Thursday, 5 March 2026

116 वें जयंती के अवसर पर छत्तीसगढ़ी के ठेठ देहाती कवि-कोदूराम दलित

 116 वें जयंती के अवसर पर


छत्तीसगढ़ी के ठेठ देहाती कवि

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श्री कोदूराम दलित अऊ उंकर सियानी गोठ

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डाँ.बलदेव:-


     लइका पढ़ई के सुघ्घर करत हवँव मैं काम

     कोदूराम दलित हवय मोर गंवइहा नाम 

     मोर गंवइहा नाम भुंलाहू, झन गा भइय्या 

     जनहित खातिर गढ़े हवॅव कुण्डलियां 

     सउक महू ला घलो हवय कविता गढ़ई के 

    .करथँव काम दुरूग मा मैं लइका पढ़ई के


         ए कुंडलियां हर दलित जी के व्यक्तित्व अऊ कृतित्व ल समझे कुंजी आय। ए नानकन मुक्तक म बहुत अकन गूढ़ संकेत है। भले ही उप्परे उप्पर एहर बड़ सरल रचना दिखत हे। सबले पहिली परिचय- लइका पढ़ई के काम वोहू म एक ठन बिसेषण लगा दिए गय हे सुग्घर अपन काम के अतेक गरब के वोकर फेर दुबारा कथन करथँव काम दुरुग मा मैं लइका पढ़ई के। काम के बाद नाम कोदूराम उपनाम दलित । ए ठेठ गॅवइहा नाम के परिचय देत बखत न संकोच के भाव अऊ न हीनता के बोध। अपन पाठक से जुड़े बर कवि के हिरदे म कतका कुलुक भुलाहू झन गा भइय्या । बिना उद्देश्य के साहित्य लेखन अर्रा आय, कवि लेखन के प्रति बड़ सावचेत हे। उन जन हित खातिर कुण्डलिया गढ़थें। कविताई के अतेक सउक के एकर पीछू खवई, पिवई सुतई सब बिसुर जाथे, एला आसक्ति कहे जाय के अनुरक्ति ? अभिघा सक्ति अउ प्रसाद गुन के ताना-बाना म बुनाय काव्य भाषा । ठेठ छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रयोग के बात चले म दलित जी के संगे संग उंकर जवरिहा अऊ आगू-पीछू के कवि पं. सुन्दरलाल शर्मा, पं. शुकलाल प्रसाद पांडेय, बिप्र जी, श्यामलाल चतुर्वेदी जइसन दो चार अऊ रचनाकर मन परथम पंक्ति में खड़े हो जायें, फेर छत्तीसगढ़ी कुंडलिया के बात निकलथे त उंकर मुंहरन म अऊ कोनो देखाऊ नई दयं ।.... मूड़ म उज्जर गांधी टोपी खफाय, खादीच के दग उज्जर धोती कुरता म देंह तोपाय, जवाहिर बंडी अऊ सर्वोदयी चप्पल के अलग रौब .... दुरिहा ले शास्त्री जी के भोरहा हो जाही। सुरता आवत हे सन् 1966 म भाठापारा म होय छत्तीसगढ़ी हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन के जिहां कवि- सम्मेलन के मंच म उनला शास्त्री जी के नाम से ही पुकारे गय रहिस... कद काठी ल देखके, ठेठ मसखरी म के श्रद्धा बस... लेकिन श्रोतामन के ताली के गड़गड़ाहट के बीच उंकर मंच म जोरदार सुआगत हो रहिस। हिन्दी के सताधिक साहित्यकार मन के बीच दलित जी के बिल्कुल अलग धज हिन्दी छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन बर बड़ गरब के विषय आय ।


      कोदूराम जी दलित ल छत्तीसगढ़िया, उंकर बोली, उंकर रहन- सहन खान-पान पहिनावा सब्बेच बर बड़ गरब रहिस। छत्तीसगढ़ी बोली के परसंग म उंकर सियानी गोठ हे “हमर छत्तीसगढ़ी बोली हर ब्रजभाषा साहीच सरल अऊ हाना मनन विसिष्ट अर्थ रखथें । " जे समय कोदूराम जी लिखे के सुरुवात करीन वोकर पहिलीच ले छत्तीसगढ़ी रचना के पेडगरी निकल चुके रहिस... छत्तीसगढ़ी दानलीला, भूल-भुलैय्या / कामेडी आफ एरर्स के आधार म लिखे गये खंडकाव्य अऊ हीरू के कहिनीं जइसन ऐतिहासिक महत्व के किताब मन छप गय रहिन, छत्तीसगढ़ी एक अइसन बोली आय जेकर भाषा के विकास अवस्था म ही बियाकरन लिखा गय रहिस। खड़ी बोली के छत्तीसगढ़ी खंभा मन के बाहिर घलोक म प्रतिष्ठा हो चुके रहिस... सिक्षा अऊ राजनीति के कमान हम इहां के धाकड़ नेता अऊ समाज सुधारक मन के हाथ म आ गय रहिस। पूर्ण स्वराज के मांग सुरु हो गय रहिस। गांधी जी भारत के राजनीतिक चेतना के प्रतीक बन चुके रहिन । हिन्दी म स्वच्छन्दवादी काव्य धारा के रोमानी स्वर के एही छत्तीसगढ़ी म छायावाद शीर्षक से नामकरन हो चुके रहिस। ए सबके वैचारिक जीवाणु मन दलित जी के दिलो-दिमाग में कुलबुलात रहिन होहय सवाल रहिस अपन कसकत दुर्दम अनुभूति अऊ विचार ल उन कउन भाषा में व्यक्त करें। महतारी के गोरस जइसे मीठ, सबल अऊ सुपाच्य छत्तीसगढ़ी बोली के मरम ल उन समझिन अऊ वोहीच बोली म लिखे लगिन, एकर बाद भी राष्ट्रभाषा ल उन कभू अनदेखा नई करीन, उंकर विचार अनुकरणनीय हे ये हर राष्ट्र-भाषा ल अड़बड़ सहयोग दे सकत है। वो समय हिन्दी भाषा भाषी क्षेत्र म आचार्य महावीर द्विवेदी के अउ मध्यप्रदेश म आचार्य भानु के अनुसासन रहिस। कोनो साहित्यकार मन ये आचार्य मन के अवहेलना नई कर सकत रहिन। हिन्दी म मुक्त छन्द के अतिसय आग्रह के बाद भी छंद के आग्रह छत्तीसगढ़िया कवि मन म जउन देखाऊ देथे, वोहर पिंगलाचार्य भानु के प्रभाव आय।  


          कोदूराम जी दलित के रचना-विधान ल समझे बर ये प्रसंग म उंकर बिचार घलो ह सहायक हो सकत हे "ये बोली मां खासकर के छन्द- बद्धता के अभाव असन हाबय । इहां कवि मन ला चाही कि उन ये अभाव के पूर्ति करयं। स्थायी छन्द लिखे डहर जासती ध्यान देंवे।" ये बात ल दलित जी खुदे अपन लेखन म चरितार्थ करथें ।


अपन बोली म लिखे के जोखिम उठाना हर कउनो अंचल विशेष मुक्ति आंदोलन ले कम महत्व के नोहय, बल्कि वोहर तो ए दिसा म सुरूआत आय। छत्तीसगढ़ी बोली ल भाषा के दर्जा दिलाय म दलित जी के लेखन के अहम् भूमिका आय, राष्ट्रीय ऐतिहासिक संदर्भ म ए हिस्सा ल काट के देखना हर आधा-अधूरा दृष्टि आय।


दलित जी छत्तीसगढ़ी के लोक जीवन अऊ संस्कृति के बड़ भारी पुजेरी ऑय । देखा दू डांड म उन इहां के सब्बोच महिमा के बखान कर डारे हैं-


   छत्तीसगढ़ पैदा करय, अब्बड़ चाऊर दार 

   हवॅय लोगमन इहां के सिधवा अउर उदार


              एतकेच नहीं इहां के अनलेख बन संपदा, किसिम किसिम के रतन के खदान घलोक बर उनला बड़ अभिमान है, लोहा जेहर कोनो भी राष्ट्र के रीढ़ के हड्डी होथे, इहेंच ढलथे इंहेच के लोग रोज आगी संग खेलथे लोहा ढलाई के दुख ला हंस हंस के झेलथें ।


भेलाई अऊ कोरबा बर कोन छत्तीसगढ़िया ल गरब गुमान नई होही । दलित जी के भिलाई शीर्षक कविता ह राष्ट्रीय एकता के दृष्टि ले एक महत्वपूर्ण रचना आय । दलित जी के हिरदे म जांगर टोरइया कमिया किसान के प्रति बड़ मया पीरा हे । उंकर श्रम के प्रति उनला बड़ घमंड हे । कमिया के तुलना सूरज से करके उन मेहनत के मान ल बहुत बढ़ा दे हावै -


    दिन भर कर काम कमिया टूटत ले कनिहा

    सूरूज साही सूतयं रात भर उठय बिहनिया


      'पांव' शीर्षक कविता म अकाट्य तर्क देके दलित जी एही निम्र वर्ग से आय कमिया मन के पूजा करे के सलाह देथें । दलित जी ला इहां के रोटी - पीठा, पहिनावा वर भी बड़ गुमान हें। उंकर बिचार म छत्तीसगढ़ के बासी म गजब के गुन भराय हे, उंकर सीख धियान देहे लाइक हे-


        कठिया भर पसिया पियो

          अऊ सौ बच्छर जिओ


           छत्तीसगढ़िया मनखे खुदे बासी खाथे अऊ आन ल तात्तात भात खवाथे। उंकर पहुनाई अऊ सिघाई घलोक हर छत्तीसगढ़ के गरीबी के कारन अऊ जी के काल आय। बंचकमन के तिहार लहुटे हे, अत्तेक धन- धान, दान-पुन के बाद भी छत्तीसगढ़िया धान के खाली कटोरा धरके भीख मांगे बर खड़े हे। अकाल अऊ सुरसा जइसे महंगाई एकरो ऊपर बंचकमन के चतुराई, हमन ल भिखारी अऊ ओमन ला मतवार बना देथे फूटहा लोटा म सोषक वर्ग के ऊपर तीखा व्यंग है। फूटहा लोटा ए बंचक मन ले देखते देखत लखपतिया बना देथे अऊ उन हमला हमर जमीन से बेदखल घलोक कर देथें.... सोचथौँ कभू दलित जी आज जिन्दा होतिन त ए अरबपति जउन मन अपन उद्योग-धंधा मढ़ाय बर हमर घर खेत गावं के गांव ल गटागट लीलत हैं, तेला देख के कइसन कविता लिखतीन.... । दलित जी हिरदे म भारी पीरा लेके ए धरती ले बिदा होइन होहयं । काबर उंकर एक पंक्ति म चेतावनी ले जादा तो पीरा हर ही झलक मारत है।


    धरती ला हथियाव झन धरती सबके आय 

    सिरजे हे भगवान सब्बों खातिर धरती ल


        एकर बाद भी दलित जी के उदारता के कोई जवाब नहीं, उंकर म कहीं संकीर्ण क्षेत्रीयतावाद के बदबू नइये। दलित जी सही मायने म गांधीवादी विचारधारा के कवि आयं, भूदान आंदोलन से भी उन जुड़े रहिन । सत्य अहिंसा अऊ चरखा उंकर हिसाब म सुराज अऊ स्वावलम्बन के अइसन मियार आय जेमा हमर ए लोकतंत्र हर टिके हे। एकरे बल म गांधी ब्रिटिश हुकूमत के मुरवा मड़ोर के ओला बिदारे म सफल होथें। गांधी जी के बलिदान ले दलित जी अवाक हे, मुस्किल से एतकेच कहि सकथें-


    रहिस जरूरत तोर आज चिटिको नहि अगोरे 

    अमर लोक जाके दुनिया ला दुख सागर मा बोरे


           देश जब सुतंत्र होइस त दलित जी मगन होके एक से बढ़ के एक जागरन गीत लिखिन । आजादी के सुवागत म उन मोटियारी नोनी मन ल ओरी ओरी दिया बारे बर कथे । काबर के एही हर उंकर बर सुरहुत्ती देवारी आय ।


चारों मुड़ा गांव म, घर म, गली-खोर म उजाला खुसियाली ही खुसियाली, दिसा-द्वार हांसे-कुलके लगथे- नोनी के दाई जुगुर - जुगुर दिया बात है, सुत उठके बड़े बिहनिया भउजी तिरंगा झंडा फहरावत हे, गलीखोर बन्दनवार अऊ धजा ले सज गय हैं। भारत माँ के पूजा होवत हे, जन गन मन के फाग चलत हे । अरुणकुमार दूध पी के किलकारी मारत है। मंजुलाकुमारी हांस - हांस के जय हिन्द करत है। चारों तरफ मंगल वर्षा होवत हे। इहां अरुण कुमार अऊ मंजुलाकुमारी व्यक्ति के सिवाय भाव के भी बोध करावत हे । लोकतंत्र के तिहार शीर्षक रचना हमर इन्द्रिय मन ला जगाय बर काफी हे- बड़ लोभ- लोभावन दृश्य हे देखा-


  हमर सास हर ठेठरी खुरमी भजिया बरा पकावय     

  लमगोड़वा भउजी के  भाई चोरा  चोरा के खावय


           वोती नाचा सुरू हो गय हे, घर अंगना म कहूं ल सल नई परत हे, भेद नई खुलही सोच समधिन छिनरिया वोही कोती सुटुर सुटुर रेंगत हे फेर भगवानी भांचा के कारन पोल-पट्टी खुल गइस-


   सुदुर सुटुर सटकिस समधिन हर देखे बर नाचा

   रोवत ओकर पिछलग्गा भागिस भगवानी भांचा


    छत्तीसगढ़ के कई अंचल म कई जात म भांजा बर कन्यादान के रिवाज हे, एकरे बर समधिन के लइका बर इहां भांचा शब्द के प्रयोग होय हे, फेर सटकिस हर बिलमे के अर्थ-बोध कराथे रेंगे के नहीं । अनुप्रास के चक्कर म दलित जी लोक चक्कर खा गय हैं। सुनो जी मितान म डंडा गीत के धुन के सुन्दर प्रयोग होय है-


    नारि नारि नाना हरि नाना गोसाई 

    आपस के झगरा होथे दुख-दाई 


       सुधार अऊ नव-निर्माण के गीत हर देसभक्ति के सच्चा परिचायक आय। दलित जी महान स्वप्न-द्रष्टा पं. नेहरू के सपना ल साकार होत देखिन अउ उमंग म वोकर फोटोग्राफी भी कर दीन-


       ये कतको बांध खना डारिस 

       कतको ठन नहर बना डारिस 

       पड़ती जमीन ला टोर टोर

       पानी मा करके सराबोर

       ये गजब अन्न उपजाव त हे 

       भूखमरी भगावत जावत हे


       बांध खना डारिस के जगा बांध-बंधा डारिस करे म ए चलन हर निर्दोष हो जातिस । दलित जी भविष्य द्रष्टा कवि आय, उन कभू लिखे रहिन- 


           एक दिन मनवा के लोहा ला 

           आजाद कराही गोवाला


       आगे चल के उंकर भविष्यबानी सच निकलीस। पंचायत के बारे म भी उंकर मन म सुखद कल्पना रहिस। सोंच म पड़ जाथों, पंचायत राज के वर्तमान अवस्था देख के उंकर आत्मा कइसे करत होहय.... पंचवर्षीय, अल्प बचत, परिवार नियोजन, सहकारिता, गोरक्षा, भूदान जइसन कल्याणकारी योजना अऊ आंदोलन मन सब्द के दुनिया में बड़ नीरस विषय आय, लेकिन निषेध के जगा विधान पक्ष ल लेके दलित जी एक से बढ़ के एक सुग्घर अऊ सरस गीत लिखे है, जेकर ले उंकर समसामयिक चेतना, समाजिक दायित्व अऊ रचना धर्मिता के प्रमान मिलथे। वस्तुवादी या उपयोगितावादी साहित्य हर प्रचार अऊ प्रसार के सुविधा के बिना भी एतेक लोकप्रिय हो सकत है, ए बात के सबूत दलित जी के ए रचना मन हवय । उंकर कविता के विषय म तुलसीदास के ये पंक्ति हर चरितार्थ होथे- 'निरस विसद गुनमय फल जासू'। दलित जी के रचना म जऊन ताप जऊन उष्मा हे वोकर भेद उंकर करनी अऊ कथनी के एका म छुपे हवय । उंकर ए आहवान हर हरेक जुग म नौजबान मन ल प्रेरना देत रही-


   मांगे स्वदेस श्रमदान तोर संपदा तोर विज्ञान तोर     

   जब तोर पसीना आ जाही ये पुण्यभूमि हरिया जाही


              दलित जी प्रगतिसील धारा के वाहक आय वैज्ञानिक प्रगति म उंकर आस्था हवय। उन अणु सूक्ष्म अऊ सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व ल दर्सन ले जोड़थे, जीवन ल सुन्दर बनाम बर विज्ञान के प्रयोग होना चाही। वोकर विनासक या निषेध पक्ष से उन ला सख्त नफरत हवय । दू डॉड एमेर देखे लाईक हे -


     बौराइन बमबाज मन बम ला करयं तैयार

     बमबाजी कर निठुर मन करथें नर-संहार

     उंकर प्रार्थना हे बम ला नष्ट करो हे

      बम लाई ए बम संकर ।


                     .विज्ञान के निषेध पक्ष ले आज समूचा वातावरन दूषित हो गय हे, एकर समन बर पेड़ लगाना ही सर्वोत्तम उपाय आय ।


    भाई अब सब ठउर मा अइसन पेड़ लगाव

    खाये खातिर फल मिलय, सुरता बर छांव


        दलित जी ए छांव अऊ फल के रक्षा घलोक बर सचेत हे... उंकर हिसाब म पेड़ लोड़ी भी देथे जेकर ले दुष्टन मन के सुधार किए जा सकत हे। बेंदरा बिनास करवइया मन बर दलित जी जंग रथें, उनला सुरता भर आना चाहिए दुष्टन के कहां तक कहे जाय- बिहाव म कन्या के चुनाव तक उनला दुष्टन के बराबर ख्याल रहथे। सभ्य समाज म जिये बर, गुंडा मन ला ठीक करना भी जरूरी हे दलित जी के मांग है-


   खटला खोजो मोर बर ददा बबा सब झन 

   खेखरीं सही नहीं बधनीन सही लाव

   गुण्डा के मुंह मा चप्पल मारय फट ला 

   खोजा ददां-बबा तू मजा के अइसन खटला


      छत्तीसगढ़ मूलतः कृषि प्रधान राज आय दलित जी वोकरे बर गाय ल लक्ष्मी मान के उंकर सेवा के सिक्षा देथे, वोकर से पिये बर दूध, खातू बर गोबर, नांगर-गाड़ी खीचे बर बइला मिलथे । गोबर जइसे तुच्छ जिनिस बर उंकर विज्ञानिक दृष्टि हवय । छेना थापे के जगा उन खातू बनाय ल जादा लाभकारी बताथों राख जइसे चीज के उन उपयोग ल समझथें । एकर से उंकर गांधीवादी वृत्ति के पता लगथे। गांधी जी छोटे-छोटे बात पर भी ध्यान देवय। कोदूराम दलित जी मूलतः कृषि-संस्कृति अऊ प्रकृति के कल्यान रूप के सफल चितेरा आय। चद्रमास सीर्षक उंकर लम्बा रचना एकठन छंद देखा-


    धाम दिन गइस, आइस बरखा के दिन 

    सनन सनन चलै पवन लहरिया 

    छाये रथे अकास म चारों खूट धुआं साही 

    बरसा के बाद निच्चट मिम्म करिया 

    चमकय बिजली गरजे घन घेरी बेरी 

    बरसे मूसलाधार पानी छर छरिया 

    भरगे खाई - खोंधरा कुंआ डोली डांगर ओ 

    टिपटिप ले भरगे नदी-नरवा


    युग्म सब्द के मोह म एमेर दलित जी खोंधरा अऊ डांगर घलोक म पानी भरो दे हावैं अइसन प्रयोग से बचना चाहिए। चउमास दलित जी के प्रतिनिधि रचना आय एमा मत्तगयंद अऊ किरीट सवैया के प्रयोग होय हे । मरत हाथी के चाल अऊ परबत श्रेणी मन के ऊपर जइसे छाये बादर के सादृस्य विधान एमेर अनूठा हवय। एक जगह दलित जी संस्कृति के इतिवृत्तात्मक सैली म किसिम किसम के रुखराई, चार- चिरौंजी, जरी-बूटी, जीव-जन्तु के बिस्तार ले गिन्ती कर डारे हे, एकर से कविता बड़ कमजोर अऊ नीरस हो गय हे, अइसन वर्णन पं. लोचन प्रसाद पांडेय के रचना म भी देखे बर मिलथे, एत्तेक सचेत कवि मन के अइसन कोरा वर्णन के पीछे का कारन हो सकत हे। संभवत: छत्तीसगढ़ के बन-बैभव संपदा अऊ खांटी शब्द मन के सरक्षण के चिंता एकर एक कारन हो सकत हे ।


       कोदूराम दलित जी के गीत, 'हमर गांव पढ़के' प्यारे लाल गुप्त के लिखे हमर कतका सुग्घर गांव, जइसे लक्ष्मी जी के पांव के सुरता आ जाना सुभाविक आय। मूल संवेदना एक होय के बाद भी दूनों रचना म सूक्ष्मता अऊ स्थूलता, संक्षिप्तता अऊ विस्तार के अंतर हवय । गुप्तजी के रचना म चिकनाई अपेक्षाकृत जादा हें धान कटाई, जोताई, जइसन मेहनत के काम म भी सुधराई खोज लेना दलित जी बर सहज आय । चन्देनी गीत म ए गीत के सैकड़ों बार मंचन हो चुके हे अऊर एकर, प्रसिद्धि गांव-गंवई तक पहुंच गय हे। ध्वनि, प्रकास अऊ रूप रंग के मनभावन दृश्य वाला ए रचना म अर्थ व्यक्ति या डायरेक्टनेश के वर्णन चातुरी अद्भूत हे 16+12- 28 मात्रा के हरिगीतिका अऊ सार के छंद-विधान देखे लाइक हे-


   छन्नर छन्नर चूरी बाजय खन्नर खन्नर पइरी 

   हांसत कुलकत मटकत रेंगय बेलबेलहीन टूरी 

   काट काट के धान मढ़ावय ओरी ओरी करपा

   देखत मा बड़ नीक लागय सुंदर चरपा के चरपा    

   लकर-धकर बपुरी लइकोरी समधिन के घर जावय          

   चुकुर चुकुर नान्हें बांबू ला दूदू पिया के आवय 

   दिदी लुवय धान खबा खब भाठों बांधय भारा    

   अऊहाँ शकँहा बोहि महि के लेजय भउजी व्यारा


          काम म हाथ बंटाय बर दीदी भांठो लइकोरही समधिन घलोक आ गय है। पूरा कुटुम काम-धाम म भिड़े हे। भरदराय काम म समूह के ताकत, सिंगार बीर अऊ वात्सल्य के तिरबेनी, द्विरुक्ति, अऊ सब्दमैत्री के सरल प्रवाह, बिल्कुल धमनी के हाट जइसन सब्द चयन। साफ-सुथरा अऊ मनमोहक ए रचना म अनुप्रास के लरी मन संगीत पैदा कर देथे संस्कृत भाषा के भातृ सब्द हर कै सौ बरिस के जात्रा करिस होहय छत्तीसगढ़ी म तो परूष-ध्वनि के बाद भी कहत सुनत म बड़ नीक लागथे' भांटों' जे कोण ले देखा ए हीरा के कटाव ह प्रकास के परावर्तन / अर्थ-बोध / के साथ चमक चमक उठथे। " भांटो"


          आज के जटिल अनुभव, उग्रविचार जीवन के कटुता विसंगति अऊ दिसाहीनता के कारन कविता के परंपरागत ढांचा मन चरमरा के कुटकुट्टा हो गय हे अऊ पद्य के जगा गद्य हर ले ले हावै। तभो ले दलित जी के एन रचना मन हमला आस्वत करथे के आजो भी छंद के महत्ता हावै । एकर से रचना में स्थिरता, अऊ सम्प्रेषणीयता के गुन आपे आप आ जाये। दलित जी अपन दीर्घ काव्ययात्रा म रोला, दोहा, उल्लाला, हरिगीतिका, चौपाई, पद्धति, मांत्रिक छंद, म जइसन सिद्धि मिले हे, वोहर आने जगा दुर्लभ आय । दलित जी के कुंडलिया मन नीति अऊ सिक्षा हवॅय, लेकिन हास्य- व्यंग्य के पाग से बड़ चटकारे दार बन गय है। दलित जी के कुंडलिया मन जीवन अऊ जगत, व्यक्ति अक समाज, दर्सन विज्ञान अऊ राजनीति सत्तालोलुपता अक मेहनत याने समग्र जन जीवन के दर्पन आय दलित जी के हास्य-व्यंग्य मन काफी पैना है, जेकर ऊपर चोट पड़थे वो तिलमिलाय के बाद भी खलखला के हांस डारथे, यही हर हास्य-व्यंग्य के आदर्स आय मापदण्ड आय ।


          हरही के संग कपिला के बिनास बहुत पुराना मुहावरा आय, "लेकिन दलित जी के कलम म निथर के ओही धारदार हो गय है। कुसंगति के परिनाम सुनो-


   बिगड़े कपिला गाय खाय के सब के चीज बसला

   जउने पाय ठठाय अऊर टोरय नस नस ला


स्वार्थी अऊ अवसरवादी के पटन्तर एक ठन कुंडलिया म दलित जी टेटका से दे हावे देखा कतका सही दृष्टांत हावे-


    मूड़ी हलावय टेटका अपन टेटकी संग 

    जइसन देखय समय ला तइसन बदलय रंग 

    तइसन बदलय रंग बचाय अपन वो चोला 

    लिलय गटागट जतका किरवा पाय सबो ला 

    भरय पेट जब पान पतेरा मां छिप जावय 

    ककरो जावय जीव टेटका मूड़ी हलावय


         राजनीति के क्षेत्र म दंवधतिया अऊ पन पेटया म जादा तपथें । सत्ताधारी के पांव चाट के उन समाज बर बड़ घातक बन जाथे, उन अपन औकात भुलाके सबे के मूड़ म चढ़े खोश थे अइसन मन बड़ा मन के तुलना दलित जी पतंग से करथे अऊ कड़क बोली म चेतावनी देथे-


        गिर जाबे तैं धागा कटही तउने पल मा

   बचा नहीं सकिही उन उड़थस जिनकर बल मा


      अखबार लोकतंत्र के चउथा खंभा आय, लेकिन पीत पत्रकारिता के बढ़त ल देख के उन कउवा जाथे। स्वास्थ बस पेपर ला झन पिस्तौल बनाओ, जइसन कथन हर समझइया मन बर भारी फटकार आय। पं. शुकलाल प्रसाद पांडेय जइसन दलित जी अपन पेसा (मास्टरी) के प्रति ईमानदार रहीन वो मन बच्चा मन के बड़ हितैषी आयं । एकरे बर भारी मात्रा म सरल पदावली म बाल-साहित्य के रचना करे हबय। माता-पिता गुरु पोथी के सेवा, सपूत अउ कपूत, कायर अऊर बीर, सिंह अऊर सियार जइसन परस्पर विरोधी गुण के पात्र ल आमने सामने रख के लइकन मन के चरित्र-निर्माण के दिसा म एक कवि मन बड़ योगदान करे हैं। कविता म कॉनट्रास्ट या विरोधाभास पैदा करना कवि के निजी विसेषता आय । खटारा साइकिल ऊपर ले हास्य पैदा करथे लेकिन भीतरे भीतरे अध्यात्म के दुनिया घलोक म ले जाथे। गृहस्थ जीवन के मन ल छू लेने वाला चित्र, निरमोही धनी के दर्सन, बिरहीन के बिनती दलित जी के भावुक हृदय के प्रतिबिम्ब आय । एमेर उंकर हृदय के विदग्धता के दरसन होथे ।


              कोदूराम जी दलित के कविता-संसार बड़ व्यापक है, वोकर कई ठन विसेषता हवय । पहिली तो विषय के विविधता, दूसर चटकदार मुहावरा मनके प्रयोग तीसर हास्य-व्यंग्य के तेजधार चौथा छंद मन के कसाव, खासकर कुंडलिया के नाग-मोरी कसाय, आखर थोरे अरथ अति वाला ठेठ छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रयोग जेकर से डंकर कविता म बड़ कड़कपन आ गय

हे । एकठन अऊ बड़े अउ अंतिम विसेषता के उंकर रचना म कोनो काल या स्थान विसेष के व्यामोह नइये, एकर बर हर समय उंकर प्रासंगिकता बने रहही ।


            वोइसे तो समय के तेज बहाय म कोन कहां किनारे लग जाही, कोनो ला पता नइये । त फेर कोनो रचनाकार के कोनो रचना बर कोन. किसिम के भविष्य बानी करना अर्रा आय। सार बात तो एतकेच आय कि कोन रचनाकार हर अपन समय अऊ समाज के संग कतका दूरिहा तक चल सकिस, कतका मनला प्रभावित कर सकिस अऊ कतका उंकर से प्रभावित होइस। आज के जमाना मा राजनीति के आघू साहित्य के का बिसात वोकर आघू हर दीन-हीन अऊ निरतेज हो गय है। आज के दिसाहीन धुरीहीन समाज म जब बड़े-बड़े साहित्य मनीषी के अस्तित्व खतरा म पड़ गय हे त हम साधारन छत्तीसगढ़ी रचनाकार मन के का बिसात? आज तो पूंजीपति अऊ सत्ताधारी मन के दलाल तथा कथित जनरलिस्ट मन के ही पूछ पुछारी हे, तभ्भो ले हमरो बीच कुछ अइसन ईमानदार, सुआभिमानी साहित्यकार मन यसः काय शरीर म जिंदा रथे जेमन बताथे के स्वस्थ समाज अऊ बेहतर दुनिया के निर्मान म आजो भी उंकर दरकार है, अइसन साहित्यकार मन म एक नाम कोदूराम दलित जी के भी हवय ।

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('छत्तीसगढ़ी काव्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि" समीक्षा ग्रंथ  भाग एक से साभार)

लेखक डाँ. बलदेव के किताब से

प्रस्तुति:-बसन्त राघव

पंचवटी नगर,मकान नं. 30

कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़,

छत्तीसगढ़,basantsao52@gmail.com मो.नं.8319939396


लोकाक्षर जून-2000, छत्तीसगढ़ी से वक अगस्त 20002 अंकों में

Sunday, 1 March 2026

लघुकथा ) आफत

 (लघुकथा )


आफत

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ट्रेन ला अगोरत स्टेशन मा बइठे-बइठे अपन मोबाइल मा वाट्सऐप, फेसबुक मन ला कोंचकत रहेंव। वोतके बेर एकझन अधेड़ महिला हा आके कहिच--

"ये बाबू थोकुन मोबाइल ला देबे का?"

"काबर वो?"--मैं पूछेंव।

"मोबाइल ला घर मा भुलागेंव हा बाबू। चरडबिया मा आवत हँव कहिके बेटा ला लेगे बर स्टेशन आ जबे कहिके फोन करहूँ?"

नारी परानी के सहायता करना चाही सोचके वोला मोबाइल ला दे देंव।

वोहा थोकुन दूरिहा मा बइठे बीस-पचिस बछर के एक झन नोनी ला थमा दिच। वोहा नम्बर लगा के लम्बा चौड़ा पाँच-छै मिनट ले गोठियाये ला धरलिच। मजबूरी मा मोबाइल ला माँगे ला परगे।

गाड़ी आइच तहाँ ले बइठगेंव। वोमन कती गेइन तेला नइ देख पायेंव। गाड़ी हा स्टेशन ले निकले बस पाये रहिसे एक ठो अनजान नंबर ले कड़क अवाज में फोन अइस- " हलो --हलो--हलो --"

"हलो हलो --तैं कोन अच भइया?"

"अरे तुम कौन हो पहले बताओ? जादा सयाना मत बनो। इसी नम्बर से कुछ देर पहले मेरी पत्नी का फोन आया था? कहाँ है वो। घर से झगड़ के भागी है?"

मोर माथा झंनागे। मन हा कहे ला धरलिच के आज तैं आफत मा परगेच। अउ भलमनसी देखाबे?

मैंहा वो फोन करइया ला कहेंव- "मैं कुछु नइ जानवँ आदरणीय। भल ला भल जानेंव।कुछु परेशानी मा होही कहिके मांगिस ता फोन ला दे परेंव।फेर एक झन अधेड़ महिला हा रायपुर स्टेशन मा माँगे रहिसे। वोमन कती गेइन तेला नइ जानवँ। "

मैं चुपचाप लकर-धकर स्विच आफ करेंव।

जइसे घर पहुँचेंव। सब ले पहिली थाना जाके ये घटना ला लिखवायेंव।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

लघुकथा) -------------- *संस्कृति बदलत हे*

 (लघुकथा)

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*संस्कृति बदलत हे*


          हमर छत्तीसगढ़ मा अपन माटी, अपन संस्कृति,अपन पुरखा अउ सियान मन के सम्मान करे के रिवाज सदियों ले चले आवत हे। अगहन महीना मा दाई अन्नपूर्णा के कृपा हा साक्षात् बरसथे, जब हमर धनहा डोली मा उपजे फसल हा लुआ टोराके कोठार मा आ जथे, माटी महतारी अउ गाँव के देवी देवता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करे के ये बहुत बढ़िहा मौका होथे।

        

             अउ तब फेर सिलसिला चालू होथे मड़ई मेला के, गाँव-गाँव मा उछाव होथे,चार महीना के चौमासा ले थके हारे मन, अपन प्रियजन ला पाके गदगद हो जाथे अउ जिनगी ला नवाँ ढंग नवाँ उमंग ले जीये बर प्रेरणा देथे।


                फेर आज हमर संस्कृति ऊपर घलो शराब के संस्कृति हावी होवत जात हे जउन हमर विरासत ला लीले के जबर ओखी बन गेहे।


         अइसने एकठन गाँव मा मड़ई के आयोजन होइस, सब लोग बाग खुशी मा नाचत गावत राहँय, बाजा-रूंजी संग गाँव के जम्मो लइका, जवान, सियान मन माता देवाला, ठाकुरदेव ला मनावत गुड़ीपारा के चौक मा सकलाय हे, ओतके बेरा मंच ले उद्घोषक हा कहिथे...........!!!


        आप जम्मो ग्रामवासी अउ तीर तखार ले आय पहुना मन के पैलगी करत हँव...... आप सबके हार्दिक स्वागत हे, अभिनंदन हे। गाँव के जम्मो देवी देवता के पूजा अर्चना के बाद अब सबो सियान मन के सम्मान करे जाही। 


         ततकेच बेरा एक झन दरुहा लड़बिड़- लड़बिड़ करत मंच मा चढ़के चिल्लाय बर धर लिस, ओला मंच ले उतारे बर सब हाँव-हाँव करे बर धर लिन, भरभर-भरभर एती-ओती लोगन मन भागत हे,लइका मन के रोवाराही परगे,झूमाझटकी मा सब तितर-बितर होगे,माइक घलो टूटगे,भीड़ हा बगियागे।हमर संस्कृति कोन डहर जात हे,सोंच के मोर मति छरियागे।




🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छग

7354958844

लघुकथा एक दृष्टि*

 *लघुकथा एक दृष्टि*

       कथा साहित्य मं तीन कथा उपन्यास, कहानी अउ लघुकथा शामिल करे जाथे। ए तीनों कथा ला आकार के दृष्टि ले क्रिकेट के भाषा मं टेस्ट, वनडे अउ टी-20 क्रिकेट के जइसे देखे जा सकत हे। फेर शिल्प (बुनावट/बनकट) मं अइसन नि होवय। तीनों मं कथानक, पात्र/चरित्र, संवाद अउ देश-काल या वातावरण चार तत्व मूल रूप ले पाए जाथे। साहित्य के कोनो विधा होवय, ओकर लेखन के अपन एक उद्देश्य होबे च करथे। एहा कथा साहित्य बर घलो लागू होथे। जउन ल कथा साहित्य के पचवइया तत्व माने जाथे।

      हर विधा के अपन एक शिल्प होथे। जेकर ले वो विधा मं लिखे गे जिनिस ला साहित्य के कसौटी मं कसे जाथे। परखे जाथे। बिल्डिंग कतको बनथें, फेर जरुरत के पूर्ति संग आने-आने नाव दिए जाथे। स्कूल, ऑफिस, मंदिर, घर...।

       कथा साहित्य मं सिरिफ लघुकथा हा एक अइसे विधा होथे जेन मं लेखक के प्रवेश मना रहिथे। जउन ल लेखकीय प्रवेश कहे जाथे। जेन मं लेखक अपन गोठ/विचार ला पात्र ले नइ कहवा के खुदे कहि देथे। लेखक कहूॅं लघुकथा मं एक पात्र हे तौ वोला लेखकीय प्रवेश नइ माने जाय। कहानी मं लेखकीय प्रवेश के गुंजाइश पूरा-पूरा रहिथे। लघुकथा टी-20 क्रिकेट जइसे फटाफट चलथे। एके घटना होथे। इही लघुता हा लघुकथा के खासियत आय। कहानी अउ उपन्यास मं उपकथा शामिल हो सकथे। एकर कथानक/घटना क्षण विशेष के होना चाही। लघुकथा मं कालांतर एकदम नाम मात्र के रहिथे। लघुकथा अउ टी-20 क्रिकेट मं अंतर ए रहिथे कि क्रिकेट मं जीत-हार के रूप मं रिजल्ट तय रहिथे। फेर लघुकथा मं बहुत अकन पाठक बर छोड़ दिए जाथे। एक पंच लाइन के संग पूरा करे के प्रयास होथे। जउन ह खासकर संवाद के रूप मं होथे। 

        बहुत झन मन छोटे आकार के कहानी ला लघुकथा समझ  या मान लेथें। कहानी पूरा होय ऊप्पर ले पाठक बर कोनो सवाल नि छोड़े। ओकर उद्देश्य भले कतको सवाल खड़ा करथे।फेर लघुकथा अइसे खत्म करे जाथे कि पाठक के मन मं कई ठन सवाल छोड़ दै। 

       आखिर मं इही कहिहूॅं कि लघुकथा (विधा) अउ लघु कथा (कथा के छोटे रूप) दू अलग-अलग बात आय।

०००

पोखन लाल जायसवाल

भेंड़ा अउ बेन्दरा वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी लोक कथा


भेंड़ा अउ बेन्दरा


वीरेन्द्र ‘सरल‘

एक जंगल में एक भेड़ा अउ बेन्दरा ह अलग-अलग ठउर में रहय। अलग-अलग किंजरे अउ खाय-पिये। एकदिन उदुप ले दुनो झन के एक ठउर में भेट होगे। दुनो झन एक-दूसर के परिचे जानिन अउ मितान बधगे। अब दुनो झन एके संग खाय-पिये अउ किंजरे। जंगल में  चार-तेन्दू असन किसम-किसम के फर ला देख के बेन्दरा ह पेड़ में चढ़े अउ तोड़-तोड़ के खाल्हे में गिरावत जाय, भेड़ा ह सबला सकेल के राखे, बेन्दरा ह पेड़ ले उतरे तहन दुनो मितान मन के अघात ले खाय। अइसने-अइसने अड़बड़ दिन बीतगे। 

एक दिन के बात आय, दुनो मितान जंगल में किंजरे बर गे रहय। बेन्दरा ह चिरई जाम के पेड़ में चढ़के फर ला तोड़त रहय। उही बेरा ओला भेड़ा संग ठट्ठा मढ़ाय के शउख लागिस। 

ओहा भेड़ा ला किहिस-‘‘ मितान फर ला सकेले में आप मन ला गजब बेरा लागथे, फर हा धुर्रा-माटी में सना घला जथे तेखर ला आप मन अपन मुँहू ला उला के मोर कोती ला देखत रहव। मैंहा बने तुक के फर ला आपके मुँहू में फेकहूं तहन आप मन बने गप ले खा लेहू।"

 भेड़ा ह भल - ला - भल जानिस अउ हव कहिके अपन आँखी ला मूंद के अउ मुँहू ला बने खोल के पेड़ उप्पर चढ़े बेन्दरा कोती ला देखे लगिस। मौका पाके बेन्दरा ह भेड़ा के मुँहू में खखार के थूक दिस। 

भेड़ा ह थू-थू करत जंगल कोती भागिस। भेड़ा ह भागत-भागत घनघोर जंगल में पहुँचगे । ओहा निचट थकगे रहय। थोड़किन सुस्ता लेथव कहिके ओहा एक ठन पेड़ के खाल्हे में बइठगे। थकासी के मारे ओखर नींद ह पड़गे। नींद उमचिस तब ओहा देखथे के दिन ह बुड़गे रहय। जंगल ह सांय-सांय करत रहय। अब डर के मारे भेड़ा के जीव ह पोट-पोट करे लगिस।

भेड़ा ह मने-मन गुनत रहय-‘‘हे भगवान! मैंहा तो अलकरहा आफत में फंसगे हवं। रतिहा होही तहन बघवा भालू, हुर्ड़ा-चितवा मन अपन-अपन माढ़ा ले निकल के किंजरही? कहूं उखर नजर मोर उपर पड़ जाही तब तो मोर जीव नइ बांचे, अब मैहा काय करवं?"

डर के मारे भेड़ा ह अपन जीव बचाय बर अउ रतिहा पोहाय बर येती-ओती चारो कोती ठउर खोजे लगिस। तभे ओला जंगल भीतरी बने ढुरी रक्सीन के घर ह दिखगे। ओहा उनिस न गुनिस अउ सोझे उहींचे खुसरगे।

 वतका बेरा ढुरी रक्सीन ह जंगल में किजरे बर निकले रहय। घर ह निच्चट सुन्ना रहय। भेड़ा ह बने हरहिन्छा घर ला चारो कोती किंजर-किंजर के देखिस। उहाँ रंग-रंग के खाय-पिये के जिनिस माढ़े रहय। भेड़ा ह खुश होगे। ओहा पहिली हकन के बने पेटभरहा उहाँ माढ़े मेवा-मिष्ठान ला झड़किस अउ आराम से बइठ के सोचे लगिस। ये ठउर ह तो मोर बर गजब सुघ्घर हे फेर ढुरी रक्सीन ह आके हाँक पारही तब काय कहूं। ढुरी रक्सीन ले बाँचे बर भेड़ा ह एक उपाय सोचिस।

रतिहा होईस तहन ढुरी रक्सीन किंजर के अपन घर पहुँचिस। कपाट ह भीतरी कोती ले बंद रहय। ढुरी रक्सीन ला बड़ा अचरज होईस। ओहा मने मन म गुनिस, अई! मैंहा तो कपाट ला बाहिर ले बंद करके गे रहेव। कोन बैरी मोर घर में खुसरगे हावे दई। 

ओहा गुसिया के चिचियाइस-‘‘अरे! मोर घर में कोन बैरी ह खुसरे हव रे।‘‘

ढुरी रक्सीन के के आरो पाके भेड़ा ह सुकुरदुम होगे। जीव में धुकधुकी समागे। फेर ओहा उप्पर छावा हिम्मत करके किहिस-‘‘अरे! कोन आय रे, मोर नाव नई सुने हावे का? भेड़ा-भेड़ा भेड़-भेड़ाकिन, सांप के आरी बनावव, बिच्छी के तुतारी बनावव, बन भंइसा ला नागर फांदव, ढुरी रक्सीन ला भुंज के खावव अउ बधुवा ला तीन थप्पड़ लगावव।‘‘

अनचिन्हार जिनावर के अइसन अवाज ला सुनके ढुरी रक्सीन के सिट्टी-पिट्टी गुम होगे। डर के मारे ओहा ठाढ़े-ठाढ़ सुखागे। ओहा सोचिस, ये ददा! लागथे कि मोर घर में कोन्हो बड़ा भारी जिनावर ह आके अपन माढ़ा बना डारे हावे। जीव बचाना हे तब इहाँ ले भागे ला पड़ही नई ते पराण नइ बांचे तइसे लागथे। ओहा तुरते उहाँ ले पल्ला भागिस।

रद्दा म ओखर भेट बघवा संग होगिस। बघुआ ह ओला देख के पूछिस-‘‘काय बात आय ढुरी रक्सीन बहिनी! अइसन काबर भागत हस?‘‘

ढुरी रक्सीन रोवत-रोवत किहिस-‘‘ काय बात ला बतावव बघुआ भइया! कोन जनी कोन जिनावर मोर घर में अपन माढ़ा बनाय हावे, हाँक पारथावं तब सांप के आरी बनाव, बिच्छी के तुतारी बनाव , बनभंइसा ला नांगर फांदव, ढुरी रक्सीन ला भुंज के खावव अउ बघुआ ला तीन थप्पड़ लगाववं कहिके मुही ला धमकी देथे।‘‘

 येला सुनके बघुआ ह खखवागे ओहा भड़क के किहिस-‘‘ अरे! ओखर अतेक हिम्मत, मैहा ये जंगल के राजा अवं अउ ओहा मोला तीन थप्पड़ लगाव कहिथे, चल तो भला मैहा देखथवं।‘‘

बघुआ के पाछू-पाछू ढुरी रक्सीन फेर अपन माढ़ा में पहुंँचिस। ये पइत बघुआ ह हाँक पारिस। बघुआ के दहाड़ ला सुनके भेड़ा के होश उड़ागे। ओहा आधा डर आधा बल करके फेर अपन मंतर ला पढ़ दिस। 

   अब तो बघुआ के हिम्मत घला पस्त होगे उहू अपन जीव बचाय बर उहाँ ले भागिस। अइसने-अइसने सांप बिच्छी, बनभंइसा संग रद्दा में ढुरी रक्सीन के भेंट होइस। सबो झन हिम्मत करके ढुरी रक्सीन के घर में जाय अउ भेड़ा के मंतर ला सुनके डर के मारे लहुट जाय। कोन्हो के हिम्मत घर में खुसरके वो अंजान जिनावर ला देखे के नई होय। अब ओ घर में ढुरी रक्सीन ह आय-जाय बर छोड़ दिस अउ भेड़ा ह हरहिन्छा अपन माढ़ा बनाके उहां रहय।    धीरे-धीरे उहाँ के खाय-पिये के सब समान सिरागे। भेड़ा ह ढुरी रक्सीन के घर के बने -बने जिनिस ला खा-पी के बने मोटागे रहय। अब ओहा गुनिस अब इहाँ रहना ठीक नइहे। कभु कहूँ मोर भेद ह खुल जाही तब इहाँ के जिनावर मन मोर पराण ला ले बिना नइ छोड़े। एक दिन झिमझाम देखके भेड़ा उहाँ ले कलेचुप भगागे।

अब भेड़ा ह अपन मितान बेन्दरा के घर पहुँचिस। ओला देख के बेन्दरा ला अपन करनी बर बहुत पछतावा होइस। ओहा लजा के अपन मुड़ी ला नवा के बइठगे। 

भेड़ा ह ओला कहिस-‘‘मितान अब लजाय के कोन्हों बात नइ हे जउन होना रिहिस तउन होगे।‘‘ 

भेड़ा के गोठ सुन के बेन्दरा के हिम्मत बाढ़िस। ओहा भेड़ा ला पूछिस-‘‘कइसे मितान! अतेक दिन ले कहाँ रहेव? बने मोटागे हावव, लागथे मनमाने माल पुआ झड़के हव।‘‘

भेड़ा ह अपन सब हाल - चाल ला साफ-साफ बतादिस। बेन्दरा ललचाके कहिस-‘‘ मितान! महू ला ढुरी रकसीन के घर के पता बता देतेव तो कुछ दिन महू उहां ले मालपुआ झड़क के आ जातेंव अब तो इहां जंगल के सब फल - फलहरी मन झरगे हावे खाय-पिये के कुछु नइ बांचे हे। देखव ना, मैहा कइसे भूख पियास में निच्चट दूबर-पातर होगे हवं।‘‘

भेंड़ा के जीव ह तो भीतरे- भीतर जरत रहय। ओला बने बदला ले के मउका मिलगे। ओहा बेन्दरा ला जंगल में ले जाके ढुरी रक्सीन के घर के पता ला बता दिस अउ ओला समझा के कहिस-‘‘देख मितान! ये घनघोर जंगल में हमेशा बघुआ-भालू, हुर्ड़ा-चितवा के डर बने रहिथे। तुमन भीतरी में खुसर के कपाट ला बंद कर देव अउ कोन्हो आके हाँक पारही तब मैं बतावत हवं उही मंतर ला भीतरीच ले पढ़हू। भेड़ा ह उही सांप ला आरी बनाव, बिच्छी के तुतारी बनावव, बनभंइसा ला नांगर फांदव, ढुरी रक्सीन ला मार के खावं अउ बघुआ ला तीन थप्पड़ लगावव वाला मंतर ला बता के उहाँ ले कलेचुप लहुटगे।

   बेन्दरा ह भीतरी में खुसर के कपाट के संकरी ला लगा दिस अउ भेड़ा के छोड़े जूठा-काठा जिनिस मन ला आरूग समझके खावत-पियत रहे लगिस।

येती बहुत दिन बाद ढुरी रक्सीन ला अपन घर के सुरता आइस। ओहा सोचिस, बहुत दिन तो बितगे हावे। मोर घर में जउन जिनावर ह कब्जा जमाय रिहिस ओहा अब भागगे होही। अइसे सोच के ओहा अपन जुन्ना घर में धमक दिस। 

     ढुरी रक्सीन ह फेर अपन घर के मोहाटी तीर जाके चिचया के कहिस-‘‘अरे! ढुरी रक्सीन के घर में कोन खुसरे हव रे?‘‘ 

बेन्दरा ह डर के मारे भेड़ा के बताय मंतर ला भुलागे अउ हुप-हुप करके येती-ओती उछले-कूदे लगिस। उछले-कूदे के अवाज ला सुनके ढुरी रकसीन ला शंका होगे ओहा कपाट तीर में जाके सेंध डहर ले देखिस, तब उहाँ बेन्दरा ह कूदत रहय। बेन्दरा ला देख के ढुरी रक्सीन के एड़ी के रिस तरवा में चढ़गे। 

     ओहा मने मन किहिस-‘‘रहा ले ले रे बेन्दरा! तोर सेती मैंहा गजब दुख भोगे हवं अब तोर मजा ला बतावत हवं।‘‘      अइसे सोच के ओहा उल्टा पाँव उहाँ ले लहुटगे अउ जंगल  में जाके ये बात ला बघुुआ-भालू, हुर्ड़ा-चितवा,सांप-बिच्छी सब ला बता दिस। सब के जी तो खखुवाय रहय। ओमन सब तुरते बेन्दरा ला मारो-मारो कहिके दौड़िन। सब झन मिल के ढुरी रक्सीन घर के कपाट ला तोड़ दिन अउ बेन्दरा ला पकड़ के वहा मार मारिन कि बेन्दरा मार के मारे दंदरगे।

मार के मारे बेन्दरा सिहरगे रहय। ओहा हाथ जोड़ के सबले माफी मांगत किहिस-‘‘ एक बेर मोर जीव ला बचा देव ददा हो ! आज मैंहा अपने करनी के फल ला भोगत हवं। मैहा अपन मितान भेड़ा के मुँहू में हाँसी-ठट्ठा करत हवं कहिके  थूंक पारे रहेव। हाँसी-हाँसी ह मोर टोटा के फाँसी होगे। आज भगवान ह मोर मुँहू में थूक दिस। मोला मोर करनी के फल मिलगे। इही पाय के कहे जाथे, जइसे करनी तइसे फल, आज नहीं ते मिलही कल।


बोड़रा ( मगरलोड)

जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)

महतारी भाँखा के जतन जरूरी हे

 विश्व महतारी भाँखा दिवस के अवसर मा...


महतारी भाँखा के जतन जरूरी हे


                    छत्तीसगढ़ी...... काय ए? सिर्फ भाषा या बोली? नही छत्तीसगढ़ी हमर मान ए, अभिमान, पहिचान ए। जइसे कोनो ला बंगाली बोलत सुनथन ता जान डरथन कि  वो बंगाल के ए, कोनो ला मराठी बोलत सुनथन ता जान डरथन कि वो महाराष्ट्र के ए, वइसने छत्तीसगढ़ी बोली छत्तीसगढ़ के पहिचान ला बताथे।भाषा या बोली सिर्फ मनखे के नही बल्कि देश, राज अउ अंचल के पहिचान होथे। ता का हमला अपन पहिचान ल भुलाना चाही? नही न…. कोनो लइका के चहेरा मुहरा आचार विचार अउ चाल चलन ल देखत कतको मन बता देथे कि वो फलाना के लइका ए। काबर कि ओ लइका म ओखर ददा दाई के पहिचान दिखथें। वइसने छत्तीसगढ़ी हमर माई बोली आय, जे हम ला पहिचान देथे। रंग रूप, खानपान, पहिनावा ओढ़ना, पार परम्परा अउ संस्कृति संस्कार के संगे संग भाँखा बोली घलो पहिचान के एक आभिन्न भाग आय। यदि हमन अपन बोली भाँखा ले भागबो त हमर पहिचान घलो नँदा जही। कोनो लइका ला ओखर ददा दाई के अलावा दूसर के लइका कहिलाय मा गरब नइ होय, अउ न वो लइका बने काहय। ता काबर फोकट अपन पहिचान ले मुंह मोड़ना? भला छत्तीसगढ़ी बोले अउ  छत्तीसगढिया काहय मा काके शरम? छत्तीसगढ़ी हमर माई बोली ए, जे भारतीय भाषा मा अर्धमागधी अपभ्रंश ले उपजे पूर्वी हिंदी के अंतर्गत आथे। जइसे महतारी के सेवा जतन ओखर बेटा ल ही करना पड़थे, वइसने हम सब छत्तीसगढिया मन ऊपर माई बोली छत्तीसगढ़ी के बढ़वार के भार हवै। कोनो भी भाँखा होय ओखर उतपत्ति बड़ श्रमसाध्य बूता होथे। आज अपन एक बात जमाना मा मनवा के देखव पता चल जही, कि कतका महीनत हे कोनो नवा शब्द गढ़ना अउ मनवाना? अइसन मा हमर पुरखा मनके महीनत बिरथा झन होय, अउ हमर माई बोली जन्मो जनम ये धरा धाम मा मिश्री घोरत रहे। भाँखा भाव के संवाहक होथे, छोटे बड़े कभू नइ होय। अइसन मा कोनो भी भाँखा ला छोटे बड़े कहना हमर नादानी होही। आज हम सब कतको काल्पनिक अउ मनगढ़त फिल्मी बोली भाँखा के नकल करई ला शान समझथन फेर जउन भाँखा हमर अंचल के पहिचान आय ओखर ले भागथन, ये कहाँ तक सही हे?


                      कखरो भी मुख ले निकले कोनो शब्द तब तक भाँखा नइ कहिलाये जब तक कि वो कोनो ला समझ मा नइ आ जाय, नही ते मनखे के आलावा चिरई- चिरगुन, कुकुर- बिलई, कीट- पतंगा आदि जीव जिनावर मनके बोली घलो भाँखा कहिलातिस। कोनो भी भाँखा बोली कागज पाथर मा कतको लिखा जाये, यदि बोलइया समझया नइ रही ता, प्राचीन काल के कतको भाँखा- बोली अउ लिपि कस कोनो संग्राहालय मा माड़े रहि जाही या फेर बिरथा हो जही। मनखे अपन मन के भाव ला भाँखा मा उतारथे, जेला समझ के आन मनखे ओखर संग जुड़थे। भाँखा मनखे ला जीव जानवर ले अलगाथे,भाँखा बिन मनखे, मनखे मनले नइ मिल सके। भाँखा भाव, भजन, भ्रमण सबे बर जरूरी हे। मनखे भले सुख मा दाई, ददा ला नइ सोरियाही, फेर आफत मा ए ददा, ए दाई कहिबेच करथे। कहे के मतलब महतारी अन्तस् मा रचे बसे रहिथे, वइसनेच आय महतारी भाँखा । यदि कोई  छत्तीसगढिया छत्तीसगढ़ी ले भागथे, दुरिहाथे ता वो मनखें समझ के घलो नासमझ बने के ढोंग करथे। छत्तीसगढ़ी मा कुकुर ला तू तू रे कहिबे ता पाछू लग जथे। बिलई ला मुनुमुनु-मुनुमुनु कहिबे ता आ जथे। गाय गरुवा हई आ, ओहो तोतो ला समझथे, कुकरी कुकरा ला कुरु कुरु कहिबे ता समझके तीर मा आ जथे, छेरी घलो हर्रो के बोली ला समझते।  ता हमन तो मनखें आन, थोर बहुत समय लगही बोले समझे मा अउ छत्तीसगढ़ी कोनो आन भाषा घलो नोहे महतारी भाषा ए, ता एला सिर्फ बोलना, लिखना,पढ़ना अउ समझना भर नइहे, बल्कि उचित स्थान अउ सम्मान देवाये बर लगही। तभे ये माटी मा जनम धरेन तेखर कर्जा उतरही। भले देखावा मा मनखे महतारी अउ महतारी भाँखा ला बिसार देथन, फेर आचार, विचार अउ संस्कृति संस्कार के दाता उही आय। महतारी भाँखा के संग मनखे के दया-मया, संस्कृति अउ संस्कार जुड़े होथे। महतारी भाँखा ले दुरिहाना मतलब अपन संस्कृति अउ संस्कार ला तजना हे। आज अपन भाँखा बोली के बढ़वार बर खुदे ला महिनत करे के जरूरत हे। कोनो भी चीज ला बनावत बड़ बेर लगथे, फेर उझारत छिन भर। अइसन मा चलत कोनो भाँखा बन्द हो जाय, दुर्भाग्य के बात हे। जइसे पानी ढलान कोती बहिथे, वइसने भाँखा घलो सरल कोती भागथे। अपन जुन्ना बोली बचन अउ माटी के सुवाद मा नवा जमाना के शब्दकोश ला शामिल करत, कठिन ले सरल के रथ मा सवार होके, उदार भाव ले सबला स्वीकारत, आज कोनो भी भाँखा बोली के अस्तित्व ला बचाये के उदिम करना चाही,तभे नवा जमाना संग जुन्ना बोली भाँखा टिक पाही। छत्तीसगढ़ी सवांगा पहिर के फ़ोटो खींचाय ले कुछु नइ होह, अन्तस् मा निर्मल भाव अउ समर्पण जरूरी हे, नही ते देखावा रूपी सुरसा के मुँह मा कतको चीज समागे। 


                    ये दुनिया बड़ अजब गजब हे। आज नवा जमाना मा मनखे सबे देश राज संग जुड़ के चलत हे। गाँव, शहर ले, शहर, महानगर अउ देश-विदेश ले जुड़े हे। सियान मन हाना मारत कहिथे कि, कोश कोश मा पानी बदले अउ  चार कोश मा बानी।  माने दुनिया मा बड़ अकन भाँखा  हे, जेखर पार पाना मुश्किल हे। आज मनखे सबे संग कदम ले कदम मिलाके चलत हे, अइसन मा एक सम्पर्क भाँखा जरूरत बन जाथे। मनखे ला महतारी भाँखा के संगे संग अपन देश अउ विश्व भर मा प्रचलित मुख्य भाँखा ला बोलना अउ समझना चाही। पहली संचार अउ सोसल मीडिया के अतिक व्यापकता नइ रिहिस, ना सबे मनखे के विश्वभर मा जाना आना, ते पाय के वो समय मनखे मन एक या दुये भाँखा जाने, पर आज अपन अस्तित्व बर महतारी भाँखा के संगे संग सम्पर्क भाँखा ला जानना जरूरी हे। भारत मा आज हिंदी सबे कोती बोले समझे जावत हे। संगे संग व्यापारिक भाषा के रूप मा अंग्रेजी जम्मो देश मा पाँव पसारत हे। मनखे मन ला अपन महतारी भाँखा के संग हिंदी, अउ अंग्रेजी के ज्ञान घलो होना चाही। आज के लइका मानसिक रूप ले ये सब बर तियार हे, कोनो लइका मन  ऊपर  एक ले अधिक भाषा ला बोले सीखे बर कहना, थोपना नही, बल्कि आज के जरूरत के रूप मा, बहुभाषी बनना कहे जाथे। एक भाषा ला धरके चलना आज सम्भव नइ हे, काबर कि मनखे जुड़ चुके हे, सरी दुनिया संग। आज भाषा जमाना के  नवा रूप के संग, सोसल मीडिया मा घलो जघा बनावत जावत हे। सब ला अपन महतारी भाँखा ला नवा दशा दिशा देना चाही, ओखर प्रसिद्धि अउ बढ़वार बर सोचना चाही। अनुवादिक एप, गूगल, टाइपिंग जैसे आज के जरूरी एप मा महतारी भाँखा छत्तीसगढ़ी दिखे, एखर बर आज के बुधियार लइका सियान मन ला बूता करना चाही, ताकि भाषा संस्कृति- संस्कार,साहित्य-समाज संग सोसल मीडिया मा घलो जिंदा रहे अउ सबला सहज समझ आये, तभे भाँखा के उमर बाढ़ही। 


अपन भाँखा के मान करव ,

दूसर भाँखा के सम्मान करव।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


विश्व महतारी भाँखा दिवस के आप सबो ला सादर बधाई,

विश्व महतारी भाषा दिवस” - छत्तीसगढ़ी

 “विश्व महतारी भाषा दिवस” - छत्तीसगढ़ी


घर के जोगी जोगड़ा, आन गाँव के सिद्ध - तइहा के जमाना के हाना आय। अब हमन नँगत हुसियार हो गे हन, गाँव ला छोड़ के शहर आएन, शहर ला छोड़ के महानगर अउ महानगर ला छोड़ के बिदेस मा जा के ठियाँ खोजत हन। जउन मन बिदेस नइ जा सकिन तउन मन विदेसी संस्कृति ला अपनाए बर मरे जात हें। बिदेसी चैनल, बिदेसी अत्तर, बिदेसी पहिनावा, बिदेसी जिनिस अउ बिदेसी तिहार, बिदेसी दिवस वगैरा वगैरा। जउन मन न बिदेस जा पाइन, न बिदेसी झाँसा मा आइन तउन मन ला देहाती के दर्जा मिलगे।


हमन दू ठन दिवस ला जानत रहेन - स्वतंत्रता दिवस अउ गणतन्त्र दिवस। आज वेलेंटाइन दिवस, मातृ दिवस, पितृ दिवस, राजभाषा दिवस, पर्यावरण दिवस अउ न जाने का का दिवस के नाम सुने मा आवत हे। ये सोच के हमू मन झपावत हन कि कोनो हम ला देहाती झन समझे। काबर मनावत हन ? कोन जानी, फेर सबो मनावत हें त हमू मनावत हन। बैनर बना के, फोटू खिंचा के फेसबुक अउ वाट्सएप मा डारबो तभे तो सभ्य, पढ़े लिखे अउ प्रगतिशील माने जाबो।


एक पढ़े लिखे संगवारी ला पूछ पारेंव कि विश्व मातृ दिवस का होथे ? एला दुनिया भर मा काबर मनाथें? वो हर कहिस - मोला पूछे त पूछे अउ कोनो मेर झन पूछ्बे, तोला देहाती कहीं। आज हमन ला जागरूक होना हे। जम्मो नवा नवा बात के जानकारी रखना हे। जमाना के संग चलना हे। लम्बा चौड़ा भाषण झाड़ दिस फेर ये नइ बताइस कि विश्व मातृ दिवस काबर मनाथे। फेर सोचेंव कि महूँ अपन नाम पढ़े लिखे मा दर्ज करा लेथंव।

फेसबुक अउ वाट्सएप मा कुछु काहीं लिख के डार देथंव। 


भाषा ला जिंदा रखे बर बोलने वाला चाही। खाली किताब अउ ग्रंथ मा छपे ले भाषा जिंदा नइ रहि सके। पथरा मा लिखे कतको लेख मन पुरातत्व विभाग के संग्रहालय मा हें फेर वो भाषा नँदा गेहे। पाली, प्राकृत अउ संस्कृत के कतको ग्रंथ मिल जाहीं फेर यहू भाषा मन आज नँदा गे हें  । माने किताब मा छपे ले भाषा जिन्दा नइ रहि सके, वो भाषा ला बोलने वाला जिन्दा मनखे चाही।


भाषा नँदाए के बहुत अकन कारण हो सकथे। नवा पीढ़ी के मनखे अपन पुरखा के भाषा ला छोड़ के दूसर भाषा ला अपनाही तो भाषा नँदा सकथे। रोजी रोटी के चक्कर मा अपन गाँव छोड़ के दूसर प्रदेश जाए ले घलो भाषा के बोलइया मन कम होवत जाथें अउ भाषा नँदा सकथे। बिदेसी आक्रमण के कारण जब बिदेसी के राज होथे तभो भाषा नँदा सकथे। कारण कुछु हो, जब मनखे अपन भाषा के प्रयोग करना छोड़ देथे, भाषा नँदा जाथे। 


छत्तीसगढ़ी भाषा ऊपर घलो खतरा मंडरावत हे। समय रहत ले अगर नइ चेतबो त छत्तीसगढ़ी भाषा घलो नँदा सकथे। छत्तीसगढ़ी भाषा के बोलने वाला मन छत्तीसगढ़ मा हें, खास कर के गाँव वाले मन एला जिंदा रखिन हें। शहर मा हिन्दी अउ अंग्रेजी के बोलबाला हे। शहर मा लोगन छत्तीसगढ़ी बोले बर झिझकथें कि कोनो कहूँ देहाती झन बोल दे। छत्तीसगढ़ी के संग देहाती के ठप्पा काबर लगे हे ? कोन ह लगाइस ? आने भाषा बोलइया मन तो छत्तीसगढ़ी भाषा ला नइ समझें, ओमन का ठप्पा लगाहीं ? कहूँ न कहूँ ये ठप्पा लगाए बर हमीं मन जिम्मेदार हवन। 


हम अपन महतारी भाषा गोठियाए मा गरब नइ करन। हमर छाती नइ फूलय। अपन भीतर हीनता ला पाल डारे हन। जब भाषा के अस्मिता के बात आथे तब तुरंत दूसर ला दोष दे देथन। सरकार के जवाबदारी बता के बुचक जाथन। सरकार ह काय करही ? ज्यादा से ज्यादा स्कूल के पाठ्यक्रम मा छत्तीसगढ़ी लागू कर दिही। छत्तीसगढ़ी लइका मन के किताब मा आ जाही। मानकीकरण करा दिही। का अतके उदिम ले छत्तीसगढ़ी अमर हो जाही?


मँय पहिलिच बता चुके हँव कि किताब मा छपे ले कोनो भाषा जिंदा नइ रहि सके, भाषा ला जिन्दा रखे बर वो भाषा ला बोलने वाला जिन्दा मनखे चाही। किताब के भाषा, ज्ञान बढ़ा सकथे, जानकारी दे सकथे, आनंद दे सकथे फेर भाषा ला जिन्दा नइ रख सके। मनखे मरे के बादे मुर्दा नइ होवय, जीयत जागत मा घलो मुर्दा बन जाथे। जेकर छाती मा अपन देश बर गौरव नइये तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन गाँव के गरब नइये तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन समाज बर सम्मान नइये, तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन भाषा बर मया नइये, तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर स्वाभिमान मर गेहे, तउन मनखे मुर्दा आय। 

जउन मन अपन छत्तीसगढ़िया होए के गरब करथें, छत्तीसगढ़ी मा गोठियाए मा हीनता महसूस नइ करें तउने मन एला जिन्दा रख पाहीं। 


अइसनो बात नइये कि सरकार के कोनो जवाबदारी नइये। सरकार ला चाही कि छत्तीसगढ़ी ला अपन कामकाज के भाषा बनाए। स्कूली पाठ्यक्रम मा छत्तीसगढ़ी भाषा ला अनिवार्य करे। अइसन करे ले छत्तीसगढ़ी बर एक वातावरण तैयार होही। शहर मा घलो हीनता के भाव खतम होही। छत्तीसगढ़ी ला रोजगार मूलक बनावय। रोजगार बर पलायन, भाषा के नँदाए के एक बहुत बड़े कारण आय। इहाँ के प्रतिभा ला इहें रोजगार मिल जाही तो वो दूसर देश या प्रदेश काबर जाही? छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार, लोक कलाकार ला उचित सम्मान देवय, उनकर आर्थिक विकास बर सार्थक योजना बनावय।


छत्तीसगढ़ी भाव-सम्प्रेषण बर बहुत सम्पन्न भाषा आय। हमन ला एला सँवारना चाही। अनगढ़ता, अस्मिता के पहचान नइ होवय। भाषा के रूप अलग-अलग होथे। बोलचाल के भाषा के रूप अलग होथे, सरकारी कामकाज के भाषा के रूप अलग होथे अउ साहित्य के भाषा के रूप अलग होथे। बोलचाल बर अउ साहित्यिक सिरजन बर मानकीकरण के जरूरत नइ पड़य, इहाँ भाषा स्वतंत्र रहिथे फेर सरकारी कामकाज बर भाषा के मानकीकरण अनिवार्य होथे। मानकीकरण के काम बर घलो ज्यादा विद्वता के जरूरत नइये, भाषा के जमीनी कार्यकर्ता, साहित्यकार मन घलो मानकीकरण करे बर सक्षम हें।


सरकार छत्तीसगढ़ी बर जो कुछ भी करही वो एक सहयोग रही लेकिन छत्तीसगढ़ी ला समृद्ध करे के अउ जिन्दा रखे के जवाबदारी असली मा छत्तीसगढ़िया मन के रही। यहू ला झन भुलावव कि जब भाषा मरथे तब भाषा के संगेसंग संस्कृति घलो मर जाथे।


“स्वाभिमान जगावव, छत्तीसगढ़ी मा गोठियावव”


लेखक - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)


चित्र मा मोर कल्पना ला साकार रूप देवइया छन्द के छ परिवार के छन्द साधक ईश्वर साहू "बन्धी"


🙏    🙏    🙏    🙏    🙏