Tuesday 31 May 2022

व्यंग्य-योग्यता

 व्यंग्य-योग्यता  

               चुनाव के समे लकठियागे रहय । अपन अपन पार्टी ले टिकिट झोंके बर , कार्यकर्ता मनके लइन लगे रहय । पार्टी के छोटे से छोटे कार्यकर्ता , अपन आप ला विनिंग केंडीडेट समझय । पार्टी प्रमुख , टिकिट के लइन देख के , पार्टी के जीत के आस म भारी खुश रहय । टिकिट के आस म , लइन लगे कार्यकर्ता के योग्यता जाँचे बर , इंटरव्यू के आयोजन रखिस । 

                इच्छुक उम्मीदवार ला पारी पारी ले , चेंबर म बलाके सवाल पूछे लगिस अऊ अपन योग्यता बताये बर किहिस । एक झिन बतइस के , मोर योग्यता ये हे के , मेहा छत्तीसगढ़ के बहुत बड़े समाज के अगुवा आँव , मोला टिकिट मिलही त , मोर पूरा समाज , मोर पिछू पार्टी ला जिताये बर उपराहा मेहनत करही । पार्टी के मुखिया पूछिस – तैं कतिहाँ के रहवइया अस बाबू ? उम्मीदवार किथे – खालिस छत्तीसगढ़िया अँव मेहा । न केवल में इहाँ जनम धरेंव बलकि , मोर पूर्वज मन घला इन्हे उपजिन , खेलिन , बाढ़िन अऊ इँहे के माटी म मिल गिन । मुखिया किथे – छत्तीसगढ़िया होना , चुनाव जीते के योग्यता नोहे बेटा , अयोग्यता आय । छत्तीसगढ़िया होना यदि योग्यता होतिस बेटा त , तैं बेरोजगार नइ घूमते , कम से कम नानमुन नौकरी पा जाये रहितेस । तैं जादा ले जादा , पंच , सरपंच , जनपद सदस्य या जिला पंचइत तक जा सकत हस । उही समे आबे , अभू पार्टी बर काम कर । 

               दूसर उम्मीदवार किथे – मोर बड़ नाम हे देश प्रदेश म । मोर चेला चंगुरिया मन बड़े बड़े पद म येती ओती बइठे हे । मय पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता आँव .. मोला टिकिट मिलही त .. जम्मो झिन चेला मन जुरिया के न केवल मोला जिताही बलकि , पार्टी ला घला फायदा देवाही । मुखिया किथे – का करे हस तेहाँ , जेमा तोर बड़ नाव हे । उम्मीदवार किथे – कतको लइका मन ला नेतागिरी करे योग्य बनाये के बूता करें हँव । मुखिया पूछिस – कतेक लइका ला तैं योग्य बना डरे हाबस ? ओ किथे – जे मोर संगत म अइस , तिही योग्य बनगे , गनती नइ करे हँव । मुखिया किथे – तोर योग्य चेला म , अभू तक एको झिन कोनो के नकसान करके नाव कमइन , कन्हो लूट खसोट , हत्या डकैती म जेल गिन ? वो किथे – में बने बने काम बूता सिखाये हँव , अइसन काम थोरे करही मोर चेला मन .... । मुखिया किथे – तैं चुनाव जितई का , लड़े तक के अयोग्य हस । तैं पिछू कपाट ले खुसरइया राज्यसभा के चुनाव तको म नइ खुसर सकस .. । जब केवल चुनाव लड़ना होही अऊ काकरो जीते के कोनो उम्मीद नइ रइहि तिही बखत आबे , तोर बर बिचार करबो । 

               तीसर उम्मीदवार हा , आतेच साठ अपन बखान करे लगिस – में चोरी डकैती सब कर चुके हँव , फेर , दुनिया के कन्हो पुलिस तिर , मोला धरे के सबूत निये । काकरो नकसानी तो कतको बेर कर देथँव , ओकर कन्हो हिसाब निये । सरे आम जेला में गोली मार के निपटा चुके हँव , तेकर हत्या के आरोप म , मोर बिरोधी जेल के हावा खावथे । अऊ रिहिस बात इहाँ जनम धरे के , त तैं इहाँ कहिथस ..... , तैं जिंहाँ के जनम प्रमाण पत्र बोल , उद्दे लान के देखा देथँव , मोर तिर कतको देश के जनम प्रमाण पत्र बने माढ़हे हे । अऊ सबले बड़के एक बात ये हे के , मोर रिश्तेदार मन बहुतेच रसूखदार आय । ओकर नाव लेहे मा , कतको के पोटा , अइसने काँपे बर धर लेथे । फेर मोर तिर अतेक पइसा हे के मेहा कतको झन ला जिनगी भर बइठे बइठे पोस सकत हँव । 

               पेट बिकारी ले बढ़के दुनिया म कोनो चीज अभू तक नइ होय हाबे । मुखिया हा दुनिया ले बाहिर के मनखे थोरेन आय तेमा ... बपरा ला घला अपन पेट के फिकर रहय । जिनगी भर पोसइया अऊ पुलिस कानून ले संरक्षण देवइया बईठे ठालहे मिलगे । दूसर उम्मीदवार बलाये के आवश्यकता नइ परिस । योग्य मनखे मिलगे । तुरते निर्णय लेवत , इही उम्मीदवार ला , चुनाव लड़े जीते अऊ छत्तीसगढ़िया के अगुवा बने लइक , सबले योग्य समझ , जल्दी से टिकिट बाँट दिस ताकि , दूसर पार्टी हा , येकर योग्यता के फायदा झिन उठा सकय । अऊ दूसर सीट बर घला , अइसने योग्य उम्मीदवार के तलाश म लगगे । 

  हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

व्यंग्य-टोनही

 व्यंग्य-टोनही 

                                   मंडल के ब्यारा के बड़े जिनीस परसार म बइठका सकलाये हे । कटकऊँवा मनखे , चारों मुड़ा मुड़ीच मुड़ी । कोन जनी काये होही भऊजी के आज । गाँव के कतको माईलोगिन मन , वोला सुगाये बर धर लेहे । तेकर ले बड़े घर के मन तो अऊ , मरेच जात रिहिन । तिर तखार के आन गाँव तक म , “ टोनही – टोनही ” कहिके बदनाम कर दे रिहिस , बपरी ला । अभू फैसला होही , भऊजी के काये करना हे ? मुड़ी ल तोप ढाँक के समे म हाजिर होगे रहय भऊजी हा ।     

                                कतको कस इल्जाम लगे रहय । बिधायक के टूरा शुरू करिस - रामू कका के नाती ह कतेक सुंदर बाजर खेलत खावत रिहिस । एक दिन येकर बखरी म आमा बीने बर का निंगिस , ओला गारी बखाना करके , अइसे पांगिस के लइका उठ नइ सकिस , सिध्धा ओकर लासे हा उचिस । के जगा नइ घूमे हे इलाज पानी बर , कतको बइगा गुनिया देखा सुना डरिस । फेर येहा अइसे जाहरा टोनही आये के , एकर आघू म काकरो दार नइ गलिस । सही बात आय निही कका ? “ हव सब्बोच सही ताय गा ”  मुड़ी गड़िया के रामू हुँकारू भरत कहत रहय । इही गाँव में एक झिन गुरूजी रहय , ओला नानुक हरस कहिके , जम्मो झिन बछरू गुरूजी कहय । उही टप्प ले कहि पारिस – एक्को झिन डाक्टर ल घला देखाये होबे कका । ओहा काये बतइस ? तेंहा बीच म भांजी झिन मारे कर गा गुरूजी ... , तोर अइसन प्रश्न ल पाछू करत रहिबे , मंडल के टूरा आँखी देखावत किहिस । तभे सरपंच के छोटे टूरा खड़े होके केहे लागिस – बिसाहिन दीदी के बहू कइसे मरिस गा ? कतेक उमेंद ले बिहाव करे रिहिस बिचारी ह , बछर नइ पुरे पइस , चुँहक दिस टोनही हा । एकरेच नाव ल काबर धरिस होही बइगा मन ? वोकर काये दोस रिहिस । ओकर बखरी म , न आमा बिने ल गे रिहिस न अमली । मुंधियार के उही रस्दा ले दिसा मैदान जावय । ओकर सुंदरई , एकर आँखी म गड़गे । अतके म ओकर मन भरिस जी , ओकर पेट के पिला तको ल पेट भीतरी म मुरकेट के मार डरिस । मंडल के टूरा किथे - अरे बाप रे ...... , अतेक पान होही ये बड़का गुरूजी के बई हा कहिके नइ जानत रेहे हन , कई ठन किस्सा हे एकर गा । बिधायक के टूरा केहे लगिस - सुखरू के गोड़ के घाव ल नजर भर का देखिस , ठीकेच नइ होइस । गोड़ काटे बर परगे । कइसे बइगा ? येहा तो अपन घरवाला तको ल भक डरिस , हमन ल काये बचाही ........... । जल्दी उपाय करव , निही ते कोन जनी , काकर नंबर आ जही । अतेक बड़ बड़ घर के लइका मन के आगू कोन हुँकारूँ नइ भरही .... । हव सहीच कहत हस भइया ...... । कलल कलल होये लागिस । सरपंच कथे – गाँव भर ल मतावत हे येहा । अब काये करना हे एकर .... । तुँहीं मन बतावव ....... । 

                               एकरो गोठ ल सुन लेतेन सरपंच साहेब , तभे फइसला करतेन जी , तभे तो न्याय होही –  बछरू गुरूजी फेर पट ले मार पारिस । सरपंच के टूरा किथे - दू अक्षर का लिख पढ़ डरे हे गुरूजी हा , अपन आप ल बड़ होशियार समझथे । वोहा का बताही ? येहा कही का , मिही टोनहांये हँव येमन ला ....... ? वोहा तो जम्मो इल्जाम ले मना करही । कुछ सियान मन किहिन - बने कहथे गुरूजी हा , उहू ल मौका मिलना चाही । हव हव .... कलकलाना शुरू । 

                               सरपंच किथे -  बता छोकरी ...... तोर काये करे जाये ...... ? मंडल के बाबू टप्प ले मारिस - ओला का पूछथस सरपंच साहेब .... गाँव ले निकाल देथन येला , न रही बाँस न बाजही एकर बाँसुरी । कन्हो कहय - एकर हुक्का पानी ल बंद कर दव , एकर ले कन्हो बातचीत गोठियाना बताना सब्बो बंद , ये हा अपने अपन गाँव छोंड़ के भाग जही । भऊजी ल अपन जगा म ठाड़ होवत देखिन ते जम्मो झिन के मुहुँ अपने अपन तोपागे । कले चुप होगे जम्मो । भऊजी कहन लागिस - सरपंच कका ,  हाथ जोर के निबेदन हे  , मोला गाँव ले झिन निकालव । मोर हुक्का पानी ल झिन बंद करव । हमर गुरूजी ह , तुँहरे मन के हाथ म , तुँहरे संरक्षण अऊ भरोसा म मोला छोंड़के सरग चल दिस । तुहींमन अइसन दुत्कार दुहू , त कहाँ जांहूँ ? वा .... हमन तोर ठेका लेहन का ? बिधायक के टूरा बइठे बइठे हकन हकन के केहे लागिस । पहिली अपन आप ल निर्दोष साबित कर , तोला कोन निकाले के हिम्मत करही ? मेंहा निर्दोष हँव भइया , येला तहूँ मन जानत हव , फेर काबर मोर संग अइसन करत हव ... बड़ दायसी ले बोलत रहय भऊजी हा । फेर शुरू होगे कलल कलल ...। मंडल किथे - तेंहा निर्दोष रहिते बहुरिया , त जे तोर सेती भुगते हे , तेमन लबारी मारथें का ? अतेक झन अकारन काबर परेशान होतिन ? भऊजी किथे - सही समे म डाक्टर ले इलाज मिल जतिस , त जम्मो झिन ठीक हो जतिन कका । बिधायक के टूरा कहत रहय - वारे पढ़हंतीन , असली कारन तैं हरस , उही ल लुकाये बर कइसे बहाना मारथे तेला । टोनही , तोला ये गाँव ले जाये ल परही , तें टोनही रेहे , टोनही आस अऊ टोनही रहिबे ।  भऊजी किथे - में नि जाँवव ये गाँव ले ....... । मोर कन्हो दोष निये..... । मंडल के टूरा जम्मो झिन ला उकसावत केहे लागिस - अइसे म नइ माने गा ..... । मारो जम्मो झिन जुर मिल के ...., येकर कपड़ा लत्ता ल हेर के  घुमाऔ गाँव भर , शरम के मारे कइसे नइ छोरही गाँव ल । कलेचुप सुनत रहय सरी गोठ ल , भड़कगे ... बिधायक । कोने रे बड़ गोठियावत हे तेहा .... मार साले ल दू जूता मुँहूँ म .....। हमन ल काबर बइठारे हो , जब तुँहीं मन सबे फइसला ले डरहू ? मेहा कोन पक्ष के बिधायक आँव , तेला नइ जानो रे । मोरे गाँव म अइसने करहू त मोर सरकार के कतका बेइज्जती होही , तेकर कलपना हे तूमन ल .... । सरकार अऊ विज्ञान दूनों , टोनही मोनही नइ माने । तूमन ल जेल के हावा पसंद हे , त बोलव येला टोनही .....। कोई टोनही वोनही नइ होये येहा , .... हां ये माईलोगिन जरूर अपन चरित्तर ले गिरे हे , तइसे लागथे मोला .... अऊ इही आरोप म , अभू ले कन्हो एकर संग झिन गोठियावव , कतका दिन ला अकेल्ला काटे सकही , देखथन ?

                     भऊजी का ...... , जम्मो गाँव के मनखे तको , नावा आरोप ले सुकुरदुम होगे । भऊजी किथे - मोर उप्पर अइसन अरोप झिन लगावव भइया ..। टूरा मन केहे लागिस - गाँव ले निकालो गा एला ..... गाँव ले ....  , चरित्तर ले गिरे प्राणी हा गाँव के नोनी बाबू मन ला घला बिगाड़ दिही अइसन म  ... । एकर का बिगरही ठगड़ी रकठी के । फेर कलल कलल शुरू होगे .........। आगी लगाके , बिधायक , सरपंच अऊ मंडल , कले चुप अपन अपन घर कोत रेंग दिन । अभू ओकरे लइका मन सियानी करत , आठ दिन के भीतर गाँव छोरे के आदेस देवत , बइठका उसले के घोसना कर दिन । 

                 तीन चार दिन नहाकगे । बछरू गुरूजी ला , अपन बड़े गुरूजी के सुरता आवत रहय ।   गुरूजी के बिहाव होये , पाँच छै बछर होये रहय । ले दे के एक झिन लइका नाँदिस , तहू ल भगवान होतेच साठ लेगे । कतको इलाज पानी करवइस , फेर दुब्बारा महतारी नइ बन सकिस भउजी हा । डाक्टर जवाब दे दे रिहिस । कोन जनी काये सोंचत , खेत ले घर आवत गुरूजी हा सइकिल सुद्धा ट्रक के सपेट म आगे । भउजी कठवा पथरा होगे । ससुरार आये ले अभू तक भऊजी अतका मर्यादा म रहय के , गाँव के कन्हो आदमी जात ओकर मुहूँ ल नइ देखे रहय । बछरू गुरूजी सोंचय , भउजी बड़ सुंदर होही कहिके .... । कतको घाँव ओकर घर निंगे रिहिस । गुरूजी के सरग जाये पाछू , एक घाँव देख पारिस , त भ्रम टूटिस । बिगन सूल के .. करिया करिया झंई .. मुहूं भर बगरे रहय । हाथ गोड़ घला उइसने । खैर , ओला काये करना हे । अभू ओकर मानवता धरम ह हुदेलत हे , तोर गाढ़हा समे म मदद करइया के अहेसान ल कब चुकाबे , मउका हे अभीच्चे , तैं जा , अऊ कतका तकलीफ म जियत हे भऊजी , तेकर शोर खबर ले , जतका बन सकही ओकर मदद कर । दूसर कोती गाँव के टूरा मन के ददागिरी आगू दिख जाये , तैं जाबे ते ठीक नइ होही गुरूजी । मन के भीतरी द्वंद चलत रहय । जीतगे मानवता । पाँच किलो चऊंर , एक किलो उरिद के दार , गोंदली , आलू , नून , मिरची , चेंच भाजी अऊ रमकेलिया टोर के , जोर डरिस बछरू गुरूजी के बई । दूनों प्राणी चल दिन भउजी के पारा । 

               एकदमेच सुन्ना रहय गली खोर । मरे रोवइया नइ दिखत रहय । डर्रा डर्रा के पहुंचिन । कपाट उघरा । भउजी किथे - अई .... तूमन काबर अपन जीव ल होम देके , मोर घर आवत हव बाबू । मोर तो बिगड़ीच गेहे । तुँहर झिन बिगड़य । बछरू गुरूजी पूछत हे - तैं कोन अस नोनी । भउजी कहाँ हे । तैं ओकर कहीं लाग मानी अस का ? लजागे नोनी , तुरते मुड़ी ल घुमघुम ले ढाँकिस , बोरा दसइस अऊ  “ आवत हौं “ कहिके भीतरी म खुसरगे । बछरू गुरूजी के सुआरी टोंकिस - कइसे गोठियाथव हो तहूँ मन , जेकर ले मिले बर आहव , उही ल पूछीथौ , कहाँ हे उही कहिके .... । बछरू गुरूजी किथे - भउजी ल तैं भेंटे हस एको घाँव ... । मुहूं भर करिया करिया झंई ... हाथ गोड़ तको करिया । येहा तो एकदम मोटियारी आय । कन्हो लागमानी आये होही , अऊ तेंहा , जाने न सुने , टपर टपर पाँव पैलगी घला कर डारे .... । बछरू गुरूजी के बई किथे – अई ...... महूँ दीदी होही समझेंव या ... । 

                 थोकिन बेर म , भऊजी बाहिर अइस । बछरू गुरूजी किथे - कतिंहा लुका गे रेहे या भऊजी ... बड़ समे लगा देस । भऊजी किथे - गोबर लीपत रेहेंव बाबू .... हांथ गोड़ धो के आवत हंव । हांथ देखावत किहिस , तंहँले फटले हांथ ल लुका दिस , गोड़ ल घलो लुगरा म सटले तोप दिस । काला लुकाथे भउजी .. गुरूजी सोंचे लागिस । भऊजी किथे - तूमन ल नइ आना रिहीस बाबू ... गाँव के मन देखहीं तहन , फेर डम्फान मचाही । गुरूजी किथे - मोर बिपत के समे बड़ मदद करे रिहिस बड़े गुरूजी हा , महूँ ल अपन फर्ज पूरा करन दव भऊजी । गोठ चलत हे । आगू काये करना हे , तेकर फइसला नइ ले पावत हे । बछरू गुरूजी समझाथे - तेकर ले अइसे नइ करते या भऊजी , तोर लागमानी संग , कुछ समे बर ओकरे गाँव चल देते । थोकिन समे काट लेते , हो सकत हे तब तक , गाँव के मनखे मन के मति बदल जाये , तहन गाँव लहुंट जते ।

                  भउजी किथे - बाबू , एक ठिन बात पूछँव - का तहूँमन ल , मोर म टोनही दिखथे ...... ? गुरूजी किथे - काबर अइसना सोंचथस या भऊजी ... । हमन उसन सोंचतेन , त काबर निंगतेन तोर दुआरी म । भऊजी बतावत रहय - मेंहा गाँव के मनखे ल कइसे समझाँवव बाबू । रामू कका के नाती रोज मँझनिया भर आमा बिनय । मँझनिया कुन झिन आये कर बेटा कहिके बरजँव , सांझ कुन ओकर बर गेदराहा आमा सकेल के रांखँव , अऊ बला के देवँव । तभ्भो ले लइका नइ मानिस । रामू कका जानत हे येला । झांझ झोला धर लिस । इलाज छोंड़ , बइगा गुनिया करिस । हाथ नइ अइस लइका । ओ समे रामू कका मोर नाव नइ लगइस । बिसाहिन दीदी के बहू छोकरी के पेटेच भीतरी म लइका मरगे रिहिस , नर्सबई ओमन ल कतको बेर अस्पताल जाये बर किहिस , नइ मानिस । अस्पताल गिस , त लइका ला गर्भ भीतरि मरे एक दिन होगे रिहिस । पीरा म बहू छोकरी घला चल दिस । वो दारी तभ्भो मोर उप्पर कन्हो इल्जाम नइ लगिस । फेर अभू काबर ये होवथे ? सुखरू कका के गोड़ , मोरे बखरी के लकड़ी बोंगत टंगिया म कटाये रिहिस । टिटनेस के सूजी लगवा ले कका , कतको केहेंव । नइ लगवइस , गोड़ काटे ल परगे । अभू तुँही मन बतावव , कोन ल कइसे समझावँव ? उही ल गुनत हँव रात दिन । का तहूँ मन ल लागथे के , में अपने घरवाला ल खाहूँ .... ? रो डरिस । 

                गुरूजी किथे - झिन रो भऊजी । मोर मानथस त , तेंहा कुछेच समे बर कन्हो चल देतेस या । मन एक कनि हलका हो जही । भऊजी किथे - मोर तो दुनिया म कन्होच निये बाबू । गुरूजीमन के दई ददा पहिली ले नइ रिहीस । बिहाव के दूए तीन बछर पाछू , मोरो महतारी बाप मनला , भगवान लेगे । में कहाँ जांहूँ बाबू .... । मोर अंतस के पीरा ल कतिहाँ गोहनावँव बाबू ...... । 

                 अपन जगा ले उठत भऊजी किहिस - रहा , बइठो या , चहा मढ़हात हँव । गोठ बात म भुला गेंव । बछरू गुरूजी किथे - बइठ न भउजी , सगा नोनी ल कहिदे , उही बना दिही । वइसे , कोने वो नोनी हा , बड़ सुंदर हे या , भऊजी ? भऊजी मुसकावत किहिस – उही तो टोनही आय , देवर बाबू...... । गुरूजी किथे - काबर ठट्ठा करथस या भऊजी ? भऊजी किथे - तूमन ल बिश्वास नइ होवत हे , आवव मोर पाछू , देखावत हौं तूमन ल । ओकर सुते के खोली ल नहाकत अँगना म अमर गिन । सुते के खोली म सीसम के सोफा , बहुतेच सुंदर डिजइन के पलंग । रँधनी खोली कोती आँखी किंजरगे , कतेक सुंदर लइन से सजे एके बरोबर साइज के डब्बा डिब्बी । एक ठिन काड़ी कचरा के नाव निही । भितरि डहर परछी म प्लास्टिक के खुरसी बिछा दिस । देखते देखत भऊजी हा , अँगना म मुहुँ कान ल , साबुन चुपर के धोये लागिस । चुँदी छरियागे , भुँइया ले लहसत , बड़े जनीस चुँदी । फेर उप्पर करे , फेर खसले , केऊ बेर करिस .... । एक घाँव त बछरू गुरूजी अऊ ओकर सुआरी तको झझकगे । सही म टोनही आये का रे ....... । झूपे कस लागथे । सुकुरदुम होके देखत रिहिस । लहुँटत ले उठके रेंग दे के मन होत रिहिस । मुहुँ ल पोंछ के जइसे लहुँटीस ....बछरू गुरूजी अऊ ओकर बई एक दूसर ल किड़ किड़ ले धर लिस..... । कइसे रूप बदलत हे .... ये सही म टोनही आय का........। 

               जइसे जइसे भऊजी , ऊंखर तिर म अमरत गिस , दूनों प्राणी के मन के डर बाढ़त गिस । खुरसी म नइ बइठे रहितीस ते , पछघुच्चा होके भाग जतिस .. तइसे , जी होगे रहय । भऊजी ये हा काये या ...... ? बड़ हिम्मत करके बछरू गुरुजी हा पूछिस । भउजी किथे - मिहीं टोनही आँव बाबू ? जोर से हाँसिस ...। टोनही नराज झिन होये कहिके यहू दूनों हाँसे लागिन ....। हाँसत हाँसत रोये लगगे भऊजी अऊ बतावन लागिस - मोला अभू तक करिया बिलई परेतीन कस देखे रेहे न बाबू । फेर ओहा मोर असली रूप नोहे । मोर असली रूप इही आय । मोर इही रूप के सेती , गाँव भर में कुछ समे ले , टोनही के नाव ले बदनाम होवत हँव । बछरू गुरूजी किथे - हमन समझेन निही या भऊजी । अत्तेक सुंदर हस फेर निच्चट कस काबर रहिथस ? हाथ गोड़ मुहू कान ला करिया चुपरके काबर लुकाथस ? 

                 भऊजी अपन राम कहानी बतावत केहे लागिस - मंडल के टूरा , जे ओ दिन बड़ लुबुर लुबुर करत रिहिस , तेहा , तुँहर गुरूजी करा , पढ़ई लिखई के सवाल करे बर रोज आवय । मोर दई बाबू के जम्मो संपति , मुहीं ल मिले हे , तेला तभे ले जानत हे । वोहा कहाय – तेंहा तो हमरो ले मंडल हस गुरूजी । गुरूजी के जाये के पाछू मदद के बहाना कतको बेर अइस । कभू पलंग त कभू सोफा , त कभू खेत खार ल , बने कीमत म बेंचें के बड़ लालच दिस । फेर भगवान के दे , ओकर नौबत नइ अइस । ओकर बात म नइ फँसेंव । अऊ बिधायक ल तो देख , मोला चरित्तर ले गिरे प्राणी किहिस , काबर मोर अनुकम्पा नौकरी बर , ओकर इच्छापूर्ति नइ करेंव , टार तोर नौकरी ल कहिके , ओकर चौंखट ल खूँदे बर नइ गेंव । मेंहा उही दिन ले जान डरेंव के मनखे मोर मदद के बहाना मोर धन के अऊ मोर शरीर के लालच करथे । उही दिन ले निच्चट कस , अपन शरीर म करिया मरिया पोत पुताके बाहिर निकलथंव । फेर एक दिन पक्का आमा खाये के अऊ गाँव के जम्मो संपति म अपन हक जताये के आदत के सेती सरपंच अऊ बिधायक के करबेलवा टूरामन मोर बखरी म निंगिस । मोर असली रूप ल नजर में उतार डरिस , बस .............. पाछू परगे । कतको प्रयास करिन । बात नइ बनिस । तेकर सेती येमन मोला टोनही बना दिन , ताकि मेंहा गाँव ले निकल जाँव , तब बाहिर म येमन मोर संग जोर जबरदस्ती कर सकँय , अपन सुसी बुता सकँय । अभू तुँहीं मन बतावव में जेला टोनही केहेंव , तिही टोनही आये के नहि ..... ?   

हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

छत्तीसगढ़ी व्याकरण : लिंग*


 

.       *छत्तीसगढ़ी व्याकरण : लिंग*

                             


 *परिभाषा*- संज्ञा के जेन रूप ले पुरूष या स्त्री जाति के बोध होथे, ओला लिंग कहिथें।


# छत्तीसगढ़ी म लिंग के तीन भेद माने गे हे-


1) *पुल्लिंग*- जेन संज्ञा शब्द ले पुरूष जाति के बोध होथे, ओला पुल्लिंग कहिथें। जइसे-


   *बाबू, डोकरा, बछवा, बइला* आदि।


2) *स्त्रीलिंग*- जेन संज्ञा शब्द ले स्त्री जाति के बोध होथे, ओला स्त्रीलिंग कहिथें। जइसे-


   *नोनी, डोकरी, बछिया, पंड़िया* आदि।


3) *उभयलिंग*- जेन संज्ञा शब्द ले दुनों जाति ( स्त्री अउ पुरूष ) के बोध होथे। ओला उभयलिंग कहिथें। जइसे-


  *संगी*( सखी या साथी ), *गिंया* ( मित्र ),*जँहूरिया* ( हमउम्र लड़का/लड़की या फेर स्त्री/पुरूष ), *लइका*( लड़का या लड़की ), *लगवार*( उपपति या उपपत्नी),*जाँवर* ( समवयस्क स्त्री या पुरूष )


.  *छत्तीसगढ़ी म पुल्लिंग शब्द-*


1) *पुरूष मन के नाम*-

    कमल, राम,दुकालू, सुकालू


2) *प्राणी मन के नाम-* 

    घोड़ा, बघवा, कोलिहा, बकरा


3) *समूहवाची नाम-*

    टोला, पारा, मुहल्ला

   (अपवाद- टोली, भीड़ स्त्रीलिंग)


4) *पहाड़ मन के नाम*-

    कबरा, दलहा, सिहावा

   (अपवाद- पहाड़ी के नाम स्त्रीलिंग-सीताबेंगरा)


5) *वृक्ष मन के नाम*-

   आमा, मुनगा, लीम, पीपर


6) *तरल पदार्थ मन के नाम-*

    दही, मही, तेल, शरबत


7) *देश, प्रदेश, समुद्र के नाम-*

   भारत, पाकिस्तान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, अरब सागर, हिंद महासागर


8) *महीना अउ दिन के नाम-*

   चइत, बइसाख, जेठ, जनवरी, फरवरी, सोमवार, मंगलवार


9) *अनाज के नाम-*

    गेहूँ, धान, चना

   (अपवाद- मूंग, अरहर, मसूर, उड़द स्त्रीलिंग)


10) *धातु मन के नाम-*

    सोना, लोहा, ताँबा, काँसा

    (अपवाद- चांदी स्त्रीलिंग) 


   *छत्तीसगढ़ी म स्त्रीलिंग शब्द*-


1) *स्त्री मन के नाम-* 

   राधा, सुखमती, रामवती


2) *नदिया के नाम-* 

    अरपा, पैरी, महानदी, मनियारी

(अपवाद- शिवनाथ, ब्रह्मपुत्र पुल्लिंग)


3) *कुछ निर्जीव वस्तु मन के नाम-* 

   सेकमी, कुरिया, तेलई, तरकी


4) *प्राणी मन के नाम-* 

   गाय, बछिया, कुकरी 

                               


 *छत्तीसगढ़ी म पुल्लिंग संज्ञा शब्द ला स्त्रीलिंग बनाय के कुछ* *सामान्य नियम हे-* 


1) पुल्लिंग संज्ञा शब्द के अन्त म ' *वा*' के स्थान म ' *इया*' जोड़े ले शब्द स्त्रीलिंग बन जाथे। जइसे-


     बुढ़वा               बुढ़िया

     बछवा               बछिया

     पँड़वा               पँड़िया

     टुरवा                 टुरिया


2) पुल्लिंग संज्ञा के अन्त म ' *आ*' के मात्रा ला हटा के ' *ई*' के मात्रा जोड़े ले अनेक संज्ञा शब्द स्त्रीलिंग बन जाथे। जइसे-


     टूरा                   टूरी

     बेंदरा                बेंदरी

    डोकरा              डोकरी

     कुटहा              कुटही

     लबरा              लबरी

     दुल्हा               दुल्ही

     ललचहा          ललचही

     लपरहा           लपरही

     रेचका             रेचकी

     टेड़गा             टेड़गी

     कबरा            कबरी

     कुकरा           कुकरी

     हरहा             हरही

     बड़ा              बड़ी

     मंगला           मंगली

     बोकरा          बोकरी


3) पुल्लिंग संज्ञा शब्द के अन्त म ' *ई*' या ' *ईया*' होही तब ओला हटा के ' *निन*' करे म शब्द स्त्रीलिंग बन जाथे। जइसे-


धोबी                     धोबनिन

ओड़िया                 ओड़निन

गौंटिया                   गौंटनिन

पहटिया/                पहटनिन/

पहाटिया                 पहाटनिन


4) नामधारी या जातिवाचक या अन्यसूचक नाम म ' *आइन* ' लगा के पुल्लिंग ला स्त्रीलिंग बनाय जाथे।जइसे-


गुरु                        गुरवाइन

                              (रु~रव)

पंडित                    पंडिताइन

चौबे                       चौबाइन

                               (बे~ब)

साहेब                     साहेबाइन

लाला                      ललाइन

                           (लाला~लला)

ठाकुर                     ठकुराइन

                               (ठा~ठ)

मिसिर                     मिसराइन

                                (सि~स)         


5) कुछ संज्ञा के पुल्लिंग अउ स्त्रीलिंग के शब्द स्वतंत्र होथें। जइसे-


मौसा                      मौसी

बाबू                        नोनी

ददा                         दाई

ससुर                       सास

जेठ                         जेठानी

राजा                        रानी

भांटो                        दीदी

देवर                         देरानी/देवरानी

साहेब                       मेम

पठुरा/पठरू              पठिया

(बकरी का बच्चा)  (बकरी की बच्ची)


6) कुछ अन्य संज्ञा मन के पुल्लिंग अउ स्त्रीलिंग रूप-


हाथी                     हथनिन

नाती                     नतनिन

पटवारी                 पटवरनिन

बघवा/बाघ            बघनिन

लोहार                   लोहारिन

देवार                     देवारिन

किसान                  किसानिन

बेटा                       बिटिया

लोटा                      लुटिया

दुलरवा                   दुलौरिन

भैया                       भौजी

एर्रा बिलाव              एर्री बिलाव

एर्रा मुसुवा               एर्री मुसुवा

एंड्रा कुरारी              माई कुरारी

(नर बगुला)             (मादा बगुला)

एंड्रा भालू                 एंड्री भालू/

                               माई भालू

एंड्रा तितर                एंड्री तितर


7) ' *इनी*' अउ ' *नी*' प्रत्यय जोड़ के घलो कुछ संज्ञा ला पुल्लिंग ले स्त्रीलिंग बनाय जाथे।जइसे-


कमल             कमलिनी (इनी प्रत्यय)

मोर                मोरनी (नी प्रत्यय)

चोर                चोरनी (नी प्रत्यय)


8) कुछ शब्द मन के प्रयोग उभयलिंग के रूप म दुनों बर होथे।जइसे-


गिंया, गरुआ, चिरई, लइका, मनखे, जाँवर-जोड़ी


9) अर्थ के आधार म एके समान होय के बावजूद स्त्रीलिंग अउ पुल्लिंग के संज्ञा शब्द अलग-अलग होथे। जइसे-


कवि                    कवयित्री

नेता                     नेत्री

साधु                     साध्वी

लेखक                  लेखिका

महान                    महती


        # *शुद्ध अउ अशुद्ध वाक्य #*


1) आपके *महान* कृपा होही।(अशुद्ध)

    आपके *महती* कृपा होही।(शुद्ध)


2) कुसुम एक बड़ी *लेखक* बनही।(अशुद्ध)

    कुसुम एक बड़ी *लेखिका* बनही।(शुद्ध)


3) शकुन्तला बने *कवि* आय।(अशुद्ध)

    शकुन्तला बने *कवित्री*  आय।(अशुद्ध)

    शकुन्तला बने *कवयित्री* आय।(शुद्ध)


4) सुमन म बड़े *नेता* बने के गुन हे।(अशुद्ध)

     सुमन म बड़े *नेत्री* बने के गुन हे।(शुद्ध)


5) कमला *साधु* के रूप म देवी हे।(अशुद्ध)

    कमला *साध्वी* के रूप म देवी हे।(शुद्ध)



 #   *व्याकरण जब लड़खड़ाय लगथे!* : *एक सम्यक टिप्पणी*#


       लोकव्यवहार के आघू व्याकरण ला घलाव रूके ला परथे अउ कभू-कभू रद्दा घलाव बदले ला परथे।


    1) *English* ला हिन्दी भाषा म *अंगरेज़ी* के रूप म लिखे जात रहिस। लोकव्यवहार म सबले पहिली *नुक्ता* ला छोड़िन अउ *अंगरेजी* लिखे लगिन। ओहू म दिक्कत होइस त *अंग्रेजी* लिखे लगिन। अब एही ह सर्वत्र मान्य हे। व्याकरण सम्मत *अंगरेज़ी* शब्द हे फेर लेखन म लोकव्यवहार के शब्द *अंग्रेजी* घलो मान्य हे।


2) # *भारत हमारी मातृभूमि है।* (सही)

          भारत हमारा मातृभूमि है।(गलत)

     # *भारत हमर मातृभूमि हे।*(छत्तीसगढ़ी : सही)


    उपर के उदाहरण म *हिन्दी* भाषा म देश के नाम (भारत) बर *स्त्रीलिंग* के प्रयोग होय हे; जनमान्यता के अनुसार एहा सही हे।


अब एक अउ उदाहरण ला देखव अउ गुनव-


# *भारत प्रगति के पथ पर बढ़ रहा है।* (सही)  

     भारत प्रगति के पथ पर बढ़ रही है।(गलत)  

# *भारत प्रगति के रद्दा म आघू बढ़त हे।*(छत्तीसगढ़ी : सही)


     ऊपर के उदाहरण म *हिन्दी* भाषा म देश के नाम (भारत) बर *पुल्लिंग*  के प्रयोग होय हे।


 *वइसे हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी व्याकरण म देश/प्रदेश के नाम ला पुल्लिंग माने गे हे।*    


3) अब *हिन्दी* के कुछ *संधि* मन ला देखव अउ गुनव-


आम+चूर = अमचूर (आमचूर-गलत)


हाथ+कड़ी = हथकड़ी (हाथकड़ी-गलत)


कान+कटा = कनकटा (कानकटा-गलत)


     उपर के तीनों उदाहरण म संधि के नियम स्पस्ट नि हे। वास्तव म देखव तो *आमचूर* के स्थान म *अमचूर* बोलना सरल हे। वइसने *कानकटा* के स्थान म *कनकटा* अउ *हाथकड़ी* के स्थान म *हथकड़ी* बोलना सरल हे। आमजन बोलचाल म सरल शब्द ' *अमचूर, कनकटा, हथकड़ी '* मन के प्रयोग करथे; एकरे सेती ओ शब्द मन के योग ला विशेष संधि के रूप म मान्य करे गे हे।


4) # हमन *जावत हन।* 

         हमन *जात हन।(व* विलुप्त )

          हमन *जाथन*।( *त+ह=थ* )


    आमजन के बोलचाल म ' *जावत हन* ' ले ' *जात हन*' फेर ' *जाथन*' म शब्द ह अपभ्रंस होके सरलीकृत हो गे। अब एही ला व्याकरण सम्मत माने जाही।

     शब्द के जोड़ ले नवा-नवा शब्द बनथे। *उपसर्ग, प्रत्यय,* *सन्धि* अउ *समास* ला शब्द रचना के विधि माने गे हे। एक तरह ले देखे जाय त आमजन के बोलचाल म बहुप्रचलित शब्द मन ला सिलहो के ही तदानुसार नवा-नवा शब्द गढ़े के नियम मन ला बनाये गे हे- समे-समे मा ओला परिवर्तित अउ परिवर्धित घलो करे गे हे।




 डाॅ विनोद कुमार वर्मा

कहानीकार, समीक्षक, संपादक


मो.   98263 40331

प्रेरणा

 प्रेरणा


प्रेरणा कोन बनथे कब बनथे ये कहे नी जा सके। अइसे नी हे कि प्रेरणा सिर्फ दाई ददा गुरु हो सकथे प्रेरणा चिरई, चुरगुन, पशु तको हो सकथे। असन कहत मनोज हर बेटी ला समझावत रहय प्रेरणा मन मा आथे तभे लक्ष्य के निर्धारण होथे , अउ बुता करत मंजिल मिल जथे सबले पहिली का करना हे सोचना चाही । अपन उद्देश्य ला समझना चाही ,अपना क्षमता खुद के देखना चाही ऐसे कहत मनोज ददा के फर्ज ले समझाय के बाद आफीस चल देथे ।कालेज पूरा करके  तात तात निकले शीलू अपन मंजिल के तलाश मा सोचत बइठे रहिस, के काय करँव कहिके ओला सूझत नी रहय । शीलू कई दिन गुजरगे ,असकटियात  रहय घर मा, बाहिर अपन सहेली संग घूमे जाय के सोंचथे अउ बगिचा कति घूमत रथें। तइसनहे एक झन चोर हा 70 साल के डोकरी दई के पर्स ल चोरा के भागत रहय फेर पुलिस देख के भी अनदेखा करके माखूर मलत बइठे रहय ।पुलीस के ये कारनामा देखके शीलू हर लघे जाके कथे  मदद काबर नी करत हस जी साहेब -ता कथे...ये तो रोज के काम आय अपन समान के रक्षा खुद करना चाही ,पुलीस कतक ल पीछू भागही अइसे कहत बेंच मा बइठे माखूर मलत चुप बैठगे । शीलू ल रीस लगत रहय फेर काय करिही। मूड़ खराब होगे कहिके बाहर आवत रहिस तव देखथे  सड़क मा कचरा फेंक के सबो कलोनी के मन मैदान ल भरत रहिन गार्डन के आघू बदबू मा भरे रहय फेर कोनों कहईया नी दिखत हे। शीलू के मन शासन के रवइया ठीक नी लगिस अउ जनता तो अनपढ़ कस अपन दुरा के कचरा घर के आघू मा थोरिक दूर माफेंक के बला टारथें अइसे काम मन जनता के मन नी आत रहय तेकर ले सब मनखे बर भी नराज रहिस। वापिस घर आवत रहिस तसने सड़क मा  एक्सीडेंट होगे एम्बुलेंस बलाय कतका बेर होगे पर अभी तक नी आत हे देखत देखत एक झन ओ मनखे मर गे शीलू के जी जर गे ये प्रसासन अउ मनखे घलो कतका निर्दयी हे शीलू एक टेम्पो करके बाकी मन ला अस्पताल पहुँचाइस । अस्पताल घलो मा हालत वैसे रहय रहय कतको मरीज कतको तड़पत रहिन फेर शीलू हिम्मत ले काम करके डाक्टर ले बात करके झटपट इलाज करवाइस शीलू के बुता ला देखके एक मरीज के दाई कथे तोर सही कलेक्टर होतिस न बिटिया तव सबो कति ब्यवस्था झटपट अउ बढि़या होतिस देख न तोर दू मिनट मा कतका मरीज मन ला डाक्टर देखे लग गे चार घंटा के ठाडे़ तड़पत हे मोर बेटा ,जरुर तँय दूसर के पीरा हर नोंनी सकबे ता ओ बुता कर जेमा सबके भला होय ये लचर ब्यवस्था ले छुटकारा देवा सक तव बनें होतिस भगवान तोला साथ दय नोनीं ।ओ दाई के कहे कइसे दिमाग मा बसगे अब शीलू तय कर लीस का करना हे अउ मन मा सोचथे मँय ही ठीक करहूँ मँय जिलाधिकारी क्लेक्टर बनहूँ करके मन मा ठान लीस खूब तियारी करिस ।अउ कलेक्टर होगे ।जिंनगी के सबो फैसला भगवान के हाथ मा होथे भगवान जेला जेखर बर बनाय रथे ओही होथे शीलू क्लेक्टर बनके शीलू नियम शहर बर अतना सुघर बनाइस साफ सफाई से लेके अस्पताल सुविधा ,पढाई लिखाई सब पानी बिजली राशन सब समय मा मिलत गइस सबो गरिया जिला के मन भारी खुश रहिस अउ आशीर्वाद देत रहिन। सदा सब के सुख के ख्याल राखइया शीलू के काम ला देखके मंत्री जी कमिश्नर बना दीस। मनोज कथे जेन प्रेरणा ले काम करहू ओ पूरा जरुर होथे ।शीलू आज बहुत खुश रहिस शहर के सबो काम बुता सुचारु रुप ले बढि़या चलत गीस जेला सबो सहरावत रहिन। शीलू के बुता ला देखके दूसर जिला मा भी काम करे गइस कि नवा इतिहास बन गे चारो मुका साफ सुथरा शहर अउ सुविधा के नाम मा गरब होय लागिस सब ला सुन के शीलू मगन होत रहय ।एक दिन अखबार मा इंटरव्यू शीलू के छपे रहय प्रेरणा स्तोत्र ओ मरीज के दाई जानकी के नाम लिस जेन हर ओखर दिमाग ला झकझोरे रहिस । मनोज पेपर पढ़त कथे शीलू प्रेरणा स्तोत्र कोनों भी हो सकथे- है न  शीलू हा ददा कहत दूनों चाय के ढूँक पियत हाँसत रहिथे हा. हा. हा............



*धनेश्वरी सोनी गुल बिलासपुर*

धनवा के सियानी**

 .  **धनवा के सियानी**

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      धनवा हर गाँव के छोटे से किसान ये, दिन के दिन नइ पुरय। अड़हा के अड़हा रथे, परिवार ल बढ़ा दारे रथे। छः झन बेटा अउ दू झन बेटी। दस झन के परिवार। बाहन-भंइसा, गाय-बछरु, बकरी-मुर्गी  के संग एक ठन कुकुर घलाव राख दारे रथे। तोता-मैना के बोली अलग ले सुनावत रहे। 


     बड़े बेटा हर थोरकन पढ़े रथे, बाकी मन तो दू-चार कक्षा पढ़ के छोंड़ दे रथें। दू झन नान-नान हें तेही मन भर स्कूल जावत रथें तेहु  मन के किताब-कापी, कपड़ा-लस्ता कछु के सोर नइ रहय। किताब-कापी लेहे के नाव म धनवा हर कंझा जाथे। कोनो लइका ल कभु पाँच रुपया घलाव देहे असन नइ करय तभो ले दूनों भाई-बहिनी कइसनों करके पढ़त रथें। दूनो बड़े बेटा मन कछु-कछु काम-बूता धर दारे रथें त धनवा ल समय-समय म दू-चार पइसा के मदद मिल जाथे। 

      दूनों बेटा मन काम-धंधा धर दारे रथें त धनवा हर ओमन के बिहाव करे के सोचथे अउ लड़की देखे बर शुरु कर देथे। बिहाव के खर्चा के बारे म सोंचथे त धनवा ल एकठन उपाय सुझथे, तेकर ले तो चारो बेटा के बिहाव ल एके घंव कर देत हँव त चार फइत के शादी के खर्चा हर बाँच जाही। गरीब आदमी का नइ सोंचय ओकर बर तो दस-बीस रुपया घलाव बहुत होथे। 

      धनवा हर चारों बेटा बर लड़की देख लेथे, एक ले बढ़ के एक सुग्घर रथे चारों लड़की मन। धनवा हर इहाँ-उहाँ सब रिश्तेदार मन ले पइसा-कउड़ी उधार ले के चारों बेटा मन के बिहाव ल निपटा दारथे। चारों बहु के दइज-डोर म घर हर भर जाथे, पाँव मढ़ाय के जगह नइ होवत रहय। सब दइज-डोर के सामान ल बेच के धनवा हर बिहाव के सब कर्जा ल उतार देथे। 

      बिहाव तो बढ़िया निपट गे, घर म चारो बहु के आय ले घर के रौनक बाढ़ गे रहय। चारो बहु ल देख-देख के धनवा गद् गद् हो जाथे। अब समस्या ये हे कि चारो बहु बर चार ठन कुरिया भी चाहिये। धनवा के छोट-छोट चार ठन कुरिया रहय, चारो कुरिया ल अपन चारो बहु ल देके अपन हर अपन घरवाली अउ चारो लइका मन ल धर के परछी म आ जाथे। अब नावा-नावा मेहमान भी आय लगथे। सबो बहु मन के लगजन मन कोनो न कोनो पहुँच जाथें ओमन के मान-गउन, रहे-बइठे के ब्यवस्था सब करे ल परथे, गलती खुद के हे त कोन ल काय कहे, चूपचाप रइ जाथे।

     धनवा हर बड़े बहु के खशखबरी पाथे त बबा बने के खुशी म फूले नइ समाय। एक-एक करके सबो बहु मन ले खुशखबरी मिलथे त धनवा हर गद् गद् हो जाथे। राम,लक्ष्मण, भरत, शत्रुहन जइसे चार झन नाती मोर अँगना म खेलहीं कथे। अब तो धनवा ल अपन नाती मन के आय के बड़ बेसब्री ले अगोरत रहय। वो दिन आ जाथे जब बड़े बहु के लड़का होथे। घर म जम्मो झन के खुशी के ठिकाना नइ रहय। नावा पीढ़ी के नावा लइका तेहु हर लड़का। जम्मों के मन होथे के बने धूमधाम से छट्ठी मनाबो त धनवा कह देथे नहीं चारों के लइका के एक संग ही छठी होही बार-बार हम खर्चा नइ करन। बड़े वाला लड़का तो साफ बोल देथे के तैं नइ करबे त मैं कर लेहौं। जम्मो के जिद के आघु म धनवा ल झुके बर पड़ जाथे अउ चारों झन के लइका के अलग-अलग छट्ठी करे बर परथे। शादी अतका खर्चा पर जाथे। धनवा बोलथे एक संग छट्ठी ल करबो कहें त तुमन नइ माना अब देखा कतका खर्चा होइस हे तेला, लड़का मन बोलथे तोला कोन कहे रहिस हे एके फंइत चारो झन जे शादी करे बर, कउन-कउन काम ल तैं अइसने एके संग करबे।

     धनवा के घर म झगड़ा हर बाढ़ जाथे, बड़े लड़का हर साफ बोल देथे के मोला अब तोर संग नइ रहना हे, मंझला वाला घलव बोल देथे महु ल नइ रहना हे। धनवा हर चारों झन ल अलग रहे बर कइ देथे। कहे बर कइ देथे फेर घर के ब्यवस्था कहाँ ले करय। घर म तो कछु सामान नइ हे का चीज के बँटवारा करय। शादी म जउन कुछ सामान मिले रहिस ओ सब ल तो पहिली ले बेंच दारे हावे अब बँटवारा दे त दे का? चारो कुरिया ल चारो बेटा मन ल रहे बर दे दिही त अपन हर चारो लइका मन ल लेके कहाँ रही। खेती-बाड़ी घलाव घलाव अतका नइ हे। धनवा हर सोंच म पड़गे, ये सब का होगे मैं तो आने सोंचे रहें ये तो आने होगे। मोला लागत रहिस एके घँव शादी कर दिहौं त खर्चा बाँच जाही चार घव के शादी के परेशानी ले बाँच जाहुं सोंचे रहें, जम्मो उल्टा होगे, खर्चा के खर्चा बाढ़ गे, परेशानी के परेशानी। उल्टा फजीहत होगे। मैं होशियारी करें फेर मोर सियानी काम नइ आइस अब ले मोला कछु सियानी करे बर नइ हे। 


**अंजली शर्मा **

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

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सुशील भोले: कहानी.. एॅंहवाती

 सुशील भोले: कहानी..         एॅंहवाती

    भूरी के भाग आज नंठागे. अब्बड़ सेवा-जतन करिस. डॉक्टर-बइद मन जइसन कहिन तइसन दवई-दारू करिस, फेर वोकर चूरी छरियाइच गे. माँग के सेंदुर बने जात के गढ़ा नइ पाइस अउ जम्मो ह धोवई धोए कस धोवा गे. पारा-परोस के मन आनी-बानी के गोठियावयं, कोनो कहय- रांड़ी ह जवान गोसइयां ल खा डरिस. आॅंखी हर तो बिटबिट ले दिखबे करथे, फेर एला अपनेच घर के ह मिलिस वो... कोनो कहय- मोला तो वो छोकरा बपरा ल दवई-दारू म कुछू-कांही करके देदे हे ताइसे लागथे. देवर संग लुहुर-टुपुर करत रहिथे, तेकरे सेती जोड़ी ह अब सिट्ठाए कस लागत रिहिस होही. कोनो कहय- हहो ठउका काहत हस, तभे तो टूरा बपरा ह बेमारी के मारे कल्हरत परे राहय अउ ए ह छछिंदरिन कस किंजरत राहय. कभू तो बपरा ल तेल-पानी चुपरत देखतेन, जब देखतेन त सोन-परी बरोबर सज-सम्हर के हांसत भकभकावत देखतेन!

    भूरी के अंतस के पीरा ल भूरिच ह जानत रिहिसे, ते वोकर भगवान ह. दूसर म अउ कोनो जाने-टमड़े के लइक रिहिसे ते वोकर देवर कमल ह, जेन ह दुख के बेरा म भइया-भउजी के सेवा-चाकरी म रात-दिन भीड़े राहय. बाकी सबो झनला सिरिफ भूरी के चारी करे म मजा आवय. उहू चारी अइसन, जेकर कोनो गोड़-मुड़ी नइ राहय. एको झन तो भूरी के पीरा म आंसू बोहा लेतिन! बपरी ह भरे जवानी म अपन जोड़ी ल बिसार डारिस. ओकर टीबी के जबर बेमारी के इलाज म अपन जम्मो गहना-गुरिया, बारी-बखरी ल बेंच डारिस फेर वोला बचाए नइ पाइस. अब कुल सम्पत्ति वोकर दू झन लइका के छोड़ अउ कुछू नइए. एक झन पांच बछर के रिंकू अउ दू बछर के टिंकू. कइसे करके अतेक बड़ जिनगी ल पहाही, नान-नान लइका मनला कइसे करके पढ़ाही-लिखाही, उनला पांव म खड़ा करही..?

    घर-परिवार अउ समाज के असली चेहरा ल अइसने बेरा देखे-परखे बर मिलथे. जतका झन समाज सेवा के नांव म मुड़ म पागा खापे किंजरत रहिथें. वो मनला तो सिरिफ खात-खवई भर के चिंता रहिथे. भूरी ह अपन गोसइयां के किरिया-करम म लाड़ू-पपची खवाही नहीं? अउ बरा-सोंहारी के सेवाद चिखवाही नहीं? सबो घर तो अपन ह किंजर-किंजर के खाए हे, तब सोझ म उहू ल खवाए बर लागही. अउ कहूँ नइ खवाही, त सोझ-बाय वोला डांड़-बोड़ी खाए बर लागही. बस समाज अतके म मगन राहय. एको झन लइका मनला अनाथ होए ले कइसे बचाए जा सकही, वोकर मरनी-हरनी के बेवस्था ल कर पाही धुन नहीं ते? कभू नइ गुनय!

* * * * *

    किरिया-करम के पाछू भूरी ल लइका मनके चिंता बजुरा-पहार बरोबर लागे लागिस. बाप ह कतकों बीमार रिहिसे तभो लइका मनके मुंह म चारा डारे के अलवा-जलवा बेवस्था करिच डारत रिहिसे. अब घर म सियान के नांव म एक झन सास भर ह रहिगे हे, तेनो ह दिन-रात खांसी-खोखी म बूड़े रहिथे. कभू कनिहा पीरा ते कभू छाती पीरा, बस वो ह वतके म बिपतियाए रहिथे. देवर कमल ह छोटे-मोटे रोजी-मजूरी करथे, फेर वतकेच म का होथे? दिन के दिन बाढ़त मंहगाई के सेती अब ककरो घर के पेट-पसिया बने गतर के नइ चल सकत हे. भूरी के आंखी म रतिहा नींद नइ आवय. वो गुनथे अब महूं ल घर के डेहरी नहाक के कहूँ काम-बुता म जाए बर लागही तभे बनही. आज लइका मन नान-नान हें,  साल दू साल म स्कूल जाए के लाइक हो जाहीं, तहाँ ले खरचा अउ बाढ़ जाही. फेर सबले बड़े बात तो ए हे, के कमल एक ले दू हो जाही, अउ वोकर सुवारी कहूँ थोरको खइटकार होइस, तहाँ ले तो मरे बिहान हो जाही. 

    भूरी अपन भविष्य के ताना-बाना म बिपतियाए रिहिसे, तभे वोकर छोटे बेटा चिंकू सूते खातिर रोए लागिस. भूरी वोला लोरी सुना-सुना के रोजे सुतावय, तेकर सेती वोकर सूते के पहिली लोरी सुने के टकर परगे राहय. भूरी समझगे ये लोरी सुने बर रोवथे कहिके. तब अंतस के पीरा अपने-अपन वोकर मुंह ले फूट परिस-

    कइसे झुलावौं झुलना गरीब के लाल,

    डेहरी म खड़े हे लेगे बर मोला  काल...

    भरे जुवानी म ददा तोर बिसरगे, बेटा ल चुमे बिन सुरता म सजगे.

    जीते-जी मरे कस आज होगे मोर हाल..

   डेहरी म खड़े हे लेगे बर मोला काल...

* * * * * 

    रतिहा जब जादा होवय त वोकर सास कइसनो करके सूती जावय, फेर देवर कमल ह भूरी के पीरा ल समझ के वोला टकटकी लगाए देखत राहय. वो मने-मन गुनय घलो एकर दुख ल मैं कइसे कम कर सकथौं? वो भूरी संग एती-वोती के गोठ करके वोकर मन ल हरू करे के उदिम रचय, फेर भूरी के अंतस तो दुख के खदान बनगे राहय. वो कमल ल कहिस-' कइसे  करबे बाबू.. तोर अकेल्ला के कमई म तो घर के खरचा चलई ह मुसकुल जनाथे, कोनो मेर मोरो लइक बुता-काम देखना.'

    भूरी के बात म कमल के अंतस रो डारिस. वो गुनथे- हे भगवान, अइसनो दिन देखे के बदे रिहिसे? हमर घर के मरजाद ल डेहरी ले पांव निकाले के दिन आगे? वो कहिस-' मैं तो कमातेच हौं न, कइसनो करके पेज-पसिया के बेवस्था होइच जाथे. तब तोला घर के डेहरी छोड़े के का जरूरत हे?'

    अइसने म के दिन चलही बाबू, फेर आज नहीं ते काल तहूं एक ले दू होबे, तहाँ ले तोरो लोग-लइका होही, तब एके झन के कमई म सबो झन कइसे जीबो?'

    -अउ मैं बिहाव नइ करहूं त?

    -कइसे बइहा बानी के गोठियाथस तैं ह.

    -सिरतोन काहत हौं, मैं तुंहरे मनके सेवा-जतन म ए जिनगी ल बिता देहूं, इही लइका मनला देख के अपन लइका के सपना ल पूरा कर लेहूं.

    -कइसे गोठियाथस बाबू... तहाँ ले ए समाज ह मोला जीयन देही? आज अतेक दुख-पीरा के पहार म चपकाए हौं, तब तो रकम-रकम के गोठियाथें, काली कहूँ तैं बिहाव नइ करबे त मोला का-का कइहीं तेकर सरेखच नइए. मोर बर तो मरे बिहान हो जाही- काहत भूरी रो डारिस.

    कमल वोला पोटार के चुप कराइस तहाँ ले कहिस-' ले ठीक हे, मैं तोर लइक कोनो मेर बुता-काम देखत हौं. काल बिहन्चे संगवारी मन करा गोठियाहूं काहत भूरी ल वोकर जठना म सूता के कथरी ल ओढ़ा दिस, अउ अपनो ह अपन कुरिया म आके सूतगे.

* * * * *

    कुकरा बासत कमल के नींद खुलगे. रोजे सहीं वोहा लोटा-मुखारी धर के तरिया कोती चल दिस. तरिया म रोजे कस गुरुजी संग भेंट होइस. दूनों के जोहार-पैलगी होइस, तहाँ ले गुरुजी वोला पूछ परिस-' कइसे कमल आज तैं पछुवा गेस, नइते आन दिन तोर ले पाछू मैं आवत रेहेंव?'

    -का करबे गुरुजी रात भर आंखी म टकटकी धरे रहिथे, तेकर सेती अतका बेर देरी से नींद खुलथे.

    -कइसे का होगे जी?

    -जानत तो हस गुरुजी घर म घटे घटना ल. अब भौजी ह काम खोजदे काहत हे.

    -बने तो काहत हे कमल. अपन लोग-लइका खातिर तो वोला घर के डेहरी ल नाहकेच बर लागही.

    -त मैं ह तो कमातेच हौं न गुरुजी, अलवा-जलवा तो चलतेच हे पेज-पसिया ह.

    -तोर कमई म वोकर जीवन कइसे चलही कमल, फेर तहूं ल अभी एक ले दू होना हे, त फेर वो ह कइसे करही?

    कमल मुखारी चगलत घठौंदा के पखरा म बइठत कहिस-' अउ मैं जीवन भर बिहाव नइ करहूं त गुरुजी?'

    गुरुजी नहाए के बाद कपड़ा ल फलियारत कहिस-' अइसे कइसे हो सकथे, ए तो जीवन के रिवाज आय. सबो ल एक ले दू अउ दू ले चार होना परथे, तभे तो सृष्टि के क्रम ह चलथे बेटा.'

    -कुछू होवय गुरुजी.. फेर मैं अपन घर के मरजाद ल डेहरी ले बाहिर नइ निकलन देवौ.

    गुरुजी लोटा म पानी धरके शिव मंदिर म जल चढ़ाए जावत कहिस-' अइसन हे, त एक रस्ता हे बेटा...

     -का गुरुजी?

    -तैं अपन भौजी संग बिहाव कर ले, कहिके गुरुजी मंदिर भीतर खुसरगे. महादेव म जल चढ़ा के निकलिस, त कमल कमल कथे-' कस गुरुजी तैं काहत हस तेन फभे के लइक हे? अरे भई तुहीं सियान मन तो कहिथौ, देवर-भौजी के नता ह महतारी-बेटा कस होथे कहिके.'

    गुरुजी कच्चा कपड़ा मनला सकेल के सुक्खा कपड़ा पहिनत कहिथे-' सब परिस्थिति अउ समय के बात आय बेटा. ए पुरुष प्रधान समाज ह सबो नियम-कायदा ल अपन स्वारथ के मुताबिक बनाय हे. अउ वोला बेरा-बखत म एती-वोती घलो करत रहिथे. जब कोनो आदमी के घरवाली मर जथे, त बहिनी के लोग-लइका मनला  सम्हालही कहिके वोहा अपन सारी ल बिहा के लान लेथे. अइसने इहू काबर नइ सोचे जाय के बड़े भाई के लोग-लइका मनला अनाथ होए ले बचाए खातिर देवर संग वोकर भौजी के  बिहाव करवा दिए जाय. दूनों झन तो आखिर हमजोली होथे. फेर उहू बपरी ल तो एक जीवन साथी के जरूरत होथे, त फेर वोकरो व्यवस्था काबर नइ होना चाही?'

    -फेर मैं तो अपन भौजी ल अइसन नजर ले कभू सपना म तक नइ देखे हौं गुरुजी.

    -ए तो तोर अच्छा नीयत अउ चरित्र के परमान आय बेटा, फेर अब एला समय अउ परिस्थिति के अनुसार बदल. आखिर भगवान मन घलो तो अइसन व्यवस्था ल चलाए हे. त फेर हमन ल वोला काबर नइ मानना चाही?

    -भगवान मन अइसना व्यवस्था चलाए रिहिन हें? कमल ल बड़ा अचरज लागिस. त गुरुजी वोला समझाइस-' हां बेटा, भगवान मन घलो अइसन व्यवस्था करे रिहिन हें. अच्छा ए बता, भगवान राम ह बाली ल मारे के बाद वोकर सुवारी अउ बेटा अंगद ल सुग्रीव ल सौंप के वोकर मन के पालन-पोसन के जम्मो व्यवस्था ल पूरा करे के जवाबदारी दे रिहिसे के नहीं?'

    कमल ह मुड़ खजवावत कहिस-' हां ए बात तो सही हे.'

    गुरुजी फेर पूछिस-' अच्छा ए बता, वोकर बाद रावन ल मारे के बाद, वोकरो गोसइन मंदोदरी ल विभिसन ल सौंप के वोकर जम्मो व्यवस्था ल पूरा करे के जवाबदारी दे रिहिसे के नहीं?'

    कमल फेर हां म मुड़ डोलाइस.

    -त फेर अउ का बात हे?' कहिके गुरुजी घर कोती रेंगे लागिस, त कमल वोला फेर कहिस-' केहे बर तो तैं ठउका कहिथस गुरुजी, फेर मैं भौजी अउ अपन दाई संग अइसन बात ल कइसे केहे सकहूं?

    गुरुजी थोरिक ठाढ़ होए कस होके कहिस-' अरे बेटा एकर चिंता ल तैं काबर करथस? मैं करहूं सबो संग गोठबात ल. घर, परिवार, समाज, पंच-पंचायत, मंदिर-देवाला सबो जगा मैं खड़ा होहूं.' कहिके गुरुजी अपन घर कोती चल दिस. 

    गुरुजी के बात ल सुन के कमल के मुड़ के चिंता ह थोरिक हरू होए असन लागिस. तहाँ ले उहू जल्दी-जल्दी नहाइस अउ घर कोती रेंग दिस.

    फागुन तिहार के मनाते कमल के अंगना म बाजा गदके लागिस. गाँव के पढ़े-लिखे लइका मन अपन गाँव म एक नवा इतिहास लिखे जाय के खुशी म गदकत राहयं. वोमन ल हांसत-नाचत देख के कुछ रूढ़िवादी मन कुलबुलावयं घलो, फेर गुरुजी के तर्क-वितर्क अउ वोकर चेला मनके उत्साह ल देख के उन जुड़ा जायं घलो. भूरी के मड़वा ल गुरुजी खुद अपन अंगना म गड़िया के वोकर कन्यादान करिस.

    चारे महीना म भूरी फेर एॅंहवाती के एॅंहवाती होगे. वोकर लइका मनके मुड़ म फेर बाप के छांव आगे. कमल घलो नवा साल म जब बड़े बेटा रिंकू ल पढ़े खातिर पहली कक्षा म भरती करिस, त वोकर बाप के नांव के जगा म अपन नांव ल लिखा के लइका मनला घलो पूरा के पूरा अपन बना लिस.

(कहानी संकलन 'ढेंकी' ले साभार)

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811


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समीक्षा- पोखनलाल जायसवाल:


 छत्तीसगढ़ के लोकजीवन म कतको किसिम के लोक मान्यता अउ लोकपरम्परा अइसे समाय हे, जइसे फूल म ओकर खुशबू महकई ह समाय रहिथे। ए लोक मान्यता अउ लोक परम्परा मनखे के जिनगी म आनंद अउ उछाह के रंग भरथें। कोनो ल उदासी के गहिर सागर ले  उबार लाथें। उँखर जिनगी म दुख के बादर घपटन नइ दँय। दया मया के खातू पानी ले सुख के बिजहा बोथें। इही इहाँ के लोक मंगल आय। जेन म 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' के भाव के साक्षात् दर्शन मिलथे।

       यहू बात हे कि हमर हाथ के पाँचों अँगरी बरोबर नइ हे। अइसने कुछु-कुछु बात घलव हमर समाज-परिवार म दिखउ देथे। नदिया के दूनो पार सहीं दू ठन विचारधारा संगसंगे आगू बढ़थे, फेर मेल नइ खावय। एक विचारधारा के दूसर ह पूरा के पूरा विरोध करथे। अइसन कतको मामला म देखे बर मिलथे। मरनी-हरनी म खात खवई। दाइज दे अउ ले के बेरा आने-आने सोच रखना। हमर लोक संस्कृति के एक ठन अउ खास विशेषता हे कि एमा 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के लोक भावना ह रग-रग म समाय हे। जेन ह सब ल एक डोर म बाँधे राखथे। दया मया के डोर म।

      भारतीय समाज म कतको किसिम के कुप्रथा लम्बा समय ले अपन जरी रोपे (जड़ जमाय) रेहे हे। अइसन किताब मन म पढ़े अउ सुने मिले हे। इही कुप्रथा म एक ठन रिहिस हे सती प्रथा। जेन तब भारतीय समाज म माइलोगन (नारी) के का दशा रहिस होही, के अनुमान लगाय बर काफी हे। कब ले कब तक चलिस ए अलग गोठबात आय।

       हमर छत्तीसगढ़ के लोकजीवन ल झाँके म मिलथे कि इहाँ के लोकमान्यता अउ लोक परम्परा ए मामला म बड़ सजोर संपन्न अउ समृद्ध रेहे हे। ए बात के प्रमाण इहाँ के लोकजीवन म झाँके ले मिलथे। इहाँ के लोकजीवन म भौजी अउ देवर के संबंध ल महतारी-बेटा के जइसे माने जावय अउ अभियो इही बात हे। ओ समय बने ढंग डॉक्टरी सुविधा के नइ रेहे ले काखरो संग अनहोनी घट जावत रहिस। इही अनहोनी म कतको बखत भौजाई जुच्छा हाथ हो जय अउ सरी जिनगी बाँचे राहय। कभू-कभू तो अइसन घलव रहय कि कोख म  रेहे अउ... अइसन म ओ समय के सियान मन बेवस्था बनाय रहिन हे कि देवर संग भौजी के बिहाव कर दे ले पहाड़ कस जिनगी म हरू हो जही। घर के बात घर म बना लँय।  येहर घर के मरजाद अउ माइलोगन ल सम्मान ले जिनगी जिए के हक अउ अधिकार दे के उदिम रेहे होही, कहे जा सकत हे। इही कथानक ऊप्पर लिखे गे कहिनी आय एँहवाती।

         ए कहानी म लोक जीवन के ओ जम्मो गोठबात हें, जेन समाज म तइहा ले चले आवत हे। लोक लाज के डर अउ जे मुँह, ते गोठ। सब कुछ हे। मानवीय संवेदना हे। समाज के वो रूप के डर हे, जिहाँ मरनी भात खाय अउ खवाय के चलन रेहे हे। यहू हे कि कुछ झन माइलोगन ल थोरको बन ठन के नइ देख सके। अउ कहूँ जुच्छा (खाली) हाथ होय के अनहोनी होगे त लोगन का सोचथे। कहे गे हे 'हँड़िया के मुँह तोप लेबे, फेर मनखे के मुँह ल काला तोपबे।'

    सुरसा के मुँह कस बाढ़त महँगाई म घर चलाय के चिंता अउ देवर-भौजी के पावन नता ल सरेखत गोठबात बड़़ सुग्घर हे। 

       गुरुजी के पात्र सुग्घर गढ़े गे हे। जेन कहानी ल तार्किक रूप ले मोड़ देथे अउ सियानी गोठ करके अभागिन माइलोगन के जिनगी म खुशहाली लाथे। 

         कहानी के भाषा म प्रवाह हे, भाषा सरल अउ सहज हे। मुहावरा मन के प्रयोग सुग्घर ढंग ले करे गे हे।

         संवाद तीनों के पात्र के मनोभाव ल टटोलत लिखे गे हे। पात्र मन के संवाद पात्र के संग नियाव करत हे।

       भूरी के संसो ल देखव - "कइसे करबे बाबू!...तोर अकेल्ला के कमई म तो घर खरचा चलई मुसकुल जनाथे मोरो बर कोनो मेर बूता देख ना।"

      देवर कमल ले बिहाव नइ करँव के गोठ सुनके भूरी के माध्यम ले समाज के चेहरा ल कहानीकार बने ढंग ले लिखे हें--कइसे गोठियाथस बाबू! ....तहाँ ए समाज मोला जीयन देही?.....काली का कइहीं तेकर तो सरेखच नइये।

      तरिया म गुरुजी अउ कमल के गोठबात म घलव जीवंतता हे।

         कहानी के समापन सुखद हे, एँहवाती होना जीवन म खुशहाली आय के संदेशा आय। ए शुभ संकेत हरे। अइसन म एकर ले अउ अच्छा दूसर शीर्षक नइ हो सकत रिहिस। 

         समाज म विधवा नारी ल बरोबर मान दे के उदिम म लिखे गे सुग्घर कहानी एँहवाती बर कहानीकार सुशील भोले जी ल मैं नंगत अकन ले बधाई पठोवत हँव।


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह पलारी 

जिला बलौदाबाजार छग.

Monday 30 May 2022

छत्तीसगढ़ी उपन्यास-लोक अभिव्यक्ति के उपन्यास केवट कुंदरा - दुर्गा प्रसाद पारकर ग्राम्य जीवन के वाहक उपन्यास 'केवट कुंदरा’







लोक अभिव्यक्ति के उपन्यास


केवट कुंदरा


- दुर्गा प्रसाद पारकर

ग्राम्य जीवन के वाहक उपन्यास 'केवट कुंदरा’


दुर्गा प्रसाद पारकर छत्तीसगढ़ के सिरमोर लेखकों में से हैं लेकिन उनका गद्य-पद्य या उपन्यासकार का रूप भी कोई अनजाना नहीं है। खासकर उनके लिखे उपन्यास 'केवट कुंदरा’ एवं 'बहू हाथ के पानी’ लोक जीवन, लोक चेतना, लोक संस्कृति के वाहक के रूप में व्याख्यायित भी किया गया है। दुर्गा प्रसाद पारकर की उपन्यास ग्राम्य जीवन के वाहक या आंचलिक है। इसमें कोई शक नहीं, इस अर्थ में कि वे घटनाओं या पात्रों पर उतना जोर नहीं देते जितना कि स्थितियों की गहरे दृश्य-चित्र उपस्थित करने में। कुल मिलाकर दुर्गा प्रसाद पारकर के उपन्यास 'केवट कुंदरा’ लोक जीवन, लोक संस्कृति पर आधारित है। वैसे दुर्गा प्रसाद पारकर का कृतित्व ही नहीं उनका व्यक्तित्व भी कालजयी है। श्री पारकर जी बुजुर्गों के साथ बुजुर्ग, जवानों के साथ जवान और बच्चों के साथ बच्चे हैं। जीवन के प्रति गहरी आसक्ति है, तीव्र सौंदर्यानुभूति के लेखक हैं। जीवन में भी वह इतने सहज ही उसकी भी वजह व्यापक परस्पर विरोधी जीवन स्थितियों को पचा सकने वाली क्षमता का ही प्रभाव है।

'केवट कुंदरा’ उपन्यास एक बारगी पढ़ने से पता चलता है कि वह किसी व्यक्ति या स्थितियों के रेखाचित्रों की तरह है और इन रेखाचित्रों को सजीव बनाने के लिए वह जीवन के छोटे-छोटे ब्यौरे देकर उनमें एक नया जीवन रस भर देते हैं।

प्रसिद्ध उपन्यासकार फणिश्वरनाथ रेणु की तरह श्री पारकर के उपन्यास ज्यादा खुरदुरे हैं तथा जीवन की जड़ों से ज्यादा गहरे और मजबूती से जुड़े हुए हैं। 'केवट कुंदरा’ की तस्वीर ज्यादा विश्वसनीय है। 'केंवट कुंदरा’ में प्रेम है, करूणा है, रिश्तों की गरमी, नरमी और प्यार खींचकर आगे लाते हैं और जीवन जीने की भरपूर इच्छा से जुड़ते हैं। यहां प्रेम जीवन से अलग कोई सजी हुई फुलवारी नहीं है। प्रेम तो सम्पूर्ण 'केवट कुंदरा’ में निहीत है। जीवन जीने की भरपूर चाहत पारकर के पात्रों में कूट-कूटकर भरी हुई है।

उपन्यास 'केवट कुंदरा’ आखिर तक पढ़ने को मजबूर करती है। कहने की सादगी, धैर्य और सतह के ऊपर तथा भीतर का सब कुछ सामने लाना, समस्या और कथा का संतुलन सब ऐसे घुले-मिले हैं कि बाह्य आडम्बर हावी नहीं होता। यह महज भौतिक विकास ही नहीं, गांव में मनुष्य के सामाजिक विकास की कहानी है। 'केवट कुंदरा’ को पढ़ते ही कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद, फणिश्वरनाथ रेणु, बाबा नागार्जुन, डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव स्वभाविक रूप से याद आते हैं। उनका मानना है-मैं उपन्यास को मानव जीवन का चित्र समझता हूं। मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्य को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्व है। 

यद्यपि छत्तीसगढ़ में अनेक जाति, धर्म और संस्कृति के लोग निवास करते हैं पर उनके चरित्र की विशेषताएं समान हैं और यही छत्तीसगढ़ की पहचान है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार व सरस्वती पत्रिका के संपादक डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के शब्दों में कहा जा सकता है कि 'स्नेह की सेवा, स्वामी भक्ति की दृढ़ता, विश्वास की सरलता, वचन की गौरव-रक्षा और ममत्व का अधिकार इसी में तो छत्तीसगढ़ की आत्मा है। छत्तीसगढ़ के जन-जीवन में चरित्र की ऐसी उज्ज्वलता है, जो अन्यत्र नहीं पाई जाती है।’

दुर्गा प्रसाद पारकर की भाषा उस गांव के आदमी की भाषा है, जो बहुत नहीं बोलता और अक्सर चुप रहता है। मगर जब भी बोलता है, अक्सर कोई गहरी मार करने वाली संवाद के माध्यम से बात करता है। मन में एक तरह की मुग्धता या गहरा लगाव है। इस उपन्यास की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे धीरे-धीरे सहज अपनाने वाली मंथर गति से बढ़ते हुए अपना प्रभाव कायम करते हैं। उपन्यास में लोक बोली के साथ बनते हुए चेहरे को साफ देख सकते हैं। 

लेखक श्री दुर्गा प्रसाद पारकर ने पूरी ईमानदारी के साथ घटित घटना का विवरण दिया है। उनका यह प्रयास रहा है कि वह घटना को उसी तरह रखें जैसे समाज में हो रही है और वह इस प्रयास में सफल भी रहे हंै। कथानक में यह जरूरी नहीं कि घटना सत्य ही हो, बल्कि जरूरी यह है कि घटना पाठक वर्ग को सत्य प्रतीत होनी चाहिए। लेखक जहां बोलता है वहां भाषा का स्वरूप बदल जाता है। वह भी सरल और सारगर्भित शब्दों में मार्मिकता और संजीदगी इस उपन्यास की भाषा है। 

उपन्यास 'केवट कुंदरा’ श्री दुर्गा प्रसाद पारकर जी के पारिवारिक दृष्टिकोण से ऐतिहासिक उपन्यास है, जो भाषागत दृष्टि से सरल, सपाट और लालित्यपूर्ण है। लोकगीतों की बुनियाद आंचलिकता का बोध कराती है। भाषा की बुनावट, कथानक की मौलिकता लेखक को पहचान दिलायेगी। 


- डुमन लाल ध्रुव



सामाजिक अनुभवों का पर्याय : केवट कुंदरा


दुर्गा प्रसाद पारकर का छत्तीसगढ़ी उपन्यास केवट कुंदरा अपने कथ्य, भाषा और शिल्प की दृष्टि से ध्यानाकृष्ट करता है। पारकर जी एक लंबे अरसे से साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में अपनी सक्रियता और पहचान बनाए हुए हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वे छत्तीसगढ़ जन मानस से अत्यंत गहराई से जुड़े हुए हैं। यहां मेरा आशय सिर्फ यह है कि जन जीवन की चहल-पहल से अगर आप अंतरंगता से जुड़ हुए हैं, तभी आप अपने आपको उन अनुभवों से समृद्ध कर पाएंगे, जो एक रचनाकार के लिए बेहद जरूरी होते हैं। हम एक ऐसे समय से गुजर रहे हैं जिसमें रचनाकार के पास भाषा तो हे लेकिन वह अनुभव नहीं है, जो लिखे हुए को एक बेहतर रचना में तब्दील करता है। दुर्गा प्रसाद पारकर का यह उपन्यास उनके प्रचुर सामाजिक अनुभवों का पर्याय है।

मुझे विश्वास है कि दुर्गा प्रसाद पारकर का यह उपन्यास पाठकों को पसंद आएगा। यह उपन्यास भाषा और कथा विन्यास की दृष्टि से पाठकों को संवेदित और संप्रेषित करने में समर्थ है। पठनीय और रोचक तो है ही। दुर्गा प्रसाद पारकर किसी घटना अथवा किस्से को एक कहानी में तब्दील करने में समर्थ हैं। यही इस उपन्यास की एक बड़ी विशेषता है। मैं पारकर जी को शुभकामनाएं देता हंू एवं पाठकों से निवेदन करता हंू कि इस उपन्यास को अवश्य पढ़ें।

बहुत बहुत शुभकामनाएं।


- विनोद मिश्र





एक


छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिला के भण्डार मुड़ा धमधा रोड म चिखली गाँव परथे। चिखली के बुड़ती मुड़ा म शिवनाथ नदिया ल नहाक के जाबे तहान गाँव बेलौदी मिलही। बेलौदी ले लगे गाँव मालूद बसे हे। दुनो गाँव मिल के बेलौदी पंचायत कहाथे। दुर्ग चण्डी चौक ले नवापारा होवत उरला डहर ले बेलौदी घलो जा सकत हे। आघू तो इहीच्च रद्दा-बाट ले दुर्ग जावै। ए रद्दा ल पैडगरी रद्दा काहै। डोंगा नहाक के दुर्ग जाय बर परै। अब तो चिखली घाट म नदिया ल नहाके बर बड़े जन पुल अउ उरला जाय बर नदिया म स्टाप डेम बनगे हवे।

बेलौदी जिहां जाम बगीचा घरो-घरो राहै तेकरे सेती गाँव ल जामगाँव घलो कहिथे। इहाँ के जाम ह दूसर प्रांत म घलो जावै। अब तो समय के संगे-संग सबो पेड़ सूखा गे। कुर्मी, केवट, तेली, नाऊ, लोहार अउ दू-चार घर के गोड़-ठाकुर के बस्ती ह राजनीति के मामला म आज दिल्ली बन गे हवे। नदिया के तीरे-तीर आमा बगीचा म गरती (पक्का आमा) बिनै। गरती ल मन भर चुहकत घर आवै। दुर्ग सहर म आमा पूर्ति करइया आज खुदे अथान बर आमा बिसावत हे।

पहिली तो आन गाँव के मन इहाँ बेटी दे बर गुने काबर कि बेलौदी म बेटी देना मने मुड़ म बोझा बोह के दुर्ग भेजना नही ते दु नम्बर। भिलाई के पावर हाउस ल दू नम्बर ल काहै। बेलौदी के जाम ल देख के बेपारी मन आधच्च बीच ले मलो लेवत रिहिन। गरमी म नदिया के रेती म बरबट्टी बोवै। अइसे किसम ले बेलौदी बारो महीना हरियरे-हरियर राहै। अपन-अपन दाई-ददा के बाजार ले लहुटई ल लइका मन देखत राहै, दाई-ददा खजानी लाही कहिके। चण्डी चउंक के बिलवा होटल ले घर बर भजिया बिसा लेवे अउ अपन बर मिक्सचर म चना डार के कागज म बंधवा के इलिग-बिलिग चरिहा ल बोहे खावत-खावत दंगर-दंगर रेंगै ते उरला कब पहँँुच जवै तेकर आरो तक नी लगै।

बिसेलाल तरिया पार म रहात रिहिसे। तरिया पार म 'कबिराहा बेड़ा’ अइसे लागय जइसे कबीर साहेब जी के गुरू मंत्र ल जपे बर बड़ा प्रेम से एक जघा राहत रिहिन हे।


पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया ना कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।


तरिया के तीर पीपर पेड़ अपन कोरा म कतनो झिन ल खेला-कुदा के ए दुनिया ले बिदा कर चुके हे। बिसेलाल केवट के गाँव बेलौदी भले रिहिसे फेर खेत ह तो भेड़सर खार म रिहिसे। ओन्हारी-सियारी के भरपूर भण्डार रिहिसे। डोली म धान बोवै, मेड़ म राहेर। धान के राहते-राहत उरीद अउ लाखड़ी ल उतेर देवै। बिना खातु-माटी के बइहा जवै ओन्हारी ह। होरा खवई म तो ओट अउ हाथ ह करिया जावै। गाय-गरूवा अउ टूरा-टानका मन ह बिक्कट पदौवै तिही पाय के बखरी राखे बर केवट कुंदरा बनाय रिहिसे।

बिसेलाल के बिहाव ल भल्ले दिन होगे रिहिसे, फेर बाप बने के सुख ल नइ पाये रिहिसे। घर के आघू म बोइर पेड़ लगा के बेटा कस जतन करिस। गॉँव म तीन साल ले मड़ई के खरचा ल घलो उठइस। तीर-तार के गाँव वाले मन ल घलो नेवतै। सब झिन अपन-अपन मड़ई धर के आवै। संझा कन मड़ईया मन ल पियई (भेंट) दे के बिदा करै। सत्ती, नम्मी, बरइया मड़ई के देवी-देवता मन खुस हो के परनिया ल चिन्ह दिन। जस-जस परनिया के पेट बाढ़त जाये तस-तस मन ह तुमा के नार कस उम्हिावत जाये। सातवाँ महीना म मइके वाले मन सधौरी खवाय बर खीर-सोंहारी, रोटी-पीठा अउ लुगरा-पोलखा धर के अइन। तीर-तखार वाले मन ल घलो बला-बला के खुसी-खुसी परसाद ल बाटिन। सब के असीस परनिया ल मिलत गिस। परनिया ल देख के सब काहै-'बाबू होही वो बाबू।’ परनिया ल देख न, निच्चट सुकसुक ले दिखत हे। टूरा मन होथेच्च अलवइन। पेट के भीतरे ले अपन चाल ल देखाय बर धर लेथे। हाथ गोड़ ल भारी हलाय बर धर लेथे।

कभू-कभू बिसेलाल ह घर खरचा बर दुर्ग के सनिचरी बाजार जावै। उहें ले परनिया बर जलेबी ऊ लान लेवय। नइ लातिस ते दिन परनिया ह ताना मार देतिस- 'जलेबी नइ लाबे ते तोर लइका ह लरहा हो जही।’ बिसेलाल घलो मजाके-मजाक म कहि देवै-''अरे जब बाप ह लरहा नइहे त लइका ह कइसे लरहा हो जही?’ तिही पाये के तो सियान मन कहिथे-'जइसन-जइसन घर दुआर ओइसन-ओइसन फइरका, जइसन-जइसन दाई-ददा ओइसन-ओइसन लइका।’

परनिया ल आमा के चटनी जादा सुहावै। तिही पाय के घेरी-बेरी काहय- 'पठउव्हाँ’ ले बाबू गिरही बाबू।’ बिसेलाल ह घलो कहि देवय-'मोला तो अमली बने लागथे त का मोर पठउव्हाँ ले नोनी गिरही का?’ परनिया ह लजा के काहय- 'चल हट, तोला तो आनी-बानी के गोठ सुझे रहिथे।’ हॉँसी ठिठोली चलते रहिथे ठउँका ओतके बेर परनिया ल पीरा जनाय बर धर लेथे।

गाँव म जेचकी ल रमौतिन दाई हा बने निपटावै। ओला बला के लानबे कहिके परनिया ह बिसेलाल ल भेज दिस। रमौतिन ह घर म आ के दुख खवावत-खवावत बिसेलाल ल कथे-'जा तो सुईन ला बला के लानबे।’ ओती जुनहा धर के सुईन के अवई होइस एती कुरिया म ए-हें... ए-हें....कहिके रोए के आवाज आय बर धर लिस। बिसेलाल कथे-जा तो देख भगवान के किरपा ले जेचकी निपट गे तइसे लागत हवै। सुईन ह कुरिया म गिस। लइका के नेरूवा ल खपरिल म काट के अलग करिस ताहन लइका ल धर के बाहिर निकलिस। बिसेलाल ह कथे-काये, काये? नोनी ए ते बाबू ए? सुईन कथे-ए ले देख ले काये तेला। देख के बिसेलाल ह खुसी के मारे कूद परिस-बाबू ए, बाबू ए कहिके। लइका ह गिरत-गिरत बाँच गे नही ते 'नोहर छोहर के लइका वहू ह जात रहितिस।’

फूड्डा-फूड्डा गाल, चाकर मुंहु, खुसियार डांग कस पातर-पातर गोड़, अइसे लागे जानो-मानो घर म तुलसीदास अवतरे हे। जउने देखे तउने चुमे बिना नइ छोड़ै....हुलु...लु.....लु....नंगरिया बेटा ए, मोर राजा बेटा ए, चार गाँव के गउँटिया बनही। बिसेलाल के दाई ह काहै- 'मोर नाती ह अपन ददच्च उपर गे हे। सुईन ह रोज लइका ल सेंके चुपरे। परनिया के सास ह काहै पेट म तिल हे वो, एकर ददा के पेट म घलो हे। दुनो गोड़ ल लमा के सुईन ह लइका ल सुता ले ताहन गोरसी म छेना आगी ल राख के दुनो हाथ म सरसों तेल ल मेल के अंगरा के आंच देखा-देखा के फदर-फदर सेंके। सेंके ले लइका के पेट ह खलखल ले सफ्फा हो जय। पेट ह खलखल ले होय ले लइका ह रोए बर धर लेवय। सुईन ह परनिया ल काहै-'पिया वो, तोर लइका भूखा गे हे’, कहिके ओकर गोदी म लेग के दे देवै। लइका अपन महतारी के दूध ल धर के चुपुर-चुपुर जब पियै त परनिया ल महतारी बने के सुख स्वर्ग ले कम नइ लागै। लइका ह पियत-पियत सुत जय।

ओ दरी जेचकी म ओतेक तकलीफ नइ जावै काबर कि फूगड़ी ह जाँघ ल बज्र कस कर देवै अउ जाँता म दार दरई ह कनिहा ल मजबूत कर देवै। कतनो झिन ल तो जादा दुख-पीरा जनाबे नइ करै। कतनौ मन धान भारा डोहारत-डोहारत खेत म गाड़ा के ओधा म हरू हो जय।

जेचकी के एक-दू दिन बाद मुंहु ल गिल्ला करे बर लोहा मारे पानी दु-चार चम्मच दे देवै। खून ल सफ्फा करे बर काँखे पानी दे जाथे। ताकत बर दु-तीन दिन के बाद सोंठ-ढुड़ही खवाय के चालू करै। परनिया के दाई ह घलो अपन बेटी बर देसी घी के सोंठ-ढुड़ही बना के लाये रिहिसे। बेटा अवतरे के खुसी म परनिया के दाई के चेहरा ह मुस-मुस करत राहै। कइसे तो जाने कस पहिलीच्च ले परनिया के दाई ह चन्दरमा बिसा के राख डरे रिहिसे। फेर पेट के बात ल तो भगवाने जाने कहिके झबला घलो बिसाय रिहिसे ताकि नोनी होवै ते बाबू दुनो बर काम आ जय।

परनिया के सास हा अपन बहू के दिन पूरे के पहिलीच्च उरीद बरी बना के मइरका म राख डरै रिहिसे। कइसे तो एसो बने जाने-सुने कस मुनगा ह लट-लट ले फरे रहै। मुनगा ल अकसी म फंसा-फंसा के कोरी भर टोर के लाने रिहिसे। बाजार ले आलू-मिरचा घलो बिसा के लाने रिहिसे।

छट्ठी के एक दिन पहिलीच्च नाऊ ठाकुर ल बिसेलाल ह तियार दे रिहिसे- 'काली बिहनिया ले हमर घर आबे, छट्ठी हवै।’ पारा-परोस वाले मन ल, गोतियार, सगा-सोदर अउ मित-मितानी ल छट्ठी बर पूछे रिहिसे। राऊत ल चेता दे रिहिसे- 'आज बरवाही झन लेगबे।’ बल्कि एक-दु किलो उपराहा घर म गाय के दूध छोड़ देबे। बड़े फजर ले नाऊ छट्ठी-सांवर बनाये बर बोरा जठा के बइठ गे। नेवतहार मन आ-के छट्टी सांवर बनावत जाये। बिसेलाल ह घर म राऊत ल तियार दे रिहिसे-'चाहा ला बने गाड़हा बनाबे, पनियर झन होवय।’ राऊत ह सब झिन ल चाहा लान-लान के देवै। चाहा पीये के बाद गोला बीड़ी माखूर बाँटय। सँउफ-सुपारी खा के जावत जाये। जस-जस बेरा बाढ़त गिस तस-तस छट्ठी चाहा पियइया मन कम होइस ताहन नाऊ ह घर भीतरी जा के गुड्डू के साँवर बनइस। एकर बाद सुईन ह खलखल ले नहवा-धोवा के नवा झबला पहिरा दिस। माईलोगन मन के अवई-जवई घलो चालू होगे। काँखे पानी पी के लइका ल पावय। जेकर ले जऊन बन जावै-चन्दरमा, ढोलकी, चाँदी के करधन, कोनो लइका बर कुर्ता लान के नही ते पइसा धरा के गुड्डू ल पुचकारत, चु... चु.... चुमत असीस देवै। मंझनिया कना ताते-तात छट्ठी-भात, आलू-बरी-मुनगा संग सुवाद लेवै। कोनो मन सोंठ-ढुड़ही माँगे- 'देना वो परनिया, गुड्डू के बाँटा सोंठ-ढुड़ही ल।’ काबर छट्ठी ह सोंठ ढुड़ही खाय बिना छट्ठी कस नइ लागै।

परनिया ह मइके ले लाने छीटही-बुंदही लुगरा ल नहा-खोर के पहिरे के बाद सबके पाँव पलागी करके मुनगा-बरी भात खाथे। छट्ठी के दिन गुड्डू के फूफू ह काजर आँजिस। काजर आँजत-आँजत किहिस-'काकरो नजर झन लगे वो, हमर भइया के मठ म दीया बरइया आ गे।’ काजर अँजौनी अपन बहिनी ल बिसेलाल ह जऊन बन परिस दिस। एकर बाद सुईन, राऊत अउ नाऊ ल शक्ति के मुताबिक भेंट दे के खुसी-खुसी बिदा करिस।

छट्ठी के उपलक्ष्य म संझाति पहर रामायण के कार्यक्रम रिहिस। रामायण पार्टी वाले मन बालकाण्ड म राम जनम के सुन्दर गुनगान करिन-


भये पगट कृपाला दीन दयाला, कौशल्या हितकारी।

हर्षित महतारी मुनि मन हारी, अद्भुत रूप निहारी।।

लोचन अभिरामा तनुु घनश्यामा, निज आयुध मुजधारी।

भूषण वनमाला नयन विशाला, शोभा सिंधु खरारी।।


    टीकाकार ह ए छन्द के सुग्घर व्याख्या करिस-'आज राजा दशरथ के घर म कृपालु दीनदयाल कौशल्या के हित करइया स्वयं भगवान प्रगट होय हे। मुनि मन के दिल जितइया अद्भुत रूप ल निहार के माता (कौशल्या) बहुत खुस हे। सुग्घर आँखी, बादर कस सुन्दर सरीर, चारों हाथ म अपन आयुध (शंक, चक्र, गदा, पद्म) धरे, गाहना पहिरे, गर म वनमाला धारन करे, बड़े-बड़े आँखी, सीमा के सागर, खर राक्षस के मरइया हरि भगवान ह कौशल्या माता ल सउँहत दर्शन दे हे।’

आठ-दस दोहा पढ़े के बाद 'लखन सिया रामचन्द्र की जय’ कहिके रामायण के विसर्जन करिन-

कथा विसर्जन होत है, सुनो वीर हनुमान।

राम लखन सिया जानकी, बिदा होत हनुमान।।

परनिया के सास ह रामायण के मनिज्जर ल कथे-'अई! सोहर नइ गाव हो।’ सुनत देरी रिहिसे ताहन मनिज्जर ह हारमोनियम के रीड ल चपक दिस। सब झिन मिल के बीरसिंग अउ बिसराम संग सोहर गइन-


जुग-जुग जिये तोर लाला

ये मदन गोपाला ये

ओ बहिनी, तोर घर बेटवा बिराजे

उछाह मंगल गावत, आनंद बधाई...

काकर भये श्रीराम 

काकर भये लछिमन हो

बहिनी काकर भरत भुवाले

काकर घर सोहर होवय ओ...

बहिनी बाजथे आनंद बधाई

उछाह मंगल गावत हवं ओ...

कौशल्या के भये सिरीरामे

सुमितरा के भये लक्षिमन हो

बहिनी कैकई के भरत भुवाले

राजा घर सोहर होवय हो...

बहिनी बाजथे आनंद बधाई

उछाह-मंगल गावत हवं ओ...


बिसेलाल कथे-लेव, अब बाबू के नाम ल घलो धर देव। सब झिन चाहा ल पीयत-पीयत अपन-अपन ले नाम धरत रिहिन हवै। कोनो काहत हे बुधवार के जनम होय हवै त बुधारू रख देव, कोनो काहै-पंचमी के जनम धरे हे तेकर सेती पंचू रख देव, कोनो काहै एसो तो सुकाल हे, कटकट ले धान-कोदो होय हवै तेकर सेती सुकालु रख देव न। अइसे काहत-काहत बोधन ह कथे-अइसे करौ न गा पंचमी के जनम धरे हे तेकर सेती गुड्डू के नाम पंचू धर देथन। सुन के सब झिन खलखला के हांसत हामी भर देथे।


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दू


छट्ठी-बरही उचे के बाद परनिया ह घर के काम-बूता म भीड़ गे। पंचू के गला अपन ददा कस गर्रा आवाज ताय। एहों...एहों... रोवै ते पारा भर जान डरै-बाबू भूखा गे होही, पिया नइ देतिस। परनिया ह जानत रिहिस-टूरा ह कोरहा होगे हवे कहिके अफीम ल एकात कनिक चटा के सुता देवै तहान निछिन्द काम बूता करत राहै।

बिसेलाल मंझोलन किसम के रिहिसे। बिसेलाल ह करकर्र-करकर्र किसानी बूता ल निपटा डरै। परनिया पानी-काँजी ल खुदे करै। गोबर-कचरा ल घलो कर लेत रिहिसे। इंकर घर गृहस्थी के गाड़ी ह दुनो के सुंता-सलाह ले बढ़िहा चलत रिहिसे। बिसेलाल मरो-जियो कमावै। कभू-कभू तो खेत डहार ले आवत-आवत बिसेलाल ल मुंधियार हो जावै। कभू-कभू काम के हिसाब से खेती-किसानी बर नांगर बक्खर अउ बनिहार मन ल बढ़ा लेवत रिहिस।

एक दिन परनिया ह पंचू ल सुता के नहाय बर शिवनाथ नदिया चल दे रिहिसे। घंटा भर के समय लग गे। बाबू के गइदंला ओढ़ना-जठना ल छपकत टेम होगे। जब घर पहुंचिस त लइका ह चिल्ला-चिल्ला के रोवत राहै। परनिया ह गंजी ल उतार के मड़इस अउ दउँड़त कुरिया म देखथे त लइका उपर तेलाटी चाँटा मन झूमे राहै। लइका के देंह भर डोमटच्च-डोमटा उपक गे रिहिसे, ले-दे-के बाँचे रिहिसे। ओ दिन ले बिसेलाल गुनिस आखिर हम काकर बर कमावत हन? धन ह लइका के काम नी आही त का काम के? बिसेलाल ह लइका के जतन बर अपन दाई ल किहिस- दाई अब तेंहा बीजा-भात बेंचे बर बाजार झन जाय कर। लइका ह अभी चाँटच्च के पुरतीन होगे रीहिसे। बिसेलाल के दाई कथे-तहूँ ह तो काम-बूता म दुबरावत जात हस ग। एकाद झिन बइला चरवाहा नइ लगा लेते। बिसेलाल ह अपन दाई के बात ल मान के गैंदलाल ल अकती के दिन साल भर बर बीड़ी दे दिस। अब तो गंंैदलाल ह परिवार के सदस्य कस मुंधराहा ले आवै अउ रतिहा कटोरी म साग धर के जावै। गंैदलाल के गोसइन ह घलो अपन घर के काम बूता ल निपटा के मालिक घर के काम-काज ल निपटाय बर झरफीर-झरफीर आवै।

अब तो पंचू के जतन करे बर बने समे मिले लगिस परनिया ल। मार फदर-फदर थपोल मार के सेंकय। आवाज ह गली तक जावै। पंचू के मुँहु जुठारे बर नवा फूल काँस के थरकुल लाने रिहिसे। सुग्घर खीर ले मुँहु जुठारे रिहिसे फूफू ह। परनिया ह अपन ननंद बर ऊँचहा लुगरा लाने रिहिसे दे बर।

बीच-बीच म लइका ह जादा चिरके ते ओकर सास ह बिक्कट खिसियावै- 'लुका-लुका के भाजी ल खावत होबे तइसे लागथे।’ त परनिया ह बहाना मार देवै- 'लइका ल चुन्ना होगे हे तेकर सेती चिरकत हे।’ सात-आठ महीना ले तो बने ओखी मारत बन जावै, थोर बहुत ऊँच-नीच खवई ह। काबर कि कोनो भी बात होवै ते परनिया ह कहि दे-'लइका के दाँत निकलत हे तेकरे सेती ताय कहिके।’

ओ समे तो जादा डॉक्टर न फाक्टर, फरपीपर, सोंठ, काली मिरची ल एकक चुटकी बराबर मात्रा म पीस के बिना पानी के खवाय ले खाँसी बने हो जावै। कोनो जर-बुखार हो जावै ते लइका के माथ म घृत कुमारी (एलोविरा) ल बोथ देवै। घाव-गोंदर होवय ते नरियर तेल म कपूर ल मिला के चुपर दे ले बने हो जावै। चोट लग जावै ते भेंगरा ल रमंज के लगा दे ले लइका ह टन्नक हो जावै। वइसे भी लइका मन जादा बीमार नइ परै काबर कि ऊँकर मन बर दाई के दूधे ह सबो बीमारी के उपचार बर सक जवै। सियान मन कथे-

बात बात म बात बाढ़े, पानी म बाढ़े धान।

तेल फूल म लइका बाढ़ै, फोही म बाढ़े कान।।

पंचू ह खेलत-कूदत बड़े बाढ़ गे। अपन दाई-ददा के संग धरे बर धर लेवै। तोर बर खजानी लाबोन कहिके भुलवार के खेत-खार जावै। बिसेलाल ह मछरी-कोतरी बर तो जीपरहा रिहिसे। तभे तो बरसात के आय के पहिली दावन, कुरियार अउ झोल्ली ल तइयार कर डरे। बिसेलाल ह गरी, पेलना नही ते सौंखी ले जब मन लागे साग के पुरतीय झोरी के बेवस्था कर डरै। 'मछरी पड़राय त केवट डगराय।’ कभू-कभू पंचू ल घलो ढूटी धराय बर लेग जाय फेर ओकर चेत ह मछरी-कोतरी डहार नइ राहै। ओकर बाप ह मछरी पकड़ के लाने तेला लुका के पानी म ढिल देवै। एक दिन तो बिसेलाल ह पंचू ल नंगत थूथरे रिहिसे। मेंह मर-मर के मछरी फंसाथौं अउ तेंह ढिल देथस। एकर बाद बिसेलाल हा पंचू ल तरिया-डबरी लेगे बर बंद कर दिस।

पंचू ह ननपन ले ही दूसर लइका मन ले हट के राहै। संगवारी मन मेचका-घिंधोल मारे बर जावै त पंचू ह उमन ल मारे बर मना करै। बल्कि पंचू ह चिरई-चिरगुन मन ल दाना खवावै। गरमी के दिन म फाता (झालर) ल धर के मिंयार म टांग देवै, परई म पानी भर के जोंती म राख के टांग देवै।

बिसेलाल ह पंचू ल स्कूल भेजे त ओकर मन ह पढ़ई-लिखई म नइ लागे। गाँव म आल्हा पढ़इया मन कर बइठ जावै नही ते रामायण पढ़इया मन करा। बिसेलाल ह पंचू बर बड़े जन सपना देखे रिहिसे। फेर ब्रम्हा के लेखा मेटाही कहाँ ले।

गाँव म दुर्ग वाले मोहन महराज के हरि कीर्तन होवै, वोमा भारी मन लगावै। गाँव म बसदेवा अउ गोरखपुरिहा मन भजन गावत किंजरै त उँकरे पीछू-पीछू पंचू ह घलो भजन-गावत किंजरै।

रीत नीत के सुग्घर बानी,

गीत कविता के नोहे कहानी।

    सोला आना सही जुबान, जय गंगान...

सबले बड़े जनम देवइया,

अउ बड़े हे छइँहा-भुइयाँ

नोहे बड़े कोनो भगवान, जय गंगान...

मया के सूत म दया गँुथाय,

वो सुग्घर सलोना हिरदे पाय,

    दुनिया वोला कथै इंसान, जय गंगान...

भरे तरिया जल देवी के पाँव,

    बर-पीपर के सीतल छाँव,

आत्मा जुड़ाथे बाँचय प्रान, जय गंगान...

दुनिया म हवय एक ठन देस,

    अड़बड़ भासा अड़बड़ भेस।

जय-जय हो हिन्दुस्तान, जय गंगान...

ले दे के पंचू ह दूसरी पढ़िस। पंचू के मन ल पढ़ई कोती नइ देख के बिसेलाल ह अपन संग खेत लेगे बर धर लिस। उप्पर कछार म अपन ह नाँगर जोत के बइला ल ढिल देवै ताहन पंचू ह छेंक-छेंक के चरावै।

उप्पर कछार म दस एकड़ के एक चक रिहिसे। जेमा बिसेलाल अउ पंचू दुनो मिलके सावन-भादो म जाम (बिही) लगा के ओला बोईर कांटा ले गोल-गोल सरप दे रिहिसे। जाम के बाढ़त ले कछार म कोदो-मड़िया, जुआँर छींत देत रिहिन हे। संग म राहेर घलो छींत देवै। परिया दू परिया म सन बीजा घलो बो देवै। जऊन ल लू के पूरा-पूरा (बंडल-बंडल) बना के गरमी म नदिया म सरो के निकाल के सूखो देवै। सूखोए के बाद चाँवरा म बइठे-बइठे सन ल नींछके रेशा ल अलग अउ सण्डइया काड़ी ल अलग कर लेवै। सण्डइया काड़ी ह भुर्री बारे के काम आवै अउ सन ल ढेरा म आँट के डोरी बना के डोर बनावै। जउन ह गाड़ा म रचरिच ले रचाए भारा ल कस के बाँधे के काम आवै। बरसाते म कछार के कांसी ल लू के बाप-बेटा सूखो देवै ताहन ओला बर के ढेरा म आँट के गुड़वा बना लेवै। इही सुमा डोरी ले खटिया गाँथै। सबो जिनिस ह घरे म हो जावै। बाजार ले नून बिसाय बर रूपिया घलो बरोए बर नइ परै काबर कि नून घलो लासा के बदला म मिल जात रिहिसे।

कभू-कभू तो कछार म बइला के आँखी म सिकारी ह कपड़ा के बने छेंका म लुकाय-लुकाय घाघर चिरई फंदोवै। ओला देख के पंचू के जीव बगिया जै। उमन ल खिसिया के काहय-कइसे तुमन ल अऊ कुुछु काम-बूता नइ मिलै। बिचारा चिरई-चिरगुुन के जीव ले के खाय म तुँहला काय मिलथे ते। कभू-कभू बाता-चिता हो जै। कइसे का तोर बइला ल मोटवाय बर कोदो-कुटकी बोय हन का? आँय। बिसेलाल ह समझा-बुझा के झगरा ल सांत करै। कभू-कभू तो घर तक घलो पहुंच जै होका-बादी ह।

बिसेलाल ह भर्री जोते राहै, पताल-भांटा लगाय बर। पंचू ला चेता के चल दे रिहिसे। तेंहा एमा बनिहार मन संग थाना (खोचका) खन देबे थरहा हो गे हे, बोए के लइक। मेंहा तोर ममा घर जाथँव थरहा लाने बर, काली आहूँ। बिसेलाल थोकिन टिरटिरहा राहै। बात-बात म टिरिर-टिरिर करै। पंचू के जीव ह कव्वासी लागै। एक दिन घर आघू चाँवरा म बिसेलाल ह बीड़ी बनात बइठे राहै। ओतके बेर बिसेलाल ल चिल्ला के कथे- अरे आ तो रे पंचू। आवाज ल सुन के बासी खावत रिहिसे तेला छोड़ के अइस। आ के पूछिस-काये ददा? बिसेलाल कथे-जा तो गोरसी ले ए बीड़ी ल सुलगा के लानबे। पंचू ह गोरसी के पलपला म बीड़ी ल सुलगावै ते सुलगबे नइ करै। राह तो मुँहु म सुरका मार के देखौं कहिके सुरक दिस। बीड़ी ह धुंआ फेके के चालू कर दिस ताहन तो पंचू ह घलो धीरे-धीरे बीड़ी पीए बर सीख गे। बिसेलाल ल आरो नइ लगिस। कभू-कभू कट्टा के बीढ़ी ह कम हो जाय तब सोंचै कि कइसे आज बीड़ी ह कमती होगे हे कहिके।

एकाद घांव लुका चोरी पंचू ल बीड़ी पीयत देख के बिसेलाल ह खिसियइस घलो बीड़ी पियई बने नोहे कहिके फेर मने-मन गुनै-आखिर तो अपने ह बीड़ी सुलगा के लाने बर काहै। तब समझ अइस के लइका कइसे बिगड़थे तेह। हाँ फेर बीड़ी पीये के अलावा अऊ कोनो अयेब नइ रिहिस।

किसानी के करत ले एक ठन बइला ह बीमार परगे राहै। एसो नदिया ल सारे बर कइसे करबो कहिके गुने बर धर लिस। बिसेलाल ह पंचू ल चेता दिस कि नदिया म बेसरम काड़ी ले एकाद एकड़ के पुरतीन बरबट्टी बोए बर नदिया म पानी के ओस तीर चिन्हा कर देबे कहिके बिसेलाल उतई बाजार चल दिस। एती पंचू ह चौपाल म जादू देखे बर भूलागे। ओती ओ जघा ल दुसर घेर डरिस। बिहनिया बिसेलाल के दिमाक खराब होगे। अब एसो गरमी म खरचा ल कइसे चलाबोन। बिसेलाल ह बिक्कट खिसियइस-परबुधिया कहिंके तोर काम बूता म मन नइ लागे, अब जवान होगे हस। किंजर-किंजर के खवई म काम नइ चलै। रिस के मारे पंचू ह हरिद्वार भगागे। भारी खोजिस बिसेलाल ह महीना भर ले फेर आरो नइ मिलिस। हरिद्वार ले पंडा के चिट्ठी अइस-तोर टूरा ह साधु बने बर हरिद्वार आ हे कहिके। चिट्ठी ल पढ़िस ते बिसेलाल ह सन्न होगे। परनिया ह घलो चिन्ता म परगे। नोहर-छोहर के एक ठन बाबू वहु साधू बन जही त हमर बुढ़त काल के लउठी कोन बनही? हमर डीह म दीया कोन बारही? कहिके दुनो परानी सुसक-सुसक के रोए बर धर लिन। परनिया ह तुरते ठेठरी-खुरमी जोर के बिसेलाल ल हरिद्वार भेज दिस। बिसेलाल ह पंचू ल समझा-भुलवार के गाँव लइस। पंचू घर अइस ताहन परनिया के आँखी ले तरतर-तरतर खुसी के आँसू झरे बर धर लिस।

एसो धान बने होय रिहिसे। येला डोली म कंसी देख के जाने जा सकत रिहिसे। बियारा म बड़े-बड़े धान के खरही के उप्पर म छेना थोपाय राहै। ऊँच खरही ल देख के अइसे लागत रिहिस हे कि एसो सबके देखे बड़े-बड़े सपना ह सिरतोन होही। बिसेलाल जल्दी-जल्दी धान-पान ल सकेल के बड़े काम करे के उदीम करे रिहिस। सबले आघू एसो बिसेलाल पैर डारिस। गैंदलाल ह मुंधराहा (पाहती) ले आठ-दस घर के बइला-बछवा ल लान के दौरी फ ांदे रिहिस। गैंदलाल ह कुलकत ददरिया झोरत दौरी खेदत रिहिस -


धाने ल लुए गीरे ल कंसी,

भगवाने के मंदिर म बाजत हे बंसी...

छत्तीसगढ़ के भुइयाँ-ठइया के बलिहारी हे,

करौ जोहार उतारो आरती मन फूलवारी हे...


एसो तो बइला मन घलो अघा गे रिहिस। मुँहु म खरिया नइ बँधाय रिहिस तभो ले धान ल खावै नही। काबर रोज तो उन ल दौंरी म ए बियारा नही ते ओ बियारा जाना राहै। जादा मन ह करै ते एकाद मुँह मार ले पैर (धान के) ल। पंचू ह अपन ददा बर पेंदयही लोटा म चाय धर के अइस। बिसेलाल देख के कथे-भुर्री उप्पर मड़ा दे लोटा ल अऊ आ मोर चाहा के पीयत ले दौंरी खेदबे। पंचू ह दौरी करा जा के दौंरी ल खेदे बर लऊठी ल मांगिस ताहन बिसेलाल ह कमरा (ओढ़े के) म तोपाय कप ल निकाल के खल्हार के चाहा ल ढार के पीये बर धरत रिहिसे। ओइसने म गनपत ह पहुंचगे। बिसेलाल ह कप के चाहा ल गनपत ल देथे। अपन बर गिलास म चाहा ल ढारिस। दुनो झिन फूंक-फूंक के सुर्र...सुर्र चाहा ल पीये बर धरिस। जइसने चाहा ह पेट म गिस ताहन गनपत के सुर (इच्छा) ह गोठियाये बर करिस। कइसे भइया-एसो तो सोला आना धान पाए हस। पंचू के बिहाव के लाडू़ ढुलाए बर मिलही तइसे लागत हवै? बिसेलाल कथे-जाने कस गोठियाथस गनपत, सोचत हवँ एसो पंचू के बिहाव ल मढ़ा देतेंव कहिके फेर मोर सोचे ले का होही- 'होइहैं वही जो राम रचि राखा।’

बिसेलाल हा कट्टा ले दू ठन बीड़ी ल निकाल के अँगरा म सिपचा के पहिली गनपत कोती लमइस। गनपत ह एक ठन ल निकाल के अपन मुँहु म डारिस अऊ दुसर ल बिसेलाल ह अपन मुँह म डारिस ताहन दुनो के मुँहु ले सुकुन के कुहरा निकले बर धर लिस।

गैंदलाल ह बिसेलाल के संगे-संग खावै-पीयै, कभू-कभू घड़ी भर बर चल देवत रिहिसे लइका मन ल देखे बर। लइका मन अपन ददा के मुँहु ल तो महीनो नइ देखै। काबर कि मुंधेरहा ले गैंदलाल ह धान मिंजई बर निकले तब लइका मन सुते राहै अउ जब पैर डार के घर जावै त लइका मन सुत जै राहै। लइका मन अपन महतारी ल पूछ डारै-ददा गाँव गेहे का दाई? दाई काहय-नही रे, अभीन धान मिंजई चलत हे न, आये-जाये म टेम-कुटेम हो जथे। पैर ले पैरा टरियाय के बेर परनिया ह घलो पहुंच जवै। धान ल कबिया के टारे त बियारा म धान के परत के मोटाई ल देख के जान डरे कि एसो धान ह बने होय हे जादा बदरा नइ हे।

धान ला ओसइस त साल भर के गोरसी भरे के पुरतीन बदरा निकलिस ताहन सब पींयरे-पींयर ठोस दानच्च-दाना राहै। ओसा के जब एक जघा सकेलिस तभे जान डरे रिहिसे कि ए कुर (कुन, कुण्ड, कुड़ही) ह एक-डेढ़ गाड़ा (बीस, तीस खाड़ी) के होही कहिके। पंदरा दिन म दस गाड़ा धान अउ दू गाड़ा कोदो ल मींज के कोठी म धर डरिस।

बिसेलाल ह खाये के पुरतीन राख के अनाज ल कोठी म छाब दिस। ओकर बाद ओन्हारी ऊ ल राखे बर चल देवै। अब तो भर्री के भांटा-बंगाला ह घलो उमिहाय बर धर लिस। बीच-बीच म बटराली मिरची ह मेछरावत राहै। ओकर फूल ह तो चांदी के फूल्ली कस दिखै। दु पेड़ दावना ह बखरी के कान म खोंचा के बतावत राहै कि अब भांटा-पताल के फूले-फरे के दिन आगे। लाडू़ गोंदा अउ चंदैनी गोंदा ह चरचीर ले फूल के बखरी के सुघरई ल बढ़ावत राहै। बखरी अइसे लागे जानो मानो -


बिक्कट सुन्दर हवस गोरी तैं तो हजार म।

फूले हे चंदैनी गोंदा जइसे कछार म।।


बिसेलाल मने मन गुनथे। बहू खोजे बर एकर ले बढ़िया मउका अउ नइ हो सकै। बखरी म पुराना झोलझोलहा कुरता अउ हड़िया म मुँहु-आँखी दाग के रखवार (बिजुका, झाखा, कागम कोड़ा) बना के भाँटा बारी ल ओकरे भरोसा छोड़ के बिसेलाल ह गनपत संग पंचू बर बहू देखे बर निकल गे। एती पंचू ह बिजुका के ओठ अउ मुँहु बनाय बर लगे राहै। अइसे लागे कि अब पंचू के घलो गदेली चना कस होरा भुँजाए के दिन आगे हे।

नवा कुरता, करिया आंछी वाले धोती ल पहिर के, जब पागा ल बाँध के घर ले निकलिस ते अइसे लागिस कि बिसेलाल ह कोनो रन जीते बर जावत हवै। बहू खोजई कोनो रन जीतई ले कम थोरे ए, जे दिन भँवरा जही उही दिन जान हम वो रन ल जीत डरेन। बिसेलाल के संग म गनपत ह मुँहु-चाई करे बर बने राहै। दुनो के बने जमे। इमन ल काकरो ले जादा मतलब नइ राहै। काकरो चारी न निंदा। सिरिफ अपन काम ले काम। खइरखा डाढ़ म गनपत घर जा के हुत कराथे- गनपत ए गनपत! गनपत- आवथौं भइया आवथौं। काहत-काहत भँदई पहिरत निकलथे। ले चल, काहत दुनो झिन बीड़ी पीयत निकल जथे। खइरखा डाढ़ म बीड़ी ल सिपचाथे तेह नदिया करार म सिराथे।

गाड़ा-रावन डहार ले नदिया म उतरथे। छपहा पानी म कुधरी दिखत राहै। धोती ल उचा के नदिया ल नाहकत राहै। धोती ल जादा उठाय के जरूरत नइ परिस। काबर कि पीड़री तक पानी राहै। नाहकत-नाहकत एक हाथ म धोती ल सकेले अउ दुसर हाथ म मुँहु ल धोवत-धोवत करार उप्पर ओप्पार चल दिन।

ओप्पार ले लहूट के देखे त नदिया के झाहूं मन मुच-मुच, मुच-मुच करत राहै। चलो एक झिन अउ बहुरिया एसो आ जही ताहन हमर मन संग हिही ठिठोली करत चुरेना काँचे बर आही। गोड़ हाथ ह जुड़ागे राहै। करार म चघ के बिसेलाल ह फेर दु ठन चोंगी सिपचइस। बीड़ी पीयत-पीयत बिसेलाल कथे-घर ले निकलत रहेंव त मुकरदम घर के नवा-बहुरिया ह पानी भर के जावत रिहिसे। ओकर बहुरिया ल देख के मोरो मन ह खुस होगे, एसो मोरो बहुरिया आही ताहन मोरो बहू कुँवा-पार ले अइसने गघरा (हवँला) म पानी भरही। मैं तो सोचथँव गनपत, भरे हण्डा देख के बहू खोजे बर निकले हन ते खाली हाथ नइ लहुटन। गनपत कथे-लड़की खोजई गरवा खोजई ताय ग फेर कइसे तो मोरो मन ह काहत हे कि पंचू खातिर बहू खोजे बर जादा किंजरे बर नइ परै। काबर हमर पंचू म तो कोनो अयेब नइ हे। न दारू पीयै न सट्टा खेलै न फालतू खरचा, बस भगत आय, भगत भगवान के। सुन्दर रूपस बहूरिया मिल जतिस। गनपत कथे-कोनो अयेब नइ हे कहिथस फेर मेंह तो ओला भांटा बारी म लुका के बीड़ी पीयत देखे रेहेंव। समझाते नहीं? अब काला समझावँव गनपत-मोरे जरहा बीड़ी ल पीयत रिहिस होही। मैं का जानत रेहेंव बीड़ी सीपचाए बर कहूँ ते बीड़ी पीये बर सीख जाही। तेंह समझाते नही गनपत बीड़ी पीये ले छाती अउ पेट के बीमारी होथे कहिके। गनपत ह बिसेलाल ल ताना मारत कथे-नाती आही तहू ल बीड़ी सीपचाये बर कहि के बीड़ी पीये बर सिखो देबे। बिसेलाल ह कथे-चुप्प रे, कहीं न कुछु अउ छट्टी बर दार भात।

पैडगरी रद्दा म रेंगत-रेंगत, गोठियावत-गोठियावत उरला गाँव पहुँचगे। गोठ-बात म पतच्च नइ चलिस कोस भर रद्दा ह। उरला ले गया नगर होवत चण्डी चउँक पहँुचिन। बिसेलाल ह चण्डी मइया ल बिक्कट मानै। नरियर-उद्बत्ती चघा के आँखी मँूद के माता जी करा बदना बद डरिस। बहू खोजे बर जाथौं माता, मोला असीस दे दे। एसो मोर बेटा पंचू बर कुलवन्तिन बहू मिल जतिस ते अवइया जँवारा पाख म जोत जलाहूँ पंचू के नाम म। माता जी के जघा जउन भी अपन मुराद माँगे वोह जरूर पूरा होवै। तिही पाय के बिसेलाल ल घलो सोला आना भरोसा रिहिस चण्डी मइया उपर। पंडित ह माथ म टीका लगइस अउ परसाद दिस। खावत-खावत मोटर स्टैण्ड पहँुचिन।

बालोद डहार बस के जाय के आरो करत रिहिसे ओइसने म ओकर बिरेझर वाले मितान समलिया दिखगे। उदुपहा दुनो मितान के भेंट होवई ह तो किसन-सुदामा कस मिलई हो गे। दुनो मितान एक-दूसर ल सीताराम महापरसाद, सीताराम कथे। बिसेलाल कथे-आव, आव चाहा पी लेव। चाहा वाला ल आवाज देथे-ए चाहा वाला एक कप अउ चाहा दे तो। चाहा पीयत-पीयत बिसेलाल पूछथे-कइसे मितान कोन डहार ले आथस? समलिया कथे-बेटी दमांद घर गे रेहेंव दमांद ल देखे बर। बिसेलाल कथे-काबर? समलिया कथे-का दुख ला बतावँव मितान, जब ले बेटी ल बिदा करे हवँ, कभू सुख ल नइ जानय बपरी ह। महीना भर पहिली जँुआ म पकड़ा गे रिहिसे। आधा एकड़ खेत ल बरो के छोड़ाए रेहेंव। ए दरी-दारू पी के दाऊ सन अटिया दिस। ओहर अपन लठैत मन ल भेजवा के हाथ गोड़ ल टोरवा दिस। दुखे-दुख ताय। बिसेलाल कथे-कइसे करबे मितान होनी ल कोन टार सकथे। समलिया कथे-चल छोड़ जिनगी म ए ऊंच-नीच तो चलते रहिथे। सब विधि के विधान आय। समलिया कथे-अब तैं बता पंचू के का हाल चाल हे? सुनके बिसेलाल जवाब देथे-वाह! ओकरे बर तो बहू खोजे बर निकले हवँ। बालोद डहार करहीभदर म बताए हे सुन्दर नोनी हे कहिके। समलिया कथे-अरे! कहाँ जाबे बालोद रोड, चल हमर गाँव बढ़िया ओग्गर नोनी देखावत हँव पंचू के लइक।

धरम के रिश्ता मितान खून के रिश्ता ले जादा मजबूत होथे। मितान ल अब्बड़ बलाये फेर आये के मउँका नइ लगत रिहिसे। हर साल मड़ई बर नेवता भेजय फेर बिसेलाल ल काम-बूता के मारे गँवतरी करे बर उसरे नही। समलिया के मन ह उमंग म कुलकत रिहिसे जानो-मानो आज सोनहा हण्डा पाये हे।

देखत-देखत समलिया ह दुर्ग ले अंजोरा जाए बर टिकिट बिसा डरिस। कण्डेक्टर ह एक हाथ म टिकिट के परची धर के दूसर हाथ म बिन खोखा वाले डाट पेन ल धरे घूम-घूम के चिल्लावत राहै-दुर्ग नांदगाँव जवइया यात्री मन जल्दी बस म चढ़ जवै। ए गाड़ी जल्दी छुटइया हे। समलिया अपन मितान अउ गनपत संग ठउँका बस के दरवाजा करा के सीट म बइठिस ताकि उतरे-चघे म कोनो किसम के दिक्कत झन होवै कहिके। देखते-देखत बस ह खचाखच भरागे। अटारन-गोटारन बरोबर आँखी वाले ड्राइवर ह अपन कुर्सी म पान चबलावत लद्द ले आ के बइठगे। भारी मोट्ठा राहै भीम सरिख। जब ड्राइवर ह सीट म बइठिस ते सीट ह पिचकगे। चीं ले करिस मैं मर गेंव दाई वो कहिके। आँखी ल ओकर देखते ते बस के हेड लाइट कस दिखै। पान के कत्था ल पुरक के पों-पों ल बजइस ते वहू ह में मर गेंव दाई वो बचाओ, बचाओ कही के पोंए-पोंए बाजिस। पों-पों के आवाज ल सुन के खाकी रंग के झोलंगा कुरता पहिरे चारमीनार सिगरेट ल मुँहु ले हेरिस अउ थैली ले सिसरी ल निकाल के जोर से फँूकिस ते सब के कान झन्ना गे। ड्राइवर जान डरिस के अब चलना हे कहिके, स्टार्टर म खोंचाये कूची ल घुमइस ताहन चालू होगे बस ह। गेयर लगा के ड्राइवर ह स्टेयरिंग ल जी ई रोड डहार मोड़ दिस।


तीन


गनपत ह पहिली घांव बिसेलाल के परसादे बस म बइठे रिहिसे। ओला तो अइसे लागे जानो-मानो इन्द्रलोक ए। मस्त अराम से पीछू डहार मुड़ी ल टेका के ओध के बइठे रिहिसे। सरकारी बस के सीट के बूच मन ह अपन कहानी ल काहत रिहिसे। जानो मानो डोकरी-ढाकरी मन जकड़ी कस किंदरत रहिथे। फेर बस के बइठई ह तो गनपत बर 'ररूहा सपनाय दार भात कस होगे।’ बइठे-बइठे झूम लगे बर धर लिस। अच्छा नींद परगे। वइसने म माड़ी ल बुबु चाब दिस। जब एकाएक पीरा जनइस ते अरे दासड़ा रे कहिके हड़बड़ा के उठिस अउ हकन के रमंज दिस। खूना खून होगे धोती ह तहान समलिया अउ बिसेलाल घलो सावचेत हो गे। धोती ल गनपत ह उघार के देखिस त 'ढेकना’ रिहिसे। गनपत कथे-अतेक दिन ले मेंह खटियच्च म ढेकना होथे काहत रेहेंव फेर आहा बस म घलो ढेकना मन के राज हे। समलिया कथे-एहा ढेकना नोहे एहा तो अंगे्रज ए अंग्रेज। अइसने इमन हिन्दुस्तानी मन के लहू ल पीयत हे। फेर अब जादा दिन ले नइ पीयै। बिसेलाल कथे-वो कइसे? समलिया कथे-अब महात्मा गाँधी ह हिन्दुस्तान ल अंग्रेज मन ले आजादी देवाये बर मुहीम चला देहे। महूँ ह बीच-बीच म पं. सुन्दर लाल शर्मा के अगुवई म आजादी के आन्दोलन म संघरत रहिथौं। समलिया अपन मितान ल कथे-देखे हस नही मितान महात्मा गाँधी ल? बिसेलाल कथे-हमला तो गाँवे ले फुरसुद नइ मिलै। अब तो तोला छत्तीसगढ़ के महात्मा गाँधी पं. सुन्दर लाल शर्मा ल देखाय बर लेगहूँ। ओला देख डरेस मने महात्मा गांधी जी ल देख डरेस। 

अंगे्रज मन सोन चिरईया भारत देस ल लूटे बर कोनो कसर नइ छोड़त रिहिन। अंग्रेज मन के कारनामा ल कुंज बिहारी ह गीत गा-गा के लोगन मन ल बतावै अउ उंकर ले मुक्ति पाय बर जगावय -


सात समुंदर बिलायेत ले आ के, हमला बना दिये भिखारी जी।

हमला नचाये तैं बेंदरा बरोबर, बन गये तैंहर मदारी जी।

चीथ-चीथ के हमर चेथी के मांस ल, अपने बर तैंहर टेकाये बंगला।

अजी अंग्रेज तैं हमला बनाये कंगला...

चिथरा पहिरथन, कथरी बिछाथन, पेज-पसिया पी के अघाथन जी।

चिरहा कमरा अउ टुटहा खुमरी में, घिलर-घिलर के कमाथन जी।

हमरे रकत ल चुहक के रे गोरा, लाल-लाल करे अपन अंग ला।

अजी अंग्रेज तैं हमला बनाये कंगला...

हमरे चीज-बस ल नंगा-नंगा के बन गेस तैं बजरंगा जी।

चाँदी ल लेके कागद ल दिये, बना दिये भिखमंगा जी।

नंगत तैंहर भरमाये जी हमला, जान डारेन हम तोर रंग ढंग ला।

अजी अंग्रेज तैं हमला बनाये कंगला...


अँजोरा के पहिली मोड़ म जऊन जघा दुर्घटना बर माहिर हे बस के मुड़ी ह घलो हाले बर धर लिस। बस ल रोक के ड्राइवर कण्डेक्टर ल कथे- देख तो चक्का मन ल, हवा हे ते नही। कण्डेक्टर उतर के देखथे त पाछू के एक ठन चक्का ह पोची परगे राहै। ड्राइवर के दिमाक खराब होगे। गेटर लगा-लगा के कब तक ले ए बस ल चलाहूँ। बोड्डा निकलत हे त काकरो खड़री ओदरत हे। समलिया कथे-वो तो गनिमत ए, बस पलटिस नही, नी ते आजे ए दुनिया ले आजादी मिल जै रहितिस। समलिया कथे-चलो हमर मन बर तो बने होगे। अंजोरा म तो हमला उतरनच्च रिहिसे। दस बांस पहिलीच्च उतर जथन। धुंआ उड़ावत चल देबोन। समलिया ह बीड़ी सिपचइस, पीयत-पीयत अंजोरा पहुँचगे। अंजोरा के बाजार कटाकट भराय राहै।

समलिया ह मितानी माने बर ढीमरीन करा ले बड़े जन भूण्डा मछरी ल लिस, मरारीन करा ले सिंघी भांटा अउ केंवटिन करा ले लइका मन बर चना, मुर्रा-लाड़ू बिसइस। मुर्रा ल खपियावत-खपियावत अंजोरा ले थनौद डहार जाय बर निकलगे।

समलिया ह खेत मन के लाखड़ी ल देखावत-देखावत, बतावत-बतावत जावत रिहिस हे। एसो सोला आना धान लुए हन मितान। उतेरे के लइक होइस उही समे ठउंका जाने सुने कस पानी घलोक हल्का-पुल्का गिर दे रिहिस हे। भारी घपटे हे लाखड़ी ह। राहेर ह तो मड़ई कस झूमरत हे। देख, सुरता घलो आगे काली तो हमर गाँव के मड़ई घलोक हे उहें कतनो नोनी मन ल देखे बर घलो मिल जही। उन ल आरो तक नइ लगही।

गोठियावत-बतावत घर पहुँचगे। घर पहुँचिस ताहन बिसेलाल के मितानिन ह सगा मन ल मुड़ी ढाँक के लोटा म पानी दे के दुरिहा ले पाँव पलागी करिस। समलिया ह अपन गोसइन ल चेता दिस बने रांधबे भुण्डा ल गजब दिन म मितान आये हे। गनपत करा पहिली ले पूछ डरे रिहिसे-कइसे एकाद सुतई दवई चलथे का? सब पोल पट्टी ल गनपत बता दे रिहिसे। भइया ह तो छुए नही फेर मेंह मउँका देख के एकाद कप आँखी मुँद के पी लेथँव।

गनपत बर बरदिहा ल रूपिया धरा के अँजोरा भट्ठी भेज दे रिहिसे। खाय के पहिली गनपत ल देसी के पउव्वा ल धरा के अँखिया दिस। गनपत ह मुँह धोए के ओखी म बिसेलाल के डर म कोलकी म जा के  पीये के बाद सीसी ल उही मेर लुका के अइस ताहन सबो झिन जेवन बर बइठगे। बिसेलाल ल बढ़िहा बड़े-बड़े तुसा वाले ल अउ गनपत ल पूछी डहार के डल्ला संग दिस। समलिया ल सिंघी भाँटा, आलू साग पोरसिस। बिसेलाल के नजर ह अपन मितान के थारी डहार चल दिस। कइसे तेंह कब ले साधू होगे हस मितान? समलिया कथे-जब ले पं. सुन्दर लाल शर्मा के आँदोलन ले जुड़े हवँ तब ले मछरी अऊ दारू ल तियाग दे हवँ। दारू तो पीनच्च नइ चाही सेहत बर बने नइ होवै। मछरी होय चाहे कोनो जीव, जीव हत्या नइ करना चाही वोहा तो महात्मा गांधी के विचार 'सत्य अहिंसा परमो धर्म’ के मनइया रिहिसे।

गनपत ह घलो मजाक करे बर धर लिस। अब हमर संग जुड़ जव ताहन मछरी खाय बर सीख जबे। सबो झिन खलखला के हाँस डरिन। समलिया ह सगा मन ल पान खवाये बर लेगत रिहिस त गोठे-गोठ म गनपत के मँुह ले निकलगे-मोरो बर मरही-खुरही के बेवस्था हो जतिस ते महँू बना के लेग जतेंव। दस साल हो गे हे रमौतिन ल मोर संग ल छोड़े। समलिया कथे-देख लेबोन काली मड़ई म कोनो कानी-खोरी मिलही ते। समलिया के गोठ ल सुन के तीनो खलखला के हाँस डरिन।

पान ऊ खा के, आ के सुत जथे। बिसेलाल मने मन गुने-आखिर गनपत ह कइसे बहके-बहके कस गोठियावत रिहिसे। गुनत-गुनत नींद ओकर पड़ जथे।

बिहनिया उठे के बाद जब मुँहु धोए बर बिसेलाल ह कोलकी डहार जाथे त ओकर नजर पउव्वा उपर पर जथे। पउव्वा देख के गनपत ल बिसेलाल ह समझाथे- हम्मन बहू खोजे बर आए हन, कोनो छैलानी मारे बर नइ आए हन। अइसन तोर चाल के जानबा हो जही ते फेर सब मामला बिगड़ जही। गनपत ल समझ आगे। रात कन एक कप पी ले रेहेंव तेला जान डरिस तइसे लागथे। गनपत ह बिसेलाल ल देवता कस मानै। जवाब घलो नइ दे पइस अउ मुड़ी ल गड़िया दिस।

कतनो बोले गोठियाये फेर गनपत ह तो नखमरजी हो गे रिहिसे। बिसेलाल कथे-एक काम करथन गनपत, पहिली तोर बर बहू खोज लेथन कोनो करा मरही-खुरही बइठे बुठाय होही ते ताहन पंचू बर देखबो। तब कहूँ जा के गनपत के थोथना ह हरियइस।

जस-जस बेरा ढरकत गिस गाँव के रौनक घलो बाढ़त गिस। अतराब भर म बिरेझर के मड़ई के भारी सोर उड़े रिहिसे। फेर एसो के मड़ई म मदन-मंदराजी वाले नाचा के सेती अउ खुसी झलकत राहै। हप्ता भर पहिली बड़े-बड़े बाजार म हाँका परे रिहिसे-माघ पुन्नी के दिन बिरेझर मड़ई हे हो...। राजनांदगाँव, दुर्ग, बालोद, सोमनी, गुण्डरदेही के बाजार म हाँका परे रिहिसे, बिरेझर मड़ई के दिन तो सांकरा, धीरी, टेड़ेसरा, अँजोरा, थनौद, तिरगा, झोला अउ भोथली वाले मन तो तिहार मानै तिहार।

बिरेझर वाला मन मड़ई ल यज्ञ ले कम नइ मानय। देवारी ले जादा फिकर मड़ई बर हो जाथे। काबर कि देवारी म तो घरे वाले मन बर जोरा करे बर परथे फेर मड़ई म तो चार गाँव के सगा-सोदर मन बर जोरा करे बर परथे। पहिली ले समलिया ह ढेकी-मुसर म धान कुटवा के रख डरे रिहिसे। जाँता म राहेर दार ल दरवा के जतन दे रिहिसे। ताकि भगवान बरोबर सगा मन आही तेमन ल कोनो किसम के तकलीफ झन होवै। समलिया के मन म बस एके बात राहै -


सांई इतना दीजिए, जामे कुटुम्ब समाय।

मैं भी भूखा न रहूँ, साधू न भूखा जाय।।


चाहा पीये के बाद बिहनिया ले समलिया ह सगा मन ल पेन्दयही लोटा अउ मुखारी धर के तरिया नहवाए बर लेगिस। मितान आ हे कहिके नवा लाइफ-ब्वाय अउ गाय छाप साबुन ल बिसइस। मुखारी ल चाबत-चाबत घठौंदा तक पहुँचगे। नहा-खोर के घर अइन। समलिया के गोसइन ह तीली तेल अउ कंघी लान के दे दिस। तेल फूल चूपरे के बाद अपन-अपन चूंदी ल कंघी म पटयइस। अइसे-तइसे करत मँझनिया हो गे। मँझनिया खाय बर फूलकसिया लोटा म पानी निकलगे। खाना ऊ खा के नवा कपड़ा पहिर के सज-संवर के बिसेलाल, गनपत अउ समलिया मड़ई डहार जाय बर निकलगे। मड़ई के दिन सगा मन आवत गिन, जावत गिन। दिन भर सगा मनई म समलिया के गोसाइन ह तो धकर-लकर संझौती कन मड़ई देखे बर गिस। ओतके बेर मड़ई ह कटाकट भराए रिहिसे।

समलिया अपन मितान अउ गनपत ल पान खवा के मड़ई डहार जावत रिहिसे। एसो के मड़ई ह बिक्कट भराए रिहिसे तइसे लागथे। समलिया गुने एसो के मड़ई म परेतीन घलो आ हे तइसे लागथे। चारो डहार ले रोहों पोहों। रेम लगे हे मड़ई देखइया मन के। गउँटिया घर के मन खासर म चघ के मड़ई आए रिहिन हे। मुड़ भर के छाँकड़ा बछवा के गर म पट्टा उपर घंटी अउ घुंघरू ल गुँथ के पहिराए रिहिन हे। कोसाही कपड़ा पहिरे खासर म बइठ-बइठ के मड़ई देखे बर आवत रिहिन। इमन ल देख के अइसे लागे कि छत्तीसगढ़ महतारी खुसी म कइसे कुलकत हे।

खासर के उप्पर म गोल बांस के टट्टा ह कुँदरा कस छइँहा देवत राहै। सांकरा वाले बड़े मण्डल के परिवार घलो अइन। डेढ़-दु सौ एकड़ के जोतनदार दर्जन भर तरिया के मालिक ल कभू घमंड नइ अइस। केवट होके कभू मछरी कोतरी, दारू गाँजा ल जानबे नइ करै। न कभू जुआँ सट्टा म उड़इस तभे तो आज लक्ष्मी जी ह अपन दुनो हाथ ले धन ल आजो उँकर घर बरसावत हे। टेसिया टूरा मन ह तो पेंदियही लोटा के भीतरी म लाल-लाल कोइला ल डार के कपड़ा मन ल अस्तरी चला के नेरो कट के फूल पेंट अउ ओपन मनीला पहिरे राहै। जादा तर जवनहा मन धोती अऊ पूरा बाही सर्ट ल पसंद करै। टेसिया टूरा मन ल खुसियार चुहकत मटर गस्ती करत रहिचूली कर पाबे। एती गाँव म समलिया के भारी दबदबा रिहिसे। समलिया जब सगा मन ल धर के रहिचूली करा पहुँचिस ताहन टेसिया टूरा मन समलिया ल देख के खुसुर-फुसुर करत कउखन ओ मेर ले टसक दिन।

रहिचूली ह उपर-नीचे रट्ठ मार दे रिहिसे। रहिचूली झूलइया मनके भीड़ लगे राहै। कब रहिचूली थम्मही ताहन हम्मन चढ़बो कहिके। धीरे-धीरे रहिचूली के रफ्तार कम होइस एक-एक कर के उतरत गिन ताहन बइठइया मन अपन-अपन जघा ल पोगरावत गिन। जब रहिचूली ले नोनी मन उतरिन ताहन थोकिन दुरिहा ले समलिया ह बिसेलाल अउ गनपत ल नोनी मन ल देखावत राहै। ओदे जउन नोनी ह कान म दवना खोंचे हे वोह थनौद वाले राम भरोसा के नोनी ए। वोदे नोनी ह जऊन ह खोपा म गोंदा खोंचे हे तेह अंजोरा वाले बहादुर केवट के मँझली नोनी ए। वहिदे दुसरइया डब्बा ले उतरत हे तउन नोनी ह तिरगा वाले प्यारेलाल निषाद के बड़े नोनी ए सुन्दर सँवर गोरी हे, एके घाँव म पंचू ह पसँद कर लिही। ओतके बेर बिसेलाल कथे-ओदे नोनी कहाँ के? ग्वालिन कस गढ़हन हवै। सीता कस फक्क गोरी हे फक्क। समलिया अपन मितान के गोठ ल ताड़ डरथे। एह तो इहें बिरेझर के धनसिंग केवट के बेटी ताय। उहीच्च ल तो देखाय बर लाय रेहेंव। फेर अऊ तीर तखार के दु-चार झिन नोनी मन ल देख लिहि कहिके तुँहला रहिचूली करा लाय रेहेंव। बिसेलाल कथे-के झिन भाई बहिनी हवै? समलिया कथे-एके झिन हे, एके झिन। एती मड़ई ह सिगबीग-सिगबीग करत हे ओती बैटरी वाले पोंगा ह तावा वाले कैसेट ले गाना झोरत रिहिसे -


चक्कर म घोड़ा, नइ छोड़व मैं जोड़ा, झूलाहूं तोला वो,

    हाय झूलाहूं तोला वो।

नदिया म डोंगा, नइ छोड़व मैं जोड़ा, तउंराहूं तोला वो,

    हाय तउंराहूं तोला वो।

गजब दिन भइगे राजा, तोर संग म नइ देखेंव खल्लारी मेला वो...

संगी जउँरिया नइ छोड़ही तोर संग, गोरी वो।

    गोरी वो, गोरी वो, गोरी वो..

मैं बन जाहूं चकरी, तैं उड़बे पतंग,

    चटघइया बोली तोर नीक लागे वो।

    तोर बोली-ठोली हा गुरतुर लागे वो।

गजब दिन भइगे राजा,

    तोर संग म नइ देखेंव खल्लारी मेला वो...

तरिया के पानी, लगे हे बानी, गोरी वो,

    गोरी वो, गोरी वो, गोरी वो...

दूरिहा घूंच के भरबे पानी, करथे छेड़कानी,

    बेलबेलहा टूरा, घठौंदा के तीर।

    बइठे बजावत, रइथे सीटी,

गजब दिन भइगे राजा

    तोर संग म नइ देखंव खल्लारी मेला वो...


मड़ई के लहूटती म बिसेलाल कथे-कइसे मितान, पंचू संग जोड़ी ह बने फभही। समलिया कथे-फभही कहिथस, सुग्घर राम सीता कस जोड़ी। बिसेलाल कथे-त का हम्मन ल दे दिही लड़की? समलिया भरोसा देवावत कथे-पंचू कस हमर बेटा ल कोनो भी लड़की दे दिही अउ ए ह तो मोर हाथ के बात हे। बिसेलाल कथे-फेर हम्मन सोचे हन एसो बहू हाथ के पानी पीबोन कहिके। सुनके समलिया कथे-मैंह जानत हौं, धनसिंग घलो सगा देखत हे-बने सही सगा आही ते बेटी ल बिदा कर देबोन कहिके। भीतरे-भीतर जोरा ल करे बर धर ले हे। ओ दिन राजनांदगाँव के सोनार दुकान म तीनो परानी ल देखे रेहेंव। सोनहा फूल्ली, अइँठी अऊ सांटी के आर्डर देवत रिहिन। बिसेलाल कथे-त बात चला न मितान। समलिया कथे-काली बिहनिया धनसिंग घर चाहा पीये बर चल देथन। बात ह कालिच्च फरहीर हो जही। बिहान दिन धनसिंग संग भेंट होगे। समलिया कथे-कइसे एती कहाँ जावत रेहे ग? धनसिंग कथे-राउत ल बलाये बर जावत रेहेंव। दूध ल बिलई पी डरे हे चाहा बर दूध नइहे। आ के दुह देतिस ते। मँय तो तुुँहर घर सगा मन ल बइठारे बर लेगत रेहेंव। धनसिंग कथे-ए तो बने बात ए चल न लेग, आवत हवँ आयँ। तोर राहत ले मोला का के फिकर रे भई। सगा मन ल बइठार के राखबे। लुंहगाँवत धनसिंग ह राऊत घर जाथे अउ तुरते आ जाथे।

धनसिंग ह जल्दी घर आ के अपन गोसइन ल कथे-सगा आ हे पानी दे वो ताहन चाय बना डर। सवाना के दाई ह मुड़ी ढांक के लोटा म पानी दे के पलागी बनाथे। एती सवाना ह चाय बनाय बर भीड़गे ओती समलिया ह सगा मन करा गोठियाय बर चल दिस। सवाना के दाई ह चाहा ल लान के दिस। चाहा ल पीयत पीयत सब बात ल समलिया ह धनसिंग ल बताथे। सबो बात ल सवाना के दाई ह कपाट के ओधा ले सुनत राहै। समलिया बताथे-बेलौदी गाँव के गौटिया आय, मोर मितान ए। ओकर एके झिन बेटा हे। निच्चट सिधवा, कुछु ल अब तक नी जानै। घर-घरायेन बने हे फेर उँकर एक ठन शर्त हे कि एसोच्च बहू हाथ के पानी पीबोन काहत हे। धनसिंग कथे-देख समलिया मोर बेटी मने तोर बेटी रे भई। तैंह दुलौरिन बेटी बर सोचत होबे ते बनेच्च सोचत होबे। जम जही ते काबर नइ दे देबोन। अपन घर म बेटी ह खाही-कमाही, एकर ले बड़े बात मोर बर अऊ का हो सकत हे। फेर इही बात ल थोकिन डर्राथँव, तोरो एके झिन बेटी हे, दे के बेर धोखा खा गेस। कुछु नइ खावै-पीयै कहिके तोर बेटी ल हरो लिस। बाद म पता चलिस-दमांद ह गँजहा अउ मँदहा हे। समलिया भरोसा देवाथे-देख धनसिंग एक घाँव धोखा खाये हवँ ते खाये हवँ फेर ए दरी नइ खाँव। दुनो के जोड़ी बने फभही अउ बेटी ह दुधे खाही दुधे अँचोही। अइसे काहत हस त सवाना ल देखा देथँव। कपाट के ओधा म सवाना के दाई ह सबो गोठ ल तो सुन डरे रिहिसे। धनसिंग ल कुरिया म आवत देख के धरा पसरा भीतरी डहार खुसरिस। अनजान बनके अपन गोसइया के बात ल सुन के हव कही दिस। 

गोठ बात कर के धनसिंग ह लहुट के सगा मन संग बइठगे। सवाना ह अपन दाई सन कप अउ सासर म चाहा लान-लान के दिस ताहन सवाना के दाई ह किहिस सगा मन के पाँव पर ले बेटी। सवाना ह सबो झिन के टूप-टूप पाँव परिस। खुस राह काहत-काहत गनपत ह पूछ परिस-तोर का नाव हे नोनी? नोनी ह लजावत जवाब दिस-सवाना

गनपत - कुछु पढ़े हस नोनी?

सवाना - नहीं।

गनपत - त का करथस?

सवाना - हम तो दाई संग बियारा म गोबर थापन लागथन।

सुन के सबो झिन हाँस डरिन। बिसेलाल सलुखा के भीतरी वाले पाकिट ले चार आना धरा के किहिस-तोला एसो जिनगी भर बर गोबर थववाय बर बेलौदी लेगबो। सुनते भर-सवाना के महतारी के आँखी म आँसू छलकगे। आँखी ल अँचरा म पोंछत कुरिया म जा के बोम फार के रो डरिस। तैं तो पर हो गेस बेटी। मैं नइ जानत रेहेंव, आज तैंह मोर कोरा ले उतर जबे बेटी, सवाना घलो सुसके बर धर लिस। सगा मन के चेहरा म खुसी के लहर दउँड़गे जानो मानो एसो के मड़ई ह सवाना बर भराय रिहिस तइसे लागथे। सवाना के दाई ह घलो खुस होगे ताहन बात ह धीरे-धीरे पारा अउ गाँव भर बगर गे। आज तो बेलौदी वाले गौटिया ह सवाना ल पइसा धरइस कहिके। सवाना के महतारी ह बिक्कट खुस राहै, मोर बेटी ह गौटिया घर जाही कहिके। मने मन गुने-''बेटी के परसादे बेटा मिल जही कहिके।


चार


जस-जस मुंधियार होवत गिस, नाचा देखे के उछाह ह बाढ़त गिस। कतनो मन तो पहिली ले बारदाना नही ते पोता जठा के नाचा ठऊर म जघा पोगरा ले रिहिन हे। कोदो पैरा, धान पैरा जठा डरे रिहिसे। ओ बखत खड़े साज म कायाखण्डी भजन चलै। मसाल जला के, खड़े-खड़े, चिकारा ल अरोय, तबला ल कनिहा म बाँधे, जोक्कड़ ह चुकनुक (मंजीरा) बजावत परी संग मंच म उतरे। देखते-देखत मंच म गम्मत शुरू हो जावै। उही समे रामदास टण्डन के खड़े साज ह भारी फेमस रिहिसे। भजन ले खड़े साज शुरू हो गे -


मीरा - मोर जन्मे सुधारन हार।

    गुरू हो तोला ना बिसरँव...

    गुरू हो तोला ना बिसरँव...

गुरू- ते बेटी राजा राव के मीरा, मोर नाव रोहीदास (रैदास)।

    काल परन दिन तोर पिता जान परही मीरा।

    वो तो तुुरत हेरा दिही खाल।

    गुरू हो तोला नइ बिसरँव...

गुरू-जहर कटोरी भेजे राजा राव, अउ दिए मीरा के हाथ।

    अरे गुरू के सुमरन करके पियन लगे मीरा।

    वो तो अमृत फल होय जाय।

    गुरू हो तोला नइ बिसरँव...

गुरू-नाग पेटारी भेजे राजा राव, अउ दिए मीरा के हाथ।

    अरे गुरू के सुमरन करके खोलन लागे मीरा।

    उहां बइठे हे सालिक राम।

    गुरू हो तोला नइ बिसरँव...


ओ समे रवेली वाले मदन-मँदराजी के नाचा ह नवा-नवा उद्गे रिहिसे भारी ताम झाम के साथ। जोक्कड़ मदन अउ ठाकुर राम, इंकर जनाना रिंगनी वाले बुलवा जब माईलोगन के सिंगार म उतरे ते लोगन धोखा खा जय। कतको दाऊ मन बिहाय बर खभर भेजवाय। पता लगावै तब पता चलै कि वोह बेटा जात ए। सुन के उँकर मन उदास हो जवै। धीरे-धीरे नाचा सुरू होय के टेम होगे। भारी भीड़ भारी। अतराब भर के मनखे मन सकलाय रिहिन हे। जेती देखते मुड़ीच्च मुड़ी। जनरेटर सुरू होगे। बिजली बगाबग अंजोर करिस। टेस्ट करिस ताहन मनीज्जर मँदराजी दाऊ ह बजनिया मन संग सुर धर के भगवान के सुमरनी करिस -


त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वम् मम देवदेव।।


कोठार म मेकअप रूम रिहिसे। दू-तीन भजन के बाद परी आये के धुन ल मनीज्जर ह बजइस। परी मन अऊ दर्शक मन परी आए के धुन ल जानत रिहिन हे। एक झिन बेटा जात ह परी के अगुवानी करत मंच म लाथे। भारी चमकुल रिहिसे। छमकत-छमकत अइस। ओ परी के आघू तो सुंदर-सुंदर टूरी मन फेल हो जवै। टूरी मन जले बर धर ले। अतेक बढ़िया सवाँगा कहाँ ले लाने हे कहिके। ए सवाँगा ल तो परी ह 'टाटा’ ले लाये रिहिसे। काबर कि छत्तीसगढ़ म ओ दरी टाटा वाले परी के भारी माँग रिहिसे। मंच म आते भार मंच के पलागी करके चढ़िस। बाजा-पेटी के पाँव परिस। काकरो नजर झन लगै कहि के अपन पाँव के धुर्रा ल मुड़ी म छुवइस ताहन निछिन्द होके मुड़ी के एक बाखा म हथेली रख के अलाप लिस-आ हा...आ हा...। अलाप ले के देवी-देवता गुरू अउ माता-पिता के सुमिरन करिस -


सरसती ने स्वर दिये, गुरू ने दिये गियान।

माता-पिता ने जनम दिये, रूप दिये भगवान।।


अब मंच ल जमाए बर अउ पब्लिक ल मोहे बर जोरदार गाना ले एक्सन के साथ गाना गाए बर सुरूआत करिस -

एक के बाद एक फिलिम वाले हिट गाना मन ल गाए बर सुुरू करिस। ए गाना मन ल गा के जब परी ह परन ताल म गोल घुमिस ते जवान ते जवान बुढ़वा मन घलो दीवाना होगे। चारो डाहर ले मोंजरा देखाय बर धर लिन। कोनो कागज जला के, कोनो टायर जला के त कोनो सीधा टार्च ल परी के आँखी म मार के त कोनो साँय-साँय सीटी पार के। परी ह मंच ले उतर के सीधा टार्च वाले करा छम्मक-छम्मक गिस। गनपत के इज्जत बाढ़ गे। गनपत ह परी संग मटक दिस ताहन ओकर पोलखा के बाँही म नोट ल कांटा पीन म गँुथ दिस। गनपत संग हाथ मिला के नाव गाँव पूछ के दउँड़त मंच डाहर वापिस आगे। मंच म आके परी ह गनपत के सुक्रिया अदा करिस -


अई हो...

इहाँ के रहवइया नोहे, बेलौदी ओकर गाँव या।

पासु म बुला के नोट दिसे, बिसेलाल ओकर नाव या।


जब परी ह कनिहा लचका के ठुमका लगइस ते मोंजरा देखइया मन तो लहो ले बर धर लिन। एक के बाद दु-तीन परी मन अलग-अलग ढंग ले सम्हरे, लोगन के मनोरंजन करिन। कोनो लुगरा पोलखा म, त कोनो घाघरा चुनरी म। परी मन के बनावट ह तो जवनहा मन के जीव लेवत रिहिसे, नइ बाँचे चोला रे कहिके। एक ले बढ़के एक परी मन ल देख के टूरा अउ डोकरा मन के नींद उड़ागे।

अब मनीज्जर ह जोक्कड़ आये के धुन बजइस। छम्मक-छम्मक जोक्कड़ मन मंच म पाँव पर के चढ़िन ताहन तो देखइया मन के घलो खुसी के ठिकाना नइ रिहिसे। जानत रिहिन हे अब तो जोक्कड़ मन ही-ही-भकभक करही। बिक्कट मजा आही। उँकर एक-एक बोली-बचन म, हरकत म पब्लिक मन खलखल-खलखल हाँसे। हाँसत-हाँसत पेट फुल जवै। अब जोक्कड़ मन समा बाँध के सुर धरिन अरे हाँ, हाँ, हाँ, हाँ...


सदा भवानी दाहिनी की सनमुख गौरी गनेस।

पाँच देव मिल रक्छा करे ब्रम्हा बिसनु महेस।।


सुमरनी के बाद मदन निषाद अउ ठाकुर राम जोक्कड़ ह एक-दुसर ल साखी के अरथ पूछी के पूछा होथे-


मदन - पहिली सुमरनी नामी चोट्टा ल सुमिरँव,

    दूसर लिगरी लाई के लगइया ल।

    तीसर सुमरनी मैं जूटहा ल सुमिरँव,

    चौथा म बइहा भूतहा ल।


ठाकुर राम - (मदन ल फड़ाक ले एक सोंटा मार के कथे) जूटहा लबरा मन ल सुमिरे बर आय हस ते नाचा देखाय बर आय हस?

मदन- मेंह भजन करत हौं।

ठाकुर राम - चोट्टा-लबरा के, जूटहा-भूतहा के भजन करबे

अरे! करना हे त भगवान के कर।

मदन - त मैं काकर करत हौं? भगवाने के ल तो करत हौं।

ठाकुर राम - त कइसे भगवान ह चोट्टा ए ते चुगलखोर ए?  भगवान जूटहा ए ते भूतहा ए?

मदन - वाह, तुहीं मन तो कथौ गोस्वामी तुलसी दास ह केहे हे कहिके -

ठाकुर राम - का केहे हे कहिके?

मदन - समरथ को कोई दोस गोसाई

ठाकुर राम - बने फरिहा के बता, भगवान ह कइसे चोट्टा होइस?

मदन - भगवान कन्हैया ह ननपन म माखन-मिसरी ल चोरा के खावै। मैं तोला पूछथौं-दसोदा मइया ह फोकट म आरोप लगइस होही?

ठाकुर राम- कइसन आरोप?

मदन - फलानी घर के माखन-मिसरी ल चोरा के काबर खाये। त कृष्ण भगवान चोट्टा होइस नही?

ठाकुर राम - अरे हव जी। फेर ए कइसे होइस, लिगरी लगइया का ए?

मदन - दुसरे सुमरनी लाई-लिगरी के लगइया ल एकर मतलब ए आय कि नारद जउन रिहिसे ओला महर्षि नारद काहय। नारद जी ल ब्रम्हा के बेटा कथे। नारद ह कम चुगलखोर रिहिसे।

ठाकुर राम - कइसे?

मदन - इन्द्र के उपर नारद ह कामदेव ल भड़का दिस। सास्तर (शास्त्र) ल पढ़ के देख, कतको झिन ल एती ले ओती लिगरी लगाय हे।

ठाकुर राम- ठीक काहत हस जी, बने सुनाय। फेर ए कइसे होइस, हमर हिन्दू धरम म जूटहा भगवान कोन आय!

मदन - तीसरे सुमरनी जूटहा ल सुमिरँव।

    सबरी के नाव ल सुने हस

ठाकुर राम - हव सुने हवँ।

मदन - सबरी भीलनी रिहिसे तभो ले भगवान राम ह सबरी के कुटिया म अइस। जूठा-काठा, कांदा-कुसा ल खइस। मीठ हे ते करू हे तेन ल सबरी ह चीख-चीख के राम ल खवइस।

ठाकुर राम - अरे, यहू ह सिरतोन के बात ए फेर वो बइहा-भूतहा ल फोरिहा के बता।

मदन - भूत-भण्डारी भोलेनाथ के नाव ला सुने हस?

ठाकुर राम - वो तो भोला भण्डारी ए।

मदन - मुड़ी म हाथ गोड़ म भभूत ल चूपर के बइठे रथे। बइहा-भूतहा कस धूनी रमाय रथे। त का मैं गलत काहत हवँ?

ठाकुर राम - तहूं बहुत बड़े गियानी, आध्यात्मिक आदमी हरस जी, मोर चोला तर हो गे। फेर महूं तोर ले कम गियानी नइ हौं?

मदन - कइसे?

ठाकुर राम - अब मैं तोला साखी के अरथ पूछत हौं, तैं ओकर अरथ बता।

मदन - ले पूछ?

ठाकुर राम - हां हां हां हां...


चौदह चरन दस नेत्र हैं,

    पांच मुड़ी जीव चार।

उल्टा घड़ा पनिहारिन के,

    संगी करो बिचार।।


मदन-तेरे काहां के चउदा चरन दस नेत्र हैं, पाँच मुड़ी जीव चार कथस। मनखे के हम्मन दू गोड़ ल सुने हन अउ मुड़ी ल एके ठन सुने हन फेर चउदा चरन का ए, पचमुड़िया का ए, सोजधरहा फरिया के बता, काला कथस?

ठाकुर राम-इही ह तो मनखे के सिरतोन बात आय। मनखे ह जिनगी भर जीवन जीथे, आखरी म ओकर इही गति होथे। जउन तोर गति होही तउन मोर गति होही। अमीर के घलो गरीब के घलो होही। आदमी ल जलाये के बाद राख के रंग ह अमीर अउ गरीब के एके होही, ए उही रस्ता ए। इही आय जीवन के सार।

आदमी मरथे त खटली बनाथन, ओकर चार गोड़ होथे, तैं गनत जा, चउदा चरन गिनवाहँू तोला।

चार चरन खटली के, चार झिन बोही के लेगथे तेकर आठ ठन चरन कतना होइस?

मदन-बारा होगे, दू ठन चरन ल अऊ बता।

ठाकुर राम-घटली उपर म सूते हे जेन ला मसान घाट लेगत हस दू ठन ओकरो ल जोड़, कतना होइस?

मदन-अब तो चउदा होगे। फेर पांच मुड़ी कइसे होइस?

ठाकुर राम- चार झिन लेगइया के अउ उपर म सूते हे तेकर मिलाके पाँच मुड़ी।

मदन- अरे हव जी फेर ए बता जीव चार कइसे होइस?

ठाकुर राम- लेगइया मन के चार जीव हे, उपर सूते हे तेह तो मरगे हे। पनिहारिन मन मरकी ल धर के पानी भरे बर जाथे तइसन ढंग ले मरे मुरदा के मुड़ी ह उप्पर डहार देखत रथे। इही ल बिचार करना हे तब होइस नही -


चउदा चरन दस नेत्र हैं,

    पांच मुड़ी जीव चार।

उल्टा घड़ा पनिहारिन के,

    संगी करो बिचार।।


मदन- हव भइया ठाकुर राम।

(ठाकुर राम गाना के सुरूवात करथे मदन ओला दुहरावत जाथे)


एक दिन उड़ जाही रे संगी,

ए पिंजरा के पोंसे रे मैना उड़ जाही।

एक दिन उड़ जाही ग, एक दिन उड़ जाही।

एक दिन उड़ जाही ग, ए पिंजरा के पोंसे रे मैना उड़ जाही...

मुट्ठी बांधे आए जगत में,

    हाथ पसारे जाबे।

दया-धरम ला निच्चट भुला गेस,

    मरे के बेर पछताबे।

एक दिन उड़ जाही ग, ए पिंजरा के पोंसे रे मैना उड़ जाही...


ओ बखत तो इग्लैंड वाला गम्मत भारी फेमस राहै। जनउला के बाद दुनो जोक्कड़ म एक झिन ह काहत हे-बला बेटा तोर दाई ला रे।

ठाकुर राम (जोर से)-ए दाई वो, आना वो, तोला ददा बलाथे ताहन दुरिहा ले फूलकसिया लोटा बोहे जनाना ह राग अलापत मंच डहार अइस...


अई हो....

नारी बर पति देवता हे दाई वो, नारी बर पति देवता हे ना।

मानुस मन बर लाखन देवता हे दाई, नारी बर पति देवता हे ना।


काहते-काहत मंच म बाजा मन के, मनिज्जर के पाँव परके जोक्कड़ मन के बीच म जाथे अउ गाना गाथे -

नारी बर पति देवता हे दाई वो, नारी बर पति देवता हे ना, मानुस मन बर लाखन देवता हे दाई, नारी बर पति देवता हे ना... ताहन फेर नाचा म गम्मत शुरू होथे -

    

मदन ह बाप अउ ठाकुर राम ह बेटा के रोल करथे। जनाना ह महतारी के एक झिन परी ह इग्लैण्ड वाली 'मेम साहब’ अउ एक झिन परी ह  छत्तीसगढ़हिन बहू के रोल करथे।

ठाकुर राम- ददा मेंह वकालत करे बर इग्लैण्ड जाहूँ।

मदन- (केकती ले)  देख वो केकती कइसे करबे, ठाकुर राम ह वकालत करे बर बिदेस जाहूँ काहत हे?

केकती- अई.... हमर एके झिन आँखी के तारा हे। ओला कहूँ बिदेस भेज देबोन ताहन हमर जिनगी तो अँधियार हो जही। ए दे अभी छै महीना बहू आये होय नइहे अऊ बेटा ह बिदेस जाहँू काहत हे। कोन ल देख के जिही बपरी ह?


ठाकुर राम ह चमेली (अपन गोसइन) ल  कथे- मेंह बने पढ़-लिख के आहूँ ताहन बड़े जन साहेब बनहूँ। चमेली घलो नारी बर देवता ए कहिके मान जाथे ताहन ओला इग्लैण्ड भेजे बर जोरा करथे। सास-बहू, ठेठरी-खुरमी रांध के सन्दूक म जोर के इग्लैण्ड जाए बर बिदा करिन। केकती जाय के बेरा ठाकुर राम ल भारी समझाय रिहिसे-देख बेटा बिदेस के टूरी मन भारी रंगरेली रहिथे कहिथे, टूरा मन ल जल्दी बिगाड़ देथे कथे। अपन रद्दा म आबे अउ अपन रद्दा म जाबे बेटा।

ठाकुर राम घलो हव दाई कही दिस। निच्चट 'लोलो पीला’ कस समझाथस वो! ओकर दाई ह कथे- त नइ समझाहूँ रे, तेंह कतनो बड़ हो जस, हमर मन बर तो बछरूच्च रहिबे।

मदन-चल ठाकुर राम, चल गाड़ी के टेम होथे।

ठाकुर राम अपन दाई के टूप-टूप पाँव परथे अउ चमेली ह ठाकुर राम के पाँव परके अपन स्वामी ले असीस पाथे ताहन ठाकुर राम ह चल देथे। ओकर बाद एक के बाद एक सबो झिन परदा के भीतर चल देथे। 

ठाकुर राम इग्लैण्ड पहुँच जथे। उहें ओह एक डहार ले किताब धर के ठाकुर राम ह जात रथे, दुसर डहार ले डुटरी-डुटरी फराक-कुरता पहिरे टूरी ह मटकत-मटकत आत रथे। दुनो झिन उरभेट्टा झपा जथे। इँकर झपई होईस अउ तबलची के धम्म ले तबला बजई होइस ताहन दुनो म सेमी नार कस मया ह बाढ़गे। दुनो ह एक-दुसर के बिना नइ रहि सकै। अब इग्लैण्ड वाले मेम ल धर के भारत आगे ठाकुर रामह। मेम ल नइ बताए रिहिसे कि मोर बिहाव होगे हे कहिके। वहू पगली ह चतुरा छत्तीसगढ़िया सन मोहागे रिहिसे। कहाँ ले नइ मोहाय रहितिस। देसी घी म पले ठाकुर राम हट्टा कट्टा गबरू जवान रिहिसे। हाँसत मुस्कात अपन घर पहुंचगे। घर म मदन, केकती अउ चमेली ह बने आव भगत करिन। ठाकुर राम इमन ल बता दिस कि मेम ह एकाद महीना बर सगा आय हे ताहन अपन देस चल दिही। घर वाले मन भगवान बरोबर मेम के सेवा करै। इमन का जानत रिहिन हे-एहा सगा नोहे नछत्तर ए।’’

अब धीरे-धीरे मेम ल आरो लगगे कि चमेली एकर गोसइन ए अउ मोला धोखा दे के लाने हे। एती चमेली ल जानबा होगे कि एहा सगा नोहे एला बिहा के लाने हे। चमेली करा कम अउ मेम के खोली म जादा राहै ठाकुर राम ह। चमेली ह चिंता-फिकर म अउँटे बर धर लिस-सउत ले तो मउत बने हे कहिके। ए डहार मेम ह शर्त रख दिस कि ए घर म चमेली रही या मेंह रहूँ। अब तो मेम के बुध म आके ठाकुर राम ह चमेली ल नंगत तपे बर धर लिस। ठाकुर राम ह चमेली ल चुंदिया-चुंदिया के मारे। देख के सब काहै-ठाकुर राम ह का बिदेस गिस अपन हा तो बिगड़बे करिस, उपराहा म बिचारी चमेली के जिनगी ल बिगाड़ दिस। चमेली ह हाथ जोड़ के बिक्कट कलौली करिस-मोला झन निकाल जोड़ी, मेंह नौकरानी बरोबर तुँहर सरन म रहि जहूँ। फेर पथरा बने ठाकुर राम के आघू म एक नइ चलिस। मार के धकियावत निकालत रिहिसे। ओइसने म तीजा ले बर चमेली के ददा ह आवत रिहिसे। ठाकुर राम ह जब धकिया के मारिस ते चमेली ह अपन ददा के पाँव म जा के गिरिस। चमेली के ददा ह अपन बेटी ल धर के उठइस। चमेली के ददा ह घलो अपन बेटी के जिनगी ल मांगिस-मत निकाल दमांद मत निकाल, बड़े बिहई होथे। फेर ठाकुर राम माने त, ओला तो अंगे्रजी मेम के नसा लगे रिहिसे-कोनो दारू के नसा होतिस ते दू-चार घंटा म उतर जतिस फेर ओह तो मया के नसा रिहिसे वहू गोरी मेम के।

आखिर म चमेली ल ओकर ददा ह अपन संग लेगे। एती उही रात अंग्रेजी मेम किहिस के अब महूँ अपन देस जाहूँ। ठाकुर राम ह चौंक के किहिस, काबर? तोर नाव लेके मैंह चमेली ल निकाल देवँ अउ तहूँ ह मोला छोड़ के अपन देस जाहूँ कथस। मेम साहब ह खिसिया के कथे-अरे जब तैं अपन बड़े बिहई के नई होयेस त मोर कहाँ ले होबे? ठाकुर राम के आँखी ल खोल दिस अँग्रेजी मेम ह। ठाकुर रामनखमरजी होगे। मेम साहब करा माफी माँगिस। अंग्रेजी मेम ह ठाकुर राम ल धर के चमेली के मइके गिस। चमेली ल समझा के मेम ह समारू के संग समझौता करा के उँकर गृहस्थी बसा के अउ ठाकुर राम ल सीख दे के अपन देस लहूटगे।

'इग्लैण्ड गम्मत’ गम्मत खतम होए के बाद दुसर गम्मत 'मोसी दाई’ के ताहन तीसर गम्मत 'देवार गम्मत’ के होवत ले बेरा चढ़ जै फेर देखइया मन टस के मस नइ होवै। रवेली वाले मँदराजी दाऊ तो नाचा के दीवाना रिहिसे। नाचा के मनिज्जरी के चलत घर फॅूँकागे। कुछु नइ बाँचिस। दु-तीन सौ एकड़ के जोतनदार बरबाद हो गे बरबाद। काबर कि नाचा पार्टी के कलाकार मन महीनों उहें राहै। जउन जइसन-जइसन खावै-पीये ओइसने ओइसने बेवस्था राहै। गाँजा पीयइया मन बर गाँजा-चिलम, दारू वाले मन बर दारू, मछरी-मटन खवइया मन बर मछरी-मटन के बेवस्था राहै। चकल-चउदस चलै। जिंहा गुड़ उहें माछी कस खवइया पीयइया मन रात-दिन झूमे राहै। देवार गम्मत संग नाचा सिरइस, सब झिन खुसी-खुसी घर लहूटिन।

नाचा ल देख के लहूटत-लहूटत बिसेलाल ह गनपत ल कथे-तेंह कइसे एकाद कप पी डरे रेहे का? मोंजरा तेंह देखाये अउ मोर नाव ल बदनाम कर देस। गनपत कथे-तेंह तो हमेसा गलत समझथस, मेंह तो लोगन ल बताए बर मोंजरा देखाये रेहेंव के बेलौदी वाले गौंटिया रवेली वाले मदन-मँदराजी के नाच देखे बर आये हे कहिके। एके रात म अतराब भर बिसेलाल गौंटिया के सोर उड़गे। बिसेलाल कथे-अरे मोला अइसन नाम नइ कमाना हे समझे। रामायण-भागवत म रूपिया चढ़ातेन ते पुन्न मिलतिस फेर परी मन के मुँहु ले मोर नाम लेवा के नाम ल डूबो देस। गनपत ह माफी माँगथे-गलती होगे, अब खियाल रखहूँ। समलिया कथे-बने तो काहत हे मितान, गनपत ह। धन हमर भाग बेलौदी वाले गौंटिया ह बिरेझर म नाचा देखिस। बिसेलाल कथे-तंै नइ जानस मितान ए गनपत ह बड़ उतलंगहा हे। अइसने आँय-बाँय बूता करत रथे अउ कुछु किबे ताहन कोंहड़ा कस मुँहु ल फूलो देथे। समलिया ह मजाकिया टोन म बोलथे-अभी गनपत ल मनमाड़े खिसियाथस अउ रिसा के कोनो डहार चल दिही ताहन सुरर जबे। बिसेलाल कथे-कइसे रे गनपत चल देबे का? गनपत कथे-हम तोर गोसइन थोरे अन तेमा तोर संग छांव कस रहिबोन। सबो झिन ठहाका मार के हाँस डरथे।

चाहा ऊ पी के बिसेलाल कथे-हम्मन ल छुट्टी दे, अब तो तैं मितान के संगे-संग 'सटका’ घलो बन गेस। समलिया ल 'सीता राम महापरसाद’ कही के बिसेलाल अउ गनपत ह बेलौदी जाये बर निकल जथे।


पाँच


मड़ई मानत-मानत बसंत ह पहुनई करे बर पहँुच जथे। पंचू के तन म आमा मउँरे बर धर लेथे। सोहागा के मन म टेसू फूले बर धर लेथे। सगई के बाद एक-एक छिन ह दुनो झिन के बड़ मुस्कुल म कटत रिहिसे। एती पंचू ह मने-मन गुने कइसन दिखत होही? संगवारी मन के गोसइन ह गोरी-नारी हे, मोरो घरवाली ह गोरी नारी होही ते नइ होही। ओती सवाना ह घलो मने मन गुने बर धर लिस कि सबके गोसइया ह पड़रा (गोरा-नारा)हे त मोरो गोसइया कइसन होही? अब तो फागुन के नंगारा ह पंचू के अन्तस म बाजे लगिस। सवाना के दाई ह अपन बेटी के देंह म देवरनीन बला के ससुरार जाए के पहिली गोदना गोदवाथे। गोदना गोदे के पहिली देवरनीन ह सवाना ल समझाथे-मइके म गोदना गोदवई ल शुभ माने गेहे नोनी। मान ले तेंह कोनो बिना गोदवाए ससुरार चल देबे ते तोर सास-ससुर मन तोर दाई-ददा कर ले गोदना गोदवाये के खरचा माँग सकथे। घर ते घर बाहिर वाले मन घलो ताना मारे बिना नई छोड़े -

देख तो दई बहुरिया ह

चूरी पइरी नइ गोदवाए हे,

बाँहा पहँुचा तक ला घलो

नइ फोरवाए हे।


देवरनीन ह बाँस के सूजी ले सतबहिनिया के अराधना करके जब सवाना ल चूक ले गोभिस ते सवाना ह आँखी ल मँूद के 'ए दई वो...’ कहि डरिस। पिरावत हे वो। देवरनीन ह भुलवारत-भुलवारत... गोदना गोदत रथे। जादा नइ पिरावै बेटी जादा नइ पिरावै। तोला चाँटी चाबे कस लागही, तोला बुबु चाबे कस लागही। अब तिंही बता बेटी सवाना तोला का गोदना ल गोदवँ -

तोला का गोदना ला गोदवँ वो?

मोर दुलौरिन बेटी

मोर गोदना चुक ले उपके

दाढ़ी म चुटकुलिया

राम-लखन हिरदे म गोदा ले

दाढ़ी म चुटकुलिया...


सवाना-धीरे-धीरे गोद ना वो, पिरावत हे न।

देवरनीन-माईलोगन मन ह तो पीरच्च सहे बर जनम धरथे। एह तो कुछु नोहे ससुरार जाये के बाद तो बड़े-बड़े दुख पीरा सहे बर परही। फेर माईलोगन तो बिना गोदना गोदवाए उदुप ले दिखथे -


मोर गोदना छत्तीसगढ़ के, चिन्हा हरे पूछ ले।

बिन गोदना के बेटी-माई दिखथे उदुप ले।।


धीरे-धीरे करके हलु-हलु देवरनीन ह सवाना के नाक म (डेरी आँखी के तीर) तीन बुंदकी जउन ल मुटकी केहे जाथे, डाढ़ी म एक बूँद के जऊन ल चुटकुलिया केहे जाथे। हिरदे म राम लखन (मनखे जइसे) तीन बुंदिया, बाँहा म बाँहा-पहुँचा, पाँव म चुरा-पैरी, नाड़ी म लवाँग फूल गोदिस। सवाना के गोरी तन म गोदना ह चुकचुक ले उपकिस। गोदना ह अइसे लागे जानो मानो-लाडू गोंदा के रस ल भँवरा ह चुहकत हे।

ओन्हारी-सियारी मिंजाए के बाद ठेलहा हो जथे। जवनहा मन अपन-अपन संगवारी मन संग खेले कूदे म लग जथे। एसो तो पंचू के बिहाव के बात का चले रिहिसे? तन मन म खुसी के लहर ह दउँड़गे रिहिसे। सुकसुकहा किसम के पंचू ह एसो अपन जउँरिहा मन संग बसंत पँचमी के दिन होले डाढ़ म अंडा पेड़ के डारा गड़ियावन लागिन। पूजा-पाठ करे के बाद इही दिन ले होलिका ल लेसे बर डारा पाना सकेले म लगगे फेर डारा पाना के टोरई ह पंचू ल बने नइ लागिस ताहन ओह अपन रद्दा ल मोड़ लिस। नाचे गाये म लगगे। रोज खाये के बाद सियनहा मन संग डंडा नाचे बर सिखै। होली के दिन एक डहार धुन्ध मंद मउँहा पीये झूमत लाली गुलाली गुुलाल म बोथाय सदाराम ह नँगाड़ा ल बजावत ताल मारिस ताहन अलख यादव ह ''सरा-सरा सुन ले मोर कबीर’’ काहत गनेस वन्दना ले फाग गीत गाए के सुरू करिस -


''अरे प्रथम गनेस मनाउँ, अहो देवा

प्रथम गनेस मनाउँ...’’


इही तरज म विद्या के देवी सारदा के सुमिरन करथे


चह हाँ पहिली देवी सारदा ला सुमिरौ

अरे, देवी सारदा ला सुमिरौं

पहिली देवी सारदा गा लेइहौं


फागुन मस्त महीना जवान मन घलो पान खा के मस्त रथे। जेला फाग गायक मजा ले-ले के गाथे -


पान खा के चले रे कहाँ के जवान

रइपुर के चूना अउ भिलई के खैर,

नाँदगाँव के सुपारी अउ दुरूग के पान।

पान खा के चले रे, कहाँ के जवान...?


नँगाड़ा के बाजती होइस अउ डंडा नचइया मन गोल-गोल गाना गा-गा के लुंहगांवत नाचे बर धरिन। पंचू ह कनिहा लचकावत मटके ते डोकरी दाई के नता मन देख के काहय-देख तो देख पंचू ह कइसे मटकावत हे तेला, एसो भर मटक ले बाबू। बिहाव के बाद सब बिसर डरबे। तोर गोसइन ह जइसन नचवाही ओइसन नाचबे। गौतरिहा ह पिचकारी म छर्र-छर्र रंग ले सब ल रंगावै। अपन हमजोली के टूरी मन ल तो गौतरिहा ह बने भर-भर के पिचकारी मारै। पंचू ल तो बिधुन होके गाना गाये ले फुरसद नइ रिहिसे -

तरी हरि नना मोर ना हरि नाना,

ए हो भला।

ऊही, ऊही, ऊही (कुहकि पारै)


सुरहिन गइया के गोबर मंगवाये

अँगना ला दे लिपवाय जो भला

ऊही, ऊही, ऊही (कुहकि पारै)


पंचू हा जब कुहकी पारै ते सिधा सवाना के हिरदे तक जावै। तभे तो होली तिहार के दिन सवाना के दिल ह धक-धक करै। मने-मन गुनय-धनी संग रहितेंव ते गुलाल लगइतेंव ओला रंग म भिगोंतेंव। होली मनाये के बाद सब खेती-खार के बूता म लग गे।

बिसेलाल ह धान बेचे बर दुर्ग के गंज मण्डी गे रिहिसे। उहें ओकर मितान समलिया ह घलो धान बेचे बर आय रिहिसे। उहें अपन मितान करा खभर भेजवा दिस कि हम्मन ह आठ दिन के बाद 'लगन पूजा’ बरात आबोन। लगन पूजा बरात ल सुन के समलिया कथे-सवाना के दाई ह काहत रिहिसे कि लगन पूजा बरात म दमांद ह घलो आ जतिस ते नजर भर देख लेबोन कहिके। बिसेलाल कथे-ले आहूँ पंचू ल।

धान बेचाए के बाद बर-बिहाव बर रूपिया के बेवस्था कर डरिस। अब तो निस्फीकर होगे, बिसेलाल ह। परनिया ह दुर्ग बाजार के दिन लगन पूजा बरात म लेगे बर सराजाम के जिनिस ल बिसइस। करसा-कलोरी, हरदी, सिंघोलिया, तेल चघनी मऊँर ल बिसइस। संग म गैंदलाल के गोसइन ल घलो दुर्ग लाय रिहिस हे परनिया ह। गैंदलाल के गोसइन ह परनिया ल काहय-काजर काबर नइ लेवत हस गउँटनीन बहुरिया बर? काकरो नजर लग जही त। परनिया ह कंझा के कथे-चुप य जब देखबे तब अलकरहा गोठियावत रहिथस। अई, अब काकर नजर ह लगही अब तो सवाना ह पंचू के पागा म बंधागे हे। गैंदलाल के गोसइन ह कथे-त अइसने हमु मन बंधाये रहे होबोन न गउँटनीन? परनिया ह कथे-निच्चट भकलीच हस तोला थोरको समझ नइ आय। जानो मानो कुछु ल जानबेच नइ करस।

लगन पूजा बरात बर गनपत, गैंदलाल अउ पंचू के संगवारी रामरतन ल तियारिस। संग म पार वाले मन ल घलो तियार दिस। पर्रा म मड़ा के सबो सामान ल चद्दर म बांध के गैंदलाल ह बोहिस ताहन सब झिन बिरेझर जाय बर निकलिन। घर मुहाटी म पहिलीच्च ले फूलकसिया लोटा म पानी मड़ा दे रिहिसे ताकि भरे लोटा ल देख के निकलबोन ते हमर बूता ह सुभ होही। मुहाटी ले निकलते भार कुआँ पार ले भरे हवँला बोह के एक झिन नवा बहुरिया ह आवत रिहिसे। ओकर हवँला म बिसेलाल ह सिक्का डारिस ताहन निश्चिंत हो के सब झिन खुसी-खुसी चलिन बिरेझर डहार। बियारा म गैंदलाल ह मुड़ भर बइला ल खासर म फाँदिस ताहन बइला मन ल हर्र-रे कहिके दउँड़ा दिस खासर ल। गउँटिया घर के बइला मन चिक्कन-चिक्कन दिखत रिहिसे। पहिली घांव पंचू ल धर के बिसेलाल गौटिया ह बिरेझर जावत हवै। त तो प्रतिष्ठा के सवाल हे तभे तो गैंदलाल करा टट्टा वाले खासर फंदवाए रिहिसे।

ओ डहार बिहनिया ले धनसिंग ह जोरा म लगे राहै। मने मन गुनै-एकाद झिन मोरो बेटा रहितिस ते काम बूता बर मोला जादा झाफर नइ परतिस। अपन बहिनी के बिहाव के जोरा ल भीड़ के करतिस फेर कथे न 'मांगे म बेटा अउ हपटे म धन नइ मिलय।’ बिचारा का करै। बेटी ल बेटा बरोबर पोसे रिहिसे फेर बेटी ह तो बेटिच्च आय। दुसर के धन आय। भगवान ह सिरिफ हमला नोनी के सज्ञान होवत ले पोसे-पाले के जिम्मेदारी ल सौंपे हे। बिसेलाल अउ परनिया ह आज मने-मन खुस राहै आज हमर बेटी के घर बसत हे फेर छिन भर म दुखी हो जवै। आज हमर बेटी ह सगा हो जही। महीना भर म हमर दुलौरिन बेटी ह बेलौदी ससुरार चल दिही ताहन हमर जिनगी कइसे चलही। फेर विधाता के आघू म काकर बात चलही। जस-जस बेरा चघत जाय लगन पूजा बरात के आय के समे लगठावत जाय। सवाना के दाई ह गोतियार अउ डिहवार मन ल पहिली ले चेता दे रिहिसे कि आज हमर घर लगन पूजा बरात अवइया हे, थोकिन जल्दी आहू रांधे-गढ़े बर लागही कहिके। गाँव म सुन्दरिया ह चना बेच के अपन जीवन यापन करै। भरे जवानी म खाली हाथ होगे। तब जवाहर ह पेट म रिहिसे। जवाहर ह तो अपन ददा के मुँहु ल देखेच्च नइहे। लगन पूजा बरात के दिन बेटा वाले मन पर्री बिसावै। काबर कि लगन धराए के बाद खुसी म चना गुड़ बाँटे के परम्परा हे। सुन्दरिया ह आजे दु किलो चना ल कुधरिल म बने फोरे राहै। बढ़िया खैरी चना ल डोकरी हरदी म पिंवरा के सोसन भर सूखा के फोरे रिहिसे। चना ल फोर के दु पर्री म बगरा दे रिहिसे। काबर कि आज बेलौदी वाले गौटिया ह लगन धराय बर आही। दु पर्री जरूर बिसाही।

घाँघरा के आवाज ह जइसे सुनइस ताहन जान डरिस धनसिंग ह, एहा सगा मन के खासर ए कहिके। धकर-लकर बाहिर निकलस अउ बियारा म खासर ल लेग के बइला ल ढिलवा दिस। देखते-देखत समलिया घलो आगे। समलिया अपन मितान ले 'सीताराम मितान’ कहिके एक-दूसर के भाव रखिन। पंचू ह टूप-टूप समलिया अउ धनसिंग के पाँव परिस। सगा मन ल धनसिंग ह घर लइस ताहन लोटा म पानी धर के माईलोगन मन अइन। सगा मन के पलागी बनइन। पंचू ह मुड़ी ल गड़िया के सबो नारी मन के पाँव परत असीस लेवत रिहिसे। पाँव परत-परत सवाना के घलो पाँव परे ल बर धर ले रिहिसे। ओइसने म सवाना के फूफू ह किहिस-नही बेटा एकर पाँव परे ला नइ लागे बल्कि एहा जिनगी भर तोर पाँव परही। पंचू ह लजा के अपन जघा म बइठगे ओतना म रामरतन ह जरे म नून डारिस। तहूँ ह यार अभी ले भउजी के पाँव परे बर धर ले हस। अभी तो सरबस जिनगी परे हे कहिके सबे झिन मने-मन मुचमुचाये बर धर लिन। बिसेलाल ह खाँसिस त ले दे के सब झिन अपन हाँसी ल रोक पइन।

समाज के चपरासी ह गाँव भर घरो-घर जा के आरो कर दिस कि आज धनसिंग घर गउर बइठइया हे, चना-गुर खाय बर आहू। चाहा-नास्ता होय के बाद गउर बइठे के टेम होगे। धनसिंग ह पं. रामहृदय तिवारी पुरोहित बर गाय के दूध लइस। दूध पीये के बाद पुरोहित ह गउर बइठे के तइयारी करिस। देखते-देखत गाँव भर के माईलोगन, बेटी जात के मन सेकलागे। बेलौदी वाले गौटिया डहार ले लगिन पूजा बरात बर पर्रा म जोर के नेंग जोग के सामान लाय रिहिसे ओला गउर ठउर म खोल दिस। पंडित ह पूजा पाठ करिस। ओकर बाद धनसिंग ह अपन हाथ के नरियर ल बिसेलाल ल दे के, फलदान करके बिसेलाल के कान म दूबी खोंचिस। बिसेलाल घलो धनसिंग के कान म दूबी खोंचिस ताहन दुनो झिन समधी भेंट होइस।

समधी भेंट के दृश्य ल देखते भार सबके आँखी म आँसू ह अपने अपन डबडबा गे रिहिसे? गाँव वाले मन के आँखी म घलो तर-तर, तर-तर आँसू ह निकलत रिहिस हवै। अँचरा म आँसू ल पोंछिन ताहन अपन-अपन ले गोठियाए बर धरिन। सवाना ह अब पराया होगे। सवाना थोकिन टन्नक बानी के राहै। चुलबुलही किसम के, सबो झिन बने हाँसी ठिठोली करै। काम-बूता म झमा-झम राहै। देखत-देखत कुआँ पार ले पानी लान डरै, देखते-देखत नहा-खोर के आ जवै ताहन मँझनिया कना अपन ददा बर बटलोही ल तीपो डरे। इतवारी, बुधवारी अऊ हरेली तिहार म तो सवाना ह अपन सहेली मन संग फूगड़ी, बिल्लस, खो-खो अऊ गोंटा खेल खेलै। जउन जइसन राहै ओकर संग ओइसने मिल जवै। अब धनसिंग के घर तो सुन्ना होबे करही फेर बिरेझर के खोर-गली ह घलो सुन्ना हो जही। देखते-देखत सुन्दरिया के अंदाज के मुताबिक बिसेलाल गउँटिया ह दु पर्री चना ल बिसइस। चना-गुर अउ नरियर ल मेल के 'फलदान’ के खुसी म सब ल परसाद बाँटिन। जब चना गुर ल पइन त खुसी के आँसू ल पोंछ-पोंछ के धीरज धरत परसाद ल खइन।

पंचू ल देखे के बाद अब चरचा के विसय होगे। दमांद ह थोकिन बिलवा हे वो, करिया हे। सवाना तो फक्क फक्क ले पड़री हवै। कतनो झिन यहू काहय के कोन जनी सवाना ह पसन्द करही ते नही। पंचू संग जिनगी ल पहाही ते नही। सवाना के सहेली मन घलो केहे बर धर लिन तोर ददा ह का बिना देखे तोला हार दिस सवाना? तैं अतेक गोरी अउ भाँटो ह केरूवस बरोबर करिया। इंकर खुसुर-फूसर ल सवाना के फूफू सुन डरिस ताहन समझावत किहिस-तोर सही भाग वाले कोनो नइहे सवाना, देवी-देवता कस सुग्घर जोड़ी फभे हे तुँहर। राम, बिष्णु, शंकर अउ कृष्ण जी के रंग ह तो सांवला हे फेर उंकर नारी सीता, लक्ष्मी, पार्वती अउ रूखमणी ह गोरी हे। तोर ले भाग मानी कोनो नइहे सवाना, तोला भगवान कस कोदो सांवर पति मिले हे। रही बात रंग के त फेर सुन -


करिया गोरिया बिटिया झन काहत रहिबे

करिया हे सिरी भगवान...

दाई के कोख कुम्हार के आवा

कोई कारे कोई गोरे हो...

    

सवाना ह सब झिन के टूप-टूप पाँव परिस। जेकर ले जतना बन परिस सब झिन अपन-अपन ले असीस स्वरूप पइसा धरावत गिन। बिसेलाल ह घलो सवाना ल रूपिया धरइस। चूमा-चाँटी ले के बाद बिसेलाल ह पण्डित ल कथे-देख तो महराज कते दिन भाँवर ह बने रही ते। महराज कथे-तुमन कब चाहत हव भाँवर ले बर। बिसेलाल कथे-हम्मन तो अकती बर भाँवर ले के बिचार करे हन। अतका ल सुनके पुरोहित कथे-त अकती बर पँचाँग देखे के का जरूरत हे। एह तो देव लगन आय। एकर ले बढ़िया लगन अऊ का हो सकथे। लगन पत्रिका ल धर के ओमा हरदी सींच के दुनो पक्ष ल दे देथे। पण्डित रामहृदय तिवारी ह चढ़ोत्तरी ल सकेल के बिदा मांगिस। पर्रा के सामान ल भीतरी डहार लेगिस। एती समलिया ह बेलौदी वाले सगा मन ल चाहा पियाय बर अपन घर लेगिस। उहें ले आए के बाद एती जेवन के तइयारी होगे रिहिसे। तसमई, सोंहारी, अउ बरा भजिया चूरे रिहिसे। संग म समलिया घलो खाना खाय बर बइठिस। खावत-खावत धनसिंग ह समलिया ल कथे-देख भई समलिया तैंहा हमर डहार के सियान के संगे-संग सटका घलो हरस। दुनो डहार के पागा ह तोरेच मुड़ी म बँधाय हे। समलिया भरोसा देवाथे-मोर राहत ले कोनो किसम के फिकर झन कर, भगवान सब निपटाही। अइसे तइसे रात होगे रिहिसे। थके-हारे रिहिन हे। सुतीन ते एक्के नींद होइस। कब पहइस ते पता नइ चलिस। बिहनिया चाहा पानी पीये के बाद बिसेलाल ह घर लहूटे बर बिदा माँगिस। सब झिन पलागी बनइन ताहन गैंदलाल ह बेलौदी जाय बर खासर म बइला ल फंाद के दउँड़ा दिस।


छै


अकती भाँवर तिथि के मुताबिक सगा सोदर मन घर नेवता पहुँचगे। अब धीरे-धीरे सब सगा मन तेलमाटी-चुरमाटी के दिन पहुँचन लागे। धीरे-धीरे सुरूज नरायेन ह उके पंचू के नवा जीवन के सुरूआत करे बर अनुमति दिस। संझा कन सियान मन केहे बर धर लिन जादा मुंधियार झन करौ। चुरमाटी ल लाने बर जावै। सियान के बात ल सुन के बिसेलाल ह भाँवत ल जोगिंस-जा गाँव भर किंजर दे। भाँवत ह घरो-घर काहत किंजरिस-आज बिसेलाल घर पंचू के चुरमाटी लाही, देखे बर आहू। पंचू के फूफू ह ढेरहीन रिहिसे। नवा लुगरा पहिरे चाँउर पिसान के घोल, भात के मुठिया, गोबर के मुठिया अउ दीया-बाती ल पर्रा म राख के सगा-सोदर मन बाजा-गाजा संग चुरमाटी जाय बर तइयार रिहिसे। पंचू के फूफा ह साबर म धोती बांध के खांघ म बोह के तइयार रिहिसे। इही ह तो ढेड़हा रिहिसे। ढेड़हा-ढेड़हिन के बिना बिहाव नइ सिधे तिही पाय के ढेड़हा-ढेड़हिन के सबले जादा मानता रहिथे।

बिसेलाल ह अपन एकलौता बेटा पंचू के बिहाव बड़ा धूमधाम ले करत रिहिसे। खरचा म कोनो किसम के कोताही नइ बरतत रिहिसे। तभे तो नाँदगाँव के सामाजिक बाजा ल लगाय रिहिसे। बजनिया मन के सोर ह दुरिहा-दुरिहा ले उड़े रिहिसे। दु ठन दफड़ा, दु ठन सिंग बाजा ल, कूद कूद के बजाथे। डमऊ ह जब कुड़कत हे, कुड़कत हे काहय ते जुड़ाए-सिताए मनखे मन घलो कुड़क जवै। तासक ल कीड़-कीड़ बजावै ते अच्छा-अच्छा के कान के कन्घउवा निकल जवै। झांझ वाले ह तो माहोल ल गरमा देत रिहिसे अउ मंजीरहा ह सबो बजनिया के सुर ल मिला के चलै। अलग-अलग बाजा ल एके संघरा सुर मिला के बजई ते अइसे लागे जानो-मानो कौमी एकता के एकर ले बढ़िहा मंच अऊ कोनो करा देखे बर नइ मिलै। दफड़ाहा ह एक घांव सेम्फल बजा के सबो बजनिया ल सावतेच कर दिस कि अब बजाय बर तइयार हो जव, अब समे आगे हे। मोंहरिया ह मोहरी के फोंही ल गिलास के पानी म भिंगो के अपन मोहरी ल टनाटन करके जब बिहाव धुन बजइस ताहन बजनिया मन रेंगवनी पार बजा दिन। ओकर बाद घर-परिवार, सगा-सोदर, पारा-परोस, पार-पाँघर, अउ गाँव बसती वाले मन चुरमाटी लाने बर मेड़रा (गाँव ले लगे नरवा) डहार जाय बर आघू बढ़िन। बीच बीच म ढेड़हा-ढेड़हीन मन देवी-देवता के आघू म दू ठन भात अउ गोबर के मुठिया ल चढ़ा के, हुम दे के बिनती करेै-हे प्रभु हमर जग ल सुफल करहू। पूजा पाठ करत ले बजनिया मन के संग म उत्साही सगा-सोदर मन पागा ल छोर के हाथ म लहरा-लहरा के नाचै तेहा देखे के लइक राहै। मसाल वाले ह माटी तेल ल डार के भपका बारत खुसी के अँजोर बगरावत रिहिसे। दु-तीन जघा म रूक-रूक के पूजा पाठ करके नाचत-गावत मेड़रा पार म पहुँच जथे। चुरमाटी ठऊर म सुवासा सहित पाँच झिन सगा सोदर मन साबर म हाथ लगा के माटी कोड़े तेला ममा-मामी घर ले लाने लुगरा म झोंक के पर्रा म राखिन। माटी के कोड़त ले गीत गवइया मन ढेड़हा ल भड़-भड़ के कुड़का डरिन अउ मोंहरी ह गवइया मन के सुर ल मिलावत सुवासा ल लजवा डरिन -


तोला साबर धरे ला नइ आवय मीर धीरे-धीरे

तोला माटी कोड़े ला नइ आवय मीर धीरे-धीरे

धीरे-धीरे, अपन कनिहा ला तीर धीरे-धीरे

तोला माटी जोरे ला नइ आवय मीर धीरे-धीरे

धीरे-धीरे, तोर धोती ला तीर धीरे-धीरे...


चुरमाटी कोड़ाय के बाद चिला अउ फरा ल परसाद बाँटिन ताहन फेर बजनिया मन घर तनी जाय बर रेंगउनी पार बजा दिन। बाजा के इसारा ल सुनते भार सब झिन घर तनी जाय बर लहूटगे। खुसी म तो रेंगत-रेंगत न तो रेंगइया मन के गोड़ पिरावय, न तो गवइया मन के टोटा, तभे तो आवत-जावत चुरमाटी गीत गाए बर नइ छोड़िन। मुहाटी करा आते भार गीत झोरिन-


तैं बलाए अउ मैं आयेंव

तोर घर के मुहाटी ला पूछत आयेंव, होरे होरे...

बाजा रे बाजे डमरू नइहे

तोर घर के मुहाटी म समऊ नइहे, होरे होरे...


घर वाले मन चुरमाटी लनइया मन के स्वागत मुहाटी म लोटा के पानी ल ओरछ के करिन ताहन मुहाटी म सबो झिन के समऊ होगे। घर के माई खोली म जा के गाना गवइया मन गाना गावत रिहिन। फूफू ह तेल चघनी कपड़ा लाय रिहिसे तेला पंचू ल पहिरा के 'तेल पियई’ (तेल चघनी) के नेंग ल पूरा करिन। पींयर-पींयर हरदी म पंचू के जिनगी ह सरसों के फूल कस पिंवरागे। अब पंचू के अवइया जनम बर घलो गति बनगे। काबर ए जनम म हाड़ म हरदी नइ रचे रहितिस ते अवइया जनम म 'रकसा’ बनतिस। पंचू के माथ म तेल चघनी मऊँर अइसे लागे जानो मानो नवा मंदिर म कलस चढ़गे हे।

बर-बिहाव ह ढेड़हा के अगुवानी म सिधथे तभे तो सबो काम के चिन्ता फिकर ढेड़हा ल रहिथे। मायन के दिन सबले पहिली पंचू के फूफा ह एक-दु झिन सगा मन ल धर के शिवनाथ नदिया के तीर म डूमर डारा लाने बर गिन। डूमर डारा अउ आमा डारा ल ढेड़हा ह मड़वा छाये बर घर लइस। घर आके सबले पहिली घर मुहाटी म दुनो डहार एक-एक ठन बाँस के मड़वा गड़िया के उपर म काँसी के बेनी गाँथ के गृहस्थी के पापर, मिरी, छेना, बरा, सोंहारी, आलू अउ गोंदली ल गुंथ दिन। ताकि पंचू के जिनगी म काकरो नजर झन लगे। ए मुहाटी के दुनो मड़वा ह पंचू के गृहस्थ जीवन के सुरूआत के एहसास करावत रिहिसे।

परछी म लगभग चार हाथ के अन्तर म दु ठन गड्ढा खन के ताँबा के रूपिया अउ सिक्का डार के एक-एक जोड़ी बाँस ल गड़िया दिस ताकि जनमो जनम जुग जोड़ी एक-दुसर के मया म बंधाय राहै।

चारो कोती लकड़ी के खम्भा गड़िया के नही ते छानी परवा म बाँस ल लमा के डूमर डारा अउ आमा डारा ले मड़वा ल छा दिन ताहन देख आमा डारा अउ डूमर डारा के गुन। अब तो हरियर मड़वा सब ल सुकुन देवत हे। मड़वा ल छा के तोरन पताका लगा के ढेड़हा चाहा पानी पी के बीड़ी पीये बर सुरतइस।

ढेड़हीन ह एक झिन सगा संग चुरमाटी म लाने माटी ल मायेन के दिन खुसी-खुसी सान के दुनो मड़वा म वर्गाकार चबूतरा बनइन। आघू तनी करसी मड़ाए बर गीरी गस जघा बनाथे। चबूतरा अउ करसा ल सजा के दुनो मड़वा म सील लोड़हा ल ओधा दिन। मड़वा अउ करसा म छींद के मऊँर बांध के पंचू के बिहाव के गवाही बना दिन। करसा के नांदी उपर दीया बार के मायेन के कार्यक्रम के सुरूआत करिन। मड़वा म ओधाए सील लोड़हा म सगा-सोदर मन तेल चघाए बर हरदी ला पिसीन। ए समे तो सब अपन-अपन ले मगन राहै। कोनो ह कोनो ल कुड़कात हे त, कोनो ह कोनो के गाल म हरदी लगा देत हे। लइका सियान जवान सब खुस। बजनिया मन टन्नक बानी के रिहिन हे। बजनिया मन कोदो पैरा ल बार के दफड़ा-डमऊ अउ तासक ल टनाटन सेंक के घटका दिन। अब मोहरी ह सुर धर दिस तेल चघनी गीत बर -


एक तेल चढ़िगे

एक तेल चढ़िगे

दाई हरियर-हरियर

ओ हरियर-हरियर

मड़वा म दुलरू

तोर बदन कुम्हलाय।

रामे ओ लखन के 

रामे ओ लखन के

दाई तेल चघत हे

कहँवा के दीयना

होवत हे अँजोर।


जस-जस हरदी चघत जावै, तस-तस पंचू के बदन ह कुम्हलावत जावै। निछिन्द जिनगी अब गृहस्थी के डोरी म बंधाये के पहिली पंचू के अन्तस ह कतनो सवाल ल पूछत राहै। अब तो जिम्मेदारी के हरदी चघत राहै। रंग पींयर, मन पींयर, तन पींयर सुध ल जनकपुर डहार लेग जात रिहिसे। फेर अन्तस के सवाल के उत्तर अन्तस ह देवत रिहिसे, सब ठीक हो जही। समे के साथ-साथ जिनगी के गाड़ी घलो चल जही।

ढेड़हीन ह पंचू के अँगरी ल धरे आघू-आघू अउ पाछु-पाछु बेटी माई मन पर्रा म तेल हरदी ल राख के पाँच घाँव नही ते सात घाँव किंजार के मड़वा के पीछू डहार के पीढ़हा ल आघू म मढ़ा के  काकी, महतारी, डोकरी दाई अउ फूफू मन अपन दुलरूवा पंचू बेटा ल असीस दे बर देखत रिहिन। उही पीढ़हा म बइठार के गोड़-हाथ म सब झिन तेल हरदी चघइन। असीस देवइया मन अपन लुगरा के आंछी ल मुड़ी म राख के असीस दे के पंचू के जिनगी के खुशहाली के कामना करत रिहिन। तेल हरदी चघे के बाद ढेड़हीन पंचू के अँगरी ल धर के माई खोली म एक भाँवर किंजार के फेर मड़वा म लइस ताहन फेर पाँच नही ते सात भाँवर किंजार के तेल हरदी चघा के बिहाव के नेंग ल पूरा करिन। बेटा बिहाव के आनंद तो दुगुना रिहिस। तेल माटी के दिन दूल्हा ल सुता अउ रूपिया ल पहिरा दे रिहिस हे। डोकरी दाई के नता मन तो ठगे-बिहाव के होवत भर ले सुता अउ रूपिया ल टोटा म अरो ले राह ताहान तो तैंह बहू के सुता अउ रूपिया म बंधा जबे। कतना सिरतोन लागथे, सियान मन के गोठ ह।

तेल चघाय के बाद बजनिया मन ल चाहा दे के बीड़ी कट्टा ल दे दिन। लुठी म बीड़ी सीपचा के पीयत ले सब झिन ठाकुर बइगा घर दतेला जाय बर तइयार होगे। उहें माईलोगन मन दतेला नाचे बर गिन। आज तो बिसेलाल गौटिया-गौटनीन के दुलरूवा पंचू के दतेला आये हे। तिही पाय के सब झिन दोहा पार-पार के नाच-नाच के झूमे रिहिन हे। जेन मन कभू कनिहा नइ मटकाए राहय वहू मन दतेला म पर्रा धर के बिधून होके मटका डरिन। फूफू ह दोहा पारिस -


ये पार नंदी ओ पार नंदी,

बीच म भांठा कछार रे।

हमर पंचू के बिहाव होवत हे,

लगे हे रूपिया हजार रे...


ताहन तो फेर देख सबके चेहरा म आनंद के लहरा दउड़े बर धर लिस।

दतेला नाच के आवत ले ढेड़हा ह डूमर डारा के बनाए मंगरोहन ल धर के पीपर पेड़ के छईंहा म बइठे रिहिसे। दतेला नाचे बर गे रिहिन उही मन घर आ के मंगरोहन परघाये बर गिन। मंगरोहन ल परघा के लाने के बाद ढेड़हा ह मंगरोहन ल मड़वा म बांधे बर धर लिस। ओती धोबी घर ले आगी लान के चूल्हा बारिन। उही चूल्हा म रांध के बिसेलाल घर मायन मांदी परिस। बिसेलाल घर मायन मांदी म घर के गारे करी के टाहड़ी अउ आमा खुला संग भाँटा खुला ह गजबे मिठाए रिहिसे तभे तो दु काउँरा उपराहा खावत रिहिन हे। वइसे भी खुसी म संघरा बइठ के खाये के अइलगे मजा रहिथे।

आजे सब नेंग ल निपटा के बरात बिदा करना रिहिसे तभे तो परिवार वाले मन बिना समे गँवाये नेंग ल एक-एक कर के पूरा करत रिहिन हे। पंचू के तेल उतारिन, पर्रा म बइठार के मुड़ी उप्पर पर्रा राख के पानी रिको-रिको के पंचू ल सब झिन नहवइन -


तोला झूलना झूले ल

नइ आवय हो दुलरू बाबू

तोर दाई ला लेगे खोर गिंजरा।

खा ले खा ले मिठई पेड़ा

तोर बहिनी ला लेगे साहेब डेरा।


नहवाए के बाद पंचू ल चद्दर ओढ़ा के नाचत-गावत सात भांवर किंजारिन।

एती नेवतहार मन बरात जाय बर लुकलुकाय रिहिन। तभे तो एक दिन पहिली गाय छाप साबुन अउ माटी राख ले कपड़ा लत्था ल कांच के उजरा डरे रिहिन हे। बराती मन अपन-अपन झोरा म एक-एक जोड़ी अऊ कपड़ा जोरे रिहिन हे। टेटकु ह रामरतन ल कथे-एक दिन रहना हे त तेंहा अऊ का जादा कपड़ा लत्था धरत हस। उहां कोनो रेहे बर थोरे जात हवन। हम्मन तो बहू बिहाय बर जावत हवन। अतका ल सुन के रामरतन कथे-मेंह ना कका नवा-नवा कपड़ा ल पंचू के ससुरार म पहिरहूं। इहें ले पहिर के जाहूँ ते धूर्रा-माटी म सना नइ जही ग। टेटकु कथे-वाह रे टेसिया। टेस मारे बर नइ छोड़े। पेंट फटे ते फटे फेर भाव झन घटे। रामरतन के दिमाक खराब होगे। खिसिया के किहिस-का कका अपन दिन ल भुला गेस। सियान मन कथे-तोला तो भारी उतलंगहा रिहिसे काहै। कतनो घांव तो गुना-गारी म डाढ़ घलो दे हे कहिके। अब तिलक लगा के साधु बनत हस-सकल पदारथ करहू लाला, कण्ठी पहिर के जपहू माला।

टेटकु  ह अपन चाल म कीरा परत देख के कथे-''तहूं ह रे रामरतन, अपन कका बाप मन सन अइसने मँुहजोरी करथे?’’ कोंवरा के रामरतन किहिस-ए बात ल तो तिंही सुरू करे रेहे कका, अब तिंही बता ए उम्मर म नइ पहिरबो ओढ़बो त का दाँत झरही त फूटानी मारबो? टेटकु समझ गे ए टूरा ह एक हाथ खीरा के नौ हाथ बीजा कर डरिस। रामरतन ह कहाँ ले नइ बगियातिस, अपन संगवारी के बरात म अपन नइ सम्हरही त कोन सम्हरही। रामरतन जानत रिहिसे-ए यज्ञ के राजा तो पंचू ए फेर मजा तो परजा मन करही। जतेक उतलंग नापना हे नाप ले। बराती बर तो दूध-भात रहिथे। रामरतन यहू जानत रिहिसे, मेंह एती के लोकड़ाहा रहंू तभे तो समधीन मन संग लागे म मजा आही। रामरतन ह बराती के मजा ल तो जानत रिहिसे फेर लोकड़ाहा मन ल हाँसी ठिठोली करत दुरिहा ले देखे रिहिसे। आज तो जादच्च खुस रिहिसे, आज तो मैंह खुदे लोकड़ाहा रइहंव।

बिसेलाल ह काम-बूता के मारे चितखान होगे हे। ओकर हाल तो अइसे होगे हे कि अब कोचई ल छोलँव ते मुड़ ल खजवावँ। बरात जाय के तइयारी अउ बेवस्था म कोनो कमी झन हो जै कहिके बिसेलाल ल फिकर होगे रिहिसे। संजकेरहे बरतिया भात खाय बर नेवतहार मन ल बलाय बर भेज दिस भाँवत ल। भाँवत ह बिसेलाल के बताय मुताबिक गाँव म नेवतहार मन घर आरो कर दिस। बाकि तो सगा मन अपन-अपन ले तइयार हो गे रिहिन हे। सगा मन बर पहिली ले कपड़ा धोए के अऊ नहाए के साबुन निकाल दे रिहिस हे। तेल अउ कंघी ल घलो पठेरा म मढ़ा दे रिहिसे परनिया ह। सगा मन नहा-खोर के आवत जाय, तन म तेल चूपर के कंघी ले मुड़ी ल कोर के भात खाये बर बइठत जाये।

ओती बिसेलाल ह समाज के चपरासी ल जोंग दिस कि जा तो डीगर समाज वाले घर 'सेर-चाँउर’ धर के जा। जेन मन बरात जाही उमन सेर-चाँउर झोंका लिही। सामाजिक बाजा वाले मन जल्दी तइयार होगे रिहिसे। बिसेलाल ह जानत रिहिसे कि बजनिया मन के जब तक ले सुर नइ चढ़ही तब तक ले बने बाजा बाजे न परी नाचै। उँकर जुगाड़ बर पहिलिच ले मनिज्जर ल रूपिया धरा दे रिहिसे। तभे तो परी मन छमकत-छमकत बजनिया मन संग बिसेलाल के घर के आघू म अइन ताहन ठोंक दिन ताल। सब समझगे अब बरात निकलइया हे।

ओती खवई पोरसई चलत हे, एती पंचू के सवाँगा चलत हे। पंचू तो आज राजा हे राजा। राजा के पीछू सैकड़ों बरतिया, बरात जवइया हे। पंचू के संगवारी रामरतन अउ ढेड़हा ह पंचू के सवाँगा म लगे हे। धोती-कुरता, लाली रंग के मोजा पहिरा के आँखी म काजर आँज देथे ताकि काकरो नजर ह झन लगे। ढेड़हा ह काजर ल आँज के पंचू ल 'माई मउँर’ पहिरा दिस। पंचू ह मउँर ल पहिने के बाद 'राम’ बरन दिखे लगिस।

अब बेटी माई मन मउँर सौंपे के तइयारी करीन। पंचू ल उत्ती मुड़ा खड़ा करके सगा-सोदर नेवतहार सब माईलोगन मन अपन मुड़ी म तेलचघनी मऊँर बाँध-बाँध के करसी ल दुनो हाथ म धर के, एकक-एकक भाँवर किंजर-किंजर के करसी के दीया म हथेरी ल आँच देखा-देखा के पाँच नही ते सात घाँव पंचू के मउँर सौंप के असीस देवत रिहिन हे। गीत गवइया मन मउँर सौंपनी गीत गावत रिहिन हे -


दे तो दाई, दे तो दाई

अस्सी ओ रूपैया

के सुंदरी ला लातेंव बिहाय।

सुंदरी-सुंदरी बाबू

तुम झन रटिहौ

के सुंदरी के देस बड़ दूर

मोर बाबू, सुंदरी के देस बड़ दूर

तोर बर लानिहौं दाई रंधनी-परोसनी

अऊ मोरे बर घर के सिंगार

के मोर दाई, मोर बर घर के सिंगार।

पाँव बर ले दे दाई

बजनी पनही

चढ़े बर लिलि हंसा घोड़ा

के मोर दाई चढ़े बर लिलि हंसा घोड़ा।

भूख बर जोर दे दाई

भूखहा कलेवना

पियास बर गंगाजल

के मोर दाई पियास बर गंगाजल।

दाबे बर ले दे दाई खाँड़ा तलवार

घामे बर छतरी तनाय।


घर के आघू म मुड़ भर के बइला बंधाये हे। गैंदलाल ह बिहनिया ले बइला मन ल धो माँज के कोंड़हा-भूसा मो के कोटना म भर पेट खवाए रिहिसे। बइला मन के किन्नी ल हेर दे रिहिसे। रही-रही के बइला ल मोटर-गाड़ी कस गैंदलाल ह धोवत पोंछत राहै। कभू बइला के पेट ल थपरी मारै त कभू पीठ ल। कभू मन हो जै ते बइला के पंूछी ल मुरकेट के देखै। बइला मन सजोर रिहिसे। पूंछी के धरते भार छटपटा देवत रिहिसे। बइला के छटपटई ल देख के गैंदलाल हा खुस हो जवै कि अब बरात जाय बर कोनो फिकर नइहे। गाड़ा के आघू डहार झांपी म नेंग-जोग के सामान ल धर के जुड़ा म कस के बांध दिस अउ गघरा म कुड़ा के लाड़ू ल घलो भर के थरकुलिया म तोप के पिसान के लेई म चिपका के झांपी के आघू म बांध दिन ताहन सब झिन जान डरिन कि इही गाड़ा म दूल्हा ह बइठही कहिके। बरात के तइयारी होगे। परनिया ह पंचू ल थनौरी दे के बेटा ल बहू बिहाय बर बिदा करिस। गाना गवइया मन खुसी-खुसी बरात बिदा के गीत गावत रिहिन हे -


गाँव अवधपुर ले चले बरतिया

गाँवे जनकपुर जाये

ये हो राम गाँवे जनकपुर जाये।

राजा जनक के पटपर भांठा

तंबू ल देवय तनाये

ये हो राम, तंबू ल देवय तनाये।

राजा जनक जो मिलने को आये

दशरथ अंग लपटाये

ये हो राम, दशरथ अंग लपटाए।

करे अगवानी ले जावय बरतिया

गाँव जनकपुर जावय।

गाँवे जनकपुरी के सोभा ल देखे

ब्रम्हा भये अकचकाए।

बने रसोई देवगन खाये

सखियन देवय गारी

सुभ-घड़ी सुन्दर लगिन धराये ओ

सीता के रचे हे बिहावे

ये हो राम, सीता के रचे हे बिहावे।

कौन चढ़े सुख-पलना

ये हो राम कौन चढ़े सुख पलना

काखर सिर म अहो चंवर होवत हे

कौन टिकोरै बाने

ये हो राम, कौने टिकौरे बाने।

राम जी चढ़िथे डाँड़ी अउ डोलना

ओ भरत चढ़े सुख पलना

ये हो राम, भरत चढ़े सुख पलना।

दशरथ के सिर में चंवर होवत हे

ओ लखन टिकौरे बाने

ये हो राम-लखन टिकौरे बाने।

गाँव जनकपुर में बाजे बंधावा

ओ घर-घर मंगल गाये

ये हो राम घर-घर मंगल गाये।


सात


बरात निकलगे। पंचू के संगवारी मन तो बड़ा सान से बरात जाय बर निकलगे। बिसेलाल दशरथ कस लागत राहै काबर कि आज ओकर राम कस बेटा ह सीता कस बहू बिहाय बर जावत हवै। सबो बराती ल रेंगाय के बाद बिसेलाल ह आखरी वाले खासर म बइठगे। बराती मन बेलौदी ले बिरेझर जाय बर बिदा होगे। बिहनिया ले निकले रिहिसे तेहा रतिहा आठ बजे बरात ह बिरेझर पहुंचगे। समलिया ह बरतिया मन के रद्दा ल देखत रिहिसे। बरात के बिरेझर पहुंचते भार समलिया ह सब जोरा म लग जथे। सबले पहिली तो बराती मन बर पानी के बेवस्था करिन। ओकर बाद चाहा पियइन। घंटा भर बाद बराती मन ल खाना खवइन। ओकर बाद वर पक्ष अउ वधु पक्ष वाले मन परघौनी के तइयारी करिन। अधरतिया के बाद दुनो डहार के बजनिया मन परघौनी के रन म जाए बर तइयार होगे। ढेड़हा पंचू ल तइयार करिस। धोती, कुरता अउ मउँर ल बने पहिरा देथे। सब बराती मन परघौनी के आनंद लेबर तइयार होगे।

अपन एकलौता बेटा के बिहाव म बिसेलाल ह कोनो किसम के कसर नइ छोड़े रिहिस। तभे तो बाजा के संगे संग अखाड़ा घलो लेगे रिहिसे। परघौनी देखे बर गाँव वाले मन के सकलाना सुरू होगे। सामाजिक बाजा ह सबके जोस ल धीरे-धीरे बढ़ावत रिहिसे। अखाड़ा वाले मन अपन करतब देखावत रिहिन हे। चार-चार ठन गेस बत्ती लेगे रिहिसे। ओकर बाद घलो अखाड़ा वाला मन मसाल जला के अखाड़ा के करतब देखावत रिहिन हे।

वधु पक्ष वाले मन घलो बरात परघाय के तइयारी म लगगे। समधीन भेंटके सामान-दुबी, हुम, पींयर चाँउर, धोती अउ नरियर ल पर्रा म धर के छेना आगी अउ लोटा म पानी धर के बरात परघाय बर निकलथे। बजनिया मन घलो सुंदर सम्हरे राहै। नाम्ही बजनिया रिहिन हे। बजनिया मन बराती पक्ष वाले बजनिया मन ल जोरदार टक्कर दिही कहिके जानत रिहिन हे।

बरात स्वागत के गीत गावत-गावत खइरखा डाढ़ म जऊन करा बराती मन रिहिन हे वो मेर वधु पक्ष वाले मन बराती परघाये बर पहुंचिन।


कै दल आवथे

हथियन-घोड़वा

कि कै दल आवथे बराते

कि अब देखो हो ललना

दस दल आवथे हथियन घोड़वा

कि बीस दल आवथे बराते

कि अब देखो

कि अब देखो हो ललना

कामा समोखिहवं

हथियन-घोड़वा

कि कामा समोखिहवं बराते

कि अब देखो

कि अब देखो हो ललना

पोगरी समोखिहवं 

हथियन-घोड़वा

बराते बगरी समोखिहवं

कि अब देखो

कि अब देखो हो ललना।


ओती अखाड़ा देखइया मन के भीड़ लगगे एती समधीन भेंट सुरू होगे। गीत गवइया मन परघनी गीत गा के बरात ल परघावत रिहिन हे -


हाथ धरे लोटिया

खांधे म धरे पोतिया

सगरी नहाय बर चले जाबो।

पनिया हिलोरे

गौरी नहावय

परगे महादेव के छाही।

सात समुन्दर ल

तैं धोये महादेव

परगे महादेव के छाही।


एकर बाद वधु पक्ष वाले मन बराती मन ल हाथ देखा-देखा के भड़े के सुरू करिन -


नदिया तीर के पटुवा भाजी

उल्हवा-उल्हवा दिखथे रे

आये हे बरतिया ते मन

बुढ़वा-बुढ़वा दिखथे रे

आये हे...

नदिया तीर के पटुवा भाजी

पटपट-पटपट करथे रे

आये हे बरतिया ते मन

मटमट-मटमट करथे रे

आये हे...

नदिया तीर के लुदवा मछरी

लुद-लुद, लुद-लुद करथे रे

बेलौदी वाले टूरा मन ह 

मुच-मुच, मुच-मुच करथे रे

बेलौदी वाले...


समधी भेंट होय के बाद समलिया ह चलव कहिथे ताहन फेर धनसिंग ह बिसेलाल के हाथ ल धर के आघू डहार लेगथे। पंचू ल ढेड़हा साइकिल म बइठार के धीरे-धीरे आघू डहार बढ़थे। बजनिया मन दूल्हा के आघू-आघू कुड़ुक दुधनुक, नुक, नुक बजावत जाथे। बेलौदी गाँव के बजनिया मन अतराब म जाने-माने राहै। बरन ह कूद-कूद के सिंग ल बजावै ते लोगन मन देखते रहि जवै। गौतरिहा ह दफड़ा ल जब किंजर-किंजर के बजावत-बजावत घराती डहार के दफड़ा वाले ले दफड़ा जब टेका के बजइस ते हटे के नावे नइ लेवत रिहिसे। बीरसिंग ह थोकिन पी डरे रिहिसे। बीरसिंग ह जो नाचिस, जो नाचिस कि बिरेझर वाले मन बीरसिंग परी उपर मोहागे। फूलसिंग ह झांझ बजावत घुम-घुम के नाचे ते देखइया मन के मन ह नाचे बर धर ले राहै।

परघई सुरू होइस अधरतिया ले तेह गली-गली, घुमत-घुमत पहागे। काबर कि चार कदम चले ताहन फेर रोक देवै। लड़की पक्ष वाले बजनिया मन जानत रिहिसे कि बरतिया मन के जोस बढ़े हे इंकर मन संग जादा ताव देखाना ठीक नइहे कहिके बरतिया मन के बाजा के संग म सुर ल मिलावत भर रिहिन हे।

धनसिंग पहिलिच्च ले बजनिया मन ल समझा दे रिहिसे कि हम्मन ल बरतिया मन ल बने परघाना हे। कोनो किसम के विघन बाधा झन होवय कहिके। तभो ले बराती मन हुदरे कस कर देवै। ले-दे के उलझत-उलझत सांत होय रिहिन हे। बराती मन ल परघा के घर तक लइन, दूल्हा ल मड़वा छुवइन ताहन बराती मन के गोड़ धोवइन, ओकर बाद दूल्हा राजा ल जेवनास घर म जघा दे दिन। गरमी के मौसम रिहिसे तेकर सेती कलिन्दर ल घलो चान-चान के दे रिहिन हे ताहन चाय-पानी पियईन।

एती दूल्हा राजा के नेंग-जोग सुरू होगे। घर के ढेड़हीन सुवासिन मन लाल भाजी खवाये बर अइन ताहन फेर सब नहाए खोरे बर तरिया गिन।

मंझनिया पंगत के बाद बड़े बिहाव के नेंग-जोग सुरू होइस। साखोचार पढ़े गिस। महाराज ह वर-वधु ल सात वचन के मंत्र दिस जेकर ले जिनगी के गाड़ी ह सुग्घर चल सकै। वर-वधु के गांठ ल ढेड़हीन ह जोड़ दिस ताहन भाँवर सुरू होथे-


मधुरि-मधुरि पग धरव हो

दुल्हिन नोनी

तुँहर रजवा के 

अंग झन डोलै हो...

मधुरि-मधुरि पग धरव हो

दूल्हा बाबू 

तुँहर रनिया के

अंग झन डोलै हो...

सुरहिन गईया के

गोबर मंगई के

ओ तो खूंट धरि

अंगना लिपइले हो....

अगरी चाँउर के

बगरी पिसाने ओ

ओ तो मोतियन चौंका पुराये ओ...

झांके देखथे दुल्हा बाबू

रानी काहे कुन

ढारथव आँसू हो...

दाई अऊ ददा रानी

जनम देहे ओ

ओ तो रूप दिये भगवाने ओ...

खाबो कमाबो

रानी राजन करिबो ओ....

दाई ददा के नाम जगाबो ओ....


नेंग के मुताबिक गीत गवइया म सोहाग गीत ल गइन -


बांस लागे पोंगरी, पुरावन लागे कलगी

नोनी के मांघ म सुहाग भरव न

सबके सुहाग बहिनी अइसन-तइसन

आजी दाई के सुहाग म सुहाग बाढ़े न

बांस लागे पोंगरी, पुरावन लगे कलगी

नोनी के मँघ म सुहाग भरव न...


सबके सुहाग बहिनी अइसन-तइसन

मामी के सुहाग म सुहाग बाढ़े न

बाँस लागे पोंगरी, पुरावन लागे कलगी

नोनी के माँघ म सुहाग भरव न...


सबके सुहाग बहिनी अइसन-तइसन

फूफू के सुहाग में सुहाग बाढ़े न

बाँस लागे पोंगरी पुरावन लागे कलगी

नोनी के माँघ में सिन्दुर भरव न।


भाँवर के बखत सवाना ह अइसे धीरे-धीरे रेंगे जानो मानो महीना भर ले खाय नइहे। ओकर पीछू-पीछू हलु-हलु रेंगत रेंगत पंचू ह असकटा गे रिहिसे। एक घाँव तो खिसिया के पीछू डहार ले पंचू थोकिन ढकेल घलो दे रिहिसे।

भाँवर किंजरे के बाद दूल्हा-दुल्हिन मन ल मड़वा म बइठारथे ताहन फेर  टीकावन सुरू होथे। आज तो धनसिंग के घर ह जनकपुर लागथे। सीता कस बेटी ल बिदा करे बर असीस के रूप म भेंंट स्वरूप टीकावन टिकथे। गीत गवइया मन टीकावन गीत गाये के सुरूआत करथे -


कोन तोर टिके नोनी

अचहर-पचहर ओ

कोन तोर टिके धेनु गाय

कि अवो नोनी कोन तोर..

दाई तोर टिके नोनी अचहर-पचहर

ददा तोर टिके धेनु गाय

कि अवो नोनी ददा तोर...

कोन तोर टिके नोनी

लिलि हंसा घोड़वा वो

कोन तोर टिके कनक थार

कि अवो नोनी कोन...

भईया तोर टिके नोनी

लिलि हंसा घोड़वा वो

भऊजी तोर टिके कनक थार

कि अवो नोनी भऊजी तोर...


गीत के चलत चलत सवाना के दाई अउ ददा दुनो झिन पचहर दाइज (थारी, लोटा, बटकी, गिलास, कोपरा) टिक के अपन बेटी के सुखद गृहस्थी बर असीस देबर आथे। उही समय गीत गवइया मन दाइज गीत गाथे -


लकठा में खेती झन करबे मोर दाई

हाय-हाय मोर दाई

दूरिहा म बेटी झन देबे वो

लकठा के खेती गरूवा खाथे मोर दाई

हाय-हाय मोर दाई

दुरिहा के बेटी दुख पाये वो

हाय-हाय मोर...


इही धरम ले धरम हे वो, ये वो मोर दाई

फेर धरम कहां पाबे वो

मोर दाई फेर ये वो...

लागत रेहेव छुटि डारेव वो

ए वो मोर दाई फेर धरम नइ तो पाबे वो।

चढ़ती हे बेरा लगिन के वो, ये वो मोर दाई

उतरती हे बेरा धरम के वो

ए वो मोर दाई उतरती...

सीता ल बिहावे सिरी रामे वो, ये वो मोर दाई

ए वो मोर दाई सीता ल...

हलर-हलर मड़वा डोले ओ, ये वो मोर दाई

खलर-खलर दाइज परै वो

ए वो मोर दाई खलर...

चटक-चटक चुमा ले ले वो, ये वो मोर दाई

चना खाये बर पइसा देबे वो

ए वो मोर दाई चना खाये बर...


नता रिस्ता, सगा सोदर, हितु-पिरितु, नेवतहार अउ मित-मितानी मन असीस स्वरूप टिकावन टिक के दूल्हा-दुल्हिन के माथ म चाँउर टिकै।

टिकावन के समापन के बाद थारी म टिकावन के सबो रूपिया पइसा ल सकेल के थारी म रख के धनसिंग ह बिसेलाल ल सौंपत कथे-हम तुहँला का दे सकथन, समधी महराज! सोला आना हमर बेटीच्च ल जानव। वो बखत माहोल गमगीन हो जथे। सबके आँखी ले दुख के आँसू ह तरतर-तरतर शिवनाथ नदिया कस बहे बर धर लेथे।

टिकावन के चलते-चलत, दाइज डोर के परते-परत सारी के नता मन ह दूल्हा के पनही ल लुका देथे। मड़वा ले उठे के बाद दूल्हा के पनही ल पहिराये बर ढेड़हा ह खोजथे। पनही ल एती-ओती खोजत देख के खल-खल हाँसे बर धर लिन। ढेड़हा कथे-देवव जूता ल। सारी मन कथे-पाँच रूपिया देबे तब देबोन। ढेड़हा कथे-ले त सवा दु रूपिया देबोन। नोनी मन ह नइ देवन कहिके मुड़ी ल हला देथे ताहन पंचू ह खिसिया के कथे-सुका कम चार रूपिया म मानौ नही ते तुँहर बहिनी ल राखौ। कहिके उठे बर धर लिस। सवाना ह अपन ममा-फूफू के बेटी मन के मजा लेवई ल देख के मने-मन कुलकत राहै। बेटी वाले कथे-दे देव बेटी, एके घांव थोरे आय दमांद ह फेर आही ताहन वसूल लेहू। तब कहूँ जा के नोनी मन जूता ल लान के दिन।

टिकावन ले उसले के बाद बराती मन ल पंगत खवाथे। धनसिंग ह अपन डहार ले सक्ति के मुताबिक बेवस्था करे रिहिसे। कोनो किसम के बेटी बर गरू झन होवय कहिके। सबो के धियान रखे रिहिसे। लाडू़ू, पापर, सोंहारी, अइरसा अउ खीर ल तो चाँट-चाँट के खइन बराती मन।

ढकारत उठिन पँगत ले। सौंप-सुपारी खावत काहत-मजा आगे यार खाना म। रात बारा बजे के बाद बिदाई कार्यक्रम सुरू होइस। गीत गवइया मन बिदा गीत गाए के सुरू करीन -


आजि के चंदा नियरे ओ नियरे

दाई मैं कालि जाहंू बड़ दूरे

वो दाई मैं कालि जाहूं बड़ दूरे।

अपन दाई के राम दुलौरिन

ये दाई मोला

छिन भर कोरा म ले ले

आज के चंदा...


अपन काकी के राम दुलौरिन

ये काकी मोला

छिन भर कोरा म ले ले।

आज के चंदा...


अपन मामी के राम दुलौरिन

ये मामी मोला छिन भर गोदी म ले ले

आज के चंदा...


अपन फूफू के राम दुलौरिन

ये फूफू मोला छिन भर कोरा म ले ले

आज के चंदा...

अपन दीदी के राम दुलौरिन

ये दीदी मोला छिन भर कोरा म ले ले

आज के चंदा...


जनम जनम गांठ जुरगे

ये दोसी जनम-जनम गांठ जुरगे

जोरे गठुरी झन छूटे

ये दोसी जोरे गठुरी झन छूटे

दोसी ल देबो नवा धोती

जोरे गठुरी झन छूटे

ये दोसी...

जनम-जनम गांठ जुरगे

जोरे गठुरी झन छूटे

ये दोसी जोर गठुरी झन छूटे।


सवाना ह अपन मइके के आखिरी बिदाई के रूप म चाँउर ल पीछू डहार छीतत दूल्हा संग म मुहाटी ले बाहिर निकलिस। जइसे सवाना मुहाटी ले बाहिर निकलिस घर-दुआर, गाँव-गली, गाय-गरूवा, नता रिश्ता, हितु-पिरीतु सब फफक-फफक के रो डरिन। जब धनसिंग ह दहाड़ मार के रोइस ते अइसे लागत रिहिसे जइसे बादर ह फटत हे। धनसिंग ल बड़ा मुस्किल से समलिया ह सम्हालिस। सवाना के दाई रोइस ते अइसे लागे धरती के छाती चिरागे हे। बेटी बिदा के दुख भारी ए। ए दुख ल जेकर बेटी हे उही महतारी-बाप जान सकथे। पंचू ह सवाना ल बिहा के आघू डहार बढ़त रिहिसे। ओइसने म रोवत-रोवत एक झिन सियान ह कथे-बेटा जात ल तो एके घाँव जमराज ह लेगथे फेर बेटी जात ल दू घाँव ले। एक घाँव दाई-ददा के कोरा ले दमाँद ह अउ दूसर घाँव ससुरार ले जमराज ह लेगथे तभे तो कथे न दमाँद लेगे ते लेगे, जमराज लगे ते लेगे।

माहोल गमगीन हो जथे। बेटी बिदाई के संगे-संग टिकावन के सामान ल झांपी म भर के गाड़ा म जोर देथे। खासर म दूल्हा-दुल्हिन मन बइठथे। संगे-संग दुल्हिन के मन ल हरू करे बर दू-तीन झिन लोकड़हीन घलो जाथे। संग म सवाना के डोकरी दाई ह घलो लोकड़हीन बन के गिस।

खासर म बइठे-बइठे पंचू ह गोसइन पा के मने-मन बिक्कट खुस राहै फेर सवाना के मन ह तो पति पाए के सुख अउ महतारी-बाप ल छोड़े के दुख ल भोगत रिहिसे। बिसेलाल के मन म नवा बहुरिया ल बिहा के लेगे के उछाह ह भादो के बादर कस घपटत रिहिसे।


आठ


सवाना ल बिहा के बराती वापिस आगे। पीपर छइंहा म चद्दर जठा के दूल्हा-दुल्हिन ल बइठार दिन। गरमी के दिन राहै। लइका मन जादा गरमाय झन जवै कहिके लोकड़हीन मन बिजना ले धुकत राहै। पंचू ह करिया बानी के रिहिसे। मौका पा के सारी मन अपन भाँटो ल ठगत रिहिन हे। हरदी पानी पाए के बाद भाँटो ह तो सूरजमुखी कस ओगरागे कहिके सब झिन खलखला के हाँस डरिन। घर म पंचू के दाई ह ढेड़हीन-सुवासीन मन ल कहिथे-चलो तइयारी करौ। सुनते भार सब झिन गाना गावत परघाय बर जाथे। सब झिन बहू ल देखे बर कुलकत राहै। सवाना ह तो लाखों म एक रिहिस। फकफक ले गोंदाफूल कस ओग्गर रिहिसे। गोरी-नारी बिक्कट सुन्दर। सब झिन बहू ल देखे के बाद पंचू के दाई ल काहय-तुंहर घर चंदा अवतरे हे चंदा। बहू के आए ले अब तुंहला कंडिल बारे के जरूरत नी परै। जिही डहार तोर बहू जाही उही डाहर अँजोर बगरही। पंचू के दाई परी कस सुन्दर बहू पा के खुस राहै। जउने देखै तउने बहू के बिक्कट बड़ई करै।

बजनिया मन रेंगाती पार बजइन ताहन ढेड़हा अउ ढेड़हीन मन ह दूल्हा-दुल्हिन ल कनिहा म पा के लइन। ए समे तो बेलौदी ह अयोध्या कस लागे। अइसे लागे जानो-मानो सीता ल बिहा के राजा राम लाये हे।

दूल्हा-दुल्हिन ल लान के घर के मुहाटी करा उतारिन ताहन घर वाले मन मुहाटी म पानी ओरछीन, आरती उतारिन। ओकर बाद दूल्हा-दुल्हिन घर म पाँव धरिन। दूल्हा-दुल्हिन ल माई खोली म जघा दिन। उहें दतोन मुखारी करे के बाद नास्ता दिन ताहन खाना खइन। मंझनिया दूल्हा-दुल्हिन मन ल कोपरा के लाल पानी म पइसा डार के खेल खेलवइन। पइसा खेले के बेर घेरी-बेरी सवाना जीत जवै। एह तो पहिलिच्च ले चले आवत हे। सियान मन कथे-नारी ले देवता हारी। त पंचू ह कहाँ ले जीततीस? एती दूल्हा-दुल्हिन मन खेल म भुलाय रथे ओती चौथिया आए के खभर लग जथे।

बिसेलाल ह अपन गोसइन ल कथे-अरे भई चौथिया परघाये के तइयारी करौ। इमन पर्रा म नरियर, लुगरा, हुम जग, दुबी, पींयर चाँउर धर के चौथिया परघाय बर गिन। उहें चौथिया परघाय के बेरा दुनो डहार ले एक-दूसर ल भड़े बर धरिन। दुनो डहार ले भड़ौनी गीत चलिस ते अइसे लगे जानो-मानो माईलोगन मन के महाभारत मात गेहे। एक डहार चद्दर नही ते कमरा ल जठा के समधी भेंट होइन। दुसर डहार समधीन भेंट होइन। एक-दुसर के खांध म लुगरा ल डारिन। एक-दुसर के हाथ म नरियर धरइन। एक-दुसर के कान म दुबी खोंच के समधीन भेंट होइन। समधीन भेंट केे बखत तो एक-दूसर ल हला घलो डरै। संगे संग भड़ौनी गीत गा-गा के माहोल ल मजेदार बना दे रिहिन हे। भेंट पलागी करे के बाद सवाना के दाई के अंगरी ल धर के पंचू के दाई ह धरिस ओती बिसेलाल ह धनसिंग के अंगरी ल धर के परघावत घर डहार लइन। चौथिया वाले मन घराती ल अउ घराती वाले मन चौथिया आय माईलोगन मन ल भड़त-भड़त आघू बढ़िन। घराती डहार के माईलोगन मन भड़ना सुरू करिन -


अइसन समधिन ल

घेरी-बेरी बरजेंव

घेरी-बेरी बरजेंव

तें गाड़ा रवन झनि जाबे समधिन

गाड़ा रवन बिच्छदी मारे

अइसन समधिन

ओकर भाई बड़ा रँगरेला बड़ा रँगरेला

कि बिच्छी के झार उतारे, भाई रे

बिच्छी के झार उतारे

अइसन समधिन

बड़ा कलमहिन, बड़ा कलमहिन

ते हाय दाई हाय ददा कहिथे समधिन ह

हाय दाई हाय ददा कहिथे...


चौथनीन मन घराती डाहर के माइलोगन मन ला भड़ना सुरू करिन-



हमर समधिन

रउतइन बने हे, रउतइन बने हे

मही ले ले, दही ले ले कइथे

समधिन ह मही ले ले, दही ले ले कहिथे

ओ तो मोला देखन नई भाये।

हमर समधी

मरार बने हे, मरार बने हे

भाजी ले ले, भाटा ले ले कहिथे

भाजी ले ले, भाटा ले ले कहिथे

ओ तो मोला देखन नइ भाये

मोला देखन नइ भाये

अइसन समधीन

कंडरिन बने, कंडरिन बने हे

सुपा ले ले, टुकना ले ले कइथे समधिन ह

मोला देखन नइ भाये

हमर समधी

कोस्टा बने हे, कोस्टा बने हे

धोती ले ले, लुगरा ले ले कइथे समधी ह

धोती ले ले, लुगरा ले ले कइथे

ओ तो मोला देखन नइ भाये समधी ह

मोला देखन नइ भाये...


चौथिया मन ल परघाय के बाद इंकर सुवागत म लगगे। इमन ल खाना खवाये बर पंगत म बइठइन। गाँव म 'धरम टीका’ बर खभर भेजवा दिस ताहन फेर बिसेलाल अउ परनिया पींयर चाँउर ले टिकावन टिक के असीस देथे अउ अपन डहार ले बेटा-बहू ल उपहार असीस रूपिया धराथे। ओकर बाद घर के कका-काकी, ममा-मामी, फूफा-फूफू अउ सब नता-रिस्ता मन दूल्हा-दुल्हिन के चरन ल दूध म पखार के अमरित कस पीयै ताहन टिकावन टिकै। चौथिया आये रिहिन तहू मन 'धरम टीका’ म टिकावन टिक के असीस दिन। रात कन चौथिया मन ल पंगत दिन। बिसेलाल अतेक जोरदार बेवस्था करे रिहिसे कि चौथिया आय रिहिन उमन देख के काहय-गाँव के गौटिया ए वो, गाँव के गौटिया ए। सवाना ह बड़ भागमानी ए, गौटिया घर के बहू बनेहे वो, बड़े घर के...।

मुंदराहा कना चौथिया बिदा करथे। अब तो पंचू के मया ह सवाना संग बंधागे रिहिसे। सवाना के रूप ह राधा कस मनमोहनी रिहिसे। जेकर रूप म पंचू ह मोहागे राहै। अब तो एको घड़ी ओला छोड़े के मन घलो नइ रिहिसे। फेर परम्परा के आघू माथ नवाय बर परगे। चौथिया वाले मन ह अपन बेटी ल लेवा के लेगे के बेर धनसिंग किहिस-दु दिन बाद दमाँद ल 'पींयर’ धोवाए बर पठो दुहू। ओतना म बिसेलाल ह कथे-पहिली जइसन बात होय हे, हम तो एसो बहू हाथ के पानी पिबोन केहे रेहेन। बेटा ह पींयर धोवाए बर जाही उही दरी बहू ल घलो बिदा कर दुहू। सवाना के ददा ह कथे-केहे बर तो केहे रेहेंव समधी महराज फेर अभी हमर बेटी ह नदान हे। बिसेलाल कथे-अइसे लागथे समधी महाराज बिहाव के पहिली बेटी ह बाढ़े रहिथे। बिहाव के बाद बेटी छोटे हो जथे। धनसिंग ह बेटी बर जादा गरू नइ करना चाहत रिहिसे तभे तो समधी के भाव ल राखत कहि दिस-ले भई, ईश्वर के इही मरजी हे त हम्मन हमर दुलौरिन बेटी के बिदा ल घलो कर देबोन। दमाँद ल पठो दुहू। बिसेलाल के मन म उमंग छा जाथे। फेर पंचू के थोथना ह उदास राहै। मैं दु दिन ला कइसे काटहूँ कहिके। सवाना के मन ह घलो कमल फूल कस छतराए बर धर लिस। दु दिन बाद मोर जोड़ी लेवाए बर आही कहिके। थोथना भले अइलाए भाजी कस दिखत रिहिसे फेर मन म मया के आमा मऊरत रिहिसे। पंचू के दाई घलो मने-मन खुश राहै-बहू आही ताहन मोर बूता हल्का हो जही कहिके। गोठ बात होय के बाद चौथिया ल बिदा करिन।


नौ


दु दिन बाद पंचू ह पींयर धोवाए बर गिस। संग म रामरतन ह लोकड़ाहा बन के गिस। दुनो संगवारी ह खासर म बइठ के चल दिन। रद्दा म रामरतन ह पंचू ल कथे-भऊजी आहि ताहन मोला भूला तो नइ जाबे यार? त पंचू ह कहिथे तेह मोला भूला गेस का तोर गोसइन आइस ताहन? रामरतन कथे-नहीं। पंचू कथे-त फेर जब तैं मोला नइ भुलायेस त मैं तोला कइसे भूलाहूँ।

थनौद करा पहुँचिन ताहन भाँठा म पानी किसाप करे बर रूकिन। उही मेर रामरतन ह बीड़ी सिपचइस। एक ठन ल सौंजिया ल दिस अउ एक ठन ल पंचू ल दिस ताहन संघरा बीड़ी पिइन। पीये के बाद बिरेझर जाय बर आघू बढ़िन। उमन बेरा राहत बिरेझर पहुंचगे। उमन ल देखते भार आगे-आगे कहिके धनसिंग ह अपन गोसइन ल कथे। ओकर गोसइन ह कथे-काह आ गे, का हा? मार हफरत हस आवत हस, जानो मानो हाथी आगे तइसे। धनसिंग ह कथे-हाथी नोहे वो, दमांद ए दमांद। दमांद के नाम सुनते भार पंचू के सास ह धकर-लकर मुड़ी ल ढाकिस अउ रंधनीन खोली चल दिस, पानी लाने बर। एती धनसिंग ह धकर-लकर खटिया ल जठा के चद्दर ल बिछा देथे। धनसिंग ह पंचू ल कथे-कोनो किसम के परेसानी तो नइ होइस न। पंचू हा कथे-नही। पंचू अउ रामरतन ह धनसिंग के टूप-टूप पाँव परिन। पंचू अउ रामरतन ल सुग्घर घटिया म बइठारिस अउ खुदे धनसिंग ह घलो खुरसी म बइठ के हाल-चाल ला पूछन लागिस। सवाना के दाई ह लोटा म पानी धर के आथे-ए लेव पानी, गोड़ हाथ धो लेव कहिके पानी दे के खड़े हो जथे ताहन पंचू अउ रामरतन ह पाँव परथे। सवाना के दाई पूछिस-अउ कइसे, सब बने बने हे न, समधी महराज अउ समधीन कइसे हे? पंचू ह जवाब देथे-बने हे। ठउँका ओतके बेर सवाना ह लजावत सगा मन के पाँव परिस, बिहान दिन बिहनिया चाहा पानी पीये के बाद नदिया डहार बाहिर बट्टा बर गिन उही डहार ले नाहत-खोरत घलो अइन। रद्दा बाट देखाए बर धनसिंग ह एक झिन लइका ल इंकर संग लगा दे रिहिसे। नहा-खोर के घर पहुँचिन। मझँनिया खाना ऊ खा के अराम करिन। संझा धनसिंग ह सगा मन ल घुमाय बर चिन-पहिचान अउ नता रिस्ता मन घर बइठारे बर लेगिस। संझौती पहर सवाना के दाई ह दमाँद आ हे कहिके तेलई बइठगे। का बरा ल कहिबे ते का सोंहारी अउ का भजिया ल। आज तो रोटी-पीठा के मारे झेंझरी ह घलो उकुल-बुकुल करत रिहिसे। आलू, चना, लफरा-लफरा लाली चेंच जुन्ना मइरका के अथान। बेवस्था ल देख के अइसे लागे दमाँद नही बल्कि भगवान ल भोग लगाना हे।

मुँधियार कना धनसिंग ह पंचू अउ रामरतन ल गाँव-गली डहार ले घुमा के लइस। गाँव म गोठ होय बर धर लिस। सवाना के गवना कराए बर आए हे तइसे लागत हे। सवाना के पठौनी होवइया हे। घर म आ के बइठते भार धनसिंग ह आरो करिस-जेवन के तइयारी होय हे कि नही। आरो करिस त तइयारी होगे रिहिसे। धनसिंग ह हुँत करइस-सवाना खाय बर पानी दे वो। सवाना ह दु ठन फूलकसिया लोटा म पानी लान के मड़इस-ए दे पानी। धनसिंग ह कथे-ओ बखरी डहार हाथ गोड़ धो लेव बाबू कहिके धनसिंग ह घलो लोटा धर के बखरी डहार गिस। इंकर हाथ-गोड़ के धोवत ले सवाना अउ ओकर दाई ह परछी म सरकी अउ पीड़हा ल ओरी पारी चार ठन रख डरे रिहिन हे। इमन हाथ-गोड़ धो के, आ के सरकी म बइठके पीड़हा के बाजू म लोटा ल राखिन। सवाना के दाई ह लोटा मन म पानी लान के डारिस ताहन सवाना ह खाना ल पोरसिस। रामरतन अउ सौंजिया ह तो खाय बर धर लिस फेर पंचू ह लजाय कस चिख-चिख के खावत रिहिसे। पंचू के लजई ल देख के धनसिंग कथे-देखो रे भई लजाय म पेट नइ भरे, खाये ले पेट भरही। लजाहू ते तुंहर पेट ह भूख मरही। सुन के पंचू के धीरे-धीरे खवई के रफ्तार ह बढ़िस। साग ह अतेक सुहावत रिहिसे कि खा के अँगरी ल चाँटत ढकारत उठिन। तब धनसिंग ह मने-मन गुनै-लइका मन हनिया के खा तो डरे हे फेर पचो पाही ते नही। रात भर धनसिंग ह छटपिट-छटपिट करत सुतिस काबर हिरदे के करेजा ल बिदा करना रिहिसे। पंचू ल घलो नींद नइ आवत रिहिसे। काबर कि नवा-नवा बिहाव ए। सवाना ल देखे बर मन ह चुटपुटावट रिहिसे।

बिहनिया चाहा पानी पीये के बाद धनसिंग ह चक घुमाए बर लेगे। एती सवाना के दाई ह सवाना ल धर के राजनांदगाँव के बाजार गिस। उहें अपन दुलौरिन बर सिंगार के सामान बिसइस। पठौनी के जोरा करिस। नवा नवा चूरि-चाकी पहिरइस। पंचू, रामरतन अउ सौंजिया दु-तीन दिन ले रिहिस। रोज खायेके नेवता ताय। एक दिन तो पंचू के पेट बिगड़गे। आमा जूड़ी के सिकायत होगे। ले दे के सम्हलिस। इतवार के दिन पठौनी होना रिहिसे। पठौनी बर गाँव म इतिल्ला करवा दिन। नता रिस्ता मन सकलाय बर धरीन। गाँव के मन अपन दुलौरिन बेटी ल बिदा करे बर सकलावत रिहिन। खाना ऊ खा के पंचू घलो नवा धोती कुरता, खांध म गमछा डारे तइयार होगे। रामरतन घलो नवा धोती कुरता पहिर के तइयार होगे। नता म सारा ह दु ठन मीठा बंगला पान ल खवइस। इमन पान के सुवाद ल लेवत गिन। ओती सवाना के आँसू ह तरतर-तरतर ढरत गिस।

जइसे-जइसे बेरा ढरकत रिहिसे, सवाना बर मइके छोड़े के समे घलो ढरकत रिहिसे। ढरकती बेरा म पंचू के हाथ म लाल रंग के धागा बांधिस ताहन सवाना के दाई ह बोम फार के रो डरिस-तैं तो आज ले मोर बर सगा बन गेस बेटी ऐ हें हें... मैं तोर बिना दिन ल कइसे बिताहूँ बेटी ऐ हें हें...। ओती सवाना घलो भेंंट लाग के बोम फार के रो डरिस-तैं तो मोला सगा बना दिये दाई, ए हें हें...। मोला तैंह अपन कोरा ले काबर बिदा करत हस दाई, ऐ हें हें...। फूफू ह सवाना के मुड़ी म नवा लुगरा ढांक के भेंट लगाना सुरू करिस। सब झिन सवाना के संग गुजारे दिन ल सुरता कर-कर के रोवै, भेंट लागे के बाद संग छोड़वनी, जेकर ले जतना बन जय ओतका सवाना ल धरावत जावै। कोनो रूपिया पइसा धरावै, त कोनो साबुन, कोनो टिकली, त कोनो नकपालिस त कोनो ब्लाउज के कपड़ा त कोनो लुगरा भेंट कर-कर के सवाना के बिदा करत रिहिन। ओतके बेर एक ठन घटना घटगे, खइरखा डाढ़ म। ठउँका गुर पानी पियाए के बेरा होय रिहिसे। ओइसने म दु ठन गोल्लर ह लड़त-लड़त भीड़ म अभरगे। डर के मारे अपन-अपन जान बचाये बर जतना झिन पठौनी बर सकलाय रिहिन हवै ओमन सब झिन भगागे। ओकर बाद फूफू ह-ले बेटी तोर भाई संग भेंट लाग ले, किहिस। ठउँका ओतके बेर गोल्लर मन भगदड़ मचा दिस। बिचारी सवाना के तो मुड़ी ढकाये रिहिसे। फूफू ह ओला धर-धर के रिस्ता नता ल बतावत-बतावत भेंट लगावत रिहिसे। फेर अपन परान के फिकर सब ल। गोल्लर के डर के मारे फूफू सवाना ल छोड़ के भागगे। पंचू के सारा ह घलो भेंट लागे बर छोड़ के सवाना ल अकेल्ला छोड़ के भाग गे। सवाना ल अकेल्ला देख के पंचू ह ओला थाम्हिस, सवाना के तो मुड़ी हा ढकाये रिहिसे। भेंट लगई म रो-रो के थकगे रिहिसे। जब पंचू ह सम्हालिस त ओला भइया होही कहिके फफक-फफक के चिल्ला चिल्ला के रोए ल धरलिस-मोला सगा आवत हे कहिबे भइया ए हें हें...। मैंह तुंहर सुरता ल कइसे भूलाहूँ भइया ए हें हें...। भइया, भइया सुन के पंचू ह चेचकार के कथे-अरे मैं तोर भइया नो हवं तोर सइयाँ अवँ सइयाँ। अरे गरूवा ल बरदिहा छोड़ दिहि ते छोड़ दिही फेर गोसइया थोरे छोड़ही। धनसिंग, गनपत अउ दु-चार झिन सियान मन हुर्र रे-कहि के गोल्लर मन ल खेदारिन। माहोल ल सांत करइन ताहन फेर सब सवाना ल सम्हालिन। एकर बाद सवाना ल ओकर भाई ह गुर पानी पियइस ताकि जिनगी ह मीठे-मीठ, सुखे-सुख बितै कहिके।

तब तक ले फूल वाले सन्दूक ल अउ जोरन के सामान ल रामरतन खासर म बाँधिस। खासर के पीछू म पंचू अउ सवाना बठिन ताहन हर्र... हर्र... काहत बइला ल हांक देथे। छांकड़ा बछवा के घांघरा ह पंचू अउ सवाना के नवा जिनगी के स्वागत म बाजत कुलकत रिहिन हे ताहन बछवा मन अपन मालिक मालकिन ल देख के उँकर पाँव के रफ्तार ह अऊ बाढ़गे। काबर कि एती तो इही मालकिन के सेवा बजाबो तब मेवा पाबो कहिके।

गाँव ले बिदा होइस, पंचू सवाना ल गवना करा के बेलौदी जाय बर आघू बढ़गे। एती धनसिंग अउ सवाना के दाई के आँसू ह बेटी बिदा के दुख म थमबे नइ करै। सगा मन ढांढस बंधावत उमन काहै-कइसे करबे सवाना के दाई, हमु मन तो बेटी बिदा करे हन। ए तो विधि के विधान ए, एक दिन तो हमु मन ल बिदा करे रिहिन हे। त हमु मन ल तो बेटी बिदा करे बर परही। दुनिया म कन्या दान ले बड़े दान कु छु नो हे। तुमन तो बड़ भागमानी अव कन्या दान करे हव। बेटी बिदा ले बड़े दुख महतारी-बाप बर कुछु नो हे। बेटी के घर ल बसा के धनसिंग अउ ओकर गोसइन के आँसू ह कम होवत-होवत ले दे के थम्हिस। तभो ले सवाना के सुरता ह पीरा ल उल्हो देवै। धनसिंग ल घलो दुख होवै फेर बाप ह आँसू ला पी-पी के अपन गोसइन ल समझावत, मया पीरा के गोठ गोठियावत अपन-अपन मन ल भुलवारिन।


दस


पंचू ह सवाना ल गवना करा के बेलौदी आ गे। गाँव भर जानबा होगे। सब झिन ल नवा बहुरिया देखे के ललक राहै। खेत खार, नदिया-नरवा अउ गली खोर ल सवाना के सास ह देखइस। सुरू सुरू म सवाना के सास ह अपन बहू के संगे-संग अइस-गिस। नवा बहुरिया ह मुड़ी ल ढाके राहै। त बहू देखइया मन घलो बहू ल चाह के घलो नइ देख सकै। कतनो बड़ गौटिया राहै, ओ समे घर म कहाँ के कुँआ बवली राहै। निस्तारी बर गाँव के सार्वजनिक कुँआ अऊ नहाय खोरे बर तरिया नइ ते नदिया जाय बर परै।

संझा कन तीर-तखार वाले मन सब झिन नवा बहुरिया ल देखे बर अइन। सवाना के सास ह चिन्हारी कराथे-एदे ह तोर काकी सास ए, एदे ह तोर फूफू सास ए अउ गोदावरी ह गाँव के रिस्ता म ननंद आय। इंकर मन के पाँव पर ले। सवाना ह सब झिन के टूप-टूप पाँव परिस। मुँहु देखवनी सास के नता मन ह लुगरा दिन गोदावरी ह साबुन के टिकिया अऊ आए रिहिस तेमन ह कोनो ह टिकली त कोनो ह फीता दिन। सब झिन बहू ल देख के खुस होगे। सवाना के गोरी बदन म मेंहदी ह मन ल मोहत रिहिसे, पाँव के मांहुर ह घर ला खुँटियाय कस चुकचुक ले दिखत रिहिसे। चाँदी के मोठ-मोठ साँटी, सोनहा फूल्ली, बाँहा म गरू-गरू पहँूची, टोटा म रूपिया, सुता अउ हाथ के हर्रइया ह तो सवाना ल 'ग्वालिन’ कस धरती लोक के परी बना दे रिहिसे। जब रेंगे ते सवाना के पाँव के पइरी ह छुनुर-छुनुर बाजे ताहन जान डरै बहू आवत हे। सवाना के सास ह जतना झिन बहू देखे बर आय रिहिन हे उमन ल बहू हाथ के खाना खवइस।

बिसेलाल, पंचू, रामरतन अउ पुराहुक ह घलो आज रतिहा कन संघरा सवाना हाथ के जेवन करिन। आज बिसेलाल ह मने मन गुने-सोला आना बहू पायेंव जउन ह अतेक बढ़िहा जेवन बनाय हवै। पुराहुक ह कथे भल्ले दिन के साध ह पूरा होगे कका आज भउजी के हाथ के खाना खा के। बिसेलाल ह अपन खोली म आराम करे बर चल दिस। पंचू ह पान खाए बर ठेला डहार पुराहुक अउ रामरतन संग निकलगे। घर म सवाना ह अपन सास ल भात पोरसथे ताहन ओकर सास ह कथे-तहूँ ह बइठ जा न खाए बर। सवाना कथे-नही दाई तैंहा पहिली खा ले ताहन मेंह खाहूँ। सवाना के सास ह कथे-मेंह दुसरइया नइ लेंवा। मोर पेट तो तोर आए ले अइसने भरगे हे। ले तहूँ निकाल ले। सवाना कथे-हव दाई। कहिके अपनो बर भात साग निकाल के रंधनी खोली म दुरिहा म जा के बइठ जथे। ओकर सास ह कथे-दुरिहा म काबर बइठे हस, आ तीर म। अब तो ए घर ल तँुही ल सम्हालना हे। सवाना ह अपन सास के बलई म ओकर तीर मुड़ी ढांक के खाय बर बइठ जाथे। खावत-खावत सवाना के सास ह पूछथे-कइसे सवाना, तोर महतारी-बाप के सुरता आवत होही। अपन महतारी-बाप के सुध आए ले सवाना ह खावत-खावत फफक-फफक के रोए बर धर लिस। ओकर रोवई ल देख के सवाना के सास ह अपन बहू ल चुप करावत कथे-चुप बहू चुप। अब तोला रोए के जरूरत नइहे। आज ले हम्मन तोर दाई-ददा अन। इहें तोला कोनो किसम के तकलीफ नइ होवै। अब तो पंचू ल, मोला अउ तोर ससुर ल तुहिंच्च ल सम्हाले बर परही। चुप-चुप चल मुस्कुरा चल। सवाना ह आँसू ल पोंछत मुच ले करथे ताहन ओकर सास ह कथे-अब चल खा। सवाना कथे-हव। कहिके खाय बर सुरू करथे।

सवाना के सास जेवन करके अपन बहू ल कथे-मेंह जाथैं तोर ससुर के गोड़ हाथ ल दबा हूँ। तहूँ ह बरतन-भाड़ा ल सकेल के अपन कुरिया म चल देबे। सवाना ह हव कहिके हामी भर देथे। ओकर सास ह अपन कुरिया म चल देथे ताहन खाना खा के, बरतन-भाड़ा ल सकेल के लोटा म पानी धर के अपन कुरिया म जाथे। उहें पंचू ह कण्डिल ल बार के खटिया म अलखत-कलथत रथे। सवाना पहुँचथे ताहन पंचू ह कथे-कण्डिल ल बुता दे। सवाना कथे काबर? पंचू कथे-अब तैं आगे हस त कण्डिल के जरूरत नइहे। तोर आए ले अइसे लागत हे जानो मानो हमर घर पुन्नी के चन्दा आ गे हे। सुन के सवाना लजा जथे।

दुनो के गोठ-बात म रात ह कइसे पहइस ते रात ह कम परगे। आज अलग-अलग दु आत्मा के मिलन रिहिसे। राम अउ सीता के मिलन के रात रिहिसे। आज रूखमनी अउ कृष्ण कस जोड़ी के मिलन रिहिसे। काबर कि पंचू ह सँवर गोरिया अउ सवाना ह फकफक ले ओग्गर रिहिसे।

गोठ बात म रात कइसे कटिस तेकर पता नइ चलिस। कुकरा बासिस ताहन बेरा पंगपंगागे बिहनिया सब झिन सुते रिहिन हे फेर सवाना ह घर ल बहारे बटोरे बर धर लिस। बाहरी के खरर-खरर के आवाज ल सुन के ओकर सास ह उठगे। सवाना के रोहन-बोहन चेहरा अउ उसवाए आँखी ल देख के सवाना के सास ल अपन दिन बादर के सुरता आ गे। अउ मने मन मुस-मुस करत गुनै बर धर लिस-अइसने महुँ ल पंचू के ददा ह लेवा के लाने रिहिसे त काला बताबे, महूं ह रात भर नइ सूते रहैव। ओकर बाद बिसेलाल खांसत-खखारत उठिस ताहन सवाना के सास ह कथे-पंचू ल उठाना वो-चाहा पानी पीही ते भइगे। काहत-काहत मने मन खुसी के मुर्रा लाड़ू बांधत रिहिसे। काबर जानत रिहिसे कि भगवान ह चिन्ह दिही ते साले भर म नाती खेलाय ल मिल जही।

बिहनिया ले उठ के बिसेलाल ह कोठा ल झाँखिस त नौकर ह कोठा के गोबर-कचरा ल हेरत राहै। भइँसा मन ल घर ले दुरिहा कोठार म बाँधे रिहिसे तेला बिसेलाल ह पैरा दे के ओकर मुड़ी ल सार के पेट ल थप्प ले मारिस। मालिक के मया ल देखके भइँसा मन घलो पूंछी ल हलइन ताहन बिसेलाल ह खेत डहार जाय बर निकल जथे। जावत-जावत भांवत ल कथे-गोबर-कचरा होय के बाद पंचू संग भेड़सर खार आ जहू। का हे कि अब खेती के दिन बादर ह लकठावत हे। कांटा खूंटी बीने बर लागही। भांवत ह हव कहिके मुड़ी ल हला देथे। मालिक के जाय के बाद भांवत ह कोटना म पानी-कांजी भरथे। घर अउ कोठा म पानी भरत-भरत बेरा ह जघ जथे। मुँहु ल जम्हावत कोठा म पंचू ह पहुँचथे-कइसे भांवत काम बूता होगे? भांवत कथे-हव। मालिक ह दुनो झिन ल भेड़सर खार बलाये हे। खेती किसानी के दिन आ गे हे। कांटा-खूंटी ल बिन के लेसे बर। हव कहिके चाहा पानी पी के दुनो झिन भेड़सर खार चल देथे। उहाँ बिसेलाल, पंचू अउ भाँवत ह सब कांटा ल एक जघा सकेल के माचिस मार दिन। सब कांटा-खँूटी ह भर-भर, भर-भर बरे लागिस। एती पंचू के मन ह सवाना बिना तरसे लागिस। काम बूता म थोरको मन नइ लागे। एकक कनी म बम्हरी पेड़ के खाल्हे म बइठ जवै। बिसेलाल ल समझत जादा देरी नइ लागिस। चलो आज के बूता ह होगे। नहावत-खोरत घर डहार चलबो। काली डाड़ेसरा खार के कांंटा अउ परन दिन बेलौदी खार के कांटा खूंटी ल बिन के लेस देबोन ताहन फेर तीनो गाँव के खार म खातू पालबो।

एती सवाना ल ओकर सास ह बारी-बखरी देखावत शिवनाथ नदिया म शिव मंदिर के खाल्हे वाले घाट म गिस। शिवनाथ नदिया बहुत खुस रिहिसे। काबर कि अब तक ले मैं कतनो नवा बहुरिया के हरदी धोवाए के साक्षी हवँ। तभे तो इंकर दुख-सुख म जीवन भर संग ल नइ छोड़ँव। इंकर हांसी, इंकर दुख-पीरा, इंकर संघर्ष के हर रूप के गवाही हवँ। आज सवाना घलो अपन वैवाहिक जिनगी म पहिली घाँव नहा खोर के अपन चोला ल धन्य समझिस। बिहाव के नवा नवा गहना गुरिया रिहिस तभो ले सांटी ल नदिया के कुधरिल ले मांजे के नेंग करिस। सवाना मुड़ ल घलो मिंजिस ताहन ओकर सास ल समझे म जादा समे नइ लगिस।

कपड़ा लत्था ल कांच के सवाना के सास ह चरू म पानी धर के करार उप्पर बने शिव मंदिर म अपन बहू संग पहुंचिस। सवाना के सास ह कथे-बाल्टी ल बर पेड़ मेर मढ़ा दे। बाल्टी ल बर पेड़ मेर मड़ा के भोले भण्डारी के मंदिर म चढ़िन। नाँदिया बइला के दुनो झिन पाँव परिन। भीतरी म आजू-बाजू बजरंग बली के पूजा करे के बाद भीतरी गिन, जिहां शिवलिंग स्थापित रिहिसे। सास ह जइसन-जइसन करै ओइसने-ओइसने बहू ह घलो पूजा पाठ करै। काबर सवाना ह अब इहें के संस्कार ल अपन सास ले सीखत रिहिसे। सास ह सबले पहिली शिव मंदिर के घंटी बजइस ताहन बहू ह घलो घंटी बजइस। सास ह मंदिर के आघू म सदा सोहागी के फूल टोरे रिहिसे, ओमा के आधा ल अपन बहू ल घलो दे रिहिसे। शिवलिंग म ओकर सास ह फूल चघइस ताहन पानी ले शिवलिंग ल नहवइस ओकर बाद अपन बहू ल किहिस-ले बहू तहूँ ह फूल ल चघा के शंकर भगवान म पानी चघा दे। सवाना घलो पहिली फूल चघइस ताहन शिवलिंग म पानी चघइस। सवाना के सास ह कथे-सवाना शिव मंदिर ह बहुत जुन्नैटहा मंदिर आय। बड़ फूरमानुक हे बड़ फूरमानुक। भगवान ले बरदान मांग ले। भगवान के मंदिर ले कोनो खाली हाथ नइ जावै। सास-बहू दुनो झिन आँखी मुँद के हाथ जोड़ के भोले भण्डारी ले बिनती करे बर धरिन। सवाना के सास ह भगवान ले बिनती करिस-हे भगवान मोर परिवार के काकरो गोड़ म कांटा झन गड़य। मोला जल्दी नाती-पोता खेलाय बर मिलै। सवाना ह भगवान ले बिनती करिस-हे भगवान मैं परिवार के सेवा कर सकौं, मैं सदा सुहागन रहौं, मैं जब मरौं ते माँग भर सिंदूर अउ हाथ भर चूरी पहिरे रहौं। हे परभू मोला अतका शक्ति दे ताकि जिनगी के परीक्षा म सफल हो जवँ। मैं अपन धरम-करम ले स्वर्ग बना सकौं। दुनो झिन शंकर भगवान के पूजा पाठ करके घर जाये बर रेंगिन। रेंगत-रेंगत सवाना के सास ह पूछथे-कइसे सवाना का मांगे हस भगवान करा? सवाना ह लजा के मुड़ी ल गड़िया देथे ताहन ओकर सास ह जान डरिस, अभी बहू ह नेवन्नीन हे जादा गोठियाना ठीक नइहे अउ जादा चढ़ाना घलो ठीक नइहे। नही ते जादा चढ़ जाही ताहन अपने बर जीव के काल हो जही।

नहा-खोर के पूजा पाठ करके घर म आके तुलसी चाँवरा म पानी रिको के पूजा पाठ करिन ताहन मंझनिया बर रांधे गढ़े के तइयारी म भीड़गे। सवाना के सास ह साग सुधारे बर धर लिस। एती सवाना ह रंधनी खोली म आगी सुलगइस। सवाना ह मइके म रांधे गढ़े बर सीख गे रिहिसे। जइसन अपन दाई-ददा बर तिपोवय ओइसने ससुरार म घलो रांधिस। भात-साग के चूरत ले, नहा खोर के पंचू अउ बिसेलाल घलो पहुंचगे। दुनो झिन ल खाना खाय बर पानी दिस। खाये के बेर पंचू ह फोकटे-फोकट साग ह सिट्ठा हे कहि के इसारा कर दिस ताहन सवाना ह डर के मारे साग म अऊ नून डार दिस। दुसरइया पोरसीस ताहन साग ह बिक्कट खर होगे। बिसेलाल ह ताना मारत किहिस-नून ह कइसे कमती लागत हे। अपन ससुर के बात ल सुन के जान डरिस के साग ह जादा खर होगे हे। फेर अब बपरी सवाना ह करे ते करे का। साग म तो पानी ल डारे नइ जा सकै। बिचारी नखमरजी होके रंधनी खोली म बइठ के रोय बर धर लिस। ओकर सास ह आ के समझइस-इंकर बुध म झन आबे नइ ते रोज गारी खाबे। अइसे तइसे सबके सुभाव अउ मुँहु के सवाद ल परखत गिस। अउ सावचेत होवत गिस ताकि आघू डहार कोनो किसम के गारी खाय बर झन परे।

संझौती गैंंदलाल ह गाड़ी म खातू भरत रिहिसे। पंचू ह रापा म खपट-खपट के झउंहा म भरै तेला बोह-बोह के गैंदलाल ह गाड़ा म भरत राहै। ओइसने म रामरतन आगे। ओह अपन संगवारी सन ठट्ठा-दिल्लगी म लगगे। अरे भई भउजी आगे तभो ले गैंदलाल ल खातू बोहावत हस। भउजी ल नइ ले आते, गाड़ा म खातू भरे बर। रामरतन ह पंचू ल ताना मारथे, कइसे रात भर नइ सुते हस का जी? आँखी ह उसवाए-उसवाए कस दिखत हे। पंचू कथे-अरे काला बतावौं यार, रात भर भूसड़ी चाबे हे। रामरतन हांसत-हांसत कथे-भुसड़ी चाबे हे ते भउजी चाबे हे। सुन के तीनो झिन खलखला के हांस डरथे। आठ-पँदरा दिन म भेंंड़सर अउ डाड़ेसरा के सबो चक म खातू पलागे।


ग्यारह


असाढ़ लगगे। बिरेझर म रइजुतिया बड़ा धूमधाम ले मनाथे। रइजुतिया के पहिली सवाना के दाई ह धनसिंग ल कथे-बेटी ल लेवा के ले आन। इहें एसो के रइजुतिया ल देख लेतिस। धनसिंग कथे-का होही, चल दुहूँ। बेटी ल लेवाए बर समधी घर जाही कहिके सवाना के दाई ह तेलई म बइठगे। बरा, सोंहारी, ठेठरी, खुरमी जोरिस ताहन धनसिंग ह कुलकत बेटी ल लेवाए बर बेलौदी जाए बर खासर म बइठ के चल दिस।

बिरेझर ले थनौद, थनौद ले अंजोरा, अंजोरा ले नगपुरा होवत मालूद बेलौदी पहुंचिस। बेरा ह बूढ़त रिहिसे। आकास ह ललहूं-ललहूं दिखत रिहिसे। घर म सुवा पोंसे रिहिसे तेला मिरची खवाय के बाद सवाना ह घर ले बाहिर निकलिस तब अपन ददा ल देखथे। खासर ले उतर के बइला ल ढिलत रिहिसे। सवाना के खुसी ह तो सदा सोहागी फूल कस छतरावत रिहिसे। धकर-लकर घर गिस लोटा म पानी लाए बर। तब तक ले बइला ल जुड़ा म बांध के धनसिंग ह घर म आगे रिहिसे। सवाना ह अपन ददा ल फूलकसिया लोटा म पानी दिस-'ए ले ददा पानी, गोड़ धो ले ताहन टूप-टूप पाँव परिस। धनसिंग ह मने-मन खुस होगे, अपन बेटी के चंचलता ल देख के। काबर कि बेटी के चंचलता ल देख के जान डरिस कि बेटी अपन ससुरार म खुस हवै। धनसिंग के हाथ गोड़ धोवत ले सवाना ह लघियात बरदखिया खटिया के उपर फूल छाप वाले चद्दर ल बिछा के अपन ददा ल बइठे ल किहिस-ले ददा बइठ। ओकर बाद सवाना ह जल्दी जल्दी चाहा ल बना डरिस। तब तक ले सवाना के सास ह घलो आगे। बहू ह अपन समधी के बनकी बनइस ओतके बेर बिसेलाल ह खेत डहार ले लहूटिस। अपन समधी संग जोहार भेंट कर के दुनो समधी खटिया म बइठगे। सवाना ह इमन ल चाहा लान के दिस। इमन दुए घँुट पीयन पाये रिहिसे ओतके बेर पंचू पहूंचगे। पंचू ह अपन ददा, ससुर अउ महतारी के पाँव परके दुरिहा म जा के बइठ गे। अब तो पंचू ह जान डरिस कि ओकर ससुर ह सवाना ल लेवाए बर आ हे कहिके। ओकर थोथना ह छुई-मुई कस ओथरगे। छुई-मुई ल हाथ लगाते भार चेहरा ल ओथरा देथे ओइसने पंचू ह अपन ससुर ल देख के ओथार दिस।

रतिहा भोजन पानी होय के बाद सब झिन अपन-अपन कुरिया म चल दिन। बिसेलाल समधी ल अपन कुरिया म सुतइस। सब ल खवा-पिया के बरतन भाड़ा ल सकेल के अपन कुरिया म गिस। जिहां पंचू के जीव ह सवाना के संग गोठियाए बर चुटपुटावट रिहिसे। दुनो झिन मया म दीया-बाती कस घर म अँजोर करत रिहिसे फेर अब तो दीया अउ बाती ह अलग-अलग हो जही, कुछ दिन बर। दुनो के एक-दुसर के बिना जिनगी कटई मुश्किल हो जही। दुनो के हिरदे ह मया के अंजोरी के बिना अंधियार हो जही। दुनो झिन गुन-गुन के विरह के पीरा ल राते ले भोगत रिहिन हे। पंचू कथे-मैं तोर बिना घड़ी भर नई रहि सकौं सवाना। तैं झन जा, झन जा। सवाना ह कथे-महूं ह तो तोर बिना नइ रहि सकौं जोड़ी, फेर का करबे नियम ल तो निभाए बर परही। एहा तो एकसरिया ए, दुसरइया आहँू ताहन तो घरबंदी हो जहूं। तोर छइहां बन के जिनगी भर चलहूं। पंचू ह उदास होके कथे-अभी मैं चलौं तोर संग तोर छइहां बन के। सोहागा कथे-कइसे गोठियाथस जोड़ी, मइके वाले मन का किही? देख तो सवाना के तुलसीदास ल कहिके। सुन के पंचू कथे-कण्डिल ल बुझा रात जादा होवथे। बिहनिया उठे बर घलो लागही। तोला मइके जाए बर जोरा घलो करे बर परही।

मुंधराहा ले सवाना उठ के घर बूता म लगगे। जब ओकर सास ह उठिस त घर के जम्मो काम बूता ह निपटगे रिहिसे। सवाना के सास ह जान डरिस। आज मइके जाए बर हे तेकर सेती बहू ह बेरा उए के पहिलीच्च घर बूता ल कर डरिस। जब ओकर ससुर अउ ददा उठिस त उमन ल उठते भार फूलकसिया लोटा म मुँहु धोये बर सवाना ह पानी दिस। दुनो समधी मँुहु धो के बइठिस ताहन तुरते सवाना ह कप-सासर म चाहा दिस। चाहा पानी पीये के बाद दुनो समधी गोठ-बात म लगगे ताहन बिसेलाल ह अपन समधी ल गाँव म कका-बड़ा मन करा बइठारे बर लेगिस। सवाना ह जल्दी नहा खोर के तेलई के जोरा म लगगे। एती सवाना के सास ह तेलई म बइठिस ओती पंचू ह सवाना के मइके जाये के सुध म गुनत-गुनत बइठे राहै। ओकर मन ना खाए के करत हे न पीये के। उही हाल सवाना के घलो फेर नारी जात ए। मया अउ पीरा के संकट ल एहसास होवन नइ दिस। एती पति के विरह ओती महतारी के मिलना, दुनो बीच के परिभाषा ल सवाना ही पढ़ सकथे। दुसर के बात नइ रिहिसे। सवाना खाना उ खा के जाए के तइयारी करिस। सवाना ह संदूक ल धर के खासर म बइठिस ताहन धनसिंग ह दुनो छांकड़ा के कांछड़ा ल ढिल्ला करके - हर्र...हर... कहि दिस ताहन उदँड़गे छांकड़ा मन बिरेझर जाए बर।

गाँव पहँुचत ले मुंधियार होगे रिहिसे। ओकर दाई ह रांध-गढ़ के तइयार रिहिसे। सवाना के पसंद के साग, मही म बफौरी अउ रमकलिया ल मन लगा के रांधे रिहिसे। काबर कि बहुत दिन के बाद आवत हे बेटी ह। सवाना के दाई बर महीना डेढ़ महीना ह बहुत दिन लागत रिहिसे। अपन करेजा के कुटका ल जेला ननपन ले पाल-पोंस के बड़े करे रिहिसे। जानो मानो ओह एके घाँव म दुसरच्च बर होगे। सवाना ह मइके ले ससुरार गे रिहिसे तब ले घर ह भांय-भांय लागे। चाबे बर दउंड़े, घर ह चाबे बर...। आज सवाना आही ताहन ओकर सन बइठ के मन भर के गोठियावत-गोठियावत खाहूँ कहिके गुनत बइठे रिहिसे। ठउँका ओतके बखत बइला के घंटी के आवाज ह सवाना के दाई के कान म परिस। धरा-पसरा उठिस अउ दउँड़त अपन बेटी करा गिस। सवाना ह घलो खासर ले उतर के टूप-टूप पाँव परिस। सवाना के दाई ह ओकर गाल ल माथ ल छू-छू के खुसी के अनुभव करत रिहिसे। ए पइत सवाना के देंह ह भरगे रिहिसे। गाल हा फूड्डा-फूड्डा दिखत रिहिसे। चेहरा म गृहस्थ के सुख ह अलग ले मुसकुरावत रिहिसे। सवाना के दाई ह डेरी हाथ म संदूक ल अउ जेउनी हाथ म सवाना ल धर के तुरते घर म लेगिस। जानो-मानो आज खुसी के सागर ह धनसिंग घर आगे हे, ओकर लहरा म सबो झिन नहावत हे।

ओती पंचू ल कुरिया ह चाबे बर दउँड़त हे। ओकर आँखी म तो सवाना के चेहरा झूलत राहै। सवाना के पाँव के पैजन के आवाज, ओकर चूरी के खनखन, ओकर कोइली कस मीठ बोली के सुरता करत पंचू के चोला ह तरसत रिहिसे। बिहनिया होइस ताहन सवाना के सास ल घलो अपन बहू के सुरता सतावत रिहिसे। सवाना रिहिसे त सबो काम बूता ल कर देवत रिहिसे। एको ठन बूता ल हाथ लगावन नइ देवत रिहिसे। आज तो घर बूता करत टेम होगे। बिसेलाल ल चाय पानी दे म देरी होगे ताहन बिसेलाल ल घलो अपन बहू के सुरता अइस। अपन गोसइन ल किहिस-बहू ह रिहिसे त चाहा पानी ह उठते भार मिल जात रिहिसे।

पंचू के मन ह खेती-किसानी म लगे नही। सुध ह सवाना डहार जाय रथे। बिसेलाल ह अपन गोसइन ल कथे-कइसे टूरा ह सुकसुक ले दिखत हे? ओकर दाई ह कथे-तहूं हा निच्चट भकला हस। बहू के सुरता ह सतावत होही। समे के संग सब ठीक हो जही। खेती-किसानी के काम-बूता म मन ल लगाही ताहन सब ठीक हो जही। ओकर बाद बांवत-बख्खर बर भीड़गे बिसेलाल ह। पंदरा एकड़ के जमीन रिहिसे। खेती अपन सेती कहि के दस-पंदरा एकड़ के जोतनदार घलो नांगर जोते। बिसेलाल ह बड़े बइला मन ल नांगर म फांदिस, पीछू म पंचू के नांगर ताहन गैंदू के नांगर। ओकर बाद सपरिहा मन के दु ठन अऊ नांगर। अइसे तइसे पांच-छै नांगर जब खेत ल जोते बर चलिस ते भड़भड़-भड़भड़ आठे दिन म बांवत ह निपटगे। नांगर जोत के आवै ताहन पंचू ह थके-मांदे रतिहा सुतै ते एक्के नींद म रात पहा जवै। पता नइ चलै रात ह कइसे पहा जय। धीरे-धीरे घर के काम बूता म लगगे। चेत ह धीरे-धीरे हरावत गिस। बिहनिया ले बखरी के तरोई अउ सेमी रमकलिया बोए रिहिसे तेला नींदे कोड़े बर भीड़ जय। नार मन ल ढेखरा म चघावे। कभू घर के  अंगना म बोवाए कोहड़ा के नार ल छानी म चघावै। पंचू ह पेड़ पौधा, साग भाजी अउ नार बियार के मन लगा के जतन करै।

रथयात्रा देखे बर सवाना ह अपन सहेली मन सन निकलिस त गाँव के उतलंगहा टूरा मन के नजर ह एक टक परगे। उमन ह कहाय-सवाना ह ससुरार के आए हे ते अऊ सुन्दर दिखत हे। दुसर टूरा काहै-कइसे सुन्दर नइ दिखही-कोइला कस करिया हे भांटो ह तेहा। सब झिन खलखला के हाँस डरिन। ओती सवाना के सहेली मन घलो ठेही मारे बर धर लिन-कइसे सवाना मइके म तोला खाए बर नइ मिलत रहिस हे का? तेमा अट्ठरा बच्छर तक ले देंह नइ भरत रिहिसे। महिनच्च भर म देंह ह भरागे। दुसर सहेली बात ल साधत कथे-चुप्प राहौ रे, हमर डोकरी दाई कथे हरदी पानी पाए के बाद तन ह फुन्नाथे कथे तेहा।

ओतके म एक झिन सहेली ह कथे-वो दे, वो दे देख, भगवान के रथ ह आवत हे। रथ म सुघ्घर बलभद्र, कृष्ण जी अउ सुभद्रा बइठे हे। चलो दरसन करबोन ताहन सबो झिन दरसन करिन अउ गजामूंग के परसाद पइन। ओतके बेर बिरझा ह कथे-चल सवाना दुनो झिन गजामूंग बद डरथन। सवाना घलो हामी भर देथे। दुनो झिन एक-दुसर ल 'सीता राम गजामूंग’ कहिके हाथ जोड़ के सम्बोधन करथे ताहन दुनो झिन जनम-जनम बर मितानीन होगे। ओकर बाद जउन करा दिखै 'सीता राम गजामूंग’ कहिके एक-दुसर के अंतस म बसै।

एती बेलौदी म असाढ़ के आखरी इतवार के सउनाही बरोए बर कोतवाल ह हांका पारिस-काली गाँव म सउनाही बरोए जाही। जब तक सउनाही बरो के बइगा ह गाँव नइ आही तब तक ले गाय गरूवा ढिलना नइहे अउ पानी-कांजी करना मना हे हो...। बइगा ह गाँव वाले मन संग सनिच्चर रात के बारा बजे के बाद करिया कुकरी, बंदन, लिमऊ अउ पूजा पाठ के जिनिस ल धर के गाँव के सियार म गिस। उहें बइगई-गुनियई करके गाँव के सुरक्षा बर सउनाही बरोइस।

सउनाही बरो के गाँव तक पहुंचत ले बिहनिया होगे। गाँव म पहुंचे के बाद फेर कोतवाल ह हांका पारिस-अब सबो किसान अपन माल मत्ता ला ढिल सकथौ अउ काम बूता कर सकथौ हो...। सब किसान मवेसी मन ल खइरखा डाढ़ पहुँचइन अउ माईलोगन मन काम बूता म लगगे। सउनाही के दिन कटा-कट तिहार रिहिसे। ओ दिन गाँव ले बाहिर निकलना बंद रिहिसे।

एक घाँव तो अइसनो होय रिहिसे कि रमौतिन के लइका के तबियत खराब होगे। ते ओला दुर्ग के सरकारी अस्पताल लेगे बर मना कर दिन, गाँव वाले मन। गाँव प्रबंध के नियम ह टूटही ते गाँव बिगड़ जही, उही पाय के गाँव वाले मन पहिली ले बंधन कर दे रिहिन हे कि जउन भी मनखे ह गाँव के बाहिर जाही ओला दस रूपिया दण्ड अउ गाँव ले अलग कर दे जाही। इही पाय के बीमार लइका ल गाँव के डर के मारे अस्पताल नइ लेगिस। ओती बइगा मन ह सउनाही बरोवत रिहिसे त एती रमौतिन ह अपन बेटा के जिनगी बर भगवान ले बिनती करत रिहिसे। लइका के हालत ल देख के रात भर मिलखी नइ मारे रहिसे। सोमवार के बिहनिया होत भार पहिलीच्च डोंगा म नहाक के उरला गाँव होवत दुर्ग जावत रिहिसे। उरला पार होए के बाद नानकून ह आँखी ल नटेर दिस। हइफों-हइफों करत दुर्ग अस्पताल म डॉक्टर करा पहुंचिस त डॉक्टर ह नाड़ी ल छू के अउ आँखी ल देख के जुवाब दे दिस-देरी कर देव रमौतिन। लइका ह हाथ ले निकलगे हे। मेंह कुछु नइ कर सकौं। सांसा के राहत ले लाने रहितेंव ते बचा ले रहितेंव। रमौतिन ह छाती पीट-पीट के रोए ला धर लिस। गोहार पार के रोए बर धर लिस-तुमन गाँव के हित बर सउनाही बरोयेव ते मोर लइका ल बरोए बर ए हें... हे...। फगुवा घलो भारी रोइस फेर का करे बिधाता के आघू म। गाँव लहूटिन, लइका के काठी माटी करिन। उही दिन सियान मन गाँव म बइठक सकेलिन अउ नियम म सुधार करिन कि बीमार मनखे के अस्पताल लेगे बर कोनो पाबंदी नइ रही।

एकर बाद गाँव म इतवारी तिहार मनाए के सुरू होइस। बीच-बीच म कहूं फसल म जादा कीरा मकोरा हो जवै त फांफा बरोए के घलो उदीम करै। गाँव म निंदई-कोड़ई सुरू होगे। सावन के रिमझिम बरसात ह फसल ल उमिहाए म सहयोग करै। काबर कि धान बर जीवन दायिनी अमृत राहै। कभू-कभू तो चार-पाँच दिन के झड़ी ह खेत-खार, तरिया-नरवा ल लबालब कर देवै। घर ले निकलना मुस्कुल हो जावै। त सवाना के दाई ह मइरका म रखे भांटा खुला, बरी अउ मसूर ल निकाल के साग राधैं। जइसने पानी ओसकिस ताहन खेत-खार म नींदई सुरू होइस। संगे संग धान ल चाले के काम सुरू होइस। सवाना के दाई ह सवाना संग अऊ आधा दर्जन बनिहार-बनिहारिन मन ह चना-होरा, लाखड़ी-होरा चबलावत-चबलावत नींदे बर गिन। उहें साँवा-बदउर ल नींद-नींद के मुरकेट के दबावत रिहिन हे। गंगई ल खन-खन के मेड़ो डहार फेंकत रिहिन हे। देखते देखत करिया बादर ह पानी छनकाय बर धर लिस। सब झिन मोरा अउ पनकप्पड़ ओढ़ के ददरिया झोरे बर लगगे।

बनिहार -

बटकी म बासी अउ चुटकी म नून

मैं तो गावत हवँ ददरिया,

तैं कान दे के सुन,

तैं जवाब देबे...

तैं जवाब देबे टूरी,

मैं गावत हवँ ददरिया तैं जवाब देबे


बनिहारिन -

बटकी म बासी अउ चुटकी म नून

मैं तो गावत हवँ ददरिया,

तैं कान दे के सुन,

मैं जवाब दुहूँ...


बनिहार -

गाड़ा रे रेंगे रवन रद्दा वो

मन परेवना हो के उड़े

अब तो तोरे सुध म वो हवा ले

हवा ले, पानी ले, न रे गोला

नई बाचे चोला का वो हवा ले ले...


बनिहारिन-

तबला चिकारा म नई तो माड़े सूर

तोला खोज ढूंड़ निकालेव, न रे छैला

अब तो कमल कस फूल रे, हवा ले ले

हवा ले ले पानी पी ले, न रे गोला

नई बांचै चोला का रे, हवा ले ले...


एती पंचू के बखरी म सेमी, तरोई ह छछले बर धर ले रिहिसे। कोहड़ा नार ल घलो छानी म चघाए के तइयारी करत रिहिसे। ओकर बर ढेखरा गड़ियावत रिहिसे। देखते-देखत हरेली आगे। हरेली तिहार बर तो अइसे लागे जानो-मानो भुइयाँ ह हरियर लुगरा पहिरे हे। गैंदलाल ह पंचू घर के गाय-गरूवा ल खइरखा लेगिस ताहन घर म गहूं पिसान के लोंदी बनइस, संगे-संग दवई घलो बनइस। खइरखा डाढ़ म जा के गाय ल लोंदी खवइस ताहन मवेसी मन के बढ़िया स्वास्थ्य के खातिर दवई पियइस। पंचू के दाई ह घर के बाहिर के कोठ म मरी मसान ले बांचे बर गोबर के पुतरी बनइस। पौनी-पसारी मन भेंट खातिर अपन-अपन मालिक घर किंजरिन। राऊत मन लीम डारा ल घर के मुहाटी म खोंच के मालिक मन के खुसहाली के कामना करिन।

ओती बिरेझर म घलो ओरी पारी सबो पौनी-पसारी मन अइन। सवाना के दाई ह जतना बनिस सब झिन ल सूपा म सेर चाँऊर देवत गिस ताहन फेर सुरू होइस गेड़ी बनई। घरो-घर अपन खेती किसानी के औजार ल धो के पूजा पाठ करिन।

बिसेलाल ह घलो कृषि औजार के पूजा करिस। औजार मन म बंदन टिक के उद्बत्ती जलइस, बरा-सोंहारी चघा के नरियर फोर के कृषि औजार के आभार व्यक्त करिस। तुँही मन हमर देवी-देवता अव। तुँहरे किरपा ले हम खेती किसानी ल पूरा कर सकथन। ओकर बाद लइका मन गेड़ी के पाऊ म माटी तेल डार के रिच-रिच करत लइका मन खइरखा डाढ़ डहार जाय बर धर लिन। सब किसान मन पूजा पाठ करके, खाना खा के अपन-अपन ढंग ले उछाह मनाए बर निकलिन। भजनहा मन रामायण पढ़े बर धरिन। कोनो ह तरिया पार म पीपर के छांव म आल्हा पढ़ के खुसी मनइन। त कतनो मन पै-बारा कहिके पासा ढुलाय बर धर लिस। टूरा मन कबड्डी सुर, नोनी मन बिल्लस, खो-खो, कुछ मन तीरी पासा अउ भटकउला खेले बर धर लिन।

सवाना घलो अपन गजामूंग घर सेर चाँउर अमराए बर गिस। उहें ओकर मितानीन के दाई ह गजब मया करिस। पहिली घांव सेर चाँउर अमराए बर आ हे कहिके ओला ब्लाउज के पीस घलो दिस। सवाना कतनो मना करिस खाए बर फेर ओकर मितानीन ह दु काँवरा खवाए बिना नइ छोड़िस ताहन दुनो सहेली दुख-सुख के गोठ गोठियावत रिहिन हे। काबर कि ओकर गजामूंग के बिहाव घलो सवाना के संघाती होय रिहिसे। वहू ल ओकर ददा ह अभीच्च-अभी लेवा के लाने रिहिसे। दुनो सहेली अपन-अपन ससुरार के गोठ बात म रमगे। सवाना अपन गजामूंग ल कथे-का हालचाल हे तोर ससुरार के? ओकर गजामूंग कथे-का करबे बहिनी, कोनो करा भागत रेहेंव तइसे हुरूहा-धुरहा जउने सगा अइस तेकरे करा हार दिस ददा ह मोला, देखिस न सुनिस, का करबे। गेंव तिही रात मार दारू पी के उछरत-बोकरत आये रिहिसे। ओ रात तो ओकर सेवा जतन म बीतगे। घर म खाए बर खपरा नइहे अउ बजाए बर दफड़ा नइहे। बहुत समझायेंव फेर उल्टा ओह मुही ल गारी बखाना देवत कुटकुट ले थुथर दिस अउ चिल्ला-चिल्ला के काहे-तैं मोला समझाथस माईलोगन होके। जादा मुँहु चलाथस कहिके जब देखबे तब लउड़ी-बेड़गा उठावत रथे। आ देख ना दाग परगे हे, का दुख ल बताबे। सुन के सवाना कथे-विधि के रचना ल का जानबे बहिनी जइसन तकदीर म रहिथे, ओइसने होथे। ओकर गजामूंग ह कथे-बेटी जात के तकदीर ल तो दाई-ददा लिखथे, गजामूंग। भले कोंदा लेड़गा घर दे देतिस फेर दरूवाहा घर झन देतिस। सवाना कथे-अब कइसनो करके ओला धीरे-धीरे सुधारबे। एक-दु झिन लइका आही ताहन सब ठीक हो जही। ओकर गजामंूग हा कथे-तेंह तो अइसे गोठियाथस जानो मानो तोर लोग लइका आगे हे तइसे। सवाना ह लजावत कथे-छी दाई तहूं ह कइसे गोठियाथस गजामूंग। कहिके दुनो झिन खलखला के हांस डरथे ताहन ओकर गजामंूग ह तिखार के पूछथे-तोर ससुरार के का हालचाल हे? हमर घर के गोसइया ह बिलवा जरूर हे फेर ओकर मन ह ओग्गर हे। ददा ह सोच-बिचार के मोला दे हे। सोला आना सास-ससुर हे उमन बिक्कट मया करथे मोला। सवाना के गजामूंग कहिथे-तँय बड़ भागमानी अस बहिनी, बड़ भागमानी अस। सवाना कथे-तँय जादा निरास झन हो। आज रात हे त काली दिन जरूर होही। सुख के अंजोरी ह तोर अंगना म एक दिन जरूर बगरही। काहत-काहत दुनो झिन मंदिर करके मैदान म चल दिन जिहें सब जउँरिहा मन खो-खो खेलत रिहिन हे। यहू मन खो-खो देखत बइठगे। मने मन गुनत रहिगे यहु मन एक के बाद एक खो-खो कस उठ के अपन जिनगी के रद्दा म बिना रूके दउँड़ही।

खेल खेलत-खेलत मुंधियार होगे। सब झिन अपन-अपन घर गिन। सवाना ह अपन मितानीन (गजामूंग) ल अपन घर लेगिस। सवाना के दाई ल देखते भार ओकर मितानीन ह टूप-टूप पाँव परिस तब ओकर दाई ह आसीस देवत किहिस खुस राह बेटी, खुस राह। सवाना के दाई ह सवाना के मितानीन ल पूछथे-कइसे तोर सरीर ह झूटके कस लागत हे बेटी। तबियत खराब तो नइ रिहिसे? सवाना के गजामूंग ह दुख उपर परदा डारत कथे-हव दाई मोर तबियत ह ससुरार म भल्ले दिन ले बिगड़गे रिहिसे। ठउंका ओतके बेर सवाना के ददा अइस। सवाना के गजामूंग ह टूप-टूप पाँव परिस। धनसिंग ह असीस दिस-खुस राह बेटी, खुस राह। सुन, भात खा के जाबे। ओतके म सवाना कथे-हव ददा गजामंूग ह हमर घर खाही अउ सुतही घलो। फूलदाई घर खभर भेजवा दे। धनसिंग ह कथे-मैंह खभर दे के आथौं ताहन सबो झिन खाबोन कहिके खभर दे बर चल दिस। खभर दे के आ के सबो झिन खाना खा-खुवा के सुते बर गिन। फेर दुनो मितानीन ल नींद कहाँ ले आवै। अधरतिया कन सवाना के दाई के नींद ह खुलिस त इंकर मन के गोठियई ल सुन के किहिस-भल्ले रात होगे हे बेटी सुत नइ जतेव। तब कहूँ इमन सूतीन।


बारह


सावन पुन्नी म रक्षाबंधन के बाद भादो के महीना म करिया-करिया बादर ह घपटे हे। धान मन ह पोटरी पान खींच डरे हे। धान के देंह माईलोगन मन कस चिक्कन-चिक्कन दिखत राहै। ऐती पंचू के सपना ह सवाना के सुध म पलत रिहिसे। पंचू ह पोरा तिहार के दिन धनहा डोली म चिला रोटी चघा के घर म गनेस मढ़ाए के जोरा म लग जै रथे। काबर कि चउथ के दिन गनपति मढ़ाना रिहिसे। ननपन ले धार्मिक किसम के राहै। कभू रामलीला म राम के पाठ करै त कृष्ण लीला म किसन के पाठ करै। तीजा-पोरा मनाए के बाद गनेस पाख म सवाना ल ओकर ससुरार पहूंचा देथे। पंचू ह तो ओकर रद्दा देखते रिहिसे। सवाना जब-जब सुरता करै पंचू के गोड़ ह खजुवाय। ओ दिन पंचू ह खेत डाहर गे रिहिसे। जब ओह घर पहुंचिस त ओला अभास होइस कि कइसे ओला घर ह गरू-गरू लागे ल बर धर ले हे। जानो मानो घर म धन के हण्डा मिलगे हे तइसे। जब घर भीतरी खुसरिस त देखथे सवाना ह टूप-टूप पाँव परिस ताहन तो पंचू के चेहरा म कांसी फूल जथे। गनेस पाख म सवाना के आते भार अब तो सब झिन संघरा पूजा करै। सवाना के सास ह मने-मन भगवान ले बिनती करै-हे भगवान अवइया गनेस पाख के आवत ले हमरो अंगना म नानकुन गनेस खेलतिस। मैं ओला दुलारतेंव-पुचकारतेंव, सेवा जतन करतेंव। ओला लोरी सुना-सुना के ओकर पेट सेंकतेंव। ओला झूलना झूलातेंव। ओकर बर घुनघुना लातेंव। ओला आनी-बानी के खवातेंव। गनेस विसर्जन के बाद पीतर पाख सुरू होगे। पंचू ह बखरी म जउन तरोई ल बोए रिहिसे उही पत्ता ले उरीद दार अउ दुबी ले बिसेलाल ह अपन ददा-दाई ल पानी देवै। क्वांर अँजोरी पाख ले माता जी के पाख आथे। येला सारदीय नवरात्रि पाख के नाव ले घलो जाने जाथे। गाँव भर मिलके गाँव म पहिली घाँव माता दुर्गा रखे के हिम्मत करिन। माता जी ल गाँव म बिराजे बर पहली बिक्कट डर्रावै। कहीं कोनो कुछु चुक झन हो जवै कहिके। नइ ते मइया ह माफी नइ देवै कहिके। तभो ले सब गाँव वाले मन बइठका सकेल के सुन्ता बांधिन कि माता जी के विधि-विधान ले सेवा बजाबोन।

दुर्ग के चण्डी माई, डोंगरगढ़ के बमलाई मइया म जगमग-जगमग जोत जलत हे। श्रद्धालु मन देवी दरसन बर कोनो बिना चप्पल के पैदल जावत हे त कोनो घोण्डत जात हे। गाँव के सेवा समिति वाले मन संझा के संझा सेवा बजावै। पंचू ह सेवा मण्डली के गायक रिहिसे। ओह माता जी के जस गीत म रम जवै-


जग रचौं महामाई, नेवता नेवत के हाँ, जग रचौं


गाँव के ठाकुर देवता ला नेवतौं, पवन पुत्र हनुमान

भइसासुर अउ पाड़ा देव ला

नेवता नेवत के हाँ, जग रचौं...


डोंगरगढ़ बमलाई ला नेवतौं, रतनपुर महामाई ला

दन्तेवाड़ा के दन्तेश्वरी मइया ला

नेवता नेवत के हाँ, जग रचौं...


भीमखोज खल्लारी नेवतौं, रावां के बंजारी ला

जब रायपुर के कंकालीन मइला ला

नेवता नेवत के हाँ, जग रचौं...


घर के दूल्हा देव ला नेवतौं, मरकी माता ठकुरइन ला

रउत गुरू बुढ़ा देव ला

नेवता नेवत के हाँ, जग रचौं...


देवी-देवता मन ल नेवते के बाद माता जी के सोला सिंगार के गीत गाथे -


पचरंग मइया के सिंगार हो माँ

सेत सेत तोर ककनी बनुरिया, अहो महामाई सेते पटा तुम्हारे

सेत हवय तोर गर के हरवा अउ फूलन के हारे...

पिंयर पीताम्बर पहिरे महामाई पिंयर कान के ढारे

पिंयर हवे तोर नाक के नथनी रहे ओंठ के छाये...

हरियर-हरियर हाथ के चूरी, हरियर गला के पोते

लाली हावे तोर माथ के टिकली बरे सुरूज के जोते...

लाली लाल लहर के लहंगा, लाली चोले तुम्हारे

पान खात मुंह लाल भवानी, सिर के सेंदुर लाल...

कारी कोरे लगे अचरन म कारी कजर के रेख

कारी हावे तोर भंवर पालकी कारी सिर के केस...


गाँव म राम लीला के घलो तइयारी चलत रिहिसे। काबर कि दसमी के दिन दसराहा घलो रिहिसे। अब तो दुबी मन उपर शीत घलो बरसे बर धर लिस। दुबी म बरसे शीत ह मोती कस चमकत रिहिसे। मोती ल देख के पंचू ल सवाना के रूप के सुरता आ जथे। संझा कन माता सेवा ताहन फेर राम लीला के तइयारी म पंचू ह व्यस्त होगे। एक दिन सवाना ह ताना मार दिस जानो-मानो तोर बिना रावन मरबे नइ करै। पंचू कथे-बने काहत हस सवाना मोर बिना रावन मरबे नइ करै। सवाना कथे-वो कइसे? पंचू कथे-अरे भई मिही ह तो राम के पाठ करत हौं। सवाना कथे-ओइसन म तो मैं तोर सीता होगेंव न। अइसन म मोला तेंहा काबर बनवास म 'केंवट कुंदरा’ म छोड़ दे हस। पंचू ह हत रे भकली काहत दुनो झिन खलखला के हांस डरथे।

कातिक लगते भार गाँव के नोनी मन कातिक नहाए के सुरू करथे। गाँव भर के मन देवारी तिहार के तइयारी म भीड़ जथे। धनसिंग अउ ओकर गोसइन घलो। देवारी माटी बर भीड़गे। संध्या कन सुवा नचइया मन घलो घरो घर सुवा नाच गा के मया पीरा के संगवारी बनथे।


सुमिरौं मँय सकल जहान बुढ़ा देव हो सुग्गा

अलसे सुनो हो सरइयो सुग्गा

गौरा हो गौरी हो सुग्गा

हथवा म सुमिरौं धरती चुनरिया

ऊपरे सुमिरौं भगवान

पुरब ले सुमिरौं मैं उगत सुरजिया

पश्चिम सुमिरौं सुविहान

उत्तर म सुमिरौं सरसती मइया

कंठे म गौरी गनेस


पइंया मँय लागत हवं चंदा सुरूज के

रे सुवना, तिरिया जनम झनि दे

तिरिया जनम मोर गऊ के बरोबर

रे सुवना, जहं पठवय तहं जाय

अंगठिन मोरि-मोरि घर लिपवावय

रे सुवना ननदी के मन नइ भाय

पहिली गवन कर डेहरी बइठारय

रे सुवना, छोड़ी चलय बनजार


सुवा नचइया मन देवी-देवता ल सुमरे के बाद सुग्घर सुवा गीत गाथे -


तरि हरि नाहना मोर, ना हरि ना ना रे

मोंगरा लगा ले कुआँ पार म

तुलसी के बिरवा ल चौंरा म लगा ले

दीदी, मोंगरा लगा ले कुआँ पार म

तरि हरि नाहना मोर, ना हरि ना ना रे

फूले हे कुसुम रंग फूल सुवना

का फूल लानेंव, का फूल टोरेंव

का फूल लेंव, सुबास मोरे सुवना

चम्पा फूल लानेंव, चमेली फूल टोरेंव

मोंगरा के ले सुबास मोरे सुवना

तुलसी के बिरवा ल चौंरा म लगायेंव

गोंदा लगायेंव ओरी-ओरी मोर सुवना


    सुवा नचइया नोनी मन ल देख के अपन दुलौरिन बेटी सवाना के सुरता आगे। कइसे तो इंकर मन ह उदसहा-उदसहा लागत रिहिसे। काबर कि सवाना राहै ते कतनो काम-बूता ल दउंड़-दउंड़ के करै। सवाना के दाई ह अपन गोसइया ल कहि घलो डरिस जानो-मानो बेटी ल दुसरच्च घर बर पाले-पोंसे रेहेन। धनसिंग ह जान डरिस कि सवाना के बिना ओकर दाई के मन ह दुखी हे कहिके ठिठोली करिस-तहुं ल तोर दाई-ददा मन ह मोर बर पाले-पोंसे रिहिसे।

ऐती पंचू ह गैंदू अउ भाँवत ल घर माटी करे बर तियार दे रिहिसे। सब झिन घर बियारा-भाड़ी के छबई मुंदई म लगगे। छोइले के लइक ल छोइलिन।

कुछ दिन ले पंचू के दाई ह देखत रिहिसे कि कोहड़ा ह एके ठन नांदिस ताहन बाकि मन नांदत नइहे। ओकर दाई ह कोहड़ा के ठुआ करिस तब छानी म अब दु-चार ठन कोहड़ा ह दिखे बर धरिस। घर ल साफ-सफाई करे के बाद सादा छुही म पोतीन अउ पिरौरी छुही ले खुंटियइन ताहन कपाट अउ चौखट मन म डढ़हेल तेल ल पंचू, गैंदलाल अउ भाँवत चुपरिन। तुलसी चाँवरा ल घलो सुन्दर छाब मुंद के चिकना डरिन। जउन-जउन मेर दर्रा हने राहै ओला माटी म बरंड दिन। सब झिन पहिलीच ले देवारी बर नवा-नवा कपड़ा लत्था बिसा डरे रिहिन हे। सवाना के सास ह एसो बहू के पहिली देवारी ए कहिके बने माहँगी वाले लुगरा-पोलखा लेवाए रिहिसे। बहू के आये ले अइसे लागत हे जानो मानो हमर घर म ग्वालिन ह आ के अंजोर करत हे। बिसेलाल अपन बर धोती कुरता अउ पंचू ह अपन बर ओपन सर्ट सिलवइस। गैंदू, भाँवत अऊ लखन गहिरा बर धोती अउ लाल वाले गमछा बिसा के लान डरे रिहिसे। सवाना के सास ह तो अपन बर चौड़ा-आँछी वाले पींयर रंग के कोसटउँव्हा लुगरा ले रिहिसे। लुगरा भारी गरू रिहिसे। जस-जस देवारी लकठावत गिस तस-तस राऊत मन के जोस ह घलो बाढ़े बर धर लिस। अलगोजवा बजावत-बजावत बरदी ह गाँव म जइसे अमरथे ताहन राऊत ह दोहा पारे के सुरू करथे -


नाचत आवय नंद कन्हैया,

    खोंचय कमल के फूल रे।

रामराज म दूध दही,

    कृष्णराज म घींव रे।।


वृन्दावन के कृष्ण कन्हैया,

    फेर देही असीस।

अन धन ले घर भरे मालिक,

    जुग जियो लाख बरिस।।


बरदी चरावत-चरावत राऊत मन सोहई गाथे। मालिक मन के हिसाब ले सोहई बनाए के सुरू करिन। गौटिया मन के घर के गाय गरूवा बर मंजूर पांख के सोहई बनावै। बइला मन बर रस्सी कस मोठ सोहई बनावै। सोहई गाय गरूवा के सिंगार आय। खुसी के प्रतीक आय। किसान जइसे देवारी बर जोरा करथे ओइसने पहाटिया मन घलो गाय गरूवा मन ल सिंगारे बर जोरा करथे। काबर कि इही गाय गरूवा मन ही जिनगी के आधार आय। घर-दुआर, कोठा-बियारा, गाँव के देवी-देवता सब सज के तइयार होगे देवारी तिहार बर। पंचू ह घर बर सुरसुरी अउ अपन बर लछमी फटाका लइस। पंचू के दाई ह दुर्ग के सनिचरी बजार जा के सुरहुती, देवारी अउ मातर बर जोरा करिस। ग्वालिन, माटी के दीया बिसइस, पोनी, माचिस, नरियर, उद्बत्ती, तेलई बर रसोई के सामान बिसइस। अपन बहू बर नकपालीस, माँहुर, टिकली, फूंदरी लिस। एसो तो अपन बहू बर बने वजन वाले चाँदी के साँटी घलो दुर्ग वाले सुवामल-गुजरमल सेठ के दुकान ले बिसइस। धान ल ढेकी म कुट के चाँउर के तइयारी करिस। तीली तेल अउ सरसों तेल ल डोमार साहू घर घानी म पेरवा के पहिलिस ले रख ले रिहिस। बरा बर उरीद दार एसो खेत म उतेरा ले बने होगे रिहिसे। तिही पाय के इमन ला एसो उरीद दार बिसाय के जरूरत नइ परिस। ओन्हारी म गहूँ घलो बने होगे रिहिसे। सोंहारी बर झेंझरी म बने धो के गहूं ल अच्छा सूखो के जाँता म गैंदू के गोसइन करा पिसवइस, संगे संग उरीद ल घलो दरवइस। अउ भर्री म तो बीते साल हकन के चना होये रिहिसे। भजिया बर बेसन घलो घरे म बेवस्था होगे। पउर साल कस एसो घलो कोल्लर-कोल्लर गोबर खातू के बदोलत धान ह झूमरत रिहिसे। मेड़ म राहेर ह फूले बर धर ले रिहिसे। कछार अउ भर्री म कोदो राहेर, जुँआर सब देवारी के खुसी ल मनाए बर पुरवाही संग नाचत रिहिन हे। ऐसो सोला आना खेती ल देख के गाँव वाले मन के संगे-संग बिसेलाल अऊ पंचू के मन म घलो भारी उमंग रिहिसे। घरे के उपजाए जिनिस ल खावै तिही पाए के सबो झिन भारी टन्नक रिहिन हे।

कातिक अमावस्या के एक दिन पहिली गोड़ मन अपन बहिनी ल करसा बोहाये बर लानथे। एमा गोड़ भाई मन अपन बहिनी के सम्मान तीजहारिन मन कस करथे। दिलीप गोड़ घलो अपन बहिनी ल करसा बोहाए बर लाने बर गिस। एती गाँव के मन घलो सुरहोती बर गौरा-गौरी के बिहाव म सब साथ देथे। साल भर के तिहार ल उछाह ले मनाथे। गौरी-गौरा के बिहाव के तइयारी म गोड़िन मन घलो भिड़गे। पाँच दिन पहिलिच्च गौरा-चाँवरा म फूल कुचरे के सुरू कर देथे। धनतेरस के दु दिन बाद अमावस्या के दि    न सुरहोती के धूमधाम ले तइयारी म लग जथे। बिहनिया ले कोनो बाँचे खोंचे घर दुआर ल पोतत हे, त कोनो केरा पान के बेवस्था करत हे। मंझनिया होवत-होवत पंचू के दाई ह सवाना ल कथे-दीया ल पानी म भिंगो दे राह, संझा तक पानी सोंख लिही। मोला पोनी लान के दे तो, बाती बर देथौं। कातिक लगते भार तुलसी चाँवरा म नवा तुलसी लगाये रिहिस हे। वहू ह चाँवरा म फुन्नागे रिहिसे। बेरा ढरकत जाथे। दुर्ग ले सामान लाए हन तेला निकाल के पूजा के तइयारी करौ। पंचू ह पूजा बर लाने बतासा, लाइची दाना, नरियर, उद्बत्ती अउ माचिस ल थारी म राख के तइयारी करथे। लक्ष्मी पूजा बर दूध के बेवस्था पहिलिच्च ले कर ले रिहिस।

संझा कन गोड़ मन गौरी-गौरा बर मेड़रा (गाँव के तीर नरवा) करा गाना-गावत चुरमाटी बर जाथे -


उठव-उठव बहिनी मोर

अंगना बटोरव, मोर अंगना बटोरव

चार संगी आए लेनहार ओ दीदी, चार...

पहिरो-पहिरो बहिनी रंगे रंग

लुगरा वो रंगे-रंग लुगरा वो

राजा ईसर देव के होवथे बिहावे

राजा ईसर देव के...।।


संझा कन चुरमाटी लान के रघुलाल के घर के आघू दल्लु के घर म रखिन। ओती सुरूज नरायेन के बुड़ती होइस अउ एती सुरहोती के दिन मुंधियार कना गाँव भर रिगबिग-रिगबिग दीया ले अँजोरी होइस। पंचू ह घलो पहिली बखरी-बारी, डोली-धनहा, कोठार म दीया-बाती बार के नरियर फोर के घर लहूट जथे। तब तक सवाना ह दीया-बाती ल थारी म जमा डरे रिहिसे। पंचू ह बाती ल जलइस ताहन एक के बाद एक सबो दीया चंदैनी कस जगमग-जगमग जगमगाये बर धरिस। सब ले पहिली माई खोली म, ओकर बाद तुलसी चौंरा म, रामायण खोली म ताहन सबो कुरिया, कोठा म दीया मढ़ा के, थारी म दीया धर के गाँव के देवी-देवता मन करा चघाए बर निकलगे। घर के आघू म 'बाई देवता’ म सबले पहिली दीया मड़इस ताहन ठाकुर दीया, साहड़ा देव म दीया मड़ावत घर लहुटिस तब तक ले सवाना अउ ओकर सास दुनो मिल के लक्ष्मी पूजा के तइयारी कर डरे रिहिन हे।

एसो के लक्ष्मी पूजा तो उछाह लेके आय रिहिसे काबर कि नवा बहुरिया सवाना के एसो पहिली तिहार रिहिसे। बिसेलाल ह आमा पाना, फूल अउ दुबी के बेवस्था कर के लान डरे रिहिसे। दु गोड़िया चूल्हा म आघू डहार खीर के बगोनिया ल मढ़ा दे रिहिसे अउ बाजू वाले चूल्हा म दूधफरा के कराही ल मढ़ा दे रिहिसे। फरा चाँउर पिसान के दीया घलो चुरोथे। घर म माटी के दीया अउ पिसान के दीया ल तुलसी चाँवरा कोठा-कोठी म मढ़ा के अँजोर करथे। ग्वालिन ह घलो तुलसी चाँवरा म रिगबिग अंजोर करथे। जब ग्वालिन रिगबिग-रिगबिग तुलसी चाँवरा म अंजोर करथे त अइसे लागथे जानो मानो घर म सरग उतरगे हे। ओकर बाद लक्ष्मी पूजा के तइयारी करिन। तिजौरी वाले खोली म पूजा के सबो सराजाम ल लईन। तिजौरी के दुनो बाखा म एक डहार सुभ अउ दुसर डहार लाभ, बीच म स्वास्तिक बनाए बर घींव म बंदन घोरिस। घोरे के बाद पंचू ह लिख दिस। सवाना ह पूजा ठउर ल गोबर म लिपीस। सवाना के सास ह पूजा बर लाय बतासा, लायची दाना ल थारी म राखिस। धनतेरस के दिन बहुरिया बर सोनहा फूली बिसाय रिहिसे। तेला थारी म राखिस। सबो गाहना गुरिया ल घलो थारी म राखिस। बिसेलाल ह मुहाटी बर आमा पान के तोरन बनइस। चाँदी के नवा सिक्का लक्ष्मी मइया छपे वाले घलो ले रिहिन हे तहू ल थारी म रखिस। ओकर बाद सवाना ह कलस सजइस। फूलकसिया लोटा उपर नाँदी म धान राख के दीया राख देथे। कलस म आमा पाना ल नाँदी म दबा देथे, ओकर बाद गोबर म लिपाय जघा म पिसान के चउँक पूरथे। बाजार ले लाए पूजा बर लक्ष्मी के फोटू ल पूजा ठउर म चिपका देथे। लक्ष्मी माता के संगे संग गनेस भगवान अउ सरसती माता घलो बिराजमान रहिथे। पूजा के पूरा तइयारी करे के बाद सबले पहिली बिसेलाल ह पानी ले आचमन कर के पूजा पाठ के सुरूआत करिस। गाहना गुरिया, सिक्का ल दूध म नहवइस। लक्ष्मी माता, गनेश अउ सरस्वती माता के माथ म गुलाल बंदन के तिलक लगइस। उद्बत्ती जलाए के बाद आगी म आचमन करके हुम दिस ताहन परनिया ह पूजा करिस, ओकर बाद पंचू ताहन सवाना ह पूजा करिस। पूजा पाठ करे के बाद सबो झिन मिलके लछमी माता के आरती उतारिन।


ओम जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

तुमको निसदिन सेवत, हर बिष्णु धाता।। ओम जय

    उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।

    सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता।। ओम जय

दुर्गा रूप निरंजनि, सुख-सम्पत्ति दाता।

जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता।। ओम जय

    तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।

    कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता।। ओम जय

जिस घर में तुम रहती, सब सद्गुण आता।

सब सम्भव हो जाता, मन नही घबराता।। ओम जय

    तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता।

    खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता।। ओम जय

शुभ-गुण मंदिर सुन्दर क्षीरोदधि जाता।

रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता।। ओम जय

माँ लक्ष्मी की आरती, जो कोई जन गाता।

उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता।। ओम जय


आरती उतारे के बाद तीन भाँवर किंजरिस ताहन सब झिन सुख, शान्ति, समृद्धि खातिर लक्ष्मी माता, गणेश भगवान अउ सरस्वती माता ले विनती करके आसीस माँगिन ताहन सब झिन देवी-देवता के पैलागी बनइन। पूजा पाठ पूरा होय के बाद सवाना ह अपन ससुर, सास अउ गोसइया के पैलागी बनइस। ओकर बाद पंचू ह अपन ददा-दाई के पैलागी बना के असीस लिस ताहन परनिया ह अपन पति परमेश्वर के पैलागी बना के 'लक्ष्मी पूजा’ ल पूरा करिन ओकर बाद सवाना ह अपन ससुर अउ पंचू बर सरकी अउ पीढ़हा मढ़ा दिस खाय बर। इंकर खाय के बाद सास बहू संघरा बइठके खइन। सवाना ल तो अपन सास-ससुर के मया म तो मइके के सुध करे के फूरसदे नइ मिलिस।

खाना खाए के बाद पंचू ह अपन संगवारी रामरतन संग दल्लू घर जाथे। जिंहा गोड़ मन गौरा-गौरी सिरजाए म लगे हे। पंचू अउ रामरतन घलो सनपना, चिपकावन लागथे। एती सवाना के सास ह करसा ल सुग्घर सजा के रख दे रिहिसे। गौरा-गौरी बनावत-बनावत रतिहा लगभग दू-तीन बज जथे। सामाजिक बाजा वाले मन समे के हिसाब ले पहुंचगे रिहिन। अब करसा परघाए के बेरा होगे। बजनिया मन बाजा ल पेरा बार के सेकिन ताहन बाजा मन घलो जोस म आगे। गोड़ बहिनी करसा बोह के निकलथे। बजनिया मन 'डंग-डंग ले नाच गोड़िन, डंग-डंग ले नाच’ के धुन बजाथे। करसा ल धान के बाली, माहूंर रंग, चाँउर, गोबर अउ हरदी रंग आदि ले सिंगारे जाथे। भाई ह बहिनी ल करसा बोहे बर तियारथे -


झपिया के लुगरा, पहिर मोर बहिनी

बोही लेबे बहिनी, झालर करसा,

करसा सिंगारौं भइया, रिगबिग-रिगबिग

बहिनी सिंगारौं भइया, गोमची बरन के

काकर करसा हे, रिगबिग-रिगबिग

काकर करसा, सिंगारे ओ बहिनी

गौरी के करसा हे, रिगबिग-रिगबिग

ईसर के करसा, सिंगारे ओ बहिनी


करसा परघाए के बाद गौरा ह गौरी ल बिहाए बर निकलथे। गौरा गौरी के रूप म शिव-पार्वती ल सुरहोती रात गोड़ मन अपन जात के मानथे। गौरा ह गौरी ल परघा के 'गौरा गुड़ी’ म पहुँचथे। चार पहर रात काटे बर बढ़ई करा जघा मांगथे। बढ़ई इमन ल गौरा गुड़ी दे देथे। गौरा-गौरी के आवत ले गाँव वाले गुड़ी करा कार्यक्रम देखे बर सकला जथे। गौरी-गौरा के बिहाव के खुसी म सुरसुरी, अनारदाना, चकरी जलाथे। टूरा मन दनाका, लक्ष्मी फटाका, चुरचुटिया, ताजमहल अउ लाल फटाका फोरथे। बइगा गौरी-गौरा के सेवा जतन म लगे रथे। माईलोगन मन डढ़इया चघ जथे। कतको मन 'बोरा’ माँगथे। डोरी ल तेल म भिंगो के जला के बोरा चुहाये जाथे। बेटा जात मन देवता जघथे। इमन ल सांट (सन डोरी अउ कांसी ल बर के) पीटथे। बेरा पंगपंगाए के बाद नेंग जोग करके बिसरजन के तइयारी करथे। घरो घर गौरी-गौरा के पूजा-पाठ करके असीस पाथे। जब गौरी-गौरा ल पानी म ठंडा करे बर लेगथे ते सबके आँखी ह गीत गावत गावत बोटबोटा जथे -


सुतव गौरी मोर सुतव गौरा

सुतव सहर के लोग

सुतव गौटिया, मोर सुतव गौटनीन

सुतव नगर के लोग...


बिहनिया सब अपन-अपन काम बूता म लगगे। पंचू ह कोठा के गाय गरूवा ल ढील के खइरखा डाढ़ लेगिस। सवाना ह घर के गोबर कचरा म लगगे। सवाना के सास ह घर अंगना ल बाहरे बटोरे बर धर लिस। देवारी तिहार के सेती बूता जादा रहिसे, कोनो ल सांस ले के फूरसुद नइ रिहिसे। परनिया ह घर मुहाटी ल खरहेरा म बाहर के गोबर पानी म लिपिस। खोर-गली ल बाचे पानी म दरप दिस। सवाना ह महावीर करा कुँआ ले हँवला म पानी डोहार के रंधनी खोली के बांगा, गंज मन ल टीप-टीप ले भर के तोप दिस। बिसेलाल ह लउठी धर के भर्री डहार निकलगे। खेत खार किंजरत-किंजरत भर्री-कछार ले सिलियारी, मेमरी धर के शिवनाथ नदिया डहार मुखारी चाबत नहाय बर उतरगे। तब तक ले बेरा चढ़गे रिहिसे। पहाटिया मन बरदी ल उसाल के चरावत-चरावत नदिया म उतार दिन ताहन किसान मन अपन-अपन माल-मत्ता ल धोए बर भीड़गे। पहाटनीन अउ लइका मन सोहई ल रंगाये बर भीड़गे। मंजूर पांख वाले सोहई के फूचरा मन ल चुरी रंग म रंगा-रंगा के सूखो दिन। वइसे भी पहाटिया मन सोहई के बूता ल निपटा डरे रहिथे। पहाटनीन ह अपन टूरा ल किहिस-ले बेटा सोहई ल रंगा दे। त ओकर टूरा ह मँुहु ल कोहड़ा अस फूलोए रिहिस हे मोर बर नवा कमीज नइ ले हस कहिके। ओकर दाई ह पहिलिच्च ले उठवा मनिला ल दुर्ग बाजार ले लान के संदूकम राख दे रिहिसे। टूरा ल नइ देखाए रिहिसे। जब्भे मनिला ल देखइस तभे वोहा मानिस ताहन तो फेर फटाफट सबो बूता ल निपटा डरिस। पहाटनीन ह घर बूता के संगे संग 'हाथा’ के तइयारी घलो कर डरिस। काबर कि जउन-जउन मालिक घर देवारी के दिन सोहई बंधाथे उहाँ-उहाँ हाथा देबर परथे। तभे तो उही हाथा म पहाटिया ह मालिक के सुख-शान्ति अउ समृद्धि के असीस देथे। पहाटिया के घर आए के पहिली मालिक मन घर हाथा छाप के आ जथे।

एती गाय गरूवा आए के पहिली घर म बहू-बेटी मन नहा खोर के खिचरी बनाय बर जोरा म लग जथे। कोहड़ा, कोचई, सोंहारी, बरा, अइरसा, भजिया के संगे-संग पूजा के तइयारी म घलो लग जाथे। कोहड़ा, कोचई मही म चुरथे ते मुँहु म पानी आ जथे। अपन सास संग मिल के दंगर-दंगर सबो काम ल धीरज धर के करत रिहिसे। देखते-देखत मंझनिया कन गाय-गरूवा मन कोठा म आगे। बिसेलाल ह सिलियारी, मेमरी धर के पहुंचथे। अब बिसेलाल ह नवा धोती अउ कुरता पहिर के पूजा करे बर तइयार होइस। पंचू घलो पूजा के तइयारी म लगगे। माई खोली म चूरी पाठ चघा के नरियर फोर के कुल देवी ल मनइस ताहन कोठा म गिस।

बिसेलाल ह गोबर उपर करसी ल राख के परई उपर धान के उपर दीया बार के सिलियारी, मेमरी अउ धान के बाली ल गोबर म खोंच के गोवर्धन पर्वत के स्थापना करथे। बिसेलाल सबले पहिली गोवर्धन पर्वत के पूजा कोठा म करथे। हुम जग दे के नरियर फोरथे। पूजा पाठ बर पंचू ह दउँड़-दउँड़ के सहयोग करत रहिथे। कोनो किसम के कमी झन राहै कहिके सवाना अउ ओकर सास ह आगुच्च आगू ले जोरा करत रिहिसे।

गोवर्धन पूजा के बाद पंचू ह गाय-गरूवा के गोड़ अऊ मुँहु ल धोवाथे ताहन बिसेलाल ह सबो मवेसी ल फूलकांस के थारी म खिचरी खवाथे। खिचरी खवाये के बाद सबो गरूवा के मँुहु धोआ के पाँव परके बिसेलाल अउ पंचू ह अपन-अपन हाथ ल धोथे। ओकर बाद इमन खाना खाथे। मवेसी ल खवाये खिचरी के बाँचे हिस्सा ल परसाद के रूप म घलो पोरसथे। खाना खाय के बाद पंचू ह पार-पंगत मन घर खिचरी खवाय बर जाथे। डिहवार के मन घलो बिसेलाल घर खिचरी खवाये बर आथे। खिचरी खवाये के बाद पंचू ह गाय बइला के सिंग ल तेल म पालिस करथे। ठउंका ओतके बेर पहाटिया के दोहा सुनई आथे। अउ दमउ-दफड़ा ह घटकत रहिथे। पहाटिया के दल घर के अंगना म पहुंचथे ताहन अरे रे रे भाई रे... काहत दोहा पार-पार के नाच म बिधुन हो जाथे। पहाटिया ह घर के गाय मन ल सोहई बाँधथे अउ बइला मन ल डोरी बरोबर रोठ सोहई बांधथे। ओकर बाद तो गाय बइला मन के सिंगार ह देखे के लइक रथे ताहन पहाटिया ह हाथा म असीस देथे -


हरियर चक चन्दन, हरियर गोबर अभिना

गाय-गाय कोठा भरे, बरदा भए सौ तिना

    जइसे के मइया तिहे दीहे

    तइसे के देबो असीसे

रंग महल म तुम बइठव गौटिया

जुग जियौ लाख बरिसे


एकर बाद अपन पहाटिया के खांध म धोती डारथे ताहन पहाटिया दल ल चोंगी माखुर, चाहा पानी पिया के बिदा करथे। सोहई बंधाये के बाद गाँव भर के किसान मन मवेसी ल फेर खइरखा डाढ़ लेग जथे। देवारी मातर तक बरदी चराय बर पहाटिया मन बनिहार लगाये रथे। उमन बरदी ल परिया डहार चराय बर लेग जथे।

राउत मन चरबज्जी बाजा गाजा के संग मालिक परघाए बर जाथे। गाँव के सब्बो मनखे लइका-पिचका होवै, चाहे बेटी-माई चाहे बुढ़वा-जवनहा सब नवा-नवा कपड़ा पहिर के सांहड़ा देव करा सकलाये बर धरिन। राउत मन मालिक परघाए के बाद दल बल के साथ नाचत कूदत दोहा पारत गनपत घर के मड़ई ल परघा के सांहड़ा देव करा लानथे। कभू कभू मड़ई ह रिसाए ल धरे ओला मना के सब झिन सांहड़ा देव करा सकलाथे। आज तो कानी-खोरी मन घलो सुन्दर सिंगार करे हे। काबर कि जीयत मरत के देवारी आय। देखते-देखत सुरूज नरायेन बूड़े के इशारा करत हे तभे तो बुड़ती डहार आकास ह लाली-लाली दिखत हे। अब सब ल बरदी के लहूटे के अगोरा रहिथे। ठउँका लखन गहिरा के नजर बरदी उपर परथे ताहन दोहा पारे के सुरू करथे। गाँव वाले मन बरदी बर जघा छोड़ के रद्दा के दुनो डहार खड़ा हो जथे। सांवत ह अपन नाती ल खंधुलाई चघा के तिहार देखावत रहिथे। ओला देख के बिसेलाल घलो मने-मन गुने मोरो नाती नतरा आही ताहन महुं ह सांवत कस खंधुलाई बइठार के गोवर्धन पूजा ल देखाहूँ। लखन गहिरा ह एक ठन बछरू ल धर के लइस अउ सांहड़ा देव म रखाये गोबर ल खुंदवा के गोवर्धन पूजा करिन ताहन गोबर के सब झिन एक-दूसर के माथ म तिलक लगइन। गोवर्धन खुंदाय के बाद सब अपन-अपन घर चल दिन।


तेरह


जेठउनी मनाए के बाद बर बिहाव बर शुभ बूता के सुरूआत हो जथे। मड़ई-मेला ह गाँव-गाँव भराये के सुरूआत देवारी के बाद सुरू हो जथे। अब तो धान लुवई फदक जथे। हरहुना धान तो देवारी के आस पास लुआये बर धर लेथे। माई धान अग्घन पुस तक लुवाथे। बिसेलाल घलो सोखर्रा खेत म हरहुना धान अउ मटासी धनहा म माई धान बोए रिहिसे। हरहुना धान ह पोटपीट ले पाक गे रिहिसे। धान के बाली ह पाक के भुइयाँ बर माँथ नवावत रिहिसे। हँसिया ल पंचू ह लोहार करा पजाये बर गे रिहिसे। ओतके बेर गनपत घलो हँसिया पजाय बर पहँुचिस। गनपत पंचू ल पूछथे-कोन डहार के धान ल लुए के शुरू करत हौ बेटा? पंचू किहिस- भेड़सर खार के धान ल पहिली लुबोन कका! देख न कका ए बादर ह घलो डरवाये बर धर लेथे। पउर साल अच्छा धान लुए के समय पानी दमोर दे रिहिसे। सबो धान ह सुत गे रिहिसे। भारी नुकसान होय रिहिस। गनपत कथे-महूँ ह डर्रावत हौं बेटा एसो फेर दुब्बर बर दु अषाढ़ झन कर दे फेर भगवान उपर भरोसा हे, एसो नुकसान नइ होही कहिके। कका-भतीजा के गोठ होवत ले लोहार ह पंचू के हँसिया मन ल पजा डरिस। पंचू के जाये के बाद गनपत अउ लोहार चोंगी सुलगइस ताहन चोंगी पीयत पीयत गनपत ह भट्ठी ल धँुकना सुरू करिस। ओती लोहार ह भट्ठी म कोइला डार-डार के ताव ल बढ़इस ताहन हँसिया ल भट्ठी म डार दिस। हँसिया ह लाल-लाल दिखे ल धरिस ताहन उलट-पुलट के हँसिया ल लोहार ह पजा के ठंडा करे बर पानी म डारत गिस। देखते-देखत गनपत के हँसिया घलो पजा गे ताहन सब झिन धान लुये बर भीड़गे। धान ल लु-लु के करपा-परपा मड़ावै। धान लुवइया मन धान लुवत हे, गैंदू अउ भाँवत भारा बाँधत हे। भारा ल बाँध-बाँध के गाड़ा म जोरत गिन। बिसेलाल ह गाड़ा के उपर चघगे, पंचू ह भारा ल रच-रच के मड़ावत जवै। गाड़ा म भारा भराये के बाद डोर म कस-कस के बाँध दिन ताहन बइला ल फांद के पंचू ह डाँड़ी म बइठ के हुर्र कही दिस। बिसेलाल ह गाड़ा के आघू-आघू धोती ल सकेलत दंगर-दंगर रेंगत गिस। बइला मन अपन मालिक  के पीछु-पीछु गाड़ा ल तीरत लपकत आघू चलत गिस। बियारा म आये के बाद पंचू ह बइला ल ढील के घर लेगिस। ओकर बाद भाँवत अउ गैंदू ह धान के खरही ल गाँजत गिस। संगे संग कोदो, मड़िया अउ जोंजरा ल घलो सकेलिन।

गाँव भर किसान खरीफ फसल के लुवई-टोरई म लगगे। कतनो मन लाख, लाखड़ी अऊ उरीद ल छपहा पानी म छीत दे रिहिन हे वहू मन उमियाय बर धर ले रिहिसे। कतनो मन चना ल भर्री म उतेर डरे रिहिस। कतनो मन धान लु के उतेरिन। कतनो किसान भर्री म ओलाही मिर्ची, भाटा बोए रिहिन त कतनो मन घर खाय बर गहूँ ल उतेरिन। अब तो देशी पताल अउ गोलेंदा भांटा के दिन आगे रिहिसे। चुचुटिया अउ सुकसी म तो दु काँवरा जादा खवाय ल धर ले रिहिसे। फर वाले धनिया फूले बर धर लिस। फर वाले धनिया, बटराली मिर्ची, अउ पताल ल गड़ा नुन सन सिलपट्टी पीस के चटनी संग खाबे ते अंगरी घलो चाँटत रहि जबे। अब सवाना ल अम्मट खाये के सउँक अउ बाढ़गे। पंचू ल किहिस-उप्पर कछार डहार जावत हस ते आज गोलेंदा भाँटा ल लाबे। मही बिलोए हवँ अम्मट म राँधहूँ।

लगती पुस म सवाना ल अम्मल म रेहे सात महीना के होगे रिहिसे। कोथाही पेट वाली ए ते पाय के पेट ह भारी दिखत रिहिस हे। सियनहीन मन काहै कि पेट म बेटी खेलथे ते माईलोगन के सुन्दरता ह बाढ़ जाथे। अउ पेट म बेटा खेलत रथे त सुन्दर ले सुन्दर माईलोगन ह घलो सुकसुक ले दिखथे। सवाना के घलो इही हाल रिहिसे। सुकसुक ले दिखत रिहिसे। ओकर सास ह अपन बहू बर आनी-बानी के खजानी लान-लान के खवावै। बिसेलाल मने-मन कुलकत राहै। नाती आही ताहन ओला खेलाहूँ। नाती ल घोड़ा बन के पीठ म चघाहूँ। पिठउँव्हा चघा के घुमाए बर लेगहूँ। पंचू आनी बानी के सपना देखत रिहिसे। मैं जादा नइ पढ़ेव ते नइ पढं़ेव फेर मोर दुलरूवा बेटा ल हकन के पढ़ा के बाबू-मुंशी बनाहूँ।

सवाना के महतारी ह अपन ननंद केकती ल एक दिन पहिलीच बला डरे रिहिसे अउ अपन देरानी, जेठानी ल घलो सवाना घर सधौरी खवाय बर जाना हे कहिके तियार डरे रिहिसे। बिहनिया ले खीर-सोंहारी बरा राँधे बर केकती अउ ओकर भौजी भीड़गे। बेटी घर जाना हे कहिके सवाना के दाई के मन म भारी उमंग रिहिसे। धनसिंग के एकलौती बेटी रिहिसे सवाना ह। सब सिंगार के सामान घलो बिसा डरे रिहिसे। खीर ल बगोंनिया म जोर के मलिया तोप के गँवाय झन कहिके फरिया म चुमचुम ले बाँध दिस। सोंहारी बरा अउ भजिया ल बटकी म राख के थारी म तोप के जुनहा म कस के बांध दिस। लुगरा-पोलखा अउ चूरी-चाकी ल सुग्घर जतन के एके म बांध के जोरा करे रिहिसे। धनसिंग ह भात खा के खासर ल बियारा म सम्हरइस ताहन छाकड़ा बइला मन ल चारा-पानी खवा-पिया के टन्नक करिस। धनसिंग ह अपन गोसइन ल किहिस-जल्दी चलौ दुरिहा के रद्दा ए सांझ हो जही। ओकर बाद धनसिंग ह खासर म बइला ल फांदिस ताहन सवाना के दाई, काकी अउ फूफू नवा-नवा लुगरा पोलखा पहिर के हाँसत-कुलकत बइठिन। बइठे के बाद धनसिंग ह खासर के डाड़ी म बइठे डेरी हाथ म कांछड़ा ल धरे जेउनी हाथ म हुर्र कहिके बइला मन ल हाँक दिस। धनसिंग ह अपन बछवा मन के जतन मन लगा के करै तभे तो बछवा मन चिक्कन-चिक्कन दिखत रिहिसे। बछवा मन के गर म घंटी बंधाय रिहिसे। धनसिंग ह जब बछवा मन ल हाँकिस तब उँकर घंटी ह बेलौदी जाय खातिर बाजे बर धर लिस। जब छांकड़ा बइला मन लुहंगावत दउँड़िस ते बिरेझर ले थनौद, थनौद ले अँजोरा, अँजोरा ले रसमड़ा होवत नगपुरा के उत्ती डहार मुड़क के मालूद करा पहुँचगे। एती सवाना ह रहि रहि के घर ले निकल निकल के मुहाटी करा अपन मइके वाले मन के रद्दा देखत रिहिसे। जइसे थक हार के भीतरी खुसरिस ओइसने घर के आघू म घंटी के आवाज अइस ताहन सवाना ल ओरखे बर जादा समे नइ लगिस। ओथराए चेहरा ह हँसी म बदलगे। सवाना ह पंचू ल किहिस दाई आगे तइसेे लागथे। पंचू ह धकर लकर घर के बाहिर निकलिस तब तक ओकर ससुरार वाले मन खासर ले उतरगे रिहिसे। पंचू ह सबो झिन के टुप-टुप पाँव परिस ताहन  खासर ल बियारा डहार लेग के बछवा मन ल उहें ढिल के खुंटा म बाँध के पेरा दे दिस। एती सवाना ह फुलकसिया अउ पेंदियही लोटा म पानी निकाल के मुड़ी ढांक के पानी दिस ताहन सब झिन के पाँव परिस। बिसेलाल ह अपन समधी संग जोहर बनइस। परनिया ह अपन समधीन मन संग जोहार बनइस ताहन सब झिन सवाना ला सघौरी खवाए के नेंग ला पूरा करिन। बिहान दिन धनसिंग ह जाये बर बिदा माँगिस। बिसेलाल ह एकाद दिन रूके बर बिनती करिस फेर धनसिंह ह जाये बर हाथ जोड़ लिस काबर कि धनसिंग के धान पान के घलो सेकलई चलत रिहिसे ताहन चाहा पानी पी के बिरेझर जाये बर खासर फांद के लहूटगे। 

धान-पान सकेलत, पुस ह फुस ले निकलगे। महीना कइसे निकलिस ते आरो नइ लगिस। बिसेलाल ह खेत डहार ले लाखड़ी भाजी अऊ भर्री ले गोलेंदा भाँटा लाय रिहिसे। संझा कन मिला के रांधिस ते मजा आगे। ओकर कुछ दिन बाद तो लाखड़ी के बीजा के दिन आगे। मुनगा संग लाखड़ी के बीजा ल रांध के खाये के आनंद अइलगे राहै। वइसे भी जड़काला म साग ह जादा सुहाथे। अब तो सवाना ह आठ महीना के अम्मल म रिहिसे तेकर सेती पताल के चटनी ल बइठ के सील म नइ पीस सकत रिहिसे। फेर मँुहु म पानी जरूर आवत रिहिसे। एकाद दिन मइरका के अथान ल हेर के खा लेवत रिहिस त एकाद दिन ओकर सास ह पताल के चटनी पीस देवत रिहिसे। जड़काला म बिसेलाल ह कभू सण्डइया काड़ी नही ते रहेर काड़ी के भूर्री बार के तापे। परनिया ह वइसे भी रोज गोरसी भरै। बिहनिया गोरसी म परसा पान म अंगाकर रोटी रांध के बिसेलाल अऊ पंचू ल खवावै। अंगाकर रोटी म घींव ल घलो चुपर देवत रिहिसे तभे तो माई-पिल्ला अंगाकर रोटी के परसादे टन्नक रिहिन हे। सवाना ह पुन्नी नहाए बर नदिया जाहँू किहिस त ओकर सास ह समझइस अभी नदिया नरवा झन जा अइसन दसा म गिर हपट जबे ते बड़ा अलहन हो जही। सवाना समझदार रिहिसे वोहा कभू अपन सास के बात ल नइ टारिस। अब तो आमा घलो मउँरे बर धर लिस। सरसों ह पींयर-पींयर लुगरा पहिरे घमाघम फूले हे। भौंरा मन घलो अब गुनुन-गुनुन गुनगुनाए बर धर लिस। बसंत के पुरवाही सबके मन म उछाह भरत रिहिस। बसंत पंचमी के दिन लइका मन होले डाड़ म अण्डा पेड़ के डारा गड़ियइस ताहान लइका मन फागुन म होलिका दहन खातिर लकड़ी सकेले के शुरू करिन। गांव म पहिलिच्च ले लइका मन ल हरियर रूख-राई ल काँटे बर मना कर दे रिहिसे। तिही पाए के लइका मन होलिका दहन बर सुक्खा-सुक्खा लकड़ी ल सकेलिन। दु-चार दिन पहिलिच्च बुढ़वा सियान गांव के स्कूल करा डंडा नाचे बर जावै। नेवरिया लइका मन ल सियान मन डंडा नाचे बर सिखोवै। बिसेलाल ह घलो कोनो ल लचके बर सिखोवै त कोनो ल डंडा के ठिक्की मारे बर त कोनो ल कुहकी पारे बर सिखोवै। बिसेलाल के संगे संग गलबलिहा, रामचरन अऊ थनवार घलो जवनहा मन ल डंडा नाचे के पैतरा ल सिखोवै। गनपत के संग गैंदू, भाँवत, प्यारे लाल अऊ थुकेल ह डाहकी बजाये बर लग जवै। प्यारे लाल ह मड़िया के फाग गाये के शुरूआत-सरा ररा सुन ले मोर कबीर कहिके कर देथे! फागुन पुन्नी के दिन होलिका दहन करथे। मुहतुर के हिसाब से होलिका जला देथे। गाँव भर के मन पांच-पांच ठन छेना लान-लान के होले जलत रहिथे, तेमे डारत जावै। कतनो मन घर के ढेकना ल घलो लान के होलिका ठउर के आगी म बरो देवत रिहिन हे।

होली खेले के दिन सवाना ह जेचकी बर अबक-तबक रिहिसे। ओकर सास ह जादा छोड़ के एती-ओती नइ जा सकत रिहिसे तभो ले तिहार के जोरा ल कर डरे रिहिसे। नहा खोर के सवाना के सास ह तेलई म बइठगे। सवाना ह घलो धीरे बांधे करे के लइक बुता ल करत रिहिसे ओकर तन ह पाके आमा कस दिखत रिहिसे। सवाना के हालत ल देख के ओकर सास ह काम बूता बर मना करत रिहिस। सवाना ह रहि-रहि के पेट ल छुए काबर कि तन म हल्का-पुल्का पीरा ह जनाय बर धरत रिहिसे। रोटी पीठा के चुरत ले बिसेलाल ह नहा खोर के आगे। लोटा के पानी ल तुलसी चौरा म डार के पलागी बनइस। कपड़ा के पहिरत ले माई खोली म पूजा के तइयारी होइस ठउंका ओतके बेर पंचू घलो आगे ताहन सब झिन मिल के पूजा करिन। एक-दूसर के माथ म गुलाल लगा के होली मनइन। गाँव भर ह होली तिहार म कुकरा-बोकरा, मछरी कोतरी म महर-महर करत राहै फेर बिसेलाल मन केवट भले रिहिन हे फेर मछरी कोतरी अऊ आरू-दारू ल नइ छियत रिहिन। गली म जेकरे मँुहु ल सुंघथे, भक्क ले माहके। पंचू ह जब छोटे रिहिस तब पिचकारी बिसा के लानत रिहिस फेर जब ले जाने सुन के लइक होय हे तब ले पंचू ह पिचकारी लेबे नइ करै। बांस के जोरदार पिचकारी बना लेवै। अब बिसेलाल ह अपन नाती-नतरा बर पिचकारी बिसाये के सपना देखत हे। 

चरबज्जी सब गांव भर के मन मड़ईया पारा म सकलागे। दरबारी के घर के आघू म डाहकी (नंगाड़ा) बजइया मन फाग गाये के सुरू करिन। पंचू डंडा नाचत कुहकी पारे बर धरिस। पुन्नू यादव अउ कुलेश्वर ताम्रकर ह फाग गाए के शुरू करिस -


मन हर लियो रे, मन हर लियो रे

छोटे से स्याम कन्हैया

छोटे से रूखवा कदम के

भुइयाँ लहसे डार

उपर म बइठे कन्हैया, कन्हैया

मुख मुरली बजाय

छोटे से स्याम कन्हैया...

        

ओती डंडा नाचत नाचत पंचू ह कुहकी पारत रिहिसे। एती सवाना दुख-पीरा खावत रिहिसे। सवाना के सास ह खोरबाहरा ल पंचू ल बलाए बर भेजिस। पंचू घर अइस ताहन ओला तुरते सुईन ल बलाये बर पठोइस। तब तक मुंधियार होगे रिहिसे। सुईन आगे। खोली म गांव के एक-दु झिन सियनहीन जउन मन जेचकी निपटावै, सुईन अउ सवाना के सास रिहिन। खोली के बाहिर पंचू अउ बिसेलाल ह बैचेन हो के एती ओती होवत राहै ताहन एकाएक लइका के किलकारी सुनई दिस। सुईन ह थोकिन रहि के बिसेलाल अउ पंचू ल लइका ल देखइस नांगर जोत्ता आय हे नांगर जोत्ता। सबके चेहरा म खुसी के लहर दउंड़गे। सवाना के सास ह सुईन अउ गांव के दाई जउन जेचकी निपटाए बर आये रिहिन हे उमन ल रूपिया पइसा दे के बिदा करिस अउ अपन ह जच्चा-बच्चा के सेवा म लगगे। सवाना के सास ह तो कांके पानी, तीली लाडू, सोंठ ढूड़ही अउ मुनगा-बरी के सबो तइयारी पहिलीच ले कर डरे रिहिसे। अब पंचू अउ बिसेलाल छठ्ठी के तइयारी म लगगे। छठ्ठी के दिन पंचू के टूरा के नाम धर दिस चैत म पैदा होय हे कहिके चैतू।


चौदह


चैतू ह जनम होइस त निच्चट लिल्हर रिहिसे, सम्हलही ते नइ सम्हलही कहिके सवाना अउ पंचू गुने बर धर ले रिहिसे। फेर परनिया के सेंकई-चुपरई म चैतू ह टन्नक होगे। बीच म सवाना के दूध घलो नइ आवत रिहिसे त परनिया ह अपन बहू ल पपीता बर सलाह दिस। तब तक ले चैतू ल गाय के दूध ल पिया-पिया के बड़े करिस। कभू-कभू चैतू के फूफू ह दूध पियाय बर आवत रिहिसे काबर कि छै महीना पहिली ओकरो जेचकी निपटे रिहिसे। अब चैतू मड़ियाय बर धर लिस ताहन ठुबुक-ठाबक रेंगे बर धरिस। अब पंचू ह दुर्ग के सनिचरी बाजार ले गुलढुली बिसा के लानिस ताहन बिसेलाल अउ परनिया ह अपन नाती ल रेंगे बर सिखोइन। कभू-कभू गुलढुली ल धरे-धरे रेंगत-रेंगत चैतू गिर जवै ताहन जोर से चिल्लाय बर धरय। चैतू के रोवई ल सुन के सवाना ह दउंड़त आवै। का होगे बेटा ल, का होगे। चुप कराय बर भुइयाँ ल पीट के चुप करावै। देख तोला गिरइसे गुलढुली ह कहिके वहू ल पीटै। तभो ले चुप नइ होवै त परनिया ह काहै-चैतू ल पिया दे वो ताहन सवाना ह छाती म थपटा के चुप बेटा कहिके चुप करावै। तभो ले चुप नइ होवै त सवाना ह चैतू ल पियाय बर एक कोंटा म पल्लु म ढांक के पियाय बर बइठ जवै। पंचू ह खेत डहार ले आथे त सवाना ल कहिथे-बड़ भूख लागत हे सवाना जल्दी खाय बर दे। सवाना कथे-अब तोर भूख ल देखौ ते तोर बेटा के। पंचू कथे-अब तो बेटा के आय ले बाप बर कहाँ ले मया रही। सवाना कहिथे-अइसन बात नोहे हो! मोर बर तो दुनो बरोबर अव फेर तैंहा भूख ल सहि सकत हस फेर लइका थोरे सहि सकत हे तिंही बता। तब तक ले चैतू सुते बर धर लेथे। ठउंका ओतके बेर परनिया ह आथे। पंचू ह हाथ गोड़ म तेल चुपरत रथे। परनिया ह अपन बहू ल कहिथे-चैतू ल मोला दे सवाना, तैं पंचू ल खाय बर दे। परनिया ह चैतू ल घटिया म सुति जबे बेटा, सुति जबे बेटा कहिके लोरी सुनावत सुता देथे। ओतके बेर बिसेलाल घलो आगे। अपन गोसइया अउ ससुर बर पानी पीढ़हा लगइस। 

रतिहा काम बूता सकेले के बाद अपन-अपन खोली म चल देथे। चैतू ल सवाना ह सुतावत रिहिसे। पंचू घलो गांव म सुकलाल घर छठ्ठी के दिन रामायण पढ़ के अइस। ओतका बेर सवाना के नींद ह नइ परे रिहिसे। कण्डिल के चाबी ल अइठ के अंजोर ल कम कर दे रिहिसे। पंचू ह घर म खुसरिस त माई दरवाजा के सकरी ल लगा के अपन खोली म गिस। कइसे तो आज चैतू के देह ह तीपे कस लागत रिहिसे तिही पाय के सवाना के नींद नइ परत रिहिसे। जागत-जागत दुनो झिन गोठियात रिहिन हे। पंचू ह किहिस बइद ल बला के लावौं का? सवाना कथे-ले न चार पहर रात ल देख लेथन ताहन बिहनिया बइद ल बला के लान लेबे। पंचू कथे अरे बुखार ह नइ उतरत हे ते कपड़ा ल पानी म भिंगो के देह ल अगोंछ दे। पानी म देह ल अगोंछे के बाद बुखार ह उतरथे ताहन पंचू ह कण्डिल ल बूता देथे। ओकर बाद दुनो झिन गोठियावत-गोठियावत लइका ल बीच म सुता के सुत जथे। सुतत-सुतत पंचू कथे-चैतू ल बिक्कट पढ़ाबो सवाना देख न महँू ह  दुए किलास भर पढ़ पायेंव। चैतू ल पढ़ा के बड़े मनखे बनाबोन। सवाना कथे-अप्पड़ ल मारे थप्पड़े थप्पड़। मँय तो अक्षर ल देखे नइ हवँ फेर महँू गुनथौं मोरो लइका ह पढ़-लिख के नाम कमाही कहिके।

पंचू कथे-देख न कुर्मी पारा वाले मन के लइका मन कइसे पढ़-लिख के नौकरी करत हे। सवाना कथे नौकरीच करना जरूरी नइहे हो! खेती अपन सेती। पढ़े-लिखे लइका ल नौकरीच करना जरूरी नइहे, पढ़-लिख लिही ते अपन अवइया वंश ल अऊ जादा पढ़ाही। गांव-समाज ल दिशा दिही। पंचू कथे-गांव समाज ल दिशा दे ले पेट नइ भरै। बल्कि खुद के दिशा ह ठीक रही ते अपने आप समाज के दिसा ह बने हो जही। नौकरी करही त लइका ह सहर म जाही। अपन जीवन स्तर ल सुधारही ताहन अवइया पीढ़ी के जीवन स्तर ह घलो सुधरही। गोठियावत-गोठियावत पंचू अउ सवाना के नींद पर जथे। 

बिहनिया उचथे ता देखथे त बछरू ढिलागे राहै ताहन सवाना ह अपन गोसइया ल उठइस-सुन तो बछरू ह ढिलागे हे, सबो दूध ल पी डरे हे तइसे लागत हे। आज बरवाही के दिन आय। पहाटिया फेर खिसियाही। पंचू कथे-पहाटिया ह तो बाद म खिसियाही, पहिली ए सोच कहँू ए बछरू ल अनपचक  झन होवै। पंचू ह गाय करा ले ओकर थन ल छोड़वा के लान के बांध देथे। पहाटिया गाय दुहे बर नोई ल गला ले निकाले बर धरत रिहिस हे, बछरू ल बांधे बर। ओतके म पंचू कथे-आज तो बछरू ह पी डरे हे, पहाटिया बरवाही ल काली लेग जबे। सुन के लखन गहिरा के मन उदास हो जथे। काबर कि बरवाही के दिन के दूध अउ घर म भईस रिहिसे तेकर दूध ल सकेल के दुर्ग लेगे।

गांव म जाम बगइच्चा रिहिसे। घरो-घर जाम के बगइच्चा। कतको घर ऊंच पुर बहू आवै, तउनो ह बउनी हो जवै, जाम बोझा डोहरयी के मारे। हां, फेर सब्बो के थैली हा खनर-खनर करत राहै। बेलौदी के जाम तो टाटा तक जावै। बिसेलाल अउ पंचू ह डंगनी ल धर के जाम बोझा करे बर चल दिन। जाम ल टोर के सांझर-मिंझर बोझा कर के खरिया बांध के बोझा ल सिधियइन, उप्पर म सुग्घर चिक्कन-चिक्कन बड़े-बड़े जाम ल सिधिया के बोझा ल ऊंच करिन ताहन कांवर ल बोह के लुँहगावत घर म अइन। परनिया ह सींका के दुहनी ल निकाल के दही ल बिलो-बिलो के लेवना निकाल डरे रिहिसे। लेवना ल दुनो हाथ म लगा के चैतू के मँुहु म चुपर दिस ताकि लइका ओगराही कहिके। लेवना ल सवाना ह कटोरी म चुरोवत रिहिसे। आज तो पंचू ह भर्री डहार ले गोलेंदा भांटा घलो लाय रिहिसे। मही भांटा म साग रांधिस ते परोसी घलो जान डरिस। संगे-संग भांवत अउ गैंदू घलो अपन मालिक मन के संगे-संग अपनो मन बर जाम टोर के बोझा कर डरे रिहिन हे। काबर कि ओ घर के हाथ गोड़ गैंदू अऊ भांवत रिहिसे। घर जाय के बेर मलिया म यहू मन मही भांटा साग धरके गिन। बिसेलाल अधेड़ भले होगे रिहिसे फेर अभी घलो ठोस रिहिसे। गांव म दस एकड़ के जोतन दार ल घलो बिना कमाए अंग नही लगै। तभे तो बिसेलाल ह सलुखा धोती म भले राहै फेर धन दोगानी ले पोट्ठ रिहिसे। कोनो करा खेत बेचावत हे कहिके सुनत देरी राहै ताहन रातो-रात कब बियाना दे के आ जवै ते कोनो ल आरो नइ लगै। 

मुंधराहा नौकर मन के संग म जाम बोझा ल कांवर म धर के निकलिन। सिरसा बांट के शिवनाथ नदिया म रेती निकासी बर ट्रक लगे राहै। ट्रक म बोझा ल जोरिन ताहन अपनो मन फलास के ट्रक म चघ गे। बिसेलाल ह चकमक ल निकाल के कपास ल टेका के लोहाटी डंडी मार के रूई ल जला के बीड़ी ला सुलगइस। पंचू ल घलो चुलुक लागत रिहिसे फेर बाप के आघू म मन मारे के सिवा कोनो रद्दा नइ रिहिसे। सुरूज नारायेन उवे के पहिली इमन सुपेला बाजार पहँुचगे। बेलौदी के जाम मने कश्मीर के सेव। तुरते कोचिया मन झपट ले। मुँह मांगे दाम दे के मलोवन बिसा लेवत रिहिन। वहू दिन जाते भार कोचिया मन चारो कांवर के जाम ल बिसा डरिन ताहन फेर चारो झिन चाय नास्ता करिन। पंचू के धियान ह तो अपन लइका बर खिलौना डहार गे रिहिसे। चैतू बर घुनघुना अउ पुक लिस। 

चैतू ह द-दा, ब-बा अउ म-मा केहे बर धर ले रिहिसे। घर पहुंचते भार पंचू ह चैतू ल चुम के एक हाथ म घुनघुना अउ दुसर हाथ म पुक धरा दिस। ननपन ले चैतू उतलंगहा रिहिसे। कभू मेचका ल कोचके, त कभू पिटपिटी सांप ल। कभू कुकुर पीला मन ल धर-धर के चुमत चांटत राहै। अपन जोड़ के लइका मन ल ढकेल दे, त काकरो उपर पानी सींच दे। किसन कन्हैया कस चैतू के घलो बिक्कट सिकायत आवै सवाना करा। सवाना ह पंचू ल बतावै। एक दिन पंचू ह चैतू ल बनेच थूर दे रिहिसे। चैतू के नाक डहार ले लहू आए बर धर ले रिहिसे। धकर लकर गोबर ल लगइस त खून ह रूकिस। ओकर बाद सवाना, बिसेलाल अउ परनिया ह पंचू ल बिक्कट लड़े रिहिन हे। तब ले पंचू ह किरिया खाये रिहिसे कि अब चैतू ल नइ बरजव कहिके।

अब तो चैतू ह खेलत-कूदत जतके बाढ़त गिस ओतके ओकर उपद्रव बाढ़त गिस। एती सवाना फेर अमली खाए बर धर लिस। देखते-देखते धनेसरी के जनम होगे। अब तो सबके धियान ह धनेसरी डहार चल दिस। धनेसरी के पैदा होय ले चैतू बर मया घलो आधा होगे। अब तो सब चीज के आधा-आधा होय लगिस। पहिली पोगरही एकेल्ला खावै अब मन भर के खाय बर नइ मिलै। चैतू कभू धनेसरी के खजानी ल झटक के खाय बर धरे, त सवाना ह थपरा दे। चैतू ह रोय बर धरे तब ओकर डोकरी दाई ह मनावै अउ काहै, तेंहा बड़े अस बेटा। धनेसरी ल दे के खाय कर फेर ओकर हिस्सा ल झटके झन कर। ले चुप बेटा चुप ओकर डोकरी दाई खिसा ले पइसा निकाल के देवै ताहन चुप होवै। अब तो चैतू ह दुकान ले खजानी बिसा के खाय बर धर लिस। एक दिन द्वारका सेठ करा ले बिस्कुट ले के धन्नू ह जावत रिहिसे। चैतू ओकर बिस्कुट ल झटक के खा के भाग गे। धन्नू के दाई ह चैतू ल कुंआ पार म खिसियइस त ओकर गघरी ल पुक म फोर दिस। रोज-रोज के सिकायत ले हलाकान होगे सवाना ह। अब सवाना के पेट फेर दिखे बर धर लिस। गांव के माईलोगन मन काहै डेढ़ौली ए वो डेढ़ौली। 

चैतू ल ओकर बुढ़ी दाई ह समझाये बर धरै अपन दाई ल जादा हलाकान झन करे कर बेटा अभी पठउहाँ ले तोर अऊ भाई नही ते बहिनी अवइया हे। अब पंचू ह सोचिस चैतू ह बिक्कट पदोवत हे कहिक स्कूल म भरती कर दिस। जब चैतू पढ़ के घर ले लहुटिस त चार-छै झिन माईलोगन मन सकलाय राहै। चैतू पूछिस का होगे? त ओकर बुढ़ी दाई किहिस-तोर भाई आ हे बेटा तोर भाई आय हे। ता ओकर का नाम रखहूं। बुढ़ी दाई किहिस-तोर नाम चैतू हे तोर छोटे भाई के नाव बैसाखु रही। 

चैतू ननपन ले उतलंगहा रिहिसे। स्कूल म काकरो बुगई खन दे त कोनो ल कोचक दे त काकरो खजानी ल झटक के खा लेवै। चैतू के लिंगोटिया संगवारी धन्नू रिहिसे। सालिकराम गुरूजी ह भारी अनुशासन वाले रिहिसे। सालिकराम गुरूजी ह हेड मास्टर रिहिसे अऊ सहायक गुरूजी के रूप म जगदीश गुरू जी रिहिसे। दुनो झिन मिलके स्कूल ल सम्हाले रिहिन हे। चैतू ह दुसरी कक्षा म पहुंचगे रिहिसे। सालिकराम गुरूजी ह हीर्री ले सइकिल चलावत आवै। जे दिन सालिकराम गुरूजी नइ आवै ओ दिन लइका मन ल तिहार कस लागै। सालिकराम गुरूजी अउ जगदीश गुरूजी ह कुट-कुट ले मार-मार के पढ़ावै तेकरे सेती बेलौदी के लइका मन पढ़ई के संगे-संग खेलकूद म दुर्ग जिला म अव्वल राहै। बचे समे म लइका मन ल बागवानी करावै। साग भाजी अउ फूल बोवै।

एकर ले लइका मन खेती किसानी संबंधी बूता ल पढ़ई के संगे-संग सिखै। स्कूल ल दान म मिले खेत ल लइका मन बोवै अऊ लुवै। धान के पइसा ल स्कूल के विकास म लगावै। जउन लइका पहला-दुसरा आवै उमन ल ईनाम देवै। शिक्षा अउ खेलकूद के दिशा म पंदोली देवै। 

एक दिन सालिकराम गुरूजी ह स्कूल म आते भार दूसरी कक्षा के कमरा म गिस। गुरूजी के कमरा म खुसरते भार सब लइका मन खड़ा हो के 'जय हिंद गुरूजी’ कहिके अभिवादन करिन। गुरूजी किहिस-बइठ जव। वइसे भी सालिकराम गुरूजी ह अनुशासन प्रिय अउ तमतमहा किसम के रिहिसे। जब ओह स्कूल अइस त दूसरी के लइका मन चोरो बोरो हो हल्ला करत रिहिन हे। गुरूजी ह लइका मन ल पहाड़ा याद करके आये बर केहे रिहिसे। सब ल पूछिस-पहाड़ा याद करके आये हव कि नही? सब झिन मुड़ी गड़िया के हामी भर दिन। अब गुरूजी ह एक-एक करके अलग-अलग पहाड़ा पूछना शुरू करिस। धन्नू के बारी अइस त गुरूजी ह पूछिस-दु दुनी कतना होथे रे धन्नू? धन्नू के चेत ह तो दुसर डहार गे रिहिसे। धन्नू ह दु दुनी पाँच कहि दिस ताहन तो गुरूजी के दिमाक खराब होगे। तीर म बलइस अउ कुटकुट ले थुथर दिस। हाथ म पट्टी ल झटक के घुस्सा के मारे ओकर मुड़ी ल मार दिस। मुड़ी ह फूटगे। लहू निकले बर धर लिस। सालिकराम गुरूजी ह लइका मन कर गोबर मंगा के मुड़ी म लगइस तब कहंू लहू ह बंद होइस। एकर बाद गुरूजी ह अपन ऑफिस म जाके बइठगे ताहन एक्की बर घंटी बजा दिस। एक्की बर सब लइका दरदिर ले बाहिर निकलगे। चैतू देखिस कि गांव के सियान श्यामरतन ह जेवनी हाथ म लोटा म पानी धरे धोती पहिर के 'राम-राम’ काहत घर जावत रिहिसे। चैतू तो दिमाक लगाए म भारी तेज रिहिसे। चैतू कथे-चल रे धन्नू वो दे श्यामरतन बबा ह नहा खोर के आवत हे। ओकर करा गुरूजी के सिकायत करबोन। धन्नू थोकिन डरपोकना किसम के रिहिसे। वोह मना घलो करिस-नही यार नइ जान। गुरूजी जानही ते दोंगर डरही। तभो ले चैतू ह धर के लेग जथे। धन्नू ह अपन मुड़ी ल धरे रथे। पीरा के मारे हकरत राहै। लइका मन ल देख के श्यामरतन ह रूक के पूछिस-का होगे रे चैतू, धन्नू ह काबर रोवत हे? चैतू कथे-गुरूजी ह धन्नू ल सिलहट (पट्टी) म मार देहे, ओकर मुड़ी ह फूटगे हे। चैतू अउ धन्नू ह श्यामरतन करा गे रिहिसे तेला धनेश ह गुरूजी ल बता दिस। गुरूजी ह अपन ऑफिस ले निकल के देखत रिहिसे। गुरूजी के जी म धुकधुकी घलो रिहिसे कहंू बइठका झन हो जवै। गाँव म विरोध झन हो जवै। दुसरा जघा ट्रांसफर बर शिक्षा अधिकारी करा शिकायत झन कर दे। बड़ा चूक होगे। आँजत-आँजत कानी होगे।

चैतू ह गोठियई म टंच बानी के रिहिसे। कोनो ले नइ डरावै। श्यामरतन ह पूछिस-काबर मारे हे? चैतू किहिस-गुरूजी ह धन्नू ल पूछिस-दु दुनी कतना होथे धन्नू बता? त धन्नू ह पाँच कहि दिस। जवाब ल सुन के श्यामरतन ह जेऊनी हाथ के लोटा ल डेड़ी हाथ म धरिस। ओकर बाद खिसिया के किहिस-कइसे रे दु दुनी चार होथे की पाँच? गलत उत्तर दुहू त गुरूजी ह तुमन ल नइ पिटही त का आरती उतारही? श्यामरतन ह अपन जेउनी हाथ ल उठा के किहिस, तुमन स्कूल जावव नही ते रहपटाहँू। चैतू अउ धन्नू उदास हो के स्कूल पहुंचिस। गुरूजी तो इमन ल अगोरत रिहिस। अब तो गुरूजी के हौसला बुलंद होगे रिहिसे। जइसने चैतू अउ धन्नू स्कूल लहूटिन गुरूजी उमन ल सुटी-सुटी चड़ाच-चड़ फेर पिट दिस अउ किहिस काली दस तक पहाड़ा याद कर के नइ आहंू ते कूट-कूट ले ठठाहँू। 

चैतू अउ धन्नू दुनो उपई किसम के लइका रिहिन, पढ़ई म गदहा रिहिन हे। रोज मार खावै। फेर गुरूजी घलो हुसियार रिहिसे। धनेश ल चना खाए बर पइसा दे के चैतू अउ धन्नू के खभर देबर लगा दे रिहिसे। धनेश ल दुनियादारी ले कोनो मतलब नइ रिहिसे ओला तो बस चना खाये ले मतलब। एक दिन धनेश ह चैतू अउ धन्नू ल मार खवाय बर गुरूजी के खुरसी म बोइर कांटा राख दे रिहिसे। गुरूजी खुरसी म बइठिस त बोइर काटा गड़गे। फेर गुरूजी के दिमाक खराब होगे। गुरूजी बिना जाने सुने चैतु अउ धन्नू ल ठठा दिस। सालिकराम गुरूजी के घुस्सा ल देख के जगदीश गुरूजी के हिम्मत नइ होवै कि ओला सलाह दे जाये। फेर जगदीश गुरूजी धार्मिक किसम के रिहिसे। हिम्मत करके सालिकराम गुरूजी ल किहिस-नाराज नइ होबे त एक ठन बात काहवँ गुरूजी! सालिकराम गुरूजी किहिस-काह न गुरूजी, नइ होववँ नाराज। जगदीश गुरूजी किहिस-लइका मन मारे-पीटे म नइ सुधरै गुरूजी, बल्कि अउ ढीठ हो जथे। उमन ल समझा बूझा के उंकर मन मुताबिक सोज करे बर परही। सुन के सालिकराम किहिस-तोर खुरसी म कांटा रखतिस त तैं का करते? जगदीश गुरूजी किहिस-खुरसी म कांटा रखे के लइक बूतच नइ करबो त रखही काबर। तभे तो लइका मन मोर तीरे-तीरे म ओधथे अउ आप लेदुरिहा-दुरिहा भागत रथे। सालिकराम गुरूजी ल जगदीश गुरूजी के बात ह जमगे। सोचिस अब नइ मारवं पीटवं न खिसियावं। 

ननपन ले चैतू उद्बिरिस रिहिसे। ओकर दिमाक म तिकड़म सुझत राहै। तुरते कुछ न कुछ हरकत करे बर मन म उपजत राहै। सालिकराम गुरूजी ह दोंगरे रिहिसे तेला नइ भुलाय रिहिसे। अब चैतू ह धन्नू ल किहिस-अरे यार धन्नू, गुरूजी ह बिक्कट दोंगरे हे, अहा दे पीठ म लोर उपक गे हे। अब कइसे करे जाये? धन्नू कथे- मोरो मुड़ी अभी तक ले पिरावत हे यार। मोला तो समझ नइ आवत हे का करना हे तेला? चैतू कथे-फेर मोला समझ आवत हे। धन्नू कथे-का समझ आवत हे? चैतू कथे-मैंहा सुने हवं, सन बीजा ल फिजोए के बाद सन ह जतने फूलथे आदमी ह  घलो ओतने फूलथे। धन्नू कथे-त कोनो भी फूल जही यार? चैतू कथे-तहंू निच्चट भोकवा अस यार जेकर बर सन फिजोथे उही ह फूलथे। धन्नू कथे-अइसे का, त चल न हमु मन गुरूजी ल फूलोए बर सन बीजा ल फूलोए के उदीम करबोन। चैतू- ए होइस न कोई बात। धन्नू क थे-ता का करे बर परही? चैतू कथे-हमर घर नवा चुकिया हे, तेंह सन बीजा लावे चुकिया म पानी डार के सन बीजा ल ओइर (डार) के परई म तोप के बियारा के पेरावट म लुका देबोन। धन्नू हव कथे। बिहान दिन धन्नू ह सन बीजा लइस, चैतू ह चुकिया म पानी लान के सन बीजा ल डार के पेरावट म दबा दिस। अब मजा आही कहिके दुनो झिन खुस हो के बियारा ले निकलिस ताहन नहा खोर के तीली तेल चुपर के बस्ता धर के स्कूल चल दिन। 

अब एक दिन चैतू अउ धन्नू ह कलेचुप चुकिया ल उघार के देखथे त थोकिन फूले रिहिसे। चैतू अउ धनराज खुस होगे आज तो सालिकराम गुरूजी ह फूले होही कहिके। स्कूल म जा के देखथे त गुरूजी ह ओतनेच्चपान रथे। फेर दुसर दिन देखिन त सन बीजा ह थोकिन जादा फूलगे रिहिसे। अब चैतू अउ धन्नू खुस होगे कि आज गुरूजी ह बने फूले होही कहिके। फेर दुनो झिन स्कूल म गुरूजी ल जा के देखथे त गुरूजी ह ओतनेच्चपान रथे। इमन गुनथे-गुरूजी ह कइसे नइ फूलत हे यार। हो सकथे गुरूजी के तबियत खराब होही। तीसर दिन चैतू अउ धन्नू ह लुका के बिहनिया बियारा म जाके चुकिया के सन बीजा के फूलई ल देखत रिहिस ठउंका ओतके बेर धनेश पहुंचगे। धनेश कथे-तुमन का करथौ यार? चैतू ओला चुप रेहे के इशारा करके फुसुर-फुसर बतइस-देख ना यार गुरू जी ह हमीच्च मन ला ठठाथे। धनेश कथे-त ए का करत हौ यार? चैतू कथे-सालिकराम गुरूजी बर सन बीजा फिंजोए हन। ए सन बीजा जतने फूलही ताहन गुरूजी ह ओतने फूलही कहीके। फेर दु-तीन दिन होगे यार सन बीजा ह तो फूलत जात हे फेर गुरूजी ह नइ फूलत हे।

चैतू, धन्नू अउ धनेश तीनो झिन थोकिन देरी ले स्कूल गिस। सालिकराम गुरूजी ह सब झिन ल खिसियइस अउ एक-एक रूल मार के कक्षा म बइठे बर किहिस ताहन गुरूजी ह धनेश ल बला के पूछिस-कइसे देरी से आए हव रे? धनेश ह किहिस-चैतू अउ धन्नू ह तोला फूलोए बर चुकिया म सन बीजा फिलोए हे। अतका सुनके गुरूजी बगियागे। धनेश ल किहिस-तें जा चैतू अउ धन्नू ल पठोबे। धनेश ह चैतू अउ धन्नू ल पठोइस ताहन कइसे रे तुमन मोला फूलोए बर सन बीजा फिलोए हव कहिके कूट-कूट से छर दिस अउ कनबुच्ची धरा के स्कूल के बाहिर बइठार दिस। 

एकर बाद चैतू अउ धन्नू ह अतना डर्रा गे कि स्कूल जाये के नामे नइ लेवै। घर ले निकले जरूर बस्ता धर के फेर स्कूल नइ जावै। पंचू अउ सवाना ह बेटा ल पढ़ाए के आनी-बानी सपना देखत रिहिसे एक दिन धन्नू ह चैतू ल किहिस-चल न जाबो स्कूल यार नही ते ददा ठठा डरही। चैतू किहिस तेंह जाबे ते जा फेर मे नइ जावौ। धन्नू ह स्कूल जाए बर शुरू कर दिस। एती चैतू ह कभू खेत डहार लुकाय राहै त कभू सीला बिनत राहै त कभू लइका मन सन खेलत राहै। अब परीक्षा के समे आगे। सालिकराम गुरूजी ह चैतू के ददा ल शिकायत करिस तोर टूरा ह पढ़े बर स्कूल नइ आवत हे। पंचू ह ए बात ल सुन के दंग रहिगे फेर वो दिन तो वोहा कुछु नइ किहिस। ओ समे गांव म कृष्ण लीला चलत रिहिसे। अब तो चैतू के धियान ह नचई गवई डहार लगगे।

बिहान दिन चैतू ल स्कूल जाए बर निकलन दिस ताहन ओला पासे बर पंचू घलो निकलिस। स्कूल म पहिली गिस चैतू उहां नइ रिहिस। धन्नू ल पूछिस-चैतू कहां हे रे? धन्नू किहिस-वोह तो मेहतरू घर गे हे। आजकल बस्ता धर के दिन भर उही डहार रथे। पंचू ह तमतमाए मेहतरू घर गिस त देखिस कि चैतू ह नान-नान लइका मन ल सकेल के कृष्ण लीला के नकल करत रिहिस। जेला रात कन देखे रिहिसे तेला बिहनिया लइका मन सन खेलत रिहिस। अपन ह किसन बने रिहिसे त एक झिन टूरा ल राधा बनाए रिहिसे। चैतू ल देख के पंचू के मइंता भोगागे। चैतू ल चुंदियावत अउ कुचरत स्कूल डहार लइस। दाऊ बन नही तो देवार काहत-काहत थपरच्च-थपरा मारत स्कूल लइस अउ गुरूजी ल सौंप दिस। अब चैतू के पढ़ई म मने नइ लागे। ले दे के गांव के स्कूल म दूसरी पास होइस। 

जब नवा सत्र म स्कूल खुलिस त चैतू ह स्कूल जाए बर ढेरिया दिस। पढ़े बर स्कूल काबर नइ जावँ कहिथस कहिके पंचू ह चैतू ल ठठावत रिहिस हे। सवाना ह छोड़इस-कइसे लइका ल मार डरबे का? पंचू अउ सवाना म झगरा मातगे पंचू ह खिसिया के सवाना ल किहिस-तोरे सेती तो चैतू ह चढ़े हे। समझा नही ते ठीक नइ होही समझे? अइसे कहिके  घर ले निकलगे। सवाना ह पूछिस-स्कूल काबर नइ जावँ कहिथस बेटा? चैतू कथे-गुरूजी ह बिक्कट पिटथे तेह। सवाना कथे-फोकटे-फोकटे काबर पीटही बेटा, तेंह जरूर उदबिरस करत होबे। चैतू कथे-मैं उदबिरिस नइ करौं। सवाना कथे-त कोन ह उदबिरिस करथे? चैतू कथे-मोर संगवारी मन उदबिरिस करथे अउ मोर नाम बात देथे ताहन गुरूजी मोला ठठाथे। सवाना कथे-ले बेटा तोर ददा ह जाके गुरूजी ल कहि दिही अब चैतू ल झन पीटबे कहिके। ओतके बेर पंचू ह आ जथे। देख के सवाना कथे-चैतू ह डर के मारे स्कूल नइ जावत हे। काली स्कूल जा के गुरूजी ल कहि देते चैतू ल झन पीटबे कहिके। पंचू ह तो घुस्सा के मारे फेर चैतू उपर थपरा उठाए बर धर ले रिहिसे फेर ले दे के थाम्हिस। सवाना कथे-काबर लइका बर खिसियाथस? पंचू कथे-काबर नइ खिसियाहँू? चैतू ल पढ़ा-लिखा के साहेब बनाहँू कहिके बड़े बड़े सपना देखे रेहेंव, सब बेकार होगे। सवाना पंचू ल शांत करत किहिस तुंहर सपना पूरा होही चैतू के ददा जरूर पूरा होही। पंचू कथे-वो कइसे? सवाना कथे-चैतू गांव म नइ पढ़ौं काहत हे त का होइस ओला दुसर जघा पढ़ाबो। पंचू कथे-कहां पढ़ाबे? सवाना कथे-चैतू ल ओकर ममा गांव सिरसा भेज देबो पढ़ाए बर। पंचू कथे-बने काहत हस चैतू ल ओकर ममा घर पढ़ाए बर भेज देथन। ओकर ममा ह कान ल अइंठ-अइंठ के ठीक करही। एकर बाद पंचू के चेहरा म मुस्कान अइस। पंचू ल देख के सवाना ह मुस्करइस अउ अपन दाई-ददा ल मुस्कुरावत देख के चैतू ह घलो मुस्करइस अउ मने मन गुनिस चलो इहाँ ले तो कल्ला कटगे।


पन्द्रह


दुर्ग ले लगभग दस किलोमीटर दुरिहा भण्डार दिशा धमधा रोड म जेवरा सिरसा बसे हे। सड़क के तीर ल जेवरा कथे अउ बस्ती ल सिरसा तिही पाए के जेवरा सिरसा घलो कहिथे। बेलौदी ले उत्ती दिशा म जेवरा सिरसा हे। बेलौदी अउ सिरसा के बीच म शिवनाथ नदिया हे। सिरसा डहार शिवनाथ नदिया के करार म बेगम बाई के ईंटा भट्टा ह बहुत प्रसिद्ध रिहिसे। दुर्ग अउ भिलाई के सहर बसोय म बेगम बाई के ईंटा के बहुत बड़े योगदान हे। दुर्ग भिलाई म डी.एम.डब्लू मार्का वाले इंर्टा नंबर एक रिहिसे। दुर्ग भिलाई म रेती के मांग ल घलो करहीडीह अउ सिरसा के रेती खदान ह पूरा करत रिहिसे। पहाती चरबज्जी ट्रक ह शुरू होवै तेह सांझ ले चलत राहै। भरर-भरर ताय ट्रक के आवाज ह। चैतू ह मछरी कोतरी धरे बर करहीडीह जावै त रेती डोहरई ल देख डरे रिहिसे। वोइसने अपन ददा संग बेलौदी के उप्पर कछार म जउन शिवनाथ नदिया के करार म रिहिसे। उहें जाम बोझा करे बर आवै त देख डरे रिहिसे। सिरसा करार म ट्रक ले रेती डोहारत बेलौदी के उप्पर कछार डहार ले शिवनाथ नदिया ल नहाक के सब बजार करे बर बिरस्पत के जावै। अतराब के सबसे बड़े साप्ताहिक बाजार भराथे। मड़ई बर तो तीन महीना पहिली ले अगोरा राहै। चैतू के मन ह जेवरा सिरसा के नाम सुन के मगन होगे। चलो बढ़िया हे बाजार के दिन मुर्रा लाडू खाय बर मिलही। 

चैतू के ममा परसु अउ ओकर मामी चरोटा ह जेवरा सिरसा म रहि के खावत- कमावत रिहिन हे। परसु के बेटा भरोसा ह घलो एसो दूसरी म अव्वल आए रिहिस हे। यहू ह तीसरी कलास म चघगे रिहिस हे। ओती चैतू ह परीक्षा के समय ढंगचाएल लगा देवत रिहिस हे। पढ़ई-लिखई म जादा धियान नइ राहै। तिही पाए के तीसरी म फेल होगे रिहिसे हे। चैतू भले फेल होगे रिहिस हे फेर पंचू अउ सवाना के सपना फेल नइ होय रिहिस हे। 

इही समे चरोटा के जेचकी निपटे रिहिस हे। नोनी अवतरे रिहिस नोनी। छठ्ठी के नेवता देबर अपन दीदी भाँटो घर बेलौदी आए रिहिस हे। चाहा-पानी पीयत-पीयत पंचू ह अपन सारा ल पूछ परिस-कइसे भरोसा ह पास होगे? परसु कथे-हव भाँटो, ओह तो अव्वल आए हे। पंचू खुश हो के कथे-अरे वाह! कमाल कर दिस भई भरोसा ह तो। सुन के परसु ह अपन भाँटो ल कथे-त चैतू भाँचा ह तो घलो पास होगे होही? पंचू कथे-काला बताबे परसु, टूरा ह बड़ अलवइन हे। पढ़े-लिखे म ओकर मन लागबे नइ करै। भइगे रात-दिन खेलई-कूदई ताय, का करबे। काकरो बात ल सुनबे नइ करै। सवाना कथे-मोरो मन ह ओकर मारे कउव्वा गे हे। कइसे पढ़ही तइसे लागथे। त परसु कथे-पढ़े-लिखे बर भाँचा ल खिसियातेव नही। सवाना कथे-तेंह खिसियई ल केहे भाई, तोर भाँटो तो कूटकूट ले थुथर डरे हे, तभो ले नइ माने। परसु कथे-मारे पीटे ले लइका अउ कुटहा हो जथे। ओला तो समझा-बूझा के मनाए बर परही। पंचू कथे-हमर मन करा तो नइ पढ़े, तैंह तोर भाँचा ल पढ़ाबे? परसु कथे-एह तो मोर बर पुन के काम आय। भगवान राम कस भाँचा ल मोला पढ़ाए-लिखाए के सौभाग्य मिलत हे, एकर ले धरम के बात अऊ का हो सकथे। सवाना कथे-मोर हिरदे के बात ल तेंह कहि दे भाई। ए बात ल मेंहा छठ्ठी बरही उठे के बाद कहँू कहिके मन म दबा के रखे हौं। एमा बिचार ल दबाए के का बात हे दीदी। तुमन कहू ते मैं अभी लेग जवं भाँचा भगवान ल? सवाना के मया ह चैतू बर पलपला गे। सवाना किहिस-ले न भाई एसो गरमी के छुट्टी ल बेलौदी म मनावन दे। स्कूल खुलही ताहन चैतू ल तोर करा पठो देबोन। एसो आमा बिक्कट फरे हे एसो के गरती ल चुहकन दे, परसु कथे-ले जाथंव दीदी। घरो डहार जोरा करे बर परही। ठउंका ओतके बेर चैतू आ जथे। अपन भाँचा के टूप-टूप पाँव परथे परसु ह। पाँव परत-परत कथे-कइसे भाँचा हमर घर रहिके पढ़बे कि नही? चैतू ह मुड़ी ल हला के हौं कहिके हामी भर देथे। ले जाथौं भाटो कहिके परसु ह कहिथे। त ओकर दीदी सवाना ह कथे-छठ्ठी बर बरी अउ मुनगा जोर देथंव, लेग जबे। आलू ल सिरसा म बिसा लेबे। सवाना ह झांपी म रखे बरी ल अउ घर के मुनगा ल जोर के अपन भाई ल बिदा करथे। परसु ह अपन दीदी भांटो अउ भाँचा के पांव परके सिरसा जाए बर लहूट जथे।

छठ्ठी के एक दिन पहिली पंचू, सवाना, चैतू अउ बैसाखु सबो झिन बेलौदी ले धरसा-धरसा रेंगत सिरसा जाये बर निकलगे। गरमी के दिन रिहिसे तिही पाए के नदिया म पानी कम रिहिसे इही पाए के अरकट्टा जाय बर सोचिन। बरसात के दिन रहितिस ते भारी तकलीफ होतिस। डोंगा म नहाक के शिवनाथ नदिया ल पार करके उरला जातिन, उरला ले दुर्ग बस स्टेण्ड ताहन उहां ले धमधा बेमेतरा वाले बस म बइठ के जेवरा म उतर के सिरसा जातिन। पंचू अपन परिवार संग नदिया पार करके करार म रेती वाले ट्रक ल देखत रूक गे। जइसे भुरूर भुरूर करत ट्रक करार म चढ़िस ताहन ड्राइवर ह सवारी बइठारे बर रूक गे। ड्राइवर मन घलो खुश हो जवै, सवारी मिले ले। उंकर थैली खरचा निकल जवै। रेती भराए ट्रक रूकिस ताहन इमन सबो झिन ट्रक म बइठिन। ट्रक ह सिरसा म रूकिस ताहन सबो झिन उतरिन। उतरे के बाद ड्राइवर ल पंचू ह रूपिया दिस ओकर बाद ट्रक ह सुपेला डहार आघू बढ़गे अउ इमन ह परसु घर जाये बर रेंगे ल धरिन। 

सिरसा पटपर भांठा ताय। गरमी दिन रिहिसे ताते-तात उलगत रिहिस। सबो झिन झांझ ले बांचे खातिर मुड़ी कान ल बांधे रिहिन। नहर के तीरे-तीर रद्दा रिहिस। इही रद्दा ले आघू डहार रेंगत रिहिन। बिरस्पत के दिन रिहिसे बाजार झमाझम भराए रिहिसे। बाजार के खुसरती म कुम्हार मन हड़िया कनौजी कस घर म उपयोग अवइया माटी के बरतन बेचत रिहिन। कुम्हार मन उही मेर बनावय अउ बारो महीना इही करा बेचै। चैतू अउ बैसाखु मुर्रा लाडू ल देख के रेंधयई मताए बर धरिन त इंकर जिद्द ल देख के सवाना ह चना-मुर्रा अपन लइका मन बर बिसइस अउ अपन भाई घर बर सगा खजानी घलो बिसइस। एती परसु ह छठ्ठी के जोरा करे बर बाजार आए रिहिसे। मुरई भांटा बिसावत-बिसावत ओकर नजर ह अपन दीदी भांटो उपर परगे। धकर-लकर सामान ल झोरा म धर के अपन दीदी-भाटो करा जा के सब झिन के पैलागी करिस। खुशी के तो ठिकाना नइ रिहिस। सब झिन ल परसु ह अपन घर लेगिस। संझा होगे खइन ताहन सबो झिन सुतगे।

बिहान दिन छठ्ठी के दिन रिहिस। डिहवार वाले मन सांवर ऊ बनवा के चाहा पीयत गिन। मंझनिया नेवताए सगा मन अउ घर वाले मन मुनगा बरी संग भात खइन। लइका मन सब खेले बर भुलागे। चैतू, बैसाखु अउ भरोसा ल खेलत देख के सवाना बिक्कट खुस रिहिसे। चल चैतू के मन ह इहां रम जही ते बने पढ़-लिख लिही। पुन्नी के दिन नोनी अवतरे रिहिसे तेकर सेती ओकर नाव पुन्नी धर दिन। सवाना ह अपन भाई-बहू चरोटा ल किहिस-चल बने होगे बहू, घर म अब राखी बंधईया आ गे। पुन्नी ल पुचकारत-पुचकारत सवाना ह बिहान दिन चरोटा ल किहिस-मैं तोला एक ठन बात कहइया हौं। बने लागही त हौ कहिबे नही ते मना कर देबे। चरोटा ह किहिस-काह न। कोन जनी अभी तो तोर करा शायद परसु भाई ह गोठियाए नइ होही तभो ले मैं पूछत हौं। मैं गुनत हौं चैतू ल इहें रहि के पढ़ातेन काहत रेहेंव। चरोटा कथे-एमा पूछे के का बात ए, भांचा-भंचरा ह हमर घर रही के पढ़ही एह तो हमर सौभाग्य आये, ले न अभीच छोड़ देव। एक-दु महीना म चैतू के मन ह भरोसा संग मिल जही। सवाना कथे-नही बहू अभी नइ छोड़ौं। ले न स्कूल खुलही ताहन चैतू ल धर के लानिंगे। ले अब हम्मन ल छुट्टी दे, घर जाबोन। चरोटा कथे-दु-चार दिन अऊ  रही नइ जतेव। सवाना कथे-नही चरोटा लेना तोर दाई तो हवे सेवा सटका करे बर। रेहे बर मंहू रहि जतेंव फेर घर म गाय गरूआ ल देखे बर परथे। ओतके बेर परसु आ जथे। परसु कथे-कइसन धकर-लकर करत हस दीदी। दु-चार दिन रूकही कहिके काहत रेहेंव। पंचू ह अपन सारा ल कथे-ले न अब हमर मन के सेती रेहे बर दु महीना के बाद चैतू ह तो आबे करही। सुन के सबो झिन खलखला के हांस डरिन ताहन पंचू अपन परिवार संग बेलौदी जाए बर लहूटे बर धरिन त चरोटा ह सवाना के खांध म लुगरा अउ परसु ह अपन भाटो के खांध म धोती डार के भांचा मन ल पइसा धरा के टूप-टूप पांव परिन ताहन पंचू मन माई-पिला बेलौदी लहूटगे। खेत खार के काम तो सकलागे रिहिसे। संझा के संझा पंचू ह खेती किसानी के जोरा म धीरे-बांधे लग गे रिहिसे। तभे तो धान के पुरा ल निकाल के रोज संझा के संझा डोरी बर-बर के सकेले ल धर लिस भारा बर। लइका मन आमा बगइच्चा चल दे ताहन पंचू अउ सवाना अपन लइका के चिंता करत समे ल काटत रिहिन। बड़े लइका के चिंता करत-करत सवाना फेर अम्मल म रहिगे। गोरी नारी सवाना अम्मल म राहै ते अउ चिकना जय। तिही पाय के पंचू मजाक कर देवै। अम्मल म रहिथस त बिक्कट सुंदर दिखथस सवाना। सुनके सवाना कथे-चल हट तोला थोरको लाज नइ लागे ताहन खलखला के दुनो झिन हाँस डरथे। 


सोलह


पंचू चउमास के जोरा गरमी म कर डरे रिहिस। संगे-संग चैतू ल सिरसा अमराए बर घलो जोरा म लगे रिहिस। ए दरी घर म अकती बर नवा नौकर लगइस। अकती के दिन सांवत ल चोंगी दे रिहिसे। गैंदू ह छै महीना पहिलीच ले कहि दे रिहिसे कि अब शरीर ह थक गेहे मालिक एसो भर संग दुहंू ताहन नइ देवंव। आना-जाना लगे रही। ऊंच-नीच बर सुरता कर ले करहू, मैं आ जहंू। पंचू सांवत ल दु दिन पहिली चेता दे रिहिसे कि परन दिन संजकेरहा आबे चैतू ल अमराए बर सिरसा जाबोन। सवाना ह दार, चाँउर अउ खैरी चना ल जोर के चैतू के कपड़ा लत्था ल घलो जोरिस ओकर बाद अपन गोसइया ल किहिस-कापी किताब अउ सिलहट बर परसु ल पइसा दे देबे। स्कूल के हिसाब ले बिसा लिही। पइसा ल पंचू ह कुरता के थैली म धरे हवँ कहिके मुड़ी ल हला दिस। चैतू बढ़िहा नहा खोर के तेल चुपर के चूंदी ल हाथे म दबा दिस। धकर-लकर म चैतू ह तेल ल बोथबोथ ले लगा डरे रिहिसे। भारी चमकत रिहिसे। सवाना ह मया के मारे किहिस-तहंू ह रे बेटा मार चिकचिक ले चुपर डरे हस। काहत अपन अचरा ले चैतू के मुंह ल पोछथे। बिहनिया ले अंगाकर रोटी रांध डरे रिहिसे। चैतू ह जावत हे कहिके रात म तेलई बइठगे रिहिसे सवाना ह। ठेठरी खुरमी ल घलो हकन के जोरे रिहिसे अउ आधा किलो कस घींव घलो डब्बा म जोरे रिहिसे। सबो ल सम्हाल के सांवत ह कांवर बर दुनो डहार बरोबर राहै कहिके अंदाज म बोझा बनइस। पंचू कथे-चल चैतू बेटा चलबोन। सवाना अपन आंखी के तारा ल हिरदे म पथरा रख के ओकर भविष्य बर बिदा करत किहिस-बने मन लगा के पढ़बे-लिखबे। चैतू किहिस-हव दाई बने पढ़हँू-लिखहँू। चैतू अपन दाई के पांव परथे संग म अपन ददा के घलो पांव परथे। ओकर बाद सांवत ल कथे-चल कहिके  चैतू के अंगरी ल धर के जेवरा-सिरसा जाए बर निकल जथे। चैतू ह सिरसा जाए बर पुचपुचाए रिहिस। ओकर पांव तो जल्दी जल्दी उठत रिहिसे।

सिरसा ले चैतू ल छोड़ के सांझ-मुंधियार ले पंचू अउ सांवत ह बेलौदी लहूटगे। चैतू बिना घर ह सुन्ना-सुन्ना लागत रिहिसे। चैतू ह अपन दाई करा सुते। सुते के बखत सवाना ह चैतू के सुते के जघा ल टमर-टमर के चैतू के सुरता करत रिहिसे। पंचू ल घलो बने नइ लागत रिहिसे फेर बेटा बने पढ़ही-लिखही ताहन बाबू-मुंशी बनही कही के मन ल मार लेवत रिहिसे। बिहनिया बैसाखु ल घलो अपन भाई के सुरता आवत रिहिसे। बैसाखु अपन दाई करा रेंध मचा दिस। दाई भईया ल वापिस लान, इहें पढ़ही-लिखही। सवाना किहिस-इहां पढ़तिस त हम्मन काबर जेवरा सिरसा भेजतेन अउ सुन तहँू बने पढ़बे-लिखबे नही ते तहँू ल सिरसा भेज देबोन समझे। देख एसो तहँू ल पहिली कक्षा म भरती करबोन। बैसाखु अपन भइया के सुरता म बंबाए बर धर लिस। सुसक-सुसक के रोए बर धर लिस। पंचू ह सब बात ल सुनत रिहिसे। पंचू ह बैसाखु ल गोदी म उठा के भुलवार के चुप करइस। तोर दाई बने काहत हे बेटा, बने पढ़बे-लिखबे आंय। बैसाखु ह मुड़ी हला के हव कहि देथे-पढ़हँू कहिके। 

ओती चैतू ल ओकर ममा ह प्राथमिक स्कूल सिरसा म तीसरी कक्षा म भरती करिस। पहिली तो प्रधान पाठक ह फेलवर लइका ल भरती करे बर मना करत रिहिसे फेर परसु के बेवहार ल देख के भरती कर लिस। परसु प्रधान पाठक ल विश्वास दिस कि मोर भाँचा ह पढ़ई-लिखई म सिरसा के नाव ल रोशन करही। एक घांव मोर बात ल रख लेव गुरूजी। परसु के बात ल रखत चैतू ल तीसरी कक्षा म भरती कर लिस। भरोसा दूसरी कक्षा म अउ चैतू तीसरी कक्षा म पढ़े बर धर लिन। एती बेलौदी म बैसाखु पहिली कक्षा म पढ़े बर धर लिस। 

शुरू-शुरू म बैसाखु ह पढ़े-लिखे बर ढेरियाय ल धर ले। पढ़ई-लिखई म ओकर ढेरियई ल देख के सवाना काहय बने पढ़ नही ते तहँू ला सिरसा पठो देबोन। डरे डर म बैसाखु मन लगा के पढ़े बर धरिस। ओती सिरसा म भरोसा ह घलो मन लगा के पढ़े बर धर लिस। फेर चैतू के मन ह पढ़ई-लिखई म लगबे नइ करै। भरोसा कक्षा म अव्वल आवै। हुसियार रहै कक्षा म। परसु ह भरोसा ल किहिस-चैतू भांचा ह तोर ले एक कक्षा आघू हे, नइ जानबे तेला पूछ ले करबे। भरोसा हव कहि के मुड़ी ल डोला दिस। परसु अउ चरोटा ह अपन भांचा ल अपन मन जइसन-जइसन खावय ओइसने-ओइसने खवावय, मया घलो बिक्कट करै। 

भरोसा अपन संग म स्कूल लाने लेगे। बढ़िया दुनो झिन के पढ़ई-लिखई ह जोर पकड़े बर धर लिस। चैतू के मन घलो लग गे पढ़ई म। चार बजे पहाती ले भरोसा पढ़े बर उठ जवै। अपन संग चैतू ल घलो उठा देवै। इंकर दुनो झिन के पढ़ई-लिखई अउ खेलई-कूदई ल देख के परसु अउ चरोटा खुस राहै। चैतू ननपन के रेमटा रिहिस। ओकर कमीज के दुनो बाहां ह रेमट पोछई म करिया जवै। चैतू चाह के भी रेमट ल नइ रोक सकै। 

एती तीज तिहार म सवाना अउ पंचू ल चैतू के सुरता सतावै फेर ओकर जिनगी खातिर मन ल संवास लेवै। बैसाखु घलो घर म अकेल्ला हो जावत रिहिस। अकेल्ला बंबाए बर धर ले रिहिसे। फेर धीरे-धीरे अकेल्ला रहवई ह आदत म शामिल होगे रिहिसे। अब बैसाखु के मन ह घलो पढ़ई म रमे बर धर ले रिहिसे। खेल के बेर खेल अउ पढ़ई के बेर पढ़ई। 

प्राथमिक स्कूल सिरसा म गुरूजी पढ़ावत रिहिसे फेर घेरी-बेरी चैतू के सुडुक-सुडुक ह पढ़ई म अड़ंगा आवत रिहिसे। खिसिया के गुरूजी किहिस सुन चैतू तैंह तोर सुडुक-सुडुक ल बंद कर नही ते तोर नाक ल कांट दुहंू। चैतू ह अपन नाक कटई के बात सुन के डर्रा गे अउ बिहान दिन स्कूल जाय बर तो भरोसा संग निकलिस फेर भरोसा ल आधा बीच म तें आघू जा मैं आवत हौं कहिके बेलौदी जाय बर निकलगे। अब तो चैतू ल अपन नाक बचाए बर भारी फिकर होगे। 

मंझनिया चैतू ह बेलौदी पहुंचिस। चैतू ल देख के सवाना अकचकागे। अई तेंह अकेल्ला कइसे आगे हस बेटा कइसे बता न? ओतके बेर पंचू घलो पहुंचगे। पंचू किहिस-कइसे तैं अकेल्ला आ गेस? कोनो उद्बीरिस तो नइ करे हस? अब पंचू ह डेनिया के ओला सिरसा लेगे बर धरथे। नइ जांव कथे ताहन पंचू के मइंता भोगा जथे अउ दु-चार तमाचा मार देथे। ओकर मरई-पिटई ल देख के सवाना ह किहिस-कइसे लइका ल मार डरबे का? सवाना ह पुचकारत पूछथे-काबर नइ जांव कथस बेटा, का तोर मामी खाय बर नइ दे का? का तोला मया नइ करै का? चैतू बड़ा चतुर रिहिसे। ओखी मारे बर मौका मिलगे ओहा हव कही के मुड़ी ल डोला दिस। रोवत रोवत चैतू किहिस-अपन मन दार-भात खाथे अउ मैंह बिना दार के सुख्खा लड़ेरत रहिथौं। उमन ह अंगाकर रोटी म घींव लगा के खाथे अउ मोला बिना घींव के देथे। भरोसा ह मोला जब देखथे तभे ढकेल देथे। अतका ल सुनिस ताहन जीव बगियागे सवाना के। पंचू जानत रिहिस ए टूरा ह फोकट म अपन ममा-मामी के बदनामी करत हे फेर सवाना के घुस्सा के मारे एको नइ चलिस। 

छुट्टी के बाद जब भरोसा ह अकेल्ला घर लहुटिस त चरोटा ह पूछिस-आज कइसे तैं अकेल्ला आवत हस, भांचा कहां हे? ओह तो स्कूल जाए के समे, तें अघुवा अउ मेंह आवत हौं कहि के मोला अघुवाए बर कहि दिस ओकर बाद ओह कहाँ गिस तेला मैं नइ जानौं। सुन के चरोटा चिंता म परगे। ओतके बेर परसु अइस। वहू ल फिकर होगे। कहां गे होही? कोनो लइका चोर तो चोरा के नइ लेगे हे। कहँू रद्दा तो नइ भटकगे। अब दीदी भांटो मन ल का मुँहु देखाहँू। चरोटा अउ परसु धकर लकर खोजे बर निकलगे फेर कोनो करा आरो नइ लगिस। आखिर थक हार के पता करे बर बेलौदी निकलगे। जब बेलौदी पहुंचिस त अपन ममा ल देख के चैतू ह लुकागे। परसु अपन भांचा ल देख डरे रिहिसे। देखे के बाद ओकर जीव ल हाय लगिस।

परसु ह घर म खुसरते भार अपन दीदी भांटो के पांव परिस ताहन कहा-सुनी शुरू होगे। सवाना के तो जीव बगियागे रिहिस। कइसे परसु हम्मन तोर काय बिगाड़े रेहेन तेमे हमर बदला लइका संग ले हस। परसु सुन के हक्का-बक्का रहिगे। अहा का गोठियाथस दीदी, मैं भांचा संग बदला ले के पाप काबर करहँू? सवाना कथे-बड़ा पुन कमइया होतेस ते मोर बेटा संग दुआ भाव नइ करतेस। हमर लइका तुंहर उपर बोझा होवत रिहिस ते पहिली ले कहि देते हम ओला पढ़ाये बर दुसर जघा खोज लेतेन फेर तुंहर करा नइ पठोतेन। परसु कथे-अइसन झन काह दीदी। सवाना कथे-त का काहवं? हम्मन तुंहर घर दार-चाँउर अउ घींव ल पठोवत रेहेन फेर ओला तो तुंही मन खा बोज डरेव। चैतू ल बिना दार के भात अउ बिन घींव के रोटी देवत रेहेव। परसु के जीव घलो बगियागे। परसु किहिस-देख दीदी उल्टा-पुल्टा बद्दी झन लगा, हम्मन जइसन-जइसन खावत रेहेन ओइसने अपन भाँचा ल देवत रेहेन। नइ पतियावस ते भांचा ल बला के पूछवा ले। सवाना कहिथे-ओला का पूछवाबे। ए सब ल तो उही ह बतइस हे। परसु कथे-अहा का लबारी मार देस भांचा। भांचा भगवान के रूप होथे। फेर मोर संग का अनित होय हे। पंचू ह सब समझत रिहिस हे। ए सब चैतू के नइ पढ़े बर बहाना आय। स्थिति ल देख के परसु ल समझइस मैं सब समझत हौं परसु। एमा तोर कोनो गलती नइहे फेर सवाना बेटा के मोह म असली बात ल जाने के कोशिस नइ करत हे। मैं जानत हौं एक घांव धरमराज ह अपन धरम ल भूला जही फेर तैं नई भुलावस। खिसिया के परसु सिरसा लहूटे बर निकले बर धरथे। त पंचू ह समझाथे-रात होगे हे अंधियार म कहां जाबे। चार पहर रात ल काट ले। परसु कथे-अब का चार पहर रात ल कइसे कांटहूँ भांटो। हमर संग गलती होगे होही तेला माफी दे देहूं। परसु ह गमछा म आंसू पोंछत सिरसा जाय बर निकल जथे। परसु के जाय के बाद सवाना घलो सुसक-सुसक के रोए बर धर लिस। जिनगी भर कभू भाई ल बरजे नइ रेहेंव फेर ए दरी मोर मती ल काय होगे रिहिस ते खिसिया परेंव। परसु ह तलमीर-तलमीर सिरसा जाये बर निकल जथे। 

अब चैतू तो ठउंका परीक्षा के समे इहां आगे त पढ़े काला फेर खेलई-कूदई म भीड़गे। पंचू ह गुनथे अब ए टूरा के मन ह पढ़ई-लिखई म नइ लगत हे। तेकर ले ओला खेती किसानी के काम डहार लगाए जाय। अब अपन नौकर ल चेता दिस कि चैतू ल घलो खेत डहार काम बूता ल सिखोए बर लेग। सांवत कथे मालिक-अभी तो चैतू ह नानकुन हे ओकर खेले कूदे के दिन हे अभी ले काबर खेती किसानी म लगावत हौ। पंचू कथे-अरे अभी कोन से मैं चैतू ल नांगर के मुठिया ल धरे बर काहत हौं। अरे भई जब तैं बासी खाबे ओतका बेर ओहा बइला मन ल चराही। फेर अभी चना तो लुए के लइक होगे हे। हमर संग म जाही चना खाए के लालच म, चना खावत-खावत उखानही अइसने धीरे-धीरे ओकर मन ह काम बूता म लग जही। धीरे बांधे अब चैतू ह खेत डहार मन लगाए बर धर लिस। घर म घलो अब पंचू ह भुलवार-भुलवार के मवेशी मन ल पैरा देबर काहै। कभू गाय बछरू ल बांधे बर तियार दे। तभो ले मउका देख के चैतू ह अपन संगवारी मन संग खेले-कूदे बर भाग जाये।

बैसाखु ह दिन रात पढ़ईच म लगे रहे। किताब कापी ओकर धनहा डोली रिहिस त कलम-पेंसिल ह ओकर नांगर। बस ओला तो सरस्वती ह ज्ञान के सागर दे-दे रिहिसे। ओती परसु के घर पहुंचते भार चरोटा पूछथे-कइसे भांचा के कोनो करा आरो लगिस? परसु कथे-हव मिलगे। चरोटा-कहां हे भांचा ह दिखत नइहे? परसु कथे-ओह अब इहां नइ दिखे। चरोटा कथे-त कहां दिखही? परसु कथे-वोह भाग के बेलौदी चल देहे। ओह तो तो सब ठीक हे भरोसा के दाई फेर बड़े जन कलंक लगा देहे। चरोटा कथे-कइसन कलंक लगा देहे हो? परसु कथे-हम्मन ओला बिना दार के भात अउ बिना घींव के रोटी देवत रेहेन कहिके भांचा ह दीदी भांटो ल बता देहे। चरोटा कथे-अइसन तो कभू मैं नइ करे रेहेंव बल्कि डरे-डर म अपन लइका ले आगर ओला दार-भात पोरसत रेहेव। अंगाकर रोटी म बोथ-बोथ ले घींव ल लगावत रेहेंव। परसु-मंै सब जानत हौं चरोटा, तैं कभू दुआ भाव नइ करे फेर किस्मत ह तो हमर मन संग दुआ भाव कर दिस। भरोसा ह अपन दाई ल कथे-चुप राह दाई सब ल भगवान ह देखत हे। 

एती भरोसा ह अपन दाई ल चुप करावत रहिसे। ओ डहार सवाना ल लगती फागुन म भगवान फेर चिन्ह दिस। सवाना ल नोनी के आशा रिहिसे फेर बाबू अवतरगे। भगवान के लिल्ला अपरंपार। ओकर आघू म काकरो बस नइ चलै। बाबू ह पंचू के अगोंछ म रिहिसे। सुइन ह सवाना ल किहिस-निच्चट अपन ददा के मुहरन ल धर के आगे हे। सुन के सवाना मने मन फुलकत रिहिसे। मजाके मजाक म पंचू ह किहिस अब एकर का नाव धरबो ब्रम्हा, विष्णु अउ महेश कस अवतरे हे। त सुइन ह कथे-बड़े के नाव चैतू हे, मंझला के नाव बैसाखु हे अउ एकर नाव जेठू धर देव। सवाना किहिस-हव बने तो काहत हे सुईन दाई ह। उही दिन ले बाबू के नाव जेठू धरागे।


सत्रह


चैतू अट्ठारा-उन्नीस साल के होवत ले डंग-डंग ले बाढ़गे रिहिस। अब थोकिन उड़ानुक होगे। दाई-ददा मन ओकर किंजरई ल देख के बरजे तभो ले उंकर थोरको नइ सुनै। ननपन ले नचई कूदई म ओकर धियान रिहिसे। अब तो बेलौदी म नाचा पार्टी खोल डरिस। चैतू अउ बरसन जोक्कड़ बने, सिलाल ह जनाना बने अउ कातिक ह परी। इंग्लैड वाले गम्मत म बरसन ह साहब बने त चैतू ह चपरासी। बिक्कट के जमे इंकर नाचा ह। रवेली के मदन मंदराजी साज के गम्मत के डिक्टो नकल करैं। धीरे-धीरे इंकर सोर ह छत्तीसगढ़ भर बगरगे। अब तो चैतू ह पंदरा-पंदरा दिन ले नाचा-पेखन म बाहिर चल देवत रिहिस। अपने सियानी करे। कोनो टोकइया न बरजइचा। तिकड़मी तो ननपन ले रिहिसे। अब सवाना अउ पंचू ल फिकर होय बर धर लिस। कहंू चैतू ह हाथ ले झन निकल जय कहिके। पंचू ह मने-मन गुने 'जहां सुमति तहां सम्मति नाना, जहां कुमति वहां विपति निधाना।’ अब तो चैतू ह गलत संगति म आ के पीए खाए बर घलो सीख गे रिहिसे। एक दिन नाचा के पोरोगराम ले अइस त ओकर मुँहु ह भक्क ले माहकिस तेला सवाना ह टोकिस-कइसे रे तोर मुँहु ह बस्सावथे। ओतका म चैतू किहिस-कुछु नोहे दाई मुड़ पिरावत रिहिस हे तेकर दवई पिये हौं। सवाना ल संसो होगे-लइका बिगड़त हे तइसे लागत हे। अपन पीरा ल सवाना ह अपन गोसइया ल बतइस। पंचू कथे-महूं ल लागत हे चैतू ह बिगड़त हवै तइसे। 

उही साल गांव म महामारी फैलगे। चैतू के डोकरी दाई परनिया हैजा के पुरतीन होगे रिहिसे। अब तो परनिया के जाए के बाद बिसेलाल ह घलो अधियाय बर धर ले रिहिसे। बिसेलाल पंचू ल काहय-मोरो ठिकाना नइ हे बेटा, नाती के चाँउर टिक लेतेव कही के महंू ह गुनथौं। अपन ददा के बात ल पंचू ह सवाना करा रखिस। सवाना कथे-ससुर बने तो काहत हे घर देखइया आतिस ते मैंह थोर बहुत बारी-बखरी के बूता ल देखतेंव। सब झिन अब बर-बिहाव बर सुन्ता सुलाह होगे। अब पंचू ह बहू खोजे बर शुरू करिस। एक दिन बिसेलाल ह भेंडसर खार ले बछरू बर कांदी लू के लानत रिहिसे। आवत-आवत मालूद खार म पखरा म हपट के गिर गे। उही मेर आंखी कान ल नटेर दिस। बरदिहा ह देखिस त पंचू ल खभर करिस। सब झन जा के खटिया म सुता के घर लानिस। रोहा-राहि परगे। सवाना ह गोहार पार-पार के रोए बर धर लिस-अपन नाती के चाँउर टिकहँू कहिके काहत रेहे ददा। अब ओकर मांथ म चाँउर कोन टिकही ददा ए हें, हें...। पंचू घलो बिक्कट रोइस। अब मोला कोन ह रद्दा देखाही ददा? कही-कही के सिसक-सिसक के गमछा म आंसू ल पोछिस। बिसेलाल के काठी-माटी करे के बाद डिहवार वाले मन ल पंंगत खवइस ताहन अपन-अपन काम बूता म लगगे। अकती पानी दे के बाद फेर पंचू ह बिहाव के जोरा म लगगे। काबर कि बिसेलाल ह अपन नाती बर बहू रसमड़ा गनियारी म खोज डरे रिहिसे। तिहारी बारी होगे रिहिसे फेर बिसेलाल के भाग म नाती के चाँउर टिकई ह लिखाय नइ रिहिसे। 

अब कइसनो करके दुख ले उबरे के बाद सब झिन बिहाव के जिनिस के बेवस्था म लगगे फेर होनी ल कोन जानथे। गनियारी वाले एक झिन मनखे के बेटी वाले संग भल्ले दिन के दुश्मनी रिहिस हे। ओह फोकटे-फोकट पंचू करा खभर भेजवा दिस कि नोनी के डोकरी दाई टोनही हे कहिके। पंचू ह सवाना ल बतइस। सवाना ह अड़ दिस हम ओइसन घर म हमर बेटा के बिहाव नइ करन कहिके ताहन पंचू गनियारी खभर भेजवा दिस कि ए मंगनी होय हे तेला डोरत हन। पंचू के होवइया समधी ह माथ धर के बइठगे। सगा ल अइसे का होगे कि सगई ल टोर दिस। अब तो मोर बेटी उपर फोकटे फोकट दाग लगगे कि सगई टूटगे हे कहिके। सगई का टूटिस ताहन नोनी वाले मन के मन ह टूटगे। अइसे लागे जानो मानो गाज गिरगे।

पंचू ह अब जे डाहर जावै उही डहार चैतू बर बहू खोजत राहे। एक बछर बाद बेलौदी ले पंचू ह अपन फूफू घर बिहाव के नेवता म धीरी गांव गिस। बिहाव निपटे के बाद अपन फूफू ल किहिस-चैतू के लइक तुंहर गांव म नोनी होतिस ते बताते। महंू ह चैतू के बिहाव कर देतेंव कथौं। फूफा ल तो पहिलीच ले पता चलगे रिहिसे कि चैतू के सगाई टूटगे हे कहिके। फूफा किहिस-केवट पारा म एक झिन नोनी हे, कमेलीन हे फेर बुटरी काठी के हे। चैतू तो ऊंच पुर हे। देख ले तोला मन आही ते नही। पंचू कथे-हमला तो कमेलीन बहू चाही। घर बाहिर दुनो ल सम्हाल सके। त फेर काली बिहनिया सखाराम घर चाहा पीये बर जाबोन। पंचू के चेहरा म रौनक आ गे। बिहनिया होते भार फूफा ह पंचू ल धर के सखाराम घर चाहा पीये बर गिस। फूफा ह पहिलीच ले चेता दे रिहिसे मैं सगा लानहँू। गोमती ल देखे बर अवइया हे कहिके। सखाराम ह पहिलीच ले तइयार रिहिस हे। सखाराम घलो मने मन गुनत रिहिसे चलो बने सरिख सगा उतर जही ते बेटी के घर गृहस्थी बसा देतेंव। 

बिहनिया बाहिर-बट्टा ले निपटे के बाद, दतुन-मुखारी करके अंगाकर रोटी खा के फूफा ह पंचू संग सखाराम घर गिस। सखाराम तो सगा मन के बाट जोहत रिहिसे। फूफा ह सखाराम के घर म खुसरे के पहिली सखाराम, सखाराम कहिके चिलइस घर म हवस ग सखाराम? सखाराम अपन नाम ल सुन के सगा मन के आरो पा के धकर-लकर निकलिस। सगा मन के भेंट पलागी बनइस ताहन घर के अंगना म बइठारिस। सखाराम अपन गोसइन ल अवाज दिस-सगा आहे पानी लान वो। दुरपति ह तुरते फूलकसिया लोटा म पानी धर के आ के देथे अउ सब झिन के टूप-टूप पांव परथे।  संग म गोमती घलो टूप-टूप पाँव परथे। सखाराम सगा मन ल कथे- लेव गोड़ धो लेव। फूफा अउ पंचू ह गोड़ धो के खटिया म बइठ जथे ताहन सखाराम ह चोंगी माखुर देखाथे। फूफा ह कट्टा ले एक ठन बीड़ी ल तीर के सुलगइस अउ पंचू हाथ जोड़ लिस। काबर कि फूफा के बिक्कट लिहाज करैं। तिही पाय के ओकर आघू म बीड़ी नइ पीयय। तब तक ले दुरपति चाहा बना डरिस। दूधे-दूध के चाहा बनइस। चाहा ल गोमती ह कप-सासर म धर के निकलिस त पंचू ह परख डरिस। ठुबुक-ठुबुक रेंगई ले जान डरिस कि गोमती बड़ कमेलीन होही कहिके। इही ह हमर घर ल सम्हालही। पंचू ह गोमती ल मन कर डरिस। चाहा पानी पिये के बाद सगा मन जाय बर बिदा मांगीन। घर ले निकलत निकलत कहि दिन कि ले घर जा के खभर ल पठो दिंगे। 

घर लहूटत-लहूटत फूफा ह पंचू ल पूछिस-कइसे नोनी ह मन अइस का? फेर थोकिन बूटरी घलो हे। जादा ओग्गर घलो नइ हे। पंचू ह कथे-गोमती ह मोला चैतू बर मन आ गे हे फूफा। रूप नही हमला तो गुन ल देखना हे। हमर घर बर अंजोरी बनके आही। देख लेबे फूफा गोमती के आए ले हमर भाग ह संवर जही। फूफा कथे-बने काहत हस पंचू गोमती ल मैं जानत हौं, जिंहा जाही ओ घर ल स्वर्ग बना दिही। पंचू कथे-पइसा धरा दे रहितेन ते बने हो जय रहितिस। सुन के फूफा कथे- अभी का बिगड़े हे। संझा कन जा के गोमती ल पइसा धरा देबोन। फूफा फेर खभर भेजवा दिस-पंचू ह आजे के आज पइसा धराए बर आहँू काहत हे। सखाराम खभर सुन के कुलके बर धर लिस। अपन गोसइन ल किहिस-सगा ह गोमती ल आजे पइसा धराहँू काहत हे।

संझा के खाना इहें खाही। खीर-सोंहारी भजिया बना डरहूँ। संझा कन सगा मन पहुंचिन। खुसी-खुसी गोमती ल पइसा धरइन। दुरपति अउ गोमती सब झिन के टूप-टूप पाँव परिन। जइसने माई खोली प दुरपति गिस ताहन गोमती ल पोटार के गोहार पार के रो डरिस। तंै तो सगा बन गेस बेटी ए हें हें..., बेटी तो पर के धन होथे बेटी ए हें हें... तोर बिना मैं कइसे रइहवं गोमती ए हें हें...। गोमती घलो सुसक-सुसक के रोए बर धर लिस। सखाराम ह रोहा-राही ल सुन के माई खोली म जाथे। महतारी-बेटी ल समझावत चुप करावत कथे-चलो जेवन के तइयारी करौ।

जेवन करत-करत फूफा ह सखाराम ल किहिस-पंचू घर ठीका बिहाव चलथे। तुंहर घर चलथे ते नही। सखाराम कथे-अब तो हम्मन गोमती ल हार डरे हन। अपन धन ल ठीका बिहाव कर के लेगे या फेर बड़े बिहाव। अब तो उंकर धन आय। फूफा कथे-त पंचू कइसे करबे, लगन बर पंडित ऊ देखाबे का? पंचू कथे-एमा पंडित-वंडित के का जरूरत हे। अकती भांवर ले लेबोन। एह तो देव लगन आय। खाते-खाते लगन तिथि ल घलो तय कर डरथे ताहन हाथ धो के उठथे। ओकर बाद सौंप-सुपाड़ी खा के खुशी-खुशी फूफा अउ पंचू ह घर लहूट जथे। पंचू ह चार पहर रात ल अपन फूफा घर काटथे ताहन बिहान दिन बेलौदी जाये बर लहूट जथे। 


अट्ठारह


चैतू के बिहाव करके गोमती ल गवना लइस। पंचू अउ सवाना गोमती कस बहू पा के बिक्कट खुस राहै। पंचू ह मने-मन गुने बहू के आए ले चैतू ह सुधरही। फेर चैतू तो बड़ फंटूस रिहिस। ओकर बर तो जिनगी ह नाचा-पेखन कस रिहिसे। जइसन परिस्थिति आये ओइसने ढल जावे। गांव म दसराहा होवै चाहे कोनो भी सार्वजनिक कार्यक्रम चैतू ह बढ़-चढ़ के भाग लेवै। गांव के बूता होवै चाहे समाज के अब तो धीरे-धीरे सब जघा सियानी करे बर धर लिस।

गोमती पढ़े-लिखे भले नइ रिहिस हे फेर पढ़े-लिखे नारी ले कम नइ रिहिसे। चैतू गोमती ल पहिली ले समझा दे रिहिस हे कि चाहे जो भी हो जय मोला बैसाखु अउ जेठू ल पढ़ाना हे। बस गोमती बर इही बात ह महामंत्र बनगे। चैतू गोमती ल किहिस कि एक घांव भले अपन लइका तकलीफ पा ले फेर भाई मन के पाँव म कांटा नइ गड़ना चाही। गोमती ह हव कहिके अपन पति परमेश्वर ल हामी भर दे रिहिसे। बिदा करे के बेरा गोमती के दाई-ददा समझाए रिहिसे-देख बेटी तैंह अपन घर ले मर के निकलबे, अब तोर दाई-ददा तोर सास-ससुर आय। पति ल परमेश्वर मानबे। तभे तो गोमती ह अपन पति के परमेश्वर कस पूजा करै। जब तक ले चैतू खाना नइ खवा ले तब तक गोमती नइ खावै। अपन पति परमेश्वर ल एक दिन बिनती करे रिहिसे-खाय के बाद आखरी म एकाद कौंरा छोड़ दे करौ, मैं भगवान के परसाद कस खा लुहँू। तब ले चैतू खाय के बाद थारी म एक कौंरा जरूर छोड़ देवत रिहिसे।

चैतू ननपन ले तिकड़मी रिहिस। एकर तिकड़मी के मारे पंचू घलो हक खा गे रिहिसे। बेलौदी जाम(बिही)-भाँटा के गांव आय। इहें जउन भी बहू आही ओला भांटा भाजी धर के दुर्ग के हटरी जायेच्च ल परै तभे जिनगी ह पहाथे। चाहे आठ-दस एकड़ के जोतनदार राहै। जइसे-जइसे दिन ह कटत गिस गोमती अब घर के संगे-संग बाहिर के काम बूता ल घलो सम्हाले बर धर लिस। अब तो बैसाखु अउ जेठू ल पढ़ा-लिखा के अपन गोसइया के सपना ल पूरा करना बड़ जिम्मेदारी होगे रिहिस। ओकर बाद गोमती पूरा परिवार के जिम्मेदारी ल उठा लिस। एती चैतू घलो भर्री म भांटा-पताल बोवै। बेलौदी ले भांटा पताल ल कांवर म बोहे लुचुक-लुचुक सुपेला बाजार जावै। उही समे भिलाई ह नवा-नवा खुले रिहिसे। दुनिया भर के लोगन मन इहें खाय कमाए बर आए रिहिन हे। देसी जिनिस के भारी मांग रिहिसे। चैतू कतनो कमावै फेर थैली खाली के खाली। काबर कि जतना के बेचे राहे सबो ल दारू भट्ठी म उरका दे। बाजारे ले घर लहूटत-लहूटत चरिहा अउ थैली दुनो खाली राहे। संगति म चैतू के पियई ह बाढ़त गिस फेर कम होय के नावे नइ लिस। अब एती बैसाखु अउ जेठू के पढ़ई के खरचा घलो बाढ़त गिस। 

चुनई के समय चैतू ह धनेश के संग केनवासिन (चुनाव प्रचार) म निकल जय। उही समे दुर्ग वाले गुप्ता दाऊ ह विधानसभा के चुनाव लड़त रिहिस। चैतू अउ धनेश रोज के रोज गुप्ता दाऊ घर चुनाव प्रचार बर पइसा ले लेवे अउ दिन भर किंजर फिरके गुप्ता दाऊ ल जीतत हस दाऊ जी कहिके दारू पी के घर लहूट जय। अब चैतू ह धीरे-धीरे राजनैतिक के पैतरा ल घलो जाने समझे बर धर लिस। एक घांव तो गुप्ता दाऊ के चुनाव प्रचार करत हन कहिके चन्द्राकर दाऊ के सपोट करै अउ गुप्ता दाऊ के भीतर घात। ओ समे चैतू अउ धनेश के खुफियागीरी ले चंद्राकर दाऊ ह विधानसभा चुनाव जीते रिहिस। ओकर बाद तो चैतू ह चंद्राकर दाऊ के भरोसामंद कार्यकर्ता बनगे रिहिस हे। नेता अउ अधिकारी मन ल कइसे खुश करना राहे तेला चैतू ह राजनैतिक क्षेत्र म आए ले सीख डरे रिहिसे। बीच-बीच म चैतू ह भांटा-भाजी अमराए के बहाना संपर्क बनाए राहै। दाऊ ल पपीता बिक्कट पसंद राहै। घर म पपीता नइ होवै त बाजार ले बिसा के घर के पपीता ए दाऊ जी कहिके अमराए बर जावै। अब छोटे-मोटे काम बर चंद्राकर दाऊ के राहत ले एती ओती भटके बर नइ परै। चंद्राकर दाऊ ह चैतू ल अपन परिवार कस मया करै। चैतू ल चंद्राकर दाऊ असीस दे दिस-चैतू मैं तोर पाँव म कभू कांटा गड़न नइ दवं।

बेलौदी गांव के खइरखा डाड़ डहार वाले केवट मन मड़ई बनावै तेकर सेती ओला मड़इया पारा अउ तरिया पार के केवट मन कबीर पंथी रिहिन तिही पाए के कबीराहा बेड़ा काहै। मड़इहा पारा के फिरंता ह थोकिन झाड़-फूक घलो करै। झाड़-फंूक के आड़ म तथाकथित बइगा गलत काम घलो करै। बेटी माई मन लाज के मारे घटना ल घर-बाहिर बताए के हिम्मत नइ करै। फिरंता डोकरा ह बदमास रिहिसे। गांव के गौटिया घर के बहू ल जर बुखार आगे। बने दिन होगे रिहिसे फेर बने नइ होवत रिहिसे। त एक झिन माईलोगन ह गौटिया के बहू फूलकैना ल किहिस फिरंता डोकरा करा नइ फूंकवा लेते। तीन घांव फंूकथे ताहन बने हो जथे। फूलकैना ओ माईलोगन के बुध म आगे अउ डोकरा घर चल दिस फंूकवाए बर। डोकरा ह अपन आदत ले बाज नइ आय रिहिसे। डाढ़ी मेछा पाकगे रिहिसे फेर मेछराए बर नइ छोड़े रिहिसे। मौका देख के फूलकैना के हाथा-बइंहा ल धरे बर धर लिस। फूलकैना झटकार के उहां ले भागिस। घर म आ के कोनो ला बताए के हिम्मत नइ होइस। फेर फिरंता डोकरा बड़ चालबाज रिहिसे जउन ओकर बात नइ मानतिस ओकर जीना हराम कर देतिस। अब फिरंता के पूरा धियान भभूत ले हट के फूलकैना उपर राहै। फूलकैना के हेकड़ी ल कइसे ठीक करे जाय। 

बइगा डोकरा ह सुकवारो ल सीखो दे रिहिसे। मैं जइसन-जइसन कहंू ओइसने-ओइसने कबे ताहन मैंह तोर ताबिज के पइसा नइ लेंव। बिहान दिन अपन घर म चूंदी ल छरिया के सुकवारो ह झूपे बर धर ले रिहिस। अपने-अपन बकरे बर धर ले रिहिस। अपन गोसइया ल काहै-मैं ह तोला खाहँू। अपन सास के चंूदी ल धर के तीरे ल धर लिस। घर म बरतन भाड़ा ल फेंके बर धर लिस। माटी के बरतन ल कचारे बर धर लिस। घर म पूरा अशांति के माहोल होगे। अब तो सुकवारो ह हंसिया ल धर के मारे बर दउँड़े बर धर लिस। ले दे के सुकवारो ल ओकर पति जगेसर ह काबू म लान के डोर म बांध के राखिस। डर के मारे तुरते जगेसर ह बइगा डोकरा घर गिस। जगेसर ल देख के डोकरा बइगा ह मने मन खुश होगे। दांव ठीक लगे हे कहिके। 

बइगा डोकरा किहिस-चल अगुवा जगेसर लिमऊ बंदन अउ लउठी के बेवस्था करके रखबे। मैं जल्दी पूजा पाठ कर के आवत हौं। जगेसर ह बइगा के बताए के मुताबिक सामान के बेवस्था कर डरे रिहिस हे। बइगा ह धकर-लकर जगेसर घर गिस ओला देख के सुकवारो ह चिल्लाए बर धर लिस। मैं अपन गोसइया ल खाहँू। मैं अपन सास ल खाहँू। सुन के महतारी-बेटा डर्रागे रिहिन हे। दुनो झिन हाथ जोर के बइगा ले बिनती करिन-बचा ले बइगा महराज, बचा ले। बइगा इंकर कमजोरी ल जान डरिस। अब तो इमन डर्राय ल धर ले हे। मैं जइसन कहँू ओइसन इमन मानही। अब बइगा डोकरा ह अपन परपंच शुरू करिस। सब ले पहिली तो लिमऊ बंदन लगा के मंत्र पढ़िस ताहन सुकवारो के मुड़ी ले पांव तक उतारिस। बइगा डोकरा ल सुकवारो काहै-तैं भाग जा डोकरा नही ते तहँू ल खा दुहँू। बइगा डोकरा सोचिस एह डायलाग ल भूला झन जाय कहिके अपन भदंई ल निकालिस अउ मारत-मारत किहिस-तैं मोला खाबे अऊ मारौं का? सुकवारो कथे-नही, नही। बइगा डोकरा कथे-मैं पूछहँू तेला बताबे न? सुकवारो कथे-हव। बइगा डोकरा सुकवारो ल पूछथे-तैं कोन अस? सुकवारो कथे-तोला मैं नइ बतावँव। बइगा डोकरा फेर भदंई म हकरा देथे। पूछथे तैं     कोन अस? सुकवारो कथे-मैं फूलकैना अवं। बइगा डोकरा कथे-तेंह कहां हवस? सुकवारो कथे-मैं मेड़रा तीर के बोईर पेड़ म हौं। बइगा डोकरा कथे-सुकवारो के गोसइया अउ ओकर सास बर के दिन के करार करे हस? सुकवारो कथे-मेंह आठ दिन के करार करे हवं। बइगा डोकरा ह सुकवारो के चंूदी ल धर के मारत-मारत किहिस-तेंह इहां ले जाबे ते नइ जास? सुकवारो कथे-नइ जावं। बइगा डोकरा ह फेर दनादन-दनादन पीटे ल धर लिस। डर के मारे सुकवारो गुनिस यहू बइगा ह दंदरा डरही कहिके जाथौं जाथौं किहिस। तब बइगा ह सुकवारो के चंूदी ल छोड़िस ताहन सुकवारो ह बड़े मन के पलागी बनइस। बइगा किहिस-देखो जी सुकवारो ल भूत धर ले रिहिसे। सुकवारो ह फूलकैना के नाम बकरे हे। ए सब करनी फूलकैना के आय। फूलकैना टोनही नो हे बल्कि सोधे आय सोधे। फूलकैना के गांव निकाला नइ होही ते गांव भर ल एक के बाद एक खा जही। सबो सकलाए मनखे बइगा के बुध म आ के हौ कहि दिन। आज रात बइठका सकेलो।

ओती फूलकैना ल सोधे आय कहिके ओकर गोसइया ल पता चलिस ताहन बुधारू ह फूलकैना ल चुंदिया के पीटत-पीटत घर ले निकालत रिहिस। फूलकैना बिक्कट कलौली करिस मोला घर ले झन निकालौ मैं तीन-तीन झिन नोनी-बाबू ल छोड़ के कहां जाहंू, मोला घर ले झन निकाल। बइगा ह मोला फोकटे फोकट बदनाम करत हे। बुधारू कथे-तैंह देवता असन बइगा डोकरा ल फोकटे-फोकट बदनाम करत हे काहत हस। पूरा गांव बस्ती भर हल्ला होगे हे तेह। अब तो अइसे लागत हे मोर दाई-ददा ल तिंही खाय हस। फूलकैना के लाख बिनती के बाद घलो बुधारू नइ मानिस। बइगा के बुध म आ के डेनिया के घर ले बाहिर निकालत रहिस ओइसने म चैतू ह फूलकैना ल पीटत-पीटत घिरलावत देख डरथे। चैतू जा के पहिली तो बुधारू ल पूछथे-कइसे का होगे बुधारू, भौजी ल काबर पीटत हस? बुधारू खिसिया के चैतू ल कथे-तैं कुछु ल नइ जानस। चैतू कथे-अरे भई कुछु बताबे? बुधारू ह फेर फूलकैना ल मारे बर धरथे। चैतू ह बुधारू ल पोटार के फूलकैना ल मारे बर मना करथे। चैतू पूछथे-आखिर काबर मारत हस बताबे? बुधारू कथे-नइ मारहँू त का एकर चुमा लुहंू। चैतू कथे-तहंू भइया, का होगे? बुधारू कथे-अरे फूलकैना ह हमर नाक ल कटवा दिस। चैतू कथे-कइसे नाक ल कटवा दिस? सुकवारो ल भूत धरे रिहिस हे। ओह फूलकैना के नाम बकरे हे। आज रात कन बइठका हे तेमा एकर नाव लेके हमर परिवार के गांव निकाला होही। फूलकैना सोधे ए सोधे। चैतू किहिस-तहंू भइया अहा का अंधविश्वास म परे हस। कोनो भूत-ऊत नइ होवै। फूलकैना भउजी न टोनही हे, न सोधे हे। ए सब फिरंता डोकरा के चाल आय। मैं ओला जानथौं। न फूलकैना भउजी ल मैं गांव ले निकालन देवौं न तुमन ल। एकर बर चाहे कोट-कछेरी जाय बर पर जय। पहिली तैं भउजी ल घर म लेग। देवी असन नारी उपर हाथ उठावत हस। घर के लक्ष्मी आय, घर के लक्ष्मी। परिवार के मरजाद आय। भउजी के आय ले जउन घर ह अतेक विकास करिस तिही ल विनाश के कारण मानत हस। संझा कन बइठका होही तेमा तुमन हिम्मत करके सकलाहू। ले दे के बुधारू ह मानिस अउ फूलकैना ल घर म चल किहिस। अब मार के मारे ओती सुकवारो ह कहरत राहै अउ एती फूलकैना हा।

कोतवाल हांका पार दिस-गांव के सब किसान ल चेतावत हवं, आज रात जें-खाए के बाद तरिया पार म बइठका हे, सब झिन सकलावत जाहू हो...। कोतवाल ह गांव के सबो गली म जा के हांका पार दिस। बइठका के खभर ल सुन के गांव वाले मन के अंतस म उत्साह भरगे काबर कि धीरे-धीरे करके सबके कान म फूलकैना वाले बात पता चलगे रिहिसे। फिरंता बइगा ह मड़इया पारा वाले मन ल सब झिन ल भड़का डरे रिहिस हे कि फूलकैना सोधे हे एकर गांव ले निकाला जब तक ले नइ होही तब तक ले गांव सुरक्षित नइ राहै। एहा गांव भर के मनखे ल एक के बाद एक खा डरही। गांव ल बिगाड़ डरही। अपन संग म अउ कतनो बेटी-बहू ल टोनही झूपे बर सिखो डरही। फिरंता डोकरा ल मड़इया पारा वाले मन बिक्कट मानै। फिरंता जइसन कहि देवे ओला राम बाण मानै। काकरो हिम्मत नइ राहै कि ओकर बात ल काटै।

एती चैतू ह कबिराहा बेड़ा वाले मन ला अपन फेभर म कर डरे रिहिसे। चैतू हमेशा समाजिक बूता म, गनेश पूजा म, अगुवई करे। काकरो भी सुख-दुख म चौकीदार कस सेवा बजाय। तिही पाय के चैतू के प्रति कबिराहा बेड़ा अऊ खाल्हे पारा वाले मन के बड़ा आदर के भाव राहे। सब झिन जानत रिहिसे कि एक कनिक पिये भर के अएब हे ताहन कुछु के अएब नइहे। चैतू जब चलही नीत के रद्दा म चलही। चैतू सब झिन ल समझइस कि आज फिरंता ह फूलकैना भौजी ल जबरन टोनही करार देवइया हे। जबकि टोनही-वोनही कुछु नइ होवै। एह सब अंधविश्वास आय। कोनो ल टोनही, सोधे कहवई ह सामाजिक अपराध आय। फोकटे-फोकट फूलकैना भउजी ल टोनही सोधे के रूप म बदनाम नइ होवन देवन। सब झिन चैतू के सलाह ल मानगे। सब झिन किहिन-अइसन नइ होवन देवन। आज फिरंता ह फूलकैना ल टोनही हे कहिके बदनाम करत हे। काली अउ कोनो ल बदनाम करही। एमा फिरंता के जरूर कोनो न कोनो चाल हे। कबिराहा बेड़ा, खाल्हे पारा अउ मण्डल पारा वाले मन चैतू के साथ देबर एकजुट होगे।

बेरा ढरकत गिस। खुसुर-फुसुर बाढ़त गिस। कोनो काहत हे-तभे तो काहन जी फलाना घर के नोनी ह देखते-देखत कइसे आंखी ल नटेर दिस। कोनो काहै पउर साल फूलकैना ह हमर कोंहड़ा डहार अंगरी देखा दे रिहिसे। देवारी के दिन खिचरी बर पोइलेन त घोलहा निकलगे। भारी खर हे फूलकैना के छांव ह। तभे तो बिसाखा ह काहत रिहिस हे-घठौंदा म पानी सिंच दे रिहिसे ओ दिन ले ओकर कनिहा पिरावत हे।

जें खाय के बाद गांव के छोटे-बड़े किसान तरिया पार म गोठियावत-बतावत सकलागे। ए दरी बइठका म भारी भीड़ रिहिसे। कबिराहा बेड़ा वाले मन फूलकैना के सपोट म रिहिन त मड़इहा बेड़ा वाले मन फूलकैना के विरोध म तमतमावत रिहिन हे। बइठक सकलागे। गांव के सियान धन्नू के ददा पटेल रिहिस। पटेल किहिस-कइसे भई बइठका शुरू करे जाय, कइसे फिरंता? फिरंता हव कहिके सहमति दे देथे। एती चैतू कहिथे-कइसे चैतू बइठका सुरू करे जाय। चैतू घलो हव कहिके अपन सहमति दे देथे। बइठक म कांव-कांव होगे। चारो डहार ले हो हल्ला शुरू होगे। पटेल ह, झिन सब चुप राहौ रे भई। कहिके चुप करइस। अब पटेल पूछिस-कस जगेसर बइठक काबर सकेले हस? जगेसर ह किहिस-आज बिहनिया मोर गोसइन ल भूत धरे रिहिसे। फिरंता बइगा ह भूत ल उतारिस त सुकवारो ह फूलकैना के नाम बकरे हे। अब तुही मन बताव मालिक फूलकैना ह मोला अउ मोर दाई ल आठ दिन के भीतर गिराहँू काहत हे। मोला बचा लेव दाऊ, बचा लेव। पटेल फिरंता ल पूछिस-कइसे बइगा, का जगेसर सही काहत हे? फिरंता किहिस-हव सही काहत हे, सही। अब मड़इया पारा वाले मन हल्ला मचाना शुरू कर दिन। फूलकैना ल गांव ले निकाले जाय। तभे हमर गांव बांच पाही। चैतू ह चिल्ला के कथे-इमन सब फालतू बात करत हे। कोई टोनही-उनही नइ होवै न सोधे होवै। इमन जबरन फिरंता के चक्कर म आ गे हे। ओतका म अवध ह किहिस-हम्मन फिरंता के चक्कर म नइ आय हन बल्कि तैंह फूलकैना के चक्कर म आ गे हस। अतका ल सुन के चैतू बगिया गे तैं आंय बांय झन गोठिया अवध। मड़इया अऊ कबिराहा बेड़ा वाले मन कांव-कांव करे बर धर लिन। पटेल शांत करइस। पटेल फिरंता ल किहिस-का तैंह साबित कर सकथस? फिरंता किहिस-हौं मैंह साबित कर सकथौं। पटेल किहिस- कइसे? चैतू, फिरंता काहत हे साबित कर दुहूं कहिके, त का करे जाय? फिरंता किहिस-अउ का करे जाय, फूलकैना ल बइठका म बलवाय जाय। इहें सबके आघू म डाड़ नहकाय जाय। नाहक डरही त टोनही नइहे अउ नइ नाहकही त जान डरौ ओह टोनही हे। ओकर गांव निकाला करे बर परही। मड़इहा पारा वाले मन कांव-कांव करे बर धर लिस। पटेल ह सब झिन ल शांत करा के बुधारू ल किहिस-बुधारू फूलकैना ल जा घर ले धर के लानबे, संग म कोतवाल घलो जाही। बुधारू हव कहिके कोतवाल संग फूलकैना ल लाए बर घर चल दिस। तब तक ले बइठका म हो हल्ला माते राहे। कोलबिल-कोलबिल हाट बाजार कस माते राहे। पटेल के गांव म दबदबा रिहिस तेकर सेती सब ल कंट्रोल कर के रखे रिहिस नही ते दुसर सियान होतिस ते कोनो घेपबे नइ करतिस। फिरंता अपन साजिश म पूरा तइयार रिहिसे। डाड़ नहकाए के तइयारी करिस। फिरंता पहिली ले दूजराम ल मुसुवा ल धरा दे रिहिसे। जइसे फूलकैना डाड़ नाहके बर आही ताहन मुसुवा ल ढिल देबे कहिके। मने-मन फिरंता बड़ खुश राहै। आज फूलकैना ल पता चलही। मोर बात ल जउन नइ मानै ओकर सर्वनाश हो जथे। 

बुधारू ह घर म पहुंच के फूलकैना ल बइठक म चले बर किहिस। फूलकैना किहिस-जब मैं टोनही नइ हौं, त फेर बइठक म काबर जाहंू। बुधारू फूलकैना ल किहिस-एह तो बइठका म साबित होही कि तैं टोनही हस ते नही। फूलकैना अपन गोसइया ल कथे-त का तहंू ल मोर उपर भरोसा नइहे? बुधारू कथे-मोर भरोसा ले का होही, समाज ल भरोसा होना जरूरी हे। काबर कि एहा गांव के मामला ए। जब सीता मइया ल अग्नि परीक्षा देबर पर सकथे त तैं तो सामान्य नारी अस। फूलकैना अपन मने-मन गुनथे-कोन जनी काय पाप करे रेहेंव कि आज मोला ए दिन देखे बर परत हे तिंही जान विधाता का रचना रचे हस कहिके सुसकत-सुसकत अपराधी बने मुड़ी ल ढाके बुधारू संग बइठका म जाय बर निकलगे। बइठका मेर जइसे फूलकैना पहुंचथे, मड़इया पारा वाले मन चिल्लाय बर धर लेथे मारो-मारो कहिके। पटेल ह चिल्ला के शांत कराथे। चुप राहो न रे भई। तब कहंू जा के चुप होथे। पटेल ह बुधारू ल कथे-सुन बुधारू फूलकैना के उपर टोनही के इल्जाम लगे हे। ओला निर्दोष साबित करे बर फिरंता के मुताबिक डाड़ नाहके बर परही। चैतू चिल्ला के कथे-ए सब अंधविश्वास ए पटेल जी। आपो बइगा के चक्कर म आ गेव। पटेल चैतू ल समझावत कथे-महंू ह अंधविश्वास के खिलाफ हवं चैतू फेर मड़इया पारा वाले मन के बात ल राखे बर फूलकैना ल डाड़ नाहके बर परही। अरे भई सांच ल आंच काबर ? चैतू ह कथे-फूलकैना भउजी ह डाड़ नाहके कि झन नाहके फेर ओह टोनही नइ होवै। जादा करहू ते मैं पुलिस थाना म तुंहर खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दुहंू। पटेल कथे-तंहु ह चैतू गांव के बात ल गांवे म सुलझाथन। गांव के नीत नियाव ल पुलिस कछेरी तक काबर लेगत हस। चैतू के एक नइ चलिस अउ सब झिन फूलकैना ल डाड़़ नहकाए बर राजी होगे। बइगा ह बइठका के बीचो बीच डाड़ खीचे रिहिस तेला फूलकैना ह नाहके के कोशिश करत रिहिस ओतके बेर हुशियारी ले दूजराम ह मुसुवा ल ढिल दिस। मुसुवा ल देख के फूलकैना डर्रागे अउ ए दई वो कहिके लहूटके भागे बर धरिस ताहन मड़इया पारा वाले मन सब उमिहागे। फूलकैना टोनही हे टोनही। मारो-मारो कहिके हल्ला गुल्ला होए बर धर लिस। ले दे के पटेल के कहना में शांत होगे। अंदरे अंदर धन्नू घलो फिरंता बइगा के साथ देवत रिहिस हे। पटेल किहिस-देखो भई, फूलकैना ह तो डाड़ ल नइ नाहक सकिस एकर ले ए साबित होथे कि फूलकैना वाजिब म टोनही हे। एकर बर का सजा दे जाय। चैतू कथे-जब फूलकैना ह गलती करेच नइहे त सजा का के? पटेल कथे- फूलकैना तो डाड़ ल नइ नहाक पाय हे। चैतू कथे-फूलकैना ह मुसुवा ल डर्रा के लहूटगे। डाड़ ल कइसे नइ नाहक सकही। पटेल कथे-त एक घांव अउ नहकाय जाय। फिरंता कथे-का रात भर डाड़ नहकावत रहिबो पटेल जी। एक घांव होगे मने होगे। काबर कि फिरंता जानत रिहिस हे कि ए दरी फूलकैना ह डाड़ ल नाहक डरही ताहन मामला गड़बड़ा जही। काबर कि अभी मुसुवा वाले जुगाड़ नइहे। पटेल कथे-देख फिरंता एक घांव तोर बात ल राखे हौं, अभी चैतू के बात ल घलो राखे बर परही। चल फूलकैना डाड़ ल नहाक ए दरी नइ नाहक सकबे त तोला गुनाह कबूले ल परही। फूलकैना ह सोच ले रिहिसे मुसुवा आय चाहे डोमी सांप फेर ए दरी तो डाड़ ल नहाक के रहंू। हिम्मत करके फूलकैना दंगर-दंगर जाथे अउ डाड़ ल नहाक देथे। कबिराहा बेड़ा वाले मन के चेहरा म खुशी के लहर दउँड़ जथे। अब पटेल कथे-कस फिरंता फूलकैना तो डाड़ ल नहाक दिस। फिरंता किहिस-ए सब ल हम नइ जानन-फूलकैना ह टोनही हे मने हे। मान ले तुमन ओला गांव ले नइ निकालहंू त मड़इया पारा वाले मन गांव ले अलग रही। पटेल फिरंता ल बहुत समझाथे-अरे भई गांव ल दू भाग म झन बांटौ। गांव के बंटाय ले मया-बटा जही। गांव के विकास रूक जही। मेल जोल सिरा जही फेर फिरंता डोकरा नइ मानिस। चैतू किहिस मड़इया पारा वाले मन अलग रहिबोन काहत हौ त कबिराहा बेड़ा वाले मन घलो अलग रही। पटेल ह लाख समझइस गांव ल दु पाटरी झन करौ कहिके फेर फिरंता नइ मानिस। ओ दिन ले गांव दु पाटरी होगे। 

अब मड़इया बेड़ा के सियानी फिरंता बइगा करत रिहिस अउ कबिराहा बेड़ा के सियानी चैतू ह करत रिहिसे। अब तो दुनो बेड़ा वाले मन पौनी-पसारी अलग-अलग लगइन। अब गांव म फूट परे ले सब झिन म फूट परगे। कबिराहा बेड़ा अउ मड़इहा बेड़ा वाले मन बात-बात म लड़े झगरे बर धर लिन। जउन गांव के एकता जगजाहिर राहय अब ओ गांव ह दु पार्टी के रूप म जाने गिस। एक पार्टी वाले मन ल दूसर पार्टी वाले मन ह फूटे आंखी नइ सुहावत रिहिस। अब देवारी म दु जघा गोवर्धन खुँदाए बर धर लिन। अलग-अलग मातर मनाए बर धर लिन। अब एक-दुसर के प्रेम ह इर्ष्या म बदलगे रिहिस। बेलौदी गांव ल काकर नजर लगगे ते समझ आबे नइ करिस। अब तो पूरा गांव के मया पिरित म जहर घोरागे रिहिसे। चैतू अउ पटेल खूब कोशिश करिन कि गांव ह एकजुट हो जय कहिके फेर इंकर मिहनत सफल नइ होइस।

कुछ दिन गुजरे के बाद फिरंता डोकरा ह सुकवारो ल रद्दा म किहिस-तोर ताबिज बनगे हे, सरी मंझनिया लेगे बर आबे। गरमी के दिन राहै सरी मंझनिया सुकवारो ह फिरंता बइगा घर पहुंचिस। सुनसान देख के फिरंता डोकरा ह हाथा बइंहा धरे बर धर लिस। सुकवारो ह झटकार के भाग के अपन इज्जत ल बचइस। फिरंता डोकरा किहिस-तोला देख लुहंू सुकवारो। तोरो हाल फूलकैना कस होही तब समझ आही। सुकवारो किहिस-तैं मोला का देखबे अब तो मैं तोला देख लुहंू। अब तक ले तोला देवता मानत रेहेन। हम का जानत रेहेन बइगा के रूप म राक्षस के बूता करत रेहे। घर म जा के सुकवारो ह अपन गोसइया जगेसर ल बतइस। जगेसर रात कन गांव भर के बइठका सकेलिस। सुकवारो ह फूलकैना करा अपन दुख रोइस। फूलकैना किहिस-मोरो सन बइगा ह हाथा बइंहा धरे के कोशिश करिस फेर मेंह झटकार के भाग के अपन इज्जत ल बचाए रेहेंव। मेंह लोक-लाज के मारे अपन गोसइया ल घलो नइ बता पाये रेहेंव तिही पाए के सबो दुख ल मने मन घुटरत रेहेंव। अब तैं चिंता फिकर झन कर मैं तोर साथ दुहूं महुं ह आज सफ्फा-सफ्फा सबो बात ल मोरो गोसइया ल बताहँू ताहन आज बइठका म महंू आहँू अउ ओ फिरंता के नाक म चूना लगाबोन।

रात कन चमाचम बइठका सकलइस। पटेल पूछिस-कइसे जगेसर काबर बइठका सकेले हस? जगेसर किहिस-फिरंता बइगा ह ताबिज देबर बला के सुकवारो के हाथा-बइंहा धरत रिहिसे अउ धमकी देवत रिहिसे फूलकैना कस तहंू ल बदनाम कर दुहंू कहिके। अब आपे मन बतावौ फिरंता गुनहगार हे ते नइहे अउ नइ पतियावव ते फूलकैना घलो संग म आय हे वहू ल पूछ लेव। पटेल ह फूलकैना ल पूछिस-कइसे फूलकैना का तोरो संग फिरंता ह हाथा बइंहा धरे के कोशिश करे रिहिसे? फूलकैना किहिस-हव पटेल जी महंू ह झटकार के भाग के अपन इज्जत ल बचाए रेहेंव। चैतू किहिस-त ए बात ल उही समे काबर नइ बताए? फूलकैना किहिस-ओ समे मोर बात ल कोनो नइ पतियातिस काबर कि बइगा ल सब देवता कस मानै। चैतू ल तो अब मौका मिलगे मैं पहिलीच्च ले काहत रेहेंव कि फिरंता ह फूलकैना भउजी ल जबरन बदनाम करत हे कहिके फेर मानबे नइ करत रेहेव। एदे आज दूध के दूध अउ पानी के पानी होगे। सब झिन अब फिरंता ल मारो-मारो कहिके चिल्लाये। पटेल सब ल शांत कराथे। कानून ल अपन हाथ म झन लेवौ। त चैतू कथे-अभी चलो फिरंता के खिलाफ दुर्ग के पुलिस थाना म रिपोर्ट लिखाबो। पटेल ह समझाथे-देखो भई गांव घर के मामला ए, एला गांवे म निपटा लेथन। गांव के फधित्ता काबर कराबोन। रमेसर कथे-अइसे म नइ बने अब फिरंता डोकरा ल गांव ले खदेरे बर परही। पटेल ह कथे-देखो रे भई कोनो गलती कर डरे हे त ओला खदेरे म बात नइ बने ओला प्रेम से समझाए बर परही। कोनो कथे-अइसन म डोकरा ह नइ सुधरे अब फिरंता ल हकन के डाड़ौ। पटेल कथे-अरे भई का फिरंता के घर दुआर ल बेचवा दुहू का? फिरंता के गलती के सजा ओकर परिवार ल काबर दुहू? पटेल किहिस-मैं कहंू तेला सब झन मानहंू कि नइ मानहँू। सब झिन हामी भर देथे। पटेल कथे-फिरंता ल एक नरियर के डाड़ परही अउ सब झिन ला माफी मांगही अउ किरिया खाही कि अइसन गलती नइ करै, कइसे फिरंता? फिरंता ह मुड़ी ल गड़िया के किहिस-हव पटेल जी। फिरंता ह सार्वजनिक माफी मांगिस अउ नरियर मंगवा के डाड़ स्वरूप पटेल ल दिस तेला फोर के पूरा बइठका म बांटिस। पटेल ह फिरंता अउ चैतू ल हाथ मिलवइस ताहन गांव फेर एकजुट होगे। पटेल किहिस-एसो होली ल सब झिन जुरमिल के मनइंगे। बइठक सिराए के बाद सब झिन खुशी-खुशी अपन-अपन घर लहूटिन। 


उन्नीस


गांव अब सुम्मत होगे। सब झिन हांसी खुशी जिनगी पहावन लागे। चैतू बड़ फरजंट रिहिसे। कोनो ले नइ डर्रायावय। अब तो चैतू ह गांव बर हीरो बनगे रिहिसे। घरेलू काम, खेती-खार के बूता के संगे-संग सार्वजनिक अउ राजनैतिक काम म बढ़-चढ़ के भाग ले बर धर लिस। संगे-संग अपन भाई मन के शिक्षा डहार घलो धियान राहै। बीच-बीच म अपन भाई मन ल चमकावत राहै। मंझला ह तो बिक्कट हुशियार रिहिसे फेर ओकर उल्टा सबले नान्हे भाई जेठू तो थोकिन कमजोर रिहिसे। अपन पहिनई ओढ़ई उपर जादा धियान देवै। चैतू ह जेठू ल जादा बरजे। फोकटे फोकटे झझकावत राहै-नइ पढ़हू ते तुमन ल बनी-भूति करे बर भेज दुहंू। तब कहंू जा के डर के मारे जेठू ह किताब ल हाथ लगाय। ले दे के उपर क्लास डहार चढ़त रिहिस हे।

अब पटेल ह घलो थके बर धर ले रिहिस हे। पटेल के थकई ल देख के धन्नू ह सियानी रद्दा म आय ल धरत रिहिसे। गांव के भरना वसूली ल, गांव के नीत नियाव ल निपटाय बर धर ले रिहिसे। अब धन्नू ल घलो लागत रिहिसे कि ददा के जाये के बाद पटेल के पागा ल गांव वाले मन मोरे मुड़ी म बांधही। देखते-देखते पटेल के तबियत बनेच्च खराब होगे। पान-परसाद खवाय के लइक होगे। चंदरमा लगे बर धर लिस। थोकिन देर बाद रोहा राही परगे। कार्यक्रम होय के बाद गांव म सुगबुगाहट शुरू होगे। अब गांव के पटेल कोन बनही कहिके? दाऊ बेड़ा वाले मन काहय धन्नू दाऊ के राहत ले अउ कोन बनही रे भई। अरे भई पटेल के बेटा पटेल बनही। फेर दाऊ मन के राहत ले दुसर के सियानी ह थोरे फभही, बताओ भला। कबिराहा बेड़ा वाले मन काहय-कतेक दिन ले दाऊच मन ल सियान बनावत रहिबो। गांव म केवट मन के संख्या जादा हे अउ फेर चैतू योग्य घलो हे। ए दरी गांव के पटेल चैतू ल बनाबोन। कब तक ले दाऊ मन के झोरा ल धर के पीछू-पीछू चलत रहिबोन।

इही साल भारी अंकाल परगे। ओती बैसाखु ह दुर्ग जिला म सबले जादा नंबर पाके मेट्रिक पास होइस। पंचू ह चैतू ल किहिस-एसो अंकाल परे हे चैतू, अब बैसाखु ल नइ पढ़ा-लिखा सकन। तेंह एक काम कर बैसाखु ल घलो काम-बूता म लगा दे। चैतू किहिस-देख ददा चाहे जउन भी हो जय, चाहे खेती-खार बेचा जावे फेर बैसाखु के पढ़ई ल नइ रोकन। मैं नइ पढ़ेव ते नइ पढ़ेव फेर भाई मन ल सूसी भर पढ़ाहँू। भले हम्मन दुनो परानी ल बनी-भूति करे बर पर जय। पंचू ह किहिस-देख रे भई तिही जान कइसे घर ल चलाबे अउ कइसे अपन भाई मन ल पढ़ाबे। सब बात ल बैसाखु अउ जेठू सुनत रिहिस हे। अपन बड़े भाई के जोश ल देख के अपनो मन बिक्कट पढ़े के किरिया खइन। जेठू कमजोर राहे। ओला ठीक करे बर कभू-कभू ओकर गुरू जी मन करा स्कूल चल देवे। चैतू के डर के मारे जेठू ह जादा उपद्रव नइ करै। बैसाखू ल कइसनो करके चैतू ह दुर्गा महाविद्यालय रायपुर म बी.ए. म भर्ती करिस। बैसाखु ल कहि दिस देख भाई रे तेंहा अपन धियान सिरिफ पढ़ाई म रखबे। एती पइसा-कौड़ी के चिंता फिकर झन करबे। तोला सिर्फ पढ़ना हे मने पढ़ना हे अउ पढ़-लिख के आघू बढ़ना हे। बैसाखु ल पढ़े बर रायपुर भेज दिस अउ जेठू ल पढ़ई-लिखई म धियान देबर बरजिस कभू चैतू के खिसियई ल देख के सवाना के मया पलपला जवै काबर कि सबले छोटे बेटा रिहिसे। चैतू के जाए के बाद सवाना ह कलेचूप जेठू ल खजानी बर पइसा देवै। आधा तो सवाना के मया के मारे जेठू ह चढ़े बर धर ले रिहिस फेर चैतू के थपरा ह बीच-बीच म ओला सोझियावै।

इही दरी गोमती ह दुख-पीरा खाय ल धरिस। सवाना ह मने मन खुश राहै। बहू आए के बाद सियान मन के एके ठन आसा रहिथे। कब मोला नाती नतरा खेलाय बर मिलही। अब नाती नतरा खेलाय के बेरा आगे। खोली ले ए हों... ए हों... कहिके लइका के रोवई के आवाज अइस। बाहिर ले पंचू अउ चैतू दउँड़त अइस। सवाना ह कुरिया ले कुलकत बाहिर अइस। पंचू ह पूछथे-नोनी ए ते बाबू ए? सवाना ह किहिस-बाबू ए, बाबू ए। चैतू के तो खुशी के ठीकाना नइ रिहिस। सवाना किहिस-चैतू तोर बूता ल हल्का करे बर आगे बेटा। चैतू किहिस-नही दाई मोर सरिख एला गदहा नइ बनावँव न खेती-किसानी करावँव एला तो बस मन भर के पढ़ा-लिखा के साहब-मुंशी बनाहँू। सवाना कथे-ले बेटा तोर सपना जरूर पूरा होही। आज तैंहा अतेक तकलीफ पा के अपन भाई मन ल पढ़ावत हस उमन पढ़-लिख के बाबू-मुंशी बनही ताहन उमन अपन भतीजा ल पढ़ा-लिखा के अपन जिम्मेदारी ल निभाही। पंचू कथे-बने काहत हस सवाना तोर सपना जरूर पूरा होही। पंचू अपन नाती के नाम दूरदेसी धरिस।

सन् उन्नीस सौ एकसठ के अंकाल ह थम्हे के नामे नइ लेवै। दु-तीन बच्छर तक सम्हलबे नइ करिस। अब तो बैसाखु के पढ़े-लिखे बर पइसा भेजय ते घर बर दु जुआर के रोटी के जुगाड़ करै। अब तो चैतू अउ गोमती बर परीक्षा के घड़ी आ गे। भेंडसर खार म टेड़ा-पानी म अमारी भाजी बो के जिनगी चलाए बर धरिन। अब तो अंकाल के मारे अइसे होगे कि एक जुआर लांघन त एक जुआर फरहार। बैसाखु के फीस बर गोमती के गहना गुरिया घलो बेचागे। माला मंूदी घलो नइ बाचिस फेर बैसाखू ल पढ़ाए बर नइ छोड़िन। अंकाल अतेक भारी रिहिस कि चरोटा अउ मछरिया भाजी भर ल खा के जिनगी पहाय ल परिस। कभू कभू चैतू ह खेत ल रहन धर के चक्रवृद्धि प्याज म दुर्ग वाले सेठ करा ले रूपिया लानै। चैतू बड़ा खुश मिजाज रिहिस कतनो बड़े संकट आ जावै फेर सबो संकट ल हांसत-हांसत झेल लेवै। एक दिन चैतू अमारी भाजी बेच के दुर्ग के पाँच कण्डिल वाले सेठ के दुकान डहार ले कुलकत-कुलकत लहुटत रिहिसे। ओकर कुलकई ल देख के सेठ किहिस-कइसे चैतू अतेक कर्जा म बोजाए हस अउ तैंह कुलकत हवस। तोला थोरको फिकर नइहे का? अतका सुन चैतू ह सेठ ल जवाब दिस-का के फिकर सेठ जी, अरे भई पइसच तो लेबे जान थोरे ले लेबे। जान रही तभे तो तोर कर्जा ल छूट पाहँू। चल तोरे करा तो आवत रेहेंव। सेठ कथे-काबर? चैतू कथे-अउ काबर खाता ल निकाल अऊ सौ रूपिया चढ़ा दे। काली बैसाखु अवइया हे ओकर पढ़ई बर पइसा देना हे। सेठ ह घलो चैतू उपर भारी विश्वास करै। तिही पाय के खाता ल निकालिस अउ सौ रूपिया फेर चढ़ा दिस।

अंकाल के समे म सरकार ह राहत कार्य घलो खोलिस फेर चैतू ह राहत कार्य म नइ जा के अपन मेहनत उपर भरोसा करिस। का करे जाय जेकर ले भाई मन ल पढ़ाए जा सके अउ घर म दु जुवार के भोजन के व्यवस्था हो सकै। राहत कार्य ले दु जुआर रोटी के तो बेवस्था हो जही फेर भाई मन ल पढ़ाये बर रूपिया कहाँ ले आही? समय के संगे-संग अपन आप ल ढालिस। एक दिन नगपुरा सहकारी बैंक गिस। उहां बैंक बाबू ल पूछिस-सुने हवं बैंक ह किसान मन बर डीजल मशीन के योजना लाय हे। बैंक बाबू किहिस-सरकार ह किसान मन ल अंकाल ले उबरे बर सिंचाई खातिर कर्जा म डीजल मशीन बर रूपिया देवत हे। अतका ल सुनिस ताहन बिहान दिन परचा ल धर के बैंक गिस अउ डीजल मशीन के रूपिया बर फार्म भरवा दिस। बैंक ह कर्जा म मशीन बर तीन हजार रूपिया दिस। चैतू बड़ हिम्मती रिहिस। अपन हिम्मत ले कभू जीवन ले नइ हारिस। जब चैतू ह दुर्ग ले बइला गाड़ी म जोर के नवा डीजल मशीन लइस त तो गांव भर देखनउट होगे। घर म पंचू, सवाना, गोमती अउ चैतू सुग्घर आरती उतार के अपन सुख, शांति अउ समृद्धि बर बिनती करिन। अब चैतू ह सबले पहिली उप्पर कछार म मशीन ल धर के गिस। पाइप ल शिवनाथ नदिया म लमा के फूटबाल ल नाली म मड़ा दिस। अब मशीन ल शुरू करे के कोशिश करिस फेर मशीन ह शुरूच्च नइ होवै। कोन जनी काय बिगड़गे रिहिसे ते नवा-नवा म। गांव के जड़कुकड़ा मन मने-मन खुश होवै। मरही चैतू ह कहिके। मुड़ भर करजा म बूड़े हे फेर फूटानी मारे बर नइ छोड़े हे। अब मशीन ल चालू करे बर सुपेला ले मेकेनिक लेगिस। ओहा किहिस-तोर मशीन म तो बड़े खराबी हे। बनाए बर जादा रूपिया लागही। अब चैतू गुनै दुब्बर बर दु असाढ़। मैं कहां ले लावौं रूपिया नवा मशीन ल बनाए बर। चैतू दिमाकी रिहिस ओला समझे म जादा समे नइ लगिस के ओ सुपेला वाले मेकेनिक हा बुद्धु बनावत हे। चैतू मेकेनिक ल किहिस-ले रे भई एक-दु दिन म पइसा के जुगाड़ करहँू ताहन तोला खभर करहँू कहिके। गांव भर हल्ला होग चैतू डीजल इंजन लाये हे ओहा चालू नइ होवत हे फेर चैतू चुप कहाँ ले राहय। ओह जानत रिहिसे महमरा वाले ओकर भाँचा ह डीजल मेकेनिक हे। अब ओला बलाए बर सईकिल उठइस अउ चल दिस। रातो रात अपन भाँचा ल धर के लइस अउ उप्पर कछार मशीन करा चल दिस। टार्च बार के देखिस त एक ठन वायर ह निकलगे रिहिसे तिही पाय के चालू नइ होवत रिहिसे। ओकर भाँचा ह वायर ल जोड़ के चालू कर दिस। रात भर भकभक-भकभक डीजल मशीन चलिस ते धनहा डोली मन रोहो-पोहो होगे। खेत के जीव घलो जुड़इस। धान ह बिहनिया टन्नक होगे रिहिस। खेत के प्यास बुतइस तभे चैतू के मन भरिस। अब तो चैतू के हिम्मत बाढ़गे। दिन-रात धनहा डोली म रहि-रहि के पानी पलो-पलो के खूब पइसा कमइस अउ अपन भाई मन ल बिक्कट पढ़इस। 

कुछ दिन बीते के बाद तहसीलदार ह गांव म पटेल के चुनाव खातिर फार्म भरे बर कोतवाल करा गांव म मुनादी करा दिस। पटेल बर चैतू, धन्नू अउ संतराम ह फार्म भरिन। पटेल चुनाव बर तहसीलदार ह तिथि तय करिस। तीनो झिन गिस त उहां संतराम ह चैतू के समर्थन म नाम वापस ले लिस। धन्नू ह तहसीलदार ल पहिली ले सेट कर डरे रिहिसे। तहसीलदार ह चैतू ल किहिस-देखो भई अभी भरना वसूले के समे हे, धन्नू ह भरना ल वसूलही। अतका सुनिस ताहन चैतू के दिमाक खराब होगे। चैतू तहसीलदार ल किहिस कि जब धन्नू ह भरना वसूलही त फेर मुनादी काबर कराए होबे? तहसीलदार ह एक नइ सुनिस चैतू के। चैतू घलो कम नइ रिहिसे पटेल चुनाव खातिर केस कर दिस। सिंग साहब के कोर्ट म। पेशी के दिन तय होइस। चैतू महमरा डीजल मशीन म पानी पलोए बर गे रिहिस ओइसने दुर्ग पहुंचिस। कपड़ा ह लद्दी म सनाए राहै। दाड़ी-मेछा बाढ़े राहै। रोहन बोहन दिखत राहै। पेशी के दिन महमरा ले सइकिल म दुर्ग गिस, मार पसीना ले लतपथ रिहिसे। धन्नू ह पहिली ले आ के सिंग साहब ल जमा डरे रिहिसे। पेशी शुरू होइस चपरासी आवाज दिस चैतू अउ धन्नू हाजिर हो। चैतू अउ धन्नू सिंग साहब के कोर्ट म पहुंचगे। सिंग साहब ह पूछिस-चैतू कौन है? चैतू किहिस-मैं आंव सर! सिंग साहब-ताना मारत किहिस-अच्छा तो तुम पटेल बनना चाहते हो? चैतू जवाब दिस-हव साहब! सिंग साहब किहिस-तुम दर्पण में अपना सकल देखे हो, पटेल बनना चाहते हो। चैतू जवाब दिस-काकरो थोथना म थोरे लिखाय हे साहब पटेल बनना। सिंग साहब कथे-देखो चैतू तुम पटेल नही बन सकते। चैतू पूछथे-काबर साहब? देखो चैतू पटेल का लड़का ही पटेल हो सकता है। चैतू के दिमाक खराब होगे। खिसिया के किहिस-डॉक्टर के लइका डॉक्टर, इंजीनियर के लइका इंजीनियर नइ बन सकै त फेर पटेल के लइका पटेल कइसे बनही तेला बता? अउ फेर पटेल के लड़का ल पटेल बनानच रिहिस त फेर पटेल चुनाव बर मुनादी काबर करवाए होबे? सिंग साहब चैतू के जवाब ले नाराज होके किहिस-पटेल चुनाव नही कराउंगा तो क्या कर लोगे? चैतू किहिस-मैं बहुत कुछ कर सकथौं। सिंग साहब किहिस-देहाती कहिके, तुमको जो करना हे कर लो अब बेलौदी का पटेल धन्नू रहेगा। चैतू भंदई पहिर के गे रिहिस। गुस्सा के मारे धम्म ले पटकीस अउ सीधा मोहन नगर चन्द्राकर दाऊ घर पहुंचगे। चन्द्राकर दाऊ चैतू ल देखते भार कथे-अरे कइसे चैतू बड़ परेशान दिखत हस, का बात होगे? चैतू सब ला बताथे। पटेल चुनाव बर मुनादी करा दिस अउ फार्म घलो भरवा दिस अब पेशी के दिन सिंग साहब ह कथे किपटेल के लड़का पटेल रही कहिके। ओह धन्नू के फेभर म बात करत हे। अब आपे बताव मैं का करौं? चन्द्राकर दाऊ किहिस-अइसे का। चन्द्राकर दाऊ ह फोन ल उठइस अउ सिंग साहब करा फोन लगइस। दाऊ किहिसे-कइसे सिंग साहब बेलौदी म पटेल चुनाव होगे का? सिंग साहब हड़बड़ागे। सिंग साहब किहिस-चुनाव तो नही हुआ है दाऊ जी, फिर..। दाऊ जी किहिस-ओ मैं फिर-विर नइ जानव। तेंहा ए बता तोला दुर्ग म रहना किनही। सिंग साहब हड़बड़ा के किहिस-रहना है दाऊ जी। दाऊ जी किहिस-रहना हे त ए बता तैं बेलौदी म जा के पटेल चुनाव कब कराबे? सिंग साहब किहिस-आठ दिन बाद बीस तारीख को गाँव जाकर करवाऊंगा दाऊ जी। दाऊ जी किहिस-सुनो सिंग साहब चैतू मोर आदमी आय एकर खियाल रखबे। सिंग साहब किहिस-जी दाऊ जी। दाऊ जी ह चैतू ल बता दिस कि बीस तारीख के सिंग साहब ह बेलौदी चुनाव कराय बर आही। तैंह अपन तैयारी कर ले। सिंग साहब ह कोनो बदमाशी करही ते बताबे। चैतू ह अपन संगवारी मन संग घर आ गे। ओती सिंग साहब ह मने-मन गुने बर धर लिस-मैंह तो चैतू ल निच्चट गे गुजरे समझत रेहेंव फेर ओह तो बिक्कट पहुंच वाले निकलगे।

अब चैतू अउ धन्नू अपन-अपन बर म माहोल बनाना सुरू कर दिन। पटेल चुनाव के सेती चैतू ह आठ दिन बर एक झिन बनिहार ल डीजल इंजन चलाए बर भेज दिस। वइसे भी अभी चैतू गांव म हीरो बनगे रिहिसे। सब झिन काहै-ए दरी चैतू ल पटेल बनाबोन कहिके। धन्नू जावै त ओला हव कहिके भुलवार देवत रिहिन हे। अब बीस तारीख के सिंग साहब ह एक झिन पुलिस धर के पटेल चुनाव कराय बर बेलौदी पहुंचिस। गांव भर के मनखे मन पीपर पेड़ के खाल्हे म सकलाय रिहिन। कोतवाल ह साहब के बइठे बर खटिया के व्यवस्था करे रिहिस हे। कोतवाल घलो अपन सरकारी वर्दी म रिहिस हे। अब सिंग साहब ह किहिस कि चैतू ल कोन कोन ह पटेल बनाना चाहत हव उमन हाथ उचावव। लगभग सब झिन हाथ उंचा दिन। बांचे खोंचे मन डर के मारे उंचा दिन। अब सब डहार ले नारा शुरू होगे-गांव के पटेल कइसन हो? बाकी मन चिल्लावन लागे-चैतू भइया जइसन हो। धन्नू ह चैतू ल बधाई दिस अउ सिंग साहब ह मने-मन सोचत रिहिस प्राण बांचगे कहिके। घर म आके सिंग साहब ह दाऊ जी के घर रिपोर्ट दे बर गिस। दाऊ जी आपके काम होगे बधाई हो। बेलौदी म चैतू ह पटेल निर्वाचित होगे हे। दाऊ जी किहिस-काहत भर हस ते लिखित आदेश घलो दे हस। सिंग साहब ह प्रमाण पत्र के एक कापी ल दाऊ जी ल देखा दिस। सिंग साहब ल दाऊ जी ह चाहा पानी पिया के बिदा करिस। बिहान दिन चैतू ह साग भाजी, पपीता अउ मिठई धर के चन्द्राकर दाऊ के असीस ले बर पहुंचिस। चन्द्राकर दाऊ ह खुश हो के असीस दिस अउ किहिस तोर म सियानी के गुन हे। अब निषाद समाज ल संगठित करे के शुरूआत कर। तब समाज ह आघू बढ़ही। चैतू ह अपन काम बूता के संगे संग समाज ल संगठित करे के शुरूआत करिस। चैतू के समाज म सक्रियता ल देख के समाज वाले मन ओला दुर्ग जिला निषाद समाज के अध्यक्ष बना दिन। अब तो गांव के संगे-संग समाज के जिम्मेदारी घलो आगे। 


बीस


अब तो चैतू के हौसला बुलंद होगे रिहिसे। हारे बर कभू जानबे नइ करिस। बड़े-बड़े आफद अइस फेर हिम्मत नइ हारिस। फल के तो कभू आशा करबे नइ करिस। बस करम के उपर भरोसा करिस। बाकि भगवान उपर छोड़ दिस। चैतू आम लोगन ले एकर सेती अलग रिहिस कि ओकर सोच ह नवा रिहिस। ओकर सोच ह शिक्षा के विकास के उपर रिहिस। ओकर सोच ह समय के साथ रिहिस। तभे तो वोह डीजल इंजन ले के गांव-गांव किराया म पानी पलोए बर जावै। दिन-रात मेहनत करै। जिहां पानी पलोवय उहें वोह डेरा डार दे। रात बिकाल के उहें सुते। उहें रांधे, उहें राहे। आठ रूपिया घंटा पानी पलोवय। दुर्ग ले सइकिल म टीपा बांध के डीजल डोहारय। कभू-कभू बनिहार लगा लेवत रिहिस। एक दिन झेंझरी गाँव म पानी पलो के बइला गाड़ी म डीजल मशीन ल महमरा लेगत रिहिस तभे गाड़ी पलट गे। ले दे के चैतू बाचे रिहिस। महमरा गाँव के कछार भुइयाँ म पानी पलोए बर गिस। धान ह कछार म बिक्कट घपटे रिहिसे। चैतू कछार म उपजे धान ल देख के दंग रहिगे। ओकर दिमाक दिन-रात सोचत राहै कि कछार भुइयाँ म घलो सोना उपजाये जा सकत हे। फेर करे ते करे का जाय।

अब चैतू ह घर म सियानी करना शुरू करिस। अपन ददा के नाम के भेंडसर खार के दु एकड़ अउ बेलौदी खार के पांच एकड़ जमीन ल बेच के मालूद खार के कछार ल सात सौ रूपिया एकड़ म बिसावत गिस। चैतू के एक सुर्री सियानी ल देख के पंचू ह खिसिया के रजिस्ट्री के दिन दसखत करे भर बर दुर्ग चले जावत रिहिसे। फेर पंचू ह मने-मन गुने। कोन जनी टूरा ह काकर बुध म आ गे हे ते हम्मन ल सड़क म लानही तइसे लागत हे। गांव के मनखे मन काहै-जिहां दुबी नइ जागे तेला चैतू ह बिसावत हे। मालूद वाले मन हांसत-हांसत अपन दस-बारा एकड़ कछार ल चैतू करा बेंच डरिन। चैतू अब एक चक बना डरिस। मालूद वाले मन काहै-अइसे लागथे चैतू के चेत ह हरा गेहे। ओती बैसाखु ह पढ़ई म अव्वल आवत गिस। बैसाखु के पढ़ई ले चैतू के हिम्मत बाढ़े अउ ओकर थकासी मिटा जय। जेठू घलो पांचवी पास हो के मिडिल स्कूल पढ़े बर नगपूरा गिस। बैसाखु घलो मिडिल स्कूल नगपूरा म पास करके हाईस्कूल नेशनल स्कूल दुर्ग म पढ़े के बाद कॉलेज के पढ़ई बर रायपुर गे रिहिसे। जेठू घलो अब पढ़ई म धियान देना शुरू करिस। पढ़े जादा फेर नंबर कम आवै। तभो ले ओतेक गदहा नइ रिहिसे। मध्यम स्तर के विद्यार्थी रिहिस। हां अतका जरूर रिहिसे साफ-सफाई बर ननपन ले धियान देवै। कभू ओह बिना प्रेस करे कपड़ा नइ पहिरै। पेंदियही लोटा म कोइला डार के पेंट शर्ट ल आयरन कर के चिकना के पहिरे। अपन शरीर के देख-रेख खुदे करै। जेठू बिलकुल अप टू डेट राहै। नहाए के बाद गोड़ हाथ म तेल लगातिस ताहन चेहरा ल आइना म देखतिस कंघी नइ रहितिस ते अपन दुनो हाथ ले चंूदी ल पटिया लेवत रिहिस हे। 

अब तो दुरदेसी घलो स्कूल जाय के लइक होगे। दिनो-दिन चैतू के उपर जवाबदारी बाढ़त गिस। काबर कि जउन सपना अपन भाई मन बर देखे रिहिस। अब अपन भाई मन के संगे-संग अपन बेटा बर देखे बर धरिस जइसे भी हो जय चाहे बनी-भूति करे बर पर जय चाहे खेत खार बेचा जय फेर इंकर पढ़ई ल रोकना नइ हे। 

जउन तपस्या चैतू करत रिहिस ओह गोमती के बिना सफल नइ हो सकतिस। अब तो घरम कमइया कम अउ खवइया बाढ़त गिस। एती कर्जा बाढ़त गिस। गांव वाले मन धान भर बोवै फेर चैतू ह कछार म गहंू घलो बोवै। काबर कि चैतू करा सिंचाई के साधन रिहिसे। गोमती आधा सीसी के हालत अमारी भाजी बेचे बर दुर्ग जावै। घर के तेल-हरदी ल कम करके अपन देवर मन ल पढ़ाए बर उंकर फीस बर पइसा सकेलय। जे दिन घर म तेल नइ राहे ओ दिन गोमती ह डबका साग रांध लेवत रिहिसे। चैतू कभू नइ किहिस के दार नइहे ते साग नइहे। इंहा तक लाल मिरचा ल भूंज के गड़ा नमक संग गुड़ के पेट भर बासी खा लेवत रिहिसे। 

ए साल तो कछार म हकन के गहंू बोए रिहिस हे। गहंू जब कछार म लहलइस ते पूरा गांव देखते रहिगे। मालूद वाले मन पछताए बर धर लिन फोकट कछार ल बेचेन कहिके। एसो तो पंचू, सवाना, चैतू अउ गोमती मने-मन खुश राहै। चलो भगवान ह मेहनत के फल दिस हे। एसो लांघन भूखन नइ मरन। आधा म कर्जा छुटबोन। ठोर बहुत ल बेच के बैसाखु अउ जेठू के पढ़ई म लगाबोन अउ बांचही एक-दु बोरा तेला साल भर पातर रोटी खाबोन। फेर विधि के रचना ल कोन जान सकथे गहंू उपर दुर्ग वाले सेठ के नजर लगगे रिहिस। चैतू ह तो पहिली ले सोच डरे रिहिस कि गहंू ले कर्जा तो नइ छूटाय फेर ब्याज ल तो हल्का करे जा सकत हे। चैतू ह सेठ ल खभर करिस सेठ जी मेटाडोर भेज देबे। बीस बोरा ल लेग जबे। बाकि हिसाब किताब होवत रही। फेर वाह रे सेठ माथ म जतके चंदन लगाय राहय ओतके छल कपट हिरदे म भराय रिहिसे। ओकर हिरदे म दया नाम के चीज नइ रिहिसे। मेटाडोर तो भेजिस फेर बीस खाड़ी बर नही बल्कि सबो गहंू ल जोर के लेगे। अब बांचिस ते सिरिफ चैतू, गोमती, पंचू अउ सवाना के आंसू। तभो ले चैतू आंसू ल बाहिर नइ आवन दिस। भीतरे-भीतर गटक लिस। जानत रिहिस कि मैंह कहंू टूटहँू ते पूरा परिवार टूट जही। अब तो थकासी मेटाए बर पाव भर दारू पीए बर पइसा घलो नइ रिहिस। चैतू अपन परिवार ल समझइस कि तुम्मन ल कोनो किसम के फिकर करे के जरूरत नइहे। महमरा म पानी पलोए हवं ते पइसा आज मिलइया हे। हमर खरचा अराम से चल जही। फोकटे-फोकट घ