Saturday, 30 May 2026

बिग्यान, भूगोल, खगोल, अउ चउथा रसायन।*


    

*बिग्यान, भूगोल, खगोल, अउ चउथा रसायन।*

            ए चारों मा मिलावट नइ होना चाहि जइसे_धरती, अगास, आगी, पानी, हवा। एमा मिलावट होय मा बिस्कुटक जनमथे। बिग्यान, भूगोल, खगोल ल मइनसे नई बना सके येमन अपन अनुसार चलथे, जेकर संगे संग मनखे चलथे। रसायन सिरिसटी मा मउजुद हे जेकर इजाद करके मेडिसिन नवा- नवा दवाई बनाथें। जेकर ले कुछ भी उत्पादन समय बेसमय करथें।

      हमर छत्तीसगढ के बारों महीना के तिहार मा बिग्यान, भूगोल, खगोल के परभाव देखेल मिलथे। जेमा मउसम के खास मेल मिलाप हे।

     जैव विविधता, प्रकृति संस्कृति संग लोक परब के मानव  जुड़ाव। सबों जीव सब्बों मउसम मा नइ दिखे _मेचका, सांप, कीरा मकोरा, पशु ,पंछी। डारा पाना के हरियई अउ सुखई। चिरइयां, गोंदा कतरो पानी रितो ले अभी नइ जामे। बीज के अवधि दिन। 

    बिग्यान, भूगोल,खगोल वो आय जेकर गति ल कोनो रोके नइ जा सकय। एक बार बिग्यानिक प्रयोग होय के बाद सदा मानव बर रद्दा बन जाथे। एला मानव चक्र या फसल चक्र मान लेवय।

       कृषि के बिग्यानिक पोठ परम्परा बर आदिम मानव कोती जाना चाहि जेन भोजन के तलाश मा जंगल- जंगल घुमत रिहीन। जेन मन सबले पहिली झूम खेती करके मानव मनबर भोज्य श्रृंखला तियार करीन जेन सब्बो जीव के काम आइस। आगी, पहिया के खोज करीन।

    जब बिग्यान के गोठ बात होथे वो जघा चमत्कार ल नइ लाना चाहि एकर ले वास्तविकता के खंडन होय लगथे बिग्यान के हनन होथे। माथा बने खोदीया के खोजे ल छोड़के बैसाखी के सहारा मा खड़े होथे। तहां आधा दूध आधा पानी हो जाथे।

         जब बिज्ञानिक शोध परख करत हन ता बाजारवाद ले बचना चाहि। बिशेष कर कथा, कंथली ले। जीनगी के ब्यथा हा कथा बन जाथे। सबले पहिली कहीं कुछू बनथे तेकर पिछू सजथे। अउ सजे वाले ल अउ सजा देबे ता काय बनही..? सबले पहिली उघरा मनखे ल कपड़ा पहिनाव, फेर भात खवाव, तब गाना गवाव। झोपड़ी ल घर बनाव, रोटी कपड़ा, मकान कइसे आइस समझाव। मानव सभ्यता के बिकास कइसे होइस.. काय ओला मिलगे तेकर खुशी मा तिहार मनाइस। अलग अलग दिन बादर म अलग_ अलग तिहार काबर मानथे..? तिहार मनाय के जीनिस मा तको अंतर हे..ये मनखे काकर पूजा करत हे.. फेर हर साल उहीच दिन बादर।

            

              मदन मंडावी

समीक्षक के दुरूह दायित्व ला सफलता ले निभाय हे पोखनलाल जायसवाल*


 *समीक्षक के दुरूह दायित्व ला सफलता ले निभाय हे पोखनलाल जायसवाल*


 छत्तीसगढ़ी साहित्य म रचनात्मक लेखन बहुत होय हे।वो दिखथे भी, फेर गंभीर और संतुलित समीक्षा लेखन अपेक्षाकृत कम दिखथे।अइसन समय मा *“विमर्श के कसौटी म समकालीन छत्तीसगढ़ी साहित्य”* समीक्षक के रूप म पोखन लाल जायसवाल जी के ये कृति हर केवल समीक्षा-संग्रह नोहय, बल्कि समकालीन साहित्यिक प्रवृत्ति के परखइया अउ आलोचनात्मक दृष्टि के परिचायक बन के सामने आय हे।

पुस्तक के भूमिका म डाॅ विनोद कुमार वर्मा जी लिखे हें, "पोखनलाल जायसवाल जी छत्तीसगढ़ी में अबाध गति से विमर्श करने में सिद्धहस्त हैं। उनके स्वभाव में विमर्श है। चिन्तन उनकी प्रवृत्ति है। प्रतिभा उनकी चेतना है। उनके विमर्श का यह संयोजन मौलिक, विद्वतापूर्ण, चिंतनपरक सुस्पष्ट होने के साथ-साथ जनजीवन की सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं आदि का न केवल उद्घाटन करता है बल्कि विवेच्य को समष्टि के साथ सम्बद्ध कर देखना उनके विमर्श का मूल आधार है। उनके विमर्श में विवेचना, विश्लेषण और प्रभावात्मकता कूट-कूट कर विद्यमान है, जो उन्हें समीक्षकों की कतार में अलग एवं विशिष्ट स्थान देता है।"

समीक्षक ने इस किताब में 15 लेखकों के 18 पुस्तकों की समीक्षा लिखी है। 

वे पुस्तकें हैं-

1.हीरा सोना खान के (खण्ड काव्य) :मनीराम साहू

2.गति-मुक्ति (कहानी संग्रह) :रामनाथ साहू।

3.तैं तो पूरा कस पानी उतर जाबे रे(काव्य संग्रह) :शोभामोहन श्रीवास्तव

4.तुतारी(कहानी संग्रह) :चंद्रहास साहू

5.ठग अउ जग (लोककथा संग्रह) :वीरेंद्र सरल

6.बहू हाथ के पानी (उपन्यास) :दुर्गा प्रसाद पारकर

7.बेरा-बेरा के बात (काव्य संग्रह) :पीसी लाल यादव

8.जयकारी जनउला(छंदबद्ध काव्य) :कन्हैया साहू

9.गजामूँग के गीत(दोहा गीत संग्रह) मनीराम साहू

10.बहुरिया (कहानी संग्रह) चोवाराम वर्मा

11.ढेंकी(कहानी संग्रह) सुशील भोले

12.मोटरा संग मया नँदागे(निबंध - गद्य संग्रह) बलदाऊ राम साहू

13.पाँखी काटे जाही(गज़ल संग्रह) :राजकुमार चौधरी

14.फुरफुंदी(बालगीत संग्रह) :कन्हैया साहू

15.हमर स्वामी आत्मानंद (चम्पू काव्य) चोवाराम वर्मा बादल

16.मोर गाँव गँवागे(काव्य संग्रह) जीतेंद्र खैरझिटिया

17.मोर अँगना के फूल (काव्य संग्रह) वसंती वर्मा

18 वीर हनुमान सिंह (खण्ड काव्य) :मनीराम साहू

मोर सौभाग्य ये कि ये पुस्तक पढ़े बर मिलिस। समीक्षा-विमर्श के ये संग्रह अतेक पठनीय रहत होही कहिके मोला आकब नइ रहिस ।या फिर ये समीक्षक के कलम के कमाल होही कि विवेचनात्मक पुस्तक मा घलो मोला पढ़े के रस मिलगे।समीक्षा मन ला पढ़त-पढ़त अइसे लागत रहिस, जइसे लेखक मन के पुस्तक ला मैं पढ़ लेंव।

छंद के छ के संस्थापक गुरुदेव अरुण कुमार निगम जी अपन विचार व्यक्त करत लिखे हें, "पोखनलाल जायसवाल जी एक साहित्यकार के रूप मा छत्तीसगढ़ी के गद्य अउ पद्य दुनों विधा मा सृजन करत हे।सृजन के अलावा उनकर रुझान पुस्तक समीक्षा डहर घलो होगे हे। छत्तीसगढ़ी साहित्य बर ये शुभ संकेत आय।"

उन ये भी कहिन, " छत्तीसगढ़ी साहित्य के समीक्षक पुरोधा डाॅ बल्देव साव के कमी ला पूरा नइ करे जा सके फेर उनकर जाय के बाद समीक्षा विधा ला गति देहे के सुग्घर काम पोखनलाल जायसवाल जी करत हे। "

जायसवाल जी पुस्तक मा अपन गोठ रखत कहे हे," मोर ए कोशिश हे कि जिंकर भी किताब मोर हाथ लगे हे उन ला मैं अउ पाठक मन तिर पहुँचाय के उदिम करौं ।उही उदिम के एक ठन कोशिश अभी सउँहत ये विमर्श अउ समीक्षा के पुस्तक हरे। मोला पूरा अजम अउ विश्वास हे कि मोर ए कोशिश खच्चित रंग लाही अउ लिखइया-पढ़इया मन उत्साहित हो के एक दूसर ला मन ले पढ़ही, अउ नइ ते पढ़े के प्रयास करहीं। "

पुस्तक मा हर समीक्षा के पहिली विषय-वस्तु मा पोखन लाल जी सुग्घर भूमिका बाँधे हे, विधा के जानकारी दे हे। समीक्षा मा तटस्थता हे।चूँकि समीक्षक कवि घलो आय, शिल्प अउ भाव के साथ साथ रस छंद अलंकार के चर्चा घलो गंभीर हो के करे हे। जउन-जउन जघा लेखक मन ध्यान खींचे हे, मुक्त भाव ले प्रसंशा के साथ कमी-बेसी के उल्लेख घलो करे हे।

वाकई समीक्षक के काम मानसिक श्रम माँगथे। 18 पुस्तक के समीक्षा यानि जम्मो पुस्तक ला पहिली पढ़ना फिर चिंतन करना, गुण-दोष के विवेचना करना अउ फिर वोला लिखना अउ तन-मन-धन लगा के पुस्तक के आकार देना, साधारण आदमी के बुता नोहय।एकर सेती आज वरिष्ठ मन घलो आज पोखनलाल जी ला खुले मन ले आशीर्वाद देवत हें। वो स्वयं कतको कहानी, गीत-नवगीत, छंद अउ निबंध जइसे विधा मा लिखत हें।छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी दोनों भाषा मा समान अधिकार ले लिखथें।

 रचना के समीक्षा ले रचनाकार मन ला अउ अच्छा लिखे के प्रेरणा मिलही, कलम सजोर होही।समीक्षक के हाथ मा पड़ के लेखक मन के पुस्तक के सही मुल्यांकन होथे। सुग्घर समीक्षा के ये उदिम बर पोखन लाल जायसवाल जी प्रसंशा के पात्र हे।साथ ही ये पुस्तक "विमर्श के कसौटी म समकालीन छत्तीसगढ़ी साहित्य" बर पोखन लाल जायसवाल जी ला गाड़ा गाड़ा बधाई। ये पुस्तक ला पढ़ के निश्चित ही लोगन छत्तीसगढ़ी साहित्य ला पढ़े पर प्रेरित होही, अइसे मोला विश्वास हे।


:बलराम चंद्राकर

सिसदेवरी, जिला बलौदाबाजार

Thursday, 28 May 2026

लघुकथा ) घर के उजार

 (लघुकथा )


घर के उजार

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वसुंधरा हा रोवत दूधमूँहा नोनी ला पाये बिहनिया बर्तन माँजे-धोये ला बइठे हे।आज चाय बनाके तको नइ पिये हे। हाथ हा चलत नइये। मनमाड़े फूले हे। वोकर गोसइया बल्लू हा नशा मा धुत्त सुते हे। रतिहा मारपीट करे हे। अस्सी-पचयासी साल उमर के सियनहिन सास हा हालत ला समझके कइसनो करके अँगना-परछी ला बाहरत हे।

  वसुधा के आँखी टप-टप चूहत हे।बेचारी हा गुनत हे-- दाई ददा मन पाँच साल पहिली कतका सोच-विचार के, मोर बेटी रानी बरोबर रइही कहिके,खुशी-खुशी वोकर बिहाव बल्लू संग करे रहिन हे। एके झन बेटा, पाँच एकड़ खेत, बढ़िया चलत किराना दुकान। महूँ हा कतका जादा खुश रहेंव।

 फेर तीन बछर पहिली सियान ससुर हा जइसे परलोक सिधारिस, बल्लू हा पियक्कड़ मन के संगति मा परके बर्बाद होगे। दुकान तको बंद होगे। रात-दिन गाली गलौच अउ मारपीट--घर मा कलह समागे।जिनगी मा दुख के पहाड़ गिरगे।

 वसुंधरा हा अचानक उठिस अउ खोली मा आके एक ठन बेग मा कपड़ा-लत्ता ला जोर के बाहिर निकलच अउ परछी मा बइठे अपन सास के पाँव परिस। सियनहिन सास हा आशीर्वाद देवत कहिस-- " घर ला तियाग के जावत हस बेटी-- ले जा, आज नइ रोकँव। महूँ नारी अँव, तोर दुख ला समझत हँव। मोर का हे आज जियत हँव-काली सिरा जहूँ। दे तो नोनी ला चूमन दे। "

वसुधा हा वोकर कोरा मा बइठार दिस। सियनहिन हा मया करके वापस देवत कहिस -- ले जावव बेटी। सुखी रइहव।

वसुधा घर ले निकलगे।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

रिसता परगे सिट्ठा*

 *रिसता परगे सिट्ठा*


           छत्तीसगढ़ हा खाली नाँव के छत्तीसगढ़ नोहय येहर अपन भाव ल मनखे मा झलकाथे। फेर जेन किसम के आजकल मइनसे के आदत बेवहार ल देखथन ओमा पहिली के अउ अबके मा गजब अंतर आवत -जावत हे। इहाँ मया -पिरा, सुख -दुख के  आमा,अमली हा कभु जोत्था -जोत्था फरय- फुलय अउ ममहावय, गुरतुर कोइली कस भाखा - बोली अंतस ल मंदरस कस जनावय ।

      अब जतेर के मनखे मेरन सुख सुबिधा संसाधन बाढ़त जावत हे वतरे के मया अँखरा के पतरावत हे। जइसे पेट हा बोजाथे अउ दलिदरी भगाथे , तहाँ  रंग रंग के गोठियाथें। मसीन के सिलाए कपड़ा ल नाप जोंख के बनाय जाथे, जेन हर गजब दिन ले टिकथे। अब रेडिमेंट उठवा के जमाना छा गेहे जउँन ला जइसन जमथे बिसा लेथें। उठवा जिनीस जलदी पटपटाथे अउ चिराथे घलोक , काबर कि ओकर सिलना मजबूत नइ रहाय। उठवा कपड़ा के उठवा मोल, फ्राक, कुरता, पेंट, कंटोप। अब भइगे आज के मया परेम उठवा कपड़ा - लत्ता कस बनके रहिगे हे, बजार म मिल जथे। चरदिनिया... नवा - नवा मा बकबकासी लगथे।

      पहिली नून, तेल, हरदी, मिरचा ल सइघो नाप तउँल के लेवँय अउ सील लोड़हा मा पिसय। अब पाकेट मा बँद मिलत हे। लिखाय रइथे _पहले स्तेमाल करें, फिर विश्वास करें। कोनो दिन नत्ता -रिसता सिमट  जाहि ता गड्डी नइ ते पैकेट मा मिलही। 

वातावरन,परिवेस हर नाता- रिसता ल बनाथे अउ बिगाड़थे। आज कोनो ला काकरो संसो फिकर नइ हे। अब जाइदा रोटी, कपड़ा, मकान के कोनो ल कमी नइ होवत हे, रोजी- रोटी , मंजूरी घरे तीर मा मिलत हे। कोनो ल जाँगर टोर कमाय के जरूरत नइ हे। ना कोनो ल काकरो मेरन हाथ लमाय के जरूरत  पड़त हे, बस इही अहंकार मनसे ला मनसे ले धुरियावत हे। आदमी दू - चार पइसा काय नइ कमइस अपन ल भूलागे।

  सगा- पहुना बर सनमान के भाव मा एक लोटा पानी, गरम चाहा एक मुठा भात अउ मीठ - मीठ गोठबात बने सनबन्ध के गाँठ जोरे के नियम रिहिस हे। आज चाहा ह स्वाहा होगे...ओकर रंग फरियाके मतउला होगे हे।

   सगा - सोदर मन आके दु -  चार दिन रहिके एक दुसर के सुख  - दुख ल जानँय । छोटे बड़े रिसता के मुताबिक आसीरबाद देवय जुग - जुग जियव, दुदे खाव दूधे अँचोव , तुहर पाँव मा काँटा झन गड़य। चुवा लेके ऊँचा उठे के रसता बतावँय । अब अहू नंदागे...। वो दिन परोसी तको पुछय तुँहर घर सगा काय रोटी लाय हे। अब तो सगा रोटी के जघा ल बजरहा खजानी मिठई हर लेलिस । वो समे गजब धुर - धुरके सगा संबंधी तक ल सोरिया लेवयँ । अब तो रिसता टूटे के कगार बनथे। वो बेखत गजब दिन के आय -जाय सगा हर बिताय दिन के सुरता करत हँसय ता दुख के सुरता म रोवय घलोक जेकर ले रिसता खासम खास बन जावय। अब तो तुरते आवत - जावत हें ।

      आज छोटे - छोटे बात ल धरके रिसा के नाता टोरे बर देर नइ करय। कुछ दिन तो माइलोगिन मन बीता भरके चेंदरी बर तको झगरा कर लेवय अउ नहीं ता मुँहु ल ओथार के घर ले निकलय।

      बीच मा टीवी हा गाँव, पारा, मोहल्ला के रिसता ल खतम करिस ओकर ले चार गुना मोबाईल हर दंदोरत हे। अब काल बदल गेहे _  पहिली वर्तमान, भूत, भविष्यकाल होवय अब _  कॉल, मिस कॉल, वीडियो कॉल के जमाना हे। ये सब्बो काल ल लील के मोबाईल हर महाकाल बनके जिनगी ल जंजाल बना देहे । बेरा कुबेरा नइ लगे  दुख के आँसू ल नाख के भार बोहावत हे। साँच,  लबारी के दरसन नइ हे। मोबाईल के आय ले जोहार भेंट कही देबे केहे के जमाना खतम। टुरी - टूरा ल बिना नेंग, लगिन -भाँवर के पल्ला भगा देथे। अब तो सियान के नियाव के घलोक कदर नइ हे।

      बात केवल सगा सोदर के नइ हे इहाँ सग्गे नत्ता -रिसता के तेवर बदल गेहे। अपन हा बैरी परोसी मितान होवत हे। त कभु घर के मेन कार्यक्रम ल ओकर कका, ददा , बबा, भाई - भौजी, फूफा - फूफी, दीदी - भाटो  तक नइ जानय ओकर नइ रेहे ले तको नेंग - दस्तूर के काम बुता ल दुसर मन निपटा देथें। बाँटें भाई परोसी के कहावत ल सिद्ध करत हें। अपन - अपन ल पुछव दुसर के काय जरूरत हे। अब तो नेवता अइसे देथयँ आयल भाही ता आय नइ ते मजा उड़ाय , ओकर बिना काम थोरीक अटक जाहि । अब नत्ता रोवय के गावय..! ना समधी के भेंट ना बहु के जेठ, होगे बिन टंगिया के बेंठ। खँड़े रिसता,  परे डरे रिसता। अब रिसता बोलय नही मुक्का होवत हे, टूटत रिसता ल जोरे राखे बर तुरपाई करेल परही।

     प्रश्न जनमथे _ जाइदा सुख सुविधा लोगन ला भरमा के दुविधा पइदा तो नइ करत हे..?  सबो मइनसे अपनेच जइसन ल संगवारी बनाही ता एक दुसर मा समानता कइसे आही..? 

      रिसता न टूटे हे  न जुरे हे बस रही - रही के खियावत हे। आज कोनो ह कोनो ल नइ सरेखत हे। भई गे नत्ता के कटोरा परत हे जुछ्छा,  रिसता परगे सिट्ठा । 


                      मदन मंडावी

            ढारा, डोंगरगढ़ छ. ग.

आज के भक्ति मार्ग

 आज के भक्ति मार्ग 


मोला लगथे भगवान हा, चाहे जड़ होवय या चेतन, चर होवय या अचर,  सबो बर उंखर सुभाव के अनुसार नियम बनाए हे। कोनो भी होय हमेशा एक समान नइ रहय। बरसात के मौसम ले बसंत ऋतु तक प्रकृति के सुंदरता देखे के लाइक रथे। तहॉं ले पतझड़ शुरू....मनखे यदि अपन सुभाव म सदा बहार रथे त ओला कोनो फरक नइ परय। फेर कहूॅं थोरको प्रसिद्धि पा जथे त ओकर भाव झन पूछौ भाई, सातवॉं आसमान म चढ़ जथे। स्वाभिमान के नॉंव म पइधथे गरब, गुमान, घमंड। अउ दिमाग ओतके 

तेज घलो भागे लगथे। "हर्रा लगे न फिटकरी रंग चोखा" के हाना ल सकार करे लगथे। खोजत रथे कहॉं ले दू पइसा बचा लॅंव, खाली बचा लॅंव नहीं रपोट लॅंव। एकर बर मनखे के चतुराई, चलाकी के जवाब नहीं। हमर असन लेड़गा के दिमाग के ट्यूब लाइट देरी म बरथे। चोक दे बर परथे। फेर ए गरब गुमान जादा दिन नइ चलय। दुनिया ल देखाए बर संत। भीतरे भीतर पनपत हे विकार अनंत। 

           मनखे के पूछ परख गुणवत्ता के अधार म होथे ए बात सही ए। फेर खाली गुणवत्ता काम नइ आवय। चापलूसी चाटुकारिता के बहुत बड़े रोल रथे। काखर पदवी बढ़ाना हे, काला माछी कस निकाल फेंकना हे एकर ऑंकलन बर ए भक्ति मार्ग बहुत ज़रूरी हे। हमर एक अधिकारी रहिन। उन ककरो कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट लिखे के चार खंभा बनाए रहिन। चारो खंभा ल बराबर दस दस नंबर दे रहॅंय। कहॅंय के तुम एक खंभा -काम के गुणवत्ता म भले पूरा नंबर दे के लाइक हौ, लेकिन बाकी तीन खंभा; चापलूसी, सेवक, अउ तीसरा; दूसर काय करत हे ओकर खबर पॅंहुचाना एमा कहूॅं जीरो पा गेव त सब बेकारे हे न.....।  अउ एकर उलटा करके देखौ:- तीन खंभा के तीस नंबर... भले गुणवत्ता म झन पाए रहव। तौ कभू न कभू जीवन म ए बात होवत दिखबे करथे।


जय जोहार 🙏🌹

भरम

 भरम  

             चार जबर मजबूत खंभा के उप्पर टिके रहय ……. एकठिन बडे जिनीस छत । ओखर खाल्हे म जम्मो मनखे अपन जिनगी ल ...... सुख से बितावत रहय । उही छत ल अपन आश्रयदाता मान के ....... ओखर ऊप्पर बिश्वास करके ... ओकर पूजा करय .... । संगे संग चारों ठिन खंभा के भरोसा करके ...... इंखरो पूजा कर लेवय मौका मौका म । पहिली खंभा हा ....... जम्मो झिन के अगुवा रहय । कइसे रहना जीना खाना हे .... अउ काये करना हे ..... तेखर बर नियम बनावय । दूसर खंभा हा सरी काम काज करत ..... देख–रेख करय । तीसर खंभा हा देखय के .... काकरो संग अन्याव झिन होवय । चौथा खंभा हा ...... बने काम के प्रशंसा करय अउ गलती ला उजागर करय । जम्मो खंभा के आपस म बनेच दोस्ती घला रहय । चारो ल इही बात के अभिमान रहय .... के उहीच मन अतका बड छत ल तान के राखे हाबय ।

                     एक दिन .. धन दौलत ..... मान सम्मान के बडोरा अइस । चारों खंभा डगमगाये लागिस । बडोरा के कचरा काडी मन ...... खंभा म चटक के दाग लगाये बर सुरू कर दीस । पहिली खंभा हा ..... बडोरा ला सहे नइ सकिस ..... वो कमजोर होके फोंगला होए लागिस । धीरे धीरे बेईमानी के चारा ...... चोरी के तोप ...... घोटाला के शेयर म ...... कोयला के आगी सचरगे । स्पेक्ट्रम के बस्सावत हावा ...... आगी ल अतका भड़काइस के ..... पहिली खंभा खोरवा होगे । छत ले एकर संग साथ छूटगे । मनखे मन डर्रागे ...... छत झिन गिर जाय कहिके ...... । दूसर खंभा अइसने कमजोर रिहीस ...... एकर वइसने कोन्हो जब्बर अधार नइ रिहीस ...... उप्पर ले गरब के जहर अउ अकर्मन्यता के पाप हा एकर हाथ ला टोर दीस । अभू एकरो संग छूटगे छत ले । सरलग ले दू ठिन खंभा के डगमगाये ले चारों डहर रोआ राही मातगे । फेर छत नइ गिरीस । तीसर खंभा डहर आसा ले ...... टकटकी लगाए देखे लगिस जम्मो । उहू ल भय अउ लालच के अमरबेल अइसे धरिस के वोहा ..... उबर नइ सकिस अउ अपन दिमाग गवां डरिस । एहा तो अतका तक भुलागे कि काला धरके ठाढ़े हे ...... एकरो हाथ ले छत के पेंदी छुटगे । अभू चौथा खंभा उप्पर भरोसा करे के अलावा कोन्हो चारा नइ बांचिस । करीन घला ...... फेर उहू ला प्रलोभन के केंसर अउ कायरता के एड्स धर लिस । अभू एकर न आंखी दिखय न कान सुनावय ....... छत के पेंदी कतका बेर दूरिहागे ...... गम नइ पाइस । भगवान ल सुमिरे के अलावा कहींच नइ बांचिस ..... मनखे करा । 

                      छत गिरे ले ...... कतका नकसानी होही अउ ओखर पूरती कइसे होही ....... तेकरे बिचार सुरू होगे । छत उदुपले गिर जही ....... सोंच सोंच के जम्मो मनखे मन दुबराए लगिन । दिन ..... महिना ....... अउ कतको बच्छर नहाकगे ....... छत जेंव के तेंव अपन ठउर म स्थिर रहय । कोन जनी छत घला हाबे के निये ......... मनखे के मन म शंका उपजगे । खोजा खोज माचगे । पता चलिस ..... छत त हाबे ...... तभे एमन सुरछित हे । फेर ये छत काय माटी के बने हाबय ....... कइसे बने हाबे ....... कतका चेम्मर हे ....... बिगन कोन्हो अधार के कइसे फइले अऊ तने हाबे ...... बिगन धुरी के कइसे लटके हाबे .... इही हा सोंच के बिषय बनगे । 

               सोध उप्पर सोध चलिस । आखिरी म पता लगिस के ..... जइसे हमर धरती हा ..... अपन अउ सुरूज देवता के बीच ...... गुरूत्वाकर्षण बल म लटके हाबय ...... तइसने ये छत हा एक कोती हमर पुरखा मन के बिचार ..... आसीरवाद ……, नियम....... अनुशासन अउ संरछन के बल म ...... त दूसर कोती जनता के बिश्वास ..... प्रेम ...... भाईचारा ..... मेहनतकश के पछीना अऊ ईमानदारी के बल म ...... बिन लौकिक सहारा के लटके हे । 

              ये छत अउ कोन्हो नोहे भइया ....... हमर लोकतंत्र आए ..... जेला तान के राखे के ठेका लेवइया जम्मो खंभा अऊ मेयार मन ....... घुना खावत फोंगला ....... बीमार परे ...... सरत हे ..... बस्सावत हे । अउ छत अभू घला ...... छाती तान के जम्मो मनखे ल सुरक्षा देवत हे । खंभा अऊ मेयार के तिड़ीबिड़ी होये ले ...... मनखे के भरम  घला भकरस ले टूटगे के ...... हमर लोकतंत्र ..... ककरो सहारा म खड़े हे ।

 हरिशंकर गजानंद देवांगन छुरा

लघुकथा - "जे ठो मुँह ते ठन गोठ "

 लघुकथा - 

   "जे ठो मुँह ते ठन गोठ "

     -मुरारी लाल साव 

बेरा बेरा म सब के गोठ सुहाथे l कोन कब कइसे गोठियाही?सुने के बाद पता चलथे l चौरा चौरा म एक से एक दार्शनिक मन असन कतको बइठे मिल जथे l दुनियाँ भर के ठेका लेके बइठे हे l ओइसने 

एक दिन  श्री बी आर बी मिलगे l याने  भकला राम बावरा ओकर पूरा नाम हे l ओला ओकर पूरा नाम लेके बुलाबे त तमक जथे l पजामा धोती पहिने खांध म पटका डारे मेंछा दाढ़ी बढ़ाये पाछू कोती एक हाथ ला लुकाये बड़बड़ावत मिलगे l पूछ परेन -"बी आर बी जी धरती ला कोन धरे हे? बताहू का? " 

'"धरती ला मेह धरे रहेँव  अभीच मड़ायेंव!" कोन लेगे?

सहीच म बौरागे l सुध बुध कति हे ओला उहू पता नहीं l पगला नोहय  भकला नोहय ज्ञानी हे l

हमर पूछे के मतलब ये रहिस धरती ला कोन बोहे हे? फेर पूछ के देखेन -" धरती ला कोन बोहे हे,भकला भइया? 

धोखा होगे  तुंहर नाम ले परेन l

झन पूछ ओकर तरमराना l

गाली बके रहितिस ओकर पहिली हमन ओला महात्मा जी महात्मा जी कहिके मान देन l तब बी आर जी (भकला राम )शांत होइस l शांत होके कहिथे -" धरती ला मही बोहे हँव दिखत नइ ये का? "

ओकर दर्शन ज्ञान ओकर करा बताही त तो  हम जान बो?

बताना महात्मा जी! बताथे -"

मटकी ला देखत हस मोर मुड़ म हे l माटी के बने हे l माटी माने धरती l मटकी ल मही बनाये हँव मही धरे हँव l मही बोहे हँव l" 

जे ठो मुँह तेठन गोठ l ओकर का का नाम धरके बइहा बना दे हे l एम ए तक पढ़ाई करे हे नौकरी घलो नइ मिलिस l छोकरी घलो नइ मिलिस l खोर किंजरा होगे l कोनो कहत हे जांगर  चोट्टा हे l कोनो कहत हे  ओकर जवानी नइ फूटीस तेखर सेती बिहाव नइ करिस l कोनो कोनो तो ओला...l"

आज हमन ला मालूम होइस बड़े ज्ञानी हमर बीच म हे तेला पूछत नइ हन lहमर चौरा म भकला असनआदमी पगला बन के हाबय l उहू ला मंच देये बर पाँच लाख -दस लाख देके 

बैठार तीस त ओकर ज्ञान के लाभ सबला मिलतिस l बाहिर ले बुलाये का जरूरत! सतसंग करना हे सतसंग सुनना हे श्री "बी आर बी "कोती धियान दे ये पड़ही l इही सोच बिचार करके हमन जल�