथंव मां ! बन्द कचरा तो न के बराबर हे ,फेर करगा -झारा मन तो बनेच हें । " 

" दई , जेहर कमाही ति हर अब खाय बर पाही । अतेक खेत- खार के मालिकिन बिरीज गौटिन के, रमौतीन गौटिन के चल गए चल गय बिना चिखला खुन्दे,फेर बिरीज के बहु जलकुंवर के नई चले । वोला तो खेत-खार म अपन गोसान संग वन -वन वोकर छया बरोबर डोले बर लागिही ।"

"बिरीज के चल गय, रमौतीन के चल गय , अब रमौतीन के बहु नन्दिनी के घलव चल तो जात हे बिना खेत -खार जाय, तब तोरो भी चल जाही ।तहुँ झन जा खेत -खार !" दादी हर तड़प के कहे रहिस ।

"दई, नन्दिनी दीदी ल  कभु झन लागे फेर मोला जावन देवा, तुँहर बर सीठा -मीठा तो लइका सोनकमल तो उतार के देबे करत हे । अरे आज नही त काल ...!" महतारी हाँसत कहे रहिस ।

"ये का ये बेटी ? "

"अवइया समय ।"

"दई, अब तहुँ रानी महुँ रानी तब कोन जाही पानी...नई चलने वाला ये । खाय बर अउ पाय बर हाथ -पांव चलाएच बर लागही ।"महतारी हर बड़खा दई ल ओझी देय रहिस । तब फिर वोकर गोठ के मतलब समझ के, बड़खा दई हाँस उठे रहिस ठीक अईसनहेच कांशी फूल मन कस । महतारी के खेती म उतरे के फायदा ये होवत हे कि खेती -किसानी के बनेच गोठ -बात ल  वोहु सीखत जात हे। दुन निंदई म शोबना बन्द के सँग म करगा के चिन्हारी करत खेत ल परछर करत हें महतारी के बनिहारिन मन अउ महतारी दु बनिहारिन के पुरता अकेला करत होही , वोमन के पीछू म किंजरत छूटे मन ल बिनत ।


            खेतवाही के रस्ता थोरकुन कठिन तो होबे करथे,बरसाती दिन म चप्पल -जूता चलबे नई करे । पहिन के आबे तब कै पइत निकालबे -धरबे, तेकर सेथी बिन पनही के पांव आ । फेर ओहु म सम्भल के , बने मजबूती ले पांव ल मढ़ात !

"ये दाई ओ!"सोनकमल के मुख ले निकल गय । एकठन कुश के टिप हर पांव म गढ़ गय रहिस पच ले ! हिंदी वाला आचार्य हर तो एकरेच किस्सा कहे रहिन । आचार्य चाणक्य -विष्णुगुप्त -कौटिल्य बन ठन के चिक्कन -चन्दरुलाल बनके अपन ससुराल(?) जात रहिन, तभे ओमन के पांव म अइसन येई एकठन कुशाग्र हर गढ़ गय । परमक्रोधी ब्राम्हण आग -बबूला ...! गांव-गंवतरी कैंसिल , वो घर वापिस आके मही के ठेंका अउ कुदारी लेके वो जगहा म फेर पहुँचीन अउ कुदारी ले वो कुश मन के जरी ल खन के वोमे मही रितोय के बुता! अउ एईच क्रोध एईच आगी हर शक्तिशाली फेर आततायी नन्द वंश ल निर्मूल घलव करिस । कतकी गोठ रकम - रकम के गोठ निकल आथे मन म , वो दिन भानु सर घलव कहत रहिन कि येहर कुशाग्र बुद्धि के छात्रा आय । जइसन कुश के अग्र भाग हर पैना रइथे ,ठीक वइसन बुद्धि ल घलव पैना चोखट होना चाहिए अउ आज ये 'कुशाग्र ' हर मोरे पांव म गड़ गय । 


          ये ख़ार के खेत मन बनेच गहिल म हांवे,तेकर सेथी इहाँ जाय बर बनेच रेंगे बर लागथे । फेर बरसाती दिन हर किल्ला ये ! खेत ख़ार भरभर मनखे मन के भरमार ! वो दे आगु म वोकरेच कस स्कूल ड्रेस पहिरे कनहुँ आन आवत दिखत हे । कोन ये येहर ? ये तो रोटी -पानी कलेवा अमरा के फिरत हे ।

ये तो चंपा कली माने चंपा आय ।

"सोन...!" सिरतोन म वोहर चंपा रहिस ।

"आ गय  चंपा , रोटी -पानी अमरा के ?"सोनकमल वोला पूछिस ।

"हाँ, बहिनी !फेर मोला अउ फिर आय बर लागही ।"

"वो काबर ओ !"

"मंय घर ल खातु के बोरा ल लेहे जावत हंव । ददा हर कहत हे,आजे छींच दी खेत म कह के ।"

"वो तो बढिया बात ये ।"

"फेर मोर तो मरना आय । ये दु पइत रेंगे बर परत हे अतेक धुरिहा ल ।"

"न न न...! झन रो ! खेती -पाती सब समलाती बुता माने टीम वर्क आय , हम सब ल थोर-मोर तो करेच बर लागही ।"सोनकमल वोकर गाल छुवत वोला दुलारत कहिस । येकर से चंपा हाँस भरिस -तहुँ ओ सोन ! का का धरे हावस ?

"अउ का कलेवा ।ले मोला जान दे अउ तहुँ तुरत - फुरत तहुँ जा ।"

"रा...रा , मोला एक नजर देखन दे ,गौटिया पट्टी के कलेवा कइसन बने हे, तउन ल।" चंपा कहिस अउ सोनकमल के मुड़ ऊपरी बोझा ल सिरतोन उतार के उलटा -पलटा के देखे लागिस । चटनी के डिब्बी ल खोल के लंबा सांस खींचिस ...ओह ! गजब ! 

कहत ।

" छोकरी बाँड़ी !जुठार देय चटनी ल ।" सोनकमल बनावटी गुस्सा म कहिस ।

"वो कइसन वो , मंय कहाँ चीखे हंव तोर चटनी ल ?"

"तँय रसेन्द्रीय माने जीभ ले नई चीखे त का होइस, घ्राणेन्द्रिय माने नासिका माने ये तोर सुआ नाक ले तो येकर स्वाद ल ले डारे, तब नई चीखा गय येहर ।"

"वा रे पढ़न्तरिन वा !" चंपा कहिस अउ खुद भाग पराइस ।


              चल सोनकमल , अभी के समय म अतका नई खटबे, तब दई -ददा मन ही कतका ल 

समोखहीं ।


***




                         अध्याय 9

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                  सोनकमल सोनकमल आय । दूसर कनहुँ आन नहीं ।  कनहुँ जगहा म अगर  सोन के कमल होही  अउ जब वोहर   अपन पंखुड़ी मन ल छतनार करत होही तब कइसन दिखत होही ? कइसन दिखत होही, जइसन हमर ये सोनकमल !  बड़का दई बिरीज गौटिन गुनत हे देखत नतनिन के मुँहरन ल । जस -जस दिन चढ़त जात हे येकर वरन हर अउ दपदप करत जात हे । अउ अकल -बुद्धि रंग -रूप ले कनहुँ जादा गहिल ! देख न महतारी के बनेच बुता ल अपन मुड़ म बोहो लिस न । फेर देखबे त साक्षात ब्रम्हचारिणी माता आय । चेहरा मुंदरा म खोज बे तब भी एको पिरकी तक नई पास । केवल अउ केवल तेल चुहत चिक्कन रूप ! फेर येहर अतेक गहिल बुद्धि के भी काबर होत जात हे अभी ले । येहर लइकई ये खेले- खाय के दिन ये ।  पाछु तो घर -गृहस्थी के  गेंरवां म बंधाय के बाद सबो जिनिस हर हर... हर गंगा ये!

"जाबो बई अब ...? "सोनकमल ,दादी बिरीज गौटिन ल पुछिस ।

"हाँ, जाबो बेटी,फेर तोर महतारी आ जातिस तब

 न ।'

"वो तो आ जाही बई , तइंच तो कहत रहे कथा - भागवत म अबेर झन करे मनखे अउ ठीक बेर म पहुँच जाय ।" सोनकमल बड़का दई के केश मन ल बढिया लाल डोर म बांधत कहिस ।

"वो तो ठीक हे,फेर वोहर ख़ार -वन गय हे । वो आ जातिस अउ जातेंन तब अउ बने लागतिस ।"दादी बिरीज बाई कहिस ।

"बई ,खेत -ख़ार के बुता सकलाही तब तो मनखे आय सकही ;अउ येती पीछू हो जाबो , तब तँय बइठे बर नि पाबो भागवत मेर ।"सोनकमल अपन बड़का दई ल चुक- चुक ले समरा पकड़ा लिस अतेक बेर 

म ।

"बेटी, तँय तो अपन महतारी करा वोकर ले बढ़के टक्कर लेवत हस बुता -काम म ,फेर मंय तो निमगा बईठाँगुर आँव । मोर समे हर ये भिथिया मन के भीतर म कट गय ।तोर महतारी के भी कट जातिस, फेर वोहर अपन इच्छा ले खेत -ख़ार वन -वन डइन डइन डोलत हे । जम्मो बुता ल हपटेच परत हे ।"

"वोइच काबर बई, पूरा गांव ग्राम भर के मनखे तो अइसन करत हें ।"सोनकमल वोकर गोठ के ओझी दिस,जेमे थोरकुन पीरा के भाव रहिस ।

"अब तो गउटियाई जमाना रह नई गिस बेटी न गउटियाई 'पन' रह गय  ; नहीं त गौटिया घर घराना के बेटी बहु मन के कनहुँ छइंहा तक ल देखे नई पाँय, वोकर एक दु लइका के महतारी के होत ल ।"बिरीज गौटिन कहिस ।

"रहिस होही बई, वो तईहा के बात आय ।अउ तईचं कहथस न तइहा के बात ल बइहा ले गय । अब वो गोठ मन के सुरता भर राख ।"सोनकमल हाँस भरे रहिस, बड़का दई के तइहा के बात ल सुनत ।

"बई, अब पहिली के गंउटी -सामंती शासन के सुरता भर राख । अब कनहुँ ल कनहुँ नई डरांय । अउ वोकर ले बढ़के कमाबे तब खाबे ।"सोनकमल अपन  बड़का दई ल मास्टरीन असन समझात कहिस ।

"तोर महतारी हर बड़ चतुरा ये बेटी ।" बिरीज बाई कहिस ।

"हाँ, मोर महतारी जलकुंवर !"सोनकमल  हाँसत कहिस ,"जतका सुंदर तन ले वोतके सुंदर मन ले ।बई,जलकुंवर द ग्रेट ! "

"वो काये बेटी !"

"अंग्रेजी ...! मोर महतारी दुनिया के सबला चतुरी ये काबर कि वो जानथे कि सोझ डहर हर सबले निकता अउ छोटे होथे । मनखे सोझ डहर म चले ले सबले जल्दी पहुँचथे । अउ जीए -खाय के  सबला सोझ डहर ये कमा अउ खा !"

"येकरे बर तोर महतारी खेती पाती के बुता म लग जाथे । फेर वोकर संग-संगवारी नन्दिनी हर तो घर ल  बाहिर नई निकले ये ।"बड़का दई बिरीज बाई कहिस,फेर वोकर गोठ म बड़ अकन पीरा के भाव रहिस ।

"अरे आज नई निकले ये त काल निकलही ! बइठ के खवई ले कब तक पुरोबे  ओ बई ? तँय काबर रोनरोंनहु हो जाथस खेत -ख़ार के नांव म ।का मोर महतारी ल तँय भेजे हस खेत -ख़ार ?"

"सपना दशा म घलव भी नही ..."

"तब तँय काबर पलपला मरत हस ! वो अपन मन ले अपन इच्छा ले ददा के संग खेत ख़ार समोखत हे, येहर तो बढिया बात आय न ! ये नावा चलागत ये, बई ।अवइया समे म देखबे तो का न का हो जाही ।"

"वो सब देखे बर हमन नि जीयन बेटी ! तुमन वो सब ल देखिहा ।अभी तो मोला एके ठन जिनिस ल देखे के साध भर हे ।"

"वो का बई ?"

"मोर बहु बोहासिन  मोर लइका पिचका  मन आन मन ले कम झन दिखें !"

"आन मन ले के रमौतीन गौटिन ले ।"

"हाँ, रमौतीन के पत्तो नन्दिनी हर घर म खुसरे रही च

छईंहा म अउ मोर पत्तो हर  कमा के लानही तभे खाबो हमन ? देख न ख़ार वन म फिरे ले कइसन करियात जात हे वोहर ।"

"बई, जलकुंवर  हर अभी सम्हर- पकर दिही तब कई झन नन्दिनी मन  वोकर तीर म ठाढ नई होय सकें । जलकुंवर इज ग्रेट बई !"

"छोकरिया ,सियानीन करा का अंग्रेजी- हमेरी चलात हस अउ मोर नांव धरत चारी -विचारी करत हावस । तभे तो डहर भर भर मोर गोड़ हर खुजियात रहिस ।"महतारी जलकुंवर  खेत ले घर आइस अउ अपन मुड़ के चारा के बीड़ा ल उतार दिस ।

"कुछु नई होइस महारानी, तोर सुंदरई के बड़ई भर तो करत रहेन, आना ओ बई ! " सोनकमल कूद के जाके वो चारा के बीड़ा ल छोरिस अउ कोठा आगु म पहिली  ले मुकुर- मुकुर देखत  फेर चारा ल देखके छटपटात बछरु ल चारा परोस दिस ।

"ले आ गय बेटी !" बिरीज गौटिन अपन पत्तो जलकुंवर ल कहिस अउ बने निच्चट वोकर मुँहू ल देखे लागिस ।जइसन वोहर वोकर चेहरा म सुरुज के  प्रभाव ल खोझे के कोशिश करत हे । घाम पियास ल आबे तब तो चेहरा हर कुम्हलाबे करिही । वोकर थोरकुन मुरझुराय चेहरा ल देख के बिरीज गौटिन हर बड़ विपतिया गय !

"चल चल बेटी हाथ मुँहू ल धो ! "वो बहु जलकुंवर ले कहिस ।

"दई अब तुमन जावा न भागवत पुराण म । तुमन ल उहाँ जाहीं कह के मंय आधा -अधूरा बुता ल छोड़ के आंय हंव ।"जलकुंवर अपन सास ल कहिस ।

"भागवत पुराण के का ! जा तो पहिली तँय अपन हाथ मुँहू ल धो के आ ।चुन्दी मुड़ी जतन !चेहरा मुंदरा ल बना तब  फेर ...!" बिरीज गौटिन अपन पत्तो ल थोरकुन  खर गोठियाईस ।


            जलकुंवर अपन सास के मन ल जानत हे ! सदाकाल वोला वोहर सुंदर देखना चाहत हे ।अउ विलम्ब करही तब सियानीन ये जगहा ले डोले नहीं जबतक वोला परछर -हरियर नि देख लिही वोहर । जलकुंवर जल्दी जल्दी हाथ पांव धोके चुन्दी मुड़ी सनकेलिस अउ आ गय वोमन के तीर म अब जावा कहत ...! वोहु ल तो पता रहिस कि भागवत के ठउर म जाना हे, तब खाली आरती -प्रसाद के बेरा पहुचें ले का फायदा हे ?थोर मोर कथा गीत- गोविंद नाचा- कीर्तन नई देखे बर मिलही तब का फायदा !

"जा चेहरा -मुंदरा बने बना !"  बिरीज गौटिन फेर बहु जलकुंवर ल कहिस ।

"चल ओ  चेहरा देखी बई ! अउ कतेक चेहरा देखबे ?ओती भागवत हर छेवर हो जाही ।" सोनकमल हाँसत कहिस ।

"होंवन दे बेटी छेवर फेर मोर बर तो एइच हर भागवत ...पोथी -पुराण ये ।"

"का हर ! येकर  चेहरा हर?"

"हाँ...! येला बने सबले बने सब सब ले बने देख के जाहाँ तभे मोर मन हर एको घरी भागवत म थिराही ।"सियानीन अपन गोठ ल पुरोवत कहिस । जलकुंवर सियानीन के जंउहर -तनाव ल समझ गय ! वोकर खेत -खार किंजरें ल येहर बिल्कुल भी मन नई करत ये, फेर जीये के धंधा बर कइसे मना करे सकही घलव ! 


           जलकुंवर झटर- पटर अपन सिंगार पेटी अउ  दर्पण करा आगय । जइसन तइसन चेहरा म लेप पावडर लगा के फेर सियानीन करा जाके पांव पर लिस । एकप्रकार ले येहर विनती घलव रहिस अब तो जावा कहत ।


              नतनिन -बूढ़ी दुनों पहुँच गईंन भागवत कथा के ठउर म । कथाकार महाराज हर कनहुँ उपकथा के संग म वर्णाश्रम धर्म के व्याख्या करत रहिन । चार वर्ण फेर चार ठन आश्रम ! ब्रम्हचर्य-गृहस्थ-वानप्रस्थ-सन्यास संगे -संग मनखे के चार प्रमुख क्षेत्र धर्म-अर्थ-काम अउ छेवर म मोक्ष ! फेर सबके सार - निश्छल निष्कपट गृहस्थ जीवन !  वोकर  दई -ददा मन  तो बस एइच सब करत हें जउन ल महाराज हर पोथी -पुराण म बखानत हें । गृहस्थ जीवन सबले उत्तम ! निज कुटुम्बिक कर्तब्य ल पूरा करइया मनखे सबला बड़े विद्वान नीतिवान गुणवान सब आय । गृहस्थ जीवन  हर मनखे के सार ये ।


         सोनकमल मने मन कहिस...हे देव ! हे कथावतार व्यासपीठ अधीश्वर महाराज ! हे पित- मात ! मोला क्षमा करिहा ! मंय ये गृहस्थ आश्रम ल नई अपनांव चाहे कुछु भी हो जाय ।



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                   अध्याय 10

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           गोदना   गोदवा ले दीदी  

           गोदना गोदवा ले बहिनी  

           न तोर हीरा न तोर मोती

           न  तोर  लाख रुपईया...

           कुछु  नई जाये तोर संग, 

           जाही बस त येई  जाही

           मोर देय ये चार बिंदिया !


                   वो गोदनहारिन नारी- परानी हर  अपन काम -बुता के गोठ ल अइसन मीठ भाखा म बखानत खोर -गली म किंजरत रहिस । बड़ धुर ल वोकर कांस कस ठनकत गोठ हर सुनात रहे । फेर वोहर अब गली म बनेच आगु निकल गय रहिस ।


            बिरीज गौटिन एला सुनिस तब गुनिस...बाढ़त उमर के लइका नतनिन सोनकमल आज नही त काल जाही अपन ससुरार ! फेर अइसन सादा सरबदा? नहीं...नहीं ! गोदनहारिन ल बलवा के एला थोर -मोर गोदना गोदवा देत हंव । अइसन गुनत वोहर गोबरहेरिन ल तुरत बलाइस कोठा कोती ले अउ वो गोदनहारिन ल बला के लाने बर कहिस । वो भी तुरंत चल दिस अउ गोदनहारिन ल धर के ले आनिस ।

"बेटी सोनकमल ...!" गौटिन नतनिन ल हांक पारिस । फेर वोती ल वोला ओझी नई मिलिस , तब  फेर बने जोरलगहा आवाज दिस । फेर तभो ले भीतर कोती चिट -पोट कुछु नई सुनाईस , तब गौटिन आंखी के इशारा म गोबरहेरिन ल जाके देखे बर कहिस अउ गोदनहारिन ल आंखी के ही इशारा म आगु के चौकी म  बइठे बर कहिस ।


         गोबरहेरिन घर भीतर कोती ल देखत आइस अउ बोइसनहेच इशारा म बताइस कि सोनकमल हर बइठेच -बइठे सुत भुलाय हे ! 

"इया ! वो कइसन वो ! " गोदनहारिन के मुख ले निकल गय । एला सुनके बड़खा दई बिरीज गौटिन मुचमुचा उठिस । वो कहिस - भई गे ! ये लइका हर फेर आज रात भर पढ़े हे अउ ये दे दिनमान बइठे -बइठे सुतत हे ।

"तभे तो वोकर हाथ म किताब हर धराय हे खुल्ला के खुल्ला !" गोबरहेरिन कहिस आँखी ल बटरत ।

"रा बइठे रह नोनी ! मंय थोरकुन आवत हंव ।"गौटिन गोदनहारिन ल कहिस अउ सोनकमल के कुरिया कोती चल दिस । एकघरी म फिरिस तब वोकर संग म सोनकमल रहिस जम्भावत ।फेर वोला देखके सँवरेली गोदनहारिन देखते रह गय। वोला अइसन अबक्क देखत देख के बिरीज गौटिन हाँस भरिस !

"कइसे का देखत हस, नोनी ?"गौटिन वो गोदनहारिन ल कहिस ।

"मंय ये देखत हंव बई कि एमे मोर बुता हर  बने उबकही कहके ! अइसन उज्जर बरन बहुत कम देखे बर मिलथे घलव  न बई ! " वो गोदनहारिन सच ल सच बता दिस ।

"का तोर बुता ये ?"सोनकमल ये अनचिन्हार नारी ल देखके थोरकुन अचंभा म घलव पर गय ।

"कइसे बई ?" सोनकमल अब अपन बड़खा दई कोती प्रश्न करत दृष्टि ले पूछिस ।

"येहर गोदनहारिन ये बेटी । येहर नारी -परानी मन के देंहे म गोदना गोदथे । अउ मंय एला बलवाय हांवों ।"

"फेर काबर ? "

"तोला गोदना गोदवाय बर !अउ काबर !"

"तभे येहर ये मोर बहां ल बनेच देखत कहत रहिस हे कि एमे वोकर बुता हर बने उबकही !" 

"हाँ...! नोनी तोर उज्जर बरन म करिया गोदना बग्ग ले उबकही ओ ! अउ  तोला सबले बढ़िया सजा देहुँ मंय ।" वो गोदनहारिन कहिस । सोनकमल वोला देखके थोरकुन आँखी गुरेरिस ,तहाँ ले फिर हाँस भरिस । फेर अतका म वो गोदनहारिन हर सकपकावत बड़खा दई बिरीज गौटिन कोती ल देखे लग गय रहिस ।

"गोदना गोदवा ले बेटी ! येहर नारी जनम के चिन्हारी ये । अउ येहर आज नहीं त काल लागबेच करही । गोदना गोदई, कान-नाक छेदई हर नारी मन ल लागबेच करथे ।" बिरीज गौटिन मनाय-बुझाय के सुर म कहिस ।

"फेर बई मंय, तंय जइसन कहत हस तइसन नारी नई बनव !" सोनकमल मने मन म कहिस, तब फिर परगट कहिस

"तहुँ न ओ बई ! एक न एक झन ल समहरातेच -पखरातेच रइबे तब तोर मन हर माढ़ही । मंय ये गोदना नई गोदवांय ।"

"गोदवा ले बेटी । जिद नई करें ओ ! काल के दिन ,जब इहाँ ले नावा जगहा चल देबे तब वो जगहा के पीतर मन बिन गोदना के बहाँ वाली नारी के हाथ ले पूजा -आंचा नई पायँ ।" बड़खा बई मनाय -बुझाय बर लग गय । 

"बई , अभी मंय हर पढ़े जावत हंव स्कूल -कालेज मन म , तब ये सब मन ल लेके पढ़े जाहाँ !"सोनकमल कहिस , तब तो बिरीज गौटिन चुप पर गय । 

"फेर तँय येती मोर हक्क ल मार देय ओ नोनी ।"गोदनहारिन कहिस ।

"वो कइसन ओ !" सोनकमल समझत तभो ले फेर हाँसत कहिस ।

"रंग रंग के जिनिस बनाय रइथें तोर बहाँ अउ  पिर्री मन म तब बड़खा दई हर खुश होके मोला भूती -बनी के संग म इनाम नई देय रहथिस ओ गौटिन नोनी ! "वो कहिस ।

"हाँ, वो बात तो हे ! तब मंय का करंव तोर बर ! "सोनकमल कहिस अउ चुप हो गय जइसन वो कुछु जिनिस के खोझार करत हे , " ले अइसे कर , तँय मोर नांव के पहिली लेटर ल लिख दे-एस !"

" मंय तो पढ़े -गुने नई अंव नोनी ।" 

"चल मंय कलम म खुद लिख देत हंव  तब तँय फेर ओमे रेंगा लेबे ।"

"हां ,बन जाही !" वो गोदनहारिन खुश होवत कहिस अउ अपन रंग -सूजी ठीक करे लागिस ।

"बग्ग ल करिस हे ओ बई !" सोनकमल के मुख ले निकल गय अउ आँखी मन तउर उठिन ।

"ले बई तोर मन आइस !"सोनकमल बोइसनहेच रोवत- हाँसत कहिस ।

"हे ये दे कम से कम हाथ के डेरी अंगठा ऊपर म एकठन बिच्छी बइठार दे नोनी ! " गौटिन, नतनिन ल पोटार के वोकर डेरी हाथ ल गोदनहारिन के आगु म बढ़ात कहिस ।


           सोनकमल बड़खा दई के ये हुकुम ल मना नई करे पइस अउ वोकर डेरी हाथ के अंगठा के ऊपर म अपन पूछी उठाय डंक मारे बर तियार बिच्छी बठइ गय ,जनम भर बर ।

"गोदना ले नज़र -बात नई लगे , बेटी !" बड़खा दई हर कहिस,तब सोनकमल वोला कुछु नि कहिस । गोदनहारिन हर तो दुनों झन ल देख के मुच मुच हाँसत रहिस ।

" गोदना हर नारी के सवांगा ये बेटी । येकर ले शरीर हर सातों- सपूरन हो जाथे ,चाहे गहना -गुरिया रहे कि नहीं तभो ले ।बेटी बिदा होय के समे म सब हर सुरता आथे महतारी ल ..."

"भईगे न बई ! तँय धर बांध के गोदना गोदवाइच तो देय मोर देंहे म । अब तोला बने लागीस होही, हां ना?  अउ जउन तँय बिदा उवा के गोठ गोठियात रथस न ,तउन ल रहन दे ; मंय कथू आन नई जाने वाला अंव , हां।" सोनकमल बड़खा दई करा थोरकुन बनावटी रिस म कहिस वोकर गोठ ल काटतेच बीच म ।

"येला तो समय हर ही बताही ओ गौटिन नोनी। कोन हर रथे अउ कोन हर जाथे ,तउन ल। मोर तो एईच बुता आय घरो घर किंजरना। सब घर के नोनी मन अइसनहेच कहथें पहिली -पहिली ;तहाँ ल सुटुर-सुटुर रेंग देथें पागा वाले के पीछू म...!" गोदनहारिन हर अइसन कहिस अउ अपन पोठ बनी -भूती ल धर के परा गय । फेर येती वोकर गोठ हर सोनकमल ल विधुन कर देय रहिस ...येला तो समय हर ही बताही ओ गौटिन नोनी। कोन हर रथे अउ कोन हर जाथे ,तउन ल। मोर तो एईच बुता आय घरो घर किंजरना। सब घर के नोनी मन अइसनहेच कहथें पहिली -पहिली ;तहाँ ल सुटुर-सुटुर रेंग देथें पागा वाले के पीछू म...तहाँ ल सुटुर-सुटुर रेंग देथें पागा वाले के पीछू म...! ये का होगय वोला !! वोकर जी म कइसन डर पेल दिस हे ।


        सोनकमल अपन खोली म आ गय । काल पेपर हे । बनेच रात ल जाग के पढ़े हंव । पूरा तैयारी हो गय हे कहु लागत रहिस हे अतका बेर ल । फेर ये गोदनहारिन के गोठ ल सुने के बाद सिरतो म जी म डर समा गय हे अउ जतका पढ़े रहिस हे, तउन सब ल भुला गंय हंव अइसन लागत हे । जी हर भकर ...भकर करत हे ! 

"सोनकमल काय करत हस ,बेबी !" सोनकमल के कान म सदाकाल के चिन्हे अवाज आ परिस। येहर तो संगवारी वृंदा के अवाज आय!

"आ वृंदावन !आ बहिनी ! आ बने लागिस हे, तोर आय ले !"सोनकमल चहक उठिस वोला देखके।

"कइसे बने पढ़ डारे सबो चैप्टर ल? मंय तो एक पइत लहुटाय भर सके हंव !"वृंदा कहिस।

"समझ ले तोरे असन महुँ देखे हंव..."

"नहीं बहिनी तोर हर पोठ रथे ओ!"

"तब तोर हर कोन सा मार बदरा रइथे?"

"तभो ले ओ! वो मेंडल के नियम ल एक पइत फेर बता देय रथे बहिनी ,तब तोर बड़ दया होय रथिस..."

"वोकरे बर तँय आय हस?"

"हां, नही त अउ का ! परीक्षा सीजन म खुल्ला थोरहे किंजरे सकबे बिन काम-काज के ।"

"तब बइठ, मंय वो चार्ट ल लानत हंव । सोनकमल अइसन कहत उठिस। अतेक बेर ल लुकाय हाथ कर ऊपर वृंदा के नजर पड़ गय ! ये बिच्छी !! 

"कहाँ ...?"सोनकमल ठिठक के ठाढ़ हो गय ।

"वोदे तोर हाथ म!"वृंदा कहिस अउ वोकर हाथ ल धर लिस।

"ये कब? आजे बनवाय हस?"वोहर हाथ ल धरे -धरे पूछिस ।

" हां...!आज नहीं अभी। यह दे बइठे हे सियान माता राम।, तउन हर बनवाइस येला !" सोनकमल कहिस।

"बने ये ओ दई तोर घर के मन! आगु ले आगु तोर बर सबो जिनिस ल कर देथें। एकठन हमर घर के मन हें कभु कुछु ल नि जानिंन! महुँ रहे रथें , तब महुँ बनवाय रथें गोदना मन ल...!" वृंदा कहिस ।


येहर जाही कनहुँ पागा वाला के पीछू म सुटुर- सुटुर रेंगत ...सोनकमल  मने मन हाँसत कहिस!


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        अध्याय -11

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"सोनकमल, आना बेटी, तीर म !" महतारी जलकुंवर वोला आवाज देत रहिस ।

"का ये माँ?" सोनकमल थोरकुन धुरिहा ले कहिस,वोहर अंगनईया म बइठे -बइठे पेपर पढ़त रहिस।

"ये दे तीर म आना बेटी, तब तो मंय तोला बताहाँ।"महतारी फेर कहिस।

"ले काये तउन ल बता।" सोनकमल पेपर पढ़ई ल छोड़ दिस अउ वोकर तीर म आ गय।


"तँय घलव ये खेती -पाती के बुता ल



 चिभिक लेके सीख ! कोन जानी आगु का होने वाला हे , बेटी।"

"दई, तँय फिकर झन कर ! तोर  बेटी ल खेती करेच बर पर जाही, तब वोहर मॉडर्न फार्मिंग करही; तोरे कस ये अलवा-जलवा, भाजी-पाला वाला खेती नई करे।"सोनकमल, महतारी के आगु म थोरकुन अईंठत  कहिस ।

"वाह बेटी, पेट भरिस; तभो ले ये जुन्ना -जुन्ना गोठ मन ल ,सीख राखे रबे,तब अविरथा नई होय ।"महतारी जलकुँवर वोला निच्चट नजर गड़ा के देखे लागिस...ये लईका के कभु -कभु के गोठ हर, समझ ले बाहिर हो जाथे ।

"ले न काय अगरिहा सीखोबे, तउन ल बता? नही त तोर सँग बरोबरी म ख़ार -वन महुँच जात हंव, भले ही वोहर कलेवा अमराय के नांव म जाथों, फेर जाथों !"सोनकमल, अब ले भी सेवर नई होय रहिस।

"..."

"लेना गौटिन,तीर म बलाय हस , तब कुछु बता।"

"येला तँय चिन्हे हस?"

"हाँ, हिरवाँ ये येहर ।"

"येकर बुता?"

"पुरी रोटी बना... भरवां वाला अउ गप गप !अउ का ?"

"येकर अउ दूजा नांव?"

"नई जानत अंव ,मंय।"

"येला कुलथी घलव कहिथें।"

"अच्छा जी , मस्टरिन !"

"अउ येहर पुरी रोटी बनाके खाय के काम तो आबे करथे, संग म मनखे मन ल पथर्री बीमारी हो जाथे, तब येला चुरो के काढ़ा बना के घलव पियाथें।जादा पानी पेशाब हर आथे, अउ पथरी हर गल गला के बोहा जाथे।"

"दई...!"

"हां महतारी।"

"तँय तो बनेच जानथस जी।"

"हां...!"

"फेर ये सब तँय कहाँ ले सीखे?"

"स्कूल ले ।"

"ये कोन स्कूल म तँय, पढ़े बर चल देय ओ महतारी !"

"बेटी, तोर स्कूल -कॉलेज जइसन शहर- नँगर म लगथे, ठीक वइसन स्कूल खेत -ख़ार म घलव जुरथे।बनिहार -बनिहारिन भूती -भूतीहार सब ठुलांथे, तब दस मनखे के दस रकम के गोठ बगरथे। अउ उहें ले ये ज्ञान के  मोती मन सँकलाथें ।"

"ओ हो हो ...! तब ये बईद -गुनिया के गोठ ल तँय ,उहें सीखे हस।"सोनकमल कहिस अउ खुद वो हिरवाँ के नार ले फर मन ल टोरे लागिस,महतारी के सँग म बइठ के ।

"हां बेटी !कतेक न कतेक रकम के गोठ !"

"दई,मोर शहर के हर महाविद्यालय आय,तब तो ख़ार-वन के हर विश्वविद्यालय -यूनिवर्सिटी आय । एकदम ओपन यूनिवर्सिटी !अउ तँय उहाँ के स्कॉलर अस। तोला तो स्कॉलरशिप मिले के काम आय।" सोनकमल, महतारी करा अच्छा जोर- जबरन करत रहे ,कुलथी के फर मन ल सँकेले लागत।

 "स्कॉलरशिप ल छोड़ बेटी! मनखे कतेक मुश्किल म अपन जीवन ल चलात हें,तउन ल जानना अब्बड़ जरूरी है। कतेक दुख अउ करलई हर हमर तीर म किंजरत र्थे।"जलकुँवर ,थोरकुन उनमुनहा हो गय । महतारी के अचानक अइसन रूप बदलई ल देख के सोनकमल खुद अचंभा म रह गय ।

"कइसे का हो गय!"सोनकमल महतारी के अउ नजदीक आ गय ।

"बेटी...!"जलकुँवर अतकी भर कहे सकिस।

"हाँ, का होइस?"

"मनखे के हित बर ज्ञानी गुनी मन ऊंचा ऊंचा दवई- माटी बनाईंन..."

"हाँ...!"

"फेर वो दवा हर , कमजोर मनखे के पहुँच म नई ये।अतेक नावा नावा मशीन एक्सरा- सोनोग्राफी बनिन हें, फेर वोहर सब बर नई ये।"

"तोला का हो गय वो,ये बेला -कुबेला कइसन तँय दुख मनात हस।" सोनकमल अब तो पूरा अबक्क हो गय रहिस।

"वो सखाराम मन हें न ,जउन मन रोजीना हमर बुता जाथें। वोकरो खुद के चार टेपरी खेत हे..."

"हाँ, त का हो गय सखाराम बबा ल?"

"पथरी...!"

"ये तभे तँय कुलथी के सुरता करत वोला सुमर डारे।"

"हाँ,बेटी। एक टेपरी खेत ल गहना धर के शहर गिस। अउ पइसा के रहत ल सब बारा नाच नाचिस।ये डॉक्टर वो डॉक्टर सोनोग्राफी अउ का का , फेर ऑपरेशन बर अउ रुपिया के जरूरत..."

"कतका?"

"सब टेपरी मन ल गहना धरे ले नई  बनतिस ओतका। खेत ल बेंचे बर लाग जाय रथिस ।"

"ये तो बड़ करलई के गोठ आय महतारी !"अब के बार सोनकमल खुद अवसाद म आ गय रहिस।

"तब फिर...?"सोनकमल फिर पुछिस।

"सखाराम हर गांव फिर आइस, अउ कनहुँ दाता के बताय ये कुलथी के काढ़ा दस दिन पीस, अउ आज ये भला -चंगा फेर बुता म आवत हे । सार गोठ अतकिच आय ।

"..."सोनकमल कुछु नई कहिस, फेर वोला देखे ल लागत रहिस कि वोहर बहुत धुर आगु चल देय हावे।


***


रमौतीन अउ बिरीज बई , दुनों के दुनों गौटिन बने मंजा के बइठे गोठ बात चलावत रहिन । तभे खोल गली म करसी... चुकिया ले ल ओ किसानिन गौटिन मन कहत एक झन पाँड़े हर नाहक़त रहिस।

"ए पाँड़े ,सुन सुन येती आ ।"रमौतीन वोला हाँक पारिस । 


             अउ पाँड़े ल तो घलव एईच जिनिस के खोझार रहिस। वो तो तुरतेच गय ।

"जोहार ओ दुनों सियान मन ल !"

"खुश रह , दाउ !"बिरीज गौटिन अशीष दिस।

"देखा तो एकठन बने पोठ करसी। येकर नतनिन पानी लानही। बने भरखन फूटत हावे।"रमौतीन कहिस।

"ले गौटिन जावत हंव मंय, काबर ठठा- मसखरी करत हावा , तुमन मोर करा?"पाँड़े कहिस।

"एमे काबर ठठा -मसखरी गा।तँय देखा न भई।"रमौतीन फेर कहिस।

"तोर घर -दुआर म तो बोर कुंआ पंप सब लगे हे, पानी च लाने बर पनघट जाय बर नई लागे।"पाँड़े हर अबले घलव वो जगहा म तय नई कर पाय रहिस कि ये सियानिन जउन कहत हे, वोहर सच आय के ठठा- मसखरी?

"चहा बन गे रे नोनी?"रमौतीन भीतर कोती ल देखत अवाज दिस ।

"बन गय बई ।"सोनकमल भीतर कोती ले आवाज दिस।

"तब लानत काबर नई अस?अउ सुन एक कप अउ लेके आबे।"रमौतीन ,झरझरात कहिस।

"हाँ, बई।"सोनकमल भीतरे ले कहिस, अउ दु कप अउ एक गिलास चाय लेके अइस। 

"एक कप ये पाँड़े ल दे।"रमौतीन गौटिन नतनिन सोनकमल ल कहिस।

"ले दाउ चाय पी ले। अउ येकरे लइक करसी बता।" वो पाँड़े ल कहिस।

"पहिली वोला चहा ल पीयन दे, फेर मोल- मोलई करबे, ओ रेंदही बई!"सोनकमल कहिस वोला।

"देख छोटकी, तोर नतनिन के चाल ल। वो मोला रेंदही कहत हे।"रमौतीन, विरीज बई ल सुनात कहिस।

"वो का कही ओ बई, तोर आगु म तो येला लकवा मार देथे।"सोनकमल खुद कहिस।

"देखे, तोर गोठ ल !वोहर छोटकी बड़की के लिहाज करथे, जउन ल इहाँ पांव धरे हे, तउन दिन ले । एक तुमन हावा ओ नोनी मन नावा उम्मर के लइका ,जउन मन बर हमन कुछुच नई  होवन।"रमौतीन अब ले भी खर गोठियात रहिस।

"ले गौटिन दई, तोर गोठ हर पोठ हावे, अउ मंय चहा घलव पी डारें !"पाँड़े कहिस, तहाँ ले सोनकमल कोती देखत कहिस"गौटिन नोनी,थोरकुन गिलास म पानी लान दे न। यह दे ये मोर कप ल थोरकुन खल्ला दिहुँ मंय।"

"ये नहीं ,चाचा!ये तोर भतीजी ये बुता ल करिही।"सोनकमल कहिस अउ सबो जूठा कप -गिलास मन ल जोर के, वो जगहा ले बर्तन- धोआ जगहा म ले चलिस।


         येती पाँड़े वोपरा अतेक बेर ले घलव, ये तय नई कर पाय रहिस कि ये सियानीन के कहई हर सच आय के हांसी -ठठा ये । वोहर अब ले घलव दुनों सियानिन मन के मुँहू ल बार -बार देखतेच रहिस।

"कइसे मुँहू ल का देखत हस। निकाल ये दहपट के लइक बने करसी। "रमौतीन ठनकत आवाज म कहिस।

"तहुँ ओ दीदी, पीछू च पड़ गय हस , लइका के।"अतेक बेर ले चुप्प परे विरीज गौटिन लटपट मुँहू उघारिस।

"अरे तँय का जानबे !येकर ले घेंच हर सीझथे। तँय नई देबे , दाम तब मंय दे दिहां, फेर ये तोर फुरफुन्दी ल गगरी बोहे देखहाँ, तब अब्बड़ सुख पाँहा।"रमौतीन कहिस,तब पाँड़े ल कहिस, "निकाल न जी तँय !"

"बई ,मोर बर गगरी लेवत हस। तँय तुँहर घर के शिखा दीदी बर ले डारे हस का ओ?" सोनकमल,फेर ओमन के तीर म आके पुछिस।

"नहीं तो...!"रमौतीन अतकिच भर कहे सकिस।




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               अध्याय 12

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                   आज महतारी घर म हे, तब सोनकमल ल मौज हे । न वोकर बर न बनिहार मन बर कलेवा -जलपान लेके खार-वन जाय के चक्कर, न येती कोला -बारी ले भांटा-पताल सिलात कच्चा-पक्का रसोई उतारे के फिकर । रसोई कच्चा -पक्का काबर ! वोकर बनाय रसोई पक्का च रहिथे, तभे बबा  हर हाँसत चिटिक अउ लान तो बेटी कहत वोकर साग -पान ल परोसना लेवत अगोरथे। हां , संग म बइठे बाबू ल घलव थोरकुन अउ साग ल बढोबे, तब वोहर कभु नहीं कहके नई कहिस , जइसन  अपन ददा के कहे म वोकरो गोठ हर घलव छुपे रथे । फेर ये महतारी हर कभु -कभु नाक संकेलथे...

कभु रमकेलिया म जादा अम्मट  ना देय त कभु भांटा हर खुखुवा गय, जरइन लागत हे, येदे आज के दार हर पच्च करत हे। बिन अचार के तो बई अउ महतारी के कौंराच नई अलगे। चाहे तँय येती कतको छक -बक दार...कतको बिजौरी ,तिल -बरी छान के दे, फेर येमन ल कइसनों म भी अचार चाही । अउ ये महतारी के हाथ म तो जादू हे, बई के तो जी  हर येकर हाथ ले उबके बघार बर लुलुवात रइथे । जउन दिन सोझे मही चाहे दही ल फोरन -मिर्चा म बघार दिही , तब बई ल पीढ़ा मढ़ाय बर नई लागे अउ   वो चहा पियी बड़की रमौतीन गौटिन आ जाही, तब वोला एक कटोरी अउ चम्मच भर के देय बर नई भुलाय । इड़हर बना देय हे कहबे तब चोरा -लुका के रमौतीन गौटिन बई बर कटोरी अमराही माने अमराही । अइसन हे ये महतारी के हाथ अउ आज घलव ये अपन हाथ के कमाल बताय म लगे हावे ...

" जलकुँवर, यू आर द ग्रेट !"सोनकमल,अपन महतारी ल सुनावत जोर से कहिस।


           येला सुनके रसोई कुरिया ल महतारी जलकुँवर निकल आइस-का का कहत हस टूरी बाँड़ी  अउ नांव घलव धरत हावस !"

"तोला ग्रेट तो कहत हंव , महतारी ।"सोनकमल बिजरावत कहिस।

" ये छोकरी ल तो मंय, येकर संग -जँहुरिया असन लागथों !" जलकुँवर अपन पसीना ल पोंछत कहिस।

"वो तो लागबेच करथस जलकुँवर !"

"मारतेच लहाँ छोकरिया,फटाफट नांव धरत हस।" जलकुँवर बनावटी रिस म हाँसत कहिस।

"तब का हो गे जलकुँवर...!"सोनकमल अपन महतारी ल फेर कहिस,अउ वोकर तीर म जाके टप्प ले वोला उठा लिस ।

"उतार...उतार तरी उतार ! बनेच बलखरही होगय हे येहर कि मंय कमजोर हो गय हंव । देख तो दई ! सइघो मइनसे ल  कइसे लइका कस टप्प ल अलगा लेत हे।"

"कमजोर होय तोर दुश्मन !"सोनकमल वोला वइसनहेच गोदी म लेके किंजरत कहिस।

"ये तरी उतार !"जलकुँवर थोरकुन लजावत कहिस।

"पवाय रह न।लइकई म महुँ ल तो पाय रहे होबे ,वोकर बलदा ये येहर।"सोनकमल वोला उतारबे नई करत रहिस।

"उतार बेटी, वोती बतर विगड़ जाही, रसोई कोती के ।"जलकुँवर सरकत उतरिस अउ रसोई खोली म चल दिस गुनत कइसन ये लइका के रंग -रूप के संग बल हर घलव भरात जात हे, येकर देंहे म । जलकुँवर अपन देंहे ल देखिस । का देखत हस जलकुँवर तोरेच तो छईंहा ये येहर। तोर समे म तँय खुद नई रहे का असन ! तब ले बल ल ये लइका हर वोकर बाप के पाय हे। अइसन गुनत जलकुँवर खुदे थोरकुन लजा गय।

"अइसन सुछिन्धा कॉलेज जाय के अउ मजा हे ,आना महतारी ।"सोनकमल अब ले भी हिलोरा लेवत रहिस।

"कइसे रे लइका ,आज बनेच महतारी महतारी लगाय हावस ।का हो गय तोला ?"जलकुँवर रसोई भीतरी ल कहिस,"रुक यह दे चुर -पाक गय, खाना खाके जा ;खाली पेट झन जा।"

"कोने जाथे,तीन तेल के इहें जेवन बनत हे, अउ मंय बिन खाय जाँहा ! कभु नहीं ।तँय राँध -गढ़ तो भई , तब मंय खुदे निकाल लिहां ,अपन बर थारी ।" सोनकमल अब ले भी वइसनहेच चहकत रहिस।

"तब हो गय हे तियार । चल बइठ, मंय निकाल के लान देत हंव ।" महतारी कहिस।

"तोर मन...!"सोनकमल कहिस अउ जेवन करे के आसनी ल लान के बइठ गय।

            

             जइसन भी बने रहिस , जेवन सोनकमल पेट भरत ल खाइस । महतारी तो, कभु -कभु वोकर आहार ल देख के भक्क घलव खा जाथे। बाबू लइका मन कस हे, येकर आहार हर ;येकर बाप असन । येकर ददा पोठ खाथे तब तो दिन भर ट्रेक्टर के हद हद हद हद ल झेलथे, फेर ये लइका; दुनों बाप- बेटी के थारी तारा -सिरा ही तो रथे ।


               सोनकमल रसोई खोली ल निकल आइस,महतारी के अँचरा म हाथ पोंछत ।

"देख...देख तोर चलन ल । वो दे कै न कै ठन  गुंर्री -टॉवेल माढ़े हावे, तब ल भी तँय ये मोर अँचराच ल सानथस ।"महतारी थोरकुन रिसहा कहिस ।

"वोमन म हाथ बने परछर साफ नई होय न ।" सोनकमल वोइच दे, तुरत -ताही महतारी के गोठ ल लहुटादिस ।

"अरे...रे...रे !" सोनकमल कहिस।

"का हो गय अब ?"महतारी जलकुँवर कहिस।

"वो सार-मार ल तो भुंलागय हंव , खाय बर !"सोनकमल वइसनहेच हाँसत कहिस।

"वो काये वो ,दई !"

"दही ...!"

"हाँ...!!"

"लंबा राग झन अलाप अउ लान के दे !" सोनकमल वोला बनावटी रिस म गुर्रत कहिस ।

              जलकुँवर भीतरी खोली कोती गिस अउ जब फिरिस तब वोकर हाथ म स्टील के बड़े कटोरी -चम्मच म दही अउ शक्कर रहिस ।

"सब ला भुला जाबे त भुला जाबे फेर ये जिनिस ल झन भुलाबे। दूध -दही हर ही खाय -पीए म सार -मार आय, बाकी सब वइसनहे यें ।"जलकुँवर कहिस, सोनकमल ल समझात ।

"मंय जानत हंव न महतारी, तोर चिक्कन परेवा बने के राज ल,फेर तँय अब ले घलव नई पसरे अस; तोर संग के आन मन ,आन मन काबर शिखा दीदी के दई नन्दिनी बड़े- दई ल देख न , कइसन पेट म तीन ठन लोर दिखथे अब !"सोनकमल कहिस।

"तोर नन्दिनी बड़े दई  माने बड़े गौटिया के बहु...माने काल के बड़खा गौटिन ! वोला तो धूप-पानी तक मन नई देखे  सँकय , खार -खेत तो धुरिहा हे । अउ येती तोर महतारी जलकुँवर तो खारे -वन म गड़े रहत हे न !" जलकुँवर कहिस।

"वोकरे बर तो तँय सातो-सपूरन हावस । अभी तोला सलवार कुर्ती पहना के कॉलेज ले जाहुँ मोर नावा सहेली ये कहके, तब सब पतिया जांही ।" सोनकमल हाँसत कहिस ।

"बस...बस, तइंच हर जा दई ! हमन पढ़ डारेन एक जनम बर ।" जलकुँवर हाँस भरे रहिस।

"नहीं...नहीं , तँय सलवार म सुंदर नई दिखस, अइसनहेच साड़ी म तँय खुले हावस, माँ ।" सोनकमल एक पइत फेर जलकुँवर के चिक्कन-चांदो गाल मन ल समारत कहिस।

"ले अब सोझ -सोझ पढ़े बर जा !बनेच भेवा कर डारे अतेक बेर म तँय ।" महतारी वोकर बर चटकन उबात कहिस।

"ले न एक घ मार न , माँ !"सोनकमल फिर कहिस।

"चल वोती लइकई म सियानीन के नज़र बचा के तोला थोर -मोर नई कूटे- थुरें  रथें,तब तँय अतको घलव नई पढ़ पाथे , बेटी !"जलकुँवर कहिस ।

" ये का डोकरी -भाखा म बेटी कहत हस ,माँ  !"सोनकमल तो आज भिड़तेच रहिस महतारी करा ।

"तँय माँ कहत हस तब मंय बेटी कहत हंव।" महतारी जलकुँवर कहिस।

" मोला बेटी कहे बर अभी बई हे, तँय अइसन बुढ़ापा वाला बेटी झन कहिबे। तँय नांव धरबे, बेटी बई हर कहही ।"सोनकमल हाँसत कहिस।

"का हो गय ,बेटी...! काबर महतारी करा बझत हस ।"कहत बई बिरीज गौटिन आइस। अब वो थोरकुन संकेलाय दिखथे।

"ये आ गय, बई !"सोनकमल वोकर तीर म जाके वोला धर लिस अउ परछी म माढ़े तखत म बइठार दिस।

"ये अभी ल आज पढ़े बर नई गय अस बेटी !" बलराम गौटिया अपन नतनिन ल किताब -कॉपी धरके निकलत देखिस,तब कहिस। वो अउ उंकर पूत सोनकमल के ददा आत्माराम अभी- अभी अपन फटफटी म शहर ल आत रहिन। नावा रकम के धान- बीज के खोझार म वोमन कृषि सेवा केंद्र  मन म देखा -ताका करत रहिन ।


        दुहा गाय मन बर पशु आहार के बोरी ल फटफटी ले छोरत बाप आत्माराम सोनकमल ल कहिस-नोनी, वोकरा वृंदा हर अपन कापी -किताब साईकल समेत खड़े हावे। वोहर तोर डहर देखत हे कहु लागत हे।

"कका, डहर देखत हे कहु लागत हे, नही! देखतेच -देखत असकटा गंय न, तब येला लेहे बर यह दे इहाँ घर तक ल आ गंय न ।"वृंदा घलव इहाँ आ गय रहिस।

" ले बई , बने रबे , हमन जाथन पढ़े बर !"सोनकमल तो अब अपन दादी करा भिड़ गय रहिस।

"जावा बेटी, फेर गाड़ी -मोटर ल देख -ताक के पार करिहा चौक-चौराहा ल ।" बिरीज गौटिन घलव वइसनहेच अशीष देत कहिस।

   

           सोनकमल अउ वृंदा जाय बर निकलतेच रहिन कि गर्रा -धुंका...बडोरा चक्रवात कस रमौतीन बड़की गौटिन आइस ।

"कहाँ जात हस रे नोनी ? रुक अभी !"वो सोनकमल ल छेंकत कहिस।

"पढ़े जात हंव बई, वो दे चहा माँ बना के दिही न..."सोनकमल वोहु ल एक चोंच मार दिस।

"भइगे बस !बहुत पढ़ डारे । अब कढ़े बर सीख ! तोला देखे बर सगा -पहुना आत हें !" रमौतीन गौटिन लगभग वोला धमकावत कहिस।


          येला सुनके सोनकमल के मुँहू फरा गय । फेर वृंदा के आँखी म चमक आ गय रहिस ।


*         *         *          *           *


"महतारी ,ये बच्छर तो हमन अइसन कुछु सोंचे नइ अन बर-बिहाव के बारे म ।" बलराम गौटिया अपन कुटुंबदारी के बड़की भौजी रमौतीन गौटिन के आगु म हाथ जोरत कहिस ।

"नई सोचे रइबे तउन ल सोचे बर लागथे, दुलरू! पोठ सगा ये । मोर छोटे बहिनी के नाती आय । सोनवानी गोत ये। पचास एकड़ भुइयां अउ अगलउता लइका । अउ का लेबे । देखे जाबे तब , जानबे बावनगढ़ी के गौटिया के रहन -बसन ल..."

"बई, तब तो शिखा दीदी ल बिहा दे न उहाँ ।"सोनकमल चट ल कहिस ।

"देख तो परछर गोठ ! वोला तो वोहर लइकई ल देखत आवत हे । वोला वोहर नई मनवाय । तोर ये छलकत..."

"भइगे, अब चुप परा, बड़ी सास ! " जलकुँवर ये बिन मौसम बरसात अउ रमौतीन के अलंगत-फलंगत गज भर लंबा जबान ले थोरकुन विपतिया गय रहिस। शरम घलव नई आय येला ! सब  भरे हावन अउ ये...तोर छलकत...कथे ।

"अरे काल पछतइहा !पहिली कान लगा के सुनव ! अपन इलाका के बहुत बड़े नामी आदमी ये वोमन ।" रमौतीन कहिस।

"बड़े दई, तोर छोटे बहिनी घर ! वोमन ल तो पूरा इलाका जानथे । फेर ये बच्छर लइका हर दूसरा साल म हे कालेज के ,अउ हमन अभी अइसन कुछु गुने नई अन ।" आत्माराम ,सोनकमल के बाप कहिस।

"माफी देबे बई, तोर सब गोठ ल आज तक मानतेच रहे हंव ,फेर आज के गोठ ल नई मानत अंव न !"सोनकमल रमौतीन गौटिन ल कहिस, अउ वृंदा ल कहिस -चल वृंदा !

"रा न ओ ! तोर घर के ये गोठ -बात हर बने लागत रहिस ।" वृंदा कहिस ।

"अब तोला बेर नि होत ये ?" सोनकमल वोला थोरकुन खरा कहिस।


             वो दुनों झन बाहिर निकल आईन अपन- अपन सायकिल ल धर के।

"बने ये ओ दई ! तुँहर घर सगा -पहुना आय के शुरू हो गिस...!" वृंदा सोनकमल ल कहिस। 


*रामनाथ साहू*


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              अध्याय 13

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" बिरीज, कहाँ गय ।" रमौतीन गौटिन बड़ सेवर अवाज म हांक पारत फिर अइस।

"हाँ, दीदी !आना भीतर कोती ।"बिरीज गौटिन बाहिर निकल के कहिस। 

"काय करत हावस ।" रमौतीन पूछिस।

"दीदी, तँय तो बने हावस,अउ मंय तो सफ्फा ढलँग गय न । ये कनिहा हर अब , बनेच बेर ल बइठन नई देय ,ये पाय के बिस्तर म  ढलँगे रहें ।"बिरीज गौटिन वोकर मुँहू ल बनेच देखत कहिस , अभी कइसन सेवर दिखत हे येहर ।

"नोनी,वो पहुना मन के गोठ गोठियात रहें न, वोमन आ गिंन हे ओ।अउ येती तो तोर लइका हर बात ल मानिस नहीं ।

अब कइसन करों, मोरो पन के सवाल हे। तँय ये बच्छर वर -विहाव कर के झन कर ,फेर वो लइका मन ल तोर देहरी ल खूँदन दे । बाकी बात ल मंय बना लिंहा ।" रमौतीन गौटिन एके सांस म अतका कहिस ।

" ये दीदी, तोर बहिनी के नाती माने तोर नाती, अउ तोर नाती माने मोर नाती ! वोला आन दे,येहू हर वोकर बूढ़ी दई  घर ये । इहाँ के भी चहा-पानी पीयन दे।" बिरीज गौटिन सदाकाल के अपन भाव-व्यवहार म ओझी दिस , तहाँ ले बहु जलकुँवर के खोली कोती अवाज देत कहिस-बेटी,निकल तो ! यह दे तोर बड़ी- सास आय हे।


             जलकुँवर बाहिर अइस अउ पूरा गोठ ल जानके,घर -अंगना ल समोखे लागिस।फेर मने - मन म हान-लाभ ल जरूर विचारत रहिस...लइका कहथे मंय वर -विहाव नई करंव । लइका के बुद्धि  अभी कतेक गहिल ! लईकई -बुद्धि म अभी किताब के दुनिया म तउरत हे । जिनगानी हर अइसन नई कट जाय । अउ काबर नई करिही वोहर वर -विहाव? अतेक सुंदर सिरतोन म सोन के कमल फुलत हे, तउन हर कनहुँ घर के शोभा बनही, तब तो महतारी -बाप के जी हर जुड़ाही । अतेक अनमोल जिनिस हे,  कनहुँ खाता- पीता बने आचरण सुभाव वाला जहूँरिया ल येकर हाथ सौंपा जाही , भरभर हाथ लोई -बंधन करके कइना-दान करबो, तब हमरो जीवन हर सुफल कहाही । बराबरी के खोजबे तब मिलही के नई मिलही, तेकर ठीक -ठिकाना थोरहे हे ! उन्नीस -बीस सब चलथे। वो तो हाना हे न...लात घर के बेटी भात घर अउ भात घर के बेटी लात घर ! अरे , छि: ! छि: !  महुँ घलव का का सोच डारथंव, मोर लइका जाही -हमर  ले उँच सगा -पहुना बर । चल तो देख ली, आते साथ थोरहे देवा जाही लइका हर ! जेकर घर आमा -अमरूद फरे रहिथे, वोकर घर हजार लबदेना गिरथे । अच्छा, त पहिली लबदेना शुरू हो गय ! जलकुँवर मने -मन म हाँसिस, तखत के चद्दर ल बलदत ,ये सब हर तो लागबे करथे । फेर येती सियानिन बिरीज गौटिन आधा- जिंया  हो जात रहे...

" दई, भइगे बइठ जावा । तुँह ल तो एकदम पक्की -पक्का हो गय कहु लागत हे ।" जलकुँवर सास ल थोरकुन मीठ-झिड़की दिस ।

"का पता बेटी, भगवान के का मरजी हे, कभु एइच हर आखिरी हो जाही त, जइसन तोर संग होय हे ।"सियानिन घलव पोठ गोठ करिस।

    

          अब तो मुचमुचाये के बारी जलकुँवर के रहिस । सही बात कहत हे ये सियानीन । वोकरो घर बर पहिली सगा येमन रहिन, अउ येहू मन कहिथें, वोहर पहिलीच रहिस का येहू मन बर ! फेर ये लइका के डिंगरई ...नई करंव कहिथे शादी -व्याह ! अब कइसे करन ! मनाय-बुझाय बर लागही ।अउ मनाय- बुझाय म येकर ददा पास हे । कइसनो करके मना -बुझा लिही, समे आही वोतका बेरा ।


          चल वोला अभी जादा चिंता -फिकर करे के जरूरत नइये ।अभी तो घर म एक ले बढ़के एक सियान मन हें। सोनकमल के बाबू अभी घर म हें, बई हावें , अउ सबले बड़े सियान ददा अभी घर म हांवे ।

"जलकुँवर बेटी... कोन- कोन हावा घर म ओ !"रमौतीन गौटिन के आज तक ले सबले जादा मीठ बोली सुनाइस ।

"ये आवा आवा बड़ी- सास !"जलकुँवर कहिस निकलत,"सबो झन हावन घर म, सिरिफ नोनी हर पढ़े चल देय हे।"

"मोर संग यह दे अउ पहुना हें ।"रमौतीन गोठ बनावत कहिस ।

"ये...येहर तो बड़ बात ये बई, बलावा वोमन ल !"जलकुँवर फेर ओझी दिस फेर तब तक ल, तीन झन बाबू पीला मन घर आके, बनेच आंखी बटेर के सब कोती ल देखत रहिन ।

"आवा महतारी !"  रमौतीन ल हाथ जोरत बलराम गौटिया निकलिन, "संग के पहुना दाउ मन ?"

"बेटा हो,छोटे गौटिया बलराम  ,अउ मोर बर दुलरु !" रमौतीन एक किसिम ले मिल -भेंट करात कहिस।


      एक के बाद एक तीनों लइका उठिन, अउ आगु जा के चरन छुए के बुता करिन ।वोतका बेरा ल जलकुँवर काँस के लोटा म भर भर के पानी लान के मढ़ा दिस । एला देखके वो पहुना मन , एक दूसर ल देख के थोर -थोर मुचमुचाइन ।तभे सोनकमल के ददा आत्माराम निकल आइस । रमौतीन गौटिन फेर वोमन ल अँखियाइस । अब वोमन बइठेच - बइठे हाथ म वोला जोहार कर लिन । जलकुँवर ल पानी उवा लानत देख के वोला वइसनहेच नाहक गिन ।


            आत्माराम देखिस...मांझा म बइठे लइका टोपी ऊपर म चश्मा खापे हे । मुँहू कान हर बने जात के नि दिखत ये । अरे ! कुछु बने इरादा लेके आय हस ,तब मुँहू कान ल परछर बता न जी !आत्माराम कहत रहिस, फेर मन म... लड़की के बाप अंव। मोर लइका सुंदर हे...परम -सुंदरी हे । वोकर तो जोड़ी - जांवर बनायेच बर लागही , येहर तो पक्की -पक्का बात आय ; फेर मंय चीज -वसुत के पीछु नई  भागंव ,तब्य फेर जउन लड़का हर रंग -रूप म मोर बेटी के बरोबरी करही के ऊपर रहही , वोकरेच हाथ म बेटी के हाथ ल सँउपहा ! चाहे वोहर राजा रहे के रंक ।

"बेटा, लेवव न ये चरबनी मन ल कुछु -कुछु...!"विरीज गौटिन कहिस,"महुँ तोर ये बूढ़ी दई असन , बूढ़ी दई अंव ग ।"

"हां, बई !तभे तो हमु मन मया-पिरीत के खोझार म येती आ निकले हन ओ ।"वो दल म के एकझन आन लइका हर कहिस ।

"का होइस ,बेटा ।आय हावा तब बड़ अच्छा लागत हे जी।"ये पइत, बई के बलदा म बलराम गौटिया ओझी दिन ।

"बबा, एक लोटा पानी मांगे के बुता म आय रहेन ग ! "

"बढिया करा बेटा, आय -जाय ले ही तो रस्ता खुलथे बेटा, देखे हस न खार-वन म घलव !" रमौतीन गौटिन गोठ ल पुरोइस, "फेर बेटा, समय हर थोरकुन आन हो गिस। नोनी हर पढ़े बर शहर चल दिस हे । अउ गांव जवई अउ रुख चढ़ई वाला हाना हे । कोन जानी कतका बेरा आवत हे ।"

"कुछु नई होइस बई, तँय संसो झन कर । अरे ,तुमन सब झन ल भेंट डॉरेन, तब हमन के अवई हर अकारथ नई जाय ।"वोइच लइका हर कहिस , तब वो टोपी -चश्मा खापे लड़का हर वोकर अंग देखिस, जाने- माने वोला बरजत हे अतेक गिरके झन गोठिया कहत । येला समझ के वो लइका सिरतोन म थोरहे  घुच गय, अइसन लगिस ।


                तब तक ल जलकुँवर सबो झन बर चहा-पानी ले आनिस अउ आगु के टेबल म मढ़ा दिस , फेर वोमे के खास गिलास के चहा ल रमौतीन गौटिन ल धरा दिस । वो पहुना लइका मन जलकुँवर ल देख मरत रहिन, जइसन ये आशा म येहर महतारी आय , तब येकर लइका घलव तो अइसन होबेच करिही ।

"लेवा न ग दाऊ हो, चहा-पानी लेवा न ग।"रमौतीन गौटिन वोमन ल जोजियात कहिस।आज वो बपुरी धरम -संकट म फँस गय रहिस । दुनों कोती के बराबरी व्यवहार चाहत रहिस , फेर अइसन लागत रहिस कि टोपी -चश्मा वाले लड़का हर रिसा गय हे।ये सुन्ना घर म , ये डोकरी-डोकरा मन ल देखत चहा -पानी पिए बर आय हावन का ! वोमन टस मस नई होइन,जाने माने घर- गुसाँई ल ये बताना चाहत रहिन कि लड़की हर नइये, तेहर तुमन के सोलह आना गलती ये ।

"गर्मी के समे ये गा दाउ मन ,ये टोपी- चश्मा ल एको घरी बर उतार लो ।" सोनकमल के बाप आत्माराम ,एक प्रकार ले  वो दाउ -पिला ल टोपी -चश्मा हटाके पाँच-परगट अपना चेहरा ल बताय बर कहत रहिस । 


              येला सुनके , लागिस वो लइका येकर मतलब ल समझ गिस,अउ सिरतोन म अपन टोपी -चश्मा  ल उतार लिस। आत्माराम देखिस...चेहरा-मोहरा तो बने हे ,फेर आँखी हर कइसन अतेक लाल दिखत हे...


          येती रमौतीन के संग बिरीज गौटिन घलव कउआ गय । अब का करे जाय कहत ...तभे  वोला सुरता आइस वो परछी म टँगाय वोकर बड़खा फोटो के ।

"दाउ हो !/नोनी हर तो नइये, फेर वो परछी म वोकर फ़ोटो हर टँगाय हे ।"बिरीज गौटिन कहिस, जइसन तुमन ल देखे के मन होही, तब तुमन वोला देख लव ।येती येला सुनके आत्माराम कसमसा गय, फेर महतारी हर कह दिस तब कह दिस हे ।


     वोती वो टोपी वाला हर अँखिया के इशारा करिस कि चला रे देख ली वोला । वोमन तुरत -ताही वो परछी म आ गिन अउ नजर भर के देखिन वो सोनकमल के बड़े साइज के फोटो ल...

"तोर कैमरा निकाल रे!"टोपी वाला कहिस। खछ् ले फ़ोटो के फ़ोटो खींचा गय।

"ले बई अउ बबा, हमन जाथन !"वोमन कहिन  अउ निकल आईन ।


         सब विदा करे बर बाहिर आईंन तब परगट सुनिन ,वो टोपी वाला हर कहत रहिस ...येला तो हमन दुनिया के कनहुँ कॉलेज म पढ़त होही, तब ले खोज डारबो अउ देख लेबो । इहाँ अउ आये के जरूरत नइये ।

"अउ अइहा घलव झन ! मोर घर के चहा -पानी...स्वागत -सत्कार तोला नई सुहाईस । मोर देव धामी दुनों महतारी गेलौली करिन हे, तब ले  एको घूँट पानी ल तुमन नई चीखे अव ।तँय दिल्ली के राजा होबे, तब ले भी लइका तोला नई देवन दँव ददा ल ...आत्माराम बड़ रोसिया गय रहिस ।


      अब बोपरी रमौतीन का करथिस, वोकर चहा के गिलास हर जुड़ा गय रहिस।




          

              अध्याय 14

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       नावा बच्छर के नावा पान । चैत के अंजोरी पाख ल  नावा साल शुरु हो जाथे । पूर्णिमांत -अमांत के चक्कर म नई पड़बे, तब ले ये रुख -राई के नावा उलोहत पान मन बता देथें कि का हर नावा ये ,अउ का हर जुन्ना ये । तरी म गिरे पान -पतई मन गर्रा -धुंका मन के संग म येती- वोती बगरत रहिथें । जब पान नावा हे, तब फूल मन घलव नावा निकलबे करिहीं ! नावा गोजा म नावा पान , फेर गोजा के टिप मन म फुले के डोहड़ु-कली मन घलव दिखथें । खार-वन म सबो रुख मन म नावा कुंवर पान के झालर हर लसरत रहिथे,जाने माने अगमजानी -सर्वज्ञानी विधाता हर सुरूज नारायण के ताप ले अपन रचना अपन जीव -चराचर  मन ल बचाय बर ये बुता ल करे हावें ।


           येती लइका मन के परीक्षा पेपर भदराय हावे अउ चैत ल वैशाख कहत अक-तिजिया अक्ती तिहार आगे । नावा बच्छर के पहिलात तिहार ! हमन काबर तिहार -बार ल बने नई मानबो, का टूटा पर गय हे हमन ल...जलकुँवर कहिस मन म । ये पइत देखे अउ खाय के लइक  ' देहरौरी ' बना के पठोहुँ तोर करा रा...! जलकुँवर कोला -बारी म बीज -भाथा ल बोवत हे । ठीक काल लइका के छेवर पेपर हे ।वोला रंच अकन घलव कहे नई सकाय । जो कुछ करना है, तउन ल अपनेच ल करना हे ...जलकुँवर के हाथ ले भदइला जोन्धरी के बीज मुठा -मुठा छिंचात हें ।

वो जोन्धरी ल सकिस, तब फेर सात -पनिया खीरा के बीज मन ल थाला मन म खुबेसे के बुता करिस । बनिहार मन पहिली ले भुइयाँ ल जोत-फांद के तियार कर देय रहिन, अभी जलकुँवर खाली बीज -वपन करे के ही बुता करत हावे , आज अक्ती के आगु दिन आय । अक्ती के तो धान के मूंठ लिंही, वोकर ददा हर तीर के ढोड़ीहा खेत म जाके । नौ बीसवाँ पानी,तेरा बीसवाँ धान, सतरा

 बीसवाँ बंद -कचरा... अउ का न का के ए बच्छर कोन ग्रह हर राजा ये कोन मंत्री ये । काकर हाथ म पानी हे फेर गौटिया तुँहर हाथ म मूंठ हे...ददा ल इशारा करत महाराज कहे रहिन,जउन हर पत्रा सुनाय आए रहिन ।अक्ती के पहिली बीज-भाथा ल धरती म खुबेस दे रबे ,तब फर -फूल हर नई भेंटाही त  कम से कम भाजी खाय के लइक जिनिस मखना, कलेरा मन तो मिलबेच करथें। ये बोपरा जरी -खेंड़हा के धोय जाय न पछिने,चार -चार पान के होइन तब ले खाय के शुरू ! जलकुँवर कोला के आखिरी मुड़ा म मुठा -मुठा रकसी-ज्वार  ल छींच दिस ।येती हर गौ माता के हिस्सा आय । जउन दिन खेत -खार ल हरा चारा नई आय सके, तउन दिन ये ज्वार मन ल कुटी बनाके देय बर लागथे , वोमन ल । अउ जड़कल्ला म जब ये ज्वार मन छेवर हो जाथें तब वोकर बाबू ...यह दे काय कथें ...हां, बरसीम ! येला छींचवा देथें ये कोती वोमन के चारा बर । 

"दीदी, अब जई घर ओ ! बनेच बेर हो गय ।"बंद कचरा झर्रावत एक झन बनिहारिन कहिस ।

"हां, जावा !आज कइसन मैं सबो जिनिस मन ल भुलावत हंव रे ,नोनी मन !"

"जादा खा डारे होबे कि कम । अइसन म ही तो अइसन होथे ।" वो बनिहारिन कहिस ।

"बने कहे !लेवा अब जावा अउ दुसरिया जोर थोरहे संकेरहा अइहा जी ।"जलकुँवर बनिहारिन मन ल दुलारत कहिस । 

"हाँ...दीदी !"वो बनिहारिन कहिस, अउ वो तीनों अपन छुट्टी कर लिन ।


            जलकुँवर जानथे , जब ले वोहर खेती के धुरा ल धरे हे, उनला बनिहार -बनिहारिन मन बर  चिटिक भी चिंता -फिकर नई  रहत ये । वोकर घर -खेत म बुता करे बर बनिहारिन -बनिहार मन उबड़ीक - उबड़ा होवत हें !थोरकुन वोकर जलकुँवरी रूप के जादू वोकर ले जादा खाय- पिए के रंग -रंग के खाजी  ऐना -बैना अउ सबला जादा वोकर मीठ बोली बरोबरी के नाता-गोता वाला व्यवहार ! कनहुँ जात-धरम के बनिहार -बनिहारिन रहें, गांव चलागत गांव रिश्तेदारी म यथायोग्य  नातेदार  कका काकी बड़की बड़का बने हांवे येमन ।


         चल ,सब बीज -भाथा सिरागे अउ कोला हर घलव खुर्रा बोवागे ! बाँचे नवतप्पा के घाम म ये बीज अउ धरती दुनों के दुनों भम्भाय रहीं , तब  बरसा के पहिली फुहार हर परही, तब बीज हर बट ले आँखी उघारही...सूली मन निकल आहीं ,अउ अभी भुरभुर दिखत कोला हर पटा जाही पान फूल ले ।

 अभी तो थोरकुन हरियर बाँचे हावे -रोपा भाजी , खेड़हा अउ ये चर्रइंया  खोटनी के दु -चार परिया म ही , हाँ ये केरा के उतरत घेर मन घलव साग -पान बर सहा हांवे ।


               जलकुँवर अब घर कोती आ गय । सोनकमल अब ले भी अपन किताब मन में जटकेच रहिस, वो न तो बई-बबा ल जेवन देय रहिस, न खुद खाय रहिस । वोला अइसन देख के जलकुँवर थोरकुन मुस्काइस । चल येला आज पढ़नेच दँव ...आजेच भर पढ़ही, तहाँ ले जब तक गजट म अपन रिजल्ट ल नि देख लिही, तब तक के कापी -कलम बंद ।


         जलकुँवर खुद बने परछर हाथ -पांव धो के दूसर ओनहा बदल के रसोई घर म गिस । नहाना -धोना तो  बिहना बेरा होइच जाय रथे। सियान -सियानीन ल जेवन करा के सोनकमल के तीर गिस -चल, बेटी !पहिली खा ले तब फेर पढ़त रहिबे ।

"चल ,एकरा बहस करई माने टाइम -मैनेजमेंट गड़बड़ा जाही ।"सोनकमल कहिस ,अउ महतारी ले आगु जाके आसनी म बइठ गिस । अउ चुपेचाप जउन भी रहिस पान -परसाद,  वोला लेके अपन पढ़े के जगहा म फेर आ गय। ये साल के छेवर किताब... वो कहिस अउ किताब म फेर आँखी गड़िया दिस ।


*          *        *         *            *


"तँय मोर आज के पेपर ल बने नई बनन देस, अइसन लागत हे !" सोनकमल महतारी ल चाउर पिसान म दही ल समोत देखिस  तब कहिस ।

" येती तँय देहरौरी बनाय के पया धरत हस ,अउ वोती मंय पेपर लिखहाँ ।" सोनकमल कहिस ।

"बेटी ,अइसन गोठियात हावस ,जइसन देहरौरी  बनाके  तोला कभुच नई खवाय अंव , फेर आज तो अगला -उछला बनाहाँ ! बनेच अकन बनाहाँ..."

"वो काबर वो !"

" बेटी ,अभी तो तँय सीधा तोर पेपर म जा । मोला अभी कतेक न कतेक बुता करे बर हे।पुतरी -पुतरा के विहाव के नेंग -नाता करे बर हे, वोहु हर ये रोटी-पीठा मन बन लीहीं,  तेकर बाद म। तोर बबा मन खेत डहर 'मूंठ' लेये गय हें । महुआ कुची तियार हे, वोमन आहीं तब देव -धामी करा दिया -बाती बारहीं ..."

"बबा गा ! इहाँ तो गाड़ा गाड़ा मन बुता माढ़े हांवे !"सोनकमल कहिस अउ अपन सायकल धरके बाहिर निकल अइस,वो बाहिर म सायकिल घण्टी के आवाज सुन डारे रहिस । वृंदा बाहिर म खड़ा रहिस । 


*          *           *           *            *


"ये आ आ जल !" नन्दिनी जलकुँवर ल अपन घर म देखिस,तब थोरकुन खुश होवत कहिस । वोहर वोकर हाथ के कटोरा ल देख डारे रहिस ।  आज के दिन बरा -सुंहारी तो सब के घर बनथे;वोकर अलदी - बलदी करे के रोटी देय -लेय के चलागत पहिली रहिस , फेर मनखे मन अपन -खया हो गिन आजकल । अपनेच बना अउ अपन खा । नहीं त आन आन घर के आन आन घाना के सतरंगी रोटी कुढ़वा जाय, अउ कभु निनासत त कभु बउनत बड़ौरी मारत वो रोटी मन ल सब खाँय । येकर ले भी बढ़के बात कुछु दुख -सुख म काकरो घर तेलई नई चढ़े, तब वो घर के लइका -पिचका मन ल पता नई चले , अतेक रोटी बाहिर ले आए जाय ! फेर सब दिन होत एक समाना...!जलकुँवर के संग भीतर आवत नन्दिनी अतका ल गुन डारिस ।

"काय लाने हावस,पीला नोनी !"नन्दिनी जलकुँवर ल बईठारत कहिस ।

"यह दे दु -चार ठन देहरौरी ये दीदी ।" जलकुँवर कहिस अउ कटोरा नन्दिनी कोती बढ़ो दिस । नन्दिनी इलायची के कहर ल नाक म लेवत चासनी ल  अंगठी म छू के देखिस काहीं वोहर कड़ा तो नई हो गय ये ।

            वोला अइसन करत देख के जलकुँवर थोरकुन मुचमुचाइस-कइसे हे दीदी !

"वोला तो चिखही तभे गम पाही, बहु ।"रमौतीन गौटिन अइसन कहत अपन कुरिया कोती ले निकल आइस ।

"बबा गा !अतेक अकन काबर लाने हावस बहु?सब झन खाबो, तब ले आन ल बांटे के पुरता बाँच जाही ।"रमौतीन बड़का कटोरा म भराय देहरौरी मन ल देखत कहिस।

"मोर बेटी के बनौती बनाय के, वोकर जीवन सँवारे बर तूँ जादा कोशिश करत हावा तेकर सेथी ये येहर ये तुँहर बर ..."जलकुँवर हाँसत कहिस ।

                  

                 येला सुनिस तब रमौतीन के मुँहु म डारत हाथ हर रुक गय रहिस ।


*         *           *            *          *

           अगास म उड़ियात चिरई मन ल एकघरी ल बने मन लगा के देखत सोनकमल ल वृंदा कहिस -अतेक झन देख ओ दई ! येहर कोई छेवर परीक्षा नोहे , अभी तो आगु साल फाइनल देवाय बर हे !

"छोकरी ,  मारतेच लिहाँ ! चौबीसों घण्टा दई-दई लगाय रहथस ! वर -विहाव करे बर उतियाइल हो जाथस । कनहुँ पागा वाले तुँहर घर आके बइठे होही , जा तो तोर घर !"सोनकमल वोला ठठा करत कहिस, फेर येला सुनके वृंदा के आँखी म चमक आ गय ।

"तब तो होगय तोर फाइनल परीक्षा !"सोनकमल फेर कहिस ।

"अरे  वोई पागा-टोपी वाला हर तो मोला, अपन लियाकत जान के सायकल,मोटर,चाहे फटफटी म बइठार के लान ही रे पेपर देवाय !"वृंदा घलव वइसनहेच हाँसत कहिस ।

" अउ पेपर दुनों झन देवइहा -महतारी अउ बेटा ! हाय दई ! कनिहा हर पिराइच मरत हे ।" सोनकमल पेट कोती उभार बनात वृंदा ल विजराइस ।

"मारतेच  लिहां छोकरी... !!"वृंदा हाँसतेच कहिस,फेर वोकर चेहरा हर बगबग ले लाल हो गय रहिस,अउ नजर हर तरी हो गय । तभे वो देखिस...अगास म उड़ियात चिरई मन म ले एक जोड़ा  चिरई उतर के तीर के घमघम ले फूल मन मे माते धनबोहार रुख म आके बइठ गिन हें । 


           वो दुनों संगवारी अइसन गोठ बात म माते रहिन । तभे बोमन के तीर म भट भट करत एकठन बड़े डील -डौल के फटफटी आके रुकिस । वोला वईसनहेच बड़े डील -डौल  के बाबू पिला हर चलात रहिस । वोहर अबक  होके सोनकमल ल भर आँखी देखिस ।

"फोटो ल अउ जादा सुंदर !" वो बाबू पिला कहिस ।

"कोन अउ काबर ? अउ तँय कोन ?"वृंदा रटाक ल गोठियाइस ।

"येहर ...! अउ हमन येकर घर सगा-पहुना गय  रहेन , तभे तो तोर आगु म आय के अधिकार बनत हे ।" वो बाबू पिला कहिस ।

"बने करे !अब  देख डारे न ।"वृंदा  हर फेर खरखर गोठियाइस ।

"येला देखे गय रहेन ,तब तुमन जानबूझ के येती आ गय रहा ।"  गाड़ी के पाछु सवारी वाला हर कहिस ।

"तब तोर मतलब हमन पेपर ल छोड़ देय रथेन ।"

"हां...! येकर बर तुमन ल पेपर ल छोड़ देना रहिस। जानत हव येहर कोन ये ।" वो सवारी कहिस ।

"तोर मालिक तो आय कम से कम !"वृंदा वइसनहेच तेवर म जवाब दिस ।

"अरे झुनझुना भाई !तहुँ अलकर अस । मालिक के जगहा वोकर बॉडी गॉर्ड ल भिड़ गय !" वो गाड़ी वाला हर अपन सँगवारी ल समोखत कहिस ।

"नोनी ! हां...मंय तोर से बात करत हंव । तोर बड़ नांव सुनेन तब वो दिन तोर घर तोर बर मंय सगा पहुना गय रहें ।"  वो गाड़ी वाला सोनकमल ल कहिस ।

" ठीक हे । गय रहे तब गय रहे ।"

"आज तोला देख डारें ।"

"वो भी ठीक हे...!"

" अब मंय तोला बिहाहां । तोर संग विहाव करहां ।"

"अभी तो तँय जा ! येहर बीच सड़क ये ।शहर नगर ये । थाना पुलिस हें ।"

"वो सब मोर जेब म हें...!" 

               अब तो सोनकमल बक्क ले वोकर मुँह ल देखिस ।

"जाथन !बड़ जल्दी मिलबो !!"वो गाड़ी वाला कहिस अउ अपन गाड़ी चालू करके आगु जाय लागिस ।


                  फेर थोरकुन धुरिहा जाके एक पइत फेर लहुट के सोनकमल ल देखे लागिस , तब सोनकमल वोला हाथ के इशारा करके वापस  बलाइस ।

"हरे सोनकमल ! इहेंच ल बइठ के चल देबे का रे !!"वृंदा जोर से नरियाइस ।

"अरे चुप्प !" सोनकमल हाँस भरिस ।


            अब तो वो गाड़ी वाला कुलकत मुड़ आइस ।

"रुक तो वृंदा तँय ! "सोनकमल

 कहिस ।

"ए दई !ए दई !! कइसन करत हस ओ ? "वृंदा कहिस ।

"तँय रुक ...!"सोनकमल कहिस अउ वो गाड़ी वाला ल अकेला वोकर तीर म आय के इशारा करिस ।

" देख...न मंय तोर दुश्मन ! न तँय मोर दुश्मन अभी ! सब घर ल सब जाथें । आना जाना होथे बात बढ़थे । रिश्ता जुड़ जाथे ।" सोनकमल वोला अकेला म कहिस ।

"हां,तँय ठीक कहत हस !"

"फेर दऊ !मंय वर -विहाव नई करंव ।"

"आँ...!फेर काबर ??"

"नई करंव माने नई करंव ! एइला तोला बताय बर बलाय रहें ।अब जा अउ खुश रह !!" सोनकमल कहिस ।

"तँय काबर विहाव नई करबे । अउ मंय विहाहाँ... तब तोइच ल विहाहाँ !! "

"तब्य तहुँ झन कर मोरे कस विहाव ! ले अब जा !"सोनकमल कहिस अउ वृंदा तीर आगिस, जेकर सांस हर पिंजरा म नई खुसरत रहे ।

"का होइस का होइस ओ ?का का खछ् डारे अनचिन्हार ल ओ !  ए दई !ए दई !!" वृंदा हँफरत रहे ।

"चुप ! कुछु नई होय ये ! अब चल घर ।"

सोनकमल कहिस।

"घर म शिकायत करे बर लागही ।" वृंदा अटकत कहिस।

"अरे चुप्प !अतकी -अतकी ल  शिकायत करबे त का के सोनकमल ! !" सोनकमल हाँसत कड़किस वोकर बर ।

"नहीं आ दई !! तँय भले ही मार लेबे ,मोला सबो गोठ ल पुरुत के पुरुत काकी ल बताय बर लागही !"वृंदा वोकर मुँहू ल बनेच देखत कहिस।



*रामनाथ साहू*



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            अध्याय 15

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                  आज काल तो परीक्षा पेपर छेवर होय हे, तेकर सेथी चल दु चार -दिन कुछु नि करना ये । कुछु नि करना ये...येकर मतलब बई के हाथ -गोड़ ल लगरई के छोड़ आन अउ कुछु बुता बंद !


           अउ अभी घाम महीना म कोन  सा मार अउ आन कुछु बुता माढ़े परे हे। न वोला आन आन मन असन ढेलवानी जाय बर ये,न खेत म बगरे दूबी मुड़ी मन ल खने- छोले  बर ये। हां...ढेला पासबे कुदारी के पासा म त बड़ सुख मिलथे । तेकर सेथी ये ननबुटिया टूरी मन इकड़ी-दुकड़ी खेलत हें खपरैल ल पाँव म उछालत...

"महुँ ल खेलाहा रे विमला !"सोनकमल विमला ल कहिस ।

"ये...आना  बड़े दीदी !"वो लइका हाँसत कहिस।वोकरे असन सात आठ झन नोनी मन ये इकड़ी -दुकड़ी खेलत रहें करंज रुख तरी ।घाम महीना म करंज के छांव...! तिल भर बर घलव घाम नई दिखे ।

"विमला , तँय कतका पढतस नोनी ?"सोनकमल वोला पूछिस।

"अभी तो एको नहीं...।" विमला कहिस।

"वो कइसन वो...!"सोनकमल  येला सुनके थोरकुन चकराइस ।

"तँय काला पूछत हस दीदी,पढ़ डारें तउन ल कि आगु पढ़हाँ तेला ?" विमला हाँसत गोठ ल झेलिस ।

"अरे वाह !तँय तो बड़ तेज हस नोनी । चल कोई एक ल बता दे, तब मंय समझ जाँहा ।"सोनकमल घलव भिड़ गय वोकर करा।

"तब दुनों ल बतात हंव । मंय सातवीं पढ़ डरें हंव अउ अब आठवीं पढ़हाँ ।" विमला खपरैल कुटी ल उचकात 

कहिस । येला सुनके सोनकमल हाँस भरिस अउ कहिस -शाबाश !

"एक पइत अउ कह न  दीदी !" वो नोनी विमला कहिस ।

"शाबाश ! बहुत -बहुत शाबाश !"सोनकमल वोकर पीठ म हलका हाथ जमात कहिस । ये सब हर घर मुँहटा ले थोरकुन धुरिहा के गोठ रहिस । तभे वोकर कान म महतारी के कंठ ले वोकर नांव सुनई परिस । वोहर वोला हांक पारत रहिस ।

"लेवा खेला जी नोनी मन! मंय अब खेल डारें । अउ वह दे दई हर हाँक घलव पारत हावे ।"सोनकमल वो लइका मन ल कहिस अउ वो जगहा ल आ गिस ।

" रा... ना दीदी ! आ ना खेलबो ,तँय रहे त बने लागत रहिस।" चाँदनी कहिस ।

"फेर कनहुँ न कनहुँ ल , मोर ये खेलई हर बने नि लागत ये ;तभे तो हाँक पर गय ।"सोनकमल कहिस।

"लेवा न आँन दिन फेर आहूँ ।"वो फेर कहिस अउ घर कोती आ गय ।


          वो घर म गिस तब देखिस...कुटुंबदारी के वोई बड़े भाई... शिखा दीदी के बड़े भाई नन्दिनी बड़े दई के बेटा अउ रमौतीन गौटिन दई के नाती गजपाल बइठे हे ।वोकर आँखी मन लाल दिखत हें । 

"आ गय खेल के ?"गजपाल पूछिस ।

"हां...भैया ।"सोनकमल छोटकुन उत्तर दिस ।

"बने खेले...!"गजपाल हर तो कभु वोकर से सीधा मुँह बात नई करे, ये तो वोला पता रहिस ;फेर आज अउ अभी के वोकर तेवर हर तो पूरा के पूरा आन रहिस । सोनकमल वोकर गोठ के काय जवाब देतिस । गजपाल के रौब -दाब अइसन कि महतारी ,बई कनहुँ वोला कुछु नि कहत यें । चल हक्क कुटुंबदारी के तो आय ,अउ का गलत कहत हे...

"छोड़ कांची -कुचलिया सुप सुपलिया इकड़ी -दुकड़ी तोर ,अब ये सब के तोर उम्मर नि रह गय ये ...!"गजपाल बनेच अधिकार के संग म कहिस ।

"अभी -अभी गय रहें , भैया ।"सोनकमल , थोरकुन भयात कहिस ।

"कइसे का हो गय, बेटा ! बने तो हावा न !" जलकुँवर कहिस , ये बारी म सोनकमल के बदला म ।

"मंय तो बने हंव, फेर तुमन शायद..."

"कइसे का हो गय! का हो गय हे हमन  ल ;हमन तो नई गम पात अन।" जलकुँवर फेर कहिस।

"तुमन ल घमंड हो गय हे ।"

"ये बबा गा ! " जलकुँवर हाँस भरिस ।

"हाँस लव अभी, फेर मउक़ा आही तब रोइहा , मुड़ ल धरके ।"गजपाल के अवाज हर बढ़त जात रहिस ।

"आखिर हो का गय, वोला बताइहा तब तो जानबो ।"जलकुँवर , वोकर विरिन -विरिन करई ल देख के आनन्द मगन होवत रहय ,फेर सोनकमल बर येहर जनउला -पहेली बन गय रहे कि...का इकड़ी- दुकड़ी खेलई हर अतेक बड़े अपराध...अतेक बड़े जुर्म हो गय हे ?वोहर  अब गजपाल के मुँहू ल बनेच देखके, उहाँ अपन अपराध खोझे लागिस ।

"मोला का पूछत हस काकी, अपन गुणमनतिन बेटी करा पूछ !"गजपाल कहिस, तब एकपइत दुनों डराइन महतारी अउ बेटी एके संग...कइसे का ऊंच -नीच हो गय कहके !

"बने फरिया के बतावा बेटा ,का करिस हे ये टूरी हर...!!" महतारी जलकुँवर तो अब सिरतोन म थोरकुन विपतियां गय रहिस।

" येहर वो दिन दलपत ल , अपन तीर म वापिस बला के सफ्फा -सफ्फा कह दिस हे कि येहर कभु विहाव नई करे।" गजपाल तो अब गुस्सा म भभक गय रहिस।


          येला सुनिस तब जलकुँवर ल घलव थोरकुन कुछु होनी -बदी के डर चढ़ गय । वृंदा हर बनेच गोठ ल तो बताय रहिस, फेर ये गोठ हर नावा ये ।

"कइसे दऊ हर का कहत हें !"जलकुँवर घलव थोरकुन अकबकावत कहिस।

"येहर का कही , काकी । दलपत हर मोर संग आय। मंय हर ही वोला येकर शोर -सन्देशा बताय हंव । जांनथव दलपत ल, बावनगढ़ी के गौटिया आय । पूरा हमर कुटुंबदारी के जतका पूंजी नई ये ,वोतका अकेला वोकर हावे ।  येकर बने रंग -रूप ल समझ के वोला इहाँ बलवा लेय रहें , वो दिन अउ जानबूझके संग म नई आँय वो दिन..." गजपाल सरपट कहत रहिस, फेर वोहर गुस्सा म तमतमात रहिस।

    

            अब सोनकमल भर नजर गजपाल ल देखिस अउ थोरकुन मुचका उठिस । जाने माने वो कहत रहिस कि ये बवंडर के जरी ल मंय पा गय हंव , नहीं त कभु देखे न जाने बावनगढ़ी के टुरा- टँका मन कइसन बलराम गौटिया के देहरी म अइसन हक्क जतावत चढ़ आथिन के वोकर नतनिन करा डहर चलती मंगनी -बरनी के गोठ चाल लेथिन । हां...त येहर ये भेदिया!

"काकी !ठंडा मति कर के सोच लव । वोहर एला मन कर डारे हे । कर दो एकर विहाव वोकर संग । राज करही उहाँ जाके । मोर बई हर ,बात चाले हे ,त कुछु सोच समझ के ही करे

 होही ।" गजपाल लगभग धमकावत कहिस ।

" फेर बेटा ! येकर तो येहर कालेज के दुसरईया साल ये । येकर पढ़ई हर तो रुक जाही अइसन म !" महतारी जलकुँवर कहिस।

" टार न काकी , अइसन पढ़ई ल। इहाँ जिनगी हर बने के सौदा होवत हे, तेमे अइसन नान-मुन जिनिस ल नई देखे जाय ।" गजपाल तो अपन रुआब म रहिबे करिस ।

"तभो ले बेटा , पढ़ई हर पढ़ई आय..."

"अरे ,वो प्राइवेट देवा दारही पेपर ल ।दलपत के कनहुँ नौकर -चाकर येला पेपर देवाय बर कालेज पहुंचा दिंहि अउ ले आनहीं ।"गजपाल जलकुँवर के बात ल पुरा नई होन देय रहिस । तब सोनकमल वोकर मुँहू ल फेर देखिस, फेर वोला सँगवारी वृंदा के संग होय हँसी-ठिठोली हर सुरता आ गय...वृंदा कहत रहिस कि वोई पागा वाले हर तो मोला पेपर देवाय लानही रे !  अपन लियाकत जान के साईकल ,  कार के मोटरसाइकिल म बइठार के ;फेर वोकर हिस्सा म इहाँ नौकर -चाकर निकलत हें , जउन मन वोला लांनहीँ पेपर देवाय बर ! तब वोहर का करत रहही वोतका बेरा म ?

"हाँ...हाँ बोल कुछु कहत हस तउन ल !" गजपाल फेर कहिस ।

" मंय का बोलहाँ भैया! सबेच ल तँय बोल डारे न तब !"सोनकमल बड़ मजबुती ले कहिस ।

"देखे...देखे येकर रुआब ल ! येहर का नि जवाब दिस होही दलपत ल । जादा करबे त टूरी मारतेच लिहां न ..." गजपाल के गोठ पुर नई पाइस कि सोनकमल कहिस -महतारी हर कहथे भैया...मोला मारे -पीटे के बुता ल तो तँय, जब मंय पेट भीतर म रहें ,तब ले करत आत हस । येहर न तोर बर न मोर बर कुछु नावा गोठ नई होइस ।"


                अब तो सोनकमल घलव थोरकुन भभक गय रहिस । वोहर अब नजर मिला के गजपाल ल देखिस, तब एक पइत  वोकर नजर हर तरी झुक गय। 

" अच्छा भैया !जब मंय तोर करा जबान खोल डारें हंव, तब तँय परछर बता कि ..." 

"का बतांव तोला ?" सोनकमल ल बोलने नई दिस गजपाल अउ बीच म ही बोल परिस ।

"तँय ये बता...तँय मोर बनौती बनाना चाहत हस कि वोकर ?"

"दलपत हर मोर संग ये !भई बरोबर ये ..."

"अउ मंय कोन अंव ?"

"तहुँच बहिनी अस...!"गजपाल कहिस अउ अपन जगहा ल उठ खड़ा होइस ।

"भैंसा के सींग हर भैंसा ल गरू रथे बेटा ! चिटिक ठंडा मति करके सोचन देवा अभी...!"महतारी जलकुँवर कहिस ओतका बेर ।

 

  

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              अध्याय 16

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                रात के जेवन के बाद, बलराम गौटिया ल वोकर जीवनसंगिनी बिरीज गौटिन  तीर म जाके आज के जम्मो गोठ ल पियाइस । येला सुनके बलराम गौटिया पहिली तो हाँसिस...वाह रे ! बुजा पूत ! हमर लइका के जिनगी बनाय के सुध हमन ल नई ये ! चल, बने करिस ;सुरता करा दिस त । तब फिर गुनान म घलव परगे !चिक्कन पान म कउआ...अइसन बुता झन हो जाही । अरे !तँय पागा बाँध के आना जी !तोर कुटुंब-भीर-कबीला ल संग म लान । कोन मना करे हे ! सबके घर सब आथें -जाथें, फेर आय -जाय के तरीका हे, चलागत हे ! फेर ये कोन सा तरीका आय कि कॉलेज पढ़े गय लइका ल छेंक के ये बताना कि मंय तोला मनवा डारें न अउ तोला बिहाहुँ !

"गौटिन...लक्षण बने नई दिखत ये !बला सबो झन ल इहाँ !"बबा बलराम गौटिया कहिस ,तब बिरीज गौटिन बाहिर आके सोनकमल ल सबो झन ल गौटिया के खोली म आय बर कह दिस । अउ कोन सब झन...ददा आत्माराम, दई जलकुँवर अउ छोटे भई रजत  ।  सबो झन रात के जेवन ल छेवर करके बबा के कुरिया म आ गिन।

"कइसे बेटा ! कइसन ये बातचीत हर गजमजहा चलत हावे ।"बलराम गौटिया निज पूत आत्माराम ल पूछिस ।

"ददा , वो दिन तँय घर म रहे नहीं अउ बड़े दई के धुरिहा के कनहुँ लाग -मानी एक झन दउ -पिला हर अपन दुझन सँगवारी मन संग आय रहिस हे, सगा पहुना के नांव म ..."

"चल ठीक!फेर एसो तो हमन गुनत घलव नई अन , बर-बिहाव के गोठ ल।दिन के आय ल देखबो जी ।" बलराम गौटिया बीच म कहिस ।

"बने रहिस...?"

"रंग -रूप हर तो बने दिखत रहिस, फेर आँखी हर रकत बरन लाल...! "

"येकर मतलब?"

"ददा ,तँय सियान अस, तईंच हर 

बता ।"

"खाना-पीना वाले ये का?"

"हो सकत हे ।"

"बबा रे बबा ! भगवान बचाय !"बलराम गौटिया हाथ जोरत कहिस ।

"वोकर ले अउ बात ..."

"वो का ये ?"

"दुनों महतारी माने दई अउ बड़े दई कलपत रहिन अउ वोमन घर म लइका काबर नई ये कहत रिसाय बरोबर एक घूँट पानी ल गला तरी नई उतारीन ।"आत्माराम के गोठ म पीरा हर तउर उठिस।

"जे घर के पानी नई मिठाईस, वो घर के लइका कइसे मिठाही, आत्माराम...!"

"ददा...!"

"येकर छोड़ अउ आन का गोठ होइस हे?"

" येकर छेवर पेपर के दिन , कॉलेज तीर जाके वोमन येला देखिन हें..."

"चल बने करिन...का मोर लइका कानी -खोरी हावे,जउन ल लुकाबो ।" बलराम गौटिया कहिस।

"बात हर अउ आगु हे, ददा !"

"बता बने फरिया के वोला, का गोठ ये तउन ल।"

"वो लड़का का ? बनेच उमर के दिखत रहिस,तउन हर सीधा येला गौटियापा भाषा म बर-विहाव के गोठ करे के शुरू कर दिस..."

"का कहे ...? वोकर अतेक हिम्मत...अउ ये वोकर संस्कार आय !"बलराम गौटिया घलव गुस्सा म भर गय, अब वो सोनकमल कोती ल देखत कहिस- अउ तँय बताय तक नहीं ।

"येहर तो कुछु नई बताय ये । पूरा गोठ ल येकर सँगवारी वृंदा हर बताइस हे, आके ।"बिरीज गौटिन कहिस ।

"कइसे बेटी...?"

"बबा,बलराम अउ बिरीज के वंशावली, अतेक कमजोर नई ये, जउन हर अइसन कचरा- कुटा वाले बड़ोरा म उड़िया जाही । ये गोठ हर कुछु बताय के लइक जिनिस रइबे नई करिस तोर लइक ।"सोनकमल बड़ मजबूती ले कहिस ।


         बबा बलराम निहाल ! अउ का लेबे डोकरा...वो अपन आप ल कहिस, फब वोहर फिर सोनकमल कोती ल देखत कहिस - वो ठीक ये बेटी, फेर ये सब जिनिस हर बताय के आय । असल बात ऐंठ वाले व्यवहार के ये । तोर बाप ठीक कहत हे, दुनों महतारी के कदर करत वोमन चहा -पानी चिखतीन, बने मिल भेंट करथिन, तब बात कुछु आन रथिस ।

   

            एक घरी ल सब चुप रहिन, तब फिर अतका  बेर ल चुप महतारी जलकुँवर कहिस-वो पहुना के रिस , ये बात म रहिस कि हमर शोर -पता पाय के बाद घलव लड़की हर ,पेपर देवाय  भाग गय !

"...तब का वोकर बर साल भर के पेपर ल छोड़ दिही !"आत्माराम तमक उठिस ,"वोकर गौटियापा वोकर जगह ! लड़की मांगे आत हस, तब तँय मंगता अस अउ मंगता -जोगी के भेष म आ ! काल तँय का करबे तेला तँय जान  !! अरे ! अभी गोबर सनाय हाथ अइसन हे , तब धोय हाथ कइसन होही जी ।

"बेटा , जुड़ा जा ! लइकई बुध्दि लइका मन के रबे करथे । एमा पहिली बड़की गौटिन के पन के बात हे , फेर बावनगढ़ी के गौटिया खानदान के पन के बात हे ..."बलराम गौटिया कहिस,फेर वोकर गोठ ल काटत उँकर बेटा आत्माराम कहिस-येमे का पन के बात हे, ददा ! कोई काकरो लागा-बोड़ी तो नई खाय अन ;न हम वोकर,न वो हमर । बात आगु बढ़तीस तब सबसे ऊंची प्रेम-सगाई ...होतिस , फेर इहाँ तो पाँव  मढ़ाते अकड़ हर दिखत हे ;फेर वोकर ल बढ़के बात...लइका ल बीच बजरिया छेंक के भांत -भांत के गोठ करत हे ।"

"एइच ल तो मंय लइकई -बुध्दि कहत हंव , बेटा ।"बलराम गौटिया कहिस, तब वोकर मुख ल देख के बेटा आत्माराम थोरकुन मुचमुचा उठिस...ददा हर अभी बड़ सियानी गोठ करत हावे, फेर अभी रमौतीन बड़े दई आ जाही... का करत हावस,दुलरू ...कहत,तब ये ददा के बक्क हर नई फूटही !

"कइसे का होगिस बेटा ?" बलराम गौटिया अपन पूत के ये मुचमुचाई ल देख डारिस अउ वो थोरकुन अपन आख -पाख ल देखिस,फेर वोती तो कुछु रहिबे नि करिस, तब फिर का दिखथिस !

"इहाँ तक तो सब ठीक हे, ददा ! फेर गोठ हर अउ बाँचे हे ।" आत्माराम, सोनकमल के बाप कहिस ।

"वो का बात ये , जी ?" बलराम गौटिया कहिस ।

"मंय तो नई रहें घर म , फेर येमन बतात रहिन कि नावा गौटिया इहाँ आय रहिस अउ बनेच जोर से जंगात रहिस..."

"कौन गजपाल ?"

"हां...!"

"फेर काबर...?"

"बात घूम -फिर के वोइच जगह आ जाही ।"आत्माराम कहिस ।

"अरे , धंधा झन जनवा ! सब ल फरिया के बता ।"बलराम गौटिया घलव थोरकुन जंगाय असन कहिस ।

"वोकर कहना रहिस कि बावनगढ़ी के सगा- पहुना मन ल वो बलवाय रहिस..."

"अपन घर कि हमर घर...?"

" हमर घर बर ।"

"फेर अपन घर काबर नई बलवाईस ?"

"फोर के बतात हंव । ये लइका जादा सुंदर हे वोकर ले ,तेकर सेथी ।"

"वाह...! एमे कनहुँ ल कोई शंका हे ।"बलराम गौटिया खुश होवत कहिस, "तब तो वो लइका ,जनम म...?"

"तीन बच्छर के बड़े आय ।"अतका बेर ल चुप ,गोठ सुनत बिरीज गौटिन कहिस,तब सब एक पइत मुचमुचा उठिन ।

"तब तो वो लइका ल पहिली उठे के काम ये ।"गौटिया कहिस ।

"बावनगढ़ी के सगा हर बहुत बड़े मनखे आय, अउ वोला त्रिपुर -सुंदरी चाहिए बिहाय बर ...!"गौटिन कहिस । महतारी जलकुँवर तो ससुर के आगु म चुपे रहिस ।

"अउ अइसन त्रिपुर- सुंदरी आय मोर सोनकमल !"बबा बलराम गौटिया कहत रहिस,"तब एमे का बात हे ?"

"बात हे ददा ! फेर गोठ किंजर-बुल के वोइच कोती जाही ।"आत्माराम कहिस।

"देख ! फेर वही गोल-मोल गोठ..."

" गजपाल रोसियात हे । वो सगा ल अपन  संग बतात हे अउ कहत हे कि बावनगढ़ी के गौटिया के बेटा के आगु म ये का परीक्षा ...का पेपर , जउन ल देवाय बर ये सोनकमल कूद परिस अउ वोमन ल जुछा घर ले वापिस होना परिस ।"

"का कहे ! सगा -पहुना ल तो आगु -पाछु दुबारा -तिबारा आत-जात बनही, फेर पेपर हर तो कनहुँ ,लइका ल नई अगोरे ! गलत बात...बिल्कुल गलत बात !"बलराम गौटिया घलव थोरकुन रोसिया गय रहिस ।

"काल तँय अउ मंय घर म नई रहेन, तब मउका देख के छोकरा -बाड़ा घर आय रहिस,अउ येमन ल बनेच थरथरवाय  हे। चल !घर के लइका ये,कहत कुछु नई कहत अन , फेर का येहर बन जात हे ?" आत्माराम के गोठ म थोरकुन पीरा रहिस ।

"मोर लइका हर सातों -सपूरन हे ,त कनहुँ वोमे दांत लगा दिहिं का ? का करना हे का धरना हे, सब हमला पता हे...!"महतारी जलकुँवर अपन आप ल रोके नई सकिस । बबा बलराम गौटिया नतनिन सोनकमल कोती ल देखिस अउ कहिस - इया बेटी,कइसन चुप हस  ! कहाँ चल देय तँय ?"







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                     अध्याय 17

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                     आज सोनकमल के मन हर भारी  हे । ते पाय के वोहर अकेला ही नहाए बर तेल साबुन बाल्टी धर के तरिया कोती चल दिस । ओला लागत रहिस कि  तरिया के परछर जल  म नहाए ले मन हर फ़रिया जाही ।घर के दाई ददा अउ बई बबा  मन के तो बोल अब बर- बिहाव के ही निकल हे ।ओमन अब लागत हे कि जतको जल्दी हो जाय ओला ये  घर ले विदा कर देंय । बस एक अकेला  भर चुप रथे ।  वोहर ये छोटे भाई रजत  । जब भी बार-बिहाव के गोठ निकलथे , तब रजत  के आँखी मन डबडबा जाथें ।


              रजत हर ही  चाहत हे कि  दीदी के साथ कभू झन छूटे  अउ बाकी मन ल तो अपन परन अपन नेम- धरम ,अपन कर्तव्य के  चिंता फिकर  हे । वोमन ल अब  सिरिफ  एक ही बुता करना है बस ! अउ वो बुता आय   सोनकमल के बर -बिहाव !  वो कर दो । अउ सोनकमल  तँय बर -बिहाव नई करना चाहतअस ...! वो काबर ओ ?  पता नइये । फिर मैं अभी बर -विहाव के बंधना म नई बंधाना चाहत हों । अरे ! तँय नई चाहत अस तब का... कि तोर चाहे नई चाहे ल कुछु होही सोन कमल ? अरे सब कुछ होही ! बर -बिहाव मोला करना है कि वोमन ला ?  वोमन के  बात ल नई मानबे तब सब फिर बंद हो जाही ।  खाना पीना सब  बन्द ! सोनकमल  मने मन  हांसिस  जनाना घाट म  अपन  ओनहा कपड़ा मन  ल  राखत... ये घाट म तो जरूरत बिन जरूरत के  अउ  सबो  रकम के नारी -परानी मन ये घटोंधा म अपन- अपन तेल साबुन म मगन रहिन । जरूरत  वोला  जिंकर घर म  नहाय के  अउ आन साधन नई ये   । अउ बिन जरूरत वोकर बर  जेकर घर म नहाए के सहूलियत है अउ वोहर शौक म म आन के  देखा देखी कभू - कभार तरिया के घाट -घटोंधा म  नहाए बर आ जाथे ।


            सोनकमल नजर भर के देखिस - ये घाट पर तो जाने -माने नारी -परानी मन के मेला हो गय रहिस । सियान उम्र के चंदैनी बई  नहात हे । वहीं अधेर पांचों बड़े दई घलव  हे । भरे पूरे गेदराय अन्नपूर्णा भौजी है तब चिड़ी फ़ांफ़ा असन पातर नावा-  नेवरिया बहू दुलारी  घलव है । अउ बिन बियाहे नमूना बर कौन ल खोजबे वृंदा के छोड़ !  दु चार छोटे नोनी लइका पिचका मन घलव  अपन तेल साबुन  ल घसत  रहीन वो जगहा म ।

"ये आ जी जूनियर गौटिन ! आज येती कइसन ?" वृंदा सोनकमल ल देख के कुलकत कहिस।

"जइसन तँय वइसन मैं !"सोनकमल घलव  बड़ खुस होइस वृंदा ल ये जगहा म भेंट के ।

"आज येती कइसन ?"वृंदा फेर कहिस।

"फेर वही गोठ...! अरे तुंहरो घर म तो बोर बोरिंग चलत हे, तब तँय फेर इहाँ काबर आय हस ?"सोनकमल थोरकुन जंगाय असन कहिस।

"यह दे ये स्पेशल शेम्पू म मुड़ मिसे ।" वृंदा छोटकुन उत्तर दिस। अब सोनकमल आखा -बाखा अगल बगल ल देखिस कि कोन ब्रांड के शेम्पू येहर लाने हे रे कहके , फेर वोकर आँखी म एको शीशी डब्बा कुछु नई दिखिस ।

"कइसे...का देखत हस नोनी ?" वृंदा वोला अइसन देखत कहिस ।

"तोर शेम्पू ल खोझत हंव, वो दाई ! कोन कंपनी कोन ब्रांड वाला ये कहके !"

" शेम्पू के कंपनी ? ओहो...हो ! वो तो मदर इंडिया ब्रांड वाला ये बेबी ।"वृंदा हांसत कहिस ।

"ये ब्रांड तो पहिली सुनत हंव !"

"नहीं येहर बड़ जुन्ना आय ।"

"चिटिक येकर डब्बा -पैकिंग ल बता  ।"

"समझ ले येहर बिन पैकेज-पैकिंग के मिलथे !"

"वो कहाँ वो ? कोन दुकान म खुल्ला शेम्पू  बेचाथे ?"

"येहर अभी हमर गांव म फिलहाल अभी नई बेचावत ये । जतका तोर मन लागही, वोतका तँय ले आन ।"

"अच्छा !बता तोर शेम्पू ल थोरकुन !" सोनकमल कहिस,तब वृंदा वोला पीतल बाल्टी कोती इशारा कर दिस। सोनकमल वो बाल्टी म झाँक के देखिस - छोकरी बाड़ी ! मारतेच  लिहां...धरे हे करिया मुड़ -मिसनी  माटी ल अउ शेम्पू के नांव लेथे ।

"अरे महारानी !तोर ये हर्बल केमिकल मन ल लाख गुना के बढ़िया ये मुड़ मिसे बर।अउ समझ ले मंय एकरे बर आज तरिया नहाय आय हंव । माटी म मुड़ मिसबे तब बोर म एकदम सफ्फा नई होय। मुड़ म कुधरा कुधरा बाँचीच जाथे अउ तरिया म चार पइत मुड़ ल हलाय तब सब झर जाथें ।" वृंदा  हाँसत कहिस ।

" सच बात...!"

"का हर...?"

"तँय जो अभी कहे वो सब हर अउ तोर मदर -इंडिया ब्रांड शेम्पू बहरा खेत कोती के मुड़-मिसनी माटी दुनों ।" सोनकमल घलव हाँस भरे रहिस ।

"तब चल आजा ! हो जा शुरू ! चल मंय पहिली तोर मुड़ ल  मिसत हंव ।"वृंदा कहिस अउ सोनकमल के हाथ ल धर के तीर लिस ।

"नहीं ,ये मुड़- मिसनी माटी ये मदर -इंडिया ब्रांड शेम्पू तँय लाने हस, तेकर सेती पहिली तोर मुड़ ल मिसबो ।"सोनकमल कहिस अउ वोकर हाथ ल रोक दिस । अब वृंदा जानत रहिस कि  सोनकमल करा बहस करना अबिरथा ये। येकर सेती वोहर तरी मुड़ करके बइठ गय । ले तोला जउन करना हे कर ले कहके ।


                  अब तो सोनकमल वो  मुड़- मिसनी माटी ल लेके वृंदा के चुन्दी मन म लेप लगा के अपन दुनों हथौरी दसों अँगली मन म मालिस ।

"ये ...ये का करत हस ! " वृंदा नरियाइस ।

धान मिसे बर तोर मुड़ म दस अँगली के ये दस ठन बइला फाँदे हंव ।" सोनकमल चुन्दी मन ल फोरियात जवाब दिस।

"चल न मोर बारी नई आही का ...!" वो बड़ धीरे कहिस । अउ येती सोनकमल वोकर  मुड़ के आँगुर -आँगुर म वो गीला मुड़ -मिसनी माटी ल मल दिस। अब तो ओकर उलट वृंदा धर लिस सोनकमल के चुन्दी ल । दुनों संगवारी मुड़ ल बोरके  अपन अपन चुन्दी ल फरियाइन । 


            वृंदा देखिस सोनकमल कोती अउ आँखिच  आँखि म इशारा होगय । अब अउ का  ! ये तरिया हर वो दुनों मन बर तरणताल बन गय रहिस । येमन तो डुबकत बनेच गहिला कोती जावत  रहिन , तब फे वोमन ल  अइसन करत देख के अन्नपूर्णा भौजी अवाज दिस अउ इशारा ले लहुट आय बर कहिस । वो दुनों घलव वापिस लहुट आइन...

"का ये भौजी ? काय कहत हावस ?"वृंदा वोकर ले

 पूछिस ।

"ननदिया मन !तुमन ई तीर म सुध के बुतात भर ले तउरो.. नहावो ,फेर वो गहिल कोती झन जाव ।"वो कहिस ।

"वो काबर ओ ?" वृन्दा फेर कहिस ।

" सतबहिनिया नोनी ...!वोमन सज्ञान लइका मन ल नई सहें । तीर के ले जाहिं अपन भीर म ..."

"वाह भौजी !" के पइत सोनकमल कहिस ।

"देख बूड़त बूड़त तुमन के आँखी कान हर ललिया घलव गय !अब बस अतकिच नहावा । जर- जुड़ , सर्दी -खांसी सबो ल देखे बर लागथे न !"भौजी कहिस तब वोमन सिरतोन पानी ले बाहिर निकल आइन ।


       नहा के घर फिरत हें दुनों संगवारी । अभी चुपे हें । अउ का गोठियाहीं ! 

"कइसे का हाल हे ?" वृंदा पूछिस गहिल प्रश्न ।

" सब बेहाल !" 

"कइसे का होइस ?" 

" अब तो सब एके हो गंय हें घर भर के मन ! अउ सब के बस एके गोठ ...वोइच बावनगढ़ी !"

"अउ तँय का कहत हस ?"वृंदा  सोनकमल ल कोंच- कोंच के पूछत रहे ।

"मंय शादी -विहाव नई करना चाहत हंव रे वृंदा ! अउ सबो झन मोर पीछू पड़े हावा ... इहाँ तक तँय घलव ।" सोनकमल कलप उठिस ।

 " फेर काबर ओ ! भगवान तोला अतेक सुघ्घर रंग -रूप देय हावे , अउ ये रंग -रूप हर काकरो काम नई आही, तब  सब अविरथा नई होही ।" वृंदा सियानिन बरोबर कहिस ।

"का कहे ! भगवान सुंदर रंग रूप देय हावे, तब काकरो उपभोग के जिनिस बनना जरूरी ये का ? काकरो अंकशायिनी बनना जरूरी ये का ! " सोनकमल जइसन भभक गय रहिस ।

"नहीं आ नोनी !जीवन हर बड़ लंबा ये । महतारी -बाप सब दिन काम नई आंय । जीवन साथी बनाबे तब जिनगी के गाड़ी बढ़िया चलही , सोनकमल !" वृंदा समझाय बरोबर कहिस ।

"वो तो ठीक ये ।फेर मंय विहाव नई करंव !" सोनकमल  बड़ मजबूत  आवाज ले कहिस ।

" कांही  तँय ,सायकोलोजी म पढ़े  वो फ्रीजिडीटी के शिकार तो नई हो गय ?" वृंदा सुरता करे असन कहिस ।

"छोकरी बाड़ी ! का का कहिथे...मोला फ्रीजिडीटी होय हे,तब  वोइच सायकोलोजी वाला निम्फोमेनिया हर तोर बाँटा ये ..."सोनकमल  हाँसत कहिस । अब वोमन ल अपन -अपन घर जाय बर अलगे होना रहिस । वोमन अपन अपन रस्ता लिन ।फेर थोरकुन धुरिहा जाय के बाद सोनकमल फिर लहुट के हांक पारिस - वृंदा ...!

" फेर का होइस ?" वो थोरकुन जंगाय असन कहिस ।

"वो तोर मदर-इंडिया ब्रांड शेम्पू...गजब के... ! एक नम्बर के !"सोनकमल हाँसत कहिस ।

"छोकरिया ! एई ल कहे बर हाँक पारे हस ... !"वृंदा हाथ के चटकन उबात कहिस ।


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                 अध्याय 18

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        सोनकमल तो अपन आप ल अब अकेला ही समझत हे । छोटे भई रजत  ल पढ़े के नांव म अब शहर म कर देय गय हे । मुंहा- चाही... मन के बात करने वाली सुख -दुख के संगवारी वृंदा तो विहा होके  आन जगहा चल देय हावे । बड़का दाई बनेच सियानीन हो गय । बबा हर घलव बनेच ऊंचहा सुनथे । कुछु गोठ ल बनेच जोर से कहबे तब सुन पाथे । अब महतारी के ही चलागत हे घर म । वो जइसन चला लेय, घर वइसन चलही । बच्छर भर म ही का न का हो गय , वोकर बर दुनिया हर ! दई -ददा दुनों आ गिन बावनगढ़ी के गौटियापा पूँजी -रुँजी के प्रभाव म ।  का रिस धरबे बेटी...! बेटी के बाप ल तो तरी मुड़ी करेच बर लागथे, ददा कहत रहिस । अब लईकई भूल -चूक माफ ! लइका ल हमन सोलह आना मनवा डारेन बलराम गौटिया ।अब तुंहू मन आवो जी हमर घर -दुआर  । वोहू कोती ल तुंहू मन झाँक आओ...बावनगढ़ी के सियनहा गौटिया आ गय रहिस हे घर म सगा -पहुना के नाम म ! अउ ये गोठ ल वो कहे रहिस है । फेर मंय हर शादी -विहाव नई करना चाहत हंव । फेर काबर सोनकमल ?पता नइये ,फेर मंय ये बर विहाव के बंधना म नई बंधना चाहत हंव । सब कथें अइसन जिनगी नई चले । काबर नई चलही ।मोला दई -ददा के ये संपत्ति घलव नई चाही । वोहर छोटे भई रजत के ये तब वोकरेच ये । मंय मोर पेट बर कमा लिंहा कनहु जगहा म ले । अउ का चाही बस यई न...!


        सोनकमल के नजर तीर के पठेरा म  माढ़े वो पुतकी उपर पर गय , जउन ल महतारी हर जोगी -जोगड़ा महराज करा ले, बने तनतनात लाने एक चरिहा  धान के बदला म लेय हावे आज । वो घर के लेंटर उपर ल देखत रहिस येला अउ वोमन के फुसुर -फ़िया गोठ हर घलव सुनात रहिस ...ये भभूत हर सिद्ध भभूत आय  गउटीन ! नोनी ल कुछु म मिला के दे देबे...बस ! तहां ले देखबे एकर असर ल !भोलेनाथ सबला बना दिही । महतारी ल असीस देवत धान ल अपन झोली म धरके वो जोगी परा गय । महतारी हर वो पुतकी ल बस यह दे एइच करा राखे हे । सोनकमल आगु जाके वो पुतकी ल खोल के देखिस बने नजर गड़ा के वो जिनिस ल । बस एकदम सादा रंग के जिनिस राख बरन ...बस यह तो राख-भभूत आय ।


              सोनकमल के चेहरा म एकठन मुस्कान तउर उठिस । वोहर एकर एक चिमटी लेके मुँहू म ना घलव लिस । बस...राखेच आय येहर !  वाह रे महतारी अउ तोर बइगई -गुनअई ...! चल दे दे दवा ! मोहनी -मंत्रा देवा दे नहीं त छेवर म जहर दे दे !

"सोनकमल !बेटी ...! आना खाना खाले !"महतारी मया म पलपलात खाना खाय बर हाँक पारिस ।

"हाँ...माँ !"

"आना मोर कोती... खाना खा ले ।"

"खाना कि कुछु अउ ?"

"अउ का वो ? अब  यह दे चुर -पाक गय हे । खाना खाले महुँ हर बुता ल हरु हो जाँहा ।" महतारी कहिस ।

"ठीक हे महतारी !तँय हरु होय के जतन तो करबे करत हस, फेर हरु नई  होवस न..."सोनकमल बुदबुदाईस ।

"कइसे कुछु कहत हस का ?" महतारी जलकुँवर पूछिस वो बुदबुदाई ल सुनके ।

" कुछु भी तो निही ओ दई  ।"सोनकमल कहिस, "रा थोरकुन मंय यह दे कोला कोती ल आवत हंव तब फेर बईठहां  खाय बर । "


                       अउ वो सिरतोन म कोला कोती चल दिस ।चल महतारी !  जाने माने वो कहत कि... चल तोला सहुलियत होय अपन जादू- मंतर करे बर । ये पुतकी ल खाना म मिलाय बर !


               सोनकमल वापिस फिरिस हाथ -गोड़ ल धोवत तब वो पठेरा कोती वोकर नजर चलिच दिस । वो पुतकी हर पठेरा म नई ये...सोनकमल के चेहरा म भेदहा मुस्कान तउर उठिस -हो गय तइयारी ?

"हाँ...अब खाय बर बइठ !" महतारी कहिस तब सोनकमल बइठे के आसनी लगा के खाना खाय बर बइठ गय अउ हाँसत सहज भाव ले खाना ल खा लिस । फेर परोसना देवत महतारी के मुख म भेदहा -मुस्कान हर तउरत रहिस । 


             सोनकमल सब कुछ जानत घलव आन दिन असन सहज भाव ले अपन जेवन पूरा करिस । महतारी ल पताच नई चलिस कि ये देव -भभूत ल, वो सब जानत हे । महतारी तो आन बुता म भुला गय,फेर सोनकमल वहीं च रह गय । देख तो निज महतारी हर महतारी नई रह गय । वोहू हर वोकर बर कोर -कपट करत हावे । अइसन जरूरी जिनिस हावे बर -बिहाव हर वोकर बर ।सोनकमल के गहा हर भर आइस । ये महतारी ल वोकर जान के फिकर नई ये भले ही वोकर बर -विहाव के फिकर हावे । सोनकमल उनमुनहा हो गय ।


            अब तो अइसन विपत के बेरा म मन ल हरियर करे बर वोकर खचित साधन रहिस । तीर -तखार के खेत -खेतवाही कोती जाके किंजरई ! वृंदा रहे तब वोकर तीर म जाय ले घलव मन माढ़ जाय , फेर वो तो अब अपन मनपसंद जगहा म पहुँच गय हे । अपन ससुरार पहुँच गय हे । अइसन म अब बारी -बिरता वाले हरियर जगहा  म जाय ले ही मन ल चैन मिलही ।अइसन गुनत सोनकमल छोट बुटी टुकनी ल धर के भाजी -पाला सिलाय के नांव म बारी डहर ल खेतवाही कोती आ गय। एक खेत दु खेत फलांगत वोहर यह दे बनेच धुरिहा आ गय । येहर  बरसाती धान -पान के सीजन नई होय,तभो ले डलवा -दु फसली फसल मन लगे हांवे खेत -खार म अउ दु -चार नर -नारी मन घलव दिखत हांवे  वो कोती । 


        सोनकमल देखिस गांव ले थोरकुन धुरिहा म  ठाढ़े पहाड़ -डोंगरी के उपर म सादा बादल मन आके उतरे बराबर दिखत हें । सोनकमल येला देखके गुनिस मन म...अरे बादर ! तुमन ल देख के अइसन लागत हे कि, तुमन मोला सिखोवत हव...देख सोनकमल  देख ! कईसन हमन हमर मयारुक ये पहार ल अपन बहाँ -भुजा म भरत हन । अइसन कनहुँ मयारुक के  मया के बंधना हर ही सार ये, ये धरती म ,बाकी सब निसार ये खईता ये !

सोनकमल हाँस भरिस । चलव बढ़िया बुता करत हव । सीखोवत रहव दया -मया प्रेम -पिरीत के पाठ, फेर सोनकमल हर तुमन के विद्यार्थी नोहय । वोला सिखोय बर नई लागय । वोकर हृदय म अइसन कुछु  मया प्रेम -पिरीत काकरो बर नइये । त का सोनकमल के हिरदे हर कठवा -पखरा के बने हावे ?नहीं ...सोनकमल के हिरदे कठवा -पखरा के नई बने ये । वोहू हर मनखे रूप आय, फेर ये बंधना वोला अभी स्वीकार नइये, जेमे बंधाय बर वृंदा हर छटपटात रहिस , जेमे बांधे बर महतारी ल जहर-महुरा राख -भभूत खवाय बर लाग जात हे ।


       सोनकमल आगु गिस । आज ये रुख -राई के झुंझाट मन कईसन कईसन दिखत हें । वोहर एकठन लीम के रुख तीर म जा खड़ा होइस ।फेर वोकर नजर ये लीम के रुख म लपटाय गुरुची नार उपर पर गय । कईसन पोठ लपटाय हे ये गुरुची नार , लीम के रुख म  ! तँय का कहत हस रे गुरुची नार...?लपटा तहींच लपटा !सोनकमल ल झन सीखो !! वो अपन बुता ल जानथे अपन पुरता । काहीं ल वोला सिखोय के जरूरत नइये  ! सोनकमल कहिस अउ खुदे हाँस उठिस । फेर ये नार - विंयार... वन -लता मन के अइसन रुख मन ल लपेटई ल देख के वोकर मन हर भारी हो गय ।


        अउ कतेक आगु जाबे सोनकमल अब...?वो मने मन म कहिस अउ अब घर कोती फिरे बर लहुटे लागिस । फिरत हे सोनकमल एक खेत ल दु खेत फिर तीसर खेत ! खेत म गछे हे मुड़ही भाजी । बबा हर येला बने पतियाथे उसन -रिमंज के बघार देबे त । अइसन गुन के  वो अपन हाथ म धरे डलिया म ये मुड़ही भाजी ल टोरे बर बईठ गय । थोरकुन बेर म बने डलिया भर भाजी ल वो टोर लिस । चल अब चले जाय वो कहिस अउ उठ खड़ा होइस...तभे वोकर मुड़ उप्पर अगास म चिरई के एक जोड़ा सांय -सांय उड़त दिखिन । 

देखा महतारी प्रकृति ! सबेच ल बता दार सोनकमल ल ! अउ कहदे... बिन जोड़ी जांवर गति मुक्ति नइये ! फेर सोनकमल तोर ये सब भेवा ये सब खेला -लीला में आने वाली नइये ...


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               अध्याय 19 

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               सब समझा- बुझा के थक गिन फेर ये लइका कोन जानी कोन  माटी के बने हे कि टस ले मस नई होत ये । अतेक पढ़े गुने हे । वोला धर बांध के कइसे बिहाव करबे वोकर ?वोकर तो बस एके रट हे कि मंय बिहाव नई करंव माने नई करंव...महतारी खाय बर देबे तब बढ़िया नई देबे तभो बढ़िया !


         महतारी वोकर जम्मो संग -संगवारी मन के नांव गनाथे कि अलनिन के होगे फलनिन के होगे । बाँच गय त बस वोकर सोनकमल । आन आन लइका मन फर फूल गिन न अउ ये अभी...बस ! अउ आन ल कोन अमरबे ? येकर खचित संगवारी वृंदा के कोरा म बाबू खेलत हे । अउ इहाँ तो बस ये छोकरी- बाँड़ी के एके नखरा...मंय बिहाव नई होंव माने नई होंव । अरे तँय जनम से  आज तक महतारी बाप ल कुछु दुख- तकलीफ नई देय अस । कुछु अलहन -अनहोनी नई करे अस । सदाकाल वोमन ल सुख पहुंचाय हस । वोमन के माथ ल उँच राखे हस, तब अब काबर दुख देय असन करत हस । तोर ये बिहाव नई होंव...वाला गोठ ल सुनके अब तो सगा -पहुना मन घलव  आना -जाना छोड़ दिन न । फेर सुने म आत हे कि वो पहिलात पोठ सगा मन आँय रहिन बावनगढ़ी के गौटिया के घर ले ! वो दउ पिला के घलव कनहुँ आन जगहा म मंगनी -बरनी नई होय ये...महतारी जलकुँवर गुनत हे छुही ले खूंट धरत । कतको घर हर सिरमिट -पखरा ले बने हे तभो ले जलकुँवर बीच बीच म छुही ल घोर के तीरे- तीर ल खूंट धरत रहिथे।अइसन करे ले मन म ताजगी के भाव भर जाथे । अउ अभी ये बखत ये छुही -चाका लिपाई हर खास हे । वो मुचमुचा उठिस । चल...अभी बिन मौसम बरसात होही ! मउका बिन मउका  वो घर म आनंदी चउका-आरती करवाही । ये बात हर खाली वोकरेच मन म हे । वो कही त येकर ददा काबर काटहीं  वोकर  गोठ ल । चउका -आरती होय ल ये टूरी बाड़ी ल सद्बुद्धि मिलही त मिल 

जाही । जलकुँवर अइसन गुनत छुही के बुता ल जल्दी पूरा करे बर हाथ चलाय बर लग गिस । फेर आगु बढ़त वोकर हाथ गुड़ धरे के खाली मथनी करा पहुँच गय । अब तो बरछा -बारी ले न  कुसियार न गुड़ कुछु मन घर आबे नई  करें । सीधा खड़ा तौला जाथें ट्रेक्टर के ट्रेक्टर । नहीं त पहिली ये मईरका -मथनी मन गीला राफ़ गुड़ अउ सुक्खा भेली गुड़ ले भरे रहंय ।  वो पइत के नहना -पाग धराय चेम्मर गुड़ हर कतेक न कतेक दिन म सिराय रहिस । अइसन गुड़ अउ घी ल मिला के धूप देबे त सुआस ले घर हर भर जाथे । अब गुड़ नई ये त ये मथनी मन खाली  के खालो हांवे । जलकुँवर अइसन गुनत ये मथनी मन ल घलव छुही लीप देंव कहिके टरकाय लगिस । फेर ये का ! ये टरकिस नहीं अउ कईसन ये मथनी हर गरू गरू लागिस हे ? 


         जलकुँवर मथनी ल उघार के देखिस । अरे  राम ! कोन एमे ये छीता फर मन ल भर देय हावे । अउ कोन होही सोनकमल के छोड़ ।  चल बने करे हस। खाली माढ़े ये मथनी मन  कुछु काम तो आवत हांवे नही त बस अइसन ही रह जाथिन येमन । एमे छीता फर ल टोर के भँडोत हे । जलकुँवर मथनी भीतर ल दु चार छीता फर मन ल निकाल के देखिस । येहु भी न...आँखी उघरे बिन आँखी उघरे सबो रकम के फर मन ल ले आने हे पकोय के नांव म । आँखी उघरे फर मन पाकहीं अउ बिन आँखी उघरे मन करिया जाहीं...


           महतारी जलकुँवर ये फर मन ल देखतेच रहिस कि वोतकिच बेरा म सोनकमल घर आइस । वोहर कनहुँ अरोस -परोस म गय रहिस ।

"आगय बेटी !"महतारी पूछिस ।

" हाँ...मां ।" सोनकमल महतारी ल ओझी दिस ।

" कहाँ गय रहे ?"

"बस यह दे नन्दिनी बड़े दई करा अउ कहाँ जाबे ।"

"अच्छा ...!"

"वो बईठ न सोनकमल कहके बनेच बेर ल बईठारे रहिस ।"

"ये फेर वो काबर ओ ...?"

"वो कहत रहिस कि प्रभा दीदी के ससुराल जाय के बाद ,वोला बड़ सुन्ना लागथे..."

"वोकरे बर वोहर तोला बइठार के राखथे ।बने बुता करत हव तुमन ।"जलकुँवर कहिस । वोकर गोठ ल थोरमोर रिस पित्त हर झरतेच रहिस ।

"का हो गय माँ ?"सोनकमल वोला पूछिस फेर महतारी हर वोला कुछु नई कहिस । वोकर अन्तस हर चुर गय । अतेक दिन ल कुलकत  रहें मने मन मोर लइका जादा सुघ्घर हे अउ मउका आही तब पलक झपकत शादी -बिहाव बर उठ जाही । फेर जइसन सोचबे वइसन कहाँ होथे । जउन लइका मन ल   हीन मानत रहें मन म ,वोमन उठ गिन का प्रभा का वृंदा अउ येती ये अपन जिद म बाँच गय । अरे नर हो कि नारी ...तन धरे हस तब बिन बिहाव -शादी के कईसन जिनगी कईसन गति -मुक्ति ? महतारी के नैन अब अउ धरे नई सकिस ।

"तँय रोवत हस महतारी ?"सोनकमल कहिस अपन महतारी ल बने खोभिया के अपन बहाँ म भरत...फेर महतारी कुछु नई कहिस । अब सोनकमल भला का कहथिस -  तोर जिनगी म अउ कुछु बुता धंधा -पानी बाँचे हे कि बस सोनकमल के बिहाव करई भर बाँच गय अब ?


             येला सुनके जलकुँवर आँखी डबडबात घलव हाँस भरिस । वो अब नजर भर के सोनकमल के मुख ल देखे लागिस ।

"रो के झन डरवा !सोनकमल तोर फाँस में नई आने वाली ये ।"सोनकमल वोला धमकाय बरोबर कहिस ।

"मंय का कहत हंव ओ दाई ,तोला ?"महतारी जलकुँवर 

कहिस ।

" बिहाव करे बर कहत हस ।फेर एकठन बात बता ?"

" ये बबा !का गोठ ये ओ ?"

"तँय मोला अपन अन्तस म गढ़े -सिरझे "

"... "

"हाँ... के... ना ?"

"हाँ...!"

"मोला  छोटकुन ले बड़े करे ..."

"हाँ...!!"

"फेर का वोहर कनहुँ आनेच घर म जाके जीये बर ये ?"

" बेटी ...सबो तोरे कस सोच दिंहि तब ये दुनिया कइसे चलही ?"

"ठीक कहे फेर सब कोई मोर असन कहाँ सोचथें ? तँय जादा नांव लेथस प्रभा दीदी के अउ मंय जादा नांव धरथों वृंदा के । वोमन के सोंच हर अलग हे। प्रभा दीदी ल बर -बिहाव म कोई तकलीफ नई होइस। वृंदा हर तो बिहाय बर मरिच जात रहिस । अब मन भर पाइस हे ... जटके हे टुरा दिन भर किन्नी असन वोकर से । बन गय महतारी ..."


        येला सुनके जलकुँवर मनेमन  हाँस भरिस ,फेर दिखावटी म थोरकुन मुचमुचा के रह गय ।


*        *           *             *            *


               चौका -आरती बर गुरु महाराज के आगमन हो गय रहिस । महंत जी के संग म अउ आन आन बुता करईया  मनखे जइसन 'सुमिरन ' सुमरत चौका लिपने वाला दीवान अउ गीत -गोविंद उजागर करने वाला दल ।संग म दसेक झन भक्तिन मन घलव रहिन । चल अइसन आनंदी चौका के तो अलगेच ठाठ रहिथे ।


     निछाय मुंडी नरिहर, बीरा पान के संग रंग रंग के चढ़ौत्री ! चारों खूंट जगर मगर दिया मन के पांत...मंझ म विराजिन साहेब । साहेब -बन्दगी के जयघोष ले जगह हर गूँजत रहिस । अइसन  येहर सोनकमल बर पहिली चौका-आरती नोहे । अउ कई न कई पइत ये चौका हर होय हे ,फेर आज के ये चौका आरती हर खास लागत हे वोला ! महतारी वोला जिद करके नावा नावा ओनहा-कपड़ा पहिना दिस हे।


             गुरु वंदना के पर्व चौका आरती शुरू हो गय । पद उपर पद का साखी का शबद का रमैनी । सब के सब  ओसरी -पारी झरत हें । सोनकमल देखथे -महतारी मगन मन सब ल सुनत हे...

करो रे जतन सखी सैंया मिलन की ।

गुड़वा -गुड़िया सूप सुपलिया

तज बुद्धि लरकैया खेलन की ।

देवा पीतर भुइया भवानी

यह मारग चौरासी चलन की।

ऊंचा महल अजब रंग बंगला

साईं की सेज वहाँ लागी फूलन की ।

तन मन धन सब अरपन कर वहाँ

सूरत सँभार पर पैंया सजन की ।।

कहे... पद हर पूरे नई पाय रहिस ,सोनकमल रिस म थर थर कांपत  आगु आ गिस । बस बंद करव साहेब ! तुँहर पांव परत हंव मंय ...! जिंहा देखव तिहाँ बस एकेच गोठ । ये सैंया मिलन के छोड़ अउ कुछु दुनिया म नइये का ?



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                    अध्याय- 20

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     घाम महीना के दिन के, चढ़े कटकट मझनिया वाले ये घाम हर - का मनखे का आन, सबो जीव -चराचर ल थर खवा देय रहिस ।  दुपहरी के ये  मूड़ चघ्घा घाम हर आँच मारतेच रहिस हे, भले ही दिन हर अब खसले के नेत म आ गय हे तब ले भी । 


       अइसन दिन म लइका -पिचका मन ल दूसरांन खाये बर लाग जाथे । बाँचे -खोंचे जेवन...पसिया -पानी ल लइका मन फेर ढरकाथें । रजत घलव मंझनिया के खेला -बुला के घर म वापिस फिर आय रहिस ।वोहू ल अब दूसरांन खाय बर भुखन लागे के शुरू हो गय रहिस ।

"दीदी ...दीदी !"वो अपन दीदी सोनकमल ल हांक पारिस । दीदी हर तो वोला निकाल के पेज -पसिया देथे अउ संग म दुनिया भर के गोठ- गोठियात...वोकर शहर नंगर के रहई ,वोकर पढ़ई जम्मो जिनिस के गोठ बात करत, त कभू हुँकारू देत वोला फेर पेट भर पानी-पसिया पियन देथे । महतारी हर तो सुतत  भर रहिथे । फेर दीदी हर तो आज नई दिखत ये , येती अभी ...तब कहाँ गिस वोहर अभी । अइसन खर मंझन तो वोहर के कभू भी नई निकलय , तब आज कहाँ गिस वोहर ?


       रजत ये परछी वो परछी रेंगत वोला खोझिस । वोहर सुतत महतारी ल उठाना नई चाहत रहिस । अइसन खोझत वोहर मांझा अंगना म जा ठाढ़ होइस । ये मंझ अंगना म लाल मंदार के  विरवा हर गझाय रहिस । विहना कटकट ले गझाय ये लाल मंदार मन लकलकात घाम अउ झरझरात झोला -गरम लू के चलती निच्चट झुरमुरा गय रहिन । येला देखके रजत के जी धक्क ल करिस - दीदी...! रजत के मुख ले बड़ जोर लेके निकल गय ।


        रजत के ये किल्ली -गोहार ल सुनके महतारी जलकुँवर झकनकाके उठ बईठिस -कइसे का हो गय बेटा ?

"दीदी हर ये कोती नई दिखत ये !" रजत कहिस ।

"गय होही कनहुँ कोती । फेर तँय काबर घाम म ठाढ़े हावस ?" महतारी कहिस ।

"दई, देख तो ये लाली मंदार फूल मन कईसन झुरमुरा गंय हें । कनहुँ -कनहुँ मन तो जरे बरोबर हो गय हें ।"

"घाम हर अइसन करत हे दउ अउ ऊपर ले झोला -झांझ हर कतका हे, एहु ल घलव देख ! फेर तँय ऊपर आ भई !"


           महतारी के कहे ले रजत ऊपर आ गय । फेर वोहर अब ले घलव वो झुरमुराय फूल मन ल बरोबर देखतेच रहिस । अब तो महतारी खुद आगु जाके अपन हाथ -मुंहूं धोके रजत बर दूसरांन खाना निकाले लागिस ।


       चारे कंवरा म रजत हर आज के दूसरांन खाना ल खा डारिस । वोहर अब अपन हाथ -मुँहू ल समारत फेर बाहिर म आ गय , फेर वोकर नजर अब ले घलव दीदी सोनकमल ल खोजतेच रहिस । वोकर दीदी ...पड़की -परेवना वोकर दीदी चहकत मैना ! खोजबे तब ले भी ओनहा- कपड़ा म चिटिक धुर्रा नई पावस । वोकर तीर म रहत भर ले बारी के मोंगरा असन कहर हर मन म व्यापे रहिथे । फेर अभी वो  कहाँ गिस हे ? आज के दूसरांन खाय म वो मजा नई अइस, भले ही महतारी हर खाना निकाल के दिस हे, तब ले भी । वो निकाल के राख दिस अउ अंते परा गय,जबकि दीदी हर वोकर खावत भर ल तीर म बईठ के रंग -रंग के गोठ करत रहिथे । वोकर गोठ म पता ही नई चले कतका बेर जेवन हर सिरा गय हे । फेर दीदी हर ये बखत थोरकुन असक दिखथे, अइसन लागथे कि वोहर कनहुँ बहुत बड़े पीड़ा ले गुजर हावे । वो  जादा चुप रहिथे आजकल ।महतारी ल घलव पहिली कस अँकवार म भर के नई हिलोरे नहीं त पहिली महतारी ल अँकवार म भर के, त कभू कोरा म उठाके येती ओती किंजार देय अउ ये महतारी छोड़...छोड़ कहत रहि जाय । येकर ले बढ़के वोहर महतारी ल कतको बेरा...कइसे जी जलकुँवर ! कहत नांव धरे अउ महतारी हर नकली रिस म मारतेच लिहां छोकरी ! नांव धरथे जइसे सखी सहेली आँव कहत चटकन उबाय तब वोहू ल घलव बने लागे । फेर ये बतर महतारी अउ दीदी के खुल्ला गोठ बात हर नंजर नई आय । कहाँ चल देय हावे दीदी अभी ! वोतकी बेर एकठन बड़ जोर के बड़ोरा आइस अउ अंगना के जम्मो कुम्भलाय मंदार के  फूल मन गिर गईंन भुइँया म...येला तो होना ही रहिस ।


            रजत के मन आज ये दूसरांन खाके खेले -बुले के नांव म फेर वापिस जाय के नई करिस । वोहर घर के उपर तल्ला कोती चढ़ गिस । घर के उपर तल्ला म घलव  कईठन खोली हावे ।वो खोली म बबा हर चढ़े सकत भर ल आके सुते ।आज बबा अउ बई तो ये खोली के पाखा म फोटो बन के टँगा गय हें ।अउ वोई खोली के दरवाजा खुला दिखत हे ...


        रजत  वो खोली के तीर म आ गिस अउ देखिस -दीदी सोनकमल बिस्तर म पट सुते हे ।  वो जागत हे कि सुत भुलाय हे तेकर पता नई चलत ये । रजत वोला आवाज देना उचित नई समझिस ... मां ...मोला रास्ता देखा ! मोला रास्ता देखा ! सोनकमल के मुख ले ये स्वर हर अब्बड़ धीरन्त निकलत रहय । वोकर माथा हर एकठन चौड़ा कॉपी के आधा खुले पन्ना म टिकाय रहे फेर वोकर मुख ले... मां... मोला रास्ता देखा...मोला रास्ता देखा... बरोबर निकलत रहय ।


          रजत दीदी के ये हालत देख के थोरकुन डरा घलव गय । वोहर तुरतेच लहुटा पांव वापिस फिर के महतारी करा आ गय अउ जम्मो हाल सुनाइस । महतारी घलव अबक्क हो गय सुनके ये  गोठ ल अउ चलतो बताबे कहत रजत संग म खुद उपर चढ़ आइस । फेर येती सोनकमल के मुख ल बरोबर वइसनहेच गोठ निकलत रहय...मां मोला रास्ता देखा...मोला रास्ता देखा !


      महतारी घलव येला सुनके बिपतिया गय ।वोहर रजत के हाथ ल धर के खुद वोकर तीर म आ गिस -बेटी ! सोनकमल !!


           सोनकमल पलट के देखिस । वोकर दुनों आखीं म आँसू हर पांच -परगट दिखत रहय ।महतारी एला देखिस त तड़प उठिस !

"का हो गय बेटी ?"

"..."

" कोन तोला का कह दिस ?"

"..."

" अं... अइसन चुप रहिबे तब कईसन काम चलही । काबर तँय रोवत हस ?"महतारी कहिस,फेर सोनकमल कुछु नई कहिस । तब छोटे भाई रजत हर आगु जाके वोकर हाथ ल धर लिस, वोकर हाथ म धरे किताब पलट गय । फेर वोमे ल एकठन फोटो गिर परिस । वोकर किताब ल अइसन फोटो गिरत देखिस ,तब कुछु होनी -अनहोनी के डर ले महतारी के सरबना सूखा गय । वो झपट के ये फोटो ल धर लिस...त ये बात हे ! काकर फोटो ये हर ? महतारी  वो फोटो ल देखिस ,बने नजर गड़ा के ।

ये ...! ये बबा रे !! ये काकर फोटो ये ? अबगा निच्छट थुलथुल डोकरी ...माथा म रेखेच रेख अउ  झक्क सादा ओनहा !

"मदर टेरेसा ! मदर टेरेसा... !!" रजत वो फोटो ल चिन्हत  चिल्लाइस ।

"कोन...!कोन ये येहर ? का तँय येला चिन्हथस ?" महतारी तो अकबकाइच गय रहिस । 

"तोर छोड़के, कोन नई जाने दुनिया म येला ?" रजत प्रश्न के उत्तर प्रश्न म ही दिस - ये हर महान संत मदर टेरेसा ये । इसाई धर्म मानने वाला मन के संत ।"

"खाली ईसाई भर मन के अउ कुछु नोहें येहर ...?"बड़ बेर बाद म सोनकमल के मुँहू खुले रहिस । वो गूंगवात नजर ले छोटे भाई अउ महतारी ल देखिस ।

"अच्छा...नोनी ,तब तँय मदर ल कहत रहे...मां... मोला रास्ता दिखा मोला रास्ता दिखा...कहके ।" रजत वोकर तीर म जाके कहिस ।

"कइसे बेटी का बात ये ? ये ईसाई मनखे कब ले तोर महतारी बनगे चोरी लुका । तोर अपन महतारी मर गय का ?" जलकुँवर रोवत -हांसत कहिस ।

" तँय मोर महतारी अस अउ येहर संसार के महतारी ये ... जग जननी आय, मोर आराध्या ये जइसन तँय हर  उस जइसन ये पाखा म टँगाय ये  मोर बई हर रहिस ।... अउ रहिस बात मोर ईसाई बने के तब कान खोल के सुन ! मैं कबीर -साहेब के उपदेश ल मानने वाला फेर खाँटी सनातनी हिन्दू घर के बेटी अंव अउ ये धरती म जावत ल हिन्दू ही रईहां ।मैं वैष्णवी अंव अउ वैष्णवी ही रईहां। फेर येहर मोर आराध्या आय । येहर हमन बर अपन जीवन ल होम चढ़ा दिस । येहर मोर बर तोरे कस महतारी आय !"

"बढिया बात कहे ! सब झन सब ल मानी का हर्जा हे का खर्चा हे ।"महतारी कहिस,"फेर अइसन का गोठ आ गिस जउन ल लेके तोला दुखियारी बनके इहाँ ऊपर पटाव म चढ़ के ये बई -बबा के आघु म रोय के जरूरत पर गय रहिस । ये आदि भवानी ल सुमिरै बर लाग गिस ।" 

"..."

"बता... बता ?"

" मंय अब का करंव ?"

" बेटा बरोबर बईठ अउ बईठ के खा ! मंय अब तोर आगु म शादी -विहाव के नांव नई  धरंव ।फेर अब तँय रो झन ।"महतारी कहिस। एला सुनिस  तब एक पइत सोनकमल महतारी के मुख ल देखिस ,तहाँ ले फेर मदर के फोटो ल देखे लागिस । जाने माने कहत रहे ये काया ल हरियर तँय राखबे खाना -खुराक देके अउ आत्मा बर रस्ता ये बताय ...


        तभे वोमन ल गली के वो पार के घर म किल्ली -गोहार सुनई परिस । "लागत हे सोनमत बहुरिया के देंहे उसल गय हे...वो तो दिन पुरताही आ गय रहिस हे । हे भगवान ! वोला पार लगा । ए नावा देवी दई ! वोला पार लगा ।" महतारी हाथ जोरत कहिस ,फेर सोनकमल के अन्तस म जिगिम ल करत कुछु जिनिस उतर आइस हे जइसन कनहुँ जगह बिजली गिरिस हे सब कोती हर अंजोर हो गिस हे । 


    वो बड़ मजबूत कदम ले तरी उतरत...गली पार करके,उहाँ जाके सोनमत बहुरिया के बहाँ ल धर लिस ।सोनमत वोला पोटारत वोकर बहाँ म ओरम गय अउ बल पाके अगम -दरहा ल पार हो गय ।


           महतारी जलकुँवर तो पाछु आके  नावा पहुना ल धर लिस । तब फेर वोला सोनकमल ल दे, एकठन थारी ल ठिन... ठिन बजाय लागिस ।

तब तक तो बनेच नारी परानी मन जुर गय रहिन उहाँ । 


         सोनकमल मुड़ ऊपर करके अगास कोती ल देखथे ...  अंगना म अभी- अभी अंगरा म नाय धूप ले उठत सादा कहरत सादा धुंआ के लोल हर ऊपर कोती चढ़त रथे...जाने माने येहर रास्ता ये 'मदर' के पीछू- पीछू चलके अपन मुकाम पाय के ...



             

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              अध्याय 21

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      धरती म   ए बरस के बरखा के पहिली बूंदी मन परिन । घाम महीना भर के भँभाय धरती हर तो अब सोन सोन कहर ल उगले के शुरू कर देय रहिस । अइसन पानी ल पट पट गिरत देखिस तब सोनकमल कोला- बारी कोती आ गिस अउ छोटे भाई रजत ल हाँक पारिस । तब रजत घलव काये...दीदी कहत वोकर तीर म आ गय । सोनकमल अब ले भी पानी के परथमहा बूंदी मन ल अपन मुड़ म लेवत मगन रहिस ।

"का ये दीदी...?" रजत घलव ये बछर के पहिली बरसात के बूंदी मन ल अपन हथौरी मुड़ म झोंकत कहिस ।

"आसाढ़ आगे...!"सोनकमल कहिस ।

" आसाढ़ आ गय माने पानी गिर गय ।" रजत वइसनहेच पानी के बूंदी मन ल झोंकत कहिस ।

"आसाढ़ आ गय माने पानी गिर गय माने बेंगचा नरिया गय माने मंजूर नाच दिस माने बिजुरी चमक गय माने बादल गरज गय माने..."सोनकमल छोटे भाई के हाथ ल धर के चकरी किंजरत कहत रहय ।

"माने माने अउ माने का दीदी ...?"रजत घलव खुश होवत कहिस ।

"...माने स्कूल खुल गय !"सोनकमल हांसत कहिस ।

"हां ...वो बात तो है दीदी ।"

"...माने गांव छोड़के शहर जा बाबू ।"सोनकमल कहिस, तब रजत के पांव रुक गय ।

"...माने राखी पुन्नी रक्षाबंधन बर फेर घर आ !" सोनकमल वोला वइसनहेच हिलोरत कहिस ।राखी पुन्नी के गोठ सुनके रजत ,फेर खुश होइस , नहीं त शहर जाय के नांव म वो थोरकुन उनमुनहा हो गय रहिस ।

"बरसा ऋतु माने धान पान के समे।धान पान बने होही, तब तो भर पेट अउ पेट भर खाबे, बाबू ।" सोनकमल कहिस ।

" हाँ दीदी ! बरसा ऋतु हर सबो ऋतु में के राजा आय, बसन्त हर नहीं ।"

" जो प्रतिपालहीं सोई नरेशु..."

"मतलब...?"

"रमायन-पोथी म लिखाय हे ...जो पोसही ,वई हर राजा ये ।"

"गजब कहे ...!

" मंय का कहें...जउन कहिन हें वो तुलसीदास महाराज आँय ।"सोनकमल हाँसत कहिस ।

"चल दीदी !बहुत गोठ -बात हो गय बरसा ऋतु बर ।तहुँ नहा डारे अउ महुँ ...!"रजत सोनकमल ल वइसनहेच खेल- खेल म हिलोरत कहिस ।

"खाली तंय अउ मंय कि अउ कनहुँ आन ?" सोनकमल पूछिस।

"हम सब नदी -पहाड़ , वन -डोंगरी , सबो रुख -राई सब के सब नहा डारेंन ।" रजत , वोकर गोठ के ओझी दिस ।


          वोतकी बेरा ददा घर हमाइस ।वोहर कत्थु बाहिर गय रहिस ,उहाँ ल आवत रहिस ।वोकरो ओनहा हर आधा भीजे आधा सुक्खा दिखत रहय।

 "अरे लइका हो ...! तुमन काबर भीजत हव जी !मंय तो ये नांगर लोहा पजवाय गय रहंय अउ तुमन ये घरे म सोझे- सोझ म भीजत हव भाई ।" वो कहिस ।

"बेटी सोनकमल ! तोला दई के गोठ के सुरता नई ये का जी !" ददा फेर कहिस।

" ददा, का गोठ ...?"

"बरसाती पानी ल सकत भर ल मूड़ उपर झन लेय, अइसन करे ल  सीधा जर -जुड़ के खतरा रहिथे।"

" ददा, तोर बेटी ल जर -जुड़ नई अमराय । तोर बेटा ल नई कहे सकाय ।" सोनकमल अब ले भी छोटे भाई रजत के हाथ ल नई छोड़े रहिस ।

"वाह रे दीदी... ददा के बेटी माने तोला जर -बुखार नई आमराय,अउ ददा के बेटा ल यानि कि मोला जर -बुखार अमराही ! ठउका कहे तँय ।" रजत घलव वोकर हाथ ल हिलोरत कहिस ।

"बस भाई अब बंद करव ये बरसा स्नान । कनहुँ ल नई अमराय जर -जुड़ ! ठीक न ... " ददा कहिस अउ नांगर लोहा मन ल सँभालत आन कोती चल दिस ।


           येती सोनकमल रजत ल धकेलत -खींचत सुक्खा म ले आनिस अउ वोहर खुद भीतरी म जाके सुक्खा ओनहा पहिन लिस ।फेर रजत हर अब ले भी अपन गिल्ला ओनहा ल डांटेच रहिस ।

"ए दउ ! तँय तो मोला ददा करा ल मार खवाबे...तोला जर -जुड़ अमरा दिही तब ।चल सुक्खा ओनहा पहिन ।" सोनकमल  छोटे भाई ल थोरकुन डपटत कहिस ।

"ठीक हे दीदी ,तँय कहत हस तब मंय कपड़ा बलद लेत हंव,फेर तोला मंय ददा करा ले मार खात कभू नई देखे हंव ।"रजत मुड़ के पानी ल झर्रात कहिस ।

"फेर मंय तोला देखे हंव थपरा खात ।"सोनकमल  थपरा उबात कहिस ।

"वह तो मोर ये चेथी हर सिझ गय हे, ददा के थपरा खात ।" रजत अब ले भी मौज म रहिस ।

" लबरा अउ लफ्फरा ...अरे !ददा हर एको दु रहपट तोला  छुवाय हे, वोहू ल जादा डिंगरई करे हस तब नहीं त वो बोपरा हर कोन ल लागथे, बता भला ।"

"तँय बता भला ...?"

"टुरा बांड़ा भला मंय का बतांहा ...!"

"तँय वो दिन...रोवत मदर ल गोहारत कुछु रास्ता दिखा दई... कहके कलपत रहे ।वो का रास्ता बताइस तोला ...चिटिक हमु सुन ली ।" रजत ठउका सुरता करत कहिस ।

" सच्चा हिरदे ले सुमिरें रहें मंय । तँय नई देख पाय... एक सेकंड नई लागिस ,वो मोला डहर सुझा दिस हे बाबू । अब वो डहर म मोला चलना हे ।"सोनकमल के हाथ तो अब अपने आप जुर गय रहिस ।

"का डहर ये, दीदी ?चिटिक महुँ तो सुनों ।" रजत अचरज म  भर गय रहिस । येला सुनिस तब सोनकमल वोकर तीर म जाके ,वोकर कान म फुसुर -फिया करिस । येला सुनके पहिली रजत मुंहूं ओरमाय कस करिस, तहाँ ले फिर हाँसत दीदी के पीठ ल एक मुटका जमा दिस -शाबाश दीदी !

"ये दई ओ ! फेर तोर शाबाशी हर महंगा पर गय , भई ।"सोनकमल कुहरत कहिस ।

" बलांव   भैया ल ?बाँचे खोंचे ल वो पूरा कर दिही ।" रजत वोला बिजरात कहिस ।

"अरे , वो तो पीटत -पीटत  थक गय न !अउ कतेक पिटही ।" सोनकमल कहिस, "दउ कहे लागबे न  ददा अउ दई करा ?" 

"घबरा झन ! जब तँय मदर ल अतेक मानत हस, तब वोइच हर डहर बनाही ।"रजत कहिस, तब वोकर सियनहा बरोबर गोठ अउ मुख मुद्रा ल देखके सोनकमल ल बड़ सुख - आनन्द मिलिस ।

"चला आवा जी लइका मन !"ददा हर हाँक पारिस ।

"काबर ददा ?" रजत ये हाँका ल सुनके पूछिस ।

"इया अब कुछु खइहा -पिहा कि खाली गोठेच बात म माते रइहा ,फेर ये गोठ मंय नई कहत अंव भई ! ये गोठ ल मंय तुँहर महतारी के बदला म कह देत भर हंव ।" ददा हाँसत कहिस । येती ये दुनों -भई बहिनी घलव ,ददा के अतेक लंबा गोठ लमई ल सुन के हाँस भरिन । वो दुनों घलव सिरतो म आ तीर आ गिन ।  रसोई खोली कोती ल  चुरत तेल के कहर आय के शुरू हो गय रहिस ।

"दीदी...टेस्टिंग , दीदी...टेस्टिंग ! मोर ये नाक हर मोर घ्राणेन्द्रिय हर कुछु बनत चीज के टेस्टिंग करत हे ।" रजत बहिनी करा बेलबेलात कहत रहय ।

"हाँ...भई ! मोर कान हर मोर श्रवणेन्द्रिय हर कुछु जिनिस, जइसन तीपत- खौलत तेलई म कुछु जिनिस ल नाँय के अवाज चाँय...चनन ल सुनत घलव हे । मोर कान हर घलव तोर नाक कस टेस्टिंग करत हे।"सोनकमल घलव रजत के सुर म सुर मिलात कहिस ।

"अरे , तुमन के नाक -कान हर टेस्टिंग करते रहय ।  येती तो मोर जीभ हर टेस्टिंग करिच डारिस न...!" ददा अपन कटोरी ल वोमन के आगु म मढ़ात कहिस ।

"ओ...हो बरा !"रजत कुलकत कहिस,"फेर काय खुशी म ?"

"तोला बरसत पानी म भिजे के खुशी म...!" ये पइत रसोई खोली ल बरा के छोटकुन टुकनी धर के निकलत महतारी कहिस ।

"बेटा रजत ! खा ले महतारी के हाथ ले बरा- सुंहारी  अउ गुलगुल भजिया । येहर तोर बर समझ  नेवता -भगता ये ।जाय बर हे अब गंवतरी...जाय बर हे शहर-नँगर अपन स्कूल पाठशाला !" ददा रजत ल रिझात कहिस ।

"ददा तब मोला नई मिले गुलगुल भजिया ।"सोनकमल घलव खुश होवत कहिस ।

" अरे तोर ल बाँचही तउन ल बोपरा रजत पाही जी !" ददा हाँसत कहिस ।


     दुनों भई बहिनी अपन -अपन आसनी म बईठ गिन अउ जइसन रहिस तइसन खाजी मन के भोग लगाईन । बहिनी सोनकमल आज भई ल छोड़बे नई करत ये...

"दई ...!"सोनकमल कहिस ।

"हाँ बेटी...का हो गय ? यह दे एईच करा तो हंव ।" महतारी कहिस ।

"मोला दस रुपया देबे ?"

" इया ! वो काबर ओ ?"

"चॉकलेट -चुटुर खाँहा ।"

"ले लेबे ।"

" दई ! मोला सौ रुपया देबे ?"

"वो काबर ?"

"चुटकी -मुँदरी लिहां ।"

"ले लेबे भई ।"

"दई मोला हजार रुपया देबे ?"

"वाह !तोर हर तो बढतेच जात हे ...येला का करबे ?"

"नावा डरेश  बिसाहाँ ।"

" येहु ल लेबे ।"

"दई..."

"ये बबा अउ कुछु कहिबे काय ओ ?"महतारी जलकुँवर अब तो खलखलाके हाँस भरिस ।

"दई ...बस एके पइत कहन दे न ! वो छेवर आ गय हे ।"

"चल कह काय ये तउन ल ?"

"मोला लाख रुपया अउ देना ।"

"ये बबा रे ! लाख रुपया !! कुछु दुकान खोलबे का जी ?"महतारी अपन मुखमंडल म अचरज के भाव लानत कहिस ।

"नहीं दई !महुँ  अउ पढ़े बर भरती होंइहा कहत हंव ।"सोनकमल कहिस अउ ददा के मुख ल देखे लागिस ।

"अउ काय पढबे बेटी !नेंगहा तो पढ़ डारे हस न ।"महतारी कहिस । वोकर मुख म थोरकुन चिंता के  रेख जरूर दिखे लग गय रहिस ।

"बस दई ! नेंगहा ही तो पढ़े हंव न ।"सोनकमल कहिस ।

"बेटी, फरिया के बता , काय कहत हस तउन ल ।" ये पइत ददा कहिस ।

"ददा मोला अउ पढ़न दे । ये पइत नर्सिंग पढ़हां ।"सोनकमल कहिस ।

"बेटी...सब ल गुनें बर लागही ।रुपया -पैसा हाँसी ...निंदा..."महतारी जलकुँवर कहिस ।

"गौटिन !तँय वह दिन एला कहत रहे न... अउ का करबे ! बेटा जइसन बईठ के खा ! " ददा कहिस ।

"हाँ...कहे होंइहा ! अउ अभी घलव कहत हँव ।"

"जब येहर बेटा असन बईठ के खा सकत हे तब बेटा जइसन अउ पढ़ नइ सकत ये का ?"ददा कहिस,तब फेर सोनकमल ल कहिस, "बेटी तोर जतका मन लागही वोतका पढ़ !जो मन लगे वो पढ़ ! कतको लागे खरचा के फ़िकर नई ये ।" ददा कहिस । 


     तभे ठंडा जुड़ हवा के एकठन झोंका वो करा आ गय रहिस । सोनकमल मने- मन जोहारत अगास कोती ल देखत रहिस तब ।



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           अध्याय 22

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"अरे ,उठ गौटिन !तँय काबर रो मरत हस । हमर लइका मन कनहु आन तान थोरहे गिन हें...पढ़े बर गंय हें ।" आत्माराम गौटिया सोनकमल के ददा ,वोकर महतारी जलकुँवर गौटिन ल समोखत रहे ।

"टुरा के तो फिकर नई ये,सोनमकल के ददा !फिकर मोला होवत हे ये नोनी जात के । एहर अतेक दिन ल मोर अंचरा के छईंहा बरोबर मोर संग म रहिस । अतेक पढ़ई -गुनई ल इहेंच घर म रह के नून -बासी खा के पढ़ डारे रहिस । आज पहिली बेर एहर मोर ले अलग होइस हे, तभे मोर जी हर छूटत हे ..."जलकुँवर कहिस अउ बमफार के रोये लागिस ।

" ख़ईता जिनिस बर मन ल छोट झन कर ! लइका मन पढ़े के नांव म गंय हांवे । बेटी ल पठोनी नई पठोय हस । अउ पठोनी काकर ?मोर लइका बर -विहाव म चिभिक नई लेत ये , तब वोला काट के थोड़हे फेंक देबे घर ल । एक पइत जिभिया दे देय हावस...बेटा बरोबर रह अउ बईठ के खा ! तब वोइच म रहिबे सब दिन..."सोनकमल के ददा आत्माराम ,वोकर महतारी ल समोखत कहिस ।


        जलकुँवर ये खोली ल निकल के वो खोली वो खोली कोती किंजरिस , तब  सोनकमल के खोली ल देख के फेर रोइस । 

"जलकुँवर...!"आत्माराम थोरकुन जोरलगहा हाँक पारिस ।

"हाँ..." वो बस अतकिच कहे सकिस ।

"येकर पहिली दुनों लइका पढ़े-गुने के नांव म कभू एके संग निकले हें कि नहीं ,चिटिक बता तो ..."

"..."

" दुनों लइका निकलें । सोनकमल हर सांझ होवत ल तोर करा वापिस आ जात रहिस..." 

              आत्माराम के ये गोठ ल सुनके जलकुँवर बक्क ल वोकर मुँहू ल देखिस कि अब आगु ये का कहना चाहत हें ।

"गौटिन...ये पइत ये लइका हर सांझ के नई फिर के समझ ले महीना -दु महीना के गय ल आही ।"आत्माराम वोला कहिस ।

"आजे चिट्ठी -पत्री लिख देव ...शोर -सन्देश भेज दव, राखी पुन्नी बर मोला दुनों लइका अंगना म चाही ।" महतारी जलकुँवर बने पोठ कहिस ।

"तोईच्च ल चाही कि अउ कनहुँ आन ल नई लागत होही ।" आत्माराम कहिस,तब येला सुनके जलकुँवर घलव हाँस भरिस ।

"चल...चल बने चिक्कन चिक्कन राँध पसा !लइका मन भागिन हें, अब हमन मन भर के खाबो ।"आत्माराम गौटिया फेर कहिस ।

"...जाने माने लइका मन तुंहला चिक्कन चिक्कन खाय बर रोक देय रहिन ।" जलकुँवर तो येला सुनके हाँसिच डारे रहिस ।

"वोमन के रहे ले बाँटा नई हो जात रहिस जी !" येला सुनके जलकुँवर कुछु नई कहिस अउ सिरतो म चूल्हा कोती चल दिस । चिक्कन चिक्कन न सही अलवा -जलवा सही पर  कच्चा -पक्का रसोई तो उतारेच बर लागही न ।


        जेवन पानी के बाद  सोनकमल के बाबू आत्माराम , घुरूवा म  बाँचे- खोंचे गोबर -खातु ल खेत म रितोय बर अपन ट्रेक्टर लेके निकल गय । ट्रेक्टर जोरने वाला बनिहार मन तो पहिलीच ल पहुँच गय रहिन । उंकर जाय के बाद महतारी जलकुँवर अकेला हो गय घर म  । घर हर फेर भाँय भाँय करिस वोला घर जइसन लील खाही वोला !

"काकी ...हावा घर म ?" खोर मुँहटा कोती ल अवाज सुनई परिस ।

"हाँ ...आवा बेटा !" जलकुँवर अवाज  ल चिन्हत कहिस ।  वो तो गजपाल रहिस । वोहर अब भीतर आ गय ।

"कका कहाँ गिस...?"वो हर कुर्सी म बइठत पूछिस ।

"टेक्टर ले के निकलिन तो हांवे बेटा ! बहरा -नार कोती ले गिन होंही ।"

" अउ का पढ़े चल दिस सोनकमल हर ? कतेक पढही वोहर ?" गजपाल सदाकाल कस अपन भर्रहा सुर म बोलिस । येला सुनके जलकुँवर के माथा फिर ठनके लग गय ।अरे !  कुटुंबदारी के नाता गोता सोनकमल के  बड़े भई वोकर कुरा ससुर बेटा ...फेर येहर ओमन के ओझी -बझी म सदाकाल अपन हक्क जान के बुडे रहिथे । का कहे जाय एला !

"हाँ...अउ पढहाँ कहके शहर म वोहू भरती हो गिस हे ।" महतारी जलकुँवर कहिस ।

"सुनत हँव...वोहर नर्सिंग पढ़े के नांव म गय हे।"

"वोतेक तो जादा नई जांनव मंय बेटा !फेर वोकर गोठ बात हर अइसनहेच निकलत रहिस ।"

"वोतेक भोली मत बन काकी ! हजाबे तब जानबे ।"

"का जिनिस ल हजाय के बात करत हव बेटा ?"

"अउ का ला ? अपन लइका ल अउ कोन ल !" गजपाल अपन जगहा म अलथी- कलथी लेत कहिस । वोकर गोठ ल सुनके जलकुँवर तो भरभरा उठिस... वोहर भभकिच गय ।  एक पइत वोकर मन होइस कि येकर मुँहू च म कह दों कि तँय तोर ल देख हम ल अपन ल देखन दे । फेर रिस ल पीयत आगु पाछु ल सोंच के कुछु नई कहिस । वो कुछु नई कहिस त का होइस ?गजपाल तो  चुप रहे नई आय रहिस ...

"काकी हमर कुल- खूंट का नाता- गोता तक म कनहुँ लड़की नस बाई नई बने यें अउ तँय बड़ मजा ले वोला नस बई बने बर भेज देय ।"वो अतका कह के एक घरी बर  चुप हो गय ,फेर वो तो चुप रहे बर आय नई रहिस - नस बाई नर्स माने का ? सबके...

" सबके....का बेटा ?" जलकुँवर गजपाल के अधूरा अउ भेदहा गोठ ल सुनके एक पइत फेर भभक गय रहिस ।

"सबके सेवा करने वाली  अउ का... ?"गजपाल अपन गोठ ल सुधारत कहिस ।

"सेवा करइ हर तो कुछु गलत नोहें बेटा ?"

"कुछु हर गलत नोहें काकी अउ सब हर गलत होत हे। अइसन सेवा करे बर कोरी- खईरखा आन टूरी- टुरा मन परें हें । बलराम गौटिया बिरिज गौटिन के फूल ले  अउ जादा सुंदर नतनिन ल आने के सब ऊंच -नीच साफ करने वाली नर्स  नस बाई बने के जरूरत नइ रहिस ये ।"

"तब का के जरूरत रहिस...?"जलकुँवर के मुख ले तुरन्तेच  निकल गय ।

"वोला बावनगढ़ी के गौटिया खानदान के कुलवधू मोर संगवारी दलपत के जीवनसाथी बनके हमर मुंड ल ऊंच करे के जरूरत  रहिस ।" गजपाल अउ मजबूत बइठत कहिस ।


       दलपत जइसन पूंजी -रुंजी म पोठ न सही फेर कनहुँ आन सधारण सुंदर लइका के हाथ म येला सौंप के वोहू मन सुछिंधा हो जाय रथिन, फेर ये लइका हर अइसन कहां करन देत हे । अतेक पढ़े गुने के बाद घलव अब अउ आगु पढहाँ कहके वो खुद शहर  चल दिस हे ।वोहू मन वोकरेच इच्छा ल समर्थन करिन हें । आजकल के जमाना...! कहे  के लइक बिल्कुल नइये ! थोरकुन ऊंच -नीच हो  जाही तब कुछु होनी -अनहोनी झन हो जाही , ये जिनिस के बड़ डर लागथे ।


           गजपाल हर काकी ल थोरकुन चुप देखिस तब जइसन मउका पा गय वोहर । वो भड़भड़ात कहिस - काकी , पीछू पछताय ल का फायदा ? धर -बांध के वोकर विहाव ल कर दे । ससुराल जाही तब वोकर सब चोचला हर निकल जाही ।


          येती जलकुँवर सुनत भर रहिस गजपाल के उपदेश -सिखोनी  ल । वोहू ल अब समझ नई आत रहिस कि का सही ये का गलत ये । जाने अनजाने वोकर हाथ अपन मुड़ म चल दिस ।

"मुड़ ल धरबे त का पाबे काकी !  मंय जइसन कहत हंव तइसन कर । कका ल भेज शहर । वो जाके वोला -समझा बुझा के ले आनही । चौमास कटन दे । जेठानी तिहार के बिहान दिन मंडवा !

दलपत हर आज ले घलव वोला अगोरत बईठे हे ।  तँय हां...  कह कि वोती बरात अइस समझ !

"बेटा ! तूँ ठीक कहत हावा ।फेर ये गोठ ल तुँहर कका ल पियान  देवा पहिली ।"जलकुँवर अतकिच भर कहे सकिस ।

"नई मानही न राखी पुन्नी बर वोला आवन दे । आही वोकर बाद वोकर जाना बंद !मोला बलवाबे एक थपरा म वोकर अकल ठिकाना नई लान दिहुँ तब मंय भी कोन गजपाल अंव ।" गजपाल तो अपन गोठ के असर होवत देख अब तो मुचमुचात रहिस ।

"ले काकी अब तँय बईठ ! अब मंय जावत हंव । मोला जइसन लागिस मंय कह देय हंव । दलपत हर घलव अतेक लंबा तपस्या कर डारे हावे वोकर बर । वो घलव अइसन म चुप नई बइठे । कुछु ऊंच -नीच हो जाही तब तँय मोला दोष झन देबे ।" गजपाल कहिस तब तो येला सुनके महतारी जलकुँवर के जी म डर समा गय ।


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         अध्याय 23

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            दई हर तो घुँच गय रहिस हे गजपाल के गोठ ल सुनके फेर ददा हर छाती अड़ा दिस कि मोर  बर का बेटी के का बेटा ! दुनों मन पढ़बो कहिके आगु बढ़त हें , तब मंय कोन होवत हंव वोमन ल छेंकने वाला ? एक पइत जिभिया देवा गय लइका ल कि तँय तन पा गय बेटी के त का हो गिस ! बर -विहाव कर के परगोत्री बने के तोर इच्छा नई होवत ये  तब बेटा बरोबर बईठ के खा ! अउ मर- मिट जाबो तब बेटा बरोबर खाँद म बोहो के ले जा माटी -पानी दे मुखाग्नि दे ! सब कथें अतेक सुघ्घर नोनी हर येकर संग बढिया फभे रहिथिस, वोकर संग बढ़िया फभे रहिथिस ; वो तो बढ़िया गोठ आय, फेर जब  शादी -बिहाव ल करने वाला हर ही तियार नइये , तब जबरन वोला काट के थोरहे फेंक देबे ? रहिस बात वोकर नर्सिंग पढ़ई के ! आज तक हमर ये गौटिया कुल -खूँट म कनहुँ नोनी हर  'नस बई' नई बने यें । हाँ... बड़े साढू भाई के भतीजीन हर डॉक्टरिन जरूर बन गय हे। डॉक्टर अउ नर्स म फरक तो होबे करथे, फेर डॉक्टरी पढ़े के सब ल मउका घलव नइ मिलय अउ लइका हर नर्सिंग पढ़े के जिद कर दिस । एमे का 'पन' बुड़े के बात हे । ये गौटियापा आंट  वाले मनखे मन ल का कहिबे जउन मन लागिस  वो कह दिन... अउ ये बुता हर घलव  बढ़ पवित्र बुता आय ।  छोटे -बड़े  सब के सेवा करे के मउका मिलही । अउ नर के सेवा हर नारायण के सेवा ही ये ; तब बेटी पढ़ लिस नर्सिंग अउ आज वोहर सरकारी अस्पताल म पक्की नर्स बन गय हे ...!


      सोनकमल के ददा आत्माराम के चेहरा म विजेता के भाव आ गय । चल बेटी हर सिध्द हो के आवत हे । वो सिद्ध हो गय , वोकर पढ़ई हर सिद्ध हो गय । सादा डरेश म कईसन दिखत होही सोनकमल हर ?

"ददा...!"सोनकमल के खनकत अवाज सुनइ परिस । वो तो ददा के आगु म आ खड़ा हो गय । ददा देखिस...नजर भर के... झक्क सादा बादर बीच रगबग ले उबके चंदा फेर पूरा साड़ी पिंधे के सेथी महतारी बिरीज गौटिन के रूप हर दिखत हे येकर रूप म... !

"दई ...!"आत्माराम हाथ जोरत कहिस ।

"दई...फेर काकर ददा ?"

"मोर ...अउ काकर ?" ददा आत्माराम कहिस । वोकर तो आँखी भर आय रहिस । निज ददा ल अइसन डबडब देखिस तब सोनकमल कूद के जाके वोला पोटार लिस । आत्माराम घलव  छोटकुन लइका बरोबर वोकर बहाँ म सपट गय । अपन महतारी के कोरा हर वोकर बर साक्षात रहिस । बड़ दिन बाद महतारी के कोरा के सुख वोला मिलिस हे... गुनत रहिस आत्माराम ! चल...अब हो गय मिल -भेंट...आत्माराम मन म कहिस। कोन जानी कतका बेर के चले हे लइका हर ?पानी -कांजी कनहुँ करा पिए हे कि नहीं ?

" गौटिन पानी दे न जी ! देख तो कोन पहुना आय हे ।" आत्माराम गौटिया कहिस , फेर चिट -पोट कुछु नई सुनाइस, तब वोहर लहुट के देखथे ...अरे ! जलकुँवर गौटिन तो एइच जगहा म ठाढ़े हे लोटा भर भर पानी ल धरके ।

"तहुँ ओ मां...!"सोनकमल कहिस अउ सदाकाल कस महतारी ल अपन कोरा म उठालिस , फेर महतारी आज अब उतार अब उतार नई कहिस । वोला लागत रहिस क़ि ये कोष-खजाना जउन हर छूट गय रहिस ,वोला वोहर फेर भेंट डारे हावे ।

"उतार बेटी उतार ये  एक कुंटली ल !"बाप चुहल करत कहिस ।

"कहाँ के एक क्विंटल ददा  !ये तो अबगा हरु हो गय हे..." सोनकमल महतारी के आँखी म आँखी मिलात कहिस,तब तो जलकुँवर लजा मरिस । का करही वो ... विधाता हर ये भद भद मांस ल देइच मरत हे तब ।

"उतार येला !"ददा थोरकुन जोरलगहा कहिस ।

"नईच उतारों ददा !जब तक ये उतारे बर नई कहहि तब तक ।"सोनकमल अब महतारी ल अपन खाँद डहर सरकात रहिस ।

"ये उतार भई अब !"महतारी वोकर चकरेठी पीठ म हल्का- हल्का मुटका मारे के शुरू कर देय रहिस ।

" ले अब कहत हस तब..."सोनकमल कहिस अउ महतारी ल भुइँया म उतारिस ।

"छोकरी बांड़ी ! आधाजियाँ कर डारथे ।"महतारी जलकुँवर बनावटी रिस म मुचमुच हाँसत कहिस । अब तो सोनकमल दई अउ ददा , दुनों ल अपन एक- एक अँकवार म धर के खड़ा हो गय ।

"बचा के राख बेटी...!"महतारी थोरकुन डपटत कहिस ।

" का हर सिरा ही माँ ! सोनकमल के ये  अपन दई -ददा बर आदर अउ मया हर खतम होने वाला नोहें ।"सोनकमल कहिस । आत्माराम गौटिया तो समरथ बेटी के सामर्थ्य ल देख के मगन रहिस ।वोला लागत रहिस कि बेटी ल अपन पांव म खड़ा देखे के सुख हर ही अलग होथे ।

" गोड़ -हाथ धोले बेटी अब ! कोन जानी कतका बेर के निकले हावस ; कुछु खाय हस कि नहीं । पाछु फुरसत ले सब हमन ल बताबे ।"ददा कहिस ।

"पहिली येला तो धर ! अभी खोल के झन देखबे ।"सोनकमल अपन ददा ल कहिस अउ एकठन नानबूटी पर्स असन जिनिस ददा कोती सरकाइस ।

"तोर महतारी ल धरा बेटी येला ! महुँच तो तोरे कस एईच ल धराथों अइसन जिनिस ल ।" ददा हाँसत कहिस ।

"ले चल अइसन कहत हस तब , तँईच धर दई !"सोनकमल कहिस अउ महतारी के हाथ म वो जिनिस ल जबरजस्ती धरा दिस ।


          महतारी जलकुँवर वोला खोल के देखिस,तब चेहरा म चमक आ गय । वोकर मुख ल निकल गय- सोनकमल के सोन...!

"गौटिन येला सोनकमल के ही राहन देबे न , उठाबे झन !"ददा आत्माराम गौटिया कहिस ।

"अटक आ परे ल देखत थोरहे रहिबो । लागही त उठा लेबो अउ पीछू भर देबो ।"  महतारी जलकुँवर हाँसत कहिस ।

"तोर नीयत ठीक नई लगत ये , गौटिन !" ददा कहिस ।

"एमे का नीयत के बात हे ददा !"सोनकमल तुरतेच कह उठिस ।

"बेटी के कमई ल कइसे खाय सकबे , बेटी ?" आत्माराम कहिस ।

"कोन बेटी...! सोनकमल तो बेटा ये न ददा ?" सोनकमल फेर तुरतेच कह उठिस ।

"तब ले भी , बेटी !" आत्माराम कहिस , तब सोनकमल कुछु नई कहिस ।


             बातचीत करत मंझनिया ढरके के बेरा आ गय , फेर दुनों महतारी -बेटी के गोठ नई सिराइस । एक ले बढ़के एक गोठ...सबो कोती लामत गोठ अउ वोतकी वोमन के उत्तर-उतारा ।

"दई...!बड़ दिन हो गय खेत-खार के सिवाना ल खुंदे । चार -पांच बछर तो  होइच गय न । आज मोर मन वो कोती जाय के करत हे !" सोनकमल खोल बाहिर कोती ल देखत कहिस ।

"करिया जाबे बेटी !बने फक्क पर्री हावस तउन हर । घाम महीना के घाम रिगबिग ले जनावत हे ! दूसर जिनिस खेत -खार म अभी का पाबे । खाली खातू- कुड़हा मन माढ़े भर होंही ।" महतारी वोला एक पइत मना करत कहिस ।

"कहत तो ठीक हस दई,फेर मोर मन हर वो कोती जाय के होवत रहिस ! बड़ दिन हो गय,  वो कोती ल एक नंजर देखे ।"वो फेर कहिस ।


        लइका के इच्छा जान के जलकुँवर गौटिन...ले चल त ! आज परसाही खार कोती ल किंजर आई कहके , जाय के तियारी करिस । वोहर एक ठन छोटकुन टुकनी अपन संग म धर लिस ।अब दुनों महतारी -बेटी निकल आईंन गांव के परसाही खार कोती । निकलते साथ सोनकमल ललिया गय घाम म...

"देखे , तोला कहत रहंय तब ले नई माने ! अब हो गय लाल न घाम म ..."

महतारी कहिस ।

" मंय भर होंय हंव कि तहुँ घलव होय हस ।"सोनकमल उल्टा  कहे लगिस ।


        गोठ बात करत वोमन अब वो कोती ल फिरे बर धर लेय रहिन । तभे वोकर नजर तीर के बोहार रुख ऊपर चल दिस । अभी गर्मी के महीना लगत हावे , येकर सेती येहर तो भद भद ले फूल मरे हे , फेर तरी के अमरउ अतका के ल आन मनखे मन तीर -सुलर के ले आने हें । बढिया गोंछा मन उपर म दिखत हें ।

"रा दई ,मना झन करबे न ! मोला कुछु नई होय । ये बोहार के फूल तोला मंय कै न कै पइत खवाय हँव । आज घलव मोला येला टोरन दे ।" सोनकमल कहिस ।

"राहन दे बेटी अब ! जतका खवाय वोतका खवाय अब अउ नई लागय ओ !"महतारी वोला बल भर के रोकत कहिस ।

" घर म दही -मही होवत हे न बने ?" सोनकमल पूछिस ।

"तोर घर ल दही -मही हर कब छोड़े हावे !"

"अच्छा अउ बता ?"

"वो का ओ ?"

"तँय ये टुकनी ल धर के काबर आय हावस ?"

"धर लेंय माने धर लेंय ओ ! एमे का बात हे ?" महतारी कहिस ।

"तब फिर मोला ये रुख म चढ़के, वो दु -चार गोंछा ल उतारन दे ।"सोनकमल कहिस अउ सिरतो वो रुख म चढ़ गय टिप शाखा म अउ बोहार फूल ल टोरे लागिस ।

"शहर गये शहराती नरस बाई मन बोहार फूल नई खाँय जी !" एक ठन चिन्हरहा स्वर हर सोनकमल ल सुनई परिस रुख के तरी ले । 


           उहाँ महतारी के संग कनहुँ आन खड़े रहिस ।


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                  अध्याय 24

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               सोनकमल अस्पताल म सटे स्टाफ क्वार्टर ले देखिस । वो बइला गाड़ी म आय मनखे मन  महिला ल डॉ. विशाखा देवांगन के मुँहटा म उतारत रहिन , तभे डॉ. विशाखा अपन खोली ल बाहिर निकल आइन  अउ थोरकुन जोरलगहा वोमन ल अइसन करे बर रोकिन । वो हाथ ले इशारा करत ये नानकुन अस्पताल के  लेबर रूम कोती ल बतात रहिन अउ खुद वापिस घर नई गिन । वो वइसनेच सिविल ड्रेस म वो महिला के संग आय लॉगिन ।फेर उँकर नजर कथु एती -ओती ल खोझत रहें ।

"डॉक्टर , मंय इहाँ हँव ...!" सोनकमल खनकत अवाज म कहिस । 

" तँय कइसन अभी इहाँ । अभीच्चे तो तँय गय रहे न...?" डॉक्टर विशाखा देवांगन चहकत कहिंन ।

"आपौ घलव तो अभी गय रहा न ।" सोनकमल लेडी डॉक्टर के आँखी म झाँकत कहिस ।

"फेर यह दे डिलीवरी केस आ गिस न, तब कइसन करबे !" "डॉक्टर कहिंन ।

"हाँ ,मेडम !"वो कहिस अउ लेबर खोली कोती चल दिस अउ जाके आय महिला के बहां ल धरके  समोख लिस ।

"धीरज धर बहिनी ! पहिलात ये न... ये... ये...देखे नरायण तोला पार कर दिन । देवी दई तोला पार कर दिस ।" सोनकमल कुलकत कहिस । डॉक्टर  विशाखा अपन इंजेक्शन ल धर के आईंन ,फेर इहाँ के हाल -समाचार ल जान के वोकर मुंहू फरा गय ।

"सोनकमल... कुछु तो हावे  तोर म गुड़िया ! तोर रहे ल सूजी -माटी लगाय बर नई लागे अउ महिला ये लेबर -पीरा ल पार हो जाथे ।तोर रहत ल एको झन ल सिजेरियन नई लागे ये !"

"अउ कनहुँ ल लागे घलव झन , मेडम !अइसन अशीष देवव आप !"सोनकमल हांसत कहिस। 

"अशीष तँय दे ! मंय तो केवल दवई -सूजी लगाथों बस न  !"

"बल अउ बुद्धि तुँहर मेम अउ काम -बुता हमन के ।" सोनकमल कहिस।

"कमल दीदी , यही हर तो सोन ऊपर परे सुहागा ये ओ !" नीरा कहिस , जउन हर येमन के गोठ -बात ल सुनत रहिस । वोहर ये अस्पताल म दई रहिस । वोहर नावा लइका के  सकल बुता ल करके अपन हाथ ल पोंछत येमन के तीर म आय रहिस ।


     तभे ये नावा -प्रसूता कोती ले वोकर ससुर आके, दु सौ रुपया डाक्टर के आगु म आके हाथ जोरत मढ़ा दिस । वोहर वइसनहेच अपन   हाथ ल जोर के ठाढ़े रहिस ।

"बबा...पहिली तो हाथ ल छोड़ !"नीरा कहिस, "हाँ... अउ काय कहत हस! का ये येहर...?"

" कमजोर अन बई ! लइका ल पार लगा देया तुमन ! तुमन ल लाख लाख असीस !"

"बस अशीष दे सियान !"ए पईत सोनकमल कहिस ।

"धर लेवा बई मन... महतारी मन... ! मोर नाती कोती ले एक एक कुटी पेड़ा खा लिहा...बस !" सियान कहिस अउ फेर हाथ जोर लिस ।

"धर ले सोनकमल ...मनखे के भावना हर बड़े  होथे ।वोला ठेस झन पहुँचे ।" डॉक्टर विशाखा कहिन, तब सोनकमल वो दुनों नोट ल धरके नीरा के हाथ म धरा के ,वोकर ये हाथ ल थोरकुन मसक दिस ।

"कमल दीदी ,तँय अइसनहेच करथस ! अरे रुपिया ल धराथस तउन हर बने लागथे, फेर ये जउन तँय हाथ ल बल भर के मसकथस ,तब तो जान हर ही चल देथे ।"नीरा झरझरात कहिस , तब येला सुनके सोनकमल वोकर हाथ ल एक पईत फेर मसक दिस ।

"अरे ,अब छोड़व ठठ्ठा -मसखरी ल अउ अपन ठउर -ठिकाना पहुँचव ! कोन जानी कब कोन आ जाय ...?"डाक्टर कहिन अउ वो मनखे ल लईकोरही के दवा माटी तोरा -तबेला ल समझाय लॉगिन । 


          सोनकमल अभी के अपन बॉस डॉक्टर विशाखा देवांगन के बात ल मान के अपन  क्वार्टर कोती जाय लागिस । वोला वइसन जावत डॉक्टर देखत रहिन । कइसन हे ये लड़की के आदत -व्यवहार हर ! पूरा रात भर खटे हे नाईट शिफ्ट म अउ यह दे...डिलीवरी पेटेंट देखिस तब बिन बलाय कूद के आ गय अउ पूरा सँभाल लिस । जतेक केस जतेक गर्भवती मन ल एहर छुइस हे कि समझ वोमन हरु होगिंन निच्चट सुभिता ले । वो कहत रहिस वो दिन...जे दिन देश समाज म गर्भवती प्रसूता मृत्युदर अउ नवजात मृत्युदर हर शून्य हो जाही , वोहर हम सब बर बड़ उच्छा -मंगल के दिन होही ... !लगत हे एकर जीवन हर एकरे बर समर्पित हो गय हे। रंग -रूप तो भगवान येला छांनही टोर के देय हे! एहर जब भी तीर म रइथे , वोतका बेर ल कइसे एकठन आसरा वाला शांति हर मन अउ हिरदे म छाए रहिथे । फेर एला देखे ल लगथे कि एहर डाक्टर रहितिस अउ खुद वोहर एकर जगह म नर्स रहितिस तब फबथिस । एकठन अउ बात ...एहर अपन घर-परिवार के बारे मे कभू कुछु नई बताय । सुने म आथे कि एहर तो पोठ बड़े घर- घराना के बेटी आय ! येहर अइसन जॉब नई करथिस तब ले भी चलतिस ,फेर येहर जॉब करत हे अउ एक पैसा के लोभ -लालच भी नइये एकर शरीर म।


          अब डॉ. विशाखा देवांगन अपन केबिन म बइठे रहिगिन । वो गुनत  रहिन ...वो तो खुद अपन घर म कुक राखे हावे। कुक- नोनी रांधत होही । जब वो रांध -पसा के सकही तब फ़ेर वोला अवाज दिही । तब वो पहुंच जाही अउ गप गप खा लिही , फेर ये सोनकमल इहाँ दिन -रात खँटही , तब ले भी अपन बर सूबे -शाम तात तात तिपत भोजन बनाय के मउक़ा निकाल लेथे । वो दिन तो मलिया भर के बेटा जुतिया वाला तीखुर वोला पहुंचाय गय रहिस...थोरकुन चीख लेवा मेडम !घर के बनाय गुड़ ले बने हावे...! काये ये कमल ?बेटा जुतिया के दिन वाला तीखुर ये मेडम । बेटा जुतिया...?तोर कै ठन बेटा हावे कमल ?कोरी -ख़ईरखा मेडम । ओहो !एको झन ले हमन ल भी भेंट -चिन्हारी करा न जी ।मोर बेटी -बेटा मन ले रोज भेंट करथव मेडम आप तो । फेर हम तो चिन्ह नई पायेंन जी ।आज मोर एकेझन लइका ल भेंटे हव आपमन...वोला बनेच खिसियात डाँटत डॉट्स दवा ल नियम से खाय बर नई कहे हवा आप ? गुने बर पर गय...ओहो वो रिक्शा वाला खोख... खोख खांसत डोकरा !आज के ओ. पी.डी.के अकेला  पेशेंट ! अउ  ये  ब्रम्हचारिणी  आदि -भवानी  वोकर मंगल कामना करत बेटा जुतिया के उपास रहत हे । मेडम ...मोर महतारी हमन दुनों भई -बहिनी के मंगल कामना करत ये उपास ल बड़ नियम ले करथे तब महुँ घलव अइसन जरूर करथंव ये दुनों उपास -बेटा जुतिया अउ भई जुतिया ल । येकर महतारी...बबा गा ! येकर ले रंच मंच बड़े दिखत हे अभी मुश्किल ले बड़े बहिनी जइसन ! वो भेंट करे आय रहिस,तब देखे हे वोला । हम सब इहाँ दु चार मनखे तो हवन ये अस्पताल म तब का के साहब अउ का के कर्मचारी - चपरासी ! सब एके डोंगा म नई चढ़े अन का...? अतका गुनत डाक्टरींन मेडम हांस भरिन काबर कि उँकर  कान म कुक नोनी बिनी बाई के अवाज- जेवन बन गय मेडम ! सुनई पर गय रहिस ।


             चल अब झटपट जेवन ल निबट के आया जाय ! अभी नावा उम्मर म अपन काम बुता ल ठीक से नि करबे तब कब करबे ? जब अस्पताल ल अपन कैरियर बनाय हवन तब ये अस्पताल ले कइसन परहेज ! येला हमन ल   'स्वास्थ्य मन्दिर ' बनाय के जरूरत हे अउ ये बनके रहही । 

      

                    डॉ. देवांगन अपन डॉक्टर क्वार्टर कोती गिन अउ सिरतो म झटपट जेवन -पानी करके फेर अपन केबिन म आ गिन ।  आज के पूरा दिन ल उनला ये पी.एच. सी. ल देखना हे । का ओ.पी.डी. कि का भर्ती -राउंड ...? सब हर सब ये इहाँ ! मनखे मन ल गुड़ फील होय अइसन जतन ये नावा टीम हर करत हे !जइसन इहाँ होड़ लगे हे कोन जादा अपन समय दे सकत हे इहाँ । अउ ये बुता ल वो सब मन ल सिखोने वाली ये सिस्टर सोनकमल  । अभी खींच तान के वोला भेजे हंव तब तो गय हे, नहीं त दु कौरा के खाना -रांधना पसाना अउ जब शिफ्ट नई रहही ते दिन के दु पहर रात अपन खोली म बिताही नहीं त वोकर घर- द्वार तो बस ये अस्पताल बिल्डिंग हर भर ये ।

"लंच हो गय, डॉक्टर ?"सोनकमल अपन हाथ मुंहू ल पोंछत डॉ. विशाखा तीर म आ खड़ा हो गय ।


             अब तो डॉ विशाखा देवांगन वोला भर नजर देखिन फेर ये नजर म ये  दया मया करुणा बरसाने वाली  ये देवी बर करुणा रहिस ।

" आ कमल !"वो कहिंन वोला ।









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                       अध्याय 25

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                         जलकुँवर गौटिन तावा ले अंगाकर ल झर्रात गुनत रहिस कि ये अंगाकर हर तो अब पनपुरुवा रोटी बनके रह गय हे। अतेक पातर ल अंगाकर कहबे तब लाज ये । थोर मोर जादा मोटहा हो जाही, तब फेर वोला कोन खाही ; दुइक-दुवा तो बाँचे हावन ।जब ये दुनों लइका मन ठुलाथें, तभे घर हर घर कस लागथे, नहीं त बस भूत -बंगला बन के रह जाथे, अतेक बड़ बलराम गौटिया के ये महल -अटारी हर ! भूत -बंगला... ठउका कहे जलकुँवर ! कोन भूत रहथे इहाँ ? अउ कोन...?सोनकमल के ददा अउ रजत के दई ! वो मने- मन कहिस अउ खुद हाँस भरिस ।

"का जिनिस ल हाँसत हस ,गौटिन ?" सोनकमल के ददा आत्माराम गौटिया कहिस ।

"कुछु नई होइस गौटिया !" जलकुँवर कहिस ।

"अब कोन कहाँ के गौटिया ,गौटिन ?" आत्माराम कहिंन ।

"बबा...अभी तुइंच गौटिन कहत हव । जब गौटिया रहही तब तो गौटिन रह पाही ।" जलकुँवर अपन गोसांन आत्माराम करा मुंहा-चाही करत कहिस ।

"हाँ...कहत तो तँय ठीक हस ।"आत्माराम कहिंन ।

" अउ तो सियनहा मन ल नई देखे अन, फेर ददा ल देखें हन !वो रहिन छोटे गौटिया बलराम गौटिया बड़े दई के भाखा म दुलरु गौटिया ,तब उँकर वंशावली हर कईसन गौटिया नई कहाहीं ।" जलकुँवर जइसन फैसला सुनात कहिस ।


                       येला सुनके आत्माराम गौटिया हाँस भरिस, फेर वो कुछु नई कहिन । जलकुँवर गौटिन अंगाकर ल चार कुटी टोरिस तब फेर अपनेच म कहिस -देखत हव अतेक दिन होय के बाद घलव चार कुटी टूट जाथे अंगाकर हर ।

"त का होइस । दु कुटी कहा लेबो एकेक झन । अउ रहिस बात लइका मन के तब लइका मन हमर ले दुरिहा कनहू आन थोरहे चल देय हांवे । महीना दु महीना म वोमन आईच तो जाथें न!" आत्माराम गौटिया गोठ ल समोखत कहिस ।


                      जलकुँवर येला सुनके कुछु कहिस तो नहीं फेर अपन मुँहू ल अंते करके आँखी ल पोंछे लागिस ।आत्माराम गौटिया घलव चुप रहिस एक घरी ले , तब फेर वोहर जलकुँवर के हाथ ल धर के खड़ा हो गिन ।

"लेवा खावा !कोन जानी लइका मन अभी कुछु खाय हें कि नहीं !एई जान के अभी मन हर भारी हो गय ।"जलकुँवर अपन गोंसान आत्माराम ल कहिस ।

"अरे वोमन खाय काबर नई होंही । ये पईत गय रहें तब रजत के नाश्ता पानी खाना -पीना के बढ़िया जोखा मढ़ा के आय हंव न ! रजत अभी नाश्ता करके अपन ट्यूशन चल देय होही अउ कमल हर तो नहा -धो पूजा- आँचा करके अपन नाश्ता बना खाके  अपन ठउर म चल देय होही ।"

"हाँ...!"जलकुँवर गौटिन छोटकुन उत्तर दिस ।

"हाँ, अब चल तहूँ खा अपन हिस्सा ल ।"वो कहिंन ।

"हाँ..."जलकुँवर गौटिन कहिस अउ अपन मलिया ल म माढ़े रोटी ल अपन कोती तीर लिस ।


                      आत्माराम गौटिया अपन बांटा ल लकर -धकर लीलिस अउ तुरतेच घर बाहिर निकल आइस । वोकर बुता वोकर ट्रेक्टर हर आज खोर -मुँहाटी म ही माढ़े रहिस । वोला आज बेलपान खार ल पूरा करना ही रहिस , तेकर सेती वोहर थोरकुन जल्दबाजी म रहिस । अउ अइसन तो रोज के बुता ये ।  फेर आत्माराम बर अपन खेत -खार बिरता -बारी गोठान -दईहान मन हर खेल -खेलवारी के मैदान रहिस । घर -गिरस्ती के बुता तो जलकुँवर के माथे म रहिस , जउन हर पूरा के पूरा मन -मुताबिक  होत रहिस ।


                      जलकुँवर गौटिन अपन अंगाकर कुटी ल अपन मलिया म धरके जस के तस बइठे रहिस । लइका मन ल सुरता करत रहिस  वो अउ वोला लागत रहिस कि ये रोटी कुटी हर वोकर नरी म उतरबे नई करिही आज ! फेर चल रे जांगर कहत वो उठ खड़ा हो गय ।रोटी कुटी जस के तस माढ़ गय ।


                        रोटी के कहर ल पाइस तब बाहिर खोर मुंहाटी म किंजरत एकठन कुकुर हर घर पेल दिस अउ रोटी कुटी ल उठा के ले जाय लागिस । जलकुँवर वोला देखिस, तब ले लेजान दे !आज के रोटी हर एकरे बांटा रहिस कहत वोला दुर्र झुर्र कुछु नई कहिस । वो कुकुर घलव वोला मंजा के बाहिर ले जा के खाय लग गय । कुकुर हर रोटी ल ले गय त, ले गय ! एहर कोई बड़े बात नई होइस फेर अइसन अउ कुछु आन चीज ल  कनहुँ आन नँगाके ले जाहीं तब का होही ? वोकर घर के सबला निकता जिनिस का ...?  बेटी सोनकमल...! कनहुँ वोला वोमन ले छीने के कोशिश करहीं तब का होही ? शादी बिहाव तो  हम खुद कहत हन करले कहके , फेर वो करे तब न ...? जलकुँवर  मन मन अइसन गुनत विधुन हो गय । वोकर मन म बैचेनी कम छटपटी जादा समा गय ...चनैनी -बीरा बीरबहूटी रानी कीरा असन वोकर लइका कनहुँ के पनही तरी म झन रिमजा जाही ? लइका का पहीनही अउ का ओढ़ही ...सब म सब के नजर ! वोकर लइका मन कनहुँ ल हुचूर्रा तो नई बलात यें आ सीना जोरी करबो कहिके फेर  मनखे मन के नीयत के ठिकाना नइये ... !


                     जलकुँवर अपन जगहा ल उठ के आके सील -लोढ़हा ल धोय लागिस । ले येमन लटलट ले सनाय हावें । वो बोपरा आज खुद चटनी पीसे हांवें । जलकुँवर अकेला सब बुता करत थक जाथे ये गुन के वो बोपरा खुद भिड़ जाथें अइसन -अइसन बुता करे म , जेकर करे ले बुता हर कम नई होय । ये लटलटाय सील के परछर धोवइ असन बाढ़ जाथें । जलकुँवर सील -लोढ़हा के हालत देख के मुचमुचा उठिस।


           जलकुँवर सील -लोढ़हा ल बने धोय के बाद हाथ पोंछत आ ठाढ़ हो गय। तभे का करत हव काकी...कहत गजपाल घर आइस ।

जलकुँवर मने मन थोरकुन खार खईस फेर उपर म भाव -व्यवहार देखात कहिस -आवा बेटा ! 

"कइसे बने बने चलत हे न...?" गजपाल आते साथ पूछिस । 

"वो का बेटा ? सब बने तो हावन ।" जलकुँवर वोला उत्तर दिस।

"बने तो रईबे करिहा अब न ...!"

"कइसे का बात हो गय, बेटा ?"

"कुछु खास नहीं ,तब ले भी अब कका अउ काकी चिक्कन चिक्कन दिखत जात हव अब ।"

"ये का कहत हव बेटा !कब हमन चिक्कन नई अन तेला बतावा । बिरीज गौटिन अउ बलराम गौटिया के वंशावली हर कब चिक्कन नइये ?आन मन के मन कभू रहें कि झन रहें?"जलकुँवर थोरकुन रिसहा नजर ले वोला देखिस ।

"ससुर के नांव धरत हव काकी !"

"त का होगिस ! कनहुँ बाप के नांव नई धरें का ?"

"धरव धरव शौक से अपन ससुर अपन गोंसिया के नाम धरव ।अउ का बाँच गय हे ।"गजपाल कहिस ।


          जलकुँवर गजपाल ल जानतेच रहिस । येकर करा चढउ लेबे तब येहर चढ़तेच जाही अउ चढउ म येकर पार नई मिलय । येकर सेथी वो चुप रह गय । गजपाल ल अपन गोठ बगराय बर पोल नई मिलिस, तब वोकर नजर एती वोती किंजरे लागिस । तभे वोकर नजर अंगना के डांग म सुखात कका आत्माराम के नावा कुरता उपर पर गय । अब जइसन वोला खोभा मिल गय। वोकर चेहरा म चमक आ गय ।

"काकी येहर कका के नावा कुरता आय न ?" वो कहिस ।

"हाँ... बेटा !"जलकुँवर कहिस । वोला अइसन कुरता के गोठ करत देखके वोकर मन म आसरा बंधा गय रहिस कि येकर ले गोठ हर आन कोती जावत हे अउ येकर कचर- मचर हर अब बन्द हो जाही। फेर ...

"बनेच महंगा अउ नावा डिजाइन के लागत हे ।" गजपाल जलकुँवर कोती ल भेदहा देखत हाँसिस ।

"होही बेटा...! मंय नई जानत अंव ।" वो कहिस ।

"बेटी के कमाई म तो अतका पींधे ओढ़े के अधिकार तो सबला रइथे ।सोनकमल तो तुंहरों बर नावा साड़ी...नावा गहना लानिस होही न !"

" ए बाबा ग ! ये का कहत हव बेटा !!" जलकुँवर तो एकदम अकबकागय ये नावा गोठ ल सुनके । कतका दुष्ट हावे ये गजपाल हर !देखतो येकर गोठ ल ! बबा रे बबा !!

"कइसे ठीक कहत हंव न काकी..."

"तुँहर कका हर पहिली ओनहा कपड़ा पहिने की नहीं कि बेटी के कमाई म ही वोहर कपड़ा ल पाइन हें ?"जलकुँवर रिस म थोरकुन तमतमा गय रहिस ।

"अरे पहिने फेर अइसन डिजाइनदार निकता कुरता वोहर कब पहिने । अब बेटी के कमाई म काबर नई पहिनही भाई !" गजपाल निच्छट सेटरा बरोबर कहत रहय ।

"पहिली तो कान खोल के सुनव ! ये कुरता न कनहुँ साड़ी हर नावा नई होइस । तुँहर कका के कुरता हर तुँहर ददा के कुरता ल सदाकाल बने रहिथे ।अउ येहर उँकर अपन कमाई ले बने कुरता आय । रहिस बात बेटी के कमाई खाय के ...! त कान खोल के सुन लेवा बेटी- बेटा के कमाई ल महतारी -बाप नई खाही तब अउ कोन खाही... ?" जलकुँवर अपन बेटी सोनकमल के कमाई ल खाय के गोठ म पूरा के पूरा उखड़ गय रहिस...

" वो तो दिखतेच हे काकी ! एकरेच बर तो वोकर बिहाव नई होत ये ।"  गजपाल थोरकुन मुचमुचात कहिस ।


      अब तो जलकुँवर अपन मुड़ ल धर के बइठ गय रहिस ।



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                 अध्याय 26

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          सोनकमल बर तो अब ये शहर हर अपन घर बराबर हो गय हे । अपन ये ननबुटिया पी. एच. सी. म आत -जात मनखे मन ल तो वोहर बने चिन्हे  हावे। येकर छोड़ शहर के अउ बनेच मनखे मन ल वोहर जानथे । अउ वोमन घलव वोला बनेच मान देथें ।  पी. एच. सी.म दु झन डाक्टरीन हांवें अउ दस बारह झन अउ आन स्टाफ मन हांवें । वो सब मन के बीच सोनकमल तो बस सोनकमल आय ।

"सोनकमल ...!"

"जी, मैडम !"

"तँय डाक्टरीन रइथे अउ मंय सिस्टर तब बने फबथिस..."

" आप ल मंय कै न कै पईत कह डारे हंव न मेडम ,अइसन झन कहिहा कहके न !" सोनकमल डॉ. विशाखा देवांगन के जुरा ल बने करत कहिस । अभी आज अतेक बेरा ल कनहुँ एको मनखे इहाँ ओ.पी.डी. म नई दिखे यें । पर्ची बनईया टेकराम बाबू तो बने एक नींद सुत घलव गय बइठेच बइठे...वोला अइसन करत देख वो दिन सोनकमल थोरकुन मुचमुचा उठे रहिस...लइका !तँय अभी लइका हावस । कतको भी स्वास्थ्य विभाग म बुता करत हस ,तब ले भी हमन कस खरकती उमर आही..तब अइसन बइठे बइठे ओंघई हर सधारण बात होही...टेकराम कहिस ।सारी भइया !सोनकमल कहिस तब फिर दुनों झन खलखलाके हाँस भरे रहिन ।

"सोनकमल...!"डॉ. विशाखा वोला कहिन।

"जी मैडम !"

" हमरो विभाग हमर बुता घलव विचित्तर हे न ?"

"वो कईसन ...!!"

"हमन आन मन असन, मनखे मन ल... पब्लिक ल... बीमार पड़ा जी अउ हमर इहाँ आवा जी... कहे थोरहे सकबो ।" 

"नहीं मेडम ...!बिल्कुल भी नहीं ।"सोनकमल खुस होवत कहिस ।

"सोनकमल...एक बात बता ?"डॉ .विशाखा कहिन ।

"का बात ये ,मेडम !"

"तँय डाक्टरी काबर नई पढ़े ?"

"वो तो सब के बस के बात नई होइस न मेडम । तब सोनकमल के भी बस के बात नई रह गय ।" सोनकमल गुनिस, अब ये गोठ के मेडम ल का जवाब दँव ।

"तँय पढ़े-गुने म घलव बने हुशियार हस । बने पोठ खाता -पीता घर के बेटी अस । तँय कोशिश नई करे अस नोनी...नहीं त तहूँ घलव डॉक्टर रइथे आज ?" 

"तब सोनकमल के बुता ल कोन करतिस मेडम ?"

"अरे , वोकर बर कोरी -खईरखा कतको जन हें  !"मेडम कहिन, फेर उँकर गोठ म सिरतो थोरकुन पीरा अउ पछतावा हर पांच-परगट झलकत रहिन ।

"चलव हो गय मेडम !होइहें वही जो राम रची राखा ! मोला तुँहर संग म रहे म बड़ आनन्द आथे । एक तूं भर अइसन मनखे होवा जउन हर काबर विहा नई होवत अस सोनकमल ?कब बिहाबे सोनकमल...जइसन सवाल नई पूछा । जबले ज्योति चन्द्रा के बिहाव होइस हे कि बस अउ आन कुछु बुता नई बाँच गय ये मनखे मन करा !" सोनकमल थोरकुन विपतिया गय हे अइसन लागत रहिस ।

"सोनकमल ! सब मनखे के थोरकुन अपन निजता होथे, जेमे वोकर महतारी - बाप जीवनदाता असन मन तको के दखल नई रहे ।अउ ये दुनिया म कछु म कछु के दखल देवइया  मन के कमी कहाँ हे ।" डॉक्टर वोला समोखत कहिन ।

"तभो ले मेडम...!"

"तोर रंग -रूप ल देखके मनखे सहज म कह उठथें ।"

"तब  अइसन म मंय का करँव ?"

" अइसन गोठ मन ल... धूल उड़ाता जा ! समझे...सोनकमल !"डॉक्टर तो अब मौज म आ गय रहिन अइसन लागत रहय ।


                  अब सोनकमल कुछु नई कहिस फेर वोहर डॉक्टर विशाखा के मुँहू ल बनेच देखत रहिस । डॉक्टर के  सरकारी जन्मकुंडली म देखे ले पता  लगे रहिस कि वोमन , वोकर ले चार साल बड़े आंय । उमर म बड़े पद म बड़े अनुभव म बड़े मान -प्रतिष्ठा म बड़े  ।दूसर मेडम डॉ. शिवांगी  धृतलहरे घलव वोकर ले पांच साल बड़े आंय । फेर ये सियानीन ज्योति सबले छोटे रहिस फेर वोकर बनौती बन गय...वोइच कहत रहिस बबा ! मोर बनौती बन गय ।मोर बिहाव लग गय।  ये ज्योति बाई हर वोकर पक्की सहेली वृंदा पार्टी के आय । वृंदा शादी बिहाव बर एकदम उतीअइल हो मरत रहिस । आज दो पिचका के महतारी...! कइसे करथस वृंदा येमन ल...? वो अइसन गोठिया के भेदहा हाँसी, हाँस देय रहिस । एकझन ल तँय ले जा तो...कुछु ल भी खात -पीयत रही । वृंदा ईंट के जवाब पत्थर ल देवत वइसनहेच भेदहा हाँसी हाँसे रहिस ।

एसो के तीजा के बखत घर गय रहिस तब भेंट होय रहिस वोकर ले । पलल पलल ससुरालेच के गोठ बात  वोकर करा, फेर छेवर म -कमल ! भैंसा ल भैंसा के सींग हर गरू थोरहे होही...कहत अपन दुनों लइका ल पोटार लेय रहिस , तब छेवर ठट्ठा करत वो कहे रहिस...भैंसा ल कि भईंसिन ल वृंदा ! वृंदा हर तो लदर -भसर दिखे के शुरू नई हो गय ये का !

"का बनेच गहिल सोंचत हस, सोनकमल -नोनी ?"डाक्टरीन दई कहिन ।

"कुछु तो खास नहीं , मेडम ।"

"तोला एकेझन मुचमुचात देखें ,तब पूछत हंव ।" वो घलव हाँस परे रहिन ।

"मोर नानपन के संगवारी वृंदा के सुरता करत रहंय । "

"हाँ, ये नांव ल तो तँय एक -दु पईत अउ बताय घलव हस । का हो गय वोला ?"

"पूरा लईकोरही लदर-भसर  हो गय हे ये पईत। दूध अउ पूत ल धरे नई सकत ये ।"

"वो तो बढ़िया बात आय ।"डाक्टरीन कहिन ।

"हाँ ...मेडम ! फेर एकठन मोर सपना अधूरा रह गय ।" सोनकमल फेर चहकत कहिस ।

"वो का  तोर सपना अधूरा रह गय ओ दाई !" डाक्टरीन तो सोनकमल के ये गोठ ल सुन के मुंहुँ ल फार देय रहिन ।

" मेडम...मेडम...मंय चाहत रहंय कि वोकर जचकी ल मंय कराय रहिथें तुँहर संग म ...!" सोनकमल तो येला कहत खुद हाँस भरिस ।

"ये तो बढ़िया बात होय रहिथिस ।"

"फेर हो नई पाईस ..."

"कै झन है कहे ?"

"दु झन हो गय हें एक टुरी अउ एक टुरा ।"

"तब अब तोर शउक हर पूरा नई होय सके । संस्थागत प्रसव तो होइस होही न ?"

"हां... मेडम !वोकर ससुराल तीर ।"

"तब समझ ले कनहुँ आन सोनकमल कनहुँ आन विशाखा वोकर सुख ल पाँय होहीं ।"

"हाँ...मेडम ।"सोनकमल खुश होवत कहिस ।

" पींयर नोनी...परी नोनी ! आज कनहुँ ल हमर जरूरत नई ये । आज कनहुँ एको झन जीवन दीप  तक ल बोहनी तक नई कराइन ये । " डॉक्टर विशाखा थोरकुन अकबकाय कस करत कहिंन ।

" हाँ मेडम !"

"चल अइसन सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः  रहें रे बबा ! "

"हाँ, मेडम ! येहर तो बड़ अच्छा गोठ होही ।" सोनकमल कहिस ।


                 एकघरी ले दुनों झन चुप रहिन तब फिर सोनकमल ,जइसन कुछु सुरता आइस हे, तइसन कहिस -मेडम , मैं रमला सेठाइन ल वो इंजेक्शन ल लगा के आवत हंव,जउन ल वो तुँहर ले काल आके लिखवाय रहिस हे।

"घर पहुंच सेवा ...!"मेडम हाँसत कहिन।

"आप कुछु कह लेवा ।"

"घर पहुंच निःशुल्क सेवा !"

"चला यह गोठ सही हे..."सोनकमल हाँसत  छोटकुन बेग ल धरिस अउ अपन साईकल चढ़ गय  ।


            ये शहर के घिचिर पिचिर वाला रास्ता !  कभु थीर नई होय । जगहा जगहा गड्ढा मन म मटमैला पानी भरे हावे । कतको आवत हें तब वोतकी जावत घलव हें। सोनकमल तीरे -तीर बस्ती कोती  जात  रहिस , तभे पीछू कोती ल एकठन चार पहिया गाड़ी आके वोकर तिरेच ल सँटत गुज़रिस ।

छपाक... ! वो गाड़ी के चक्का ले चिखला- मटमैला पानी उछलिस अउ सोनकमल के बगुला पाँख कस सादा ड्रेस ल सान दिस ।


       अब वो गाड़ी चलईया हर पीछू मुड़ के सोनकमल कोती ल देखिस अउ हाँसिस। सोनकमल ल ये चेहरा हर कनहुँ करा पांच परगट के फोटो म देखे हंव...अइसन लागत रहिस ।




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                  अध्याय 27

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 "पहिली दंवरी चले । लकरी के बेलन चले त अतेक धुर्रा -फुतका घर कोती नई समाय, सोनकमल के ददा !" जलकुँवर गौटिन घर- दुआर ल तीसर पईत बहारत कहिस ।

" कइसे का होगे गौटिन...?"आत्माराम कहिन । वो थोरकुन आन बुता म लगे रहिन । वो गोंदली बारी के थरौटी बर बीज मन ल , मोटहा कपड़ा म बांध के पानी म भिगोय के जतन करत रहिन ।

"आजकाल के ये थ्रेसर -हर्वेस्टर उवा उवा का का कथा तेमन के चले ले आगू के सौ पचास घर म बस एईच बुता आय ।" जलकुँवर 

कहिस ।

"सौ पचास के बुता ल तोर ये उवा उवा मन अकेला कर देथें गौटिन । वोहू ल काबर नई गुनत अस।

"हाँ...!वो गोठ तो बरोबर हे ।"

" थोरकुन सुख त थोरकुन दुख..."

"येई नांव ये जिंनगी के...कहे बर काबर रख छोड़त हावा ।"

"चल, वोला तँय पुरो देय। हमर धान-पान सँकला गय त का होइस ।आने मन के तो बाँचे हावे । वोमन तो सँकेलबे करहीं अपन बाँटा खेत -खार ल ।" आत्माराम बीज के गठरी ल पानी म बोरत कहिन ।

"बीज मन बने हें...?"

"अभी तो बने दिखत हें । गोंदली -प्याज बर नासिक राज हर नामी हे अउ दुकानदार हर नासिक बिजहा ये कहके देय हे ।देख अब आगु का होत हे तउन ल ।"

"बनेच होही । पाछु बछर के हर तो बने होय रहिस न ।"

"हाँ...वोइच दुकानदार करा ले ये बीज भाथा  मन ल लाने हंव ।"

"बनेच होही, काबर नकल -चकल ल कनहुँ दिहीं ?"

"अइसन झन कह । नकल चकल ल ये पूरा दुनिया हर भर गय हे । तोरे असन पूरा दुनिया हर नई ये ।" आत्माराम गौटिया हाँसत कहिस, तब तो जलकुँवर ल घलव , हाँस के वोला जवाब देय बर रहिस ।

"काबर हाँस मरत हस गौटिन...?" आत्माराम कहिन।

" इया अब हमन दुइक- दुवा हावन , तब का हाँसी कि का रोवासी...गौटिया !" जलकुँवर के चेहरा म अभी ल घलव हाँसी के लोर मन पांच- परगट दिखत रहंय ।

"चल बने कहे ।अब तँय बइठ । मंय हर ये बीज मन ल थरौटी म निबटाय जात हंव ।" आत्माराम कहिन अउ वो जगहा ले उठ खड़ा होइन । आगु के भंडार खोली म जाके दवई खातु के जोम करत वो बाहिर निकल गिन।

"चल रे धमना किंजर बुल के मोरे अंगना...! हम अभी कत्थु नई जान । हमर अपन, अलग बुता आ परे हावे । वोमन ल निबटाय बर हे।"जलकुँवर कहिस अउ अपन अकेला अपन बुता म लग गय। बुता अउ का ?एक पईत अउ घर -दुआर ल बाहरे के बुता । फिर दु चार गाय हांवे तेमन के तोरा -तबेला  । फिर वोमन के पुरता कईंचा-पाका रसोई तो उतारे बर लागही न ।


          जलकुँवर लकर -धकर बहार -बटोर के तिरिया दिस अउ रसोई खोली म आके कुंदरू -कलेरा मन ल निमारे बर धर लिस ।  आज के रसोई  येमन ले बनही । जेठानी (देव उठनी )तिहार के बाद ये कुंदरू नार हर घलव भदक जाथे फरे बर अउ अउ शादी- बिहाव हर घलव...

"का का बुता काम होवत हे ,काकी !" बने जोरलगहा हालचाल पूछत गजपाल घर म घुसर आइस अउ आगु म माढ़े कुरसी म , विसनहेच बने जोरलगहा बईठिस । ये का रंग म भंग ये रे...ये लइका फिर माथा खाही, जलकुँवर गुनिस, फेर परगट म कहिस - ये... आओ आओ बेटा, बिराजो कुरसी म !

"वो तो मंय पहिलिच ल बइठ गय हंव ,काकी ।"गजपाल कहिस ।

"बड़ सुघ्घर गोठ , ददा !" जलकुँवर कहिस ।

"कका नई दिखत ये ।कहाँ कहाँ जायेच रहिथे वोहर...?कभु भी आबे , वोहर घर म भेंटायच नहीं वोहर !" गजपाल थोर थोर मुच मुच हाँसत कहिस ।


              येती जलकुँवर गौटिन जानत हे ।ये उतपतिया के कका के आगु म ,कुछु चले नहीं , तेकर सेथी ,येहर उनला जावत देख लेय होही , तेकर बाद, गोठ के ओड़हर बनात आ धमकत हे ।

"कइसे का हो गय, काकी ?"

"कुछु तो नहीं , बेटा ।"

" ये लेवा बिहाव के नेवता ।"गजपाल एकठन शादी वाला बने रंगीन चकबक करत कार्ड ल जलकुँवर कोती बढोइस ।

"ये काकर बिहाव होवत हे, बेटा ।"

"तुहुँच तो पढ़े -गुने हव,काकी । पढ़ लेवा न ,वोला ।"

"फेर... तभो ले बतावा ।" 

"अउ काकर ?बावनगढ़ी के गौटिया के पूत, मोर संगवारी दलपत के ।"

"वोई जउन हर सगा -पहुना  बन के आय, रहिस ।"

"ठीक समझा..."

"बढ़िया बात, बेटा । हमर घर म सझ नई माढीस, तव वोहर देखत थोरहे रहिही  । "

"बने कहा ...!"

"फेर हमन ल काबर वोहर नेवता देत हे ?"

"बने पूछा...!तुमन मोर कका -बबा होवा कि नहीं ?वोहर तुमन ल मोर कोती ले पूछे हावे ।"

"बढ़िया करिस ।"

" वो तो सोनकमल ल स्पेशल खचित नेवते हे !यह दे वोकर नांव के आने कार्ड घलव भेजे हे।" गजपाल कहिस अउ जलकुँवर गौटिन कोती ये दूसरइया कार्ड ल बढोइस । वो बोला धर घलव लिस-देवा...एहू ल बढ़िया करिस। मंय ये कार्ड ल सोनकमल करा जरूर जरूर भेजवा दिहां ।"


              जलकुँवर अब थोरकुन रिस म भर गय रहिस। अरे सब के घर सब सगा- पहुना जाथें । सब के सब जगहा मंगनी -बरनी होइच जाथे का...? अउ का अइसन नेवता भेजे जाथे ।ये लइका उतपतिया वोमन ल जलील करना चाहत हे ... लजलजवाना चाहत हे ।

"जरूर बेटा जरूर खचित सबो मई -पिल्ला ताला -कुची ओरमा के जाबो ।" जलकुँवर कहिस ।

"फेर मंय तो अइसन नई कहत हंव !"

"तब का होइस ! एमे तो लिखाय हे कि पूरा परिवार के साथ पधारे बर हे ।" जलकुँवर के ये गोठ ल सुनके, गजपाल थोरकुन सपटिस ।

"का सोनकमल वोकर से नई बिहाही , तब वोहर वोकर कस लइका नई पाही ।"

"बिल्कुल पाही । संसार सागर म अले -अले के सुंदर परे हांवे। फेर एमे कुछु उगटे के तो बात नइये ।" 

"लेवा बईठा अब मंय जात हंव ।"

"बावनगढ़ी के गौटिया के दूत बनके नेवता अमराय आय हावा, तब जेवन-खान चहा-पानी करके जाव !"जलकुँवर आज थोरकुन बनेच भड़क गय रहिस । वोकर अइसन तात बरन ल देख के गजपाल, थोरकुन संकेला गय ।

"नि लागे काकी , लेवा अब जात हंव ।"

"ठीक हे , तुँहर मन,फेर ये कार्ड हर सोनकमल करा जरूर पहुँच जाही।"

"ठीक हे काकी ! लेवा मंय जावत हंव ।"गजपाल थोरकुन सपटत कहिस।

"हाँ...जावा ।" जलकुँवर रिसहा कहिस ।


*       *        *         *          *            *


       सोनकमल ल कॉर्ड थमात गांव के चिरोंजी भैया चल दिस । वोहर लेंन- देन के नांव म ये कोती आय रहिस । सोनकमल नांव -गांव पढ़े के पहिली ही वो कॉर्ड ल तना के देखिस ।  ओह ! एहर ये ,ओकर उपर  वो दिन चिखला फेंकइया ! अपन गाड़ी ल जान -बूझ के चिखला म पेला के ये मनखे हर , वोकर उपर चिखला ल फेंकिस अउ आगु जा के चेहरा देखात हाँसिस घलव । अब समझिस वोकर व्यवहार ल । एहर वोकर बर सगा -पहुना आय रहिस ।  येला बने परच्छर तो देखे नई रहिस ,फेर वो दिन देखे रहिस । तब का जानी एई हर दलपत आय ।   रंग रूप कद काठी सब हर मजबूत ,फेर वो गौटियापा आंट ...सांगा म नई  समात । कुटुम्बदारी के गजपाल भैया तो तड़प जात रहिस, एकर संग रिश्ता जोड़े बर । चल एकर बिहाव होवत हे !फेर येकर शरारत ,बर वोला का कहे जाय ।

 

          सोनकमल हाथ म दलपत के शादी के कार्ड ल धरे हे । महतारी जलकुँवर ये कार्ड ल पठोय हे फेर काबर ?


          सोनकमल बनेच बेर ल वो कार्ड ल लहुटा के देखत रहिस । दलपत संग सुकन्या...! दलपत संग सोनकमल ...!छिह ...!ये वो का सोच लेत हे। दलपत संग सोनकमल नई हो पाइस, तब तो दलपत संग सुकन्या होइस हे। 


        चल ...बने होइस ! सोनकमल मने- मन कह तो दिस, फेर आँखी डहर ले दु बूंदी चुहिच गय ।



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                      अध्याय 28

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           ये गंवई -देहात असन खेत- खार, बारी -विरता वाला कस्बा म , जिंहर वोकर ये पी. एच. सी. हर हे, सोनकमल ल टिके बनेच दिन हो गय । वो आज फिर बइठे हे फुरसत ले । मनखे मन अब ,ये कोती थोरकुन कम आवत हें । शहर म अब दु -चार छोटे बड़े नर्सिंग होम, क्लीनिक घलव खुल गय हें, मनखे मन वो कोती घलव तिरा जात हें । मनखे मन के हाथ हर अब सदाकाल कइंचा रहत हे , तेकर सेथी वोमन अपन उपर खरचा घलव करत हें । एकर ले बढ़के , वोमन जतको भी मनखे मन के संपर्क म आंय हांवे, वोमन ल हाइजीन अउ सैनिटेशन के महत्तम ल बरोबर बतांय हांवे, तेकर सेती मनखे मन थोरकुन कम बीमार घलव परत हांवे । दुनों मेम अउ वोमन सब मिलके ,एक ठन अउ बुता जउन करे रहिन,वोकर चर्चा समाचार पत्र मन ल होवत राजधानी तक ल पहुँच गय हे। 


            अउ वोमन भला करे का हें ?मनखे मन ल क्लीनिकली देखत,लाग गय हे, तब सरल पैथोलॉजी जाँच कराके पोषण अउ विटामिन,मिनरल अउ प्रोटीन के कमी कोती ध्यान देवा  के सरल, सस्ता,सुलभ अउ ओल्ड इज गोल्ड फॉर्मूला मन ले ,मनखे मन के शरीर ल मजबूत करे के काम  भर करे हांवे । येहर वोकर सोच ये , वोकर अनुभव ये, फेर ताकत अउ निर्णय विशाखा मेम के आय । दवई दुकान वाला ,एम.आर. मन येकर विरोध करिन, फेर वोकर ये इन्नोवेशन हर नई रुकिस, अउ छः महीना म ही ये बुता के रंग दिखे के शुरू हो गय । सोनकमल मुचमुचाइस...सोन दीदी !तोर गोठ  हर दु भेदवा कपटाही ये ओ !

"ओ कईसन ओ , गजरा !"

"तँय सूजी लगाय गय रहे त सेठाइन ल जादा तेलहा घी -डालडा खाय बर मना करत रहे..."

"हाँ...तब ?"

"अउ मोला तँय थोरकुन तेलहा, बने तेल खाय बर कहत हस , तब नि होगिस अलग अलग गोठ ओ !" गजरा कहे रहिस वो दिन, जब वोहर वोला अंडरवेट जान के मूंगफली, सिंगदाना ,गुड़ -भेली खाय बर कहत रहिस अउ,थोरकुन फैट- तेल वाले जिनिस मन ल खाय के सलाह देय रहिस । गजरा हर हांसतेच रहिस,माने वोहर समझ नई पाय रहिस ।

"गजरा...!"

"हाँ, दीदी ।"

"मोर उपर विश्वास हे न ?"

"सोलह ले सतरा आना !अपन ले भी जादा ।"

"तब मोर गोठ म..."

" ह ओ दीदी !मंय समझें नहीं तब तोला कहि देंय ।"

" डाक्टरी म तँय हर अंडरवेट हस अउ जानकी सेठाइन हर ओवरवेट । "

"येकर माने ,दीदी ?"

"तँय हरु टीड़ी फांफा अउ सेठाइन गरू...!"

"मंय हरु टीड़ी फांफा तब सेठाइन का ,दीदी ?"

"चुप भी कर, नोनी !थोरकुन तेलहा खाबे, तब तोला न्यूट्रिशन मिलही,अउ चिक्कन चांदो दिखबे ।"

"का तोरे कस दिखहाँ ,दीदी ?"

"नहीं, सेठाइन असन !"

"नहीं दाई !अतेक दया झन कर !वो तो दलम ये ! दलदलात हे ।"

"नोनी , डाक्टरी बईदई म  अइसन चर्बी ल मेद-  एडिपोज टिश्यू कहथें अउ जादा हो जाथे त येला खींच बाहिर करे बर लिप्पो सकसन करवाया बर पड़ जाथे !"

"राहन दे ,दीदी वोमन ल । मोला का करे बर हे, तउने भर ल बता !"गजरा कहिस अउ खलखलाक़े हाँस भरे रहिस ।...बस कहें न थोरकुन घी -तेल बने खा !चिक्कन चांदो दिखबे ! सोनकमल गजरा करा होय गोठ बात ल सुरता करत खुद हाँस भरे रहिस ।

"सोनकमल बहिनी ,कईसन एके झन बइठे मुचमुचात हस !" सुनयना हवलदारिन वोकर तीर म आवत कहिस ।

"ये आ भाभी !कईसन येती आय हस ओ ?सब बने तो हावा न ?" सोनकमल अपन बइठे के स्टूल ल उठ बईठिस ।

"बहिनी ,सब बने हावन, फेर थोर बहुत उंच -नीच होते रइथे ओ !" हवलदारिन कहिस," मेडम डॉक्टर मन नई दिखत यें ।"

"नहीं... नहीं आतेच होहीं ,फेर हाँ...विशाखा मेम तो आज  सक्ती जाहीं ।आज जिला लेबल के कुछु बैठक हे ।फेर का हो गय...?"

"कनिहा अउ कोंथा दुनों हर पिरात हे ।"

"ये अच्छा बात नई होइस !"

"तुमन के कहे सबो जिनिस मन ल खात-पीयत हवन, तभो ले..."

"भौजी, निकता जिनिस मन ल खात-पीयत हस, वोहर तो बनेच अच्छा गोठ ये ,फेर एकर संग अइसन पीरा- बतहा बर देहें ल पोठ करे बर तो बनावटी- कृत्रिम  विटामिन मिनरल अउ ले ।"

"हमर बर दवा माने दवा ओ ! तुमन जाना वो सब मन का का ये तउन ल ।"

"ठीक कहे तँय ...!"

"चल, मंय पीछू आ जाहाँ, मोला विशाखा डाक्टरीन ल ही बताय बर हे ।"हवलदारीन कहिस ।

"बने बात ! तब फिर काल आबे ।आज तो वो नई बइठ पाहीं ।"

"हाँ ,ले अब तँय बइठ ।मंय जात हंव ।"

"अरे भौजी बइठ न ,एको घरी !"

"नहीं नोनी जात हंव !हवलदार बर जेवन बइठारहाँ गेस म । वो कनहुँ तफ्तीश म जाहीं ।"

"ले भाई जा...!"सोनकमल कहिस अउ वोकर बर हाथ हलाइस । हवलदारीन घलव वोकर बलदा म मुस्कुरात विदा होइस ।


          सोनकमल अब फिर अकेला बइठे हे । अउ आन आन मन हांवे, फेर आने जगहा म , आने बुता म ।वोकर ये ठउर हर अब सी. एच. सी. कहात हे-सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र । एक प्रकार ले शुरू वाला जम्मो सुबिधा-एन्टी रेबीज, एन्टी स्नेक वेनम,पैथोलॉजी जइसन जिनिस मन बर मनखे मन बड़ आशा के साथ ,इहाँ आवत हें अउ वोमन के आशा हर आज तक आशा ही बने रहत हे। कनहुँ निराश नई होंय यें । एहू हर एक बड़े बात आय ।


           आज कईसन भला रकम के सुनसान लागत हे ! ये हवलदारीन के जाय के बाद तो अब आकुल -व्याकुल ही लागत हे ।मनखे मन पूरा के पूरा 'निरामयाः' स्वस्थ होगिन के वोमन के ये सी.एच. सी. हर बीमार पड़ गय हे। का बात हो गय...!


             सोनकमल अपन जगहा ल उठके एती -वोती टहले के शुरू कर दिस ।अइसन करे ले वोला बने लागिस ।फेर अइसन करत कहाँ जाबे ? विशाखा मेम रइथे तब बने समय हर कट जाथे । वोमन के ये अभियान के बड़ चर्चा होइस । अतेक दिन के देखे ल एकठन जिनिस दिखे हे ।  अइसन देहात के जगहा म हेवी वर्म इंफेस्टेशन  कृमि गेंगरूवा आंवसा पेट पीरी मन पाचन तंत्र के चुल ल हला देय रहिथें । अइसन होय ल पक्क ल अनीमिया हर पहिली दिखथे । कृमि पेचिस मलेरिया के इलाज, आयरन विटामिन मिनरल सप्पलीमेंट बस अउ का हे , फेर जउन वोमन करा रहिस हे तउन हर लगन अउ ये बुता म चिभिक आय।जेकर चलते हॉस्पिटल ल  जिला गणतंत्र दिवस परेड म कलेक्टर द्वारा प्रशस्ति पत्र अउ इनाम मिले हावे।इनाम -इकराम ल बड़े , वोमन के ये मॉडल के की जगहा म अनुकरण होवत हे, तेहर बड़ बात आय ।


        फेर जब ले ये नावा डॉक्टर भद्र आय हांवे,तब ले ये जगहा थोरकुन आनेच- आने  लागथे, गरू- गरू लागथे ।


         सोनकमल अब तो हाँस भरिस ।वो डाक्टर भद्र के सुरता करत रहिस अउ वो आगु ल आवत दिखिस ।

"कइसे सोनकमल , ओ.पी. डी. उवा सब सुन्ना लागत हें।आज अतेक बेर ल अगोरें, घर म घलव एको झन नई  फटकिन । इहाँ साले चार पइसा के बाहरी आमदानी नई दिखत ये ।"

"सर...!"

"मंय पहिली गम पाय रहिथें कि इहाँ डॉ विशाखा जइसन डाक्टर अउ सोनकमल जइसन परबुधनिन नर्स हें, जउन मन हाइजिन , सैनिटेशन अउ न्यूट्रिशन के तिरेबेनी बोहात मनखे मन ल आर्ट ऑफ लिविंग सिखोत ,खुद अपन पांव म टँगिया चलात हें, तब मंय इहाँ जॉइन करबे नई करथें ।"

"सर ...!" सोनकमल अतकिच भर कहे सकिस   । वो अब काय कहथिस । डाक्टर हर पद म गरिमा म अउ अनुभव सबो म वोकर ले बड़े आंय । वोमन जउन बुता करें हांवे, तउन हर तो गलत होबे नई करिस।फेर ये महात्मा वोला गलत कहत हें...डाक्टर भद्र...सोनकमल मने मन म कहिस । परगट म तो वो चुपे रहिस ।


              डॉ. भद्र अपन केबिन म जा बइठिस अउ सोनकमल अपन जगहा म अकेला रह गय। वोला फेर ये जगहा हर गरमत आकुल -व्याकुल लागिस । आज अतेक गरम दिन तो नई होइस, तभो ले काबर वोला गरू गरू गरम लागत हे ! वो मेडिसिन स्टॉक खोली म आ गिस । आज एहू जगहा म बईठइया जनक नई आय ये ।खाली बिजली के ये लट्टू भर हर जलत हावे... ये का ये ...!! कोन वोकर बहाँ ल रिमजत धर लिस हे...ये मदर..!

फड़ाक... फट... के आवाज कान म सुनई परिस ।बरत बिजली के लट्टू हर अपने आप फूट के वोकर पीछू  म खड़े डॉ. भद्र उपर गिर गय। एकठन तीपत कुटी हर तो, वोकर चेहरा म आ गिरे रहिस ।

"सोनकमल ..!! माफी देबे मोर सुध हर बिगड़ गय रहिस..." डाक्टर कहिस अउ खोली ल बाहर निकल आइस । 

"..."

"सोनकमल !माफ नई करस का..?"

"..."

"सोनकमल !माफ कर... माफ कर !"डाक्टर अपन कान ल धरत कहिस, तब सोनकमल आगु बढ़के वोकर हाथ ल धरके तरी कर दिस ।

"मोर तत हर आज बिछा गय रहिस हे, सोनकमल !मंय तोर इज्जत -मरजादा ल खिलवाड़ कर बइठत रहें ।"

" ले चल कोई बात नइये ,डाक्टर !मोर का इज्जत ल खिलवाड़ होत रहिस । मोर इज्जत मोर शरीर म नई भराय ये ,जेला कनहुँ लुटे सकहिं । हां !फेर तँय अभी अपन इज्जत जरूर गंवात रहे । रहिस बात जोर जबरजस्ती के तब,सोनकमल हर अकेला दु झन डाक्टर भद्र बर काफी हे ।"सोनकमल कहिस ।


       डॉक्टर भद्र डरे बले सोनकमल कोती ल देखिस । वोकर चेहरा म रिस तो रहिबे नई करिस ,अउ जउन दिखत रहिस वोला तो करुणा ही कहे जा सकत हे !नर्स के संग म शाश्वत सदाकाल रहईया करुणा अपन बीमार पेसेंट मन बर । चाहे कनहुँ तन के रोगी रहंय कि मोरे असन मन के रोगी ...डॉक्टर भद्र कहिस मने मन म ।


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                      अध्याय 29

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          सोनकमल अपन सरकारी क्वार्टर के साफ -सफाई लिपाई -पोताई म लेबर लगा के खुद भिड़े रहिस ।  हर बुता बर सरकार के मुंहुँ ताकबे तहु हर  कोई अच्छा जिनिस नई होय । अपन बुता आप करना चाही । फेर अभी करे ल घर हर रन भन दिखत हे ...मेस !सोनकमल मने मन म कहिस अउ जतको जल्दी हो जाय ,कहत बगरे सामान मन ल धो -पोंछ के सरियात जात रहिस ।


         चल ...बैठक खोली हर तो सरिया गय । नावा रंग -पोलिश के कहर मन नथुना म पेलत हें । माते -माते कस लागत हे , तब ले भी मन म ताजगी समा गईस हे। वोकर ये  घर म ददा आत्माराम  गौटिया अउ भई रजत के बरोबर आना जाना हे। रजतेच हर कहे रहिस हे ...दीदी ये पईत बने रंग -पालिश लगवाबे , नहीं त मंय इहाँ ठहर के करवा दिहां । लगे हाथ ये पेंटर बाबू मन भेंटा गिन, तब बिन दीवाली के दीवाली हो उठिस ,अउ चार पैसा गलाय ले भाई रजत ल इहाँ , बइठ के वोकर घर -क्वार्टर ल पोतवाय बर नई लागिस । वोहर भी तो अपन ठउर म पढ़ई-गुनई के बुता ल करत हावे । दई आय रहिथिस ,तब ...अतका के का बेटी । मंय येला  भिथिया म छुही लिपे असन लीप दिहुँ कहथिस । अउ...अउ अपन लिपत वोकरो से लिपवाय ले रथिस । सब कोती ल ये पेंटर लइका मन पोतहीं ,फेर ये वोकर पूजा के जगहा ल तो ,वो खुद अपन हाथ म ही पोतही । येई जगहा के पूजा अउ ध्यान हर तो वोला भला चंगा राखे हे अब तक ल । ध्यान म जउन आनन्द हे वोहर अनिर्वचनीय ये ।वोहर गुंगा के गुड़ ये !


        चल...बैठक खोली हर तो सिरझ गय । अब मंय ये पूजा खोली ल ,एइच मन के संग , लगे हाथ निबटा लंव !गुनिस सोनकमल अउ पोतइया पेंटर बाबू मन करा जाके, वोमन के अगरिहा ब्रश अउ रंग घोल ल लान के ,खुद अपन मन मुताबिक पूजा खोली ल पोते लगिस ।गणेश - लक्ष्मी-सरस्वती, लड्डू- गोपाल, गायत्री माता, विश्वरूप दर्शन अउ दुनिया के सबला बड़खा स्काउट - बजरंगबली ! स्काउटिंग के मोटो ये -हरदम तैयार रहो ! अउ बजरंगबली सब बुता बर हरदम तैयार...ये पाय के ये दुनिया के सबले बेस्ट स्काउट आंय ।अरे...!रे...!! मदर के सादा ओनहा म रंग के छींटा पर गय । सोनकमल अपन ओढ़नी ले तुरनतेच वोला पोंछिस अउ मुस्कुराइस ।

" ले... दीदी !अब लंच करबो ओ । बुता बन्द करत हावन ।" एकझन पेंटर हर कहिस ।

"बने बात भई !चलव हाथ -मुंहुँ धो लव ।" सोनकमल घलव बाहिर निकल आइस ।

" ये दीदी हमन अपन ठउर जात हन  लंच बर ।"

"फेर मंय तो तुमन बर कंइचा -पक्का , जइसन भी बने हे, रान्ध डारे हंव गा...!"

"ये तँय अलकर कर देय हस ,दीदी ।"

"तुँहर घर के ल आन दिन खाबो ।आज सोना दीदी के रांधे खाव ।"

"दीदी के परसाद...!" दूसर पेंटर हर कहिस ।

"कुछु समझ ले रे भई, सादा दार -भात अउ पताल चटनी तो भर आय ।" सोनकमल घलव हाँस उठिस ।


          अब वो दुनों पेंटर मन परछर होके जेवन बर बइठ गिन । सोनकमल ,वोमन ल खवा -पिया के खुद अपन घलव बइठ गय जेवन करे बर । एती वो दुनों पेंटर मन हाथ -मुँह पोंछत फेर लग गईंन अपन बुता म ।

"दऊ हो, थोर मोर सुरता नई लेय रथा ग ! "सोनकमल वोमन ल तुरतेच -ताही बुता म लगत देख के कह उठिस ।

"दीदी, तँय हमन ल जेवन कराय हस न !"

"हाँ...वोमे का बात हो गय ।"

"तब हमू मन के घलव फर्ज बनत हे, कि थोर-मोर बुता ल बने कर के दी । आज म तो नहीं,फेर अइसन करे ले ,तोर बुता हर काल म छेवर हो जाही ।" पहिली पेंटर हर हाँसी -ठिठोली करत कहिस ।

"फेर मंय अइसन लकर -धकर जल्दी करे बर नई कहत हंव ।बुता ल बने चोखट करव ।"

"दीदी, सुखाय के समे दे ।फेर देखबे ।"

"चल ठीक, भई ।" सोनकमल कहिस अउ येती बैठक खोली म आ गय ।


           वोकर मन म थोरकुन ये भाव आइस कि ये पईत वोकर परिवार ले पहिली कोन आही इहाँ तक ...? ददा हर तो यह दे पन्दराही पन्द्रह च दिन होवत हे आ के गईस हे तउन हर ।वो तो अब तुरतेच -ताही नई आय । आही त महतारी कि छोटे भाई रजत । नहीं त दुनों झन एके मोटरसाइकिल म बइठ के । वो दुनों झन आहीं, तब ये जगहा के ये नावा कलेवर ल देख  के जरूर खुश होंही । महतारी हर,वोकर अपन हाथ ल पोते ये पूजा खोली ल, शायद नई मनवाही । वोकर अपन हाथ ले पाते ये जगहा हर ये बाबू मन के हाथ असन थोरहे बनही । चल...सब बुता ल सब थोरहे जानही ;जउन बुता ल विशाखा मेम अउ सोनकमल जानथे, वो बुता ल ये लइका मन थोरहे जानही...

"दीदी...स्टेनर खंग गय ओ !" पेंटर भीर म के वो एकझन बाबू हर हांक पारिस ।

"तब जा ना भाई, तइंच ले आन , मार्केट ल ।"सोनकमल कहिस अउ वो दउ ल एकठन नंबरी नोट निकाल के दिस । 

"दीदी,ये पईत रंग कराबे,तब वॉशेबल इमल्सन पेंट ल करबो ओ ।"वो पेंटर दउ हर चहकत कहिस ।

"ले बन जाही भई , फेर येहर ठहरिस सरकारी क्वार्टर !आज हावे कल ल छिना जाही ।"

"वो काबर छिनाही ओ ?"

"भई , सरकारी कर्मचारी मन के अलदी -बदली ट्रांसफर सस्पेंड उवा होत रहथे न ,तेकर सेती रहे के लइक परछर भर बना दो ।"

"गलत बात !एक तो तोला इहाँ ले जान नई दन ,अउ दूसर मनखे जिहाँ भी रहे वोहर ,वोकर घर आय ।"वो पेंटर हाँसत कहिस अउ अपन बाइसिकल ल धर के मार्केट कोती चल दिस ।


         सोनकमल बक्क ले वो पेंटर लइका ल जात देखिस । कतेक बड़े बात कह दिस ये बाबू हर खेल -खेलवारी म !मनखे हर जहाँ कहीं भी रहही, वोहर वोकर घर आय । जउन ल वोहर ,अपन निज घर मानत हे ,वोहू ल घलव एक दिन छोड़ के खचित जाय बर लागही मनखे ल । तेकर ले , जे हर जउन जगहा म अभी वर्तमान म रहत हे वोहर वोकर निज धाम आय अउ एला सजाना-संवारना ,मनखे के बुता आय ।


      अब तो सोनकमल के गहा भर आइस ,अउ वोहर ये ठउर ल अब अउ जादा पवित्र नंजर ले देखिस । वोकर हाथ दरवाजा म चूहे रंग मन ल पोंछे म लग गय। ले ... अब करत हस तब येला बने मन लगा के कर !वो अपन- आप  म कहिस अउ अपन हाथ ल चलाय चलाय करिस । 


        सोनकमल अपन बुता म लगे रहिस कि तभे वोकर कान म भद भद भद के अवाज सुनई परिस । वो नंजर ऊंचा के देखथे ...भारी भदभदहा बड़े डीलडौल के फटफटी म दु झन मनखे , वोकर मुँहटा म आके रुकिन हें । कोन ये येहर ! कनहुँ करा देखे हंव ,अइसन लागत हे । अरे !येहर तो वो शादी के कार्ड वाला...दलपत आय ! वोकर बर सगा -पहुना आय रहिस । वोकर उपर वो पईत चिखला फेंके रहिस अपन चार पहिया गाड़ी ले । एहर अब ,अउ काबर आय हे ?सोनकमल के जी हर धक धक करिस ।

"का ...सोन... कमल ! येई नांव हे न तोर ?" वो मनखे थोरकुन तीर म आत कहिस ।

"हाँ...!"सोनकमल ,अतकिच भर कहे सकिस ।

"तोर घर पहुना आय हन । बइठे बर नई कबे ।" वो कहिस ।

    

            अब तो सोनकमल पीछू घुंच गय, तब वो दुनों मनखे ,वोकर पीछू म आके बैठक म बइठ गिन ।

"लिपई - पोतई होत हे ,कहु लागत हे ।"वो मनखे ,सोनकमल कोती ल देखत कहिस ।

"सगा -पहुना के दिन आय न , भई राम ! अतका सब हर लगबे करथे ।" संग म आय ,दुसरईया मनखे हर कहिस ।


     एला सुनिस,तब सोनकमल फिर बक्क ले वोकर मुँह ल देखिस ।

"अभी तैयारी होत हे अउ हमन थोरकुन जल्दी आ गयेन , भई राम !"वो दूसरईया मनखे हर ,फेर कहिस ।

"कईसन तुमन इहाँ... ? मोर से कुछु काम ...?" सोनकमल पूछिस , वोमन ल ।

"कामे काम हे। बिन काम कोन काकर घर ल जाथे ?" वो दुसरईया मनखे हर ही जवाब दिस ।

"हाँ...बताव !"सोनकमल कहिस ।

" पहिली तो तोर से माफी ,माँगत हंव ।" दलपत कहिस ।

"का बात बर ...?"

"वो दिन जान बुझ के तोर ऊपर चिखला फेंके रहंय,गाड़ी ले ,तेकर बर ।"

"चल , वो कोई बात नई होइस ।" सोनकमल कहिस ।

"अउ दुसरईया गोठ हे कि..."संग वाला मनखे कहिस ।

"का...?"सोनकमल ,थोरकुन उखड़ गय रहिस ।

"दलपत दउ हर तोर बर सगा -पहुना आय हे ।"

"का...!!"

"हाँ...ठीक सुने तँय ।"

"येकर तो शादी -बिहाव हो गय न ?"सोनकमल अपन -आप ल रोके नई सकिस ।

" हाँ...।"

"तब फेर...?का वोहर छूट गय ।"

"वोहर काबर छुटही । छूटे बर बर -बिहाव थोरहे करे गय हे ।"

"तब फेर ...?"

" वोहर है त काय होइस । दलपत हर तहूँ ल बिहाही  अउ राखही ।"

"बाप रे ! तुमन के अतेक हिम्मत ?"

"दलपत ल का जिनिस के डर...?"

"मोर न सही । कानून -कायदा के भी..."

"वोला तो येहर जेब म धर के किंजरथे ।".

" तुमन मोर डेहरी म बइठे हव ..."

"जादा झन अईंठ नोनी ! येहर तोर तकदीर ये, कि दउ हर तोला मनवा डारे हे अउ तोर आगु म ये चुप बइठे हे। तँय ठहरे एकठन छै पैसाही नर्स !बस तोर अतकिच औकात हे। नर्स माने सबके..."

"तँय चुप परबे कि तोर जीभ ल अभी सुरलों !"सोनकमल अपन पेशा ल गारी, सहे नई सकिस ।

"चुप भी कर ,दीवान !"दलपत कहिस।

"मंय चुप परहाँ, तब तोर बात कईसन बनही ।" वो मनखे हर कहिस, तब फिर सोनकमल कोती ल देखत कहिस,"तँय जरूर नाराज होबे । तोर नाराज होना हर जायज हे, फेर मंय तोर दुश्मन नई हंव ।  तँय बात ल मान !ये छै पैसाही नौकरी ल छोड़ अउ चल दउ के घर म सुख से रहबे । तँय बड़कीच कहाबे ,काबर कि दउ के नंजर, तोर ऊपर बनेच पहिली ल हे ।"

"हो गय ...!कह डारे...!! मोर औकात ?मोर बाप के औकात ? तोर ये दाऊ हे तेकर ले कम से कम आधा जरूर होही ? छै पैसाही नर्स  अउ नर्स माने सबके...का ...? हिम्मत हे, तब गोठ पूरा कर !"सोनकमल , जो मन म अइस , वइसन बोले लागिस ।

"बलराम गौटिया अउ बिरीज गौटिन के  वंशावली तुमन के ,अपन घर आये मेहमान जान के स्वागत करत हे । लो !ये चाय पानी पियो !" सोनकमल कहिस ।

          

       वो दुनों जरूर चाय -पानी लिन ,तब सोनकमल वोमन ल कहिस, "लो ,अब तुमन जाव !" 

"बने ठंडा दिमाग ले मोर गोठ ल सोचबे, नोनी अउ खबर पठोबे ।" वो दुसरईया मनखे कहिस,"पहिली वाली हर हे, त का होइस ?राजा -राठी गौटिया -सामन्त मन तो एक झन ल जादा तो राखबेच करथें । बस एईच समझ ले ।"

"दीदी !हमन सब गोठ ल सुन डारे हन ! हमन  के रहत ल अउ कुछु जादा ऊँच -नीच हो जाय रथिस त वोमन ल..." पहिली पेंटर हर अपन गोठ पुरो नई पाय रहिस कि सोनकमल कहिस - नई लागे भाई ! तुमन जइसन भई मन के रहत ले महुँ ल तो गरब रहिस न कि संग म ये दुनों छोटे भाई मन हें ।


       सोनकमल वो दुनों झन ल चहा परोसत खुद अपन घलव प्याली ल उठा लिस,पिये बर।



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                   अध्याय 30

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        सोनकमल आज खड़े खड़े रात पहरा देय हे। अइसन कभु नई होय रहिस । मिडवाइफरी कोर्स के पढ़ई करे के  बखत म ,अइसन स्थिति के गोठ जरूर पढ़े रहिस,फेर आज तक ल पाला नई पड़े रहिस ।


           आज जउन जचकी होइस हे, तउन महिला ल अब धनुष- टँकार असन जिनिस के शिकायत आ गय रहिस । कई पईत होगय झटका परत । वोला जिला अस्पताल कि कनहुँ आन अस्पताल म ले जाय के सलाह दे देय रहिन ।फेर उँकर गोठ ल सुनके , महिला के संग म अवइया वोकर गोंसान अउ सास दुनों रोय बर धर ले रहिन ।

"अइसन रोये गाये ले काम नई चलने वाला ये।येला तुरते ताही आगु ले जाव ।"डॉक्टर वोमन ल थोरकुन रिसहा कहे रहिन, काबर के वोकर  इहाँ अउ रहई हर जादा जोखिम वाला गोठ हो जात रहिस । फेर वो जच्चा के सास हर नावा जन्मे लइका ल सँभारत आ गिस अउ कहिस ।भगवान जउन करे ,डाक्टरीन दई ! हमन येला अभी आन जगहा म ले जाएच नई सकन । ले जाबो तिहाँ ,तोरे च असन कनहुँ डाक्टर हर येला देखहीं ,तेकर ले तइच देख दे , माँ !"


        अब तो डॉक्टर विशाखा बंधा गय रहिंन । वो बंधइन संग म सोनकमल घलव बंधा गय ।अउ बंधाथिन का ...?येहर तो एमन के रोज के बुता रहिस ।


         डॉ. विशाखा सोनकमल ल वो प्रसूता के सघन मॉनिटरिंग बर कह दिन ।दवई -माटी जोंग दिन अउ खुद आगु जाके अपनेच हाथ ले वोला इंजेक्शन घलव लगा दिन । तुरत फायदा होइस,फेर थोरकुन बेरा के गय ले , वो बीमारी हर फेर उबक गय , अब तो दवई के हैवी डोज़ के पर्ची लिख, वोकर व्यवस्था बना के सोनकमल ल वहींच रुके बर कहके ,वो खुद अपन केबिन म आ गिन । अतका ले बनेच मुंधियार हो गय। दिया बाती बिजली बाती सबो बर गय ।


             अउ बजरंगबली ल दुनिया के सबला बड़खा स्काउट -सदा तैयार रहव ,मानने वाली सोनकमल बर येहर कोई बड़े बात नई रहिस ।आखिर वोकर आराध्य बजरंगी भी तो एईच बुता करथें  हाँ...फेर बजरंगी के आगु म सकल  त्रिभुवन के मालिक राम जी रइथें अउ इहाँ  वोकर आगु म ये नाना रकम के छेवरिहा मन रहिथें ।चल... इ सब मन तो राम जी आंय ,जानकी माई आंय ।


                 सोनकमल गुनिस अउ वो महिला ल देखिस ।दवा के असर म वोहर शांत फेर अशक्त दिखत रहय । छेवारी होवई हर नारी के दूसर जनम होथे ,फेर तभे ये सृष्टि हर चलत हावे । एक झन वोहर ये डहर म नई ये त का होइस ...!आगु म अबोल परे ये नारी हर तो हे... वृंदा हर तो  हे ! अपन जुन्ना नानपन के संगवारी वृंदा ल सुरता करत सोनकमल मुचमुचा उठिस । वृंदा के एक ठन अउ हो गय !अब भेंट पारहां, तब डॉ. विशाखा ल बला के घर म ही, वोकर टी.टी.आपरेशन करवा दिहां । का पता अउ लोभ करत होंही , वोकर घर के मन ।


             वृंदा के सुरता करे ले ये फायदा होइस कि सोनकमल के शरीर म नावा उछाह के संचार हो गय । साली वृंदा ! कईसन पसरे के शुरू हो गय हे एके लइका म । सारी !बहिनी , तोला गारी दे पारेंव । तँय कभु मोर अनभल नई सोचे अस , फेर मंय तोर बर अभी का अनभल सोंचत हंव । तोर सुरता भर तो करत हंव । अउ वोती , तोर गोड़ खुजियावत होही । 


             अतेक दिन ल रोज देखत  सोनकमल  ल घलव दवा -माटी के बनेच चिन्हारी हो गय हे,...न सोनकमल ! सोनकमल अपने आप म कहिस । फेर वोला लिखे के अधिकारी तो सर मेडम मन भर हें ।  डॉ. विशाखा सोनकमल के बुद्धि आंय ,त सोनकमल ,डॉ .विशाखा के बल आय । 


           तीन बजती रात के वो छेवरिहा महिला ल एक पइत फेर बने जोरलगहा ,दौरा परिस । सोनकमल बिन देरी करे विशाखा मेम ल लान के , भिड़ गय ये बुता म  । असर ...? दु मिनट म ही वो दौरा शांत हो गय ।

"सोनकमल...!"डाक्टर कहिन ।

"हाँ, मेडम ।"

"अब तँय जा , मोर जगहा म केबिन म अउ आंखी मुँद ले ,एको घरी ;येती मंय हंव तोर बलदा म निगरानी  रखहाँ ।"

"नई लगे , मेडम !जावा तूं आराम करा ।लागही तब मंय ,फेर बला लिहां ।"सोनकमल बड़ मजबूती ले कहिस ।

"अरे जा !मंय एको झपकी आंखी मुँद डारे हंव ।फेर येला पूरा मॉनिटरिंग के जरूरत हे । मंय देखहाँ येला पूरा । आज हमर ये बेड हर ही,ये बोपरी बर आई.सी. यू. बन गय हे । उहाँ घलव अतकिच तो होही , बस न ।" डाक्टर विशाखा कहत रहिन । वो तो अपन दवई के तुरते- ताही रेस्पॉन्स मिलई ल देख के खुश हो गय रहिन ।फेर सोनकमल चुपचाप उनला सुनत भर रहिस ।

"अरे जा !तोला मोर ऊपर विश्वास नई ये का ...?"डॉ.विशाखा हाँसत कहिन ।

"मेडम...!!सोनकमल तुँहर ऊपर अपन आप ले जादा विश्वास करथे ,फेर ये पेशेंट हर घलव डॉ. विशाखा के आय, वो सोनकमल नर्स के थोरहे ये ।"

"वो सब ठीक हे !रात के बेरा ये । जइसन मंय कहत हंव ,वइसन कर । जा आँखी भर मुँद लेबे । तँय बने रइबे, तब न अउ आन के सेवा करबे । का पता...काल येकर ले अउ बिगड़हा कुछु केस आ जाही ।" डाक्टर ,वोला लगभग धमकावत कहिन ।

"त का होही, हमर जतेक बल अउ बुद्धि हे , वोतेक करे सकबो मेडम !" सोनकमल कहिस ।अब तो डॉक्टर वोला, ढकेलत ,उहाँ ले भेज दिन ।


                   सोनकमल मैडम के हुकुम के मान रखे बर , उँकर केबिन में आ गय। अउ इहाँ आके सिरतो म  वोकर आँखी मुँदा गय । ये सिद्धि तो वोहर पायेच रहिस कि जब मन लगे तब  निद्रा देवी ल ,वोहर बला ले ।


       थोरकुन देर बाद वोकर कान , श्रवण- इंद्रिय म तीर के क्वार्टर में ले भगतराम के कुकरा के बासे के अवाज पहुंचे लगिस । आज ए देसी अलार्म के अवाज  सुनके सोनकमल   के आँखी खुल गय । वोहर  ये  देसी अलार्म ल सुन के वोकर ऊपर  मुचमुचा उठिस । अब वो झटपट आँखी में पानी छीटा मार के,  मैडम के जगह पहुंच गए । 


          वहां मैडम तो खुदे निडिल -सिरिंज धरके  वो प्रसूता ल सूजी लगात रहिन । वो सोनकमल के बाँटा के बुता ल   खुद  करत  रहिन ।

" देवा मैडम ,मोला । "सोनकमल कहिस ।

"अरे ! तँय आँखी मुंदे कि  नही ?"

" मंय आँखी घलव मुँद डारें,अउ आराम घलव कर डारें ; अब येती के बुता ल मोला बतावा अउ तुँ अपन क्वार्टर जावा । मेडम येकर रिकवरी ...?"

"बने तो लागत हे, सोनकमल !आगु देख प्रभु इच्छा । "

"हाँ, मेडम !

"हमन से जउन भी बेस्ट होही ,येला देवत हन, अउ आगु  देबो घलव ।शहराती मल्टी हॉस्पिटल मन के फेसिलिटी हमन ,येला इहाँ जुगाड़ कर के देबो,जब येकर परिवार हर  येला शहर ले जाय बर समरथ नई ये तब ।" डॉ. विशाखा,थोरकुन जमहावत कहिन ।

"बिल्कुल मेडम ! येहर तो हमर बुता ही आय ।"सोनकमल कहिस, "लेवा तुँ अभी जावा,मंय तुँहर बताये सबो जिनिस ल कर लिहां ।"


               अब तो डॉ.विशाखा ,उहाँ ले बाहिर निकल आइन अउ अपन क्वार्टर कोती जाय लगिन । थोरकुन बेर बाद म,  बेर-बादर उ के ये दुनिया ल फेर जगर मगर कर दिन । वो छेवरिहा के ससुर , वोकर तीर म डरत -सहमत  आइस ,अउ हाथ जोर के सोनकमल ल देखे लगिस ।

"सियान ! हाथ तो वो आदित्य भुवन -भास्कर बर जोर । अब येहर खतरा ले बाहिर हे।अतेक बड़ डाक्टर ,येकर तीर म रात भर बइठ के नर्स के बुता तक ल करे हे ;तेकर पुण्य के फल तो येला मिलना ही हे ।"सोनकमल कहिस । वो सियान के हाथ , अब ले भी जुरेच रहिस ।


        आज के दिन बर नावा स्टाफ मन आ गिन । वोइच संग म डॉ. विशाखा घलव आ गिन ,अउ सोनकमल ल ,अपन क्वार्टर जाके परच्छर होय बर इशारा करिन । मतलब मैं आ गय हंव ।


             सोनकमल झटपट उहाँ ले निकल के अपन क्वार्टर म आके  फ्रेश होके फेर हॉस्पिटल पहुँच गय । तब वोकर कान म डॉ भद्र के  बड़बड़ाय के अवाज सुनई परिस - कोन जानी येमन ल का मिलही । हर हमेशा खतरा मन ले खेलत रहिथें । ये इक्लेमसिया पेशेंट ल, बड़े अस्पताल म रिफर नई करके ,इहेंच ल आई .सी.यू. बना देय हांवे  येमन !

"त का हो गय डाक्टर !" लेडी डाक्टर जांगड़े,वोल ओझी देत कहिन । तभे गुड मॉर्निंग डॉक्टर्स कहत सोनकमल वोमन के आगु आ गय ।

"सोनकमल !तँय आज दिन भर ,मोर संग म रहिबे । "डॉ. जांगड़े कहिन ।

"जी मेडम ! बिल्कुल काबर नहीं..." सोनकमल कहिस ,तभे  सबो झन ल गुड मॉर्निंग कहत डॉ. विशाखा देवांगन फेर आ गिन हॉस्पिटल के ओ.पी.डी. केबिन म ।

"मेडम ,आज सोनकमल मोर संग म रहही ।"डॉ. जांगड़े हाँसत कहिन ।

"बिल्कुल भी नहीं मेडम !वोकर आज दिन भर के आराम करे के छुट्टी देवत हंव ,मंय । वो अपन क्वार्टर जाके आराम करे । वो जचकी पेशेंट हर रिकवरी कर डारिस  हे । अब वो खतरा ले बाहिर हे ,तभो ले दु दिन इहाँ अउ रहही ।" डॉ. विशाखा कहिन ।


          सोनकमल  कुछु नई कहिस ,बस वो मुचमुचा के रह गय । तभे वोकर नजर आज के समाचार म पर गय ।आज तो चुनाव परिणाम अवइया हे । गजट ल चिभिक ले के लहुटात सोनकमल के नजर  जाने चिन्हे असन लागत ये चेहरा के ऊपर पड़ गय , वोकर तरी म लिखाय रहिस - दलपत सिंह नौ हजार छप्पन मतों से विजयी ...



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                 अध्याय 31

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"बधाई हो, सोनकमल !"डॉ. विशाखा चहकत सोनकमल ल कहिन ।

"का बात के मेडम ? नई जानत अंव,तभो ले धन्यवाद ।" सोनकमल हाथ जोरत कहिस ।

"तोर प्रमोशन हो गय , बहिनी !"डॉ. देवांगन थोरकुन भावुक होत कहिन ।

"बुता तो एइच करना हे न मेडम !"

"हाँ, फेर जिम्मेदारी जादा बाढ़ गय न ।"

"अउ पइसा घलव न , मेडम !"

"हां...!थोर बहुत तो बढबे करथे , नहीं त का जिनिस के प्रमोशन ?" डॉक्टर कहिन अउ लेटर ल निकाल के सोनकमल ल दिन ।


         सोनकमल ए. एन. एम. ले अब एल.एच .वी. बनगे ।  आक्जलरी नर्स मिडवाइफ ले लेडी हेल्थ विज़िटर बन गय । आक्जलरी नर्स मिडवाइफ रहिस,तब वोकर बुता रहिस -गांव -गंवतरी म रहके , स्वास्थ्य विभाग के पहिली मनखे बने के ।  स्वास्थ्य विभाग के कई तल्ला के महल -अटारी के  नींव के पहिली पखरा, फेर वोहर अब तक ल ये पी.एच. सी. म स्टाफ -नर्स जइसन बुता करत रहिस हे । हरा साड़ी हर वोकर , चिन्हारी रहिस । हरा साड़ी ले अब  वोला नीला साड़ी पहिने के अवसर मिलही । स्टाफ- नर्स मन के,  बगुला पाँख असन झक्क सादा  ड्रेस के तो का कहना !

"काहीं कुछ नई होय !जइसन चलत हे, वइसन ही चलही ।"डॉ .विशाखा कहिन ।

"अभी तो तुँ अफसर  हवा । तुँहर बोले ले ही , सबो जिनिस मन होंही ।"

"हाँ...! कम से कम ये पी.एच.सी. म तो होबे करिही । तँय प्रोमोशन के फार्मिलिटी पूरा कर अउ बुता तोला ,इहाँ रहके पहिली असन , स्टाफ नर्स के ही करे बर लागही ।

"मेडम , बस तुँहर आशीर्वाद अउ हुकुम चाहिए ।"सोनकमल हाँसत कहिस ।

"इहाँ घलव मनखे के तो कमी रहिबे करत हे, अइसन म तँय , कागज -पाथर पूरा करके,इहाँ के ही ड्यूटी ल कर ।"

"जी मैडम !"

" इहाँ घलव वोइच लेडीज- हेल्थ के बुता तो सबो झन करत हावन न ? बड़े ले बड़े बिगड़े केस ल तोर , भरोसा म पार कर डारे हन ।"

"मोर भरोसा का ,मेडम !वो तो पार करने वाला , कनहुँ आन हें ।"सोनकमल के आँखी मुँदा गय अउ बन्द आँखी भीतर म कनहुँ झलक उठिस ।


       अब तो डॉक्टर मेडम वोला देखत मुचमुचात भर रहिन ।

"चल अच्छा !अभी तो तँय ,तोर ये भूमिका ल स्वीकार !कागज -पाथर फार्मिलिटी संजोर ।पाछु के बात पाछु देखे जाही ।" डाक्टर मेडम कहिन वोला...


*           *            *             *               *


" सोनकमल, तँय संग म रहथस तब मोला बहुत बल मिलथे । येकर सेती, मंय तोर पदस्थापना, ये तिरेच के लोकलिटी म कर देय हंव । तँय जइसन आज तक ल ये हॉस्पिटल क्वार्टर म रहत हस, वइसनहेच रह । मंय परमिशन देवत हंव ।" डॉ. विशाखा ,सोनकमल ल अपन केबिन म बला के कहिन।

"मोला कोनो तकलीफ नइये मेडम !अउ काम -बुता तो कनहुँ करा रहिबे , करेच बर लागही । आपमन के इच्छा म ही , मोर इच्छा हे ।फेर ये बुता बर बहुत- बहुत आभार घलव !"सोनकमल हाथ जोरत कहिस ।

"चल छोड़ ये आभार उवा देय के  बनावटी  भाखा ल !जइसन ये हॉस्पिटल हर मोर ये,

 वइसन  येहर तोर  ये । अउ कम्युनिटी के भी एइच बात हे। कम्युनिटी ल हेल्थ सर्विस देय बर तोर हमर नियुक्ति करे हे सरकार -दुआर हर। येकरे बर हमन ल , तनखा खवावत हे।" डाक्टर मेडम भाषण देय असन कहिन ।

"हाँ मेडम , ये बात तो जरूर हे।"

"तब दिल खोल के बुता कर ; जिहाँ मन लागे उहाँ ! तँय ये सिस्टम ल आन नई होय अस ।"

"हाँ मेडम !मंय जउन जिनिस बर ये सिस्टम ल अपन बर चुने हंव, वोहर सोनकमल के आखिरी  साँस के रहत ल ,वोकर वो बुता बन्द नई होय , चाहे सोनकमल कनहुँ जगहा म रहे ।"

"वाह सोनकमल... !"

"तोर संकल्प ..."

"सोनकमल के रहत ले वोकर अपन जात महिला जात हर ये प्रसव पीड़ा ये छेवरिहा बुता म कुछु खोट झन पाय । वोला बढ़िया स्वास्थ्य सेवा मिले ...बस एइच हर सोनकमल के नान बुटी संकल्प आय ।" सोनकमल घलव आज बोहा गय रहिस, भावना के बहाव म ।


           सोनकमल अपन प्रमोशन पद एल.एच. वी. ल जॉइन करे के बाद घलव पहिलीच असन , स्टाफ नर्स के बुता म लगे रहिस ,अउ वोला का के भय रहिस -वोला समोखने वाला तो कोई अउ आन रहिस , डॉ. विशाखा देवांगन रहिन ।


*           *           *              *              *


"सोनकमल ! सोनकमल ...येती आ !!" डॉ. विशाखा सोनकमल ल हाँक पारिन ।

"कइसे का हो गय , मेडम ?" सोनकमल घलव हकमकात वोकर कोती आइस ।

"गजब हो गय...!!"

"का हो गय...मेडम ?"

"तोर ट्रांसफर हो गय..."

"कहाँ अउ कइसे ?"सोनकमल कहिस ,येला सुनके ,एक पइत वोहू अकबकाइस ।

" येई तो अचंभा ये ।अरे ट्रांसफर हर ,तो सरकारी कर्मचारी के जात -धरम ये ।वोमन तो जिंदगी भर  पूरा सेवाकाल म इहाँ -उहाँ होतेच रहिथें । अउ ट्रांसफर आर्डर हर पूरा बंच म निकलथे, एक संग कोरी -सौ मनखे मन के एके संग होथे,वोहू हर बैन ओपन होय के बाद , फेर इहाँ तोर नांव के ये एकड़ा सिंगल ऑर्डर लेटर निकले हे । लागत हे कनहुँ भिड़ -भाड़ के करवाय हावे, नियम कानून ल ताक म धरके । अरे !तँय नई करबे,तब मंय करहाँ। मंय ये आदेश ल प्रोटेस्ट करहाँ, हाई कोर्ट जाय बर लागही,वकील धरे बर लागही ,तब ले मंय धरहाँ, तँय दस्तख़त भर कर देबे ! बाकी मोर ऊपर छोड़ !" विशाखा मेडम ,वो लिफाफा ल धरे थरथर काँपत रहिन ,"कोन बैरी के नजर गड़ गय येकर उप्पर रे..."


       मेडम ल अइसन भकचकात देख के पहिली ,सोनकमल ल थोरकुन हाँसी आ गय । वोला देखके , मेडम थोरकुन रोसिया गिन -अब समझें मंय । चोरी लुका हाथ पांव जोड़ ,हजार बजार फेंक के ...बस तँय खुद कराय हस अपन ट्रांसफर ल !"

"मेडम ,वो तो ठीक हे, फेर काकर अउ कहाँ ट्रांसफर होइस हे !"

"अतेक भोली काबर बनत हस ,सोनकमल !तोला हमन के साथ प्यारा नई ये ,अउ तँय हमन ल असकटा गय हस,त पहिली काबर नई बताय, जब ट्रांसफर ले बैन हटे रहिस तब ,वो समय  , मैं खुद तोर मनचाहा ट्रांसफर करवा देय रहिथें ।"

"मेडम...!"

"अउ का हो गय । जा दई, जिहाँ जाहाँ कहत हस तिहाँ ..."

"मेडम ! मेडम... !! " सोनकमल ,जाके मेडम के हाथ धरके  हलाइस ।

"हाँ...!"

" काकर कईसन कहाँ ट्रांसफर होय हे । मंय कुछु नई जानत अंव ।"

"सिरतोन...?"

"सिरतो मेडम ! मोला मोर किरिया ! मंय येकर बारे मे कुछु नई जानत अंव ।"

"अइसन का..."

"मोला, मोर ले बढ़के अउ ऊंचा जिनिस जउन हे, डॉ. विशाखा के किरिया !मंय एकर बारे मे कुछु नई जानत अंव ।"

"अरे , कपटाही !मोर किरिया झन खा , नहीं त मंय तोर कपट  म , मर जाहाँ ।"डॉ. विशाखा हाँसत कहिन, फेर उँकर आँखी हर डबडबा गय रहिस ।

"मेडम...!"सोनकमल थोरकुन चिल्लावत कहिस ।

"देख तो ट्रांसफर के नांव म कईसन कुलकत हे  रे बबा !" डाक्टर कहिन ।

"चला वोइच सही, जो तूं कहत हावा, फेर पता तो चले, सोनकमल के कहाँ ,ट्रांसफर होइस हे  ?"

"हाँ...तँय रहिबे तो एइच जिला म ,फेर ब्लाक बदल गय। पड़ोस के ब्लाक के बड़े गांव -बावनगढ़ी म तोर हेडक्वार्टर रहही !"

"बावनगढ़ी ...???"

"हाँ...एई तो लिखाय हे ।"

"बावनगढ़ी ..."

"हाँ...बावनगढ़ी !" डाक्टर मेडम ,कागज ल एक पइत अउ पढ़त कहिन ।






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                  अध्याय 32

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"मैं पूरा के पूरा इंक्वायरी कर डारे हंव ,सोनकमल !"डॉ. विशाखा देवांगन,अशक्त दिखे कस,अपन दुनों हाथ ल टेबल ऊपर म लमा के कहिन ।

"का जिनिस के इंक्वायरी, मेडम...?"सोनकमल अपन रूटीन वर्क म लगे रहिस,वो वायल ले सूजी लगाय बर ,दवाई तीरत कहिस ।

"यही कि तोर ट्रांसफर के वजह का हे ।"

"तब बतावा फेर...?"सोनकमल हाँसी -ठिठोली करे के वरन म कहिस ।

"अरे ,ये अभी-अभी चुनाय नेता...का नांव कहथें वोकर...दलपतसिंह ! एहर पोगरी रुचि लेके तोर ट्रांसफर अपन जगहा म करवाय हे ।" मेडम  कहिन ।

"ये बबा रे...!!"सोनकमल अतका भर कहिस ।वोहर हाथ म भराय सूजी ल, लटपट आगु म इंतजार करत सियानीन ल लगाय सकिस ।

"कइसे का हो गय...!!"डाक्टरीन दई कहिन ।

"कुछु नहीं मेडम...! हमर जइसन छोट बुटी करमचारी के ट्रांसफर कराय बर, ये राजनेता टोपी वाले मन ल का जरूरत आ गिस ? बस...एइच ल गुन डारें,अउ मोर मुख ले एहर निकल गय ।" सोनकमल कहिस ।अतेक दिन एक संग म रहे के बाद घलव,सोनकमल हर मेडम ल जम्मो जिनिस नई बताय ये । शादी -बिहाव के नांव म , वोकर एके ठन हथियार रहिस...मेडम तुँहर सुख- सनाथ तुँहर बर -बिहाव ल पहिली देखही सोनकमल,तुँहर मंड़वा म पहिली नाचही सोनकमल ,तेकर पाछु वो एकर बारे मे गुनही । वोहर दलपत के लिरी -लिगरी ल , मेडम ल एको नई बताय रहिस हे ।

"सोनकमल !ये अभी के चुनाव जितइया मनखे हर कतको बड़े राजनीति दांव-पेंच वाला होही त का होत हे । विशाखा ,खाली इहाँ बइठ के गोबर के कंडा भर नई बीनत ये । वोकरो थोर-मोर पुर -पहुँच होही , एक फोन एक लेटर म तोर ट्रांसफर ल रोकवा दिहां मंय ।" मेडम थोरकुन भड़क गय रहिन ।

"बहुत बहुत धन्यवाद ,मेडम ! फेर अभी तो टारा ये गोठ ल । पहिली गुनन देवा,तेकर पाछु बर तूं तो बइठे हावा न ।"सोनकमल ,डाक्टर के आगु म हाथ ,जोरत कहिस । येला देख -सुन के मेडम के गुंगुवात चेहरा म ,सदाकाल विराजने वाला हाँसी के लोर ,उपला अइस।


*          *             *              *          *


"ले सोनकमल ,येहर तोर अपन फैसला आय ,तब हम कोन होथन तोला रोकने वाला !" विशाखा मेडम ,खुद अपन निज हाथ ले ,विदाई -समारोह म सोनकमल ल मिले गिफ्ट मन ल सरियात कहिन ।

"मेडम...!"

"अरे ,एइला सियान मन कह देय हांवे..."

"वो का मेडम ?"

"का मेहंदी के रंग के का परदेशी के संग...दुनों के दुनों दिन चार के ।"डॉ. विशाखा हाँसत कहिन, फेर अब उनला अपन आँखी मन ल पोंछे बर लग गय रहिस, "कनहुँ करा भेंट बे ,तब चिन्हबे कि नई चिन्हबे सोनकमल !"

"मेडम...जादा च झन करा न !"सोनकमल कहिस,अउ उँकर गोड़ ल धर डारिस ।अब तो विशाखा मेडम ल वोला धर के,उठाय बर लागिस ।

"देखे पूरा के पूरा कम्यूनिटी हर कईसन तोर संग हे, तोर उपर अतेक दवाब भी पड़िस हे कि तँय इहाँ ले झन जा ! फेर तोर मन के इच्छा जान के तोला इहाँ ल रिलीव करत हन ।"

"मेडम..."

"अरे तोर ट्रांसफर रोके के फाइनल बुता हर तो मोर हाथ म हे, जब तक तोला रिलीव नई करहाँ,तब तक तँय कहां जाबे ।फेर तँय अपन इच्छा ल बता देय, तब तो तोला रिलीव करेच बर लागही न ...!डॉ. विशाखा कहिन अउ सोनकमल ल वोकर ,रिलीविंग आर्डर ल थमा दिन ।


*           *             *               *               *


                   बावनगढ़ी ! चल इहों के ये क्वार्टर हर बने मिल गय हे ।पहिली जम लों, तेकर पाछु घर म बताहूँ । पहिली बताय ले,ददा हर तो ,ये नौकरी ल छोड़वा के ही मानथिस ।दई हर भले ही ,कुछु नई कहथिस ।वोहू म ये बात ल जान के ,कि कोई हर, व्यक्तिगत रुचि लेके वोकर ट्रांसफर कराय हे, तब तो  बाते हर नई बनथिस । सोनकमल अपन समान मन ल ,नावा क्वार्टर म जमाइस । इहाँ न तो पी.एच. सी. ये ,न अउ आन सीनियर वोकर ले ,ये दस बारह झन ए. एन. एम. नोनी मन हें,जेकर वोला मुखियागिरी करना हे । अउ वोमन के थ्रस्ट एरिया ये गर्भवती- महतारी मन के बुनियादी सार- संभाल , टीकाकरण... बाँचे- खोंचे म हायजिन अउ सैनिटरी के बुता अउ ये सब मन के प्रचार -प्रसार येमन के बारे मे जनता म जागृति पैदा करना ।

"का का नांव हे जी नोनी मन  तुमन के । अउ मंय सोनकमल -तुमन के एल.एच. वी. दीदी ।" सोनकमल अपन परिचय -चिन्हारी देवत कहिस ।

"जोहार दीदी !तोर बड़ नांव सुने हावन ओ ।"

"वो का बात के दई ...?"

"तँय बड़ पोठ कार्यकर्ता अस,तेकर पाय के दाउ जी हर तोला ,इहाँ अपन इलाका म लाने हांवे ।"

"होही बहिनी,येकर से हमला का ! जतका बुद्धि -अकिल भगवान देय हावे, वोतकिच तो करे सकबो न..."

"हाँ...ये बात तो हावे दीदी । दीदी, मंय रूपा विश्वकर्मा "

"बढ़िया...!"

"मंय चन्दना यादव !"

"मंय शीतल यादव "

"मंय जानकी डड़सेना "

"मंय श्रुति साहू...!"

"अउ तँय नोनी...?"

"मोर बारी छेवरेच म आथे दीदी, मंय अन्नपूर्णा लहरे अंव ।"

"बढ़िया बहिनी हो ,सबो जुरमिल के बुता ल करबो । सबके सेक्टर हर सबके आय ।" सोनकमल ,सबो ल समोखत कहिस अउ महतारी के भेजे करी लाडू अउ मुंगफली लाडू सब झन ल निकाल के खवाइस ।सबो चिखिन...

"दीदी,तँय ये लाडू ल खवा के  मुंह म मिठास अलग भर देय अउ हमन ल बंधाय लाडू असन एक रहे के गोठ घलव सिखो देय ।" अन्नपूर्णा सिस्टर कहिस ।

"इहाँ कोन ल कोन सिखोय सकही बहिनी,सबो झन करा अपन मति-बुद्धि हावे । सिखोय के गोठ निकलत हे, तब सीखोइया रहे डॉ. विशाखा देवांगन असन अउ सिखइया रहे सोनकमल असन ,तब सीखे अउ सिखाय के आनन्द हे बहिनी । वइसे सब बनेच पढ़े -गुने हव,सब अपन बर ...आत्म दीपो  भव बनव , अपन रस्ता ल उजियार करे बर खुद दीया बनव, तब फेर सबो जिनिस हर पुरुत के पुरुत खुलत जाही ।"

"दीदी, तोर गोठ हर बने लागत हे ओ !"

"बने एकर बर बहिनी,कि मंय कुछु नावा गोठ थोरहे कहत हंव , ये सब हर सदाकाल चलइया शाश्वत गोठ आय ।" सोनकमल थोरकुन मुस्कुरात कहिस,फेर वोला लागत रहिस कि वोकर हाथ ले कुछु निकता बनेच निकता जिनिस हर गंवा गय हे...का ये ,ये जिनिस हर? हां...डॉ. विशाखा के छत्र -छाया हर ये  जिनिस हर,जउन हर अब नई मिलय ,फेर अभीचे तो वोहर खुद कहिस हे न...आत्म दीपो भव...अब आगु वोला खुद अपन दीया अपन आप ल बने बर लागही ।

"दीदी,का गुनान म पर गय?हमन के संग ,तोला नई भावत ये का ओ ?" श्रुति सोनकमल के मुंहुँ ल देखत कहिस ।

"नहीं बहिनी , अइसन कुछु गोठ नइये ।तोर नांव अतेक सुंदर-श्रुति... श्रुति साहू न अउ मनखे हर तँय ,तोर नांव ले जादा सुंदर हस ;तुमन के संगति म अब जीवन पहाना हे, तब ये संगति काबर बने नई लागही ओ ।"

"कुछु कुछु कहत रह दीदी !ये पइत हमन ल लागत हे कि चल बने रूप वाली हेड दीदी मिलिस हे ।" शीतल कहिस ।

"तोर नांव घलव बड़ सुंदर हे दीदी ! सोनकमल  न कि स्वर्ण कमल ?"

"बहिनी, मोर नांव सोनकमल आय,अउ मोर जम्मो कागज-पत्तर म एइच लिखाय हे ।"सोनकमल हाँसत कहिस ।

"फेर मतलब तो वोइच आय न स्वर्ण कमल माने सोन के कमल !"

"होही बहिनी...!"

" दीदी ,तोरे असन ल देख के तो कवि मन कविता लिखथें ओ !"

 "बस बहिनी हो बस...सब एक ल आगर एक हव जी । मंय बस तुमन ले एक जिनिस म बड़े हांवो,वोहर ये उमर बस ।"

"दीदी, कुछु बने सिखवना दे ।"

"सिखवना कहत हस...!"

"कहने वाला बड़े,फेर वोकर ले बड़े करने वाला ! सिखवना कहत हव...तब सुनो, सुने सकिहा तब ?"

"तँय कह तो दीदी, जउन भी कहबे, तउन हर निकताच गोठ होही ओ !"

"तब सुनव...! हमर पेशा नर्स...! अउ समाज हर हमन ल थोरकुन आन नंजर ले देखथे ।तुमन समझत हव न ,मंय काय कहत हंव तउन ल ?"

"समझत हन दीदी,अउ एहर सोलह आना सच गोठ आय ।" रूपा  विश्वकर्मा कहिस ।

" लड़की मास्टरीन आय,तब वोहर बढ़ियाच होही अउ लड़की हर नर्स आय,तब वोहर बिगड़हा ही होही !ये मंय नई कहत अंव,येला समाज हर कहिथे ..."

"सोलह आना सच गोठ..."

"तब हमन ल ,नर्स के ये छवि ल बदले बर लागही ।सब अपन सोझ डहर म आव अउ सोझ डहर म जाव।सब अपन काम बुता ले साबित कर दव कि नर्स हर महतारी के मया के मोटरी आय ।"

"दीदी...!!" जानकी हर खुशियाली म अतकिच भर कहे सके रहिस ।


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                अध्याय  33

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              नाक म कुसियार पेरे -चुरोय के मीठ-मीठ कहर पेलत हे । ये सुवास हर अतेक मीठ हे, तभे तो पूजा - आंचा के बेरा म गुगुल धूप के संगे -संग गुर -घी के घलव आहुति ना लेथें पूजा करइया मन । जरूर तीर तखार म कुसियार बरछा होही । वो खुद भूमि- पुत्री किसनहा बेटी आय,वोकर खुद के अतेक बरछा- बारी हे,तभो ले ये नौकरहिन बन गय हे, तब वो कईसन ललात हे ये सुवास बर ...सोनकमल खुद म कहत खुदे थोरकुन लजा गय । चल...अभी तो पेट भर पी लंव ये सुवास ल ! नाक हर घलव वोइच इन्द्रिय तो आय न जइसन ये रसना -जीभ हर हे । अइसन गुनत सिरतोन म सोनकमल लंबा- लंबा सांस खींचे लगिस ।


       अभी वोहर तैयार होके अपन वो 'चिरइया' मन के...जइसन वो कहे,इंतजार करत हे । शुरू ले ही वोकर उसूल बन गय हे, तँय इंतजार कर फेर तँय आन कनहुँ ल इंतजार झन करवा ! आज फेर सेक्टर -मीटिंग हे, जम्मो 'चिरइया' मन अपन अपन प्रोग्रेस -रिपोर्ट लेके आहीं । अभी तो टीकाकरण अउ फैमिली प्लानिंग उपर ही जादा ध्यान हे सबके । अउ ये दुनों मन रूरल हेल्थ के सबले चैलेंजिंग एरिया घलव ये। लइका मन ल,ठीक समय म  टीका लगवाय बर, वोकर महतारी- बाप मन भुलाइच जाथें । चल ! वो तो वोकर अपन ये चिरइया मन ल ,एकठन अलगी रजिस्टर बनाके अपन आश्रित जम्मो लइका- पिचका मन के अलग चेक -लिस्ट बना के राखे बर तैयार कर डारे हे ।


         सोनकमल फगुनहा हल्का जाड़ म घाम तापे के आनन्द लेवत अपन ए. एन. एम. मंडली के इंतजार करत हे ।

" दीदी -नमस्ते !"

"ये आ आ केकती !फेर केकती कि केतकी ?"

"केतकी दीदी !दीदी मंय केतकी फूल अंव न,अउ मोर मार्कशीट मन म एइच लिखाय घलव हे ।"

"वोइच ये बहिनी,संस्कृत के केतकी हर, हमर अपन भाखा म केकती हो गिस न !"

"ठीक है दीदी,तँय तोर मन लागही,तइसन कहले जी !"केकती कहिस ।

"फेर ये कैन म का धरे हस नोनी...?" सोनकमल,केतकी के हाथ म धराय वो स्टेनलेस स्टील के कैन ल बनेच देखत पूछिस ।

"दीदी, ये थोरकुन कुसियार रस ये ओ ।  पीये अउ रसावर बनाय ,दुनों के पुरता ।" केतकी कहिस ।तब तक ये काये जी...कहत शीतल आ गय ,तब तक सबो झन आईच गिन, काबर कि वोमन जान डारे रहिन -सोनकमल दीदी तियार होके वोमन ल अगोरत रइथे ।

"आवव आवव जी , चिरइया मन !सबो झन के अभिनन्दन हे , नोनी हो !"सोनकमल खुश होवत कहिस ,काबर के वोकर हाथ म चमकत सोनहा वरन के घड़ी म अभी दस बजे बर पांच मिलट कम रहिस । दस बजे बैठक जुरे के समय रहिस ।

"दीदी,ये थोरकुन चना होरा अउ घी ये !चीख लेबे तब मोला बने लागही ।" अन्नपूर्णा कहिस ।

"जरूर बहिनी ,जरूर  , वो काबर नई चिखहां!" सोनकमल कहिस," फेर मोला आशा नहीं पूरा विश्वास हे कि तुमन केवल कागज म ही सब कुछ करके नई आय होइहा,बल्कि जउन करे होइहा,तेकर ये कागज मन एकठन नमूना होहीं । कागज रंगइया तो पूरा दुनिया हे, फेर असली मैदानी लड़ाई लड़ने वाला बनेच कम हें ।"

"दीदी, मोर रिपोर्ट हर जउन करे हंव,सोलह आना वोइच आय ।" शीतल कहिस ।

"अउ हमन के हर ,बस एकदम फाल्स ये रे शीतल,तहूँ कहथस त...?" श्रुति तो शीतल के गोठ ल सुनके,थोरकुन तमक गय रहिस ।

"बइठा... बइठा अब !सबो के रिपोर्ट पोठ रहे अउ बुता घलव  । चलव आज के ये हमर बैठक ल थोरकुन फॉर्मल रूप देई । वन्देमातरम अउ जनगणमन खाली स्कूले मन बर रह गय हे का ? "सोनकमल हाँसत कहिस ।

"नहीं तो दीदी...!"

"तब फेर आज ले हमर बैठक, समीक्षा- बैठक सबो राष्ट्रगीत वन्देमातरम ले शुरू होही अउ छेवर राष्ट्रगान जनगणमन ले ।" सोनकमल कहिस ।

" तब तो बढ़िया लागही एहर ! " अन्नपूर्णा सिस्टर कहिस ।

" सब झन ल राष्ट्रगीत अउ राष्ट्रगान के प्रोटोकॉल मालूम है न कि भुला गया अपन स्कूलिंग पीरियड ल...? सबला अपन जगहा म खड़ा होना है अउ सावधान सम्मान देना है, वृंदा ..."

"ये वृंदा कोन , दीदी ?हमर बीच म तो अइसन कनहुँ वृंदा नइये ?"

" वृंदा , मोर संगवारी ये । स्कूल कॉलेज के दिन म वोई हर ,स्टेज म चढ़ के सावधान -विश्राम कॉशन देवत प्रेयर कराय । ए बुता के वोहर बड़ शौकीन रहिस,अउ उस्ताद घलव ।"सोनकमल ,एक पइत फेर वृंदा के सुरता म मात गय ।

"वोहू हर अब तोरे कस हेड सिस्टर हे ?"

"नहीं , वोहर मालगुजारिन बन गय हे ।दु झन डारा -शाखा बना डारे हावे अउ खुद अपन हर चकरेठी हो गय हे ।' सोनकमल कहिस,तहाँ ले एक पइत फेर ,बो कॉलेज के छेवर पेपर के दिन , लगभग वोमन संग होय वो छेड़खानी , जइसन वृंदा मानत रहिस ,तेकर सुरता वो कर उठिस । चल ,अब तो वोकरेच इशारा म ,वोकरेच गांव म अब नौकरी करत हंव , नहीं त ये गांव हर वोकर ससुराल कहाथिस । तीन -चार महीना तो हो गय, फेर अभी तक तो सामना नई होय ये ,कोई जगहा म, फेर जब हो जाही त ? सोनकमल न वो दिन नई डरात रहिस, न आज डरात ये , न काल डराय । मनखे ल मनखे से का के डर ?  ये लइका मन पूरा राम -कहानी थोरहे जानत हें ,कि वोमन के ये नेता हर वोकर बर सगा -पहुना गय रहिस, वृंदा अउ वोला छेंके रहिस, जुन्ना जगहा म वोकर ऊपर चिखला फेंकिस गाड़ी ले,अउ बिहाता होये के बाद घलव वोकर आगु म निर्लज्ज होके  वोला दूसरा औरत के रूप म रखे के कोशिश घलव कर डारे हे वोहर ...अब आगु का करही ? सोनकमल ल डर ?कभु नहीं...!बस न...


           सोनकमल ल थोरकुन गंभीर होवत देखके , संगवारी मन थोरकुन सकपका गिन ।अभीचे तो दीदी ,बने रहिस,फेर आ का होगिस वोला ? तभे अन्नपूर्णा हर वातावरण ल हल्का करे बर ,थोरकुन इठलात कहिस - दीदी ! तोर स्कूल म वो वृंदा दीदी हर प्रेयर कराय ।तब इहाँ के वृंदा, मंय अंव । मंय प्रेयर कराहुँ ,तुमन सबो झन ल !

"जरूर बहिनी ,जरूर !"सोनकमल कहिस अउ अपन आप ल समोखत वो उठ खड़ा हो गय।अब तो सब खड़ा हो गिंन अउ  वन्देमातरम गाईन ।

"दीदी,आज तो दु -चार पद स्पीच दे । बने लागिस हे आज हमन ल, स्कूल छूटे के बाद ,ये वन्देमातरम ल फिर गाय के मउकाच नई मिले रहिस । आज के तँय हेड मिस्ट्रेस अस । चल स्पीच दे ।" केकती बने बलखरहा कहिस ।

"का स्पीच देबे ,बहिनी ।" सोनकमल कहिस ।

"नहीं...नहीं ! केकती ठीक कहिस हे ।"दु- तीन झन सोनकमल के चिरइया मन चांव -चींव करिन...

" भारत माता की जय !नोनी हो...ये दुनिया म भावना हर बड़े आय । हमन नौकरी करत हन सोचबो, तब येहर नौकरी आय । चाकरी करत हन कहिके सोचबो,तब चाकरी करत हन । पेट  जीयत हन कहबो ,तब पेट जीयत हन, अउ अगर महुँ हर घलव ये बुता ले,राष्ट्र निर्माण म योगदान देवत हंव कहके सोचबो ,तब हम घलव राष्ट्र निर्माता अन ।" सोनकमल ,थोरकुन भावुक हो गय रहिस । अब तो येती ताली बज गय ।

" सीमा म हमर बीर -बहादुर भई मन साक्षात मौत जइसन कतको बड़े बरकस मैक्रो बैरी -दुश्मन मन ले लड़त हें , तब इहाँ अन्नपूर्णा केतकी शीतल मन फँजाई,पैरासाइट, बैक्टिरिया वायरस जइसन माइक्रो शत्रु ले जूझत हें । ये शत्रु मन के कहर ले कनहुँ लइका -पिचका ल पोलियो झन होय, गर्भवती ल टेटनस झन होय । समाज -राष्ट्र ल कनहुँ एपिडेमिक -पान्डेमिक झन वियापे कहके ।तब हमन घलव वोइच योद्धा अन..."

" बस दीदी ,बस ...गर्मी चढ़ गय !जोश आ गय  !! " रति कहिस ।

" मोर बहिनी अनूपा हर शिक्षिका ये..."

"वोकर तो दुश्मन अउ पोठ हे, बहिनी । सैनिक भाई मनके दुश्मन तो नजर भर दिखथे । हमर दुश्मन इलेक्ट्रॉनिक माइक्रोस्कोप म दिखिच जाथे, फेर मास्टरीन के दुश्मन -अशिक्षा ,वो तो दिखे न चिखे...बस महसूस होथे । हमर मास्टर भाई मन वोई अज्ञानता- अशिक्षा के सबले शक्तिशाली दैत्य मन करा लड़त हें ,फेर सबके बुता हमर बुता समाज निर्माण राष्ट्र निर्माण ...बोल भारत माता की जय !

"जय...!!"सबो जय घोष करिन ।


        अब सब अपन प्रोग्रेस रिपोर्ट अपन रूटीन वर्क म भिड़ गिन । तभे एक झन अनचिन्हार नवयुवक हर आइस ,अउ सोनकमल ल जय -जोहार करके कहिस - दीदी ! मंय हवेली ल आवत हंव । दउ माने अब नेता जी ,तोला  हवेली बलाइस हे । गउटिन ल तोला बताय बर हे , वोकर येहर पहिलांत ये...

"बिल्कुल भाई !ये तो हमर बुताच आय , चल हमन ये दुसरइया बेरा म आतेच हन ।" सोनकमल धड़ाक ले कहिस ।

"इहाँ के सेक्टर ...? "

"दीदी मोर ...!"शीतल यादव कहिस ।

"मीटिंग छेवर के बाद, ये भाई, जिहाँ कहत हे, उहाँ जाबो ! डहर देखे हस न..."सोनकमल हाँसत कहिस ।

"दीदी ...तहूँ न !मंय टी.टी. के सिंगल डोज लगा डारे हंव न वो शैलजा दउआइन ल ।" शीतल अपन बुता के प्रमाण देवत खुश घलव होवत रहिस ।





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                  अध्याय -34

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"येई जगहा हर हवेली ये ,शीतल...?"सोनकमल शीतल ल पूछिस ।

"हाँ...!दीदी...!फेर अतेक सजावट का बात बर ओ ?" शीतल हवेली के सजावट ल देख के आँखी बटेरत कहिस ।

"ह ओ बहिनी शीतल !ये बात ला तँय जानबे कि मंय ओ ?"

"हाँ...दीदी !सही कहे । मंय इहेंच के रहइया अंव ,फेर मंय सिरतो नई जानत अंव कि का बात ये ?का जिनिस के खुशियाली... का सुख -सनात ये दाउ घर तउन ल?"शीतल अब ले घलव वइसनहेच भखवाय रहिस । वोला थोरकुन दुख घलव लागत रहिस कि...दाउ अब नेता जी  घर के ये का खुशियाली ये,तउन ल वोहर खुद नई जानत ये ,न ये हेड दीदी सोनकमल ल  बताय सकत ये ।

"आ शीतल सिस्टर !" हवेली के मुँहटा ल निकलत शिवचरण दीवान ,सोनकमल अउ शीतल ल हाथ जोरत कहिस ।

"दीवान भइया !"शीतल ,दीवान ल पूछिस ।

"हाँ...!"

"आज हवेली म ये का होवत हे ? काबर अतेक सजावट हे? असल म हमन ल  दउआइन ल देखे बर तोर वो लइका हे न... का नांव धरथें वोकर, भुला पारेंव, वोहर बलाय गय रहिस ।" शीतल ,शिवचरण दीवान ले पूछिस ।

"हाँ,शीतल बहिनी !दाऊ हर तुमन के डहर देखत हे भीतर म ..."

"फेर ये साज -सजावट...?"

"वोई ल तो मंय खुद नई समझ पात हंव ।ये दाउ के मन म का अइस अउ वोहर हवेली ल अतेक सजाय के हुकुम दे दिस । फेर वोहर कहत रहिस कि ...आज मोर खास पहुना सबले खास पहुना अवइया हे !"

"कोन पहुना अवइया हे, जेकर स्वागत बर पूरा हवेली हर जगमगा उठे हे ?"

"येला तो मंय ,नई जानत अंव ।" दीवान कहिस,फेर येला सुनके सोनकमल के चेहरा म गहिल मुस्कान तउर उठिस ।


             दीवान वोमन ल हवेली के भीतर कोती ले गिस ,जिहाँ  शैलजा दउआइन बइठे रहिस । शैलजा वोमन ल देख के खड़ा हो गय अउ जय -जोहार करिस ।

" आव मेडम मन ! हमर ये छितका कुरिया म तुमन के स्वागत हे ..." दलपत दाउ कहत ,घर कोती ल निकलिस अउ बाहिर जाय बर लगिस  ।

" गउटिन बने चेकअप करवा लेबे...अउ हां सुन, मेडम मन ल हमर घर - दुआर बने किंजार के देखा देबे , चाय- पानी बने कलेवा  करवा देबे । मंय थोरकुन आन कोती जावत हंव ।" दउ रुक के कहिस,अउ सोनकमल कोती एक नजर देखत बाहिर निकल गय ।


           सोनकमल बनेच नजर गड़ा के शैलजा ल देखिस । न छल के चिन्हा न कपट के, बस ... गाय जइसन निर्दोष अउ सरल चेहरा !दिन चढ़त हे तब ले भी नई दिखत ये । सोनकमल वोला देखके मुचमुचा उठिस अउ आगु बढ़के वोकर गाल ल समार दिस । येला देखके शीतल भकचका गय । न जान न चिन्हार...अउ ये सोनकमल दीदी आते साथ सीधा वोकर गाल ल समारत हे । अरे...! रे...! ये का होवत हे ! ये हेड दीदी तो वोला अपन अँकवार म भर लिस ! अउ ये शैलजा गउटिन घलव बने मजा के दीदी के बहां म सपट गय हे, जइसन येमन पहिली के चिन्हार यें ।

"लेवा तुमन पहिली के चिन्हार होवव अउ मंय तुमन ल चिन्हारी कराय के अपजश भर पाय रहिथें ।"शीतल सिस्टर कहिस ।

"मनखे ल मनखे के का चिन्हारी कराय के जरूरत हे, शीतल बहिनी ।"सोनकमल कहिस ।

"तभो ले वो, दीदी, पहिली -पहिलात भेंट करबे ,तब चिन्हारी कराय बर लागबेच करथे । फेर तुमन तो पहिली के चिन्हार अव, अइसन लागत हे !" शीतल कहिस । वोकर चेहरा म थोरकुन  दुख अउ अचंभा के भाव हर, पांच -परगट दिखत रहिस ।

"तँय जइसन गुनत हस,वइसन चिन्हार बिल्कुल नोहन हमन । मैं ये शैलजा गउटिन ल पहिली बार देखत हंव ,अउ येहू हर शायद मोला पहिली बार देखत होही ।" सोनकमल कहिस ।

"तब फेर कईसन येकर बर तोर मया हर पलपला उठिस । आते साथ येकर गला लग गय । शीतल ल अतेक दिन हो गय तोर संग किंजरत , फेर गला लगई तो दूर , वोला अइसे करके छुए घलव हस का ,तँय ?" शीतल बनावटी मुंहुँ फूलोत कहिस ।

"आ बहिनी तहूँ ल गला लगा लिहां ,आ तोला गोदी म उठा घलव लिहां ।हमन एक जात -जन्मन के बेटी अन ओ , तब ये बोपरी ल छू पारें !"सोनकमल ,शीतल के गाल ल थोरकुन हुदकत कहिस ।

"हाँ...! ये डाक्टरीन दीदी ल पहिली पइत देखत हंव ।"शैलजा कहिस ।

"ले शीतल, जउन बुता म आय हावन ,वोला करी । येकर बी. पी.उवा देख ! एच. बी.बर स्लाइड बना । वइसन, साधारण देखनी म येहर  अनेमिक तो नई दिखत ये, फेर हम छत्तीसगढ़ीहा मन के एनेमिया हर दई-काल बीमारी आय ।" सोनकमल कहिस अउ शैलजा ल ओधा म ले जाके ,वोकर हिसाब ले जांच करिस ।

"सबो बढ़िया हे !सिस्टर के देय ये आयरन -फोलिक ल खात रहिबे ,बन्द झन करबे !" सोनकमल ,शैलजा ल फेर समारत कहिस ।

"हाँ,दीदी...?"शैलजा कहिस,तब सोनकमल बक्क ल वोकर मुंहुँ ल देखके हाँस परिस ।

"तँय बड़खा पुर -पहुँच वाला राजनेता के धर्मपत्नी अस ।तोर बर जइसे चाहबे, वइसन व्यवस्था होही ।फेर एकठन जिनिस ल गुन के राखबे -छेवारी डिलीवरी घर म नई होना ये ।अब के नावा जमाना  हर संस्थागत प्रसव के जमाना  आय ।कोई न कोई संस्था म जाय बर लागही ।"सोनकमल ,शैलजा ल चेतात बरोबर कहिस।

"अभी तो बहुत दिन हे दीदी !"

"प्रीवेंटिव डोज़ मन लगबे करिहीं ।"

"दीदी,तँय भगवान बरोबर लागत हस ओ।" शैलजा कहिस ।

"तँय भगवान ल देखे हस ?वोकर संग मोर जइसन मनई के तुलना करत हस ।"

"नही दीदी, नई देखे अंव ।"

"फेर मंय देखे हंव...!"सोनकमल कहिस थोरकुन भाव म भरत ।

"तँय कब अउ कहाँ देख डारे दीदी, भगवान ल ओ !" शीतल कहिस के पइत ।

"बहुत झन भगवान  देवी -देवता मन  धरती म घलव रहिथें ,शीतल ! मैं वइसन एक झन ये धरती म रहइया नर तन भगवान के गोठ करत हंव । एक झन वोहर ये -डॉ. विशाखा देवांगन । मोर गुरुआइन मोर भगवान !" सोनकमल ,अपन जुन्ना ठउर के संगवारी डॉ. विशाखा के सुरता करत भाव म भर गय रहिस, भाव -विभोर हो गय रहिस ।


           गोठ बात म महिला मंडली मात गय रहिस । सोनकमल ,अपन अतेक दिन के अनुभवी नजर ले देख डारिस कि अभी तो शैलजा ल कुछु भी तकलीफ नइये,फेर अवइया बेरा म येला प्रेग्नेंसी आयरन डेफिशियेंसी एनीमिया हो सकत हे। गोठ बात ल पता चलिस कि येहर घलव पूर्ण शाकाहारी आय । 

"ये का ये ओ... !!"शीतल सिस्टर  के मुंहुँ ले निकल गय । सबके आगु म,  दु झन बुताक़री -कामगारिन नोनी मन दु -तीन ठन थारी म तीपत -तीपत कै न कै रकम के बरा -सुंहारी ...अइरसा पपची लान के जमाय के शुरू कर देय रहिन ।

"ले न बड़े दीदी , शुरू कर ! दउ जी कहत हें कि कनहुँ आज बड़का पहुना अवइया हे। वो वोकरे स्वागत के तियारी म लगे हांवे ।अउ एती ,तुंहू मन तो घलव पहुना अव न ओ  ।" शैलजा कहिस ।

"बिल्कुल पहुना अन हमु मन घलव न दीदी !"शीतल सिस्टर ,शैलजा दउआइन के गोठ के उतारा देवत कहिस । फेर येला सुनके सोनकमल मुचमुचा के रह गय । अउ येती वो नोनी मन अउ कुछू कुछु अरन -बरन के खाय के जिनिस मन के लनइच बुता करत रहिन ।

शीतल हाँसत वोमे के एक झन ल अँखियाइस कि ये सब का...?

"दउ जी के हुकूम ...!"वो नोनी कहिस अउ चलते बनिस ।

"ले न दीदी, चीख ले ओ !"शैलजा थोरकुन कलपे बराबर कहिस ।

"ये बहिनी ...जरूर !"सोनकमल वोकर आगु म जउन कुछु  भी माढ़े रहिस,वोमे के थोरकुन जिनिस उठा के अपन मुंहुँ म ना लिस अउ शीतल ल खाये बर अँखियाइस । अब तो शीतल घलव एक -दु ठन ल चिखिस ।

"दीदी...!"शैलजा कहिस ।

"हाँ...!"

"ये सब मन ल चीख न ओ !"

"पेट फूल जाही । मुड़ पिराही ! " सोनकमल हाँसत कहिस, "ले अब हमन ल जाय के हुकुम दे, गउटिन ।"

"दउ जी हर मोला ,तोला सब कोती ल किंजार के देखाय बर कहे हे ।चल दउ जी के घर के सबो कोती ल देख ले ।"

"मंय दउ जी के सबले निकता जिनिस ल , जबले आँय हंव तबले देखत हंव । वो जिनिस ल अउ निकता जिनिस का हो सकत हे । घर -कुरिया माटी पथरा के कूड़हा !"सोनकमल ,शैलजा के गाल ल एक पइत फेर छुवत कहिस अउ जाय बर उठ खड़ा हो गय ।

"कुछु जिनिस के फिकर झन करबे !डाक्टर के जोंगे दवा -आयरन सप्पलीमेंट जरूर ले । कैल्शियम घलव कभु -कभु । कुछु लागही,तब विशाखा मेम ल मंय बलवा लिहां तोर बर !"सोनकमल अब हाथ हला के जाय कस करिस ।

"दीदी,तोला अउ आएच बर लागही !"

"मंय जरूर आहाँ ! सन्देश देबे ।" सोनकमल कहते रहिस,तभे वो कामगारिन नोनी मन दु ठन पैकेट धर के आइन अउ सोनकमल -शीतल ल धरात कहिन -दउ जी हर ये पाकिट मन ल ,तुमन ल देय बर कहिन हें ।

"शैलजा ...!" सोनकमल शैलजा ल कहिस ।

"हाँ ,दीदी !"

"भले ही तोर हमर भेंट होय घँटा -दु घँटा होत हे ।अब जान -चिन्हार हो गयेन ।अउ अब तँय आगु ये दीदी ल भेंटे के मन हे, तब ये भेंट - गिफ्ट ल धरे बर झन कहबे ।"सोनकमल बड़ मजबूत अउ गंभीर होत कहिस,तब वोकर ये बरन ल देख के शैलजा अउ शीतल दुनों डरा गिन ।

"नहीं दीदी, मोला तोर जरूरत हे ।" शैलजा कहिस अउ सोनकमल के आगु के पैकेट ल लेके खोल के देखिस-कोसा के चन्द्रपुरी साड़ी !

"दीदी...येला छू के छोड़ दे न !मंय पहिनहाँ !"शैलजा हाथ जोरत कहिस ।

"वाह रे भारतीय नारी !देख तो कइसन अपन गोसांन के मान राख लिस ।"सोनकमल हाँसत कहिस अउ वो साड़ी ल छुवत खोल शैलजा के खांद म ना दिस ।


        सोनकमल अउ शीतल निकलत रहिन कि दीवान हर -सिस्टर !ये गौटिन के पहिली चेकअप के मेडिकल रिपोर्ट कहत ...एकठन फ़ाइल ल लान के धरा दिस ।


       सोनकमल , वो फ़ाइल ल खोलिस ।फ़ाइल के छेवर म नानकुन चुटका रहिस - आज के मोर सबले बड़े पहुना ! धन्यवाद तोला !तँय मोर घर के पानी ल पीये । मंय तोर घर के चाय -पानी ल नई चिखें, येहर मोर जिनगी के पहिली बड़े गलती ! माफी मांगत हंव ।


       सोनकमल एती -वोती ल देखिस ।फिर थोरकुन मुचमुचात वो फ़ाइल ल वापस कर दिस -पुराना ये !आज भी दउआइन  बढ़िया हे ! अंदर भी ठीक हे। बढ़िया हलचल हे । भैया कह देबे ।


*          *           *            *              *


"दउ जी , आज के वो बड़े पहुना कतेक बेर आही ,सांझ हो गय न ...?"दीवान दलपत करा जाके पूछिस ।

" आज के बड़े पहुना...?वो तो आके चल दिस न ,दीवान !"दलपत ,हाँसत कहिस ।


         येला सुनके दीवान के मुंहुँ हर फरा गय रहिस ।




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         अध्याय -35

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"चल शैलजा बहिनी,महीना भर नई होय पाय ये अउ मंय ,तोर डेहरी म दुबारा खड़े हंव ।"सोनकमल कहिस ।

"त का होइस दीदी, मंय खचित बलवाय हंव तब तो तँय आय हस । तोला बलाय बर मैं, दीवान ल ही भेजे रहें । वोला कह देय  कि वोहर खुद जाही। कनहुँ आन ल झन भेजही ।" शैलजा ,वोकर हाथ ल धरके अपन माथा म छुवात कहिस ।

"आवा  बहिनी हो सबो झन !"शैलजा ,सोनकमल के संग म आय अउ सिस्टर मन ल स्वागत करत कहिस । ये पइत वोकर संग म  वोकर कै न कै झन 'चिरइया' मन रहिन, फेर अभी वोमन चांव - चांव नई करत रहिन । सात आठ हरा साड़ी भीर म एक ठन नीला साड़ी ! आज ये चिन्हारी रहिस, सोनकमल के मण्डली के ।

" ये काये बहिनी !" सोनकमल भरे कांस के लोटा ल झोंकत कहिस ।

"पहुना आथें,तब वोला पानी तो देये च बर लागथे ,दीदी !"शैलजा कहिस ।

"नोनी, महीना उप्पर अउ हो गय, फेर तोर देहें हर दिखबे नई करत ये !"ये पइत सोनकमल खुद कहिस ।

"हाँ, दीदी ! मोर महतारी हर फोन म कहत रहिस कि कुछु नई होय...कतको झन मन नारी मन कुकुर- पेटिया घलव रहिथें । बनेच दिन म दिखथे,नहीं त नहीं ।" शैलजा ,हाँसत कहिस ।

"चल सियान मन के सब गोठ हर पोठ रहिथे ।"सोनकमल कहिस ।


         तभे सोनकमल के नजर कांस के बड़े लोटा म तउरत सादा गुलाब ऊपर पर गय । वोला ,वो लोटा अउ फूल ल अइसन देखत देखिस ,तब शैलजा हाँस भरिस -  खुद दउ जी हर मढ़ाय हे येला दीदी, तोर स्वागत बर  !

"स्वागत तो आज हम सब झन करी ,ये इलाका के सबले बड़े गायनिक  अउ फीमेल डाक्टर , डॉ. विशाखा देवांगन के । मंय वोला खचित बलवाय हंव मंय तोला देखाय बर !बनही की नहीं !"

"हमर बर तो तँय बड़े डाक्टर बईद अस दीदी, तोर जोंगे जम्मो बुता ल करत हंव । मोला अभी काहीं कुछु नई लागत ये ।बस तोला देखे के मन लागिस ,तब बलवा लेंय ! अउ तँय अपन होके अतेक बड़े मेडम ल,मंय -पिरीत के बंधना म बांध के इहाँ बलवा देत हस,तेहर तो अउ बड़े बात ये । बहुत बड़े बात ये ।"

"तहूँ तो अब मोर बर ,कुछु खास हो गय हस शैलजा !"सोनकमल कहिस,फेर ये पइत मने- मन ।येला तो शैलजा सुने नई पाइस ।


               तभे दीवान आके खबर दिस कि मोटर गाड़ी म एकझन डाक्टरीन कस दिखत नारी परानी आय हे अउ ये हेड सिस्टर ल पूछत हे ।

"देखे ,मेडम हर आ घलव गिस !"सोनकमल कहिस अउ सरनटात बाहिर कोती आइस । तब वोकर पीछू म सबो जूनियर सिस्टर मन घलव आइन...चल तो देखी डॉ. विशाखा देवांगन ल ! ये हेड दीदी हर वोकर बड़ नाम जपथे ।


            सोनकमल डॉ. देवांगन ल पांव परे बर झुकिस, तब डॉ. विशाखा वोकर हाथ ल धर के उठा लिस - सोनकमल...! मोला पठेरा म झन टांग ,ये पांव -पलोटी पर के ! मोला तोर संग म ही रहन दे ।देख मोर वादा पूरा ! तँय बलाय अउ मंय आ गंय ।

"धन्यवाद मेडम !"

"वो देखे,कोन ल अउ काबर धन्यवाद !"डाक्टर हाँसतेच रहिन । तभे वो हाथ जोरे शीतल मंडली ल देखिन ।

"अब मंय जानें, तँय काबर इहाँ आके हमन ल भुलाय परे हस तउन ल । ये फुलवारी... ये फूल मन के मंझ म रहि के तँय हमन ल भुला गय न !"

"मेडम , हमन फूल -फुलवारी नोहन,हमन तो बस दीदी के चिरइया भर अन !"रत्नकला कहिस ।

"वाह !  चिरइया चल ये भी खूब हे...!"डॉ. विशाखा कहिन ।

"सोनकमल, अपन इष्ट ल कइसे भुला सकत हे ?" सोनकमल कहिस ।

"बस... बस चल फेर पठेरा म, मोला झन टांग ! काम के बात करी !"

"हाँ,मेडम !"सोनकमल कहिस अउ खुद अपन हाथ म मेडम के बैग ल धरके वोला शैलजा गउटिन के कमरा कोती ले आनिस ।


          शैलजा हाथ जोर के खड़े रहिस अपन कमरा म ।

"सोनकमल, एच. बी.?" मेडम ,देखते साथ कह उठिन ।

"रूटीन खुराक तो लेते हे ,मेडम !"

"ठीक हे, तब ले भी..."मेडम कहिन अउ शैलजा के घर म ही अपन क्लिनिक ल उतार दिन । 

"मंय अइसन नई कर पाँय, पैथोलॉजी वाले दु झन अउ जरूरी मशीन मन ल घलव धर लेय रहथें ।"डाक्टर मेडम थोरकुन अफसोस करत कहिन- जब येहर सोनकमल बर खास ये ,तब विशाखा बर कईसन नई होही ।


       सोनकमल मेडम के आगु म पीपर पान कस डोलत हे... कभु भीतर त कभु बाहिर !वोकर  संग म आय सबो चिरइया मन ,आज सोनकमल दीदी के ये नावा रूप ल देखके मगन हें... शैलजा बोपरी तो बस हुकुम भर ल मानत हे ! वोहर बस एके बात ल काटत रहिस - छि ओ दीदी ! अतेक बड़ डाक्टरीन...मोर गुरु ये कहत हस तँय अउ अंगाकर बनवाय बर कहत हस ।दउ जी आहीं,तब मोला का कहीं,जब जानहीं तब...

"नहीं...मेडम के गोठ मोर बर ब्रम्ह वाक्य ! ये जिनिस ल वोइच कहिन हें ।" सोनकमल हाँसत कहिन ।


            दउ घर के रसोई वाली अउ दीवान ,दुनों हाँसत हें पताल चटनी अउ अंगाकर परोसत । अउ चिरइया मन घलव भखवाय हें...बड़े मनखे के बड़े साध रे बबा... !


            सोनकमल मन दूसर जुवार डाक्टरीन ल बिदा करिस अउ शैलजा के दवा -माटी ल समोखत ,उहाँ ले फिरे सकिन । 


      चल...आज एकठन बड़खा बुता होइस हे। शैलजा मंय तोर बर, बस अतकिच तो करे सकहां ।फेर जइसन जइसन दिन चढ़त हे, ये शैलजा के देहें म डर चढ़त जावत हे...



*         *       *          *           *           *


          सबो चिरइया मन अब इहाँ ले अपन खोंधरा बर परा गिन । विशाखा मेडम घलव अब तक अपन ठउर पहुँच गिन होहीं । अब के उँकर  ये ठउर, पहिली वोकरो तो रहिस । सब चल दिन ,अब मंय बाँच गंय,इहाँ अकेला - अपन के नावा ठउर ठिकाना म !


            फेर एकठन जिनिस ! काबर मंय शैलजा ल अतेक चाहे लग गंय हंव ?का शैलजा के आड़ ,म वोकर मनखे ,पहिली के मोर बर उतरे सगा-पहुना ल चाहे लग गय हंव । का वोकर धन- संपति ...महला -दुमहला मोला भाय लग गय हे ? गर्भवती शिशुवती मनके देखभाल सेवा- जतन तो वोकर सरकारी बुता आय ।फेर अभी भले -चंगा शैलजा ल ही देखे बर, देव बरोबर विशाखा मेम तक ल घसीट लेंय इहाँ । का काल सबले विहना  भेंटाय परबतिया बर ,वोहर विशाखा मेम ल बलवाय रहितिस ? नहीं न...! फेर काबर ? वोहर एकर बर कि परबतिया हर परबतिया ये अउ शैलजा हर शैलजा ये । का मोर से भेदभाव -गलती होवत हे ?बिल्कुल नहीं...!परबतिया ल घलव कोई बड़े समस्या नई ये अउ वोला वोकर हक्क के ख्याल देखरेख बरोबर मिलत हे ।फेर शैलजा बर जादा काबर...?वोहर मोर हक्क ये कि कनहुँ ल थोर मोर ज्यादा ध्यान काबर नई रख सकत हंव मंय ।


          सोनकमल अलसाय अपन ठउर ल उठिस अउ आगु जाके खलल खलल पानी ले अपन हाथ -मुँह हाथ -गोड़ सबला धोइस, जाने माने अइसन करके वो शैलजा किस्सा ल धोये के कोशिश करत हे ... 

सोनकमल...!तोला शैलजा बलवाय रहिस के अपने आप गय रहे ?नही...नही...मंय अपने आप नई गय रहें । मोला तो शैलजा हर वोकर खास पाटी तरी के मनखे दीवान ल भेज के बलवाय रहिस । तब तँय फेर काबर अतेक दुख मनावत हस । मोला शैलजा हर अपन निज लाग मानी कस लागत हे । एके जात- जन्मन के सगा भाई बहिनी तो होबे करा न तुमन ?नहीं मोला वोहर वोकर ले अउ खास लागत हे । काबर ...?पता नइये... । चल, सोनकमल लबारी झन मार...!हाँ...वोकर मनखे दलपत नेता जी दाउ अउ का का हर मोर बर सगा बनके मोर घर आय रहिस । फेर ये गोठ ल इहाँ खुद दलपत जानथे अउ सिरिफ मंय ?हम दुनों के छोड़ अउ आन कनहुँ नई जानत यें । तब फेर...?पता नइये...!

"मदर...!!"सोनकमल के मुख ल जोर से किल्ली -गोहार असन निकलिस । 


         अउ येती संझाती के दिया -बाती पूजा -आरती के बेरा हो गय रहिस ।





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             अध्याय -36

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             सोनकमल पारिजात नोनी ल  अभी देखके आवत हे।  जब ले  ये परिजात जन्मे हे, तब ले हफ्ता- पन्दरा दिन म, वोहर ये हवेली के एक चक्कर जरूर लगा लेथे । पारिजात नोनी के महतारी  शैलजा दउआइन हर अब ले भी घलव वोला बड़े बहिनी  जइसन मान देथे । शैलजा ,मोरो मइके हर तोर हवेली ले कम नइये । मंय,  मउका मिल जाही तब, तोला उहाँ ले किंजार के घलव ले आनहाँ कभु । सोनकमल कभु -कभु  ये हवेली के रद्दा लेवत मने- मन गुंनथे घलव ।


          फेर एक गोठ ,जउन ल  केवल और केवल दु झन जानथें , वोला शैलजा हर घलव नई जानत ये ।वोला  ये  हवेली आए- जाए में असुविधा बिल्कुल नई होवत ये । वोहर जब... जब भी हवेली गय हे।वोला दाऊ... नेताजी... दलपत के बिल्कुल दर्शन नई होय अब । सोनकमल अच्छा से जानत हे  कि , वोकर हवेली म आना- जाना नेता जी ल बड़ भाथे ।अउ  आगु म आय ले ,कभु सोनकमल विदक जाही , तब येहर अच्छा गोठ नई होही, येला जानके दलपत आगु नई आय । फेर ये जुगजुगी पारिजात ल बनेच दिन ल नई देखबे, तब वोला देखे के मन जरूर लागथे । अरे ,जुगजुगी ! अब तो तँय छोटे सायकिल घलव घुमाय लगे हस रे । तोला सिरझाय म तोर दई-ददा मन के सर्वस्व लगे हे। फेर तोर महतारी शैलजा ल ए.बी. निगेटिव ब्लड के जरूरत परिच गय,तब दु पइत ल खुद मंय, दु पॉइंट ब्लड नई देंय हंव का रे,जब तँय पेट भीतर म रहय । अइसन म मोरो ब्लड के एको मॉलिक्यूल घलव तोर भीतर म जरूर होही । छि!कहबे न तँय...देय जिनिस ल उगट के हलका झन हो ओ आँटी कहबे !मोला आँटी कहबे  कि मौसी  ?मौसी काबर ?तोर महतारी तो मोला भर मुँह दीदी कहथे ! चल कुछु भी कहबे फेर जरूर कहबे !मंय तोला ही देखे जाथों तोर घर , अउ आन कुछ नहीं न...!


         भटकत हस सोनकमल ?बिल्कुल नही...! काबर भटकहां मंय ? मोर बुता काम म कोई खोट नइये । हाँ...! पहिली शैलजा  अउ अब ये जोगनी पारिजात बर ,वोकर मन म थोरकुन अगरिहा दया -मया  जरूर बसत हे। कारण...कुछु भी रहे ।फेर का मोला थोर-मोर निजता के अधिकार बिल्कुल भी नई ये...?नहीं...महुँ ल घलव थोर बहुत निजता के अधिकार हे अउ  अब पारिजात हर मोर निजता म शामिल हे। जे दिन वोकर सिरजनहार -वोकर महतारी शैलजा कि वोकर  बाप  दलपत,वोकर ले मिले-जुले ले मना कर दिहीं ,वो दिन एक क्षण म वोहर,वोकर ले अपन ये दया -मया ल संकेल लिही । राई -रत्ती के कुछु भी घटी -बढ़ी सोच -गुनई नई होय ,फेर अभी जइसन चलत हे, वइसन बढ़िया हे।


         सोनकमल सड़क के तीरे - तीर फुटपाथ म रेंगत हे । वोहर पारिजात घर जाय बर अब वाहन के प्रयोग बिल्कुल नई करय । पैदल आथे-जाथे । वो कहथे - येकर ले  एक नहीं दु फायदा हे ।  ईंधन -तेल के बचत अउ शरीर बर  हलचल दुनों के दुनों । अरे...जुगजुगी पारिजात फेर आँखी आगु म आ गय रे !आज के हल्का गुलाबी घेर वाला ड्रेस तो खुले हावे रे । फेर तोर चुंदी - केश ल ,तोर महतारी सीधा ही पटियाथे अउ ऐंठ के ,एकठन क्लिप  भर ल धरा देय रहथे । वोला उलट के अइसन करे ले तँय जादा सुंदर दिखथे । तँय शैलजा के जगहा मोर कोख ल निकले रहिथे तब...सोनकमल ! छि ! छि...!! ये का गुने लग गय तँय...? सोनकमल ,खुद करा ले थोरकुन लजा गय।वोकर गाल हर ललिया गय रहिस ।



*        *          *           *           *          *


       सोनकमल अपन क्वार्टर के  मुँहटा म अपन ददा आत्माराम अउ भई रजत ल अइसन आके बइठे देखिस,तब बनेच अचंभो म पर गय । ये का होगिस येमन ल ! न शोर न पता अउ अचानक ददा -भई के अवई !!


             सोनकमल पहिली घर के ताला ल खोलिस ,तब फेर ददा ल पानी देवत ,वोकर पांव परिस ।

"कइसे कहाँ गय रहे ,बेटी ...?"ददा पूछिस ।

"दई, बने हे ददा ?"सोनकमल चालाकी करके,ददा के प्रश्न के उत्तर ल गोल-मोल  कर दिस । वोहर जउन बुता ल आजतक नई करे ये,ददा के आगु म... लबारी -झूठ ,वोला अब कइसे करतिस । अउ कइसे बतातिस कि वोहर कोन ल देखे गय रहिस हे?

"रजत...!" सोनकमल अब रजत कोती ल देखत वोला ओझिआइस ।

"हाँ...दीदी ।"

"तोर वो आड़ा -तिरछा वाला जउन ल तँय स्टाइलिश कहथस ,वो फटफटी नई दिखत ये।"

"अउ तँय वोला फटफटी च कहिबे न । बाइक कहे म तोला तकलीफ होथे न !" रजत दीदी के घेंच ल धर के हलात रहिस ।

"चल ठीक,तोर फटफटी तोर बाइक ये ।"

"हाँ,अइसन कह ।फटफटी तो वो घर म माढ़े हे न करिया देवता  ददा के ,वोहर ये समझे ।"

"हाँ,फेर तोर फटफटी -बाइक कहाँ हे ?नई दिखत ये ।"सोनकमल सिरतो म नजरे नजर वोमन के सवारी ल खोझत रहिस ।

"कोई बाइक फटफटी नई आय ये। गाड़ा लेके आय हावन । गाड़ा...गाड़ा माने  पैसठ एच. पी.  वाला ट्रेक्टर ल ट्राली समेत । छोटे ट्रेक्टर घलव नहीं ।" रजत थोरकुन तमकत कहिस ।

" सिरतोन ददा...?" सोनकमल अपन बाप आत्माराम गउँटिया कोती ल देखत कहिस ।

"हाँ, बेटी ।"

"फेर काबर आय हवा तुमन ट्रेक्टर- ट्राली ल लेके । कत्थु अंते जावत होइहा ।"

"काहीं अन्ते नई जात अन हमन । इहेंच तोर करा आय हावन ।"

"फेर वो काबर जी ...?"सोनकमल बनेच अचम्भा म भर गय ।

"तोला लेहे ...लेजाय बर ।"

" मोला लेहे -लेजाय बर ये बड़खा तेल पिया ट्रेक्टर काबर ?"

"तोर झोला- झंडा गठरी मोटरा... चोटरा सब ल एके पइत जोर के ले जाय बर ।"

"फेर काबर...?"सोनकमल के तत हर बिछात रहिस कि ये का होवत हे।

"बस...बहुत कर डारै नौकरी अउ अपन मनमौजी !चल घर अउ चुप ...बइठ !" रजत घलव थोरकुन भभकत रहिस ।

"फेर हो का गय...?"

"ददा -दई के कान म तोर बारे म आन -तान जाथे ।"

"का...?का जाथे वोमन के कान म ?"सोनकमल विपतिया गय ।

"यही कि इहाँ के हवेली म तोर आना जाना बाढ़ गय हे ।"

"ए बबा गा ...!!" सोनकमल कहिस अउ अपन मुड़ ल धर लिस ।

"जे समय म वो हवेली वाला हर तोर बर जी -परान ल देय बर तियार रहिस ,तब तँय उहाँ जाय बर तियार नई होय अस,अब जब वोकर जोड़ी -जांवर बन गय हे,तब तँय उहाँ  बार बार काबर जावत हस ?"

"