Friday 5 July 2024

स्वच्छ भारत अभियान

 स्वच्छ भारत अभियान 

                    गाँव ला स्वच्छ बनाये के संकल्प ले चुनई जीत गे रहय । फेर गाँव ला स्वच्छ कइसे बनाना हे तेकर , जादा जनाकारी नइ रहय बपरी ल । जे स्वच्छता के बात सोंच के , चुनई जीते रहय , तेमा अऊ शासन के चलत स्वच्छता अभियान म , बड़ फरक दिखय । बहुत दिन ले बांचे के कोशिस करिस , फेर छेरी के दई कब तक खैर मनाही , लपेटा म आगे अऊ वहू संघरगे शासन के अभियान म । अपन गाँव ल स्वच्छ बनाये बर , घरो घर , सरकारी कोलाबारी बना डरिस । एके रसदा म , केऊ खेप , नाली , सड़क अऊ कचरा फेंके बर टांकी ...। गाँव म हाँका परगे के , कनहो मनखे ला , गाँव के खेत खार तरिया नदिया म , दिशा मैदान बर नइ जाना हे , जे जाही , तेकर ले , डांड़ बोड़ी वसूले जाही । कागज म , गाँव के भौतिक कचरा के , अधकचरा नियंत्रण होगे फेर , एक कोती गाँव उहीच करा के उहीच कर , अऊ दूसर कोती , मनखे के मन म सकलाये कचरा , शौचालय के संखिया ले जादा बाढ़हे बर धर लिस ।  

                    एक दिन के बात आय , एक ठिन तिहार म , उही गाँव के भगवान ल , अबड़ अकन भोग लगिस । भगवान घला कभू खाये निये तइसे , उनिस न गुनिस , पेट के फूटत ले खा डरिस । रथियाकुन पेट पदोये लागिस । भगवान सोंचिस मंदिर भितरी म करहूँ , त पुजेरी सोंचही भगवान घला मंदिरेच म .......। चुपचाप लोटा धरिस अऊ निकलगे भाँठा ..... । जइसे बइठे बर धरिस , कोटवार के सीटी के अवाज सुनई दिस । भगवान सोंचिस – कोटवार हा कहूँ मोरे कोती आगे अऊ चिन डरिस त बड़ फजित्ता हो जही । धकर लकर हुलिया बदलिस तब तक , कोटवार पहुँचगे अऊ केहे लागिस – तैं नइ जानस जी , हमर गाँव हा ... ओ डी एफ ... घोषित हे , इहाँ खुल्ला म शौच मना हे । भगवान पूछिस ‌- कती जगा बईठँव , तिहीं बता ? कोटवार खिसियावत किथे – तोर घर शौचालय निये तेमा , भाँठा पहुँच गेस गंदगी बगराये बर ।  भगवान किथे – मोला तो पूरा गाँवेंच हा शौचालय दिखत हे अऊ अतेक गंदा के , बइठना मुश्किल हे । कोटवार अकबकागे , सोंचत रहय .. कइसे गोठियाथे बिया हा ... । 

                    भगवान फोर के बतइस - मंदिर म धरम के ठेकेदार मन , कोंटा कोंटा तक म अपन सोंच के शौच म ... दुर्गति कर देहें । कोटवार किथे – मंदिर मा रहिथस त , पुजारी अस का जी ? तोर घर म तो  शौचालय हाबे , उहें नइ बइठथे गा .... । भगवान किथे - मोर तो कतको अकन घर हे बाबू , जेकर गिनती निये । मंदिर म मोर नाव ले अपन अपन रोटी सेंक के , मोर रेहे के जगा म शौच कर देथें । मस्जिद म रहिथँव त , अलगाववाद अऊ कट्टरवाद के पीप ला , जतर कतर शौच कस बगरा देथे । गिरिजाघर म खुसर जथँव त , वहू मन , लबारी के प्रचार प्रसार करत ...... पूरा खोली म , एक ला दूसर ले लड़ाये के बैचारिक कचरा ल घुरवा कस , बगरावत रहिथे । 

                    थोकिन सांस लेवत फेर केहे लागिस ‌‌‌- आम जनता के घर के , सरकारी शौचालय के तो बाते निराला हे । बनते बनत देखथँव , ओकर हरेक ईंटा म मिस्त्री , ठेकेदार अऊ इंजीनियर के , शौच के निशान पहिली ले मौजूद हे । शौचालय बनतेच बनत , इँकर भ्रस्टाचार के गंदगी ले निकले बदबू म , नाक दे नइ जाय । कोटवार किथे – तोर पारा के पंच ला नइ बताते जी ..... । भगवान किथे - उहू ला बतायेंव , थोरेच दिन म एक ठिन ओकरो नाव के , बइमानी के शौच लगे ईंटा चढ़गे । सरपंच तो अऊ नहाकगे रहय , ओहा जगा जगा के शौचालय म धोखाधड़ी के कांड़ लगावत किंजरत रहय । अधिकारी मन करा का शिकायत करतेंव - ओमन कपाट बर , लबारी के फ्रेम तैयार करत रहय , जेमा सरहा मइलहा लालच के पेनल , वहू अतका भोंगरा के ........ बिगन झाँके जना जाये के , कती मनखे भीतरि म खुसरे हे । बिधायक के घर म , फरेब के पलस्तर लगाये के , योजना बनत देखेंव । दिल्ली तक पहुँच गेंव , उहां येकर संरक्षण बर , मौकापरस्ती के छड़ अऊ विस्वासघात के सीमेंट म , फकत आँकड़ा के छत , बनत रहय । उहू छत के हाल तो झिन पूछ बइहा ....... , अतका टोंड़का ........ अऊ हरेक टोंड़का ले , देश ला बर्बाद करइया , किरा बिलबिलावत .... बदबूदार सोंच , बूंद बूंद करके टपकत , गंदगी बगरावत रहय । अभू तिहीं बता कोटवार , कति जगा जाके गोहनावँव । कति मनखे , मोर बर , स्वच्छ शौचालय बना सकत हे ? मोर देस म स्वच्छ भारत के कल्पना कइसे अकार लिही ? 

                      कोटवार किथे - जब अतेक ला जानथस , त , तिहीं नइ बइठ जतेस दिल्ली म । कोन गंदा बगराये के हिम्मत करतिस । भगवान जवाब देवत किहिस – मय भगवान अँव बेटा । मय सरग म शासन कर सकत हँव फेर , तोर भारत म शासन , मोर बर मुश्किल का ...... असंभव हे । कोटवार लंबा सांस भरत किथे - का करबे भगवान – जेला अच्छा जानके दिल्ली म बईठारथन तेमन ...... उहाँ बइठते साठ , कोन जनी काये खाथे .. , का पचथे ....... का नइ पचय ......., संसद भितरी म , गंदगी बगराना शुरू कर देथे , इही गंदगी हा , जम्मो देश म , धिरलगहा , एती ओती , जेती तेती , जतर कतर , बगरके देश ला जहरीला बना देथे । जे मनखे संसद म खुसर नइ सके तिही मन , तोरे कस लोटा धरके , गंदगी करे के जगा अऊ मौका तलाशत किंजरत रहिथे .......। 

                     कलेचुप लोटा धरके भगवान हा मंदिर म खुसरिस ओकर बाद से .. कभू निकले के हिम्मत अऊ इच्छा दुनों नइ करिस । 

    हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

हाथा दे के परम्परा

 : लेख 

      हाथा दे के परम्परा

      हाथा दे के परम्परा बड़ जुन्ना हे।ये परम्परा छत्तीसगढ़ के संगे संग पूरा देश में हवय।भारतीय संस्कृति में हाथा ल बड़ सुभ माने गे हे।हाथा ल हिंदी म पंचसूलक कहे जाथे। हाथा दुनों खाली हाथ म कुमकुम या हरदी ल एक ठिंन थारी म घोर के हाथ म सान के घर के दीवार म छापे जाथे। हमर छत्तीसगढ़ म चौऊर पिसान या गहूँ पिसान ल पानी म घोर के ओमा हरदी या बंदन मिलाके हाथा दे जाथे।

            नवा घर के गृहप्रवेश के पूजा के बेरा म घर के मुख्य दरवाजा म हाथा दे जाथे।गृहप्रवेश के पूजा हाथा बगैर पूरा नी माने जाये। कथा-पूजा ,तीज-तिहार,जन्म संस्कार ,बर बिहाव म हाथा दे के परम्परा हे। नवा बहुरिया के घर म गृहप्रवेश होथे त नवा बहुरिया ह घर के मुख्य दरवाजा म हाथा देथे। हाथा ह हिंदू धर्म म बड़ सुभ अउ समृद्धि कारक माने गे हे। हाथा या पँचसूलक के साथ म स्वास्तिक बनाये जाथे। हाथा के छापा बनाये ले घर म सुख शांति रहिथे। घर के लोगन मन ल हर काम-काज म सफलता मिलथे।घर म कलह-क्लेश के नाश होथे। घर म बुरी आत्मा, भूत प्रेत के नजर नी लगे। हाथा ल लछमी माने जाथे।हाथा दे ले घर म साक्षत लछमी माँ बिराजमान होथे। घर म अन्न -धन के कोनो कमी नी होवे ।अईसे माने जाथे।

          हाथा के परम्परा ह बड़ प्राचीन हे। जुन्ना बेरा म जब कैमरा अउ फोटू नी रहीस तब परदेस जवईया मन ह अपन परिवार वाला के याद बर ओखर हाथा ल कागज म छाप के ले गे अउ ओ हाथा ल देख के  खुस होवे। रवींद्र नाथ टैगोर के कहिनी काबुलीवाला में एखर जिक्र हे।

           पूजा-कथा या तीज तिहार ,बर बिहाव म हाथा सुहागिन या कुंवारी कन्या  मन देथे। हाथा देवईया सुहागिन या कुंवारी कन्या मन ल हाथा दे के बदला म कुछु पईसा, कपड़ा या अन्न धन दे जाथे। हाथा घर के मुख्य दरवाजा, धान के कोठी, तिजोरी, पूजा घर, अउ मंदिर म दे जाथे। कई जगह म गोबर के हाथा दे जाथे।अईसे मान्यता हे कि गोबर के हाथा दे ले बुरी आत्मा और भूत प्रेत के नजर नई लगे। हाथा देवई हमर संस्कृति के परिचायक हे। जेला नवा पीढ़ी भुलात जाथे।

                     डॉ. शैल चन्द्रा

                    रावण भाठा,नगरी

                    जिला-धमतरी

                   छत्तीसगढ़

आदरणीय सम्पादक महोदय,

                                  सादर नमस्कार!

                  उक्त लेख मौलिक अप्रकाशित है।

                      डॉ. शैल चन्द्रा

छत्तीसगढ़ी कहिनी* *सबला बड़खा धरम*

 -



             *छत्तीसगढ़ी कहिनी*



             *सबला बड़खा धरम*

            ---------------------------


                                     


          महाविद्यालय के सभाकक्ष मा सबो पढ़ईया  लईका मन ठुला गय रहिन। आज युवा उत्सव के तीसर दिन रहिस। मंच म स्वामी विवेकानंद के आदम कद तेल चित्र  हर  माढ़े रहिस । फुल - पान,अगरबत्ती के बाद  म ये  जगहा हर  बहुत नीक लागत हो रहीस । 


        आज के विषय  रहिस,  'मोर धरम:दू पद म ' ।एक प्रकार ले  एहर विवेकानंद के विश्व धर्म सम्मेलन  के सुरता म  एकठन छोटकुन खेलवारी घलव रहिस ।   मंच संचालक पलीहा हर  थोरकुन म अपन बात रखत बारी बारी ले  भाग लेवइया मन ल बलाय के शुरू  कर दिस-


        "मोर नॉव जुनैद आय।इस्लाम मोर धरम ये।अउ मोला अपन मुसलमान होय म बड़ा फख्र हे।इस्लाम ल अगर एक शब्द म आप कहना चाहो तब वो शब्द हर ये -ईमान। अगर हर मनखे ईमान ल साध लेय तब सब सधा जाही।"


          कतेक न कतेक अउ कतका बेर ल ताली हर बजिस।


"मैं पीटर,  पहिली मोर नाव पीतर लाल रहिस।बपतिस्मा होइस अउ मैं पीटर बन गय ।मैं अब ईसाई अंव ।ईसाई धरम ल एक शब्द म कहबे तब वोहर 'प्रेम' ये।सच्चा  ईसाई  करा प्रेम के छाण अउ आन कछु नइ रहय। वोकर कोई बैरी नइ रहय।वोहर नफरत जानबे नइ करे। प्रेम अउ प्रेम ...सब बर प्रेम एइच हर सच्चा ईसाइयत आय ।"


" मैं श्याम सुंदर ..आप सब झन ल जोहर हे।मैं हिन्दू अंव ।हिन्दू धरम ल एक पद म समझे बर हे तब  'सत' आय।   अउ सत्याचरण  का ये।

।  मनसा वाचा कर्मणा ऐक्य, मन म जउन है वोहर कण्ठ ले निकले अउ वोइच्छ ल हाथ  हर करे । अउ ये सब परहित बर रहे-

परहित सरिस धरम नही भाई ।

पर पीड़ा सम नही    अधमाई ।


       हिन्दू धर्म के बस यई हर सरल रूप आय ।ताली फेर बड़ जोर ले बजिस ।


   जसबीर सिख धर्म ल समर्पण, त अजित मांडे बौद्ध धर्म ल मध्यम मार्ग अउ समन्वय बताइस । उदित हर तप ल जैन धर्म के प्रान कहिस।


          सब बोल  डारिन ।


"अरे चन्द्रशेखर ..!तोर कुछु भी धरम नइ ये का।"प्रोफेसर असलम कहिन।


"है सर जी, मोरो धरम हे ।" चन्द्रशेखर कहिस ।


"तंय तो हिन्दू होवस न । तहुँ कुछु बोल ।"


"हिन्दूत्व मोर धरम ....पीछु ये।पहिली मोर धरम राष्ट्र धर्म ये। एहू धरम हर  देश म सदा सदा ले रहे हे ।सिंधु काल,वैदिक काल ल लेके चाणक्य , चन्दबरदाई से लेके माखनलाल चतुर्वेदी तक ए धरम के अस्तुति म कहत नइ थके ये । यई राष्ट्र धर्म हर मोर् धर्म ये। स्वतन्त्रता, समानता , मितानी अउ सब ल न्याय ।एइ हर मोर  राष्ट्र धर्म के चिन्हारी ये ।"चन्द्रशेखर अतका कह के चुप रह गया ।


"अरे एहर तो अइसनहेच धरम ये ,वोहू भी सब बर ।मान ..मान नही त झन मान।"जूही नोनी झर्रस ल अइसन कहिस।


"नही जूही, चन्द्रशेखर हर एकदम  ठीक कहत हे। हिन्दू, सिख ,मुसलिम ये सब धर्म मन तारा जोगनी येँ ।तब  राष्ट्र धर्म हर  चन्द्रमा  आय ..सुरुज आय।राष्ट्र धर्म हर धर्म भर नोहय वोहर परम् धर्म  ये। एकरे कोरा म सब धर्म आके  थिराथें । "प्रोफेसर असलम एक प्रकार ले आज के सभा के उपसंहार करत कहिन ।


     राष्ट्र धर्म ...परम् धर्म..  सबला बड़खा धरम ...उँकर गुरु गम्भीर अवाज एक पइत फेर गुंजिस ।


     विवेकानंद के तैल चित्र के तीर म उदबत्ती मन अभी ले जलतेच रहिन अउ उँकर सुवास ले जगहा हर महमहातेच रहिस ।



*रामनाथ साहू*


-

दुलार ‌‌ चन्द्रहास साहू

 दुलार 

                        ‌‌  चन्द्रहास साहू

                         मो 8120578897


सिरतोन अब्बड़ थकासी लाग गे आज बुता के करत ले। फेर बुता तो सिराबेच नइ करे।....अउ एक बुता सिरा जाथे तब आने बुता मुहूॅं फार के ठाड़े रहिथे। बेरा पंगपंगाती ले उठे हावंव अउ बिन अतरे सरलग बुता करत हॅंव तभो ले एको बुता नइ सिराये। कनिहा मा पीरा भरगे । माथ धमके लागिस। आज तो चहा घला नइ पीये हावंव। टिक.. टिक...करत दीवाल घड़ी ला देखेंव। नौ बजके पचपन मिनट, दस बजत हाबे। अब तो चहा के तलब अउ बाढ़गे। फेर बिन दूध वाला ....? इही तो दुख आवय बहिनी !  घरो घर कुकुर पोस डारे हाबे तब कहाॅं ले गाय के दूध मिलही ? 

ननपन मा तो पारा-परोस मा बिन मांगे दूध मही मिल जावय। इही बहाना राम भजन अउ हाल-चाल के जानबा घला हो जावय। खाॅंसी-खोखड़ी होवय वोतकी मा गाॅंव के कोरी अकन हितु-पिरितु मन पुछ डारे फेर अब तो एक दूसर के जानबा नइ होवय। भलुक सरी दुनिया हाथ मा धरे मोबाइल मा समागे हाबे फेर परोसी के सुध नइ लेवय। मरके अईठ जाथे, सर जाथे अउ‌ बस्साये लागथे तब जानबा होथे पारा-परोस के मन ला। अइसना तो बदलत हाबे हमर देश अउ समाज हा। हे भगवान ! अउ कतका बदलही हमर छत्तीसगढ़ हा...? मानवता अउ संवेदना हा सिरा जाही का ये दुनिया ले  ? जी घुरघुरासी लागिस जम्मो ला गुणत-गुणत। हाॅल के सोफा मा बइठ गेंव अब।

"काकी काहंचो नइ मिलिस दूध हा।''

दूध बर पठोये रेहेंव तौन लइका लहुट के बताइस।

"मेंहा तो जानत रेहेंव बाबू ! वोकरे सेती आगू ले चहा चढ़ा डारे रेहेंव गा !''

अब लइका ला मेहनताना देये लागेंव। मया के मेहनताना। देवर के लइका आवय आज पढ़े ला नइ गेये हाबे। वोकर स्कुल के मास्टर मन वेतन बढ़ाओ कहिके हड़ताल मा हाबे। तोस अउ बिस्कुट ला देयेंव अउ इंडक्शन कुकर ले चहा उतार के दू कप मा ढ़ारेंव। मोर कप मा लिम्बु निचोड़ेंव अउ पीये लागेंव चहा ला। ....अउ दू घूंट चहा के चुस्की लेयेंव अउ अइसे लागिस जइसे  मूड़ पीरा हा माढ़गे। अंग-अंग मा नवा ऊर्जा के संचार समागे। मने-मन अंगरेज मन ला धन्यवाद दे डारेंव। भलुक अब्बड़ अत्याचारी करे हव रे परलोकिया हो फेर चहा ला हमर देश मा लान के बने करे हव। चहा के आखिरी घूंट हा उरकिस अउ उदुप ले नजर हा बाथरुम कोती गिस। गंदला कपड़ा के पहार परे रिहिस। अब तो फेर माथ पीरा उमड़गे । मोर, मोर लइका के अउ पटवारी साहब माने मोर पति परमेश्वर के कपड़ा-लत्ता। ...बनियान अउ चड्डी ? सिरतोन धरती फाट जातिस अउ समा जातेंव अइसे लागिस। ...फेर कहाॅं ले धरती फाटही ? महतारी हा बेटी के दुख ला नइ देख सकिस तब सीता बर धरती हा फाटगे...अउ मोर दाई हा मोर दुख ला नइ देख सकिस तब मोर बर वाशिंग मशीन बिसा के पठोये हाबे।.... रहा ले ले वो !  तब बुता करहूं। सिरतोन साहब ला अब्बड़ बरजेंव। भलुक अपन कुर्ता-पेंट ला झन कांच फेर चड्डी-बनियान ला धो देये करे कर जी अइसे फेर वो तो बड़का साहब आवय अउ मेंहा ..? तभो ले अब्बड़ ठोसरा मारथे। घर मा रही के का करथस ?  चार झन के जेवन बनाथस।  दू कुरिया ला झाड़ू-पोछा करथस।..बस ताहन दिन भर सुतथस। टीवी देखथस येकर ले जादा का बुता करथस ? सिरतोन  दुनिया के जम्मो नारी के जिनगी हा इही यक्ष प्रश्न मा अरहजगे हाबे तब मेंहा कइसे बांच सकहूं ?

चार झन के जेवन, दू कुरिया के जतन येकर ले जादा का बुता  ?

जम्मो ला गुणत-गुणत अब कनिहा अउ माथ मा  बाम लगा के दीवान मा ढ़लंग के कम्मर ला सोझियायेंव। झटकुन आँखी लटके लागिस। रातकुन बने ढंग के नींद नइ‌ परे  रिहिस। लइका के यूनिट टेस्ट रिहिस । बिहनिया ले स्कूल पठोये के संसो अउ रिविजन करवाये के जिम्मेदारी। सिरतोन लइका मन के भलुक यूनिट टेस्ट होथे फेर महतारी बर तो बोर्ड के वार्षिक परीक्षा हो जाथे। काॅपी कहाॅं हे मम्मी ? किताब नइ मिलत हे, तब चेप्टर के गोठ। ...अउ ट्यूशन वाली मैडम के नखरा। हाय ...! जम्मो ला मैनेज करना हे तभो ले गोसइया के ठोसरा। घर मा रही के का बुता करथस ? जइसे घर के देख-रेख हा कोनो बुता नो हरे।

खट्...खट् मोहाटी बाजिस अउ कपाट ला खोलेंव। लइका के पीठ  मा लदाये क्विंटल भर के बेग ला उतारेंव। अंग्रेजी मीडियम के स्कूल आवय ना, आनी-बानी के किताब-कॉपी के बोझा ला बोहो के जाये ला परथे उप्पर ले लंच बॉक्स अउ पानी बाॅटल....! लइका छटाक भर अउ बस्ता किलो भर। भाग ले सातवी पढ़हइया नोनी आवय। छोटका क्लास मा अतका तब बड़का क्लास मा अउ कतका बोझा रही ते ?

अब लइका हा सोफा मा बइठिस अउ मेंहा धकर-लकर जूता-मोजा ला हेरे लागेंव। अब लइका के नखरा शुरु होगे। बेटी यूनिफॉर्म गंदला होगे हाबे वो ! हेर दे अउ गोड़-हाथ ला धो तब फुरसुदहा बइठ के जेवन कर ले बेटी ! फेर बेटी हा तो कनघटोर होगे। कोनो गोठ ला नइ सुनत हाबे मोर। 

"आ बेटी ! मेंहा हेर देथो यूनिफॉर्म ला।''

बेटी तो अब रिमोट ला धर के फटफीट-फटफीट चैनल बदलत हाबे। एक कार्टून मनपंसद नइ आवत हाबे आने चैनल चालू करत हाबे। चेचकार के अपन कोती तीरेंव लइका ला अउ सोज्झे बाथरूम मा धकेलेंव तब जाके यूनिफॉर्म ला चेंज करिस टूरी हा। अइसे लागिस जइसे प्रथम विश्व युद्ध जीत गेंव मेंहा अउ अब द्वितीय विश्व युद्ध जीते के उदिम करत हॅंव। 

डायनिंग टेबल मा बइठारेंव अउ खाना ला परोसेंव - कढ़ी भात । लइका तो देखते साठ जच्छार होगे।

"ये का साग आवय मम्मी ?''

लइका तमतमावत किहिस।

"कढ़ी साग तो आवय बेटी ! मही नइ मिलिस तब आमा‌ खोटली डार के बनाये हावंव।''

लइका ला समझाये के उदिम करेंव फेर लइका तो अब बीख उगले लागिस ।

"मार्बल टाईल्स लगे चकाचक करोड़ों के घर । बड़का टीवी फ्रिज कुलर वेस्टर्न आर्ट ले साजे  एक लाख  पैसठ हजार रुपिया के डायनिंग टेबल अउ ओमा खाना खाना हे तब आमा खोटली के बने कढ़ी भात ....।  हा....हा.... ये गरीबो वाला खाना.....हा ...हा..... बहुत नाइंसाफी है मम्मी ये तो....। सबका हिसाब होगा....बराबर होगा।''

लइका कोनो फिलिम के डायलॉग मारे लागिस।

"चुप रह ! ढ़ोंगयही टूरी !''

लइका ला बरजेंव अउ मनाये लागेंव। 

"का करबे बेटी ! घर मा कुछू साग-भाजी नइ रिहिस तब इही ला बना डारे हंव वो ! सब्बो किसम के खाये ला परथे बेटी ! कभु दुखम तब कभु सुखम । ... रातकुन बनाहूं ना वो ! तोर पसंद के सब्जी- मटर पनीर। गउकिन ईमान से बेटी !''

मेंहा किरिया खा डारेंव।

"मम्मी सुनो !''

तुम्हारी आदत थी वादा तोड़ने की,

मगर, 

इन्ही आदतों ने मेरी आस तोड़ दी।''

टूरी अब शायरी झाड़े लागिस अउ गुनगुनाये लागिस।

वादा तो टूट जाता है....।

अपन हाथ ले दू कौरा खवाये हॅंव अउ जम्मो भात ला छोड़ दिस अब। हाथ धोइस अउ मोबाइल ला कोचके लागिस।

"खा ले बेटी!''

अब्बड़ मनाये हॅंव फेर जम्मो अबिरथा होगे। सिरतोन तो आवय मुही ला मार्केट जाये के बेरा नइ मिलिस। अउ हमर साहब जी ला ? भलुक अपन साहब मन बर दारु बिसाये बर शरम नइ आवय अउ घर के सब्जी-भाजी लेये बर शरम आथे, मार्केट मा झोला धरके रेंगे बर शरम आथे गोसइया ला। साग-भाजी बिसाये मा मान सम्मान सिरा जाही .? नाक कटा जाही....?...अउ दारु बिसाथे तब ?

"मम्मी ! मेंहा पिज्जा लेये बर जावत हॅंव।''

टूरी सायकल निकालत किहिस। अब्बड़ बरजेंव फेर नइ मानिस मोर गोठ ला अउ पैडिल मारत चल दिस साहू पिज्जा सेंटर कोती। पइसा तो धरे हस कि नही....पुछते रही गेंव। ....अउ हमर घर पइसा के का कमती ? जी कलपगे मोर। टूरी के बेवहार ला देखके। बड़की के ये रंग तब अभिन तो चौथी पढ़इया नान्हे टूरा के का होही भगवान ! ...आगू नांगर टेड़गा हाबे तब पाछू नांगर के का ठिकाना ? मेंहा तो सबरदिन मान-सम्मान देये बर सीखोये हॅंव। मीठ बोली बोले बर सीखोये हॅंव फेर लइका के बेवहार..? लइका उप्पर नही भलुक मोर परवरिश उप्पर प्रश्न चिन्ह लगगे। सिरतोन जम्मो कोई भोकवी कहिथे मोला। लइका मन घला। का सिरतोन भोकवी हावंव का ? जौन अपनेच लइका के परवरिश नइ कर सकंव। .. अउ लइका ला जम्मो सीखोना  महतारीच हा सीखोही, ददा के कोनो बुता नइ हे का ?

              जम्मो ला गुणत-गुणत लइका के छोड़ल भात ला खाये हॅंव। आरुग सितागे रिहिस फेर का करंव ? नइ खाये ला भावय तभो ले झन फेंकाये कहिके खाये ला परथे अन्न महतारी ला।  

खट्.... खट्... मोहाटी के कपाट बाजिस।

जाके कपाट ला खोलेंव अउ देखेंव। मोहाटी मा मुचकावत मोटियारी ठाड़े रिहिस। 

"सील-लोड़हा ले ले बहिनी !''

मेंहा आखी ला नटेरत  ससन भर देखेंव मोटियारी ला । मुड़ी मा सील पट्टी बोहे रिहिस। खांध मा चोंगा बोहे रिहिस अउ ओमा नानकुन लइका जुगुर-जुगुर देखत रिहिस। एक झन बारा तेरह बच्छर के नोनी हा अचरा ला धरके जेवनी कोती ठाड़े रिहिस अउ तीसरइया आठ दस बच्छर के टूरा हा डेरी कोती ठाड़े रिहिस।

"बेरा ले कुबेरा आ जाथो। नइ लेवंव सील लोड़हा। अभिन कुछू जरुरत नइ हाबे। मिक्सी-फिक्सी के जबाना मा कोन सील लोड़हा बिसाथे ते ?''

रट्ट ले कहेंव। मोटियारी के चमकत चेहरा बुतागे। 

"बहिनी! भलुक कुछू ला झन बिसा फेर मोर लइका मन ला खाये बर कुछू दे दे। ये डेरउठी ले कभू बिन खाये नइ गेये हावंव। गौटनीन दाई कहाॅं हाबे ? नइ दिखत हाबे। आरो करके बता दे, मनटोरा आये हाबे। सील लोड़हा वाली मनटोरा ला जानथे वोहा।''

मोटियारी मोर सास ला पुछत  किहिस अउ बरपेली घर मा खुसरगे। बइठे बर केहेंव अउ एक लोटा पानी पीये बर देयेंव। पानी ला पीयिस गड़गड़-गड़गड़ अउ आरो करे लागिस। येती वोती ला देखे लागिस। 

"दाई ! का करत हावस वो ?''  

"नइ हाबे दीदी ! दाई हा।''

हार लगे फोटू ला देखावत केहेंव अउ मोटियारी बम्फाड़ के रोये लागिस।

"मोला कभु लांघन नइ पठोये गौटनीन दाई !...अहहा....।''

"सबरदिन मोर पहिरे ओढ़े बर नवा-नवा ओन्हा कपड़ा देयेस वो ! ....अहहा....।''

"मोर लइका मन ला अब्बड़ दुलार करे हस दाई...!....अहहा....। ''

गो....गो.... हिच्च....।

मोटियारी ससन भर रोइस । सिरतोन अतका तो बटवारा लेवइया वोकर बेटी मन घला नइ रोइस अपन दाई के मरनी मा। आज सौंहत दिखत हाबे लहू ले जादा गहरा रिश्ता अनचिन्हार ले घला हो सकथे। मोरो आँखी ले अब अरपा-पैरी उफान मारे लागिस। अपन मन ला समझायेंव अउ चुप होयेंव। जम्मो कोई बर जेवन निकालेंव अब। मोर बेटी के जहुंरिया लइका तो अघागे खावत ले कढ़ी भात ला। एकसरिया, दूसरइया, तीसरइया तीन परोसा खाये लागिस नोनी हा। ...अउ मोटियारी हा घला दूसरइया मांग डारिस।

"आमा खोटली डार के कढ़ी ला अब्बड़ सुघ्घर बनाये हस बहिनी ! अब्बड़ गुरतुर हाबे वो। अघावत ले खाये हॅंव वो ! अब्बड़ दिन मा।''

मोटियारी किहिस। सिरतोन वोकर चेहरा दमकत रिहिस अब। उछाह के उजास आवय येहाॅं। दोनगी के दूधपीया लइका घला ढ़कार मारत हाबे अब । 

"अब तो किचन मा मिक्सी अउ आनी-बानी के जिनिस आगे हे बहिनी ! हमरो धंधा वोकरे सेती मार खा गे हाबे वो ! अब अइसन पथरा के का बुता ? तभो ले मन नइ माढ़े अउ किंजार लेथन गाॅंव -गाॅंव,पारा-पारा। फेर कतका ला किंजरबे वो ?  पहिली तो मोहाटी मा सुस्वागतम लिखाये राहय। कपाट ला ढ़केल के चल देवन। अब तो घरो घर कुकुर पाले हाबे। कुत्ते से सावधान लिखाये रहिथे। डर लागथे काकरो घर जाये-आये बर। हबराहा कुकुर मन गरीब ला देखते साठ भुके लागथे अउ मोटियारी होगे तब तो दू गोड़ के कुकुर घला लार टपकाथे।''

मोटियारी अब्बड़ मरम के गोठ ला किहिस अउ अब्बड़ आसीस दिस।

"तोर कुटूम्ब के मान बढ़े वो !''

"लोग लइका मन दूधे खावय अउ दूधे अचोवव वो !''

"तोर गोड़ मा कांटा झन गढ़े बहिनी!''

"....अउ तोर चुरी अम्मर राहय वो बहिनी!''

अहा......मोटियारी के अतका आशीर्वचन। मन अघागे। सौंहत कोनो भगवान उतरे हाबे अंगना मा अइसे लागत हाबे। 

अब तो मोर लइका घला आगे रिहिस। पिज्जा ला धरके। मोर रिस तरवा मा चढ़गे। 

"बेटी! भात-बासी ला खाये बर केहेंव तब मुहूॅं नइ चलिस। ....अउ पिज्जा नपाके ले आनेस। कहाॅं ले पइसा पायेस तौनो ला बताना उचित नइ समझेस। जौन ला नइ खावंव कहिके छोड़े रेहेस। तौने ला ये लइका अउ सील वाली दीदी हा अघावत ले खाइस। अभिन नानचुन हावस जादा झन उड़ा वो !'' 

"मम्मी ! तेहां घलो तो कभु पिज्जा नइ खाये हावस वो! तोरो मन करत होही ? मोर नानी हा पइसा धराये रिहिस तौने पइसा ले लाने हॅंव वो  पिज्जा ला । .....अउ अकेल्ला खाये के रहितिस तब उही कोती ले खाके नइ आ जातेंव मम्मी।''

".... ले मम्मी खा ले।''

बेटी अब एक प्लेट मे ले आनिस मोर बर पिज्जा ला अउ आने प्लेट मा मोटियारी बर ले आनिस।

"अई, अइसना रहिथे बहिनी ! पिज्जा हा।''

मोटियारी देख के किहिस अउ लइका मन घला ललचावत रिहिस।‌... अब मोटियारी अउ वोकर लइका मन घला पिज्जा खावत हाबे। अउ मोला तो अपन हाथ ले मोर मयारुक बेटी हा खवावत हाबे। 

"....अउ तेहां बेटी ?''

ले मम्मी तेहां ससन भर खा। मेंहा तो खातेच रहिथो। 

नोनी किहिस अउ एक कुटका ला दुलरवा बेटा बर राखिस। वोकर स्कूल के छुट्टी सांझकुन होही। देवर के बेटा घला आ गे रिहिस अब जम्मो कोई बांट के पिज्जा खाये लागेंन । 

"ले बहिनी बइठो। अब, महूं हा  सोज्झे अपन घर जाहूं। तुंहर मया पाके आज माइके सुरता आगे। मोर कोती ले येला राख ले।''

मोटियारी किहिस सील ला देवत। 

"नइ राखव दीदी ! तेहां बेचके दू पइसा कमाबे। मोला अभिन जरुरत नइ हाबे फेर जब जरूरत होही तब तोर करा ले बिसा लुहूं।''

"नही बहिनी ! येला अब अपन घर नइ लेगो मेंहा। तुंहर घर के मोर गौटनीन दाई हा अब्बड़ हियाव करे रिहिस हमर‌। अब्बड़ करजा हाबे मोर उप्पर।

"तभो ले झन दे।''

".....मोर भतीजी के बिहाव बर वोकर फुफू कोती ले ये जोरन आवय मोर कोती ले राख ले। नोनी मन कब बड़े हो जाथे जानबा नइ होवय। अभिन ले बर-बिहाव के जोरन ला करत रहिबे तब एक-एक जिनिस हा वो  बेरा बर पूरा होथे। राख ले बहिनी मोर गरीब के चिन्हारी ला। ..अउ जिनगी के का भरोसा बहिनी ! जीयत रहिबोन कि उड़ा जाबोन ते ..? वोकरे सेती राख ले।''

मोटियारी अब गिलोली करे लागिस । अब तो मना करे के कोनो जगा घला नइ दिखत हाबे। एक नत्ता-गोत्ता अउ जुड़त हाबे। एक मया अउ बाढ़त हाबे।

"ठीक हाबे ....ले आन।''

महूं हा अब वोकर मया के आगू मा हरा गेंव। सील ला झोकेंव अउ अब देवता कुरिया मा लेग गेंव।... अउ अब जतन देयेंव। अब अइसे लागत हाबे जइसे अब मोर नोनी हा बड़े  होगे अउ अब बिहाव के तियारी करत‌‌‌ हाबो। ....अउ सिरतोन दाई-ददा मन तो बेटी के बिहाव के तियारी वोकर जनम धरते साठ शुरु कर देथे। 

कुरिया मा गेयेंव अउ सौ-सौ के दू नोट लानके मोटियारी के दूनो लइका ला धरायेंव।

भलुक अब्बड़ नही किहिस फेर आज नत्ता-गोत्ता जुरियावत हाबे।

"अपन मामी कोती ले देवत पइसा ला मना नइ करे भांची-भांचा हो !... झोंक ले। ...अउ येदे लुगरा मोर ननंद बर...!''

मेंहा केहेंव अउ मोटियारी के खांध मा नवा लुगरा ला डार देंव। मोटियारी अब एक बेरा अउ गोहार पार के रो डारिस। अउ सिरतोन महूं तो रो डारेंव नवा नत्ता-गोत्ता पाये के उछाह मा। खोर के निकलत ले देखेंव मोटियारी अउ लइका मन ला। ...अउ मोर नोनी के उप्पर नजर थिरागे। आमा खोटली के कढ़ी भात खावत रिहिस।

"अब्बड़ सुघ्घर बनाये हावस मम्मी सब्जी ला। मजा आगे अउ ये ईज्जा-पिज्जा मा पेट नइ भरे मम्मी ! पेट भरथे ते तोर हाथ के जेवन मा। मोर हिरोइन मम्मी !''

लइका अब दाई बरोबर दुलार करत महूं ला खाना खवावत हाबे।...एक कौरा.... दू कौरा.....।

...अउ मोर आँखी मा फेर अरपा-पैरी छलछलाये लागिस। सिरतोन नारी के मन कतका कोंवर होथे...?  दू टिपका आँसू बोहाइच जाथे।

------//-------//--------//------


चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

पिन 493773

मो. क्र. 8120578897

Email ID csahu812@gmail.com

   

नेपाल यात्रा

 नेपाल यात्रा

----------------------

विगत दिवस (6 से17 जून 2024) तक भगवान पशुपतिनाथ के अहैतुकी कृपा अउ भागवताचार्य पं०प्रदीप चौबे के प्रेरणा अउ मार्गदर्शन मा छत्तीसगढ़ के 140 झन तीर्थ यात्री मन के जत्था संग मोर सपत्नीक नेपाल देश के तीर्थयात्रा सकुल सम्पन्न होइस।

 6जून के रतिहा 9 बजे दुर्ग नवतनवा एक्सप्रेस के एसी बोगी B6मा यात्रा के उत्साह मा लकर-धकर बइठेन।भाटापारा स्टेशन ले ट्रेन छूटिस तेन हा 7 तारीख के रतिहा 9 बजे गोरखपुर स्टेशन पहुँचिस।उहाँ उतर के यात्रा प्रबंधक हा जिहाँ ठहरे अउ भोजन पानी के व्यवस्था करे रहिस हे तिहाँ विश्राम करेन।गोरखनाथ मंदिर के नजदीक के वो धर्मशाला हा छत्तीसगढ़़िया तीर्थयात्री मन ले कोजबिज कइया करत रहिसे। बिहानभर गोरखनाथ मंदिर के दर्शन अउ अन्य जगा,गीता प्रेस आदि ला घूमे के बाद दोपहर 2बजे काठमांडू बर बस मा सफर शुरु होइस।

   नेपाल देश हा हिमालय के गोद मा बसे हे जेकर सीमा तीन तरफ ले भारत अउ एक तरफ ले तिब्बत(चीन) ले लगे हावय। हमर देश के मन बिहार अउ उत्तर प्रदेश ले जा सकथे।हमन गोरखपुर ले लगे सोनाली बार्डर ला पार करके काठमांडू जिहाँ पशुपतिनाथ के मंदिर हे तेकर दर्शन बर प्रस्थान करेन।

    नेपाल देश जाये बर भारतीय मन ला पासपोर्ट नइ लगय फेर आधार कार्ड अउ सामान मन के चेकिंग जरूर होथे। लगभग 24 घंटा के बस मा सफर (अधिकांश) पहाड़ के उपर पहाड़ी रास्ता) के बाद संझा 4 बजे काठमांडू पहुँचेन।उहाँ के रामनाथ होटल मा ठहरे के व्यवस्था रहिसे। नहाँ धोके आधा किलोमीटर दूरिहा मा स्थित भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन बर चल देयन। भीड़ जादा नइ रहिसे तेकर सेती आधे घंटा मा भगवान पशुपतिनाथ के भव्य दर्शन होगे।यात्रा के पूरा थकावट मिटगे अउ मंदिर परिसर मा अपार शांति के अनुभव होस।अइसे लागिस के जिनगी धन्य होगे। 

     काठमांडू मा पं० प्रदीप चौबे जी के पाँच दिन के भागवत के आयोजन सुबह 9बजे ले दोपहर 12 बजे तक होवय। अब तो बड़े बिहनिया ले रोज पशुपतिनाथ के दर्शन तहाँ ले दिनभर ले लेके रात दू-तीन बजे तक नेपाल के दर्शनीय धार्मिक, प्राकृतिक अउ ऐतिहासिक जगा मन के भ्रमण के सिलसिला चालू होइस।एक दू रात तो दूरी जादा होये के सेती काठमांडू ले बाहिर तको रुके ला परिस।

  काठमांडूच मा पशुपतिनाथ मंदिर के अलवा स्वयंभूनाथ मंदिर,बौद्ध मंदिर,बौद्धस्तूप, पाटन दरबार, विष्णुमंदिर आदि बहुत कस जगा ला देखेन।एकर अलावा काठमांडू ले बाहिर के डोलेश्वर महादेव, मनोकामना देवी मंदिर, जनकपुर आदि के भ्रमण अउ दर्शन करेन।

   नेपाल हा पहाड़, नदिया , गहिर खाई अउ कटकट ले जंगल वाला बहुतेच मनोरम देश आय। माँउटएवरेस्ट सहित अउ सात ठो संसार के ऊँचा चोटी मन इँहें हें,200 ले आगर नदिया हें। 3000--5000 मीटर गहिरा खाई जेला देखे मा कँपकँपासी लागथे।एकदम खराब अउ खतरनाक सड़क जेमा वाहन 20कि०मी०के स्पीड ले जादा नइ चलत होही --इँहे हे।

   एक दू दिन तो खाई मन ला देख के अबड़ेच डर लागिच।सबले जादा डर तो लगभग 5000 मीटर के ऊँच चोटी मा बिराजे मनोकामना देवी के दर्शन बर रोप वे मा जावत-आवत लागिस ओइसनहे माता जानकी के मइके जनकपुर जाये के बेरा खराब पहाड़ी सड़क मा झूलना कस डोलत बस के सफर हा लागिस।

  नेपाल मा हम ला ग्लोबल वार्मिंग के तको अनुभव होइस।काठमांडू मा भारी उमस अउ 30-32 डिग्री तापमान रहिस।इहाँ एक बात के अउ अजरच लागिस के एक जगा (दर्शनीय स्थल) ले दूसर जगा जाये बर लहुट के काठमांडूच आये ला परै।शायद उहाँ सड़क कनेक्टिविटी नइये।

  नेपाल मा गाँव-गौतरी हम ला  नइ दिखिस। जो भी बसाहट हे वो सब सड़क के तीरे-तीर दिखिस।

    नेपाल मा एक अनुभव अउ होइस के उहाँ शराब के नदिया तको बोहावत रहिथे।गली-गली,हर ठेला-दुकान मा शराब बिकथे।

   कुल मिलाके अद्भुत अउ मनोरम देश के हमर यात्रा वापसी नवतनवा होके भारत मा प्रवेश के संग 17 जून के संझा 5 बजे अपन घर हथबंद पहुँच के सकुशल सम्पन्न होगे।

🙏🙏🙏

चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़़

समाज ला सत् अउ अहिंसा के रद्दा दिखईया*-

 *समाज ला सत् अउ अहिंसा के रद्दा दिखईया*- 

                      *सद्गुरु कबीर* 


                           - *वसन्ती वर्मा* 


       कबीरपंथ अउ बड़े-बड़े कतको विद्वान मन के मानना हे के संत कबीर जइसन ग्यानी पुरुस पिछले दू हजार बरस मा ए जगत मा कोनो पैदा नई होय हे। सद्गुरु कबीर साहब के बानी हा मनखे मन के जीवन मा गहरा प्रभाव डाले हे। जिनगी के डोरी मा उनखर विचार ह माला कस गुथाँय हवय। धर्म अउ समाज के जम्मो पक्छ मा उनखर विचार ह-  विवेकपूर्ण समाधान प्रस्तुत करे हे। समाज अउ मनखे, राजा अउ रंक, नगर अउ गाँव, मानव अउ पसु जगत, चेतन अउ जड़, आत्मा अउ परमात्मा सबो के सार बात ला कबीर साहेब हा सुघ्घर अउ सरल ढंग ले बरनन करें हें। एखरे सेथी कबीरपंथ मा संत कबीर ला ‘ *सद्गुरु*’ के दर्जा मिले हवय।

सद्गुरु कबीर साहेब के जनम् सन् 1398 के जेठ पुन्नी के दिन होय रहिस, ते पाय के *जेठ पुन्नी* के दिन ‘ *कबीर जयंती*’ मनाय जाथे। फेर कबीरपंथी मन के मानना हे के कबीर साहब के जनम एखर पन्द्रह दिन पहिली जेठ अमावस के दिन होय रहिस। एही दिन कबीर साहेब हा तरिया के भीतर पुराइन पान के बीच खोखमा फूल के ऊपर प्रगट होय रहिन। ते पाय के कबीर पंथी मन जेठ अमावस के दिन बरसाइत उपास रहि के ‘ *प्रगट दिवस* ’ मनाथें। एखर बाद कबीर साहेब 120 बरस तक ये धरती मा प्रगट रुप मा रहिन।

           सद्गुरु कबीर मांस, मदिरा सेवन, वेस्यावृत्ति, जुआ, चोरी जइसन सामाजिक बुराई ला जड़ से खत्म करे के उपदेस दिन। 


 *माँस भखै मदिरा पिवै, धन वेस्या सों खाय।* 

 *जुआ खेलि चोरी करै, अन्त समूला जाय।।* 


         सद्गुरु कबीर के दृस्टि मा जेन मनुष्य के हिरदे म प्रेम अउ जीव के प्रति करुणा के संचार नि होय ओहा मुरदा समान ए।


 *जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जानु मसान।* 

 *जैसे खाल लुहार के, स्वांस लेत बिनु प्रान।।* 


      सद्गुरु कबीर समाजवादी अउ समतावादी महापुरुष रहिन। उनखर विचार मा जौन व्यक्ति ऊंच-नीच के भेद नि करे वोहा भगवान के समान ए।


 *लोहा, कंचन सम करि जाना, ते मूरत होवय भगवाना।* 


     सद्गुरु कबीर जब ए धरती मा अवतरित होईन ओ समय स्त्री मन अर्धगुलामी के जीवन जीयत रहिन, ओमन के बलात् धर्म परिवर्तन कराए जात रहिस। सद्गुरु कबीर स्त्री मन के गुलामी के विरोध करिन ता उन ला पंडित, मौलवी, सामंत-राजा मन के जबरजस्त विरोध झेलना पडि़स। सद्गुरु कबीर सबो ला ललकार के कहिन।


 *नारी निन्दा मत करो, नारी नर की खान।* 

 *नारी से नर होत है, धु्रव, प्रहलाद समान।।* 


      संत कबीर के मानना रहिस कि समाज मा न जादा गरीब होना चाही न जादा अमीर। उनखर विचार मा जादा संचित धन ला जरुरतमंद ला बांट देना चाही।


 *जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम।* 

 *दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानों काम।।* 


         सद्गुरु कबीर के सबले बड़े ग्यान के बात ऐ रहिस के ओमन गृहस्थ अउ विरक्त दुनों ला मुक्ति के अधिकारी मानिन। कबीरपंथ मा घर परिवार छोड़ के जंगल पहाड़ मा परमात्मा ल खोजे बर नी कहे गे हे, न ही यज्ञ-हवन करे बर, न ही माला जपे बर कहे गे हे। कबीर पंथ मा सहज उपासना पूजा-पाठ के विधान हावय जेला स्त्री-पुुरुष दोनों कर सकत हें। वास्तव म कबीर पंथ ला ‘पारिवारिक धर्म पंथ’ कहे जाय ता कोई बड़े बात नी होय।

संत कबीर के जीवन दरसन के महात्मा गांधी के उपर बहुत प्रभाव पडि़स। संत कबीर अहिंसा अउ सत् के रद्दा मा चले के उपदेस जीवन भर दीन, तव गांधी जी ह सत्य अउ अहिंसा ला स्वराज के लड़ाई मा अपन हथियार बनाईन। कबीर साहब के पालन-पोसन जुलाहा परिवार मा होईस, ते पाय के सूत काते के चरखा हा जीवन भर ओखर साथ रहिस। गांधीजी घलो चरखा ला अपनाईस अउ स्वराज के लड़ाई मा चरखा ला लेके चलिन। वास्तव मा चरखा मा लगातार कर्म करे के मर्म छुपे हे। लइका जवान, बूढ़ा, नारी-पुरुस सबो कोई चरखा मा सूत कात सकत हें दिन मा घलो अउ रात मा घलो। एमे बहुत जादा श्रम के आवश्यकता नि होय, फेर एला सबो कोई लगातार चला सकत हे।

         सद्गुरु कबीर साहब हा छै सौ बरस पहले मनुष्य जाति के उत्थान पर जो उपदेस दे रहिन, ओहा आज घलाव वइसनेच प्रासंगिक हे। मानव समाज हा हमेसा सद्गुरु कबीर के रिणी रही।


 *सत्गुरु हम सू रीझि करि, एक कहा परसंग।* 

 *बरसा बादल प्रेम का, भीग गया सब अंग।।* 


         सद्गुरु कबीर साहेब के जीवन दर्सन अउ समाज सुधार बर ऊँकर उपदेस हर मध्यकाल के भारतीय समाज के ऊपर अतेक जादा प्रभाव पडि़स के उन-ला ज्ञान-दीप लेकर अवतरित आत्म-ज्ञानी संत माने गईस। सद्गुरु कबीर साहेब के अवतरन मध्यकाल मा- अइसे समय मा होइस जब राजा-महाराजा-नवाब-सामंत मन के आपसी लड़ाई के कारण पूरा भारतीय समाज आतंकित रहिस। लूटमार, हत्या, बलात्कार जइसे जघन अपराध ले आम आदमी अपन रक्छा करे में असमर्थ रहिन। तब सद्गुरु कबीर साहेब ह आम आदमी मन में आत्मबल के संचार करके ओला नवा रद्दा दिखाईन। हिन्दु-मुसलमान समुदाय म व्याप्त पाखण्ड, कुरीति, भ्रमपूर्ण आचरन के निंदा के साथ-साथ क्रूरता अउ हिंसा के उपहास करिन अउ ओला रोके प्रयास करिन।


 *ना जाने तेरा साहिब कैसा है।* 

 *मस्जिद भीतर मुल्ला पुकारे, क्या साहिब तेरा बहिरा है?* 

 *चिउंटी के पग नेवर बाजे, सो भी साहब सुनता है।* 

 *पंडित होय के आसन मारें, लंबी माला जपता है।* 

 *अंदर तेरे कपट कतरनी, सो भी साहब लखता है।* 

 *सब सखिया मिलि जेवन बैठी, घर भर करै बड़ाई।* 

 *हिंदुअन की हिंदुवाई देखी, तुरकन की तुरकाई।* 

 *कहै कबीर सुनौ भई साधो कौन राह है जाइ।।* 


       ग्यान-दीप ले के अवतरित संत कबीर ल केवल गुरु नि माने गईस बल्कि उन ला सत् के राह दिखईया अर्थात् सद्गुरु के रुप मा भारतीय समाज ह मान्य करिस। हिंदू अउ मुस्लिम दुनो समाज के रहईया मन कबीर साहेब ल सद्गुरु के रूप मा जानिन, मानिन अउ उन ला ईश्वर के साक्षात् रुप मान के पूजिन। गुरु के बारे म संत कबीर ह कहिन -


 *गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढि़-गढि़ काढ़ै खोट* 

 *अन्तर  हाथ  सहार  दे,  बाहिर  बाहे  चोट।।* 


         अर्थात् गुरु कुम्हार ए अउ सिस्य कुंभ (घड़ा) हे। जइसे कुम्हार कच्चा घड़ा के भीतर एक हाथ ले सहारा दे थे अउ दूसर हाथ ले बाहर से चोट मार-मार के घड़ा ल ओकर आकार देथे अउ साथ-ए-साथ घड़ा बनात जतका भी कंकड़-रोड़ा आदि मट्टी म मिलथे ओला चुन-चुन के फेंक देथे वइसने गुरु ह सिस्य ल सही आकार देथे अउ सही रद्दा दिखाथे।


- वसन्ती वर्मा, बिलासपुर

संत कबीर साहेब

संत कबीर साहेब

 *कबीरपंथ के छत्तीसगढ़ म विस्तार के सारगर्भित संकलन योग्य जानकारी।..... वंशगुरू दयानंद साहेब के संतान नि होय के कारण गुरुमाता कलाप देवी ह गृन्धमुनिनाम साहेब ला दू बरस के उमर म गोद लिन अउ वंशगद्दी परंपरा आघू बढ़िस।* 

     *अइसे माने जाथे कि  यदि आवश्यक होही त गुरु गोसाई के वंशज के कोनो सुयोग्य बालक ला गोद लेके वंश परंपरा ला आघू बढ़ाय जाही अउ गद्दी सौंपे जाही। फेर गृन्धमुनिनाम साहेब ला गोद लेहे के बाद छत्तीसगढ़ के कबीरपंथी समाज अउ अनेक साधू महंत मन विरोध म काबर उतर गिन अउ खरसिया म नया गुरुगद्दी स्थापित करिन जेन हर अभी घलो निहंग परम्परा म आघू बढ़त हे?*

      *आचार्य गृन्धमुनिनाम साहेब ला गोद लेहे के विरोध के मूल कारण ये रहिस कि ओमन गुरु गोसाई परिवार ले संबंधित नि होके ब्राह्मण परिवार के संतान रहिन। विरोध करने वाला मन के कहना रहिस कि चूकिं गृन्धमुनिनाम साहेब गुरु गोसाई परिवार ले संबंधित नि हे त उनकर गोद लेहे म वंश खंडन होवत हे। ये विरोध के स्वर दशकों तक बने रहिस अउ कालांतर म षड़यंत्र के तहत गृन्धमुनिनाम साहेब के प्रथम पुत्र के जहर देके हत्या कर दिये गिस।...... कबीरपंथ के वर्तमान चौदहवें धर्मगुरु आचार्य प्रकाशमुनिनाम साहेब वस्तुतः गृन्धमुनिनाम साहेब के द्वितीय सुपुत्र हैं। जहाँ तक मोर जानकारी हे आचार्य गृन्धमुनिनाम  साहेब जौन ब्राह्मण परिवार ले गोद लिये गे हें वोही परिवार ले संबंधित सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार स्व निरुपमा शर्मा घलो रहिन।* 

       *कालान्तर म पंथ गुरु गृन्धमुनिनाम साहेब कबीर धर्म के उद्भट विद्वान के रूप म देश भर म स्थापित होइन अउ देश भर के कबीरपंथी विद्वान साहित्यकार मन ला एक मंच म लाके कबीर पंथ के प्रचार-प्रसार म अपन जीवन ला समर्पित करिन।* 

     *आचार्य गृन्धमुनिनाम साहेब के विद्वता, समर्पण अउ सार्वभौम मान्यता के कारण विरोध के स्वर स्वतः खत्म होगे। सन् 1991 म आचार्य  गृन्धमुनिनाम साहेब के निधन के बाद वर्तमान आचार्य प्रकाशमुनिनाम साहेब पंथ के 14 वें आचार्य के रूप म गद्दी म बइठिन।* 

       *छत्तीसगढ़ म कबीरपंथ के बारे म कुछ ऐतिहासिक जानकारी जेन ला परिस्थितिवश विस्मृति के गर्भ म ढकेल दिये गे हे- आज वोही जानकारी साझा करे हौं।* 🙏🌹


             - डाॅ विनोद कुमार वर्मा

छत्तीसगढ़ म संत कबीर के प्रभाव

 छत्तीसगढ़ म संत कबीर के प्रभाव 


( 22 जून- संत कबीर जयंती पर विशेष)


  आलेख - ओमप्रकाश साहू "अंकुर  "


हमर देश के संस्कृति अउ सभ्यता ह सदा ले अब्बड़ समृद्ध रिहिस हे. धन -धान्य ले संपन्न भारत ह” सोना के चिड़ियाँ कहलाय. ये सोन रुपी चिरई ल लूटे बर कतको विदेशी मन बेपार करे के बहाना आइस अउ धीेरे ले अपन पइठ जमा के इहां राज करिस. हमर देश ल मुगल मन के आक्रमण ले नंगत नुकसान पहुंचिस. भारत के संस्कृति अउ सभ्यता ल नंगत नुकसान पहुंचाइस. हजारों मंदिर तोड़ दे गिस. समृद्ध सभ्यता ल तोड़ के तहस -नहस कर दे गिस .जनता तरह -तरह के अत्याचार ले कराहे लगिस. अइसन स्थिति होगे कि धर्म- परिवर्तन के नाम म लाश पटागे. डर के मारे लोग मन अपन धर्म ल भूल के दूसरा रद्दा अपनाय लगिस. अइसन बेरा म संत दादू दयाल, संत रविदास, गुरु नानक, संत सुंदर दास अउ, संत रामानंद,संत कबीर जइसे महामानव मन ह अवतरित लिस अउ जनता मन म ज्ञान के बीज बो के अंधियारी ल भगाय के

निक काम करिस.

जब हमर देश म कवि मन राजा मन के वीरता अउ श्रृंगारिकता वर्णन म मगन रिहिन अइसन विकट बेरा म संत कबीर अउ ज्ञान मार्गी के अउ संत,कवि मन अपन विचार ले जनता मन म जागरण फैलाय के काम करिन.

संत कबीर के काल मुगल साम्राज्य के समय के रिहिन हे .ये

समय भारत म राजनैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक अउ धार्मिक सबो क्षेत्र म विपत्ति ह अपन पांव पसार ले रिहिस. अइसन बेरा म हमर संत कवि मन

जनता ल घोर निराशा ल उबारे बर ईश्वर के  निर्गुण भक्ति अउ ज्ञान डहर धियान मोड़े के काम करिस. संत कबीर ह समाज सुधार अउ सामाजिक समरसता के बीज बोइस. वोहा हिंदू अउ मुसलमान दूनों धर्म म समाय दिखावा अउ बुराई मन उपर जमगरहा चोट करिस . दूनों धर्म के ठेकादार मन कइसे जनता ल बरगला के अपन सुवारथ बर काम करय. ये सब उपर संत कबीर ह नंगत के व्यंग्य करिस अउ जनता मन म जागृति फैलाय के सुघ्घर कारज करिस.


संत कबीर अउ धनी धर्मदास


हमर छत्तीसगढ़ म संत कबीर के विचारधारा ल जन जन तक पहुंचाय के महान कारज करइया म धनी धर्मदास के नाँव अव्वल हे. कबीर पंथ के स्थापना करके जनता ल कबीर के बताय सही रद्दा म चले बर जउन काम धनी धर्मदास करिस वोहा इतिहास म दर्ज होगे हे. अइसने महान कारज

गुरु घासी दास बाबा ह करिस. ये दूनों महामानव के छत्तीसगढ़ हमेशा ऋणी रहि.

कबीर पंथ के संस्थापक, छत्तीसगढ़ी के आदि कवि धर्मदास साहब के जनम कबीर साहब के ढाई वर्ष पहिली विक्रम संवत 1452 (ई. सन् 1395 ) म कार्तिक पूर्णिमा के दिन रींवा राज्य के बांधवगढ़ नगर म प्रसिद्ध कसौंधन वैश्य कुल म होय रिहिन. वोकर पिता के नाँव मनमहेश साहू अउ महतारी के नाँव सुधर्मावती रिहिन हे. उंकर बिहाव 28 साल म पथरहट नगर के वैश्य परिवार के बेटी सुलक्षणावती के संग होइस. इही सुलक्षणावती ह आमिन माता के नाँव ले जाने जाथे. धनी धर्मदास के ननपन के नाँव जुड़ावन साहू रीहिन हे. सन 1425 म वोकर पहिली बेटा नारायण दास के जनम होइस. बाद म धनी धर्म दास संत कबीर के संत्संग प्रवचन ले प्रभावित होके अपन धन दौलत ल समाज सुधार अउ कबीर के विचार धारा ल फैलाय म लगा दिस. उही दिन ले संत कबीर ह जुड़ावन साहू ल नवा नाँव दिस – धनी धर्मदास ।


जुड़ावन साहू वइसे तो पहिली ले धनी रिहिन हे. जमीन -जायदाद भरपूर रिहिन हे. बचपन ले सत्यनिष्ठ ,सात्विक, धर्मनिष्ठ, धर्म परायण रिहिन. पहिली वो सगुणोपासक रिहिन. मंदिर बनवाय रिहिन अउ पंडित -पुजारी मन के गजब आदर -सत्कार करय. खूब तिरथ -बरत करय अउ धर्म के काम म अव्वल राहय.

जइसे धनी धर्मदास म बुढ़ापा आइस त तिरथ- बरत बर निकल गे. बारह साल तक देश के सबो तीर्थ स्थल मन के भ्रमण करिस. वि. सम. 1519(सन 1462) म मथुरा नगरी पहुंचिस. उनचे अचानक वोकर भेंट कबीर साहेब से होइस. सद्गुरु कबीर साहेब के

निर्मल वचन मन ल सुनके धर्म

दास के जिनगी म ज्ञान के अंजोर बगर गे. वोला अब लगिस कि अब तक के जिनगी ह बेकार चले गे . वो दुबारा कबीर साहेब के खोज म निकल पड़िस अउ कांशी नगरी म सद्गुरु ले वोकर भेंट होइस. सत्संग करे के बाद धर्म दास साहेब ह सद्गुरु ले अपन जनम भूमि बांधवगढ़ चले के विनती करिस. धर्मदास साहेब के अरजी ल सुनके कबीर साहेब वि. सं. 1520 म बांधवगढ़ पहुंचिस.

अब धर्मदास साहब अउ माता आमिन अपन हवेली म बने धियान देके कबीर साहेब के सत्संग सुने लगिस. सद्गुरु कबीर साहेब जइसे आत्मज्ञानी (ब्रह्मज्ञानी ) ल पा के धर्मदास धन्य होगे. अपन प्रथम गुरु बिट्ठलेश्वर रुपदास जी ले आज्ञा लेके बांधवगढ़ म विशाल संत समागम के आयोजन करिस अउ कबीर साहेब के शिष्य बन गे. आमिन माता ह घलो ये पावन मार्ग म चल पड़िस.

सद्गुरु कबीर साहब के शिष्य बने के बाद धर्म दास अउ आमिन माता जनसमुदाय के संग अपन हवेली बांधवगढ़ म रहिके लगातार सत्संग प्रवचन सुने लगिस.


कबीर साहेब के विचार धारा के प्रचार प्रसार


सद्गगुरु कबीर साहेब के कृपा ले

बांधवगढ़ म उंकर हवेली सद्धर्म प्रचार के प्रमुख केन्द्र बन गे. धर्म दास के पास सब कुछ रिहिस. धन दौलत के संगे संग मान सम्मान अउ प्रतिष्ठा घलो. येकर कारण सत्संग, भजन ,साधु संत अउ भक्त मन बर भोजन भंडार, सेवा सत्कार अउ ठहरे बर सबो सुविधा. इनचे ले ज्ञानी गुरु अउ विवेकी चेला के बीच महान ज्ञान गोष्ठी होइस. गुरु -शिष्य परंपरा के

प्रादुर्भाव अउ कबीर पंथ के शुरुआत होइस.


धनी धर्म दास ह कबीर साहेब के अमृत बरोबर वाणी ल जन समुदाय के बीच प्रचार प्रसार करे बर वोकर लिपिबद्ध करे के महान काम करिस. वि. सं. 1521 म कबीर पंथ के सब ले जादा चर्चित ग्रन्थ बीजक के संग्रह के कारज करिस.

अतकीच नइ धर्म दास साहेब ह एक लम्बा समय तक (49 बरस )

सद्गुरु कबीर साहेब के सान्निध्य म रिहिस अउ मानव जीवन ल सुखद, शांत अउ समृद्धिशाली बनाय के दिशा म सविस्तार चर्चा करय. ये सबो अनमोल वचन ल सहेजे के महान काम घलो करत गिस जेहर आज हमर बीच कबीर सागर, शब्दावली जइसे कतको सद्ग्रन्थ के रुप म उपलब्ध हवय.


अात्म साक्षात्कार होय के बाद धर्म दास जी ह अपन करोड़ो के संपत्ति ल जन कल्याण बर अर्पित कर दिस. धर्मदास साहेब सद्गुरु कबीर साहेब के प्रति अत्तिक समर्पित होगे कि एक जान अउ दू शरीर जइसे संबंध स्थापित होगे.

धर्म दास के काव्य शैली कबीर जइसे

सद्गुरु कबीर साहेब अउ धनी धर्म दास के बीच अटूट संबंध के कारण वोकर काव्य शैली घलो कबीर जइसे हे.

संत कबीर ने धनी धर्म दास साहेब को वि. स.1540 में पंथ प्रचार खातिर गुरुवाई करे के दायित्व सौंप दिस. गुरुवाई मिले के बाद धर्म दास ह कबीर साहेब के नाँव ल उजागर करे अउ उंकर संदेश ल जन जन तक पहुंचाय बर अथक प्रयास करिस.

सत्यपंथ के स्थापना करिस. पन्द्रहवीं शताब्दी के मध्यकालीन धार्मिक आंदोलन म संत कवि धर्मदास ह कबीर पंथ के संस्थापक के रुप म भारतीय इतिहास म अपन नाँव दर्ज कराइस.


जगत कल्याण के भावना खातिर सद्गुरु कबीर साहेब भविष्य म पंथ संचालन बर धर्म दास साहब ल ब्यालीस वंश तक अखण्ड अउ अटल राज स्थापित होय के आशीर्वाद घलो दिस. ब्यालीस वंश के ये गुरु परंपरा सद्गुरु कबीर साहेब अउ धनी धर्म दास साहेब के आशीर्वाद ले कबीर पंथ के सही ढंग ले प्रचार प्रसार करत हे.

सतगुरु कबीर साहेब के कतको शिष्य रिहिन . संत कबीर ह अपन बाद पंथ संचालन खातिर कुछ नियम बना के चार गुरु के नियुक्ति करिन. चार गुरु के स्थापना होय के बाद घलो धनी धर्म दास साहेब

प्रमुख अंश माने जाय. वि. स. 1570 म चूरामणि नाम साहेब कबीर पंथ  म वंश परम्परा के तहत पहिली गुरु के रूप म गुरु गद्दी पर बइठिस. वर्तमान म श्री प्रकाश मुनि नाम साहेब कबीर पंथ के 14 वें गुरु  के रूप म गुरु गद्दी म विराजमान हे.

ये प्रकार ले हमर छत्तीसगढ़ म सद्गुरु कबीर साहेब के विचार धारा ह गजब सुग्घर ढंग ले प्रचार प्रसार होवत हे. वंश परम्परा के संगे -संग पारख सिद्धांत ल लेके चलइया इहां लाखो कबीर पंथी हे.  पारख सिद्धांत वाले संत अउ अनुयायी मन वंश परम्परा के विरोध करथे।कबीर पंथ के माध्यम से संत कबीर के संदेश जन जन तक बगरत हे. इहां  वंश परंपरा  के संगे -संग पारख सिद्धांत के अनुसार चलइया  अनुयायी मन दामाखेड़ा, कुदुरमाल,  रतनपुर,कबीरधाम (कवर्धा) कबीरमठ 

नादिया ( राजनांदगांव), खरसिया, करहीभदर ( बालोद),  पेण्ड्री ( राजनांदगांव) बुरहानपुर, सुरगी ( राजनांदगांव) सुंदरा ( राजनांदगांव), भिलाई अउ आने जगह घलो कबीर आश्रम संचालित हे. ये जगह मन के संगे संग कतको गांव अउ शहर म विशाल कबीर सत्संग मेला के आयोजन होथे. ये जगह मन धार्मिक तीर्थ स्थल के रुप म प्रसिद्ध हे.

हमर छत्तीसगढ समरसता के धरती आय। कुछ अपवाद ल छोड़ देथन त इहां धर्म अउ जाति के नांव म झगरा नइ होवय जइसे के आने प्रदेश म देखे जाथे।  इहां के रहवासी मन संत कबीर, धनी धर्मदास, गुरू घासीदास बाबा, संत रविदास, बुद्ध, महावीर , गुरूनानक के संदेश ल अपना के सुमता के दीया जला के चलथे। हमर छत्तीसगढ समन्वय के धरती आय।



[ सुरगी,राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ ]



◆◆◆ ◆◆◆

कबीर ल जानव*

 डॉ पद्मा साहू ‘पर्वणी‘

खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़


           *कबीर ल जानव*


हमर भारतीय दर्शन मा बहुत झन साहित्यकार, संत पुरुष होय हें जेमा संत कबीर ह भक्ति काल के एक अइसे संत हरै जेकर ज्ञान अटपट हे जेला समझ पाना बहुत कठिन हे। कबीर जी सधुक्कड़ी जीवन अपनाइस, अपन जीवन ल साधु के समान बिताइस। कबीर के ज्ञान ल जाने बर पहिली अपन आप ल जाने ल पड़ही। कबीर के ज्ञान छोटे-मोटे ज्ञान नोहे कबीर एक अइसे व्यक्तित्व, महान पुरुष हरै जेन ल आज पूरा दुनिया हा जानथे अउ संत कबीर के ज्ञान ल मानथे। 

       कबीर के गुरु रामानंद स्वामी जी हा कबीर के वास्तविक रूप, ज्ञान ल जान के कबीर ल गुरु मानीस  फेर कबीर के आज्ञा ले कबीर के गुरू बने रहिस। रामानंद गुरु हा  शालिग्राम के मूर्ति ल नहा धोवा के तियार कराथे फेर माला पहिनाय बर भूला जाथे त अपन माला ल हेरथे ओहा गर ले निकलबे नइ करे। कबीर कहीथे गांठ ला खोलव, अज्ञानता के भ्रम ला तोड़व, तब माला गर ले निकलही अउ भव बंधन हा छुटही उही दिन ले स्वामीजी ला ब्रह्म तत्व  अपन अंतस के राम के ज्ञान होथे, अउ कबीर के आगु मा नतमस्तक हो जाथे। 

 कबीर भक्ति काल के इकलौता संत हरै जउन पाखंडवाद ऊपर करारा प्रहार करे हें अउ अन्तस के राम ल जगाय बर लोगन मन ऊपर ज्ञान के लउठी मारे हें।

कबीर कहिथे-


एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट-घट लेटा।

 एक राम सकल पसारा, एक राम सबहुँ ते न्यारा।


एक राम दशरथ के, दुसर राम तीसर घट-घट वासी हे, तीसर राम सर्वव्यापी हे,अऊ जउन राम हा सर्वव्यापकता ले ऊपर हे, न्यारा हे उही राम के गुणगाथे कबीर ह।


       कबीर कहिथे कि राम अविनाशी नाम निराकार हे, साधना के प्रतीक हे। 

अऊ ओ राम के दर्शन कब होही?

कबीर कहिथे__ 

मन सागर मनसा लहरी, बूड़ै बहुत अचेत।

कहहीं कबीर ते बांचिहैं, जिनके ह्रदय विवेक।।


 अर्थात मन सागर हे अउ ये सागर मा काम, क्रोध, विषय, वासना, लोभ, मोह, अहंकार के कतकों लहर उठथे। जउन मनखे मन अपन अंतसमन के ये लहर ल काबू  मा कर लेथे ब्रह्म तत्व ल जान लेथें उही मन भवसागर ले पार हो जाथें। जेनमन, मन के लहरा  ल शांत नइ कर पाय वो मन दुनिया के माया मा डूब जाथें।संत कबीर माया ले बचे बर दुनिया ला अगाह करथे।


मन माया तो एक है, माया मन ही समाय।

 तीन लोक संशय पड़ा, काहि कहूं समझाय।।


माया अउ मन एक हे।  माया मन मा ही बैइठे हे। जेकर ले तीनों लोक संशय मा पड़गे  जेन मनला देवता कहिथे वहू मन नइ बाचिस।  त अब कोन हा कोन ल समझाही। अइसन अद्भुत हे कबीर के ज्ञान हा। 

 कबीर सम्यक तत्व ला समझाय के प्रयास करे हे दुनिया ल। 


मन ऐसा निर्मल भया, जैसे गंगा नीर।

पाछे-पाछे हरि फिरै, कहत कबीर-कबीर।।


कबीर मनखे के असल रूप ल बतात हुए कहिथे कि तुम भगवान ल मत खोजव अपन मन ल अइसे निर्मल बनाव अउ अपन अस्तित्व ल जानव निर्गुन ब्रह्म तत्व ल जानव तहांँ ले हरि खुद तुमला खोजत आही।


संत कबीर  ये संसार मा रहत हुए भी संसार के माया से दूर रिहिस। कबीर संसार ल छोड़िस नइ हे फेर संसार ल पकड़िस घलो नइ हे। वो विरक्त होके राहय, इही कबीर के जीवन जिए के कला आय।

     कबीर तो जनम अउ मरन के भ्रम ल घलो टोर दिस। लोगन मन के धारना रहे कि काशी मा मरथे ता मुक्ति मिलथे, मगहर मा मरथे ता गधा बनथे। ये बात हा एक अंधविश्वास हरय ये अन्धविश्वास ल दूर करे बर कबीर खुद 120 बछर के उम्र मा काशी ले मगहर गिस। मगहर मा जाके लोगन मन ला समझाइस के आदमी  कोनो जगह मरेले सरग या नरक मा नइ जावय, आदमी के करम ओला सरग अउ नरक मा ले जाथे। 


‘क्या काशी क्या ऊसर मगहर, राम हृदय बस मोरा।

जो कासी तन तजै कबीरा, रामे कौन निहोरा’


हिंदू मुस्लिम ल फटकार घलो लगाय हे अउ एकता के सूत्र मा बाँधे के प्रयास घलो करे हे ।

   हिंदू मुस्लिम के एकता बर काशी के राजा वीर सिंह बघेल अउ मगहर रियासत के मुस्लिम नवाब बिजली खान पठान दूनों कबीर के परम शिष्य हरय जउन मन कबीर के प्राण त्यागे के बाद देह ल अपन-अपन अपनाय बर  झगड़ा लड़ई  के बात सोचयँ। कबीर झगड़ा लड़ई ल दूर करे बर आखरी समय मा घलो समन्वय करा दिस। एक दिन आमी नदी जेहा  शंकर के श्राप ले  सुक्खा राहय ऊंहा  कबीर के जाए ले पानी बोहाय लागीस। आज भी बहत हावय। ऊहा ले स्नान करके कबीर हा आइस  अउ अपन ध्यान समाधि बर चद्दर के बीच मा सोगे ओखर ऊपर अउ चद्दर ढक दिस। कबीर कहिस की  बिजली खान पठान, राजा वीर सिंह बघेल  चादर मा जो वस्तु मिलही तउन ला बराबर-बराबर बांट लेहू। अउ झगड़ा मत करहु। 

फेर कहिथे__


 उठा लो पर्दा, इनमें नहीं है मुर्दा।


 देखते-देखते चादर मा कबीर के देह के जगह मा फूल बनगे। वोला हिंदू, मुस्लिम दूनों  मन बाँट लिस अउ अपन-अपन देव घर,हिंदू मन समाधि, मुस्लिम मन मजार  बनाके कबीर ल माने लागिस।  अहु एक अद्भुत बात आय। जेला देख के बिजली पठान हा अचंभा मा पड़गे।


संत कबीर नहीं नर देही, जारय जरत न गाड़े गड़ही।

पठीयों इत पुनि जहाँ पठाना,सुनि के खान अचंभा माना।।


कबीर अपन सधुक्कड़ी जीवन बिताइस। समाज ल समन्वय के शिक्षा दिस। अनपढ़ होय के बाद घलो पूरा दुनिया ल अपन अइसे शिक्षा ज्ञान दिस के आज वो शिक्षा के जब्बर ज्ञान के फेर जरूरत हे। अद्भुत हे कबीर अउ वोकर ज्ञान हा।


जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही।

सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही।।

      तत्व ज्ञान ल पाए बर निर्गुन उपासक कबीर हा दुनिया के अहमता ल मेट के अपन जीवन ल जान लीस, दुनिया ल उपदेश करीस,अंधविश्वास कुरूती ल दूर करे बर जब्बर काम करिस साहित्य ल नवा दिशा दिस।  कबीर के जीवन पूरा ज्ञान ले भरे हे। जउन हा कबीर ल जान लिही  कबीर ओखरे आय।


पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात।

एक दिना छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात।।


कबीर साहेब मनखे  मनला नेकी करे बर सलाह देथे, क्षणभंगुर मनखे शरीर के सच्चाई ल लोगन मन ल बताथे कि पानी के बुलबुला जइसे मनखे के शरीर क्षणभंगुर हे। जइसे प्रभात होथे ता तारा छिप जाथे, वइसने  ये देह हा घलो एक दिन नष्ट हो जाही। राग-द्वेष, ईरखा ल त्याग के भाईचारा अपनाय के संदेश दे हे संत कबीर ह।


रचनाकार 

डॉ पद्मा साहू "पर्वणी"

खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़

संस्मरण डोंगरगढ़ यात्रा

 संस्मरण 

डोंगरगढ़ यात्रा


हमर संग म एक डोकरी चघिस ।ओ समय म सीढ़ी नई बने रहिस हे 1974 के बात आय ।मै अपन ममा के बेटी शशि दीदी संग गे रहेंव।ओखर एक बछर के बेटा के मुंडन कराये बर गे रहेन ।


हमन करीब तीन बजे जघे बर शुरु करेन ।एक चट्टान के बाजू म बड़े जन खोह रहिस हे ।जीजीजी  भागबली वर्मा डिप्टी रेंजर रहिस हे ।वो ह कहिस के ये मेर शेर हावय ओखर गंध आवत हावय ।ओखर ठीक पहिली एक झन डोकरी मिलिस ।एक ठन लौठी धरे रहिस हे ।हमर सियान मन लुगरा पहिरंय वइसने लुगरा पहिरे रहिस हे ।मइलखोड़हा लुगरा ।बाल बिखरे रहिस हे ।


हमन ओ खोह.ल देखे बर चल देन ।बाद म देखेन के डोकरी आगू आगू जात हे ।हमन भी दीदी के कारण बइठत बइठत चढ़त रहेन ।

जब उपर के सीढ़ी ल चढ़े के शुरू करेन तब ओ ह पाछू म रहिस हे ।हमन चढ़ गेन ।उहें नाऊ रहिस हे ।लइका के मुंडन होगे ।ओ डोकरी दिखत नई रहिस हे ।अब सांझ होय ले लगगे ।पुजारी ह कहिस अब जल्दी उतरव नही त रात हो जही ।जानवर आ जथे ।हमन कहेन एक डोकरी हमर आगू आगू.आवत रहिस हे..ओ ह पहुँचे नईये .पुजारी कहिस अकेल्ला डोकरी नहीं भाई नई आ सकय ।एक पानी भरत रहिस हे तेन ह हऊंला ले के उतरीस ।हमन उतरेन ।पुजारी उतरिस ।डोकरी कोनो मेर नई मिलिस ।नीचे के दुकान मन म पुछेंन त सब कहिन के अइसना कोनो डोकरी इंहा नई दिखय ।अब तो हमन थरथरा गेन।कोन रहिस हे ।भूत परेत तो नोहय.।हमन शेर के बात बतायेन ।डोकरी अऊ शेर के बात सुन के नीचे के पुजारी कहिस भागशाली आव भाई तुमन देवी के आरो पा लेव अउ देख घलो लेव ।वो देवी आय अपन सवारी संग साक्षात तुमन ल अपन धाम तक लेगे ।

अइसे हमन वास्तव म अनुभव करे रहेन ।मोर काका ( पिताजी ) डोंगर गढ़ के हाई स्कूल म प्राचार्य रहिस हे ।मोर बड़े बहिनी डा. सत्यभामा आड़िल के बाद कोनो संतान नई रहिस हे ।तब हमर बड़े दादी ह.दूसर बिहाव करे बर कहि दिस ।काका चार साल तक गांव वापस नई अइस । हमर माँ के सहेली मिश्रा चाची रहिस है ।ओ ह मानता रखिस अउ मै पैदा हो गेंव ।बड़े दीदी ले बारह साल छोटे ।तब तक काका ह जगदलपुर म प्राचार्य होगे रहिस हे ।चाची के बेटी जेन मोर ले एक साल बड़े हे ओखरो नाम सुधा हे।ओ चाची अपन बेटी के नाल ल हमर माँ ल पिलाये रहिस हे ।एक माँ के मातृत्व दूसर माँ के गोद सुना नहीं देख सकिस ।एक माँ ,एक सहेली के बहुत बड़े उदाहरण आय मिश्रा चाची ।हमर घर म खुशी आगे ।येला मिश्रा चाची ह डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी दाई म एक हऊंला पानी अउ एक माला  साल भर चढ़ा के पूरा करिस ।ये मोर बिहाव होय के बाद भी चढ़ावत रहिस हे .बारहो महिना चढ़ावय अउ साल म एक बेर जाके पइसा देवय । एक माँ जेन अपन लइका के नार जेन ल जमीन म गड़ाय जाथे तेन ल मोर माँ ल पियइस ।माँ के दरबार म मानता रखिस,अउ ओला सालो साल पूरा करिस ।एक मोर माँ जेन जनम देय के बाद बम्लेश्वरी ल नई भुलइस ,मोर मुंडन भी उहें होय हावय ।हमन जाते राहन ।मोर लइका बर भी मोर माँ ऐखरे अँगना म लेगिस ।मै तो तीन माँ के परेम पायेंव ।एक बेर बम्लेश्वरी संग भेट होगे ,अपन होय के आभास देवइस फेर हमन नई पहचान पायेन ।अतका सुरता हे के मैं जब थकव त ओखरे बाजू म बइठ जांव ।ओ ह मोर संग संग चलय ।दीदी काहय टोनही होही दूरिहा रह ।येला मै मुलावंव नही ।आज भी ओखर रूप दिखथे ।

सुधा वर्मा ,18-4-2016

पइसा के रूख*

 *(छत्तीसगढ़ी साहित्यिक पुरोधा छत्तीसगढ़ी के दूसरा उपन्यासकार आदरणीय श्री शिवशंकर शुक्ल जी, जउन हर 'दियना के अंजोर ' अउ 'मोंगरा' छत्तीसगढ़ी उपन्यास लिखिन हें। उंकर लिखे बाल कहानी संग्रह 'दमांद बाबू दुलरू' म संग्रहित एक ठन प्रमुख कहानी 'पइसा के रुख' हर अविकल प्रस्तुत हे । मोर पूरा प्रयास रहिस हे कि कनहुँ करा उँकर भाषा -शैली म छेड़ छाड़ झन होवे कहके, अउ एमे मंय सफल हंव, अइसन लागत हे।)*



              *पइसा के रूख*

              ---------------------

- *श्री शिवशंकर शुक्ल*


--

                  

           एक गांव में दूझिन भाई रहत रिहिन ।बड़े के नाम दुकालू अउ छोटे के नाम सुकालू रहिस। दुनों झिन के खटला मन मं आपुसे मं रोजेचझगरा होवै । रोज के किलकिल ले  दुनों भाई मन  अलगिया गिन ।


         सुकालू बहुत एक कोढ़िया रहिस।  कभु कोनों काम धंधा नई करत  रहिस । दिन रात सूतय अउ इती उती किंदरय । ओखर इहिच बूता रहय । अपन ददा के कमई ,जोन  ओला बटवारा मं मिले  रिहिस  उही ल उड़ावय ।


              थोर दिन मं ओह अपन ददा के कमई ल  फूंक  डारिस । फेर ओह भीख मांगेल धरिस।  गांव के मन ओला बाम्हन  घर जनम  धरे ले कुछु कांही दे देवंय । अइसने इनकर दिन बीते ।


          एक दिन सुकालू के टूरा हर अपन बड़ा के टूरा मेर एक ठिन कठवा के हाथी देखिस । ओहर दऊरत दऊरत अपन दाई आई मेंरन आइस अऊ रोवन लागिस । सुकालू के खटला  हा पूछिस , का होगे , काबर रोथस ?


           टुरा ह किहिस, दाई बड़ा ह  मेला ले भइया बर कठवा के हाथी लानिस हे, वइसने मंहू ला बिसा देना । सुकालू के खटला जोंन  ला तीन दिन ले अनाज के एक सीथा खाय ल नई मिले रहिस, खिसिया गे । कहिस कस रे करम छड़हा, तोर ददा के गुन मां पसिया नइ मिलय, तोला हाथी चाही । सुकालू के टुरा अऊ रोवन  लागिस । टुरा ल रोवत देख के वोह खिसियागे अऊ दुचार चटकन  टुरा ल झाड़ दिस।


              सुकालू  ह कुरिया मं एक मांचा ऊपर बइठे रिहिस। अपन जोड़ी के गोठ ह ओला बान उसन लागिस। ओह अपन मन मं गांठ बांधिस कि मेंह कुछ काही करबे करहूं । 


            दूसर दिन सुकालू कमई करे बर आन गांव जाय बर अपन घर ले निकरिस । गांव के मुहाटी मं एक लोहार के घर रहय । सुकालू ल गांव के बाहिर जावत देख के ओह किहिस, कस गा बाम्हन देवता, कहां जाथस?


       सुकालू ह किहिस, लुहार कका में ह दूसर गांव जावत हववं, कुछु काहीं बुता करहूं। अब कले चुप्पे नइ बइठवं ।

 

        लुहार हर किहिस-- गांव ले बाहिर काबर जा थस , मोर हिंया बूता कर ।  सुकालू किहिस -- लुहार कका तैं जउन बूता तियारबे में उहीकरहूँ ।


        ओ दिन बेरा के  बूड़त ले सुकालू ह लुहार हियां घन पीटिस-  संझा जाय के बेरा लूहार ह सुकालू ल दिन भर के मजूरी तीन पइसा दीस। सुकालू ह तीन पइसा  ल लेके चलिस अपन कुरिया कोती। सुकालू ल आज एइसे लगे जइसे ओला तीन पइसा नई, कहूं के राज मिलगे ।


           कुरिया के मुंहाटी ले सुकालू ह अपन  खटला ल हांक पारिस। सुकालू के खटला ह दिन भर ले अपन जोड़ी ल नई देखे रहय । सुकालू के हांक पारत वहू  दुवारी के अंगना मं आगे । सुकालू हर किहिस, ले ये दु  पइसा, मेंह आज  बूता करके लाने हवंव । अब में ह बइठ के नइ रहवं। जतेक बेर सुकालू हर पइसा ल देत रहिस,सुकालू के  खटला ह देखिस कि  सुकालू के हाथ ह लहू लूहान  होगे  हावय। कहिस,ये तोर हाथ  मं का होगे हे? सुकालू ह  किंहिस,आज दिन भर मेंह लुहार कका हिंया घन पीटे हंवव ओखरे ये।


 सुकालू के खटला पानी तिपोइस अऊ सुकालू ल नहाय के पथरा ऊपर बइठा के  ओखर हाथ ल सेके ल तीपे पानी भित्तरी  लाने बर गिस , ओतके बेर  सुकालू ह उसका बेर सुकालू ह एक पइसा जेन ला ओहर चोंगी -माखुर बर  लुकाय ले रहिस, तेन ल नहाय के पथरा के नीचू मं लुका दिस।


        हाथ ल सिंका के सुकालू ह बियारी करिस। खातेखात वोला  नींद मातिस वो ह सूतगे ।


      बिहानियां सुकालू के खटला ह उठिस । त काय देखथे कि नहाय के पथरा के तीर म पइसा के रूख  लगे हवय। पहिली तो वोला लगिस के मोला भोरहा होवत हावय । वो ह  पथरा मेरन  जा के देखथे त  सहीं मं उहां पइसा के रुख रहय। लकर धकर ओह पइसा ल चरिहा मं भर भर के सुते के कोठी में लेग लेग के कुरोय लगिस।  पइसा के झन- झन  सुन के  सुकालू के नींद ह टूटगे। वोह देखिस कि मोर जोड़ी ह चरिहा म पइसा भर भर के लान लान  के इहां कुरोयवत हे । वो ह पूछिस, कउन  मेर  ले तोला एतका धन दोगानी मिलगे? 


         वो ह कहिस-- उठ त देख पथरा मेरन कतेक बड़े पइसा के रुख लगे हे । सुकालू घलो देखिस त ओला अपन रात के पइसा के सुरता आइस, जेला वोह पथरा खाल्हे लुकादे रिहिस । आज वोला जनइस के अपन पसीना बोहाय पइसा मं कतेक बल होथे। वो ह  गांठ बांधिस के बिन बूता के मेंह बइठ के एक सीथा मुंख मं नई डारंव ।


             सुकालू घलो पइसा वाला बनगे। पइसा के रूख के सोर राजा लगिस। वोह खूभकन बनिहार लानिस अउ  सुकालू  के कुरिया म नींग गे। सुकालू, राजा ह हांक पारिस।  सुकालू ह अपन दुवारी म राजा ल देख के जान गे के येहर काबर आय हाबय । फेर राजा के आगु वोह काय । बनिहार मन कुदाली रापा ले के भिड़गे ,रुख उदारे बर फेर करतिस जेतक वो मन भुंया ल खनय ओतके रुख ह भुंइया मं हमात जाय।थोर दिन मं रुख हर धरती माता के कोख मं हमागे ।  राजा हर मन मार के रेंग दिस।


    सुकालू ल पइसा के रूख हर  चेत करा दिस के मिहनत के कमई हा कतेक बाढ़थे ।


*श्री शिवशंकर शुक्ल*

---

 खाँटी  छत्तीसगढ़ी शब्द -

------------------------------

खटला - औरत, सुवारी

हिंया -इहाँ , यहाँ

कुरोय लगीस -भरे लागिस,जमा करे लागिस

खाल्हे -तरी ,नीचे

------------------------------


प्रस्तुतकर्ता -

*रामनाथ साहू*

-------------::----------

छत्तीसगढ़ी बाल कहानी वोखर किराया माफ कर दे पापा

 छत्तीसगढ़ी बाल कहानी


वोखर किराया माफ कर दे पापा 

=====================

                    कमलेश प्रसाद शर्माबाबू


         प्रियांशी अउ मुस्कान अब अच्छा अउ पक्का सहेली बन गे रिहिन।पिछले तीन साल मा तो जइसे ऊखर संबंध सगी बहिनी ले घलो वो पार होगे रिहिस। दुनोझन एक संघरा पूर्व माध्यमिक शाला मा पढ़त रिहिन।एके संघरा आना जाना पढ़ना खेलना घूँमना दुनोझन के चलय।प्रियांशी जब छठवी कक्षा मा रिहिस तभे किरायेदार बनके मुस्कान के अब्बू गुलजार ऊखर गाँव आय रिहिस।कोठार मा बने नवा पक्की मकान ल प्रियांशी के पापा वो मनला किराया मा दे रिहिस।गुलजार गाँव-गाँव मा फेरी लगाके कपड़ा बेंचे के काम करय अउ वोखर पत्नी सुल्ताना घर मा पीकू फाल लगाके मशीन चलावय,अच्छा खासा कमाई हो जाय ।बिल्कुल नियत समय मा नौकरी वाले मन बरोबर पाँच तारीक के वो अपन एडवांस किराया दू हजार रूपया मकान मालिक मुरली ल बिजली बिल सहित जमा कर दय।

     कब काखर ऊपर कइसन मुसीबत आ जही केहे नइ जा सकय। फेर ये त्रासदी तो हमर देश के संग-संग कतको देश मन झेले रिहिन।पूरा कारोबार ठप्प होगे रिहिस,दू महिना के सख्त लाकडाऊन ह तो जइसे पूरा कनिहा ल टोर के राख दे रिहिस।आर्थिक स्थिति पूरा चरमरागे रिहिस।धंधा पानी सब चौपट होगे रिहिस। गुलजार ह कतको घरेलू समान टी वी, कूलर, आलमारी ल दुकान मनसे  किश्त मा खरीदे रिहिस, आखिर कोन जानत रिहिस कि आफत बनके ये कोरोना महामारी आ जाही।ये बइरी के कारण आज हजारो लोगन के हाँसत खेलत जिंदगी बरबाद होगे।घर से न निकले के सरकारी आदेश घलो बिकट सख्त रिहिस।

      कोरोना के डरावनी अउ भयानक तस्वीर  के बीच कइसनो करके दू महिना के समय रोवत-धोवत कट गे , फेर ब्यापार करे के आजादी कोनो ल नइ मिलिस।गुलजार के चिंता धीरे-धीरे बाढ़े लागिस,अब तो किराया दे मा घलो भारी परेशानी आय लागिस।दूसर तरफ मकान मालिक मुरलीधर बेहद हि कठोर इंसान रिहिस लेन-देन के मामला मा अउ भारी सख्त राहय।किराया बर तो  रोज दबाव डालय अउ रोज दू चार बात सुनाय बिना खाना नइ खाय ।संझा बिहनिया उदे पानी पियाय लागिस। गुलजार अउ सुल्ताना ल रातदिन नींद नइ आवय आखिर वोमन करय त का करँय,,, समझ नइ आय।

    गुलजार हर समय मुसीबत मा अपन ससुराल वाला मनसे कुछ समय बर उधारी पइसा माँग लेवय फेर ये दरी तो उहू आसरा टूट गे।वोखर ससुर के ईलाज मा छय लाख रुपिया लगाय के बाद घलो वोला वोखर ससुराल वाले  मन नइ बचाँ सकिन।वोहा कोरोना बीमारी ले संक्रमित होगे रिहिसे।बाँचे खोंचे उम्मीद ससुर के जनाजा के संग ही दफन होगे। फेर ये सब बात ल मकान मालिक ल कोन समझाँवय।मुरलीधर तो आज फटकार लगाय मा कोनो कसर नइ छोड़िसअउ वोखर सात पीढ़ी ऊपर पानी रिको के छट्ठी के दूध सुरता कराके राख दीस।मुरलीधर अभी-अभी नवा घर बनाय रिहिस हे अउ अपन मन जुन्ना घर में राहँय।नवा पक्की मकान ल किराया दे रिहिस हे घर के दू लाख करजा घलो मूड़ मा बोझा कस माढ़े रिहिस हे, ऊपर से किरायेदार चार महिना ले किराया बर तरसावत रिहिसे जइसने मुँह मा आय तइसने उराट-पुराट सुना दय,अउ अब तो पइसा पटा के घर खाली करे के फरमान घलो जारी कर दीस।

           प्रियांशी पिछला दू दिन  ले खाना पीना सब छोड़ दे रिहिस।अस्पताल मा डाँक्टर मन वोखर पूरा टेस्ट कराइन फेर कोनो बीमारी नइ निकलिस।डाँक्टर मन मुरलीधर ल सख्त चेतावनी दीस कि अगर प्रियांशी के इच्छा अउ भावना के ख्याल नइ राखे जाही त वोला बचाना मुश्किल हे।वोला कोनो बात से गहरा धक्का पहुँचे हे। साँझ के जइसे हि प्रियांशी ल घर लाय गिस,देखे बर मुस्कान वोखर अब्बू अउ अम्मी सबझन संघरा आइन।वोमन ल देख के प्रियांशी सिसक-सिसक के रोय लागिस, मुस्कान घलो फफक-फफक के रोय लागिस सब के आँखी नम होगे,अपने-अपन आँसू चूहे लागिस।

       मुस्कान ल जइसे हि जानकारी होइस कि दू दिन ले प्रियांशी कुछु खाय-पीये नइहे, झट ले अपन मम्मी संग घर जाके एक बड़े कटोरा भर दाल खिचड़ी बनाके ले आइस अउ ले बहिनी खा,,,ले बहिनी खा कहिके खवाय लगिस।प्रियांशी ह रोवत-रोवत सबो खिचड़ी ल पेट भर खा डरिस। पापा मुरलीधर ह देख के अकबकागे, काबर कि वोहा तो पिछला दू दिन ले प्रियांशी ल खवाय के बिक्कट उपाय कर डारे रिहिस फेर प्रियांशी एक कँवरा घलो नइ खाय रिहिस।माँ गीतारानी के आँखी घलो डबडबा गे आँसू रोके नइ रूकय, संग मा मुरलीधर के आँसू घलो मउहा कस टपाटप चूहे लागिस।वोतके बेर प्रियांशी के दादा दादी मन घलो आगे। दादा दादी मन चारधाम यात्रा करे बर गे रिहिन फेर का करबे सख्त लाकडाऊन के सेती उही डाहर तीन महिना ले छेंकाय रिहिन।उहूमन नोनी के अइसन हालत ल देख के घबरागें।प्रियांशी वोमन ल पोटार-पोटार के रोय लागिस।मुरलीधर ह मुस्कान ल कीथे बेटी अब तैं रोज प्रियांशी ल अइसने आके खवाय कर कहत-कहत,,,गभरागे।

          मुरली ह जइसे हि प्रियांशी के मूड़ मा हाथ फेरे ल धरिस प्रियांशी ह वोखर हाथ ल अपन हाथ मा धरके सिसक-सिसक के रोवत कहिथे,,,वोखर किराया माफ कर दे पापा,,,वोखर किराया माफ कर दे पापा अउ जोर-जोर से दहाड़ मार के रोय लागिस।

       मुरलीधर के कठोर दिल आज चानी-चानी होगे आखिर उहू भी मनखे आय अउ हर मनखे के दिल मा कहूँ न कहूँ मानवता छिपे रहिथे वोखर पापा वादा करिस कि हाँ बेटी,,, मै तोर भावना ल समझ गे हँव कि तैं का कहना चाहत हस।ये कोरोना के त्रासदी मा जेन दुखी हे वोला अउ दुख नइ पहुँचावन अउ मिल-जुलके ऊखर सहायता करबोन। मैं तोला कसम देवत हँव बेटी कि आज से वोखर पूरा किराया माफ कर दे हँव अउ जब तक लाकडाऊन रिही तब तक अउ आगे चार महिना तक वोखर किराया माफ हे।अतका सुन के प्रियांशी के चेहरा म मुस्कान लहुटगे।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू

कटंगी-गंडई

जिला केसीजी छत्तीसगढ़

9977533375

लघुकथा – नाव दोष

 लघुकथा – 



नाव दोष 


एक गाँव म पति पत्नि के बीच म पटबे नइ करय । रात दिन खिटिर पिटिर होतेच रहय । इँकर सेती नोहर सोहर के एके झन बेटा के पालन पोषन ठीक ढंग से नइ हो पावत रहय । बाई हा बहुतेच उच्छृन्खल किसम के रिहिस । ओहा अपन घरवाला के एको बात नइ सुनय । अपन घरवाला ला अपन हिसाब से चलावय । बपरा घरवाला हा बदनामी के डर म कलेचुप रहय । 

घेरी बेरी किटिर किटिर के सेती परिवार म सुख शांति नइ रिहिस । बेटा ला जब पाये तब .. मारे बर बाई के हाथ उचेच रहय । घर के मुखिया हा एक झिन ज्योतिष महराज तिर देखना सुनना करवाये बर गिस । कुंडली म सबो ठीक रहय । न कोनो ग्रह दोष न अऊ कुछु दोष .. । हाथ बिचारत महराज हा उँकर नाव पूछिस । मुखिया हा अपन नाव ला संविधान .. बाई के नाव ला सरकार अऊ बेटा के नाव ला लोकतंत्र बतइस । 

ज्योतिष महराज हा समझगे के .. नाव के सेती परिवार के बीच तनाव अऊ अनबन होवत हे । फेर बता नइ सकिस अऊ शांति जाप म लगगे । 


 हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन . छुरा

योजना

 योजना 

                    प्रदेश के मुखिया संग , योजना आयोग के बइठक चलत रहय । योजना आयोग के उपाध्यक्ष हा भड़कत कहत रहय – खैरात म बांटे बर बंद करव । तुँहर अइसन बूता के सेती हमर जम्मो खजाना खाली होवत हे । अब अइसन बूता बर , हमर करा कन्हो फंड निये । तूमन शुरू करे हव , तुहीं मन अइसन योजना ला , अपन पइसा म चलावव । प्रदेश के मुखिया किथे – समे के मांग के हिसाब से योजना सुरू करे रेहेन बाबू .... तैं का जानबे .. ? सरकार बनाये खातिर अइसन करेच ला परथे गा ...... । कन्हो ला , एक रूपिया दू रूपिया किलो म , चऊँर दे के , ओकर पेट भरना गलत हे का ..... ? उपाध्यक्ष किथे – गलत कहीं निये , फेर सस्ता राशन के चक्कर म गरीब के संख्या , उदुप ले बाढ़गे , तबले , हमूमन गरीबी के लइन म आगेन । मुखिया किथे – असल म योजना ला हमन , सिर्फ बोट बर लाने रेहेन फेर , को जनी , कब बोटर मन घला जुड़गे एमा , तेकर सेती , खरचा बाढ़गे । योजना आयोग किथे – चाहे कहीं होय , हमर देश के मुखिया हा .... अब अइसन योजना बर , पइसा दे बर , मना करत हे , तूमन , अपन अपन , बेवस्था कर लेवव । 

                    दूसर दिन प्रदेश म , केबिनेट के बइसका म , समस्या के समाधान बर मंथन चलत रिहीस । जम्मो मंत्री मन अपन अपन सुझाव दीन । सार्वजनिक निर्माण बिभाग के मंत्री बताथे – सर , जम्मो सार्वजनिक बितरण प्रणाली ला हमर बिभाग ला दे दव । मुखिया किथे – एकर ले काये होही ? मंत्री किथे – सिर्फ लीपापोती ....। कागज म चिक्कन सड़क बना सकत हन , त ये बहुत छोटे बूता आय हमर बर । सिर्फ बजट बनही , खरचा के आवश्यकता निये ... । मुखिया किथे – अरबों रूपिया के बजट ला तुँहर अधिकारी मन सड़क कस लील दिहीं तैं देखते रहि जबे ...... । तोर से नइ हो सके । मंत्री जवाबलेस होगे । 

                    सिचाई मंत्री किथे – सर , जम्मो सिस्टम ला मोला दे दव । चार दिन म खरचा म नियंत्रण हो जही । मुखिया किथे – पानी के नियंत्रण बर जे बांध बनाये हस तेमा , कतका पानी नियंत्रित होइस हे ....... ? दूधो गे दुहना घला गे , बांध अऊ पानी संघरा बोहागे ....... । तहन फसल बोहागे , मनखे बोहागे , जानवर बोहागे , मुवावजा बाँटत हमर कतको बोहागे ...... । कलेचुप बइठगे ।

                    संस्कृति मंत्री किथे – मोर करा वइसे भी कन्हो बूता निये । में सिर्फ , राजिम म कुम्भ कराथँव , कभू कभू साहित्य के सम्मेलन अऊ बछर म एक बेर , राज्य महोत्सव । में सार्वजनिक बितरण प्रणाली ला बहुतेच नियंत्रण कर सकत हंव । मुखिया किथे – न तोर कुम्भ म ठिकाना , न कन्हो महोत्सव म .... , इनाम बाँटथस तिही म अंगरी उच जथे .... तैं का कर सकबे .....  नानुक बजट तोर से सम्हलत निये , तैं अतेक बजट के बूता ला काला संभाल सकबे .... तोर करा का योजना हे तेला बता .....। मंत्री किथे – काम हाथ म मिलही तब योजना बनाबो .......। 

                     बित्त मंत्री किथे – मोला लागथे अब ये काम ला सीधा , हमर नियंत्रण म दे देना चाही । हमन जइसे चहापत्ती ला ऊँच म टांग के .... गोंदली ला टिलिंग म चइघाके , जनता ला पदोथन तइसने , सस्ता राशन ल अइसे ऊँच म टांगबो के .... कन्हो अमर झिन सकय । जे अमर पारही , ते टेक्स म , मर जही ... । मुखिया किथे – येमा हल्ला होये के चांस हे । चुनई लकठियागे हे , तोर योजना म वोटर ते वोटर , बोट तको दुरिहा जही ...... । 

                    स्वास्थ्य बिभाग के मंत्री कलेचुप बइठे रहय । मुखिया किथे – तहूँ कुछ तो बोल .... । वो किथे – मैं का कहँव सर । जे योजना ला सुरू करथन , बदनामेच होथन । अऊ सरकार के किरकिरी होथे । आँखी के आपरेशन के अभियान चलाथन , त कतको झिन के , आँखी फूट जथे । परिवार नियोजन म , पेट म कैची छूट जथे । साँस के तकलीफ दुरिहाये बर लाने , आक्सीजन के सिलेंडर हा , बड़का बड़का कारखाना म लग जथे । फेर एक बात हे मुखिया जी ... मोला सार्वजनिक बितरण प्रणाली ला दुहू ते , कुछ महीना म तुँहर समस्या के , समाधान हो सकत हे । मुखिया किथे – कइसे ? स्वास्थ्य मंत्री किथे – फकत एक बेर घोषणा भर कर दव के , सार्वजनिक बितरण प्रणाली के सस्ता राशन , अस्पताल ले मिलही कहिके ...... । मुखिया पूछिस – येकर ले का होही ? स्वास्थ्य मंत्री किथे – जनता जानत हे , सरकारी अस्पताल के हाल ला । इहाँ आये के बाद बहुतेच कम सौभाग्यशाली मन , सकुशल वापिस जाथे , तेकर सेती , कन्हो सरकारी अस्पताल के चौंखट म पाँव दे बर सोंचथे ..... । सस्ता राशन के योजना ल , ‌हमन ला बंद करे बर नइ लागे , हमर अस्पताल म राशन बिसाये बर .... कन्हो आबेच नइ करही , त खुदे , कुछ दिन म योजना अपंने अपन चुमुकले बंद हो जही । पूरा पइसा बाँच जही ....... । चुनाव समे , जनता ला मुहुँ देखाये म घला कन्हो परेशानी नइ होय । हमन , कहि सकत हन के , हमन तो दे बर तैयार रेहेन .... फेर कन्हो झोंके बर .... तैयार निये । केबिनेट म प्रस्ताव ला मंजूरी मिलगे । चार महीना म , प्रदेश म सस्ता राशन झोंकइया के संख्या शून्य होगे । प्रदेश के गरीबी पूरी तरह ले दूर होगे । गरीब मुक्त राज्य ला यू. एन. ओ. म पुरुस्कार झोंके बर बलाये गेहे ...... ।     

 हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

सबके दिन बहुरय ....... जइसे घुरुवा के दिन बहुरगे .........

 सबके दिन बहुरय ....... जइसे घुरुवा के दिन बहुरगे ......... 

रोज बिहिनिया ले दुकलहिन हा दिसा मैदान खातिर जावत बेरा .. अपन घर के गोबर कचरा ला सकेल के... अपन घुरुवा म फेंक देवय । एक दिन के बात आय .. दुकलहिन हा .. बाहिर बट्टा दिसा मैदान जावत समे .. गोबर कचरा ला फेंकें धरिस तइसने म .. घुरवा के बींचों बीच .. एक ठिन मोटरी देख पारिस .. नजर थोकिन कमजोर रिहिस .. समझ नइ अइस .. उही तिर बिलमके नजर भर निहारत .. काये होही .. काला फेंक पारेंव बैरी कहत मने मन बुड़बुड़ावत .. सोंचे लागिस .. तभे मोटरी म हलचल दिखिस .. मोटरी ला एक कनिक हालत डुलत देख पारिस । भूत परेत मरी मसान होही समझके , डेर्रा गिस अऊ कचरा ला घुरुवा तिर म उलदके .. लकर धकर ... झऊँहा ला उही तिर पटक के मसक दिस । लहुँटती म .. झऊँहा टुकना उचावत खानी ...नजर अऊ ध्यान फेर उहि कोति चल दिस । बेरा पंगपंगागे रहय .. थोकिन हिम्मत आगे रिहिस । उही तिर खड़े होके ध्यान लगा के देखे लागिस । ये दारी .. मोटरी हालत डोलत नइ रहय । अचरज म परगे .. काये होही येहा सोंचत .. घुरुवा म चाइघगे अऊ धुरिहा ले मोटरी ला .. हिम्मत करके छुये के प्रयास करिस .. गुजगुज लागिस । हाथ ला वापिस खींच लिस तभे .. मोटरी फेर हालिस । दुसरइया छुये के हिम्मत नइ होइस । लकर धकर लहुँटके .. अपन गोसइँया अऊ बेटा ला बतइस । सब्बो झिन तुरते घुरुवा कोती दऊँड़िस । पिछू पिछू ओकर बहू घला भागिस । 

घुरुवा म पहुँचके मोटरा ला धीरे से लउड़ी म हुदरिस .. रोये कस अवाज अइस । लउड़ी म फँसा के ओकर बंधना ला हेरिस .. निचट उल्हुर बंधाये रहय .. फटले हिंटगे । देखिस तहन जम्मो झिन .. अवाक होगे ... काकरो मुहुँ ले बक्का नइ फुटत रहय ....... नार फुल समेत नानुक नोनी ....... । जम्मो झन घुरुवा तिर म खड़े सोंचते रहय .. ततका म बहू हा घुरुवा म चइघके .. लइका ला .. हाय मोर बेटी कहिके.. किड़किड़ ले पोटार डरिस । बिहाव के दस बछर नहाकगे रहय .. बपरी के कोख म लइका नइ नांदत रहय । रात दिन येकरे बर .. भगवान ले बिनती करत रहय .. भगवान मोर सुन लिस कहिके .. लइका ला चुमे चांटे बर धर लिस । बहू के लइका के प्रति मोहो अऊ पागलपन ला देखके .. सास ससुर अऊ ओकर घरवाला घला .. नोनी ला अपन संतान स्वीकार लिस । नोनी उप्पर .. बहू के मया अतका पलपलागे के .. लइका बियाये कस .. ओकर थन ले .. दूध के धार फेंकाये लगगे । घुरुवा म मिलिस तेकर सेती .. नोनी के नाव घुरुवा परगे । 

घुरुवा जब घर म अइस ते समे ओकर घर म ठीक से खाये बर नइ रहय । फेर घुरुवा के चरन परे ले .. घर के गाय भईँस के दूध .. अपने अपन बाढगे । अब घुरुवा के ददा हा सिर्फ पहटिया नइ रहिगे बलकि दूध बेंचइया रऊत बनगे । जइसे जइसे घुरुवा हा बाढ़त रहय .. तइसे तइसे घर के आर्थिक स्थिति बने होये लगगे । घुरुवा घला हरेक काम म अगुवा । अपन दई ददा के संगे संग .. बबा अऊ बबा दई के घला.. अबड़ सेवा जतन अऊ ख्याल करय । घुरुवा दिखम म जतेक सुंदर रहय ततके …. चुलबुली घला ... फेर बहुतेच अक्कल वाली रहय ... तेकर सेती .. गाँव भरके चहेती रहय । 

समे बीते के साथ .. घुरुवा सग्यान होगे । बबा अऊ बबा दई हा निचट सियान होगे रहय । जियत ले घुरुवा के बिहाव देख डरतेन .. दु बीजा चऊँर टिक देतेन सोंचय । फेर कन्हो सगा सोदर के आरो नइ मिलत रहय । घर के जम्मो झन ला ओकर बिहाव के फिकर धर लिस । एक दिन के बात आय , जंगल म .. घुरुवा हा संगी जहुँरिया संग .. लकड़ी बिने बर गे रिहिस .. उही समे .. छतरसाह नाव के युवराज हा .. जंगल म शिकार खेलत ... रसता भुलागे । संगवारी मन के साथ छुटगे । प्यास म ओकर टोंटा सुखाये लगिस अऊ भूख म पेट पिराये लगिस । रसता अऊ संगवारी खोजत थकगे रहय अऊ रुख के छइँहा म अराम करत संगवारी मन ला अगोरत रहय .. तइसना म .. दबे पाँव एक ठिन चितवा हा राजकुमार कोती दऊंड़े लगिस । राजकुमार सावधान होतिस तेकर पहिली .. चितवा हा राजकुमार उप्पर कुद दिस । घुरुवा के नजर परगे .. हाथ के टंगिया ला जोर से फेंकिस .. चितवा के टोंटा अल्लग कटाके फेंकागे । युवराज ला खरोंच तक नइ अइस । तलफत परेशान युवराज ला .. घुरुवा हा अपन धरे पसिया ला पियइस .. बासी खवइस अऊ थोकिन अराम के बाद .. ओकर राज के नगर जाये के रद्दा सुझइस । युवराज अपन देश राज चल दिस जरूर फेर .., ओकत आँखी म घुरुवा बसगे । युवराज के मन .. घुरुवा म लगगे । दूनों के अऊ मुलाकात म .. युवराज ला पता लगिस के .. घुरुवा गरीब के बेटी आय । युवराज सोंचिस .. येला बिहाव करहूँ कहि देहूँ तब ...रानी माता नइ स्वीकारही ... ।राज के मंत्री ला समस्या बतइस ... बात राजा तक अमरगे । राजा हा घुरुवा ला बहू बनाये बर .. अऊ रानी ले हुँकारूँ भरवाये बर .. घुरूवा के दई ददा ला बड़े आदमी बना दिस ..। घुरूवा के जनम स्थान म ... घुरुवा अऊ ओकर परिवार बर .. बड़े जिनीस महल बनवा दिस । ओकर ददा ला ... अपन आधा जमींदारी दे दिस । कुछ समे म .. बिगन बिघन बाधा के .. धूमधाम से .. राजकुमार संग घुरुवा के बिहाव निपटगे । 

दाना दाना बर तरसत .. गोदरी कथरी के दसना दसावत .. छितका कुरिया म जिनगी पोहइया .. मनखे मन .. घुरुवा बेटी के परसादे .. जमींदार बनके .. राजकुमार के सास ससुर कहाये लगिन। ऊँकर दिन सँवरगे । कचरा काड़ी गोबर खातू हगना मुतना म पटाये घुरुवा हा महल बनके पबरित स्थान होके .. पुजाये लगगे । घुरुवा बेटी हा रानी बनके राज करे लगिस । एक घुरुवा हा .. दूसर घुरुवा के किस्मत बदल दिस .. तब गाँव के सियान के मुहुँ ले .. ये बात ला कोन रोक सकही के .. सबके दिन बहुरय .. जइसे घुरुवा के दिन बहुरगे .......।  

        हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा.

Sunday 9 June 2024

रूपिया के दुख

 रूपिया के दुख


पहिली घाँव रूपिया ला रोवत देखिन लोगन । जंगल म आगी लगे जइसे खबर बगरगे ।   कतको झिन ला विश्वास नइ होइस । सचाई जाने बर कतको मनखे बेचेन होए लागिन । सरी दुनिया ला अपन तमाशा अउ करतब ले रोवइया ल ....उदुप ले रोवत सुनना अउ देखना अचरज अउ सुकुरदुम होए के विषय रिहिस । जम्मो सोंचे लागिन काबर रोवत होही रूपिया हा ....? काए बिपत्ती परे हे ओकर उप्पर । सकलागे उही जगा म कतको मनखे । रूपिया ला मुहुँ तोपे देख … पूछे लागिन । एक झिन किहिस - काए पिरावत हे तेमा .. डेंहक डेंहक के रोवथस ? रूपिया रोतेच रहय । बड़ किरोली के पाछू तैयार होइस बताए बर । रूपिया हा केहे लागिस - मोला गिर गे .... गिर गे ..... कहि के घेरी बेरी बदनाम करथव अउ पूछे ला घला आथव ? तूमन ला थोरको लाज शरम नइये ? जम्मो सकलाये मनखे मन हाँसिन अऊ केहे लागिन - हमन तोर संग कहीं कुछु होगिस होही सोंच के आए हाबन । गिरथस तेला.. गिर गे केहे म.. काए लाज ? ऐमे रोए के का बात हे । रूपिया किथे- उहीच ल बतावत हँव भई । मेंहा गिरत रहिथँव फेर उठत घला रहिथँव का ...... ? आज तुँहरे संगवारी हा गोठ गोठ में मोला ..... नेता कस गिर गे रूपिया हा ...... कहि के बदनाम कर दिस । इही बात हा मोर छाती म बाण मारे कस लागिस ।ओकरे पीरा के मारे बेचेन हो के रोवत हँव ।

एक झिन किथे -बने तो किहिस । तेंहा वाजिम म नेता कस गिरथस ..... ऐमे गलत कहींच निये । रूपिया हा अउ गोहार पार के दंड पुकार के रोए लागिस । लोगन मन ब‌ड़ समझइस । थोरकिन बेरा म शांत होए के पाछू भावुक होके रूपिया हा केहे लागिस - मोला चाहे चोट्टा मन कस गिरे समझ लौ ..... चाहे बईमान कस .... चाहे बईजात कस .... चाहे झुठल्ला धोखाबाज लबरा कस गिरे समझ लौ .... फेर नेता कस गिरे झिन समझौ । चोट्टा कभू न कभू पछताथे । बईमान ल ओकर हिरदे कभू न कभू धिक्कारथे। बईजात सतसंगत के असर म कभू न कभू सुधरीच जथे। अउ झुठल्ला धोखाबाज लबरा मनखे .. सजा पाके फेर सोज रद्दा मरेंगे ल धर लेथे । फेर कोन जनी नेता ला कते माटी म गढ़हे हे भगवान घला । न वोहा कभू पछताए । न होकर हिरदे ओला कभू धिक्कारे । न कभू सतसंग के असर म सुधरे । न सजा पाके लबारी मरई अउ धोखा देवई बंद करय । 

 रूपिया हा मनखे मन ला अपन जान के बताये लागिस - मेंहा गिरथों जरूर फेर उठ घला जथँव । अउ ये नेता मन केवल गिरथें .. उठे निही । अइसन मन संग मोला संघेरहू त मोर हिरदे म कतका छेदा होए होही अउ ओहा कतका पिरावत होही तेला मिही जानहूँ । इही क्लेश मोला रोवावत हे । एक ठिन बात अऊ बतावँव ...... मेंहा गिरँव निही बलकी गिराए जाथँव । तभो ले .. गिरत गिरत घला .. मोला गिरवइया के भला घला कर देथँव। जबकि नेता मन अपन ले गिरथें अउ जतका घाँव गिरथें.... अपनेच सुख बर गिरथें अऊ दूसर ल दुख पहुँचाए बर गिरथें । जेमन सत्ता के खुरसी ऊप्पर गिरथें तेमन देश ला फोंगला करथें । जेमन धरम के खुरसी म गिरथें तेमन जनता के आस्था ल मुसेट के मार डारथें ।जेमन समाज के खुरसी म गिरथें तेमन भई भई ला लड़ाथें घर घर ल टोरथें । में कोन्हो ला गिरावँव निही हमेशा उठाथँव .... खड़ा करथँव । फेर येमन कोन्हो ला उठाए निही केवल उठाए के नाटक करथें । एमन कोन्हो ला खड़ा होवन नइ दे । अउ उठाथें केवल गिराए के मजा ले खातिर । एक ठिन बात अउ .... में गिरथँव त बड़ मुश्किल ले चलथँव ...... फेर ये मन जतका गिरथें ततके जादा चलथें ।  

एक झिन किथे - अइसन म तोला खुश होना चाहि के तोर तुलना अतका चलने वाला मनखे संग होवत हे । उहू बड़े ..... तहूँ बड़े । रूपिया किथे - निही भई में बड़े नोहों । में छोटे ले छोटे मनखे के पछीना के गरमी ले उपजे हँव। अउ येमन एसी कूलर के ठंडा म जनम धरे मनखे आए । एक झिन मनखे हा फेर चुट ले मारिस - फेर तिहीं ह येमन ल अउ बड़े बनाए हाबस जी । रूपिया किथे- में कहाँ बड़े बनाए हँव । एमन ला तुँहर वोट के ताकत बड़े बनइस । एक झिन सुजान मनखे किथे - फेर ये वोट तोरे हिम्मत ले खरीदे अऊ बेंचाथे यार । रूपिया बड़ दायसी ले केहे लागिस -ये सोलह आना सच आए । मोरे ताकत अउ हिम्मत ले येमन वोट ल खरीदथें अऊ खुरसी पाके अपन स्वार्थ पूरा करथें । फेर यहू गोठ ओतके सच आए के .. बेंचाये अऊ बिसाये के बूता ल येमन अपन संग मोला गिरा के करथें । जे खुद नइ गिर सकय अऊ मोला गिरा नइ सकय अऊ मोला गिरत नइ देख सकय ...... वो मनखे वोट नइ खरीद पाय अउ राज नइ कर सकय । 

थोकिन पानी घुटकके लम्भा साँस भरत रूपिया केहे लागिस - एक आखिरी बात अऊ बतावत हँव ....... मेंहा जेकर संग रेंगथँव या चलथँव तेकर उद्धार कर देथँव जबकि ये मन जेकर संग रेंगथे या चलथे तेकरे गोड़ ल टोर के खोरवा लंगड़ा बना देथे । में जेकर पीछू रहिथँव या परथँव तेला मंडल अऊ धनवान बना देथँव अउ एमन जेकर पीछू परथें तेकर दुर्दशा निश्चित हे .... वोला स्वर्गवासी बनाके दम लेथें । अइसन संग मोला काबर संघेरथव ?  ये हा न्याय आए का ?

रूपिया बड़ गोठिया पारिस । दूसर दिन समाचार म छपगे । नेता मन भड़कगे । बइठका सकलागे । निंदा प्रस्ताव पास होगे । रूपिया के बहिष्कार कर दिन । थोरकुन दिन म ... ये रूपिया नंदागे अउ चलन ले बाहिर होगे । एकर जगा करिया रूपिया ( काला धन ) प्रचलन म आगे ।

      हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा .

नौतप्पा म धरती नइ तिपय त का‌ होथे ?

 नौतप्पा म धरती नइ तिपय त का‌ होथे ?


दू दिन मूसा कातरा, दू दिन टिड्ढी ताव।

दू दिन पाछू जल हरय, दू विषधर दू वाव।।

माने नौटप्पा म पहिली दू दिन तक धरती म गरमी (लू) नइ चलय, त धरती म अब्बड़ मुसुवा अउ फसल ल नुकसान करइया कीरा- मकोरा (कातरा) बाड़ जथे। अगला दू दिन तक गरमी नइ परय, त टिड्ढी, फांफा अउ पतंगा मन के अंडा ह नाश नइ होवय अउ बुखार लवइया जीवाणु- कीटाणु मन नइ मरय। अगला दू दिन तक गरमी नइ होवय, त सांप- बिच्छी,  जहरीला जीव-जंतु मन अब्बड़ पनपथे अउ ककरो काबू म नइ आवय। अगला दू दिन तक गरमी नइ होय ले अँधउर गरेर आथे, पानी टिपकथे। जेकर ले अवइया बरस म दुकाल परे के संभावना रइथे। 


अशोक धीवर "जलक्षत्री"

( पेंटर, मूर्तिकार अउ साहित्यकार /छंद साधक )

तुलसी (तिल्दा-नेवरा)

परलोभन पत्र"

 "परलोभन पत्र"

         कतनो बेरा लेड़गा ल लेड़गा कहना घलो उटपुटांग लगथे।काबर कि लेड़गा दूं किसम के होथे, एक दिमाग ले दूसर नाम के।हमी ल हमर काकी मन कोंदा काहय भले हमर मुहूं आज ले चलत हे।कतको बेरा लेड़गा मन के हाजिर जवाबी देवई बड़ मुश्किल रहिथे। दिमाग ले लेड़गा पूछ परिस आज आजादी के अमृत महोत्सव मनाय के बाद घलो नेता मन सड़क, बिजली, पानी बर चुनाव लड़त हे भईया ।इही ह त ऊंखर बुता (धंधा) आय रे लेड़गा।अऊ ये हर ऊंखर जनम सिद्ध अधिकार आय।अऊ विकास के डोंगा हर ऊपरे ऊपर तंउरथे ।कतरो जगा सड़क घलो बनथे फेर चांटी के रेंगे ले उखड़ जथे त बिचारा मन के का दोष हाबे,वो तो चांटी ल चाही न नवा सड़क ले दूरिहा घूंच के रेंगय।हमन तो इक्कीसवीं सदी म हन रे लेड़गा इंजिनियर मन डामर गिट्टी के मात्रा ल पूरा 'क्वालिटी 'के संग नाप तउल के डलवाथे,एको कन करिया आईल कस नी लगे।लईका राहन त डामर गिट्टी चप्पल म लटके त काड़ी म कोचके म कतिक मजा आय। 

         बिजली पानी के घलो उही किस्सा आय रेंगत हे पैदल यात्री कस।यहू मन हिता (रुक)जथे रद्दा म रेंगत- रेंगत डोंगरगढ़ के उड़नखटोला कस।ये मन ल जनता के दुख पीरा देखे नइ जाय।थोकिन गरेरा म घलो बिजली आंखी मुंद लेथे।कहईया मन तो काहत रहिथे बिजली के बिल हाबे हाफ युनिट के पईसा ल बड़हादे रद्दा हाबे साफ।

   लेड़गा काहय सुने हंव नेता मन मन प्रेम -पत्र (पाती)घलो लिखथे? नही रे लेड़गा वो हर प्रेम पत्र नो आय, वो हर "परलोभन पत्र "आय।जईसे कुकर मन ल रोटी के कुटका फेंक के लालच देखाथन।समे के संगे संग इंखरो नाम मन बदलत रहिथे।पहिली येला घोषणा पत्र काहय अब, संकल्प पत्र, न्याय पत्र, गारंटी पत्र होंगे।यहू ल रोजगार गारंटी मत समझबे।जेमा चार इंच कोड़ अऊ दांत ल निपोर।ये मन जस जस चुनाव आथे जनता ल ललचाथे।ये मन तो अईसे गोठियाथे जईसे बवासीर वाले डाक्टर मन परची म छपवाय रहिथे "बवासीर का ईलाज किया जाता है गारंटी के साथ "-वैधराज फलाना -फलाना।

          प्रेम- पत्र पहिली के जमाना म चले रे लेड़गा। अब तो मोबाइल के आय वहू नंदागे।

मोर प्रिय फलानी तै कब आबे, तोर सुरता म सुररत हंव। 'शोले' हर मोर एक ठन सहारा हे।

        तोर फलाना।

       समाचार म पढ़ें रेहेंव रे लेड़गा कोनो काहत हे हमर सरकार आही त गरिबी ल एक झटका म दूर कर देबो तो का अतिक दिन ले राम मंदिर के उद्घाटन ल देखत रिहिस?अतिक अकन रोजगार देबो ताहन बांकी मन भजिया तलही?वईसे चाय वाला मन घलो जब्बर परसिध (फेमस)हे।चाहे वो डाली चाय वाला राहय,या एम• बी •ए चाय वाला।इही चाय के दम म देश बिदेश घुमत हे। वईसे चाय बेचना कोनो गिनहा बुता ( काम )नो आय।ऐकर बर कोनो डिगरी घलो नी लगे।"हर्रा लगे न फिटकरी रंग लगे चोखा "।

          त कईसे बर बिहाव नी करते रे लेड़गा?ये गारंटी के साढ़े साते सनी चलत हे भईया बाई नी मिले। अब उंखरो मन के भाव बाढ़ गेहे।किसम -किसम योजना म महिना पुट पईसा मिलत हे त भाव बढ़नच हे। कोनो काहत हे हजार देबो, कोनो काहत हे लाख देबो तो भाव बाढ़नाच हे। सरकार ल बनाय म इंकरे मन के हाथ बात हे।कहिथे न "नारी ले दुनियां हारी "।हमू ल मिलतिस त कमाय धमाय ल नी लागतिस।कभू के दिन ले यहू हर जिव के काल झन बन जाय।अइसने रही त कभू के दिन ले मरद जात मन ल झाड़ू पोंछा,चौंका बरतन करे के सौभाग्य घलो मिल सकत हे।

              फकीर प्रसाद साहू 

                "फक्कड़ "

               ग्राम -सुरगी

कोरा म लइका ,गाँव भर ढिंढोंरा

 कोरा म लइका ,गाँव भर ढिंढोंरा 

मंडल कहत लागे । बड़ अकन खेती । बड़े जिनीस बारी बखरी । कतको झिन कमइया । एके झिन नोनी लछवंतिन । दिखम म बड़ खबसूरत । फेर एक ठिन काम के न बूता के । बड़ जांगरचोट्टी ... दिन भर छलरिया मारत घूमत रहय । उही गाँव म रामू नाव के मनखे रहय । मंडल घर के सबर दिन के नौकर , ओकरो एके झिन बेटा मंगलू । बड़ होनहार । जे करा के भुंइया ल कमा देतिस , सोना उपजतिस । अतका मेहनती के , परिया परे टिकली भाँठा तको ल , उपजाऊ बना डरे रहय । ओकर हाथ में कोन जनि का जादू रहय के , जे काम ओकर हाथ म आय , चुटकी म सिरा जाय । जतका जमगरहा कमइया , ततका आदत बेवहार म सुघ्घर । तिर तखार तक म ओकर बड़ नाव रहय ।

लछवंतिन सग्यान होगिस । ठँई के गाँव म रहवइया गौंटिया के बेटा बर , अपन बेटी के बिहाव के प्रस्ताव रखे के सोंचिस । गाँव के पटिला हा मंडल ल समाझावत केहे लगिस - रामू के लइका मंगलू ल छोंडके , तेंहा काबर दूसर जगा खोजे बर जावत हस । मोर नोनी सग्यान होतिस ते , दूसर डहर झाँकतेंव तको निही । मंडलिन किथे – अई कमइया खवइया नौकर घर देबो तेमा हो , अपन लइका ल । दुनिया म अकाल परगे हे का .. ? फूले फूल म रहवइया , कइसे रही बम्बरी कांटा कस जगा म .. । भले मोर बेटी जिनगी भर कुंआरी रहि जही , फेर नि दँव ओकर घर । 

गौंटिया के बड़े बेटा संग रिश्ता के चलत बात , सुन डरिस लछवंतिन । ओकर मन तो मंगलू म बसे रहय । सगा आय के तैय्यारी म किसिम किसिम के खाये पिये के समान चुरे लागिस घर म । उचित मुहूरत देख रिश्ता पक्का करे बर गौंटिया हा बेटा संग पहुँचगे । लछवंतिन हा पानी धरके नि निकलिस  । मंडल केहे लगिस– लजावत हे नोनी हा । खाये बर बइठगे सगा मन । परोसे बर हाँक पारिस । लछवंतिन तभो नि निकलिस । कुरिया म जाके देखिन, करम फाटगे ....... । लछवंतिन हा खिड़की डहर ले कूद के भागगे रहय । मुंधियार होवत ले गाँव भर पता चलगे । रामू के बेटा मंगलू अऊ लछवंतिन के भगई ला सब जान डरीन । रामू के कुछ नि बिगड़िस ... मंडल के नाक कटागे । 

रामू कुछुच नि बता सकिस । रामू हा ओकर घर के बहुत विश्वासपात्र नौकर रिहिस । ननपन ले कमावत रिहिस । बाहिर भितर सबो डहर बेरोकटोक ओकर आना जाना रिहिस । घटना के पाछू बपरा हा मंडल के घर आवय जरूर फेर कोई ओकर संग न गोठियाय न बताय ... । चार दिन अइस .. कोई ओकर कोति निहारिन निहि । बिहान दिन ले रामू घला ओकर घर जवई बंद कर दिस । उही दिन मंडलिन के गहना गूठा चोरी होगे । बिन खोजे - परखे , चोरी के इलजाम रामू के ऊप्पर लगा दिन । रामू के घर खाना तलासी करे गिस .. पइन कुछु निहि तभो ले ओला चोट्टा अस कहिके गाँव म भारी डांड़ बोड़ी लगा दिन । मंडल घर के बूता छूटगे । बीमार परगे । बछर नहाकगे । खेती किसानी के दिन लकठियागे । ददा के बीमारी अऊ अपन माटी के प्रेम हा मंगलू ल परिवार सुद्धा ,गाँव लहुँटे बर मजबूर कर दिस । बहू बेटा अऊ नाती पाके खुश रामू हा , मंडल करा , मिले आये के संदेशा भेजिस । मंडल तरमरागे । फेर महतारी के मन कहाँ माढ़ही ..। साग बेचइया ल , दही मही वाली ल , कभू येला , कभू वोला अपन बेटी अऊ नाती के हाल पूछय । कतका बेर , कइसेच भेंट लेतेंव चंडालिन ल .. जी बड़ चुटपुटावय । 

लछवंतिन के मन घला , दई ददा संग मिले बर उदाली लेवत रहय । फेर पहिली के जमाना म जब तक मइके के लेनहार नि आवय , बेटी मइके म पाँव नि दय । तीजा लकठियागे ...। गाँव भर के बेटी बहिनी मन मइके पहुँचे लागिन । दई कलपत हे..... । ददा नी पसीजिस । कलपत दई बिमार परगे । रोवा राही परगे । ददा मजबूर । बेटी ल लेहे जाये के सुनतेच साठ मंडलिन खटिया ले उठ के बइठगे । ठेठरी खुरमी के बैना जोर डरीस । लाजे काने , मंडल पहुँचगे रामू घर ..।  

दई बेटी के मिलन होगे । कतका खवा डरतीस , कतका जोर डरतिस , नाती बर का कर डरतिस , तइसे होगे रहय जी हा । नाती मड़ियाये लइक होगे हे । पानी बरसत हे । इड़हर साग रांधे बर दार फिजो डरीस , पहटनिन दार पीस के चल दिस । महतारी बेटी गोठियावत , गोरसी तापत , कोचई पान के अगोरा म बइठे रहय । बेरा ढरत देख मंडलिन खुदे बखरी कोती रेंग दिस पान बर । 

अई बने बने या काकी ......., बाहिर म कतको तिजिहारिन मिलगे । चरबत्ता म समे नहाकगे , दिया बाती के बेरा होगे । लकर धकर पान टोर के घर पहुँचिस, पाछू पाछू मंडल घला घर आगे । लछवंतिन आगी तापत बइठे बइठे उंघावत रहय , लइका कोरा ले गायब ..... । लछवंतिन ल उठा के पूछे ल छोंड़ , लइका के खोज शुरू होगे । गाँव भर खोजा खोज मातगे । 

गाँव म खोजत , रामू घर पहुँचगे । लइका ल चोरा के लाने होही कहिके , ओला गारी बखाना कर डरिन । एती घर म , नोनी उचिस । महतारी ला घर म नइ पाके  संझा के दिया बार , दिया देखाये बर , खोली म  निंगिस , फूला तिर भुँइया हा गिल्ला लागिस । निहरके देखिस , लइका पेटी के सेंध म सुते रहय । धरके बाहिर निकल गिस , अऊ दई ल अगोरत गौरा चौंरा म बइठ , लइका ल गोदी म धरके खेलाये लागिस । मंडल घर गाँव भर के मनखे सकलाए लगिन , ओमन देखथे , लइका लछवंतिन के गोदी म खेलत रहय । लछवंतिन बताइस के , पेटी के सेंध म खुसरे अपन हाथ म एदे पोटली ल किड़किड़ ले धरे सुते रिहिस , येला हेर के नी देखे हँव काये तेला .....। पोटली ला तुरते हेर के देखिन ... सोन चांदी के गहना गूठा ... । सबो मुहुँ ला फार दिन । लछवंतिन के दई किथे - अई हाय ... कते करा पाये बइरी तेंहा एला । येहा उही गहना गूठा आये बेटी , जेकर चोरी के इलजाम म , तोर ससुर , बइसका म अपमानित होये रिहिस । गाँव के पटेल भड़कगे , ओकर ले रेहे नी गिस -  तूमन अपन तिर म खोजव निही , बाहिरे बाहिर टमड़थव । तुँहर घरे म सबो मिल जथे । फोकटे फोकट गाँव भर ढिंढोरा पीट डरथव । जेवर तुँहरे घर म हे अऊ लइका घला तुँहरे कोरा म ।  तुँहरे कोरा म खेले बाढ़े अतेक सुघ्घर लइका मंगलू ला  घला अपना नि सकेव ... बाहिर म दमाद खोजे बर निकलेव ... ओकर काय हस्र होइस ... बदनामी के सिवा काय पायेव ... ? पटेल के बात के समर्थन म कतको हुँकारू भरागे । रामू निर्दोष साबित होगे । मंडल अपन गलती सँवासिस , दमाद ल अपना डरिस , रामू संग समधी जोहार डरिस । कुछ महिना म .. मंगलू हा मंडल के बेटा के भूमिका म आगे .. अब ओहा गाँव के नावा मंडल होगे । बिगन खोजे जाने सुने , बाहिरे बाहिर उपरे उपर टमड़इया मनखे बर पटिला के गोठ “ कोरा म लइका , गाँव भर ढिंढोरा “ हाना बनगे । 

  हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा

दुदपिया के मौज-मस्ती अउ निबंध महेंद्र बघेल

 दुदपिया के मौज-मस्ती अउ निबंध 

                          महेंद्र बघेल 


पढ़इया लइका मन बर परीक्षा म निबंध लिखे के का महत्व होथे वोला उही ह अनुभो कर सकथे जेन ह कभू निबंध लिखे के मजा लूट सके होही। अब इहाँ मजा लूटे के मतलब दही लूटे कस हड़िया फोड़ इन्ज्वाय करे ले बिल्कुल नइहे, भलुक बिना नकल-चकल के निबंध लिखे के पढ़ंतापन ले हे। एक तरह ले यहू कहे जा सकथे कि जनमानस म निबंध के कलेवर ह भाषा के मान-सम्मान ल बढ़ाय के काम करथे। येला पाठ्यक्रम बनइया अउ पेपर छटइया विद्वान मन के महान कृपा कहे म कोनो हरज घलव नइहे। काबर कि इँखरे परसादे निबंध अउ वोकर महापरसाद आवेदनपत्र ह गिरे-परे-हपटे अउ डगमगडोल करत लइका (विद्यार्थी) मन के बैतरनी पार लगाय के काम करथे। सहीच म ये दूनो के नइ रहे ले  कतको विद्यार्थी मन पढ़त-पढ़त बूढ़ा जतिन फेर भासा म पास नी हो पातिन।अइसन बीपीएल वाले मन ल पुलू ढकेले बर निबंध के दस अउ आवेदन के छे नंबर ल न्याय के गारंटी समझ..।भाषा विषय के निबंध संग दस अउ बारा नंबर के गहरा नाता हवय। हमर जानत म निबंध ह येकर ले कभू पार नी पा सके हे अउ भविष्य म कोनो गुंजाइश घलव नी दिखे।

         जती देखबे तती देश के चारो मूड़ा म निबंध के जलवाच-जलवा दिखत हे। ये निबंध ह परीक्षा अउ साहित्य जगत म अपन उपस्थिति दरज कराके ग्लोबल तरीका ले न्यायपालिका म घूसरत एकतरफा धाक जमाना शुरू कर देहे।कभू-कभू तो अइसे लगथे कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के जज साहेब ह निबंध म नहावत-अचोवत होही का..।तभे तो वोकर मगज म देवता खेले बरोबर निबंध लिखवाय के भूत सवार होगे हे। दुनिया जहान ह जानथे कि तब ले लेके अब तक परीक्षा म निबंध के दस नंबरी प्रश्न ल हल करे के जरूरत पड़थे। फेर आजकल निबंध के सेती दू-दी झन ल एक्सीडेंट करइया रईस के बिगड़े बेवड़ा औलाद ऊपर रहम करई ह समझ ले बाहिर हे। सेटिंग के कमाल अइसे कि जज साहेब ह जजमेंट देय बर न्यायपालिका म अपन बायोलॉजिकल उपस्थिति ल नकारात अवतारी महामानव बरोबर एवमस्तु कहिके निबंध ले धांसू अनुबंध कर डरिस।

         एक समय अइसे घलव रहिस जब हमर पड़ोसी गांव के भुखऊ ल खीरा चोरी के आरोप म हप्ता भर ले अंदर रहे के संग साल भर ले पेशी खटना पड़िस। रद्दा चलत धनवा के साइकिल म मनवा के कुकरी ह रेताके आंखी ल नटेर दिस।कुकरी के अनचाहे मर्डर के आरोप में धनवा ऊपर अइसे धारा लगिस कि धारे-धार बोहागे अउ जुर्माना म वोकर कनिहा-कुबर ह टेड़गागे।पता नइ खीरा अउ कुकरी के केस म फैसला देवइया जज साहेब मन ह कोदो देके पढ़े रहिन ते का देके पढ़े रहिन उही मन जाने। फेर ये मन भुखऊ अउ धनवा ले,न तो नानकुन निबंध लिखवा सकिन न आवेदन पत्र..। इहाँ ले लेके उहाँ तक हमर देश म भूखऊ अउ धनवा जइसे जुच्छा जेब वाले ठनठन गोपाल मन ल आज घलव पेशी म रगड़ावत अउ पीसावत अपन आँखी म देख सकथो।

            ये तो पुणे जैसे शहर म जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के किस्मत आय जिहाँ ऊपर वाले के कृपा ले निबंध ह उहाँ के जज जैसे अवतारी पुरुष के झोली म आके गिर गे।नइते आदरणीय निबंध जी ह उही परीक्षा के पेपर म आठ-दस नंबर के भरोसा म अपन ऐसी तैसी करवात रहितिस।अवयस्क अउ रसूख के नाम म नाच नचावत बारवीं पास मंदहा रईसजादा ल निबंध के आड़ म बरी करे के फैसला ह तीसरा अउ चौथा खंभा के खाल्हे म खलबली मचा के रख देहे।मोटहा भासा म कहे जाय तो पढ़इया लइका मन बर निबंध के मतलब गाय, मेरी पाठशाला, विज्ञान के चमत्कार, राष्ट्रीय पर्व ,महापुरुष,होली अउ दीवाली जैसे शीर्षक ले भला हवय। फेर भुक्तभोगी भुखऊ अउ धनवा मन अपन अंतस के पीरा ल कोन ल समझाय..। तीन सौ शब्द म निबंध लिखे के खबर ल जब ले सुने हे तब ले येमन मनचलहा कस होगे हें। कुछु-कहीं गोठियाय के उदीम करथें फेर उनकर मन के बात ह मने म चभक जथे।

             संविधान म कानून के धारा ह सब बर एकसमान होथे। वो अलग बात आय कि ये धारा के प्रभारी मन नोट के बंडल के आगू म धारा के दिशा ला बदले बर विशेष रुचि लेवत अपन टुच्चईपन के खुलेआम प्रदर्शन कर देथें।जिनकर माथा म रहिसी के जलवा नइ रहय उनकर नानुक गलती म धारा के ऐसे बौछार हो जथे कि वोकर जिनगी ह धारेधार बोहावत बेअधर हो जथें।जिनकर हस्तक अउ मस्तक के भाग्य रेखा म पोर्श लिखाय रहिथे उनकर सोर्स ह कहाॅं-कहाॅं दस्तक देवत होही तेकर अंदाजा आप खुदे लगा सकथो।

          तेकरे सेती कहे सुने बर मिल जथे कि कानून ह अमीर मन के जेब म रहिथे। कोर्ट के खईरपा ल संडे के दिन खुलवा लेना, डॉक्टर के परखनली ले खून के सैंपल बदलवा देना अउ तीन सौ शब्द म एक्सीडेंटल निबंध लिखवाना ह रसूखदार मन बर कन्हो भारी बात नोहे। पुलिस, डॉक्टर अउ जज ले लेके पता नहीं कोन-कोन ल सेट करे बर कतिक- कतिक रेट देना पड़े होही ते..। पैसा के असर म बिगड़े मंदहा टूरा (दुदपिया) के समाचार ल छापे बर दू-तीन दिन ले अखबार के स्याही ह अपने-अपन सूखागे रहिस। पीरकी ल घोर-घोर के घाव बतइया बकबकहा टीवी एंकर मन के बक्का नी फूटत रहिस। भला होय जनता जनार्दन के.., जिनकर जागरूकता के सेती ये बिकाऊ कंपनी के हटहा माल मन के हलवा टाइट हो सकिस।

              पता नइ हमर देश के मनखे मन के खोपड़ी के डिजाइन ह कते साँचा म ढलाय रहिथे..।एक डहर येमन अपन हक-अधिकार बर रपेट के लड़ना जानथें त दूसर डहर बड़े- ले-बड़े मामला ल लघियाँत भुलवार घलव डारथें।एक तो लापरवाही के कारण होय दुर्घटना अउ उपर ले प्रशासनिक ढिलाई ह जनता के अंतस म गुस्सा ल भर देथे। तुरते ताजा मामला म खखवाय -गुस्साय जनता ह जोशे -जोश म कैंडल मार्च घलव निकाल लेथें। फेर जैसे-जैसे मामला के उपर समय के परत चढ़त जथे सबे जोश-खरोश ह अपने- अपन ठंडा पड़ जथे।जनता-जनार्दन म इही जोश (एकता) के कमी ल रसूखदार मन बिलई ताके मुसवा कस जोहत रहिथे। मउका मिलते साट ये रसूखदार मन अपन पाढ़ू मन ले उल्टा-सीधा काम ल सीध करवई लेथें।मौजमस्ती करत बिगड़े औलाद ह चाहे दारू पिये, अपन गर्लफ्रेंड संग रंग-झांझर मताय, दू सौ के रफ्तार म अँखमुंदा कार चलाय तभो ले वो कानून के नजर म दूदपिया लइका आय।व्यवस्था के इही आत्मघाती झोल ह रसूखदार मन के परवरिश के पोल ल दबाय बर टानिक के काम करथे। हे जज महोदय.., दारू पीके दू झन ल कार म कुचले के अपराध म काश तँय पंद्रह घंटा म बरी करे के जगा म वो बेवड़ा टूरा ल तीन लात जमाके ओइला दे रहितेस..। तब तोर खुरापाती खोपड़ी म तीन सौ शब्द म निबंध लिखवाय के नौबते नइ आय रहितिस।


महेंद्र बघेल डोंगरगांव

धोबी के कुकुर न घर के न घाट के

 धोबी के कुकुर न घर के न घाट के 


रतनपुर के राज खानदान म एक ले बढ़के एक प्रतापी राजा होइन । राजा के संगे संग रानी के घला सुरक्षा बेवस्था मजबूत रहय । अइसने एक काल म एक झिन रानी के सुरक्षा म दरोगा लगे रहय । रानी के नजदीकी होय के कारन दरोगा के अबड़ दबदबा रहय । ओकर हुकुम के पालन बर मनखे मन , राजाज्ञा कस जी जान लगा देवय । ओकरो सरी बूता हा फोकट म हो जाय । 

उही समे के बात आय । रतनपुर म एक झिन लच्छू नाव के धोबी रिहिस । राजमहल के सरी मइलहा कपड़ा ला धोय के जुम्मेवारी ओकरे रिहिस । लच्छू धोबी तिर एक ठिन गदहा अऊ कुकुर रिहिस । धोबी हा गदहा के उपर महल के कपड़ा लाद के तरिया लेगे । काँचे कपड़ा ला तरिया पार म सुखाये बर बगरा देवय जेकर रखवारी कुकुर करय । कुकुर ला धोबी हा अपन संग म राजमहल तक रोज लेगे तब रानी हा राजमहल के जूठा ला धोबी के कुकुर बर पोटली बना के दे देवय । कुकुर हा राजसी भोजन ला तरिया पार म सुखावत कपड़ा तिर बइठके छक के खा डरय । रोज रोज के हाड़ा गोड़ा मछरी कोतरी खा खाके कुकुर हा मोटागे रहय । दरोगा के घर के कपड़ा ला घला लच्छू धोबी हा रनिवास कस बड़ इज्जत से रोज लेगय अऊ धो सुखाके असतरी करके सांझ तक अमरा देवय ।   

एक दिन बिहिनिया ले लच्छू धोबी हा जइसे कपड़ा लाने बर रनिवास गिस तइसने पता चलिस के रनिवास म चोरी होगे । रानी के बहुत अकन गहना गूठा हा गायब रहय । राजमहल म हड़कम्प मातगे रहय । धोबी हा अंगना म धोवाये बर बाहिर निकले कपड़ा ला कलेचुप धरके निकले लगिस तइसने म , रानी हा धोबी ला देख परिस तहन , अपन नावा लुगरा ला भितरि ले निकालत धोबी ला विशेष हिदायत देवत किहिस के , येला धियान से धोबे । येमा रातकुन साग के फोरी गिरगे , रसा चुचुवागे अऊ दाग लगगे । धोबी हा मुड़ी हलावत लुगरा ला लपेट के अलग से धरिस अऊ गदहा म लादके कुकुर संग तरिया कोती सुटुर सुटुर मसक दिस । जावत जावत दरोगा घर झांकत गिस त , दरोगा के घर म तारा संकरी लगे पइस । ओ दिन जादा कपड़ा नइ रहय । तरिया पहुंचके धोबी हा कपड़ा ला गदहा के पीठ ले उतारके पार म मढ़हा दिस अऊ मुखारी घसरत रनिवास म होय चोरी के बात ला दूसर घाट म नहवइया गाँव के अपन संगवारी मन ला बताये लगिस । 

धोबी के कुकुर हा रोज के राजसी जूठा खाये मारे टकरहा रिहिस । ओ दिन रनिवास ले कुछु नइ मिले रिहीस । तभे कुकुर के नजर हा पोटली म परिस । ओहा पोटली ला सूंघिस । ओकर नाक म बोकरा मांस के गंध खुसरगे । मालिक हा दे बर भुलागे होही सोंच के कुकुर हा पोटली ला छोर डरिस । नानुक हाड़ा लटके रहय । ओला हेरत ईंचत रानी के नावा लुगरा फरफर ले चिरागे । तब तक मुहुँ कान धोके धोबी पहुँचगे । कुकुर के हरकत देख धोबी तिर मुड़ी पीटे अऊ करम ठठाये के अलावा कुछ नइ बाँचिस । एक तो रनिवास म उही दिन चोरी होय रहय उपर ले रानी के नावा लुगरा चिरागे ....... धोबी हा अवइया परिणाम के कल्पना ला सोंच सोंच के जोर जोर से रोय लगिस । कुकुर ला कोटेला कोटेला अतका छरिस के कुकुर खोरवा होगे । 

सांझकुन कपड़ा धरके धोबी हा रनिवास पहुँचिस तब ओला पता चलिस के , रानी के गहना गूठा के चोरइया मिलगे । रनिवास के दरोगा हा चोरी करे रहय । भागे के तइयारी म पकड़ागे । राजा हा बहुत दयालु रहय । फेर अइसन चोर हा समाज के दुश्मन आय कहिके , दरोगा ला राज के सरी सुभित्ता ले पाँच बछर बर वंचित कर दिस । घर भितरि कपड़ा अमराये बर पहुँचे , धुक पुक धुक पुक करत लच्छू हा , अंगना म बइठे रानी ला देखते साठ , रानी के डंडासरन होगे । बहुत मुश्किल ले किस्सा सुना सकिस अऊ अपन गलती ला घला आसानी ले स्वीकार करत , अपन नान नान नोनी बाबू के जिनगी के दुहाई देवत , रानी तिर माफी उपर माफी के याचना करे लगिस । धोबी के काँपत देंहें , थरथरावत जबान अऊ धारे धार बोहावत आँसू ला देख सुन , रानी के हिरदे पसीजगे । वइसे भी रानी हा अपन चोरी गे गहना गूठा के वापिस मिले ले खुश रहय । ओहा तुरते धोबी ला माफ कर दिस । रानी हा बहुतेच घुस्सेलहिन रिहिस तेकर सेती , धोबी हा कल्पना नइ करे रिहिस के ,आज ओकर जीव बाँचही । मने मन भगवान ला धन्यवाद देवत अऊ रानी के प्रणाम करत धोबी हा अपन घर आगे । फेर कुकुर ला अपन घर म खुसरन नइ दिस । 

चोट्टा दरोगा हा रानी के बहुतेच नजदीकी रिहिस तेकर सेती , राज भर म ओकर बहुतेच दबदबा रिहिस । फेर चोरी पकड़ाये अऊ दंड पाये के पाछू , ओकर मान सन्मान एकदमेच गिरगे । सामाजिक बहिस्कार के सेती ओकर घर के नौकर मन काम छोंड़ दिस । नाऊ हा साँवर बनाये बर मना कर दिस । रऊत छोंड़ दिस । पहटनिन हा गोबर कचरा करे बर मना कर दिस । धोबी हा कपड़ा काँचे ले इंकार कर दिस । गाँव म कन्हो बइठ घला नइ कहय । दरोगा हा एक कनिक के लालच म , अपन सरी इज्जत ला खो डरिस । जेकर तिर जातिस तिही दुतकारतिस ।गाँव के सियान मन लीम चौंरा म बइठके पासा खेलय त , दरोगा ला चौंरा म जगा तक नइ मिलय । बपरा हा टुकुर टुकुर देखत ताकत रहय । 

देखते देखत चौमासा आगे ।अपन बलबूता म , पहिली घाँव खेती कमावत दरोगा के रगड़ा टूटगे । फोकट के खाये मारे टकराहा दरोगा के देंहें , चार महिना म हाड़ा हाड़ा होगे । खेती किसानी के समे नहाके के पाछू , राम बाँड़ा के तिर , कन्हो के पुछे के आस म सियान मनके मुहुँ ताकत , धीरे धीरे रेंगत जावत दरोगा ला , गाँव के कतको झन चिन नइ सकिन । पाके चुंदी , बाढ़हे डाढ़ही अऊ मइलहा ढिल्लम ढोल्लो कपड़ा म , पातर दुबर जुन्ना दरोगा ला देख , कुछ मन ओला मंगइया भिखारी समझिन । ओला देखके दूसर चौंरा म खजवात बइठे धोबी के खोरवा खर्रू कुकुर तको , भुँकत ओकरे कोती दऊँड़े बर धर लिस । है है घुच घुच .. कहत .... जुन्ना दरोगा हा हांथ म धरे कुबरी लउड़ी ले कुकुर ला हुदेरे लगिस । तब ओकर अवाज सुन लोगन ला पता चलिस के , येहा जुन्ना दरोगा आय । ओकर नहाकते साठ , गाँव के मनखे मन आपस म , जुन्ना दरोगा म चारे छै महिना म आये अंतर के बारे म गोठियाये लगिन । तभे लइका मन के ढेला ले आहत काँय काँय करत खर्रू कुकुर ला देख गाँव के एक झिन सियान कहे लगिस - न कन्हो पारा म पूछय .. न गाँव म ... त अइसन हालत तो होनाच हे । बिलकुल धोबी के कुकुर कस होगे हे , जेहा आजो कभू घर के दुवारी म लुहुर टुपुर करत रहिथे ... कभू घाट म पुछी हलावत प्रेम के आस म ताकत रहिथे । खाना तो दूर बलकी दू टेम्पा ये घर म पाथे त चार ओ घर म ... । का करबे भइया ..... करनी के फल ला तो इहीच जनम म भोगेच ला परथे गा । 

अपन करम दंड ला भोगइया अनपुछना बहिस्कृत त्याज्य मनखे बर , धोबी के कुकुर न घर के न घाट के ..... जनता के मुखार बिंद ले आजो घला मौका मौका म सुने बर मिल जथे । 


हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा

हिजगा पारी (छत्तीसगढ़ी कहानी) कमलेश शर्माबाबू

 हिजगा पारी


(छत्तीसगढ़ी कहानी)


                कमलेश शर्माबाबू


   गाँव गँवई मा बड़ेजक अस्पताल अउ उहाँ पढ़े-लिखे डिगरीधारी डाँक्टर बिकट भाग्य ले मिलथे।जब ले गाँव मा बड़ेजक अस्पताल खुले रिहिस तब ले गाँव अउ आसपास के जनता मन भारी खुश रिहिन।अउ हो न घलो काबर कि वो डाँक्टर कोनो आने डाहन के नहीं ऊखरे गाँव के रामसिंग रजक के बेटा ये।

    कतको झन तो वोला डाँक्टर साहब नहीं वोखर नामे लेके पुकारँय,,,सेऊक डाँक्टर ,,,सेऊक डाँक्टर ।घर के मुरगी दाल बरोबर।नाम से तो वो सेवक राम रजक राहय फेर गाँव वाला मन कब सेऊक बना दीन पता नइ चलिस।

      डाँक्टरी तो कतको लइका मन पढ़िन अउ सीखिन फेर डिगरी लेके कोनो गाँव मा खोले बर तइयार नइ होइन।पइसा के चकाचौंध मा सब शहर कोती बसेरा कर लीन।बड़े-बड़े दवाखाना बना लीन।

   आखिर उनला पढ़ई लिखई के खरचा वसूलना हे, बड़े-बड़े नर्सिंग होम बनाना हे।अउ अतका भर नहीं,,,अपने बरोबर के डाँक्टर डिगरीधारी छोकरी संग बिहाव करना हे।पइसा ह पइसा कमाथे।शहर मा खटाखट,फटाफट,चकाचक पइसा मिलथे।

     फेर गाँव गँवई मा रइही त कहाँ तरक्की कर पाहीं ?अउ इही दकियानूसी सोच के सेती सब डिगरीधारी डाँक्टर मनला शहर जाय के भूत सवार होगे हे।

   कई झन दाई ददा मन अपन डिगरीधारी बेटा मनला गाँव मा या आस-पास के चऊक-चौराहा मा अस्पताल खोले बर किहिन फेर,,,कोनो मूड़ नइ उठाइन ‌!अउ उल्टा नाक मुहु सिकोड़त दाई ददा मनला दू-चार बात सुना दीन,,,हमर लइका मन इहाँ कहाँ पढ़हीं, अच्छा इस्कूल कालेज नइहे,घूँमे बर गार्डन पिकनिक स्पाट नइहे काहत बेलबेला दीन।

    जइसे हजारों कोइला खदान मा एक न एक हीरा मिल जथे वोइसने हजारों मनखे मा कोनो न कोनो अइसे मनखे भगवान जरुर बनाथे जेखर सोंच सब ले अलगे होथे।वो पइसा कम नाम जादा कमाथे।

     उही हजारों मनखे मा राहय डाँक्टर सेवक राम रजक । माँ-बाप के सरवन बेटा सेवक राम एम.बी.बी.एस.डिगरी धरके सीधा अपन गाँव 'बेरा बतर' आ गे।अउ अपन गाँव ल ही जन्मभूमि के संग कर्मभूमि बनावत दवाखाना के शुरुवात करिस।

        बहुत ही कम समय मा वोखर दवाखाना के जघा-जघा शोर उड़गे। बिना फीस के मरीज मनला देखय,कम खरचा मा बढ़िया ईलाज के सेती मरीज मनके लाइन लगे राहय।

    कतका बेर काखर भाग्य बदल जही केहे नइ जा सकय।फेर,, गाँव के एक छोटे घर के लइका भगवान के किरपा ले अतका बड़े डाँक्टर बनगे,,,चमत्कार बरोबर लगथे।शुरु ले होनहार सेवक राम हर कक्षा मा टाप करे रिहिस। बारहवीं साइंस मा तो पूरा जिला मा अव्वल रिहिस।नीट के परीक्षा बिना ट्यूशन करे दूसरा नंबर मा निकाले रिहिस।सेवक ल अउ आगे पढ़ाय बर तो वोखर बाप साफ-साफ नाहना हार दे रिहिस फेर ममा मामी मन अधरे ले उठालिन,,,वोला थोरको भार नइ लगन दीन।    

   कल तक गाँव के एक साधारण सा दिखइया लड़का सेवक राम,,पढ़ते-पढ़त कब अतका बड़े डाँक्टर बनगे पता नइ चलिस।आज दुरिहा-दुरिहा के मरीज मनके वोखर दवाखाना मा तांता लगे रहिथे।

       आज गाँव भर तिहार मानत रिहिन। कोतवाल रात के घलो हाँका पारे हे अउ सुबे ले घलो चिचियावत हे,,,सात बजे ले मतदान चालू होगे हे,,,, सब अपन-अपन वोट डारे बर स्कूल में जावत जाव हो।

        डाँक्टर सेऊक साते बजे जवइया रिहिस फेर का करबे एकझन जचकी वाले इमरजेंसी केस आगे।अइसे-तइसे ग्यारह बजगे। दू-चार झन अउ मरीज ल निपटाइस अउ थोरिक पोंडा समय देख के जल्दी आवत हँव कहिके कम्पोटर मनला चेताइस,,, अउ फटफट-फटफट मतदान केन्द्र पहुँचगे।

      मिडिल इस्कूल मा भारी भीड़, लंबा लाइन लगे राहय।मई के महिना,,,ऊपर ले नवटप्पा आसमान ले आगी बरसावत राहय,,, ४२डिगरी ले उप्पर तापमान सब के मूड़ मा चढ़ के नाचत राहय।सबझन जल्दी-जल्दी वोट डार के घर आय के फिराक मा लगे राहँय।कतको झन अपन-अपन उरमाल अउ पंछा मा रहि-रहि के धुँकत राहँय।

   भारी लंबा लाइन हे भई,,,,येखरे सेती सुबेच ले आवत रेहेंव काहत डाँक्टर सेवक राम पुरुष मनके लाइन मा आघू डाहन जाके खड़ा होगे।

     पाछू डाहन ले एक दमकरहा आवाज आइस,,,,,हमन घंटा भर ले इहाँ आलू छिने बर खड़े हन का जी ? हमन ल बेवकूफ गँवार समझथस का ? चल पाछू कोती लाइन लग।

,,,'आय बर पाछू अउ खाय बर आघू',,,तोरे असन ल कीथे डेड़ हुसियारी,,,इहाँ नइ चले तोर डाँक्टिरी गिरी। रिखी राम के दमकरहा आवाज संग पाछू डहन ले अउ दू-चार झन मुड़पेलवा मनके आवाज आय लागिस।

      तीर मा खड़े एक-दू झन सियान मन टोकिन बरजिन अउ दमकाइन कि,,,अरे मूरख हो तुमन ला थोरको छोटे-बड़े के लिहाज नइहे,,,तुँहर अक्कल मा पथरा परगे हे का? या पैरा- भूषा खाय बर चल दे हे।निच्चट बइला बुद्धि हो जहू का?,,,अरे भई कोनो भी डाँक्टर, मास्टर, अधिकारी, कर्मचारी के हिजगा नइ करे जाय। ईखर कतको काम रिथे, जनता के सेवक होथें,,, ईखर बर लाइन लगाना अच्छा बात नोहय।ईखर समय बड़ा कीमती होथे।कुछु भी बोले के पहिली बने ढंग के सोच ले करव,,कहिके जुन्ना सियान मन समझाय लागिन।

                    फेर मूरख मनला कतका समझाबे।ज्ञानिक ल ज्ञान मारे पखरा ल टाकी,मूरख ल का मारे पखरा अउ लाठी,,,,अकडू मन सियान मनके बात ल अपेल दीन। थोरको धियान नइ दीन ऊपर से चिल्लाय लागिन। आज के लइका मन बर,,, जुन्ना सियान मन कोन खेत के ढेला बरोबर होगे हें।

      डाँक्टर सेवक राम हँसमुख मिलनसार सीधा-साधा सज्जन आदमी रिहिस,फालतू छाप बकवास करना वोला थोरको पसंद नइ आय।फेर कहिथे न खोजइया मन चंदा मा घलो दाग खोज लेथें,,,राम मा घलो दोष देख लेथें अउ कृष्ण मा घलो लांछन लगा देथें,,,त फेर ये सेऊक राम कोन खेत के मूली ये।

        जब ले सेऊक राम के दवाखाना के शोर चारोमुड़ा बगरिस तब ले कईझन कामचोर जलनहा कयराहा मन के छाती फाटगे।अपने-अपन, अपने तेल मा चुरे लागिन। खुद तो दाई ददा मन के ऊपर बोझ बनके ऊखर छाती मा मूंग दरत रिहिन अउ दूसर बर खाँचा  कोड़त राहँय।

   रात दिन डाँक्टर ल गिराय के कोशिश मा कुछ मनखे मन अतका गिरगें रिहिन कि झगरा बर नान-नान ओखी खोजत राहँय।कोनो सीरियस मरीज अस्पताल लावत-लावत पहुँच के मर जाय त फोकटे-फोकट बदनाम करँय।येमा कईझन माछी हँकइया खोद्दा डाँक्टर मन घलो शामिल रिहिन।

   एक इस्तरी (आयरन) चलइया धोबी के बेटा अतका बड़े डाँक्टर बनगे,,,अनदेखना जलकुकड़ा मन के आँखी फूटगे।अउ इही जलकुकड़ा गैंग के सरदार रिहिस रिखी राम उठमिलवा।

     सब के जोर-जोर से आवाज ल सुनिस त दू-झन ड्यूटी मा तैनात फौजी मन दउँड़त आइन अउ रिखी राम ल रोसियावत देख के डाँक्टर ल पाछू कोती लाइन लगे बर ईशारा करिन।

     डाँक्टर सेऊक राम लाइन मा लगे सोंचे लागिस,,,,, येमा तो कम से कम घंटा डेड़ घंटा लगी जही,,,एकेठन बूथ हे चलो कोई बात नहीं फेर सीरियस मरीज आ जही त का होही? फेर मोबाइल घलो अस्पताल मा छूटे हे,इहाँ लाना मनाही हे। येती मतदान घलो एक यज्ञ बरोबर आय ,,,ये प्रजातंत्र के हवन कुंड मा हम सबके आहूति जरुरी हे।

          चलो ठीक हे! भगवान ये मनला एकदिन सद्बुद्धि जरुर दिही। फेर समझ नइ आय,,, एक डाँक्टर बर हिजगा पारी करथें,,अतका संवेदनहीन अउ मूरख कइसे होगे मनखे,,,,अगर आदमी सहीं-गलत,नियाव-अनियाव मा फरक नइ कर पाहीं त अइसने मा भविष्य भयावह हो जही। धरम,करम,सेवा,उपकार सब धीरे-धीरे नँदा जही।

      मने-मन डाँक्टर सोंचत जाय,,, अउ जइसे-जइसे लाइन आघू बढ़य अपनो तिल-तिल खिसकत जाय।

   ,,,,चलो एक घंटा तो गुजरगे,,,अब दस पन्द्रह झन के बाद मोरो पारी आ जही,, काहत मन ल संतोष करत माथा के पछीना पोछे लागिस।

      कोनो ल जब अपन बात में समर्थन मिल जथे त वो फूले नइ समाय अपन आप ल बहुत बड़े लीडर समझथे।रिखी राम उठमिलवा अपन कउँवा मितान मन संग वोट डार के दांत निपोरत,,, मेछा अईठत,,,विजयी मेघनाद बरोबर अकड़त बाहर निकलगे।

    दूसर बर खाँचा खनइया खुद गड्डा मा झपाथे ये बात आज घलो सोला आना सच हे। कुछ देर बाद रिखी राम उठमिलवा बइहा पागल बरोबर चिल्लावत मतदान केन्द्र डाहन पल्ला भागत आवत राहय। एकझन बेटा सोनू आज अस्पताल मा परे सेप-सेप करत हे,,आँखी मा चंदरजोत लगगे हे,,,जेने डाँक्टर ल बइरी मानिस वोखरे अस्पताल मा तड़फत परे हे। 

      देखइया मन बताइन,,,, बिजली के खंबा मा फटफटी सुद्धा टकराय हे त मूड़ सइघोजर फूटे हे,मरहम पट्टी करे के बाद घलो लहू रिसत हे,,कम्पोटर मन कतका चेत करँय,,,डाँक्टर तो इहाँ वोट डारे बर लाइन लगे हे। मोबाइल घलो घर मा छूटे हे।जेन टूरा मन वोला धरके अस्पताल लानिन तेनो मन छोड़ के फरार होगें।एक-दू झन टूरा मन बताइन कि सोनू एजेंट बने हे रातभर अपन सँगवारी मन संग घर-घर दारू बांटे हे। रात दिन के उसनिंदा कतेक ल सइही,,,,झपागे।

     सोनू के हालत ल देख के रिखी राम के जीव छटाक भर होय राहय,,,बइहा बरन होय अपन आप ल दुत्कारत, कोषत, हँफरत जाय अउ बड़बड़ावत जाय,,,,,

     नहीं!,,, नहीं!,,,मोर सोनू ल कुछ नइ होय!

     अउ हो जही त,,,,,,

नहीं! नहीं,,,,सारी दुनिया मोला हत्यारा कइही,,,बेटा के हत्यारा बाप कइही,,,मोर मुँहु मा खखार के थूंकहीं,,, धिक्कारहीं ।

    नहीं! नहीं!मोर गलती के सजा मोर बेटा ल झन देबे भोलेनाथ,,,सियान मन सही काहत रिहिन मही बनमानुख नइ मानेंव,,अगर आज डाँक्टर अस्पताल मा होतिस त मोर बेटा के हालत अतका नाजुक नइ होतिस।घंटा भर ले बेहूश परे हे,येखर बर मैं जुम्मेवार हँव।येमा डाँक्टर के कोनो गलती नइहे,,, वोला तो लाइन मा लगे बर मही मूरख करमछंडा मजबूर करे हँव,,

,,,,, आज तो मँय अपने गोड़ मा कुल्हाड़ी मार डरे हँव,,,मोर बर चारोंमुड़ा अँधियार होगे,,,,

नहीं! नहीं! सोनू तोला कुछ नइ होय बेटा,,,काहत अपटत गिरत मतदान केन्द्र डाहन गिस अउ डाँक्टर के पाँव तरी घोलंडगे।

,,,,मोर बेटा ल बचा ले डाँक्टर साहेब,,,मोर बेटा तड़फत हे डाँक्टर साहेब,,,,मोला माफी दे दे डाँक्टर साहेब,,,जल्दी चलव नइ तो मोर बेटा नइ बाँचही डाँक्टर साहेब काहत भारी गिड़गिड़ाय लागिस।

     डाँक्टर लाइन कोती ल देखिस त बस दू  झन के बाद पारी आगे रिहिस।एक नजर घड़ी कोती देखिस अउ एक नजर रिखी राम कोती देखिस,,,,,,तुरंत फटफटी म रिखी राम ल बइठार के फौरन अस्पताल पहुँचिस फेर का करबे,,,,,,तब तक सोनू के प्राण पखेरू उड़गे राहय।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू

 कटंगी गंडई

जिला केसीजी छत्तीसगढ़ 

9977533375


समीक्षा---

 पोखनलाल जायसवाल: 

मनखे जेकर मन म कखरो बर सहयोग के भाव नइ राहय। अइसन मनखे ल कखरो समय के कीमत अउ ओकर करतब(कर्तव्य) के मरम के पता नइ राहय। या रहिथे त अपन आप ल होशियार समझत उन ल नीचा दिखाय के उदिम करथे।  जुबान म लगाम नइ राखय अउ अनाप-सनाप बोलत रहिथे। सियान मन के बरजई अउ सियानी गोठ ले उन ल कोनो फरक नइ परय। कहूॅं दू-चार झन अपेलहा सॅंघर गे तब तो अउ फालतू च मान।

       अइसने अपेलहा मन के नादानी कब, कइसे अउ कतेक भारी अलहन के कारण हो सकथे? एकर आरो देवत कहानी आय -  हिजगा-पारी।

         पढ़े-लिखे अउ गुणवान मनखे कभू अइसन हिजगाहा अउ अपेलहा लोगन ले बाॅंचे के उदिम करथे। उन मन सफाई देवत विवाद/झगरा-झांसी ले बचना चाहथें। कलेचुप बुता निपटाय के कोशिश करथें। फेर अबुझ मनखे तो आगी लगाय के जतन करत रहिथे। चुनाव घरी तो इॅंकर बुद्धि ह बिनाश करे बर बरेंडी म चढ़े रहिथे। आगू देखे न पाछू , बस बुता बिगाड़ना हे। सज्जन मन के मान-सनमान ले कोनो मतलब नइ। जलनहा अउ कइराहा मनखे मन इही बेरा के अगोरा रहिथे। मन के भड़ास ससन भर कोनो बहाना ले सुनाय ले चुकय नहीं। सिरिफ बिगाड़े के सुध रहिथे। जबकि सज्जन मनखे सदा दिन सब के भला करे के सोंचथे। मन सफ्फा रहिथे। इही सफ्फा मन के सेवाभावी डॉ. सेवक गाॅंव ले पलायन नइ करिन। फेर दू-चार झन रइबे करथे जेन ल कखरो सीधापन घलव नइ भाय। दूसर के मीन-मेख देखे के चक्कर म घर के लइका के लाइन रद्दा के सुध नइ रहय। 

           रिखीराम के संग इही होइस। जवान लइका शराब के चंगुल म फॅंस चुनावी सीजन म दारू बाॅंटत उसनिंदा के चलत खंभा म झपागिस।

        एती डार के चूके बेंदरा सही रिखी पछताय लगिस। अब पछताय का होही, जब चिरई चुगगे खेत। 

       कहानी के भाषा शैली अनुपम हे। प्रवाह अइसे हे कि पाठक ले कहानी पूरा पढ़वा लेथे। हाना-मुहावरा के गजब प्रयोग। संवाद ऑंखी म फोटू खींचत जीवंत लगत हे। कहानीकार पात्र मन के मुताबिक संवाद लिखे म सफल हें।

      " हमन घंटा भर ले इहाॅं आलू छिने बर खड़े हन का जी? हमन ल बेवकूफ गॅंवार समझथस का? चल पाछू कोती लाइन लग।"

       एकर अलावा घलव अउ कतको संवाद हें।

       कहानी म लेखकीय प्रवेश उॅंकर लेखन कौशल के आरो देवत हे। इही कौशल कहानी ल नवा उॅंचास देथे।

       समाज हित म लगे मनखे अउ उॅंकर समय के महत्तम बतावत संदेशपरक कहानी बर कमलेश प्रसाद शर्मा बाबू जी ल हार्दिक शुभकामना।

००००

पोखन लाल जायसवाल 

पलारी (पठारीडीह)