Friday, 2 October 2026

छत्तीसगढ़ी भाषा ला पोठ करे के आंदोलन - "छंद के छ"


छत्तीसगढ़ी भाषा ला पोठ करे के आंदोलन - "छंद के छ" 


बिना कोनो प्रचार-प्रसार के पाँच बछर ले छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत मा एक नाम गूँजत हे - "छन्द के छ"। सुने मा विचित्र लागथे कि ये कइसन नाम आय ? फेर गुने अउ जाने मा समझ मा आ जाथे कि जइसे हिन्दी भाषा सीखे बर "अनार के अ" होथे वइसने छन्द सीखे बर "छन्द के छ" आय।


"छन्द के छ" के जनम - छत्तीसगढ़ के गिरिधर कविराय के रूप मा प्रसिद्ध जनकवि कोदूराम "दलित" जी सन् 1967 मा कुण्डलिया छन्द ल पुनर्जीवित करत सियानी गोठ नाम के कुण्डलिया संग्रह प्रकाशित करे रहिन जेमा लिखे रहिन कि छत्तीसगढ़ी बोली मा छन्दबद्ध कविता के अभाव असन हे। इहाँ के कवि मन ल चाही कि उन ये अभाव के पूर्ति करंय, स्थायी छन्द लिखे डहर जास्ती ध्यान देवैं। इही वाक्य ले प्रेरित होके उनकर बेटा अरुण निगम ह सन् 2015 मा "छन्द के छ" नाम के एक छत्तीसगढ़ी छन्द संग्रह प्रकाशित करवाइन जेकर माध्यम छत्तीसगढ़ी रहिस अउ ओमा पचास किसम के छन्द के विधान अउ उदाहरण रहिस। इही किताब ल आधार बनाके उनमन 09 मई 2016, अक्ती (अक्षय तृतीया) के वाट्सएप समूह मा छन्द सिखाये के शुरुआत करिन अउ "छन्द के छ" ऑनलाइन गुरुकुल के जनम होइस।


"छंद के छ" के उद्देश्य - छत्तीसगढ़ी भाषा ला समृद्ध करना। नवा लिखइया मन ला छन्द विधा सिखाना।


"छंद के छ" के सत्र - "छंद के छ" के ऑनलाइन कक्षा ल "सत्र" कहे जाथे। हर बछर के पहला सत्र नवा साल (जनवरी) मा, दूसर सत्र अक्ती (मई) मा अउ तीसर सत्र दलित जी के पुण्यतिथि (28 सितम्बर) मा चालू होथे। मई 2016 ले लेके सन् 2021 तक सरलग 17 सत्र खुल चुके हे। जनवरी 2022 मा अठारहवाँ सत्र चालू हो जाही।


"छंद के छ" के साधक के चयन - छन्द सीखने वाला मन ल "साधक" कहे जाथे। हर सत्र बर 10 ले 12 नवा अनगढ़ रचनाकार के चयन करे जाथे फेर ओमन ल ऑनलाइन गुरुकुल के नियम अउ शर्त भेजे जाथे। स्वीकृति आये के बाद उनमन ल नवा सत्र के समूह मा जोड़े जाथे। 10 - 12 साधक संख्या सीमित रखे के पाछू ये कारण हे कि हर साधक ऊपर बराबर ध्यान दे जा सके। ज्यादा संख्या रहे मा हर साधक ऊपर ध्यान देना बहुत कठिन हो जाथे। आज के स्थिति मा छन्द के छ मा साधक के संख्या 200 ले आगर हो चुके हे। 

                    

"छंद के छ" के गुरुदेव - जउन साधक मन बने ढंग ले छ्न्द लिखे बर सीख जाथें उही मन नवा सत्र के साधक मन ला छन्द लिखे बर सिखाथें अउ साधक मन के गुरुदेव कहे जाथें। आज "छंद के छ" मा छन्द सिखइया गुरुदेव मन के संख्या 50 ले आगर हो चुके हे। 


गुरु-शिष्य परम्परा के पुनर्स्थापना - 


छंद के छ परिवार के मुख्य उद्देश्य छत्तीसगढ़ी साहित्य के बढ़वार हे अउ ये तभे सम्भव हे जब लिखइया अउ सिखइया रहँय, तेखर सेती छंद परिवार "सीखो अउ सिखावव" के नारा लेके आघू बढ़त हे, अउ एखरे प्रमाण ए कि, आज छंद परिवार ले 200 ले आगर साधक मन सीखत अउ सिखावत हें। जउन मन छन्द सीखत गिन वोमन कक्षा म गुरु के दायित्व सम्हालत गिन अउ सत्र बढ़त गिस।  गुरु शिष्य परम्परा के साक्षात दर्शन छंद परिवार म सहज होथे।


"छंद के छ" के सत्र मा पाठ्यक्रम अउ अभ्यास - छन्द के छ के पाठ्यक्रम शून्य ले शुरू होथे माने स्वर व्यंजन, लघु-गुरु मात्रा, मात्रा-गणना के नियम, अपवाद के नियम, तुकान्त शब्द, तुकांतता के प्रकार, शुद्ध लय बर कल-संयोजन, यति, गति आदि के ज्ञान के बाद छन्द लिखे के अभ्यास चालू होथे जेला गुरुदेव मन जाँचथें। अगर साधक के अभ्यास मा कहूँ गलती दिखथे तब वोला सुधारे के रद्दा बताए जाथे। अइसने अभ्यास करत-करत साधक मन अनेक किसम के छन्द लिखे बर सीख जाथें।


"छन्द के छ :आनलाइन कविगोष्ठी" -

 

छंद एक शास्त्रीय विधा आय, जे विशेष मात्रा अउ अपन विशेष लय के कारण विविध नाम ले जाने जाथे। जइसे दोहा छंद, सोरठा छंद, रोला छंद, कुंडलियाँ छंद, अमृतध्वनि छंद, आल्हा छंद, बरवै छंद -------आदि आदि। सबे छंद के मात्रा विधान के संगे संग लय ताल घलो अलग अलग होथे। छंद के छ के मुख्य उद्देश्य छत्तीसगढ़ी साहित्य ल पोठ करना हे, एखर संगे संग छंदकार ल लिखे के साथ पढ़े बर घलो सिखाना हे, तभे तो मार्च 2017 ले सरलग हर शनिवार अउ रविवार के आनलाइन गोष्ठी के आयोजन होथे। जेमा सबे साधक मन बढ़ चढ़के भाग लेथें। साधक मन ल कोन छंद ल कइसे  लिखना हे, वोला उँखर कक्षा म सिखाये जाथे, अउ कोन छंद ल कइसे पढ़ना या गाना हे, तेला गोष्ठी म। गोष्ठी म परिपक्व होके, छंद परिवार के साधक मन कवि सम्मेलन के मंच मन म घलो छंदबद्ध  गीत कविता के प्रस्तुति देवत हें अउ ताली बटोरत हें। छंद के छ के ही प्रभाव ए, जे आजकल कवि सम्मेलन के मंच मन म घलो छंदबद्ध विविध  गीत, कविता पढ़े सुने जावत हे। गोष्ठी के एक अउ खास बात हे- हर सप्ताह अलग अलग साधक मन ल गोष्ठी के संचालन करे के दायित्व देय जाथे, जेखर ले हर साधक संचालन करे बर सीखत हें।  गोष्ठी के दिन कोनो परब सपड़ जथे त वो दिन वो परब या फेर दिवस आधारित गोष्ठी होथे, जेमा सबो साधक मन एके प्रकार के विषय म गीत कविता प्रस्तुत करथें। जइसे होली हे, त सब साधक होली आधारित काव्य पाठ करथें। ऑनलाइन कविगोष्ठी मा प्रस्तुति के सुग्घर अभ्यास करके छन्दकार मन अब आकाशवाणी अउ दूरदर्शन मा तको आमंत्रित करे जात हें। 


"कवि गोष्ठी मा पहुना" -


कविगोष्ठी म बीच बीच म छत्तीसगढ़ के विज्ञ साहित्यकार, गीतकार, कलाकार मन पहुना बनके घलो आथें, अउ मन लगाके छंदबद्ध गीत कविता सुनके आशीष देथें,  एखर से वो पहुना मन छंद परिवार के  नवा जुन्ना साधक मन ला जानथें अउ आपसी मया मेल बढ़थे। छत्तीसगढ़ के कतको नामी विभूति मन छ्न्द के छ परिवार के गोष्ठी म पहुना बनके आयें हें, जेमा  लोक गायिका स्वर कोकिल श्रीमती कविता वासनिक जी, कवियित्री अउ अभिनेत्री श्रीमती संतोष झाँझी जी, वरिष्ठ साहित्यकार सरला शर्मा जी, गजलकार श्री दिनेश  गौतम जी, अभिनेत्री अउ लोक नृत्य के निर्देशिका श्रीमती शैलजा ठाकुर जी, लोकगायक श्री महादेव हिरवानी जी, साहित्यकार बलदाऊ राम  साहू जी, गजलकार जनाब लतीफ खान जी, साहित्यकार, प्रकाशक अउ शिक्षाविद श्री सुधीर शर्मा जी, लोकगायिका श्रीमती अनुराग ठाकुर जी आदि के अलावा कई बड़े साहित्यकार अउ कलाकार मन अतिथि के रूप म शामिल हो चुके हें। उहू मन छंद परिवार के अइसन उदिम ले भारी खुश होइन अउ रंग रंग के छंद के संगे संग सुमधुर राग रंग ल सुनके खूब प्रशंसा करिन। मार्च 2017 ले अनवरत चलत छंदबद्ध काव्य गोष्ठी आजो राग रंग के आकर्षण के केंद्र होथे।


"सोशल मीडिया के सदुपयोग" -

सोशल मीडिया के ही प्रताप आय जे छत्तीसगढ़ के चारों कोती के कवि मन वाट्सअप के माध्यम ले छंद के छ के आनलाइन कक्षा म, छंद सीखत अउ सिखावत हे, कोनो एक जघा क्लास लगाके अइसन कर पाना सम्भव नइ रिहिस। एमा किसान, मजदूर, गृहिणी, नौकरी पेशा, व्यवसायी से लेके कालेज के प्राध्यापक मन तक एक संग बिना कोनो भेदभाव के छन्द सीखत हें। जब 2019-20 म पूरा विश्व कोविड के महामारी ले त्रस्त अउ भयभीत रिहिस, चारो मुड़ा अशुभ समाचार मिलत रिहिस, वो समय छंद परिवार के साधक मन अपन अधिकतर समय छंद सीखे म अउ ऑनलाइन गोष्ठी म सीखे छंद ल पढ़े म लगाइन। कतको साधक मन पुस्तक छपाये के तैयारी करिन। इही आनलाइन गोष्ठी ल अइसन आफत के बेरा म पूरा छत्तीसगढ़ काव्य पाठ बर बउरिन, जेला छंद के छ परिवार 2017 ले उपयोग म लावत हें। ये प्रकार ले कोविड काल म छंदपरिवार सोसल मीडिया के जरिये एक होके डर भय दुख सुख बाँटिन अउ विजय हासिल करिन। 


"छंद के छ" : छन्द आधारित उत्कृष्ट किताब के प्रकाशन


 "छंद के छ" म जुड़े जम्मो साहित्यकार मनके जवाब नइहे, इँखर कलम म गजब धार हे, छंद के छ म जुड़े के पहली, मुक्त छंद म कई पुस्तक ये मन लिख चुके हें, फेर छंद के छ ले जुड़े के बाद छंदमय पुस्तक के घलो बरसात करत हें, महज चार-पाँच बछर म छंद साधक मनके कतको छंदमय पुस्तक सामने आ चुके हे। कुछ पुस्तक के नाम -


छन्द के छ (छन्द संग्रह) - अरुणकुमार निगम

छंद बिरवा (छन्द संग्रह) -चोवाराम "बादल"

हीरा सोनाखान के (प्रबन्ध काव्य) - मनीराम साहू "मितान"

महापरसाद (प्रबन्ध काव्य) - मनीराम साहू "मितान"

आँखी रहिके अंधरा (कुंडलियाँ संग्रह) - रमेशकुमार चौहान

दोहा के रंग (दोहा संग्रह) - रमेशकुमार चौहान

छंद चालीसा (छन्द संग्रह) - रमेशकुमार चौहान

छंद के रंग (छन्द संग्रह) - रमेशकुमार चौहान

छंद के छटा (छन्द संग्रह) - शकुंतला शर्मा 

छंद झरोखा (छन्द संग्रह) - रामकुमार चन्द्रवंशी

छंद बगइचा (छन्द संग्रह) - रामकुमार चन्द्रवंशी

सम्पूर्ण रामायण (सार छंद) - जगदीश हीरा साहू

छंद संदेश (छन्द संग्रह) - जगदीश हीरा साहू

अमृतध्वनि छंद संग्रह - बोधनराम निषादराज

छंद कटोरा (छन्द संग्रह) - बोधनराम निषादराज

छत्तीसगढ़ी सवैया (सवैया संग्रह) - धनेश्वरी सोनी "गुल"


एकर अलावा कुछ किताब के पाण्डुलिपि प्रकाशन बर तैयार हो चुके हें -


छन्द चंदैनी (छन्द संग्रह) - आशा देशमुख

छन्द अँजोर ( छन्द संग्रह) - सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

छन्द सरगम (छन्द संग्रह) - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

छन्द गीत (छन्द संग्रह) - द्वारिकाप्रसाद लहरे

गीता के छत्तीसगढ़ी भावानुवाद - पुरुषोत्तम ठेठवार

छत्तीसगढ़ी रामायण - चोवाराम "बादल"

छत्तीसगढ़ी हरिगीतिका संग्रह -  बोधनराम निषादराज

छत्तीसगढ़ी त्रिभंगी संग्रह -  बोधनराम निषादराज


छत्तीसगढ़ी के अलावा कुछ छन्दकार मन हिन्दी मा तको किताब प्रकाशित करवावत हें जइसे - 


शब्द गठरिया बाँध (छन्द संग्रह) - अरुणकुमार निगम

कविताई कैसे करूँ (छन्द संग्रह) - कन्हैया साहू "अमित"

कुण्डलिया किल्लोल (कुण्डलिया संग्रह) - चोवाराम "बादल"

साँची साधना (छन्द संग्रह) - इंद्राणी साहू "साँची"


इन्टरनेट मा छत्तीसगढ़ी छन्द खजाना - 

15 अगस्त 2017 के छंद परिवार छंद खजाना नामक एक ब्लॉग बनाए गिस, जेमा साधक मन के छंद संग्रहित होवत हें। तीज, तिहार-बार, तिथि विशेषांक छंदबद्ध कविता के विशेष संग्रह घलो इही ब्लाग म हे। कुल मिलाके यदि गिनती किया जाय त, लगभग 90, 100 प्रकार के 10,000 ले जादा छंदबद्ध कविता संग्रहित होचुके हे, जेला न सिर्फ भारत के बल्कि दुनिया के 20 ले ज्यादा देश के  पाठक मन तको बरोबर पढ़त हें। 

गूगल सर्च म छन्द खजाना या http://chhandkhajana.blogspot.com टाइप करके विविध प्रकार के छंद एक संघरा पढ़े जा सकत हे। एखर आलावा फेसबुक म घलो छंद के छ नाम से एक समूह हे, जेमा छंद परिवार के इतर आन लेखक कवि मन घलो जुड़े हे, जिंहा छंदबद्ध रचना साधक अउ कवि मन पोस्ट करते रहिथे। 


स्थापना दिवस समारोह -

आनलाइन कक्षा म जुड़े साधक मन जब आपस म आमने सामने मिलथें तब उँखर खुशी के ठिकाना नइ रहय, इही मया मेल, भेंट भलाई खातिर छंद परिवार स्थापना दिवस समारोह के आयोजन करथे। ये समारोह मा छत्तीसगढ़ के विज्ञ साहित्यकार या कलाकार मनके उपस्थिति म आपसी भेंट अउ कविसम्मेलन के आयोजन होथे। जउन साधक मन छंदबद्ध पुस्तक छपवाये रहिथें ओखर विमोचन घलो होथे। हर साल अक्ती तिहार के आसपास में इतवार के दिन स्थापना दिवस समारोह मनाये जाथे। पहली स्थापना दिवस समारोह 2017 म, वरिष्ठ छंद साधिका श्रीमती शकुंतला शर्मा जी के संयोजन म हुडको, भिलाई म सम्पन्न होइस। दूसर स्थापना दिवस समारोह 2018 म छंदकार मनीराम साहू मितान जी के संयोजन म सिमगा म सम्पन्न होइस। तीसर स्थापना दिवस समारोह 2019 म कबीरधाम के साधक ज्ञानुदास मानिकपुरी अउ सुखदेव सिंह अहिलेश्वर के संयोजन म कवर्धा म सम्पन्न होइस। कोविड-19 के कारण सन् 2020 अउ 2021 म स्थापना दिवस समारोह आयोजित नइ हो पाइस।


दीवाली मिलन समारोह -


दीवाली मिलन समारोह के मुख्य उद्देश्य घलो आपसी मेल, मिलाप हे। ये समारोह देवारी के बाद कोनो छुट्टी के दिन देखके  आयोजित कर जाथे। पहली दिवाली मिलन समारोह 2017 म श्री चोवाराम वर्मा बादल जी के संयोजन म ग्राम हथबन्द जिला बलौदाबाजार म सम्पन्न होइस। दूसर दीवाली मिलन समारोह 25 नवम्बर 2018 के  सुरेश पैगवार जी के संयोजन म जांजगीर नैला म आयोजित रिहिस, फेर जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिया जी उही समय हम सब ला छोड़ के परलोक सिधार गिन, ते पाय के 2018 के दीवाली मिलन समारोह, सुरता लक्ष्मण मस्तुरिया नाम मा उन ला समर्पित रिहिस।  2019 म श्री बलराम चंद्राकर अउ  श्री सूर्यकान्त गुप्ता जी के संयोजन म रायपुर म सम्पन्न होइस। 2020 के दीवाली मिलन समारोह कोरोना  महामारी के कारण नइ हो पाइस। 2021 म चतुर्थ दिवाली मिलन समारोह  विजेंद्र वर्मा अउ बलराम चंद्राकर जी के संयोजन म कूर्मि भवन, भिलाई म सम्पन्न होइस।


उपसंहार - 

             

एक विचार, एक आन्दोलन कइसे बन जाथे, एखर साक्षात प्रमाण आय "छंद के छ"। छंद के छ के प्रभाव ले छत्तीसगढ़ी शब्द मन म एकरूपता सहज देखे बर मिलत हे, संगे संग हिंदी वर्णमाला के 52 आखर सब झन बउरत हें। भाव पक्ष के संग कविता के कलापक्ष मजबूत होवत हे। विषय म विविधता घलो सहज दिखत हे, घर बन खेत-खार के अलावा विधि, विज्ञान, शिक्षा, संस्कार, जन जागृति अउ नवा नवा चीज ऊपर साहित्य सृजन होवत हे। छंद के छ के एक उद्देश्य सीखे के संगे संग सिखाना घलो हे, तभे तो आज अतेक अकन सत्र सुचारू रूप ले संचालित होवत हे। नँदावत गुरु शिष्य परंपरा के झलक छंद के छ परिवार  म देखे ल मिलथे। सीखे सिखाये के हमर  इही उद्देश्य ल देखत छत्तीसगढ़ के आन सुजान साहित्यकार मन घलो अपन ज्ञान ल सोसल मीडिया के जरिये बगरावत दिखिस। छंद के छ संयम अउ समर्पण के माला म गुथाय एक परिवार आय, जे सीखे पढ़े के साथ साथ एक विशेष समूह खुला मंच द्वारा अपन सुख दुख ल घलो बाँटथे। छंद के छ छत्तीसगढ़ी भाखा महतारी के सेवा म सतत लगे हे अउ खरा उतरत घलो हे। चारो कोती छंद के छ के शोर हे। परिवार के साधक मनके आलावा आन कवि मन घलो छंदमय सृजन करत हे, अउ कतको मन हिंदी, छत्तीसगढ़ी म छंद सीखत अउ सिखावत हें। कवि सम्मेलन, पत्र पत्रिका, सोसल मीडिया  अउ इती उती चारो कोती गूँजत  छंद के शोर, छंद के छ के उपलब्धि आय।


आलेख - जीतेंद्र वर्मा "खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा (छत्तीसगढ़)

छत्तीसगढ़ी भाषा को सशक्त बनाने का आंदोलन - "छंद के छ"

 यहाँ प्रस्तुत आलेख का हिंदी रूपांतरण दिया गया है:

छत्तीसगढ़ी भाषा को सशक्त बनाने का आंदोलन - "छंद के छ"

बिना किसी विशेष प्रचार-प्रसार के पिछले पाँच वर्षों से छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत में एक नाम निरंतर गूँज रहा है — "छंद के छ"। सुनने में यह नाम थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन विचार करने पर समझ आता है कि जिस प्रकार हिंदी भाषा सीखने के लिए "अनार का अ" होता है, उसी प्रकार छत्तीसगढ़ी में छंद सीखने के लिए यह "छंद के छ" है।

"छंद के छ" का जन्म

छत्तीसगढ़ के गिरिधर कविराय के रूप में प्रसिद्ध जनकवि कोदूराम "दलित" जी ने वर्ष 1967 में कुंडलिया छंद को पुनर्जीवित करते हुए 'सियानी गोठ' नाम से एक कुंडलिया संग्रह प्रकाशित किया था। उसमें उन्होंने लिखा था कि छत्तीसगढ़ी भाषा में छंदबद्ध कविता का अभाव है। यहाँ के कवियों को इस कमी को पूरा करना चाहिए और स्थायी छंद लिखने की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

इसी संदेश से प्रेरित होकर उनके सुपुत्र अरुण निगम जी ने वर्ष 2015 में "छंद के छ" नाम से एक छत्तीसगढ़ी छंद संग्रह प्रकाशित करवाया। इसमें पचास प्रकार के छंदों के विधान और उदाहरण दिए गए थे। इसी पुस्तक को आधार बनाकर उन्होंने 9 मई 2016 (अक्षय तृतीया/अक्ती) को व्हाट्सएप समूह के माध्यम से छंद सिखाने की शुरुआत की और इस प्रकार "छंद के छ" ऑनलाइन गुरुकुल का जन्म हुआ।

उद्देश्य

  • छत्तीसगढ़ी भाषा को समृद्ध और सशक्त बनाना।
  • नए और उभरते रचनाकारों को शास्त्रीय छंद विधा का ज्ञान देना।

सत्र संचालन

"छंद के छ" की ऑनलाइन कक्षाओं को "सत्र" कहा जाता है। प्रतिवर्ष तीन सत्र आयोजित होते हैं:

  1. पहला सत्र: नव वर्ष (जनवरी) में।
  2. दूसरा सत्र: अक्ती / अक्षय तृतीया (मई) में।
  3. तीसरा सत्र: दलित जी की पुण्यतिथि (28 सितंबर) पर।

मई 2016 से वर्ष 2021 तक लगातार 17 सत्र पूर्ण हो चुके हैं और जनवरी 2022 में 18वाँ सत्र प्रारंभ हुआ।

साधकों का चयन

छंद सीखने वाले शिक्षार्थियों को "साधक" कहा जाता है। प्रत्येक सत्र के लिए 10 से 12 नए रचनाकारों का चयन किया जाता है। संख्या सीमित रखने का मुख्य कारण यह है कि प्रत्येक साधक पर व्यक्तिगत रूप से पूरा ध्यान दिया जा सके। वर्तमान में इस परिवार में साधकों की संख्या 200 से अधिक हो चुकी है।

गुरुदेव एवं गुरु-शिष्य परंपरा

जो साधक छंद लिखना सीख जाते हैं, वही आगे चलकर नए सत्र के साधकों को मार्गदर्शन देते हैं और 'गुरुदेव' का दायित्व निभाते हैं। आज यहाँ छंद सिखाने वाले 50 से अधिक गुरुदेव सक्रिय हैं। "सीखो और सिखाओ" के इस संकल्प ने विलुप्त होती प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा को पुनः जीवित कर दिया है।

पाठ्यक्रम और अभ्यास

यहाँ शिक्षण का स्तर शून्य से प्रारंभ होता है:

  • स्वर, व्यंजन, लघु-गुरु मात्राएँ और मात्रा-गणना के नियम।
  • अपवाद के नियम, तुकांत शब्द और तुकांतता के प्रकार।
  • शुद्ध लय हेतु कल-संयोजन, यति, गति आदि का ज्ञान।

सैद्धांतिक ज्ञान के बाद अभ्यास कार्य कराया जाता है, जिसे गुरुदेव जाँचते हैं और त्रुटियों में सुधार का मार्ग बताते हैं।

"छंद के छ : ऑनलाइन कविगोष्ठी"

छंद एक शास्त्रीय विधा है (जैसे- दोहा, सोरठा, रोला, कुंडलियाँ, अमृतध्वनि, आल्हा, बरवै आदि)। छंद लिखने के साथ-साथ उसे सही लय-ताल में पढ़ना और गाना भी उतना ही आवश्यक है। इसलिए मार्च 2017 से हर शनिवार और रविवार को ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया जाता है।

  • मंच संचालन का प्रशिक्षण: हर सप्ताह अलग-अलग साधक को गोष्ठी संचालन का दायित्व दिया जाता है, जिससे उनमें मंच संचालन का आत्मविश्वास आता है।
  • विषय आधारित आयोजन: त्योहारों या विशेष दिवसों पर विषय-आधारित काव्य पाठ होता है।
  • मंच एवं मीडिया प्रसार: यहाँ परिपक्व होकर साधक अब विभिन्न मंचों, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर भी छंदबद्ध काव्य पाठ कर सराहना बटोर रहे हैं।

गोष्ठी में अतिथि (पहुना)

समय-समय पर छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार, गीतकार और कलाकार अतिथि के रूप में गोष्ठी में सम्मिलित होकर साधकों का उत्साहवर्धन करते हैं। इनमें लोकगायिका श्रीमती कविता वासनिक, कवयित्री व अभिनेत्री श्रीमती संतोष झाँझी, वरिष्ठ साहित्यकार सरला शर्मा, ग़ज़लकार दिनेश गौतम, शैलजा ठाकुर, लोकगायक महादेव हिरवानी, बलदाऊ राम साहू, लतीफ़ ख़ान, सुधीर शर्मा, और लोकगायिका अनुराग ठाकुर जैसी अनेक विभूतियाँ शामिल हो चुकी हैं।

सोशल मीडिया का सदुपयोग

सोशल मीडिया और व्हाट्सएप के माध्यम से किसान, मजदूर, गृहिणी, नौकरीपेशा, व्यवसायी और कॉलेज के प्राध्यापक बिना किसी भेदभाव के एक साथ छंद सीख रहे हैं। वर्ष 2019-2020 के कोविड-19 महामारी के कठिन समय में साधकों ने अपना समय छंद साधना, अध्ययन और ऑनलाइन गोष्ठियों में व्यतीत किया और भय के माहौल को सकारात्मकता में बदला।

उत्कृष्ट पुस्तकों का प्रकाशन

"छंद के छ" से जुड़ने के बाद साधकों की अनेक छंदबद्ध पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

  • छंद के छ, शब्द गठरिया बाँध – अरुण कुमार निगम
  • छंद बिरवा, कुण्डलिया किल्लोल – चोवाराम "बादल"
  • हीरा सोनाखान के, महापरसाद – मनीराम साहू "मितान"
  • दोहा के रंग, छंद चालीसा, छंद के रंग – रमेशकुमार चौहान
  • छंद के छटा – शकुंतला शर्मा
  • छंद झरोखा, छंद बगइचा – रामकुमार चन्द्रवंशी
  • सम्पूर्ण रामायण (सार छंद) – जगदीश हीरा साहू
  • अमृतध्वनि छंद संग्रह – बोधनराम निषादराज
  • छत्तीसगढ़ी सवैया – धनेश्वरी सोनी "गुल" (इसके अतिरिक्त कई अन्य पांडुलिपियाँ प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं।)

इंटरनेट पर छत्तीसगढ़ी छंद खजाना

  • ब्लॉग: 15 अगस्त 2017 को छंद खजाना ब्लॉग बनाया गया, जिसमें 90 से 100 प्रकार के 10,000 से अधिक छंदबद्ध काव्य संग्रहीत हैं। इसे विश्व के 20 से अधिक देशों में पढ़ा जाता है।
  • फेसबुक: 'छंद के छ' नाम से एक सक्रिय फेसबुक समूह भी संचालित है।

वार्षिक समारोह

  • स्थापना दिवस समारोह: हर साल अक्ती (अक्षय तृतीया) के आसपास साधकों के प्रत्यक्ष मिलन, पुस्तक विमोचन और कवि सम्मेलन हेतु इसका आयोजन किया जाता है (पहला- भिलाई 2017, दूसरा- सिमगा 2018, तीसरा- कवर्धा 2019)।
  • दीवाली मिलन समारोह: आपसी भाईचारे और संवाद के लिए दीपावली के बाद इसका आयोजन होता है (हथबंद 2017, जांजगीर-नैला 2018, रायपुर 2019, भिलाई 2021)।

उपसंहार

"छंद के छ" इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि एक विचार कैसे एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। इसके प्रभाव से छत्तीसगढ़ी शब्दावली में एकरूपता, शुद्धता और विविधता आई है। विषय-वस्तु में प्रकृति और खेती-किसानी के अलावा विज्ञान, शिक्षा, संस्कार और जन-जागृति जैसे आधुनिक विषय भी शामिल हो रहे हैं। यह परिवार संयम, समर्पण और भाषा-सेवा का प्रतीक बनकर छत्तीसगढ़ी साहित्य को निरंतर समृद्ध कर रहा है।

आलेख: जीतेंद्र वर्मा "खैरझिटिया" स्थान: बाल्को, कोरबा (छत्तीसगढ़)

Thursday, 1 October 2026

छत्तीसगढ़ी साहित्य यात्रा

 छत्तीसगढ़ी साहित्य यात्रा 


साहित्य संदेश (साथी संदेश) : संपादक श्री स्वराज करुण जी का आभार। पढ़ने में असुविधा न हो अतः मूल आलेख भी प्रस्तुत है - 

"राज बने के बाद छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास यात्रा"


छत्तीसगढ़ के राज्य बनते साठ इहाँ की जनता मा नवा ऊर्जा के संचार होइस। खास करके साहित्य सृजन मा आशातीत प्रगति देखे बर मिलिस। गद्य अउ पद्य के अनेक विधा मन मा सृजन होए लगिस। छत्तीसगढ़ी भाषा के अनेक किताब प्रकाशित होवन लगिस। सक्षम साहित्यकार मन निजी प्रयास ले अपन किताब के प्रकाशन करवाये लगिन। कुछ श्रद्धालु प्रकाशके मन जुन्ना प्रतिष्ठित साहित्यकार मन के पांडुलिपि मन ला अपन खर्चा मा छपवाये लगिन। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के गठन के बाद साहित्यकार मन ला किताब छपवाये बर शासन द्वारा आर्थिक सहयोग घलो प्रदान करे जात हे। कोनो भाषा के प्रकाशित साहित्य वो  भाषा के वैचारिक समृद्धि के परिचायक होथे। पृथक राज्य बने के बाद के पच्चीस बछर मा छत्तीसगढ़ ए मायने में घलो समृद्ध होइस हे। छत्तीसगढ़ राज्य बने के बाद प्रकाशित अनेक किताबों में से कुछ किताब के नाम इहाँ उदाहरण स्वरूप दिए जावत हे- 


छत्तीसगढ़ी उपन्यास - माटी के मितान (सरला शर्मा), बन के चंदैनी (सुधा वर्मा), कका के घर, भुइयाँ, माटी के बरतन, जानकी आदि (रामनाथ साहू, 2003-09, 2017-19) केंवरछ (मुकुंद कौशल), करौंदा (परमानंद वर्मा, 2015), डिंगई (लोकबाबू,2016), जुराव,तुम्हर जाय ले गिंयाँ (कामेश्वर प्रसाद पांडे), केंवट कुंदरा, बहू हाथ के पानी (दुर्गाप्रसाद पारकर, 2020-21), चन्दा (दीनदयाल साहू, 2022), रिया के चाय (धनेश्वरी सोनी, 2024), गरीबा (हरप्रसाद निडर, 2025), लीमचौरा (ऋषि गजपाल) आदि


छत्तीसगढ़ी नाटक - जागे जागे सूतिहा गो, हरदी पींयर झांगा- पागा, बिलासा :अरपा के बेटी (रामनाथ साहू 2001, 2017,2024), मंगलू (डॉ राघवेंद्र दुबे, 2001), पीरा (सुरेन्द्र दुबे, 2003) रानी दाई डभरा के (नन्दकिशोर तिवारी), दुलारी (सुधा वर्मा, 2007), शिवनाथ, सुकवा, चन्दा, सोन चिरई, सुराजी गाँव (दुर्गाप्रसाद पारकर, 2013 से 2020), भोले के गोले (सुशील भोले, 2015) नवा सुरुज (सुरेन्द्र दुबे), अपन भरोसा-तीन परोसा (श्रीनिवास राव, 2018), सती बिलासा नोनी, मया के रंग ( महावीर चन्द्रा”दीन”, 2022) आदि


छत्तीसगढ़ी काव्य नाटिका - 

अइसनेच रात पहाही (जीवन यदु राही)


छत्तीसगढ़ी बाल नाटक - छत्तीसगढी बाल नाटक (सुशील यदु), प्रकृति अउ मनखे (सुधा वर्मा)


छत्तीसगढ़ी व्यंग्य संग्रह - बियंग के रंग (संजीव तिवारी), तुंहर जऊँहर होवय (धर्मेंद्र निर्मल, 2016), का कहिबे (गुलाल वर्मा, 2024), का के बधाई, बोल रे मिट्ठू बोल (राजकुमार चौधरी “रौना”, 2019), घोलघोला बिना मंगलू नइ नाचे (सुशील यदु), मोर पँड़वा गँवागे (सुरेन्द्र दुबे), उबुक-चुबुक, उत्ताधुर्रा (रामेश्वर वैष्णव, 2025), बिन पइसा के मंडई (टीकेश्वर सिन्हा "गब्दीवाला"), कल्लू कुकुर के पॉवर (विजय मिश्रा “अमित”)


छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह - हमला तैं झन भरमा जी, बिरसपत के बिरसपत, डेरी, झालर (परदेशी राम वर्मा)

तिरबेनी, करिया अंगरेज, तुतारी ( चंद्रहास साहू, 2016-22), बगरे गोठ (चन्द्रकला त्रिपाठी), जुड़वा बेटी, बहुरिया ( चोवाराम “बादल”, 2019-22), अँजोर (दीनदयाल साहू), मन के पाँखी (डुमन लाल ध्रुव), बुढ़वा कोकड़ा (हरप्रसाद निडर), भोलापुर के कहानी, कहा नहीं (कुबेर साहू, 2010-11), छत्तीसगढ़ के रतन बेटा, खेतिहारिन, अनोखी बहू (कमलेश प्रसाद शर्माबाबू, 2021-23), पुरखा के इज्जत (महेन्द्र देवांगन "माटी", 2021), गुलाब लच्छी, गुड़ ढिंढा (मंगत रवींद्र), बिहान होय के पहिली, पहरूवा जागत रहिगे (नरेंद्र कौशिक अमसेनवी) पुतरी-पुतरा के बिहाव, तोर सुरता (परमानन्द वर्मा), रतिहा पहागे, सउत (सत्यभामा आडिल), अगोरा (शैल चंद्रा), पाये लुगरा (सुधा वर्मा), मनटोरा (सुधा शर्मा), सात लर के करधन (शकुंतला तरार), गोदना के फूल (उर्मिला शुक्ला), शहीद के गाँव, कहानी (जय भारती चन्द्राकर, 2018), रहम के रोटी (किशन टण्डन “क्रान्ति”), पावन पिरित के लहरा (अनिल भटपहरी)


छत्तीसगढ़ी लघु कथा / कहानी - करगा (शकुन्तला शर्मा), गुड़ी ह अब सुन्ना होगे (शैल चंद्रा, 2017), टुकना (मंगत रवींद्र)


छत्तीसगढ़ी लोककथा  - कथा आय न कंथली, ठग अउ जग (वीरेंद्र सरल, 2023), सुखवन्तिन (बुधराम यादव), भरम के नांव टोनही (बंधु राजेश्वर खरे), छत्तीसगढ़ी कथाकंथली (कुबेर साहू), चुरकी भुरकी, 'किस्सा ठलहा राम के (सुधा वर्मा),लोरिक चंदा गाथा (मंगत रवींद्र), डोकरी दाई के कहिनी (सेवकराम बांधे,2024) आदि


छत्तीसगढ़ी बाल कहानी - जंगल के रखवार (विनय शरण सिंह), बंटी के घर (सुधा वर्मा, सचित्र)


छत्तीसगढ़ी निबंध - माटी कहे कुम्हार से, गुनान गोठ (लक्ष्मण मस्तुरिया), मैं गांव के गुड़ी अंव (चोवाराम “बादल” 2023), तीज तिहार अउ परंपरा (महेंद्र देवांगन “माटी” 2019), पुरखा के सुरता (ओमप्रकाश साहू”अंकुर”,2024)


संस्मरण - सुरता के बादर (सरला शर्मा), सुरता के संसार (सुशील भोले, 2022)


लेख / आलेख - छत्तीसगढ़ी के खुजार (बिहारीलाल साहू), आखर के अरथ (सरला शर्मा), तरिया के आँसू, परिया धरती के सिंगार (सुधा वर्मा, 2006, 2013),आखर अंजोर (सुशील भोले, 2006), सियान मनके सीख (रश्मि रामेश्वर गुप्ता, 2016), हमर धरोहर (टीकेश्वर सिन्हा "गब्दीवाला")


छत्तीसगढ़ी समीक्षा - छत्तीसगढ़ साहित्य के सौ साल, छत्तीसगढ़ी साहित्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि (डॉ. बल्देव साव, 2011, 2013), विमर्श के कसौटी म समकालीन छत्तीसगढ़ी साहित्य (पोखन लाल जायसवाल, 2024)


चम्पू काव्य - हमर स्वामी आत्मानंद (छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रथम चंपू काव्य, चोवाराम “बादल”,  2023)


पल्लवन - ताना-बाना (छत्तीसगढ़ी भाषा में भाव पल्लवन की प्रथम किताब, चोवाराम “बादल”, 2024)


अनुवाद (गद्य) - ढाई आखर प्रेम के (अंग्रेजी कहानियों का छत्तीसगढ़ी अनुवाद, अनुवादक - कुबेर साहू, 2015), चेखव के दुनिया, अंतोन चेखव की कहानियों का छत्तीसगढ़ी अनुवाद, अनुवादक - कुबेर साहू, 2020

मैक्जिम गोर्की की कहानियों का छत्तीसगढ़ी अनुवाद, (अनुवादक - कुबेर साहू), इशादि नौ उपनिषद्

(ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय और श्वेताश्वेतरो-उपनिषद्), छत्तीसगढ़ी अनुवाद एवं व्याख्या, (अनुवादक - गीता शर्मा), पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के कहिनी मन के छत्तीसगढ़ी अनुवाद, (अनुवादक - नलिनी श्रीवास्तव), छत्तीसगढ़ी मा प्रेमचंद के कहानी, (अनुवादक - परदेशीराम वर्मा)


अनुवाद / भावानुवाद (पद्य) - आनी बानी (भारतीय ज्ञानपीठ ले पुरस्कृत चौदह भारतीय भाषा की कविताओं का  छत्तीसगढ़ी अनुवाद, अनुवादक - दादूलाल जोशी "फरहद", 2009), अँधियार मा (मुक्तिबोध की कविताओं का छत्तीसगढ़ी अनुवाद, अनुवादक - भगत सिंह सोनी) श्रीमद्भागवत गीता (श्रीमद्भागवत गीता का छत्तीसगढ़ी भाषा में छन्दबद्ध भावानुवाद, अनुवादक - पुरुषोत्तम ठेठवार), गुरु गियान(बाकृष्ण गुप्त गुरु के कथाओं का छत्तीसगढ़ी अनुवाद लघुकथा, अनुवादक - पीसीलाल यादव, 2023), गीतांजलि - गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर की गीतांजलि का छत्तीसगढ़ी अनुवाद, अनुवादक - रामनाथ साहू)


छत्तीसगढ़ी बाल गीत - मेचका राजा मछरी रानी, बिन बरसे झन जाबे बादर, नाचों ताता थैया, आवो पेड़ लगावों (बलदाऊराम साहू), फुरफुन्दी (कन्हैया साहू “अमित”, 2022), खोखो मोखो डालिया (मनीराम साहू “मितान”, 2022),माटी के चुकिया (चोवाराम “बादल”2023), बगरे हे चंदा अँजोर (पीसीलाल यादव), ममा गाँव जाबो (पद्मा साहू”पर्वणी”), सगा पुताना (मिनेश साहू, 2021), फुलवारी (इंद्राणी साहू”साँची”)


छत्तीसगढ़ी शिशु गीत - मोर गाड़ी (पीसीलाल यादव)


छत्तीसगढ़ी मुक्तक संग्रह - उटका पुरान (कमलेश प्रसाद शर्माबाबू, 2023)


छत्तीसगढ़ी चारगोड़िया संग्रह - अम्मर बाई कथे (केदार दुबे), सब ओखरे संतान (सुशील भोले, 2017)


छत्तीसगढ़ी जनउला - जयकारी जनउला (कन्हैया साहू “अमित”, 2022), आवव जानिन जनऊला (कन्हैया साहू “अमित”, 2024)


छत्तीसगढ़ी ताँका संग्रह - हरियर मड़वा (रमेश कुमार सोनी)


छत्तीसगढ़ी हाइकु संग्रह - गुरतुर मया (रमेश कुमार सोनी), निर्मल हाईकु (धर्मेंद्र निर्मल, 2019)


छत्तीसगढ़ी सेदोका संग्रह - फुलेरा (रमेश कुमार सोनी)


छत्तीसगढ़ी गजल संग्रह - छत्तीसगढ़ी गजल (मुकुंद कौशल, 2002), भुइयाँ मा आगास (रामेश्वर वैष्णव, 2022), सुरुज नवा उगइया हे (बलदाऊराम साहू), कोजन का होही (धर्मेंद्र निर्मल 2015), पाँखी काटे जाही (राजकुमार चौधरी “रौना”, 2023), मया के किताब (शिव निश्चिंत), माधुरी मंजरी (माधुरी डड़सेना मुदिता) बगरै छंद अँजोर (सुखदेव सिंह अहिलेश्वर, 2022), गजल के ग (अरुण कुमार निगम, 2025)


छत्तीसगढ़ी प्रबन्ध काव्य - सोनाखान के आगी (लक्ष्मण मस्तुरिया, द्वितीय संस्करण 12011), हीरा सोनाखान के, छत्तीसगढ़ के मंगल पांडे - वीर हनुमान सिंह, महा परसाद, राजिम सार (मनीराम साहू “मितान”)


छत्तीसगढ़ी खंडकाव्य - महाभारत म दुरपति (उर्मिला शुक्ला)


छत्तीसगढ़ी महाकाव्य - श्री सीताराम चरित (चोवाराम “बादल”)


छत्तीसगढ़ी गीत / कविता संग्रह - 


छन्नर छन्नर पैरी बाजे (कोदूराम “दलित,2007)

तपत कुरु भइ तपत कुरु (पं. दानेश्वर शर्मा,2006)

मोर संग चलव, साँवरी (लक्ष्मण मस्तुरिया, 2003, 2012)

उजियारा बगरावत चल, आही नवा अँजोर (रघुवीर अग्रवाल पथिक, 2004, 2015)

धरती सबके महतारी- (डॉ. बल्देव साव, 2002)

पतरेंगी, रितु बरनन, दाई खेलन दे - निरुपमा शर्मा) 

नोनी बेन्दरी (रामेश्वर वैष्णव), सवनाही (रामेश्वर शर्मा, 2016), चंदन कस तोर माटी हे (शकुन्तला शर्मा)

हरियर आमा घन मंउरे (सुशील यदु, 2014)

हाँसत गावत गीत (विमल कुमार पाठक, 2016)

गँवागे मोर गाँव, खेती अपन सेती (जीतेंद्र वर्मा “खैरझिटिया”), सीता के अगिन परीक्षा, श्रीमदभागवत कथा (कपिलनाथ कश्यप), हम खेलबो घर घूंदिया (मुरारीलाल साव) आदि।


छत्तीसगढ़ी पद्य साहित्य ला समृद्ध करे के उद्देश्य ले 2016 मा  “छन्द के छ-ऑनलाइन गुरुकुल” के स्थापना होए रहिस जेमा भारतीय छन्द मन के विधि-विधान सिखाये जात हे। ए गुरुकुल के कारण छत्तीसगढ़ मा छन्द के क्रांति-असन आगे। इहाँ ले सीख के अनेक कवि मन छन्दबद्ध कविता मन के अनेक किताब घलो प्रकाशित करवा डारिन हें। उदाहरण स्वरूप कुछ किताब के नाम देखव - 


छत्तीसगढ़ी छन्द संग्रह - छन्द के छ (अरुण निगम), छन्द बिरवा (चोवाराम “बादल”, छन्द के छटा (शकुन्तला शर्मा), छन्द चंदैनी (आशा देशमुख), ये कलजुग के गोठ, कुण्डलिया छन्द संग्रह (अजय अमृतांशु), गजामूंग के गीत, दोहा गीत संग्रह (मनीराम साहू “मितान”), छन्द संदेश, छत्तीसगढ़ी रामायण (जगदीश हीरा साहू), अमृतध्वनि छन्द, हरिगीतिका छन्द, त्रिभंगी छन्द, छन्द कटोरा, आल्हा छन्द जीवनी (बोधनराम निषादराज), छंद गीत बहार (द्वारिका प्रसाद लहरे), छंद झरोखा, छंद बगीचा (रामकुमार चन्द्रवंशी), दोहा के रंग, आँखी रहिके अँधरा, छंद चालीसा, छंद के रंग (रमेश कुमार चौहान), बगरै छंद अँजोर (सुखदेव सिंह अहिलेश्वर), जयकारी के रंग, मनहरण घनाक्षरी संग्रह (विजेन्द्र कुमार वर्मा), त्रिभंगी छन्द धारा (संगीता वर्मा), सवैया सरोवर (इंजी. गजानंद पात्रे), छप्पय छन्द छानी (पुरुषोत्तम ठेठवार), सवैया छंद संग्रह, बरवै कोठी (धनेश्वरी सोनी “गुल”), छन्द फुलवारी (शुचि भवि) आदि।


छत्तीसगढ़ी व्याकरण - छत्तीसगढ़ी का सम्पूर्ण व्याकरण, छत्तीसगढ़ी व्याकरण (डॉ. विनय कुमार पाठक एवं डॉ. विनोद कुमार वर्मा, 2019, 2023), छत्तीसगढ़ी व्याकरण (चंद्र कुमार चन्द्राकर), सरल छत्तीसगढ़ी (रामेश्वर शर्मा) आदि।


छत्तीसगढ़ी भाषा के किताब के प्रकाशन मा स्थानीय प्रकाशक अउ छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के योगदान सब ले ज्यादा हे। कुछ किताब आने राज्य के प्रकाशक मन घलो छापिन हें। छत्तीसगढ़ी भाषा मा पाछू के 25 बछर मा  किताब तो बहुत अधिक प्रकाशित होइन हें फेर सब किताब के नाम के उल्लेख करना संभव नइ हो सके तभो ले विविध विधा मन मा प्रकाशित कुछ किताब मन के उल्लेख ए आलेख मा करे गेहे। हम गर्व ले कहि सकथन कि छत्तीसगढ़ राज्य बने के 25 बछर मा छत्तीसगढ़ी भाषा के छत्तीसगढ़िया साहित्यकार मन साहित्य के हर विधा मा लेखन करके, किताब प्रकाशित करवा के छत्तीसगढ़ी साहित्य ला समृद्ध करिन हें अउ भविष्य मा घलो करत रहीं। आशा हे कि आलेख के पाठक मन जरूर लाभान्वित होहीं।


अरुण कुमार निगम

संस्थापक - छन्द के छ, छत्तीसगढ़

Monday, 28 September 2026

पीतर पाख आस्था अउ भाव के परब हरे

 पीतर पाख आस्था अउ भाव के परब हरे  

 

बोवव बीज करम के पोठहा,सरल रखव व्यवहारI 

तब सुरता करहीं सब हा,गुण गाहीं संसारI 


हर परब आस्था ले जुड़े होथे ग्यारह दिन ले कतेक भाव भक्ति सन गणेश पूजा चलत रिहिस हे I अउ आज उही आस्था संग गणेश विसर्जन करत इही गोहरावत हन अगले साल अउ जल्दी आ I कहे के मतलब ओकर वापसी के कामना करथन, इही तो हम ला नवा शुरुआत के संकल्प के भरोसा देवाथे, गणेश मूर्ति विसर्जन के बाद बड़े फजर ले ओरिया लीप के चउँक चन्दन पुरके फूल पान चढ़ा के, लोटा मा पानी मढ़ा के, अपन पीतर देव मनके स्वागत करथन I पीतर पाख माने आस्था अउ श्रध्दा के परब आय, अउ श्रध्दा उकर बर जेकर परसादी आज हमन ल ये जिनगी मिले हे, हमन अंतस ले अपन पुरखा मन ल आभार करत उन ला सुरता के आरूग फूल चढ़ावत माथ नवाथन I काबर हम सब एकरे मन के छइयाँ मा फरत फूलत हन, तेकर सेती अनंत चतुर्दशी के बाद पूर्णिमा ले अमावस तक ओरिया लीप के पीतर मन के अगुवाई म जौं तिली अउ काशी ले तर्पण करके बरा बोबरा चीला सोंहारी बना के तोरई सन हूम जग दे के, अपन भाव ले तृप्त करथन I अउ मया दुलार मान गौण ले अघाय हमर पीतर मन तको आशीष के बरसा करत अपन परिवार के मया पिरित अउ खुशी ल देख के संझा कुन बिदा हो जथेI अउ अइसे माने गेहे ये पाख भर पीतर मन धरती लोक मा अपन परिवार के मया मा खींचत आथेI अउ भाव के परसाद पाके आशीर्वाद देवत अमावस के दिन अपन परम धाम चल देथे I वइसे तो हमन अपन पुरखा मन ला हर कारज मा चाहे दुःख रहय या सुख सुरता करथन, आशीर्वाद लेथन, फेर ये पीतर पाख अपन पुरखा मन ल समर्पित रहिथे, उन ला देख तो नइ सकन फेर भाव इही रहिथे आज दाई मन आय हे, आज हमर घर के सियान बबा ह आय हे, अउ आके हमर परिवार ल देखत हें I हमन भी ओकर स्वागत सत्कार कर भाव के भोग लगा के अपन संस्कृति अउ परंपरा के निर्वाह करत अवइया पीढ़ी ल ये संस्कार रूपी भाव के बीज ल अंतस मा बोके महकाय के कोशिश करथन I अउ ये बताय के कोशिश रहिथे अपन जनम देवइया महतारी बाप अउ घर के बड़े सियान मन ला उकर राहत ले मया दुलार मान सम्मान देवन I अउ उखर इच्छा खुशी के मान राखन, अउ उकर जाय के बाद तको उन मन के देय संस्कार परंपरा ला याद रखन, जेन पुरखा ले वंश चलत आत हे वोला सुरता करके ओकर अच्छाई ल अवइया लइका मन ल बतावन Iआज आधुनिकीकरण अउ भागमभाग के युग मा सब मनखे अपन नीत नियम रीति रिवाज परंपरा ला भुलात जात हे, फेर हमन अपन जर ला झन भुलावन अउ ये पीतर पाख तो इही सुरता देवाथे कि हमन कोन पेड़ के फूल फर आन, अउ ये तो प्रकृति के नियम अउ विधि के विधान हरे आय हे तेन ला एक दिन जाय बर पड़हीं I वो कहिथे न पाके फल एक दिन टुप ले गिरके माटी म मिल जथे, एक ठन अउ बात हे पीतर पाख मा कउँवा ला भोजन देवई शुभ माने जाथे, हमर पुरखा मन कतेक गुढ़ बात ल सोचे रिहिन Iइही मौसम ह कउँवा मन के बढ़वार के मौसम होथे, ते पाँय के वोला भोजन देंवय अउ कउँवा ह एक अइसन पक्षी आय जेन बर पीपर के फल ल खाथे अउ ओकरे बीट ले ही बर पीपर के पेड़ ह जामथे, अउ ये पेड़ ले हमन ल आक्सीजन मिलथे Iअइसन भाव के भोग लगावन कि नदावत कउँवा मन आवय ओकर बढ़वार होवय अउ प्रकृति के संतुलन बने राहय I अउ पीतर पाख मा हमू मन ये संकल्प करन पुरखा के नांव ले एक एक पेड़ लगावन अउ ओकर आशीष के छइयाँ पावन I


संगीता वर्मा 

अवधपुरी भिलाई

हमर पितर अउ हमर कउँवा//

 //पितर विशेष//


         // हमर पितर अउ हमर कउँवा//


            पितर पाख ह कुँवार महीना के अंधियारी पाख के एक्कम तिथि ले लेके अमावस तक चलथे। पंदरा दिन तक घरोघर बरा, सोहारी, गुलगुला भजिया, खीर बनाके पुरखा मन ला गुड़ अउ घींव के हुम दे जाथे। 

बताए हे की गुड़ अउ घी के हुम ला पितर पाथे। पितर पाख मा तो अबड़ नियम–धियम रहिथे, फेर आज कल के वातावरण अउ व्यस्थता ला चलते धीरे–धीरे बदलत जात हे; अउ कम होवत हे। पर पितर ह सिरिफ बरा, सोहारी राँध–राँध के खाय बर नइ मनाये जाए; भलुक येमा मनखे के संग–संग हमर पर्यावरण अउ पशु–पक्षी घलो जुड़े रहिथे। आजकल मनखे मन हा सोचथे की पितर ल नइ मनाबो त का हो जाही। नहीं.... नहीं.....। येकर नइ मनई हर हमर पर्यावरण अउ पशु–पक्षी के विनाश के कारण घलो बन सकत हे।

          हमर सियान मन बोलय की हुम देये के बाद रोटी–पीठा ल छानही म फेंक देहू। कउँवा मन आहीं अउ खाहीं त समझ लेहू की पितर मन आ के खावत हें, त घर म जेन नान–नान लोग–लइका रहय तेन मन हर बबा–दाई मन के मजाक उड़ावँय; कइसे बोलथस बबा....! मरगे तेन मन कोनों कउँवा बन के आहीं गा......।

पर ..... हमर पुरखा मन घलो जेन काम करे अउ बताये ते सोला आना सच रहय, भले हमन बात ल हँसी–मजाक म टाल देतव रहेन।

          अइसे घलो माने जाथे कि त्रेतायुग म भगवान इंद्र के बेटा ह सबले पहिली कउँवा के रूप धरे रिहिस, अउ जयंत ह माता सीता के तीर म जा के ओकर पाँव म चोंच मार दिस। उही बेरा भगवान श्रीराम जी ह तिनका बाण चला के जयंत के आँखी ल फोर दिस। जयंत ह रोवत-गिड़गिड़ावत भगवान राम जी ले माफी मांगिस, उही बेरा राम जी अपन दयालु स्वभाव ले माफ करके जयंत ल वरदान दिस कि तोला पितर पाख म परसे खाना ह मिलही अउ पितर के रूप माने जाही। कउँवा ह प्राकृतिक कारण ले नइ मरे, भलुक कोनो मार दिही या बीमारी ले ही मरथे, काबर की समुद्र मंथन के बेरा म कउँवा अमृत पीये रिहिस; अइसे बताए हे।

         वइसे हमर पुरखा मन प्रकृति ले बहुते-जादा जुड़े रिहिन हें। रुखराई, चिरई–चिरगुन ले बड़ मया करें। पर्यावरण ल सजा के राखें।

कउँवा मन ल खाये बर देये के ये कारण घलो बताए हे कि भादो महीना म मादा कउँवा मन अंडा दे थे। अपन लइका ल छोड़के जादा दुरिहा नइ जा सकय, ते पाय के घरोघर के छानही या बरेंडी म जा-जाके दाना–पानी के बेवस्था कर पाथे, पर अब दिनों-दिन कउँवा के संख्या कम होवत हे। 

          एकठन बात जनई जरूरी हे कि कउँवा मन ह पीपर अउ बर के बीजा ल खाथें; ओ मन ह ये बीजा ल खा के कोनों जगह बीट कर देथें, जेकर ले बर अउ पीपर के पौधा जगह–जगह जाग जाथे। येकर ले हमर वातावरण शुद्ध होथे। आजकल कउँवा ल बचई बहुत जरूरी हे। येकर जनसंख्या बहुत कम होगे हे। देखे बर नइ मिले। बरगद–पीपर के रूख म आक्सीजन के मात्रा बहुत अधिक पाए जाथे ; ते पाय के पर्यावरण ल सरेखे बर पुरखा मन ये उपाय ल करे हें। 

         पितर मा तोरई तरकारी के अब्बड़ महत्व हे। तोरई के साग अउ ओकर पत्ता के अब्ब्ड़ महत्व बताये हे। येकर बिना पुरखा मन नइ तरँय। तोरई के अर्थ ही तारना हे। तोरई के साग अउ ओकर पत्ता म रख के परसे जाथे। मोर मयारू संगवारी हो....! ये कहानी नो हरय; सही बात आय। हमर पुरखा मन बताए बात ल माने बर हमन पाछू नइ घुँच सकन। अब्बड़ सोच–बिचार करके पुरखा मन हर बात ल रखे हें। हमन ल पर्यावरण के सुरक्षा करई घलोक बहुत जरूरी हे। आप जम्मों झन ले मोर हाथ जोड़ के बिनती हे की ये हमर पुरखा मन के माना ल बनाए राखहू। जय जोहार....!

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//लेखिका//

प्रिया देवांगन "प्रियू"

राजिम

जिला - गरियाबंद

छत्तीसगढ़

Sunday, 13 September 2026

भारतीय जनता मा जागृति फैलाय बर सार्वजनिक गणेश परब के शुरूवात होइस

 भारतीय जनता मा जागृति फैलाय बर सार्वजनिक गणेश परब के शुरूवात होइस 


हमर सनातन संस्कृति मा बुद्धि के देवता गणेश जी के अब्बड़ महत्व हे।कोनो भी काम ला चालू करे ले पहली भगवान गणेश जी के पूजा करे जाथे। येकर ले कोनो भी कारज हा बने सिद्ध 

होथे अइसे आस्था के रुप मा रचे- बसे हे। यज्ञ,पूजन, बिहाव, गृह प्रवेश अउ आने आयोजन मा गणेश जी के पूजा करे जाथे।गणेश जी हा माता- पिता ला सबले बड़का धाम मानिस। अपन बुद्धि  ले मूसवा सवारी गणेश जी हा पिता भगवान महादेव जी अउ माता पार्वती के गोल- भांवर घूम के सुघ्घर आशीष पाइस ।पहिली पूजन के वरदान प्राप्त करिन। तब ले भगवान गणेश जी के पूजा कोनो काम करे ले पहिली जरूर करे जाथे।


        सार्वजनिक गणेश पूजा के शुरूवात 


  श्री गणेश जी के स्थापना हिंदू पंचाग के अनुसार भादो मास के शुक्ल पक्ष चतुर्थी के दिन करे जाथे। दस दिन भक्ति  के धार गांव -गांव शहर -शहर मा बोहाय ला लगथे। अनंत चतुर्दशी के दिन श्री गणेश जी के विसर्जन करे जाथे।दस दिन तक सनातनी मन भक्ति रुपी गंगा मा गोता लगाथे।


इतिहासकार मन के मानना हे कि हमर भारत वर्ष मा गणेश पूजा के  शुरुवात वीर शिवाजी हा अपन महतारी जीजा बाई के संग मिलके मुगल मन ले लड़े बर जनता मन ला संगठित करे के उद्देश्य ले करे रिहिन। छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद गणेश महोत्सव के परंपरा ला मराठा साम्राज्य के आने पेशवा मन घलो जारी रखिन।बछर 1892 मा भाऊ साहब जावले हा पहली बार गणेश मूर्ति के स्थापना करिन।

       जब हमर देश मा अंग्रेजी शासन रिहिस ता बछर 1893 मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता लोकमान्य बालगंगाधर तिलक हा येला बड़का रूप मा महाराष्ट्र मा सुरुवात करिन। सार्वजनिक गणेश पूजा के उद्देश्य भारतीय जनता मा राष्ट्रीयता के भावना मा बढ़वार कर अंग्रेजी शासन ला इहां ले भगाना रिहिस। गणेश पूजा के माध्यम ले भारत के सभी जाति, धर्म के मनखे मन ला एक साझा मंच देय के उद्देश्य रिहिनी जिहां सब सकला के अपन विचार रख सके।



सार्वजनिक गणेश पूजा के बेरा मा वीर सावरकर, लोकमान्य तिलक अउ आने नेता मन अपन भाषण मा भारतीय जनता मा जागृति फैलाय के काम करिन। अंग्रेजी शासन के शोषण, अत्याचार अउ कतको गलत नीति के बारे मा बताके देश के आजादी बर लड़े बर प्रेरित करे गिस। गणेश पूजा के समय पढ़इया लइका मन देशभक्ति के नारा अउ अंग्रेजी शासन के विरुद्ध नारा लगाय। मराठा मन ला  छत्रपति शिवाजी कस विद्रोह करे बर प्रेरित करे जाय।


 तो ये प्रकार ले देखथन कि सार्वजनिक गणेश पूजा हा आजादी के लड़ाई के बेरा मा भारतीय जनता मा देशभक्ति के भावना ला बढ़वार करे, छुआछूत दूर करे, समाज ला संगठित करे के दिसा मा  सुघ्घर माध्यम बनिस। ये सार्वजनिक पूजा हा अंग्रेजी शासन बर जी के जंजाल बनगे अउ जनता मन बर देश के आजादी के लड़ाई बर माध्यम बन गे।  तिलक जी के उदिम ले पहिली गणेश पूजा परिवार तक सीमित रिहिन। गणेश परब के बेरा मा भाषण देवइया प्रमुख नेता मन मा वीर सावरकर, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बैरिस्टर जय कर,रेंगलर परांजये,पं. मदन मोहन मालवीय, मौलिक चंद्र शर्मा, बैरिस्टर चक्रवर्ती,दादा साहब खापर्डे अउ सरोजिनी नायडू के नांव शामिल हे।कवि गोविंद अपन कविता के माध्यम ले जनमानस मा छाप छोड़य।


डीजे संस्कृति अउ अश्लील गाना चिंतनीय 


    देश ला आजादी मिले के बाद कतको शहर मा आयोजन के बड़का स्वरूप जारी हे। गणेश परब बर प्रसिद्ध शहर मन मा मुंबई , पुणे, हैदराबाद, बेंगलुरु, अहमदाबाद, चेन्नई, नासिक, जयपुर, दिल्ली,गोवा, नागपुर,इंदौर, राजनांदगांव , रायपुर के संगे संग आने शहर मा गणेश पूजा के बड़का आयोजन देखे ला मिलथे।लोगन भक्ति भाव मा रम जाथे। भारतीय संस्कृति ले संबंधित बड़का आयोजन होथे।लोक सांस्कृतिक कार्यक्रम अउ कवि सम्मेलन के आयोजन के माध्यम ले जन समुदाय हा जुड़थे अउ सुनता के गांठी मा बंधे के संदेश देथे।समय के साथ येकर स्वरूप मा अब्बड़ बदलाव घलो होइस। दिखावा के चलते अड़बड़ खरचा करे जाथे। लोक संस्कृति के जगह डीजे संस्कृति हा मूल संस्कृति ला दबा के रख देथे। डीजे के कानफोड़ू अवाज हा पर्यावरण बर अउ मानव समाज बर खतरा होवत जात हे। आयोजन समिति मन ला चाही कि आयोजन मा अश्लील गाना ला झन बजाय। अपन संस्कृति   के बढ़वार बर काम करय।तभे गणेश पूजा के महत्ता हा कायम रहि। गणेश परब हा पारा, गांव,शहर प्रदेश अउ देश ला एकता के के सूत्र मा पिरोय के सुघ्घर काम करथे। जरूरत हे आधुनिकता के चकाचौंध मा घलो अपन मूल संस्कृति ला सहेज के रख सकन तभे सार्वजनिक गणेश पूजा हा सार्थक हो पाही।


        - ओमप्रकाश साहू अंकुर 

       सुरगी, राजनांदगांव

दुलार चन्द्रहास साहू

 दुलार 

                चन्द्रहास साहू         

        ‌‌   मो न 8120578897


सिरतोन अब्बड़ थकासी लाग गे आज बुता के करत ले। फेर बुता तो सिराबेच नइ करे।....अउ एक बुता सिरा जाथे तब आने बुता मुहूॅं फार के ठाड़े रहिथे। बेरा पंगपंगाती ले उठे हावंव अउ बिन अतरे सरलग बुता करत हॅंव तभो ले एको बुता नइ सिराये। कनिहा मा पीरा भरगे । माथ धमके लागिस। आज तो चहा घला नइ पीये हावंव। टिक.. टिक...करत दीवाल घड़ी ला देखेंव। नौ बजके पचपन मिनट, ....दस बजत हाबे। अब तो चहा के तलब अउ बाढ़गे। फेर बिन दूध वाला ....? इही तो दुख आवय बहिनी !  घरो घर कुकुर पोस डारे हाबे तब कहाॅं ले गाय के दूध मिलही ? 

ननपन मा तो पारा-परोस मा बिन माॅंगे दूध मही मिल जावय। इही बहाना राम भजन अउ हाल-चाल के जानबा घला हो जावय। खाॅंसी-खोखड़ी होवय वोतकी मा गाॅंव के कोरी अकन हितु-पिरितु मन पुछ डारे फेर अब तो एक दूसर के जानबा नइ होवय। भलुक सरी दुनिया हाथ मा धरे मोबाइल मा समागे हाबे फेर परोसी के सुध नइ लेवय। मरके अईठ जाथे, सर जाथे अउ‌ बस्साये लागथे तब जानबा होथे पारा-परोस के मन ला। अइसना तो बदलत हाबे हमर देश अउ समाज हा। हे भगवान ! अउ कतका बदलही हमर छत्तीसगढ़ हा...? मानवता अउ संवेदना हा सिरा जाही का ये दुनिया ले  ? जी घुरघुरासी लागिस जम्मो ला गुणत-गुणत। हाॅल के सोफा मा बइठ गेंव अब।

"काकी काहॅंचो नइ मिलिस दूध हा।''

दूध बर पठोये रेहेंव तौन लइका लहुट के बताइस।

"मेंहा तो जानत रेहेंव बाबू ! वोकरे सेती आगू ले चहा चढ़ा डारे रेहेंव गा !''

अब लइका ला मेहनताना देये लागेंव। मया के मेहनताना। देवर के लइका आवय आज पढ़े ला नइ गेये हाबे। वोकर स्कूल के मास्टर मन वेतन बढ़ाओ कहिके हड़ताल मा हाबे। तोस अउ बिस्कुट ला देयेंव अउ इंडक्शन कुकर ले चहा उतार के दू कप मा ढ़ारेंव। मोर कप मा लिम्बु निचोड़ेंव अउ पीये लागेंव चहा ला। ....अउ दू घूंट चहा के चुस्की लेयेंव अउ अइसे लागिस जइसे  मूड़ पीरा हा माढ़गे। अंग-अंग मा नवा ऊर्जा के संचार समागे। मने-मन अंगरेज मन ला धन्यवाद दे डारेंव। भलुक अब्बड़ अत्याचारी करे हव रे परलोकिया हो फेर चहा ला हमर देश मा लान के बने करे हव। चहा के आखिरी घूॅंट हा उरकिस अउ उदुप ले नजर हा बाथरुम कोती गिस। गंदला कपड़ा के पहार परे रिहिस। अब तो फेर माथ पीरा उमड़गे मोर, मोर लइका के अउ पटवारी साहब माने मोर पति परमेश्वर के कपड़ा-लत्ता। ...बनियान अउ चड्डी ? सिरतोन धरती फाट जातिस अउ समा जातेंव अइसे लागिस। ...फेर कहाॅं ले धरती फाटही ? महतारी हा बेटी के दुख ला नइ देख सकिस तब सीता बर धरती हा फाटगे...अउ मोर दाई हा मोर दुख ला नइ देख सकिस तब मोर बर वाशिंग मशीन बिसा के पठोये हाबे।.... रहा ले ले वो !  तब बुता करहूॅं। सिरतोन साहब ला अब्बड़ बरजेंव। भलुक अपन कुर्ता-पेंट ला झन कांच फेर चड्डी-बनियान ला धो देये करे कर जी अइसे फेर वो तो बड़का साहब आवय अउ मेंहा ..? तभो ले अब्बड़ ठोसरा मारथे। घर मा रही के का बुता करथस ?  चार झन के जेवन बनाथस।  दू कुरिया ला झाड़ू-पोछा करथस।..बस ताहन दिन भर सुतथस। टीवी देखथस येकर ले जादा का बुता करथस ? सिरतोन  दुनिया के जम्मो नारी के जिनगी हा इही यक्ष प्रश्न मा अरहजगे हाबे तब मेंहा कइसे बाॅंच सकहूं ?

चार झन के जेवन, दू कुरिया के जतन येकर ले जादा का बुता  ?

जम्मो ला गुणत-गुणत अब कनिहा अउ माथ मा  बाम लगा के दीवान मा ढ़लंग के कम्मर ला सोझियायेंव। झटकुन आँखी लटके लागिस। रातकुन बने ढंग के नींद नइ‌ परे  रिहिन। लइका के यूनिट टेस्ट रिहिस । बिहनिया ले स्कूल पठोये के संसो अउ रिविजन करवाये के जिम्मेदारी। सिरतोन लइका मन के भलुक यूनिट टेस्ट होथे फेर महतारी बर तो बोर्ड के वार्षिक परीक्षा हो जाथे। काॅपी कहाॅं हे मम्मी ? किताब नइ मिलत हे, तब चेप्टर के गोठ। ...अउ ट्यूशन वाली मैडम के नखरा। हाय ...! जम्मो ला मैनेज करना हे तभो ले गोसइया के ठोसरा । घर मा रही के का बुता करथस ? जइसे घर के देख-रेख हा कोनो बुता नो हरे।

खट्...खट् मोहाटी बाजिस अउ कपाट ला खोलेंव। लइका के पीठ  मा लदाये क्विंटल भर के बेग ला उतारेंव। अंग्रेजी मीडियम के स्कूल आवय ना, आनी-बानी के किताब-कॉपी के बोझा ला बोहो के जाये ला परथे उप्पर ले लंच बॉक्स अउ पानी बाॅटल....! लइका छटाक भर अउ बस्ता किलो भर। भाग ले सातवी पढ़हइया नोनी आवय। छोटका क्लास मा अतका तब बड़का क्लास मा अउ कतका बोझा रही ते ?

अब लइका हा सोफा मा बइठिस अउ मेंहा धकर-लकर जूता-मोजा ला हेरे लागेंव। अब लइका के नखरा शुरु होगे। बेटी यूनिफॉर्म गंदला होगे हाबे वो ! हेर दे अउ गोड़-हाथ ला धो तब फुरसुदहा बइठ के जेवन कर ले बेटी ! फेर बेटी हा तो कनघटोर होगे। कोनो गोठ ला नइ सुनत हाबे मोर। 

"आ बेटी ! मेंहा हेर देथो यूनिफॉर्म ला।''

बेटी तो अब रिमोट ला धर के फटफीट-फटफीट चैनल बदलत हाबे। एक कार्टून मनपंसद नइ आवत हाबे आने चैनल चालू करत हाबे। चेचकार के अपन कोती तीरेंव लइका ला अउ सोज्झे बाथरूम मा धकेलेंव तब जाके यूनिफॉर्म ला चेंज करिस टूरी हा। अइसे लागिस जइसे प्रथम विश्व युद्ध जीत गेंव मेंहा अउ अब द्वितीय विश्व युद्ध जीते के उदिम करत हॅंव। 

डायनिंग टेबल मा बइठारेंव अउ खाना ला परोसेंव - कढ़ी भात । लइका तो देखते साठ जच्छार होगे।

"ये का साग आवय मम्मी ?''

लइका तमतमावत किहिस।

"कढ़ी साग तो आवय बेटी ! मही नइ मिलिस तब आमा‌ खोटली डार के बनाये हावंव।''

लइका ला समझाये के उदिम करेंव फेर लइका तो अब बीख उगले लागिस ।

"मार्बल टाईल्स लगे चकाचक करोड़ों के घर । बड़का टीवी फ्रिज कुलर वेस्टर्न आर्ट ले साजे  एक लाख  पैसठ हजार रुपिया के डायनिंग टेबल अउ ओमा खाना खाना हे तब आमा खोटली के बने कढ़ी भात ....।  हा....हा.... ये गरीबो वाला खाना.....हा ...हा..... बहुत नाइंसाफी है मम्मी ये तो....। सबका हिसाब होगा....बराबर होगा।''

लइका कोनो फिलिम के डायलॉग मारे लागिस।

"चुप रह ! ढ़ोंगयही टूरी !''

लइका ला बरजेंव अउ मनाये लागेंव। 

"का करबे बेटी ! घर मा कुछू साग-भाजी नइ रिहिस तब इही ला बना डारे हॅंव वो ! सब्बो किसम के खाये ला परथे बेटी ! कभु दुखम तब कभु सुखम । ... रातकुन बनाहूॅं ना वो ! तोर पसंद के सब्जी- मटर पनीर। गउकिन ईमान से बेटी !''

मेंहा किरिया खा डारेंव।

"मम्मी सुनो !''

तुम्हारी आदत थी वादा तोड़ने की,

मगर, 

इन्ही आदतों ने मेरी आस तोड़ दी।''

टूरी अब शायरी झाड़े लागिस अउ गुनगुनाये लागिस।

वादा तो टूट जाता है....।

अपन हाथ ले दू कौरा खवाये हॅंव अउ जम्मो भात ला छोड़ दिस अब। हाथ धोइस अउ मोबाइल ला कोचके लागिस।

"खा ले बेटी!''

अब्बड़ मनाये हॅंव फेर जम्मो अबिरथा होगे। सिरतोन तो आवय मुही ला मार्केट जाये के बेरा नइ मिलिस। अउ हमर साहब जी ला ? भलुक अपन साहब मन बर दारु बिसाये बर शरम नइ आवय अउ घर के सब्जी-भाजी लेये बर शरम आथे, मार्केट मा झोला धरके रेंगे बर शरम आथे गोसइया ला। साग-भाजी बिसाये मा मान सम्मान सिरा जाही .? नाक कटा जाही....?...अउ दारु बिसाथे तब ?

"मम्मी ! मेंहा पिज्जा लेये बर जावत हॅंव।''

टूरी सायकल निकालत किहिस। अब्बड़ बरजेंव फेर नइ मानिस मोर गोठ ला अउ पैडिल मारत चल दिस साहू पिज्जा सेंटर कोती। पइसा तो धरे हस कि नही....पुछते रही गेंव। ....अउ हमर घर पइसा के का कमती ? जी कलपगे मोर। टूरी के बेवहार ला देखके। बड़की के ये रंग तब अभिन तो चौथी पढ़इया नान्हे टूरा के का होही भगवान ! ...आगू नांगर टेड़गा हाबे तब पाछू नांगर के का ठिकाना ? मेंहा तो सबरदिन मान-सम्मान देये बर सीखोये हॅंव। मीठ बोली बोले बर सीखोये हॅंव फेर लइका के बेवहार..? लइका उप्पर नही भलुक मोर परवरिश उप्पर प्रश्न चिन्ह लगगे। सिरतोन जम्मो कोई भोकवी कहिथे मोला। लइका मन घला। का सिरतोन भोकवी हावंव का ? जौन अपनेच लइका के परवरिश नइ कर सकंव। .. अउ लइका ला जम्मो सीखोना  महतारीच हा सीखोही, ददा के कोनो बुता नइ हे का ?

              जम्मो ला गुणत-गुणत लइका के छोड़ल भात ला खाये हॅंव। आरुग सितागे रिहिस फेर का करंव ? नइ खाये ला भावय तभो ले झन फेंकाये कहिके खाये ला परथे अन्न महतारी ला।  

खट्.... खट्... मोहाटी के कपाट बाजिस।

जाके कपाट ला खोलेंव अउ देखेंव। मोहाटी मा मुचकावत मोटियारी ठाड़े रिहिस। 

"सील-लोड़हा ले ले बहिनी !''

मेंहा आँखी ला नटेरत  ससन भर देखेंव मोटियारी ला । मुड़ी मा सील पट्टी बोहे रिहिस। खाॅंध मा चोंगा कस दोनगी  बोहे रिहिस अउ ओमा नानकुन लइका जुगुर-जुगुर देखत रिहिस। एक झन बारा तेरह बच्छर के नोनी हा अचरा ला धरके जेवनी कोती ठाड़े रिहिस अउ तीसरइया आठ दस बच्छर के टूरा हा डेरी कोती ठाड़े रिहिस।

"बेरा ले कुबेरा आ जाथो। नइ लेवंव सील लोड़हा। अभिन कुछू जरुरत नइ हाबे। मिक्सी-फिक्सी के जबाना मा कोन सील लोड़हा बिसाथे ते ?''

रट्ट ले कहेंव। मोटियारी के चमकत चेहरा बुतागे। 

"बहिनी! भलुक कुछू ला झन बिसा फेर मोर लइका मन ला खाये बर कुछू दे दे। ये डेरउठी ले कभू बिन खाये नइ गेये हावंव। गौटनीन दाई कहाॅं हाबे ? नइ दिखत हाबे। आरो करके बता दे, मनटोरा आये हाबे। सील लोड़हा वाली मनटोरा ला जानथे वोहा।''

मोटियारी मोर सास ला पुछत  किहिस अउ बरपेली घर मा खुसरगे। बइठे बर केहेंव अउ एक लोटा पानी पीये बर देयेंव। पानी ला पीयिस गड़गड़-गड़गड़ अउ आरो करे लागिस। येती वोती ला देखे लागिस। 

"दाई ! का करत हावस वो ? ये...गौटनीन दाई ! का करत हस वो ?''  

"नइ हाबे दीदी ! दाई हा।''

हार लगे फोटू ला देखावत केहेंव अउ मोटियारी बम्फाड़ के रोये लागिस।

"मोला कभु लांघन नइ पठोये गौटनीन दाई !...अहहा....।''

"सबरदिन मोर पहिरे ओढ़े बर नवा-नवा ओन्हा कपड़ा देयेस वो ! ....अहहा....।''

"मोर लइका मन ला अब्बड़ दुलार करे हस दाई...!....अहहा....। ''

गो....गो.... हिच्च....।

मोटियारी ससन भर रोइस । सिरतोन अतका तो बटवारा लेवइया वोकर बेटी मन घला नइ रोइस अपन दाई के मरनी मा। आज सौंहत दिखत हाबे लहू ले जादा गहरा रिश्ता अनचिन्हार ले घला हो सकथे। मोरो आँखी ले अब अरपा-पैरी उफान मारे लागिस। अपन मन ला समझायेंव अउ चुप होयेंव। जम्मो कोई बर जेवन निकालेंव अब। मोर बेटी के जहुंरिया लइका तो अघागे खावत ले कढ़ी भात ला। एकसरिया, दूसरइया, तीसरइया तीन परोसा खाये लागिस नोनी हा। ...अउ मोटियारी हा घला दूसरइया माॅंग डारिस।

"आमा खोटली डार के कढ़ी ला अब्बड़ सुघ्घर बनाये हस बहिनी ! अब्बड़ गुरतुर हाबे वो। अघावत ले खाये हॅंव वो ! अब्बड़ दिन मा।''

मोटियारी किहिस। सिरतोन वोकर चेहरा दमकत रिहिस अब। उछाह के उजास आवय येहा। दोनगी के दूधपीया लइका घला ढ़कार मारत हाबे अब । 

"अब तो किचन मा मिक्सी अउ आनी-बानी के जिनिस आगे हे बहिनी ! हमरो धंधा वोकरे सेती मार खा गे हाबे वो ! अब अइसन पथरा के का बुता ? तभो ले मन नइ माढ़े अउ किंजार लेथन गाॅंव -गाॅंव, पारा-पारा। फेर कतका ला किंजरबे वो ?  पहिली तो मोहाटी मा सुस्वागतम लिखाये राहय। कपाट ला ढ़केल के चल देवन। अब तो घरो घर कुकुर पाले हाबे। कुत्ते से सावधान लिखाये रहिथे। डर लागथे काकरो घर जाये-आये बर। हबराहा कुकुर मन गरीब ला देखते साठ भुके लागथे अउ मोटियारी होगे तब तो दू गोड़ के कुकुर घला लार टपकाथे।''

मोटियारी अब्बड़ मरम के गोठ ला किहिस अउ अब्बड़ आसीस दिस।

"तोर कुटूम्ब के मान बढ़े वो !''

"लोग लइका मन दूधे खावय अउ दूधे अचोवव वो !''

"तोर गोड़ मा काँटा झन गढ़े बहिनी!''

"....अउ तोर चुरी अम्मर राहय वो बहिनी! तोर डीही मा दीया बरत राहय बहिनी ! अउ आनी-बानी के आसीस।''

अहा......मोटियारी के अतका आशीर्वचन। मन अघागे। सौंहत कोनो भगवान उतरे हाबे अँगना मा अइसे लागत हाबे। 

अब तो मोर लइका घला आगे रिहिस। पिज्जा ला धरके। मोर रिस तरवा मा चढ़गे। 

"बेटी! भात-बासी ला खाये बर केहेंव तब मुॅंहू नइ चलिस। ....अउ पिज्जा नपाके ले आनेस। कहाॅं ले पइसा पायेस तौनो ला बताना उचित नइ समझेस। जौन ला नइ खावंव कहिके छोड़े रेहेस। तौने ला ये लइका अउ सील वाली दीदी हा अघावत ले खाइस। अभिन नानचुन हावस जादा झन उड़ा वो !'' 

"मम्मी ! तेहां घलो तो कभु पिज्जा नइ खाये हावस वो! तोरो मन करत होही ? मोर नानी हा पइसा धराये रिहिस तौने पइसा ले लाने हॅंव वो  पिज्जा ला । .....अउ अकेल्ला खाये के रहितिस तब उही कोती ले खाके नइ आ जातेंव मम्मी।''

".... ले मम्मी खा ले।''

बेटी अब एक प्लेट मे ले आनिस मोर बर पिज्जा ला अउ आने प्लेट मा मोटियारी बर ले आनिस।

"अई, अइसना रहिथे बहिनी ! पिज्जा हा।''

मोटियारी देख के किहिस अउ लइका मन घला ललचावत रिहिस।‌... अब मोटियारी अउ वोकर लइका मन घला पिज्जा खावत हाबे। अउ मोला तो अपन हाथ ले मोर मयारुक बेटी हा खवावत हाबे। 

"....अउ तेहां बेटी ?''

ले मम्मी तेहां ससन भर खा। मेंहा तो खातेच रहिथो। 

नोनी किहिस अउ एक कुटका ला दुलरवा बेटा बर राखिस। वोकर स्कूल के छुट्टी सांझकुन होही। देवर के बेटा घला आ गे रिहिस अब जम्मो कोई बाॅंट के पिज्जा खाये लागेंन । 

"ले बहिनी बइठो। अब, महूं हा  सोज्झे अपन घर जाहूॅं। तुंहर मया पाके आज मइके के सुरता आगे। मोर कोती ले येला राख ले।''

मोटियारी किहिस सील ला देवत। 

"नइ राखव दीदी ! तेहां बेचके दू पइसा कमाबे। मोला अभिन जरुरत नइ हाबे फेर जब जरूरत होही तब तोर करा ले बिसा लुहूॅं।''

"नही बहिनी ! येला अब अपन घर नइ लेगो मेंहा। तुंहर घर के मोर गौटनीन दाई हा अब्बड़ हियाव करे रिहिस हमर‌। अब्बड़ करजा हाबे मोर उप्पर।

"तभो ले झन दे।''

".....मोर भतीजी के बिहाव बर वोकर फुफू कोती ले ये जोरन आवय मोर कोती ले राख ले। नोनी मन कब बड़े हो जाथे जानबा नइ होवय। अभिन ले बर-बिहाव के जोरन ला करत रहिबे तब एक-एक जिनिस हा वो  बेरा बर पूरा होथे। राख ले बहिनी मोर गरीब के चिन्हारी ला। ..अउ जिनगी के का भरोसा बहिनी ! जीयत रहिबोन कि उड़ा जाबोन ते ..? वोकरे सेती राख ले।''

मोटियारी अब गिलोली करे लागिस । अब तो मना करे के कोनो जगा घला नइ दिखत हाबे। एक नत्ता-गोत्ता अउ जुड़त हाबे। एक मया अउ बाढ़त हाबे।

"ठीक हाबे ....ले आन।''

महूॅं हा अब वोकर मया के आगू मा हरा गेंव। सील ला झोकेंव अउ अब देवता कुरिया मा लेग गेंव।... अउ अब जतन देयेंव। अब अइसे लागत हाबे जइसे अब मोर नोनी हा बड़े  होगे अउ अब बिहाव के तियारी करत‌‌‌ हाबो। ....अउ सिरतोन दाई-ददा मन तो बेटी के बिहाव के तियारी वोकर जनम धरते साठ शुरु कर देथे। 

कुरिया मा गेयेंव अउ सौ-सौ के दू नोट लानके मोटियारी के दूनो लइका ला धरायेंव।

भलुक अब्बड़ नही किहिस फेर आज नत्ता-गोत्ता जुरियावत हाबे।

"अपन मामी कोती ले देवत पइसा ला मना नइ करे भांची-भांचा हो !... झोंक ले। ...अउ येदे लुगरा मोर ननंद बर...!''

मेंहा केहेंव अउ मोटियारी के खाॅंध मा नवा लुगरा ला डार देंव। मोटियारी अब एक बेरा अउ गोहार पार के रो डारिस। अउ सिरतोन महूं तो रो डारेंव नवा नत्ता-गोत्ता पाये के उछाह मा। खोर के निकलत ले देखेंव मोटियारी अउ लइका मन ला। ...अउ मोर नोनी के उप्पर नजर थिरागे। आमा खोटली के कढ़ी भात खावत रिहिस।

"अब्बड़ सुघ्घर बनाये हावस मम्मी सब्जी ला। मजा आगे अउ ये ईज्जा-पिज्जा मा पेट नइ भरे मम्मी ! पेट भरथे ते तोर हाथ के जेवन मा। मोर हिरोइन मम्मी !''

लइका अब दाई बरोबर दुलार करत महूं ला खाना खवावत हाबे।...एक कौरा.... दू कौरा.....।

...अउ मोर आँखी मा फेर अरपा-पैरी छलछलाये लागिस। सिरतोन नारी के मन कतका कोंवर होथे...?  दू टिपका आँसू बोहाइच जाथे।


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              चन्द्रहास साहू 

                 धमतरी