Wednesday, 8 July 2026

लघुकथा -"भोंदू के मतलब " -मुरारी लालसाव

 लघुकथा   -"भोंदू के मतलब "

           -मुरारी लालसाव 

        इंटरव्यू के ऑफिस म अपन नंबर बुलाये के इंतजार करत अव्वल कुमार सोचत रहिस l का पूछही? तीर म एक झन अउ बइठे रहिस l ओला पूछिस -" अरे भाई  तै का तैयारी करे हस? "

ओहर कहिस -"का तैयारी? जुगाड़ करे ला पड़ही l"

अव्वल कहिस -" का जुगाड़?"  धुरिया घूंचत  कहिस -"अरे भोंदू हस का?" 

"भोंदू मतलब? गुस्सा ला रोक लीस l मने मन सोचिस l जउन गुरूजी मार मार के पढ़ाइस ओहा मोला "भोंदू "नइ कहिस कभू l मुरख़ भले कहिस l मुरख़ कहि कहिके मोला योग्य बना दीस पढ़ा लिखा समझा के l इही बात बताइस "न जुगाड़ काम आवय न नकल बेटा तै सफल होबे त अपने अकल से l" नम्बर आगे भीतर बुलाइस l

बड़े अधिकारी  पूछिस सवाल -"  जमींदार मन के रियासत ला अंग्रेज मन कइसे छिनिस? "

अव्वल कुमार के पास कई ठन उत्तर रहिस फेर आखिर म उही बात ला सोच के कहिस -" रियासत के जमींदार मन "भोंदू " रहिस l"

अधिकारी आँखी ला देखत रहिगे,जवाब ला सुनके l फेर पूछिस -" भोंदू मतलब  पूरा बताओ l"

अव्वल आत्म विश्वास ले कहिस -" जुगाड़ करे ला छोड़ दीस l" अच्छा जाओ l अधिकारी सोचिस -"स्वाभिमानी  हे l "

रिजल्ट आइस त देखिस अव्वल कुमार के नाँव  ऊपर म रहिस l 

-कुम्हारी जिला दुर्ग

समे

 *समे*

एक झिन बड़ मेहनती मनखे रिहिस।वो हर येदे लईका बर,येदे बुढ़ापा बर,येदे आने परिवार बर अइसे सोंच -सोंच के जांगर टोर मेहनत कर बड़ बड़े आदमी बनगे।कमई के मारे वोला न घर परिवार बर समे मिले न संगी जहुंरिया बर। एक दिन सोय जठना म यमराज आगे। वोला देख के पुछथे ते कोन अस? यमराज कथे मे यमराज।तोर दिन बादर पुरगे अब तोला जाना पड़ही।मनखे कथे मोर करा बहुत अकन धन दोगानी हे महराज आधा ल दे दूं हूं कम से कम मोला एक दिन समे दे देहू परिवार संग बिताय बर। यमराज कथे ये नइ हो सके।तब मनखे कथे मोर पूरा धन दोगानी ल ले ले मोला कम से कम एक घंटा के समे दे दे मोर संगी जहुंरिया मन बर चिठ्ठी पाती लिखहूं। यमराज कथे ये नइ हो सके।समे निकल गे।अऊ यमराज ओकर जीव ल हर लेथे।


   फकीर प्रसाद साहू 

          सुरगी 🙏

तोर हाथ मं जस हे* पोखन लाल जायसवाल

 *तोर हाथ मं जस हे*

पोखन लाल जायसवाल 


आमा, बर, पीपर अउ लीम के सुग्घर जुड़ छाॅंव वाला गाॅंव हे बिसाहिन दाई के गाॅंव। बिसाहिन दाई ए गाॅंव मं १६-१७ बछर के उमर मं बिहा के आइस। अठारह झिन के परिवार मं। सब मं बड़ मया। बिसाहिन ल नवा जघा बड़ मया दुलार मिले लगिस। मइके के सुरता तो आवय, फेर इहाॅं सबके मया ओकर कमी ल भर देत रहिस। घर मं सब के काम-बुता बॅंटे राहय। रॅंधई-गढ़ई। गोबर-कचरा। पानी भरई। लइका मन के बेवस्था। घर-दुवार अउ ॲंगना बहरई-बोटरई। सब अपन-अपन बुता मं मस्त रहॅंय। घर मं कभू कोनो कखरो ले मुॅंह नइ फुलाइन। सबो झन मया के सुतरी मं माला सहीं गुॅंथाय रहिन। दिन बीतत गिस। सबके लइका मन के बिहाव होगे। देरानी-जेठानी के बहू मन चार दुआरी ले आइन। मया के सुतरी थोरिक झोल परगे। बड़े परिवार वाला माला टूटे के कगार मं आगे। घर के गोठ घर मं रखिन। बाॅंटा के लाखा पार डरिन। ॲंगना खॅंड़ागे। लइकामन कुरिया मं धॅंधागिन। बॅंटवारा के होवत ले परोसी ल गम नइ लगन दिन। बॅंटवारा के ए बड़ोरा अतके मं शांत नइ होइस। पूरा परिवार तिड़ी-बिड़ी होगे।

अब बिसाहिन तरिया पार के परसार वाले घर मं हॅंड़िया तिपोय लगिस। सास-ससुर, तीनों लइका अउ अपन दूनो मिला ७ झन के परिवार रहिगे। पूरा गाॅंव तरिया के पार मं बसे हे। सुग्घर पुरवाही के गाॅंव। बर-पीपर के छाॅंव मं घाम-पियास थोरको नइ जियानय। खनतिहार मन दस बज्जी लहुटत तरिया पार के जुड़ छाॅंव मं बइठथें। थिराथें। एक-दूसर के सोर-संदेश अउ आरो लेवत असनान करे पाछू अपन-अपन घर हबरथें। कोनो-कोनो अपन लइका मन ला हुत करा रापा-कुदारी मन ल घर पठो देथें। "बंशी! ए बंशी ...बेटा बंशी!! रापा-कुदारी ला घर ले जा बेटा। मैं फुरसुदहा नहा के आहूॅं।" ''ए बंशी! हमरो घर रघु ल आरो दे देबे बेटा, आके गैंती ला ले जही। बर छइहाॅं मं थिरा के नहाहूॅं तेकर पाछू घर आहूॅं।'' पछीना मं नहाय बैसाखू हा गैंती-रापा ला मड़ावत कहिस। रोजगार गारंटी ले लहुटत हावें सब ओसरी-पारी। नवा तरिया बनात हावें। गाॅंव भर के मनखे जाथें। गोदी खनथें। पइसा सरकार के अउ सुभिता गाॅंव बर। गाॅंव के मनखे बर। कतेक सुग्घर योजना हावे। सरकार नहाये बर तो आवय नइ। गाॅंव ल गुजर-बसर करना हे। बड़ भागमानी हे गाॅंव अउ गाॅंव वाले मन।  

बिसाहिन दाई पैंसठ पार कर डरिस। काकरो काकी ए, कोनो के भउजी त अउ कोनो के डोकरी दाई। फेर गाॅंव भर के मनखे बर ओहर बिसाहिन दाई आय। गाॅंव भर मं एके झन उही तो हे, जेन ल सबो अपन घर बुलाथें। ओकर बुता घलव वइसने हे। ओकर हाथ मं जस हावय। कभू कोनो धोखा नइ खाय हे। सबेच बर बरोबर मया दिखाथे ओहर। दाई के बुता ल बड़ लगन ले करथे। लालच अभिन तक ओला छुए नइहे। ओहर अपन सास के बताए रद्दा मं चलत हावे। रद्दा आवय परमारथ के। जस के। सेवा के।  

बिसाहिन दाई मरे-जिये बर एके झन रहिगे हे। तीन बेटी हें। तीनों अपन-अपन घर चल दे हें। सब खुश हें अपन दुनिया मं। उॅंकर घर सियान बबा छे बछर पहिली दुनिया ले चल बसिस। तब ले अकेल्ला बर एक ठोमहा चाउर तिपो के खाथे। बेटी दमाद मन अपन संग लेगे के बात कहिन।  

'अभी तिपो लेहूॅं बेटी हो...। पुरखा मन के डेरौठी मं दीया बारन दौ मोला। जेन दिन जाॅंगर जुवाब दिही, मैं आ जहूॅं।' अइसने तो कहे रहिस वो दिन बिसाहिन दाई ह।  

गाॅंव वाले मन ओला अउ आने कुछ बात के तकलीफ़ नइ होवन दे हें। ओकर बुता ला लइका-सियान सब आले-आले कर देथें। चाहे सुसाइटी ले चाउर लाय के हो त अउ कुछु आने बुता।

बिसाहिन दाई भारी पाॅंव वाले मन घर जा-जा के हाल-चाल पूछत रहिथे। हियाव करथे। ठलहा बइठई ले बने हे। अभिन दुकलहा घर बइठे हावे अउ बीस-पचीस बछर पहिली के दिन ला सुरता करत हावे। बहुरिया ल बतात हावे , 'गरमी के दिन मं खनती-कुदारी अउ ढेलवानी दे के बुता चलय। बैसाख के महीना मं खातू पलई। अब तो सब घर मं न गाय हे, न गाॅंव मं घुरवा-गांगर। चरागन घलव नइ बाॅंचिस।... गाय...बइला-गाड़ी नॅंदावत हे।' दुकलहा के बहू हुंकारू देवत सुनत हावे।

बइला-गाड़ी जेन मं लइका-पिचका समेत सब रनबौर मेला जावॅंन। छेरछेरा के पहिली अतराब भर के मेला। रनबौर मेला।

सुरता के डोरी अब सास ला अमर डारिस। गोरस के दवा बर उॅंकर घर कइसे मनखे आत्ते राहॅंय। ओहर नरियर ले के दवा दे देवय। काहय जस के काम आय। खेत-खार के जिनिस के का पइसा-कौड़ी। 

अपन उमर पहाती मं कइसे ओहर ओला जड़ी-बूटी के जानबा दिस। यहू बताइस। ले बइठ नोनी.... अब मेंहा जाथॅंव। चार छे दिन नइ ऑंव। 

दुकलहा मन बेटा, बहू अउ अपन करके तीन परानी हावे। चार बछर होगे हे ओकर सुवारी लक्ष्मी ल बीते। बपुरा ह बड़ सेवा जतन करिस लक्ष्मी के। फेर, भगवान के मरजी के आगू काखर चलथे? लक्ष्मी हा एक दिन दुकलहा ला ठग के दुनिया ले चल दिस। खेती-खार करइया मन के इही तो पीरा ए। राहेर काड़ी के खोभा/खूंटी पाॅंव मं का गड़िस? एक ठन ओखी होगे, दुनिया ले जाय के। चउमास के दिन राहय। झटपिट-झटपिट रेंगइया लक्ष्मी के पाॅंव मं सरहा गढ़न काड़ी गड़ गिस। दवा दारू करिस। दवा-पानी ले पीरा नइ जनाइस। ऊपर के घाव सूखागे। खेती के बुता माढ़े ले संसो तो बाढ़बे करथे। खेती अपन सेती कहे गे हावे। परोसी दारी साॅंप नइ मरय। इही सोंच के घर के खेती मं दुकलहा अउ लक्ष्मी भिंड़गे। रोपा बियासी झरे चार दिन बीत रहिस। लक्ष्मी के गोड़ मं पीरा जनाय धर लिस। सपसपहा पीरा। डॉक्टर तिर गिस। भीतरे-भीतर पीब भर गे रहिस। पीरा अउ तकलीफ़ दूनो धीरे-धीरे बाढ़े लगिस। ....पाॅंव कटागे, फेर घाव बने नइ होइस अउ एक दिन लक्ष्मी दुकलहा ले नता टोर के भगवान घर चल दिस। ....चढ़े करजा ला उतारे मं दू बछर लग गिस। तब तक बाप बेटा जइसन बनिस, तइसन तिपो के खाइन। बेटा के बिहाव होगे हे, नवा सगा अवइया हावे।  


बिसाहिन दाई बड़े बेटी घर आय रहिस। आज लहुटहूॅं काहत हावे। बेटी कहिस - ले ना दाई दुएच दिन अउ रुक जा। तहान चल देबे। तोर नतनीन हा बारवी के पेपर देवा के आही। वहू एक नज़र देख लेबे। नहीं बेटी तोर दुकलहा कका घर नवा सगा अवइया हावे, चार दिन के रुकइया दस दिन होगे। मोला जायच ल परही। पहली पहलावत आय। ओकर घर कोनो नइहे।  

ओती दुकलहा के बहू पीरा खावत रहिस। पहिली पहिलावत आय। बहू बिचारी पीरा मं तालाबेली करत राहँय। दुकलहा के बेटा पइत घलो इही बिसाहिन दाई हा आय रहिस हे। तब सास के तन ह झुके ल धर ले रहिस। इही जचकी ओकर शुरुआत रहिस। अपन सास के कहे मं ही बिसाहिन दाई के बुता करत हावे। जस कमावत हावे। जचकी के दिन ले सरलग अठुराही-पंदराही बिसाहिन दाई सेवा बजाथे। सँझा-बिहनिया दूनो बेरा लइका अउ महतारी के सेवा करथे। कोनो ला बिसाहिन दाई ले कभू कोनो शिकायत नइ होइस। बिसाहिन दाई घलो सबो घर हरहिंछा आवय-जावय। ओकरो मन कभू छोट नइ होइस। बरोबर गोरस नइ आय ले महतारी बर जड़ी-बूटी घलो देवय। कतको झन ला एकर फायदा मिले हवय। तभे तो अतराब भर ले आय दिन कोनो न कोनो ओकर घर आत्ते रहिथे।

सरपंची बर महिला आरक्षण आय रहे मं गाँव भर के मन निर्बिरोध सरपंच बनाना चाहीन। " मैं अप्पड़ का सरपंची करहूँ, मोला इही मं मजा आवत हे, जचकी करावत मोला सेवा करन दव। एकर ले बड़का अउ का जनसेवा होही? मैं इही मं खुश हौं भई। मोला क्षमा करिहौ... क्षमा दिहौ।" अतकी तो कहे रहिस बिसाहिन दाई ह। गाॅंव के सियानी मोर दारी नइ होवय, मोर दाई-ददा हो।  

अभी बिसाहिन दाई के पाँव घर मं बरोबर माढ़े नइ रहिस, अउ दुकलहा ओला आरो दिस - भौजी! ए भौजी...!!  

वोहर उत्ता-धुर्रा उॅंकर घर पहुँच गिस। बहू नोनी ला देखतेच साठ कहिथे, देखे के बेरा नइ हे बाबू। एला जतका जल्दी होय अस्पताल लेगे बर परही। लइका ह थोरकुन उलट गे हे कस जनावत हे। जचकी के बेरा आ घलव गे हे। धरा-पसरा गाड़ी मँगाके, बिना कोनो देरी करे बहू ल लकठा के अस्पताल लेगे गिस। बहू मुँधरहा के उठे पीरा ले लरघिया गे रहिस। महतारी अउ सास के मया ला तरसत बपुरी हा अपन गोठ काखर मेर कहितिस। ताकत नइ लगा पात रहिस बपुरी ह। महतारी एक्सप्रेस आइस अउ अस्पताल गिनन। डॉक्टरिन मैडम जाँच करे के पाछू तुरते ऑपरेशन करके जच्चा अउ बच्चा ला बचालिस। ऑपरेशन के बाद मैडम बोलिस - "अच्छा हुआ समय रहते पहुँच गये, वरना और देरी होने से जच्चा-बच्चा दोनों को खतरा हो सकता था।.... लक्ष्मी आई है ...बधाई हो...और हाॅं! घबराने वाली कोई बात नहीं है। दोनों स्वस्थ हैं।" दुकलहा अतका सुनके बिसाहिन दाई अउ भगवान ला बार-बार धन्यवाद दे लगिस। 

बिसाहिन दाई ल कहिस, "भउजी! तोरे रहिते, आज मैं हा अपन बहू अउ नतनीन के मुख ल देख पाहूॅं।" बिसाहिन दाई कहिस, "नहीं बाबू! मोर तो कामेच आय सेवा। मैं जचकी दाई हरँव, जच्चा अउ बच्चा बर सोचना मोर काम हरे। दूनो ल कोनो नुकसान झन होवै। इही तो मैं चाहथँव। मोला लागिस कि घर मं रहना खतरा हे, मोर बस के बात नइ हे, ते पाय के इहाँ लाने बर कहेंव।"  

सिरतोन भउजी! तोर हाथ मं जस हावय। आज तक तोर राहत ले गाँव ह कभू कोनो धोखा नी खाय हे। तोर रहिते गाँव के बहू-बेटी मन कोनो तकलीफ नइ पाय हें।  

बाबू गोठियातेच रहिबे धन हमर देरानी के स्वागत मं फटाका फोरबे। तोर घर मं लक्ष्मी हा लहुट के आय हे। देख तो लक्ष्मी देरानी ला... बिसाहिन दाई ह दुकलहा ले हॉंसीं-मजाक करे धर लिस।  

मैं फटाका भर नि फोरँव भउजी! मिठई घलो बँटवाहूँ, मोर लक्ष्मी के स्वागत मं। सही मं मोर लक्ष्मी हा मोर तिर लहुट के आय हे, काहत दुकलहा के आँखी मन भर आइन। ओहर खुदे समझ नइ पाइस कि ए आँसू दुख के रहिन कि सुख के।

 ०००  

पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह)

जिला- बलौदाबाजार-भाटापारा छग

बियंग - "भोंगरा" के पारदर्शीय व्याख्या "

 हास्य बियंग - "भोंगरा" के पारदर्शीय व्याख्या  " 

-मुरारी लाल साव 


"भोंगरा " के लोक व्यवहार मे बड़ा महत्व हे l भोंगरा के अर्थ आर पार दिखना l आकार प्रकार म छोटे बड़े हो सकथे l भोंडू टोड़ूँ, छेदा  छोटे रूप आय l कोनो परदा गोल आकार म फूट जथे आर पार दिखे लगथे  l बुलक जथे कोई चीज वस्तु  उही ला भोंगरा कहिथन l  कपड़ा लत्ता साड़ी धोती घलो बड़े चिराके फट जथे गोल उहू भोंगरा होगे बताथे lभोंडू के व्यापक अर्थ भोंगरा आय l भोंगरा ऊपर कई ठन हाना घलो हे l लोगन मन आचरण चरित्र म जोड़ के लोकोक्ति बनाथे l भोंगरा ले लुकाके गुप्त लेंन देन घलो कर लेथे l भोंगरा ले ताका पासा होथे l भोंगरा ले देखना अउ आमने सामने देखना म अंतर हे l

देखय्या मन जानथे काला कइसे देखना हे?दिखत हे-दिखत हे कइथे lका दिखत हे?काला देखत हे ? कइसे दिखत हे?कइसे देखत हस?काबर देखत हे ? कोन कोन देखे के काम करत हे l हमू मन ला देखना चाही lकामा देखत हे?

बहुत  अकन सवाल उठ जथे l सबो प्रश्न के उत्तर भोंगरा से हे l भोंगरा ले देखथे  तेन भोंदू कहाथे l बने बने मनखे घलो भोंदू बन जथे l  

भोंदू होना बड़े बात आय l अभी के समे म भोंदू बन जाना ठीक हे l ज्ञानी मन ला ज्ञान बघारे बर मौका मिलथे l भोंदू मन सरकार बनाथे l भोंदू जान के अपन खेल खेलथे l उहू मन ला मजा आथे l भोंदू जनता ला घलो सुख मिलथे l हमर इतिहास गवाही हे जमींदार मन भोंदू बना बना के जमीन सकेलिस l भोंदू कहि कहिके पंडित मन दान सकेलिस l भोंदू मन बर भगवान के घलो बने कृपा होथे l 

मंदिर धर्मशाला बन जथे पूजा पाठ चढ़ावा उही मन करथे l

समझदार मन हिसाब करके लेथे देथे l दान पान भोंदू करथे भोग जोग साधू बैरागी बर l 

ये सब भोंगरा ले दिखथे l रीति नीति नियम क़ानून सब भोंगरा ले देख l आर पार सब दिखही l

कोन देखथे,जेला मतलब हे l

काबर देखथे,ढोल पोल ला जाने बर l भोंगरा ले देख के 

ब्लेक मेल करथे l 

 जघा जघा भोंगरा खोजथे l 

एक झन पूछिस थाना कछेरी म घलो l पूछे के का बात हे संगी l

उहें के भोंगर�

सब ला बचाथे l

कछेरी अदालत म एक ले एक भोंगरा पाये जाथे बाहिर के ला अंदर अउ अंदर के ला बाहिर करना सब सिखाथे l

जनता ला सरकार घलो भोंगरा ले देखथे l जनता कइसे चिल्लावत हे?काबर चिल्लावत हे?जनता ला कोन भड़कावत हे ये सब अइसने देखथे l 

भोंगरा ले पइसा आथे जाथे l

कहे के मतलब इही भोंगरा ले देश राज्य के वित्तीय व्यवस्था चुस्त दुरुस्त होथे l 

घर परिवार समाज म घलो भोंगरा के अपन खास महत्व हे l पारदर्शिता ले देखबोन त समाज पूरा पूरा भोंगरा ले दिखथे l आदमी अपने इज्जत ला ढांके ला सीख लय l दूसर के भोंगरा ला खोजत रहिथे l

परिवार के हाल बेहाल परवाह करत हन कहिके अँख मुंदा होगे हे l बेटा के आये जाये के दरवाजा अलग l बेटी बहू के आये जाये के अलग दुवार l काला कहिबे ?अधरथिया होथे लड़थे चिल्लाथे त समझ में आथे l भोंगरा भरे व्यवस्था म रहना हे त अपन आदत आचरण ला ओइसने बनाये ला पड़ही l काला लुकाबे सब कभू न कभू उघरबे करही l

     सारांश म साहित्य के सहारा लेके भोंगरा ला अउ पारदर्शीय बनाये के कोशिश करबो l ककरो अहित मत होय l कोनो ला बुरा झन लगे l सबके भला होय सबके विकास होय इही बात के ध्यान सबो ला रखना हे l  

-कुम्हारी जिला दुर्ग

कइसे बाचही पर्यावरन?* पद्‌मा साहू ‘पर्वणी’

 *कइसे बाचही पर्यावरन?*

                पद्‌मा साहू ‘पर्वणी’

                    खैरागढ़

पर्यावरन हमर जीवन के महत्वपूर्ण  हिस्सा हरे। पर्यावरन के बिना, जीवन के सपना देखई बिना आत्मा के शरीर जइसे होही। पर्यावरन आदिकाल ले मनखे मन के संगी-साथी बने हे। इही पर्यावरन के जंगल-झाड़ी, डोंगरी-पहाड़, नदिया-नरवा, रुख-राई, चिरई-चिरगुन, जीव-जंतु मनखे के सुख-दुःख के गवाही बने हें। नदी, पर्वत-पहाड़, रुखराई ल देवरूप समझ के पूजा करँय। पहिली पर्यावरन, अध्यात्मिक अउ साहित्यिक चेतना के केन्द्र रहिस। आदिकाल मा पर्यावरन मानव जीवन के अधार रहिस। 

वइसने वैदिक काल मा प्रकृति के संरक्षन धरम, संस्कृति अउ जीवनशैली के अभिन्न अंग रहिस। वेद मा प्रकृति ल देवी-देवता मानके सनमान दें । जल, भुइयाँ, वायु अउ पेड़ मन ल नुकसान पहुँचाना वर्जित रहिस। श्रद्धा भाव ले पारिस्थितिकी तंत्र ल संतुलित अउ प्रदूषन मुक्त रखे जाय।


“माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्या” 


अथर्ववेद के ये सुक्त प्रसिद्ध मंत्र के अर्थ हे कि- "पृथ्वी हमर माता हे अउ हमन इंकर संतान। " येकरे सेती धरती के शोषन करई पाप मानँय। जइसे एक लइका अपन महतारी के शोषन नइ कर सकय, वइसने हमन धरती दाई के शोषन नइ कर सकन। में अपन स्कूल पढ़ई के समे मा जब गायत्री परिवार ले जुड़े रेहेंव  त हमन  एकठन मंत्र जागरन करन वो मंत्र हे–


"ॐ द्यौः शांतिरन्तरिक्षं शांतिः पृथ्वी शांतिरापः शांतिरोषधयः शांतिः।

वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः शांतिर्ब्रह्म शांतिः सर्वं शांतिः शांतिरेव शांतिः सा मा शांतिरेधि॥"


ये मंत्र मा ब्रह्मांड के सबो तत्व ले शांत अउ संतुलित रहे के प्रार्थना करे हे।

अगास अउ अंतरिक्ष, पृथ्वी अउ जल, औषध अउ वनस्पति, जब प्रकृति के ये सबो अंग मा 'शांति' संतुलन होही, तभे विश्व अउ सब देव  संग मानव जीवन घलो सुरक्षित अउ शांतिपूर्न रहहीं। ये पर्यावणन संतुलन के सबले प्रसिद्ध मंत्र आय।

अइसने अथर्ववेद के एक ठन मंत्र जेमा धरती दाई ल खोद के ओकर ले कुछ खनिज- माटी निकाले बर घलो विनती के भाव विनम्रता भरे सीख देथे -


"यत्ते भूमे विख्नामि क्षिप्रं तदपि रोहतु। मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमर्पिपम्॥"


हे धरती दाई! "अपन आवश्यकता बर मैं तोर ले जो कुछ भी खोदके निकालहूँ (जइसे खनिज, माटी), वो वोतकी जल्दी वापिस भर जाय।" मैं जाने-अनजाने मा घलो तोर  हिरदे मा कोनो घाव नइ पहुँचावँव। ये मंत्र जंगल के  कटई अउ अधिक खनन ल रोके के चेतावनी देथे।  आदिकाल अउ वैदिक काल मा मानव प्रकृति के दोहन नइ करत रहिन बल्कि जीवन के अधार मान के श्रद्धा विनम्रता के भाव ले प्रकृति ल पूजत रहिन। भौतिक सुख-सुबिधा ल कम रख के प्रकृति के संग जिनगी के मजा लेवत रहिन।

फेर आधुनिक काल के बढ़त समे बिकास के ये दउर मा मनखे के भाव मा धीरलगहा नवा बदलाव आय लगिस। आज के आधुनिक अउ तकनीकी जुग मा जिहाँ मनखे हा अभूतपूर्व तरक्की करे हे, उहें दूसर कोती हमन एक गम्भीर संकट के डहर बढ़त हन। 

     आज मनखे प्रकृति के प्रति उपयोगितावादी भाव रखत हें। मनखे मन प्रकृति ल अपन सुख-सुबिधा अउ आर्थिक बिकास के जरिया मानत हें।  जंगल-भुइयाँ, नदिया-नरवा, रुख-राई डोंगरी-पहाड़ के पूजा तो करत हें फेर इंकर दोहन अपन जरूरत ले जादा करत हें। स्वामित्व के भाव रख के विज्ञान अउ तकनीक के प्रगति के कारन इंसान के भीतर ये भरम पइदा हो गे हे कि वो प्रकृति ऊपर नियंत्रन कर सकथे। आज मनखे अपन आप ल प्रकृति के रक्षक बने के बजाय वोकर स्वामी समझे लगे हें।

   कल-कारखाना, मशीन, शहरीकरन अउ संसाधन मन के अंधाधुंध उपयोग हा धरती के संतुलन ल जम्मो ढंग ले हिला के रख दे हे। अइसन मा पर्यावरन के संबरधन करना सिरिफ गोठ-बात के बिसय नइ हे, भलुक(बल्कि) हमर जीयत रहे बर अब्बड़ जरूरी होगे हे।

पर्यावरन संकट -

हमर पर्यावरन प्रमुख रूप ले मनखे के काम-बूता के कारन खतरा मा हे। रुख-राई के अंधाधुंध कटई, सीमेंट-कंक्रीट के जंगल बनाय बर अंड-संड (गलत-सलत)  ढंग ले रुख-राई मन ल काटे जावत हें, जेकर ले जंगली जिनावर मन के रहे के ठउर उजरत हे अउ हवा मा जहर घुरत हे। एकरे संग-संग

पानी, हवा अउ भुइयाँ, तीनों स्तर मा बढ़त प्रदूषन अपन चरम मा हे। फैक्टरी मन के रासायनिक गंदा  पदार्थ, पानी हा नदिया-नरवा मा मिलत हे, अउ गाड़ी-घोड़ा अउ कारखाना मन के धुआँ हा हवा ल जहरीला बनावत हे।

            प्लास्टिक के जादा उपयोग जेन प्लास्टिक अइसन कचरा आय जेकर नाश कभू नइ होवय। ये हा हमर माटी के उपजाउ पन ल नष्ट करत हे अउ पानी म रहइया जीव मन के जान के दुश्मन बन गे हे।

धरती के बढ़त घाम (ताप ग्लोबल वार्मिंग), खराब गैस मन के जादा निकले के कारन धरती के तापमान ल सरलग बढ़ात हे, जेकर ले पहाड़ के बरफ हा पिघलत हे अउ मौसम के चक्र ह पूरा बिगड़ गे हे। मनखे प्रकृति के बिकट दोहन करके अपने पाँव मा टँगिया मारत हे। मनखे ल अब पर्यावरन ले शुद्ध हवा,पानी माटी, नइ मिल पावत हे। चारो कोती प्रदूषन के दुर्गंध नाक मुँहु ल चपके मा मजबूर करत हे।

अब सवाल खड़ा होथे कि-

 *कइसे बाचही पर्यावरन?*पर्यावरन बचाना काबर जरूरी हे?

पर्यावरन के सीधा जुड़ाव हमर जिनगी ले हे। यदि पर्यावरन सुरक्षित नइ रही, त मनखे के जिनगी के कलपना घलो असम्भव हे। साफ हवा अउ निरमल पानी के बिना मनखे समाज हा गंभीर  बीमारी के शिकार होवत हे। 

जैव विविधता ल बनाय रखे बर रुख-राई अउ पशु-पंछी मन के जीयत रहना जरूरी हे। |

यदि हमन आज ये प्रकृतिक संसाधन मन ल नइ बचाबो, त अवइया पीढ़ी बर सिरिफ आफत अउ बिनाशेच बाचही। जीवन जीना मुस्कुल हो जही ।

हमन खुद के मिहनत अउ जागरुकता ले पर्यावरन ल बचा सकथन। पर्यावरन बचाना सिरिफ सरकार या बड़े संस्था मन के बुता नइ आय। एक सियान अउ सजग नागरिक होय के नाते हमन अपन रोज के जिनगी मा नान्हे-नान्हे बदलाव करके बड़का सुधार के काम कर सकथन। जइसे-


रुख लगाना संस्कार बनावन:- जिनगी के कोनो भी खास मउका मा (जइसे छट्ठी, जनमदिन या तिहार)  कम ले कम एक ठन रुख जरूर लगावन अउ ओला बड़े करत तक संजो के रखन। "एक रुख, सौ बेटा बरोबर" के गोठ ल सार्थक करन।

पानी के एक-एक बूंद बचावन:- पानी ल फोकट मा झन बहावन। पानी अउ बरसाती पानी ल सहेज के रखे के उपाय  ल बढ़ावा देवन।

उपयोग होवइया प्लास्टिक' ल कहिबो 'ना':-हमन हाट बजार जावत बखत संग मा कपड़ा या जूट के झोला धर के जावन। प्लास्टिक के झिल्ली-पॉलीथिन के बहिष्कार करन।

बिजली के सही उपयोग:- बिजली बचावन। जरूरत नइ रहे मा पंखा, लाइट अउ टीवी-कंप्यूटर बंद रखन। जहाँ तक हो सके, सुरुज के उरजा (सौर ऊर्जा) जइसन साधन मन ल अपनावन।

कचरा ल संजोवन:-  सुक्खा अउ गिल्ला कचरा ल अलग-अलग रखन। घर के थोर-बहुत कचरा ले घर मा  खातू बनाय के उदिम करन। अउ अपन सेहत ल बचावन, फसल मन ल, रसायनिक पदार्थ ले बचावन।

प्रकृति ल दोहन के विषय न मानन:- आदिकाल अउ वैदिक काल के जइसे प्रकृति ल सनमान मिलय वइसने आज घलो  मान देवन। प्रकृति के कोनो भी जिनिस ल, अपन जागीर नइ समझन ओकर सही ढंग ले उपयोग करके रक्षा करन।


        पर्यावरन हा हमर दाई महतारी बरोबर आय, जे हमन ल जिनगी देथे। यदि हमन एकर नुकसान करबो, त आखिरी मा हमन अपन खुद के बिनाश करबो। आज बखत के माँग हे कि हमन तरक्की घलो करन अउ कुदरत प्रकृति ल घलो बचा के रखन। प्रकृति के रक्षा च मा हमर अउ ये धरती के सुरक्षा हे। आवव, हमन सबो मिलके संकलप लेवन कि हमन प्रकृति के शोषन नइ, भलुक ओकर पोषन करबो।

            ‘प्रकृतिरेव शरणम्’।

प्रकृति हा हमर असली आश्रय सहारा  हरे।

            ‘वृक्षो रक्षति रक्षितः’।

 जब हमन पेड़-प्रकृति के रक्षा करबो, त प्रकृति हमर रक्षा करही।

आवव मिलके “भुइयाँ ल हरियर बनावन, पर्यावरन बचाके जिनगी सुधारन।"



डॉ पद्‌मा साहू ‘पर्वणी’

 खैरागढ़

 छत्तीसगढ़

हमर संस्कृति के चिन्हारी गहना - गुरिया

 हमर संस्कृति के चिन्हारी गहना - गुरिया


धरती दाई के अँचरा ल निहार के देखबे, त प्रकृति के अद्‌भुत सुघरई, सब ला अपन कोती खींच लेथे । ओरी-ओर रिकिम-रिकिम के पेड़, सबके आने-आने सुग्घर-सुग्घर फूल पात । दूर-दूर तक फइले जंगल, खेत- खार, कल-कल करत झरना, घाटी, नरवा,नदिया इहाँ के सुग्घर अलग-अलग बनावट । रहन-सहन, कोस-कोस म बदलत बोली । प्रकृति अलग-अलग रूप म सबके मन ल मोह लेथे । बिहिनिया होत ही सुरुज के सोनहा बिहान ह मानो धरती के चराचर जीव जगत उठावत हें। ओस के बूंद-पाना म मोती कस चमकथे। चिरई-चिरगुन के मीठ आवाज ले-मन आनंदित हो जथे, तभे तो अइसन अद्‌भुत सुघरई ल देख मयूर तको नाचे ले धर लेथे । अउ जब भारत भुइर्याँ के श्रृंगार के गोठ करथन त प्रकृति के मनोहारी सुघरई, आँखी के आगू झूले ले धर लेथे। उत्तर कोती हिमालय मुकुट कस सऊँरे, तीनों-डाहर समुद्र के लहर जइसन महतारी के गोदी म अठखेली करत हे। हरियर धरती धानी अइसे लागत हे, जइसन पूरा धरती के सुघरई ल अपन अँचरा म समा ले हे। जब इतिहास के पन्ना ल हम पलट के देखथन त सुग्घरता-चाहे काँहीं भी जिनिस के होवय, अपन कोती जरुर खीचथे अउ प्रकृति तो स्वयं म कतेक सुग्घर हे।तभे तो कइथे न--

-सत्यम, शिवम, सुंदरम ।

अउ जब छत्तीसगढ़ महतारी कोती ल देखथन त छत्तीसगढ़ महतारी सुग्घर हरियर लुगरा पहिरे सोला सिंगर करे माँग म सेंदूर, बाल गजरा ले सजे, भाल म गोल बिंदी चमकत, कान म खिनवा, झुमका झूलत रहिथे,जउँन उँखर रूप ल निखार देथे। नाक म नथनी, गला म हँसली-सुतिया, हाथ म चूड़ी कंगन, बहुँटा खनखनावत, एक हाथ म हँसिया धरे - जउँन मेहनत अउ कर्मठता के चिन्हारी आय। त-दूसर हाथ म धान के सुनहरी बाली ।बदन सम्मृद्धि अउ अन्न के बरकत ल दरशाथे। कमर म  करधन, पाँव म बिछिया- पायल छन-छन करत मानो मधुर संगीत के लय बिखेरत हे। ओखर रूप ल देखके अइसे जनाथे, सोला सिंगार करे महतारी के रूप सहीच म ममता के भाव झलकत दिखथे, अउ अइसे लागथे हमर महतारी अपन लइका मन ल अपन गोदी म बइठारे हे।

देख सुग्घरता नारी मन के, दर्पण घलो लजाथें।

माथ के बिंदी, बेनी के गजरा, जब मुच-मुच मुसकाथें।

सुग्घरता तो नारी परानी के नैसर्गिक गुण हरे, अउ जब-हम प्राकृतिक सुग्घरई के बात करथन त छत्तीसगढ़िहिन नारी के श्रृंगार के सादगी विश्व म प्रसिद्ध हे।हमर संस्कृति म नारी मन के श्रृंगार करे के चलन प्राचीन काल ले चले आवत हे। ऐतिहासिक मूर्तिशिल्प म नायक-नायिका के श्रृंगार ल देख के, कतेक भाव-विभोर हो जथन  आज उही गहना सब ला प्रभावित करत हें।

इतिहास कार मन कइथे नारी श्रृंगार के प्रथा, गोदना ले शुरु होय रिहिस होही। जेन वो समे के श्रृंगार राहय । आज फेर उही ह अपन रूप बदल के आय हवय। जेला आज के पीढ़ी के लइका मन टैटू कहिथे। धीरे-धीरे फूल, मोर पाँख, कौड़ी, घोंघी, रंग बिरंग के पथरा, मोती-मूंगा जइसन जिनिस के, श्रृंगार करें ले धरिस तभे तो कहिथे न बहुत कम म श्रृंगार के जिनिस होय के बाद भी बड़ सुग्घर दिखे के प्रकृति ह नारी मन ल अइसे बनाय हें, जइसे लगथे प्रकृति ह नारी के श्रृंगार म दिखत हे।

हमर पुरखा मन इहाँ के मनखे मन बर अलग- अलग राज उँखर रहन-सहन, रीति-रिवाज के हिसाब ले पहिरे-- ओढ़े, सजे सँवारे के जिनिस बनाय हे। जेन नारी व प्रकृति-ले जोड़े राखथे अउ धीरता, परिवार बर आदर्श अउ  समरपन के भाव सिखोथे । काँहीं भी तीज तिहार, मड़ई मेला म जब महिला मन सोला श्रृंगार करके निकलथे त ओखर रूप म चार चाँद लग जथे।वइसे तो नारी अउ पुरुष दूनों अपन रूप ल सँवारे के उदिम आदिकाल ले करत आवत हे। फेर नारी मन के सऊँख पुरुष मन ले कतको जादा होथे। तभे कइथे तको नारी के सोला सिंगार करे ले सुख-समृद्धि आथे। पैरी के झुनुर-झुनुर आवाज ले घर म ऊर्जा के संचार होथे ।श्रृंगार सकारात्मकता भरथे, खुशी अउ मया-पिरित के बढ़वार करथे।

चूड़ी खनकय हाथ म, पायल गावय गीत । 

बिंदी सोहय माथ म, लागय सुग्घर मीत ॥


छत्तीसगढ़ के संस्कृति म गहना गुठा बड़ समृद्ध नजर आथे 'गहना-गुठा सिरिफ श्रृंगार भर नोहय, बल्कि ये हमर संस्कृति-परंपरा अउ पहिचान के जीयत- जागत चिन्हारी आय । गाँव-होवय ते शहर, खासकर तिहार, बर-बिहाव अउ पारंपरिक अवसर म अपन गहना ल पहिन के अपन संस्कृति ल जिंदा राखथे, इहाँ अंगरी ले लेके मुड़ी के खोपा तक नारी श्रृंगार देखे बर मिलथे । जाति सम्प्रदाय अउ क्षेत्र के हिसाब ले येमा फरक जरूर होथे। जइसन विश्व पटल म जब छत्तीसगढ़ के बात होथे, त बस्तर के नारी मन के श्रृंगार जरूर झलकथें। उहाँ के वनांछादित प्रदेश म आदिवासी-जन-जीवन प्रकृति ल पूजत आवत हे। ओखरे सेती उहाँ के श्रृंगार म तको प्रकृति झलकथे। उहाँ के नारी मन ल देखथन त सुग्घर गोदना, गोदाय, मुड़ म सीप-कौड़ी-मोर पंख लगाय, जुड़ा म फूल गजरा अउ बेनी म फुँदरा-झाबा, बनुरिया लगाय, नाक के दूनो कोती बड़े-बड़े फुल्ली पहिरे, सुर्रा कंकनी, नागमोरी अउ कनिहा म घुँघरू वाला करधन पहिरे रहिथे। आदिवासी जन जीवन म कंघी के बड़ महत्तम हे। वोमन बाँस के बने कंघी जरूर राखथे इहाँ के ग्रामीण अंचल के मन कंघी ल प्रेम निवेदन के चिन्हारी तो मानथे ।

अइसने मैदानी क्षेत्र के गोठ करथन त वो चाहे रायपुर होवय या बिलासपुर सब जगा क्षेत्र अनुसार ओकर स्वरूप म थोरको या कोनों जगा बहुत अंतर देखे बर मिलथे । फेर गहना के जेन मूल रूप हे तेन सबो जगा एके हे । पर सुग्घर दिखे के चाह तो हमर जनम जात हरे, हमर करा सोन के गहना राहय या चांदी या फेर गिलवट धातु के, फेर जेन हे-तेने म हमन सुग्घर दिखे के उदिम करते रहिथन ।

माथ माँग म मोती पहिरे, कान फभे तुरकी! 

गहना फभये नारी मन ला, झुमका अउ लुरकी। 

पहिन नाक म नथली मोती, गहना हे सुतिया।

कान खींनवा लटकन सोहय, पहिरय जब रुपिया॥

आज भी हमर पुरखा मन के चिन्हारी गहना गुठा हम ला अपन कोती प्रभावित करथे, अतका सुग्घर- सुग्घर ओखर बनावट डिजाइन आज के आधुनिक युग म तको ओखर अलग पहचान हे । अउ ये सिरिफ नारी मन के श्रृंगार के जिनिस नोहय, येकर पाछू उँखर गहिर सोच रिहिन । तभे तो शुभता के प्रतीक, सुहाग के चिन्हारी संग आज के समे म येकर वैज्ञानिक प्रमाण तको देखब-म मिलत हे।

बिहाता महिला मन सेंदूर, टिकली. चूड़ी, महुर-नखपालिश, मेंहदी, काजर, पावडर, क्रीम, मुहरंगी, कउँड़ी, पाँख, फूल अउ तो अउ कान म दवना पान खोंचे – चुकचुक से दिखत रहिथे।जइसे लुगरा पाटा के पहिरई ह अलग अलग राज के हिसाब ले नारी-के श्रृंगार म मिंझरथे । ओइसने साज श्रृंगार तको मिंझर जथे।जइसन नारी मन अपन चुंदी ल सुग्घर खोपा पारे या बेनी गाथे, पुँदरा लगाय, फूल पाँख अउ गजरा ले सजाथें-सँवारथें। अपन बेनी म चाँदी या डालडा चाँदी के पिन लगाथें। झाबा,बिनुरिया जेन ल बर बिहाव म शुभता मानथन तेन ल लगाके बाल ल सुघराथे ।नारी के साज श्रृंगार गहना केवल परंपरा अउ सुघरई भर ल नइ बढ़ावँय, बल्कि येमा वैज्ञानिक प्रमाण तको मिलथे, जेन नारी के रूप ल सजाथे- सँवारथे अउ ओखर मन ल तको संतुलित राखे म मदद करथे।जइसे

माँग टीका-  जेन ल कई जगा माँग-मोरी 'घलो केहे जाथे ये महिला मन के एकदम खास अउ पवित्र गहना आँय । ये माथा के बीच माँग म पहिरे जाथे, जेन मेर सेंदूर लगाय जाथे । माँग टीका सुघरई ल तो बढ़ाबे करथे, बल्कि ये नारी के सम्मान, गरिमा अउ सुहाग के प्रतीक तको माने जाथे। बिहाव अउ तीज तिहार बार म ये गहना नारी मन के रूप ल निखार देथें

माँग टीका जेन मेर पहिरे जाथे, वो जगा गाथा के बीच आज्ञा चक्र माने जाथे। जेन जगा म हल्का दबाव ले मन शांत अउ तनाव कम होथे। येला पहिरे ले शरीर के तापमान तको सामान्य होथे,अइसे कहिथे लोगन मन।

नथली - नथली सुहाग, सुग्घरता अउ सम्मान के चिन्हारी आय। येला पहिरे ले रूप निखर जाथे, बिहाव के बेरा नववधु के जरूरी श्रृंगार होथे। कई जगा तो नथ, बिहाव म जरूरी हो जथे । फुल्ली नथ सुहागिन मन के सुहाग के चिन्हारी हरे। ये हमर परम्परा अउ संस्कार के तको  चिन्हा आय। ये सुघरई ल तो बढ़ाबेच करथे, फेर वैज्ञानिक रूप म तको येकर प्रमाण मिलथे, नाक के बाँया हिस्सा के संबंध महिला के गर्भाशय ले होथे, काबर नाक के नस गर्भाशय ले जुड़े-होथे, जेखर ले जचकी संबंधी समस्या कम होथे।अइसने कान म-- 

करणफूल 

कई प्रकार के सुग्घर-सुग्घर कान म पहिने के खिनवा, ढार, लवंगपूल तरकी, लुरकी, आयरिंग पहिनथे । अउ अइसे कहे जाय करणफूल ले कान ढकाय रहिथे जेखर ले नारी परानी मन बुराई ल सुने ले दूर राहय।अउ कान के बाहिर म कई ठन नस जुड़े रहिथे, जेन गहना के दबाव ले दबे रहिथे, जेन गुर्दा-अउ कई अंग ल स्वस्थ राखथे । जेन ल आज के भाखा म एक्युप्रेशर पाइंट कहिथे ।

तितरी 

तितरी अतका सुग्घर गोलहूँ, कई रंग के मोती जड़े कान के उपर भाग म पहिनथे अइसने खोटिया ल तको महिला अउ पुरुष दुनो झन पहिनथे इहू ल एके कान म पहिनय अउ सुग्घर फभय।

मंगलसूत्र 

मंगलसूत्र बिहाव के सबले पवित्र गहना माने-जाथे, ये बिहाता के सौभाग्य, सुहाग, अउ पति-पत्नी-के अटूट संबंध के चिन्हारी आय । जब वर अपन दुल्हन के गला म मंगलसूत्र पहिनाथे,त वचन लेथे संग निभाय के रक्षा करे के, जीवन भर साथ रेहे के।ये परंपरा अउ शुभता के संग मानसिक संतुलन बनाय राखथे,शरीर म सोना पहिरे ले रक्त संचार म सुधार होथे।अउ करिया पोत नकारात्मक उर्जा ल सोखथे, अइसे केहे जाथे हमर छत्तीसगढ़ के कई जनजातीय समुदाय के मन मोहर या कलदार पहिनथे, जेन सोना चाँदी या रुपिया ले बने होथे, अउ रेशम या कोसा के धागा ले गुँथाय रहिथे ।

पुतरी –

करिया या लाली पोत म गुँधाय सोना के ठप्पा रुपिया कस या गिलट के बने या सिक्का के बने होथे जेन ल महिला मन अपन छत्तीसगढ़ी वेषभूषा म पूरा गहना ल पहिनथे, अउ अपन परंपरा संस्कृति के चिन्हारी ल बड़ मया ले संजोथे।

सुतिया

ये गोल मोटा असन अउ कड़ा जइसन गला के गहना होथे, जेन गला म एकदम चिपके रहिथे, ये चांदी या गिलेट धातु ले बने गोलहूँ असन दिखथे।

सुर्रा

सुर्रा ल तको गला म पहिनथे, जेन गोल-गोल बड़े माला कस लाख म सोनहा परत चढ़े कई ठन लाल अउ कई ठन सोनहा रंग के रहिथे, जेन ल नौ या ग्यारह विषम संख्या म पहिने जाथे। जेन रेशम के धागा म गुँथाय रहिथे।अइसने हँसली, पटली, कंठा, अउ आजकल ल देखन त किसम-किसम के डिजाइन, लक्ष्मी हार, चोकर ये सब गहना हमर गला मा चिपके रहिथे तब शरीर ले घर्षण करके हमर खून के संचार ल बढ़िया राखथे।

बाजुबंद या बाँहटा –

ये हमर पुरखौती गहना आय, जेखर ले बाँहीं सजथे, जेन ल महिला मन खास मउँका म पहिनथे कुछ जगा येला पुरुष मन तको पहिनथे। ये सोना, चाँदी या गिलेट धातु ले बने, बड़ सुग्घर-सुग्घर डिजाइन के बने होथे।

नागमोरी 

नागमोरी ल तको बाँहीं म पहिनथे जेन साँप के डिजाइन असन होथे।हरैया तको येकरे एक प्रकार हरे

बहुँटा, पहुँची कंकनी करधन, पहिरे सुग्घर पुतरी।

बाँही सजे हे नागमोरी ले, अंगरी म पहिले हे मुंदरी ।

साँटी, टोड़ा, बिछिया, पैरी, अइठी हाथ के हवय गहना । 

गहना फभथे नारी मन ला, सिरतो हवय कहना।


करधन 

करधन हमर श्रृंगार के अहम हिस्सा आय। महिला  मन येला साड़ी या लहंगा के उपर, कोनो भी तीज-तिहार. बर-बिहाब म पहिनथे, लोकगीत मन म भी करधनिया के सुग्घरता के वर्णन देखब म मिलथे। (अलग अलग जगा म येकर अलग-अलग नाम तको हे) ये सोना, चांदी या कोनो भी धातु ले बने होथे, कई डिजाइन अउ कई लर के बने ये करधन सौंदर्य ल तो बढ़ाबे करथे, अउ अइसे घलो केहे जाथे, येला पहिरे ले पेट संबंधी समस्या दूर होथे। मोटापा म राहत मिलथे, महवारी के समय दरद म आराम मिलथे । 

पायल 

पायल के नामे सुनके पायल के छम-छम सुग्घर आवाज के एहसास हो जथे, जब नान-नान लइका मन घुँघरू वाला पायल ल पहिन के रेंगथे त अपने आप सकारात्मकता आ जथे। जब नवा बहुरिया के पायल के छम-छम ले घर गुँजथे त खुशी के उर्जा प्रवाहित होथे । पायल, पैरी, पाजेब तोड़ा, पैजन, जिहाँ गोड़ के सुघरई ल बढ़ाथे उहें ये हमर सुहाग के चिन्हारी संग, सेहत के तको रक्षा करथे, चाँदी के पायल उर्जा के संवाहक होथे, जेन हमर शरीर म उर्जा के संचय म मदद करथे ।उहें हड्डी ल मजबूत करके खून के संचार ल नियंत्रित करके,पाँव के दरद म आराम पहुँचाथे।

बिछिया

बिछिया ल गोड़ के अंगरी म,  खासकर अँगूठा के बाद वाला दूसरइया अंगरी म पहिने जाथे। फेर आजकल सबो अंगरी-म पहिनत हे, जेन बिहाता महिला मन के सुहाग के चिन्हारी आय, बिहाव में बिछिया पहिनाय के खास रस्म तको होथे, बिहाता महिला मन सौभाग्य के प्रतीक अपन सुहाग के चिन्हारी ल हरदम पहिने रहिथे । ये पाँव के सुघरई ल तो बढ़ाबे करथे, फेर येकर वैज्ञानिक पहलू इहू आय येला पहिरे ले गोड़ के नस सीधा गर्भाशय ले होवत हृदय तक जाथे। जेन ह गर्भाशय ल स्वस्थ बनाय रखथे, मासिक चक्र ल नियमित राखथे अउ ब्लड प्रेशर ल तको नियंत्रित करथे । अउ चांदी शरीर के उर्जा ल संतुलित करे म बहुत मदद करथे।

ये गहना गुठा मन ल जब हमन अपन दाई-परदाई मन ल पहिने देखन त कतका सुग्घर जग-जग ले दिखँय । आजो हम सिर ले नख तक गहना पहिने, सियान मन के फोटू ल देखथन त मन भाव-विभोर हो जथे ।आज आधुनिकीकरण के युग म हमर पुरखौती गहना मन अपन चमक ल थोकन खोवत जात हे। अउ  ये सिरतोन-- बात तको आय बदलाव तो प्रकृति के नियम आय। आज के भागमभाग कामकाजी जमाना म कम वजन के, कमल लागत के। नवा-नवा डिजाइन कोती महिला मन के झुकाव होवत हे। ओखर सेती वजनी भारी आभूषण म कमी आवत जात हे। पहिली मनखे मन करा नगद पइसा-कौड़ी नइ राहत रिहिस, त इही, कीमती धातु गहना उँखर पूँजी राहय । जेन ल बेरा बखत भँजा तको लेवय।

आज विकास के दौर म लोगन के आना जाना दूर-दूर शहर-यहाँ तक सात समुंदर पार म होवत हे। तेखर सेती बहुत -अकन गहना के रूप बदल गेहे, अउ हल्का-फुल्का गहना -अपन जगा ले, लेहे। अउ समय के माँग तको  इही आय, फेर अइसे भी नइ हो सकय हमर संस्कृति अउ संस्कार के वाहक गहना गूठा , कहूँ, नँदा तो नइ जही।

फेर आजो देखे बर मिलथे कई ठन सामाजिक संस्था के-महिला मन, काँहीं सामाजिक आयोजन, अपन तीज- तिहार म अपन पारंपरिक गहना-गुठा ल पहिनत हे। अउ सबो ल येला बचाय बर प्रेरित तको करत हे। हमर तो इही प्रयास-हे, हम सब ला अपन संस्कृति के संदेश देवइया, संस्कार के बोध करइया, हमर पुरखा के चिन्हारी ये गहना गुठा ल सँभाल के, सँजो के राखे के जरूरत हे।


गहना गुठा चमके देह म, मया के रंग रचावय। 

माटी के महक संग, अपनों खुशबू बगरावय।

गंगा कस पावन सुग्घर, नारी के मान बढ़ावय। 

संस्कार के सोनहा चिन्हारी, जनम-जनम संग निभावय।



संगीता वर्मा 

आशीष नगर रिसाली भिलाई

घाम "के अलग अलग नाम

 " घाम "के अलग अलग नाम  

       -मुरारी लाल साव 

बेरा याने सुरुज भगवान l घाम लेके आथे l बेरा निकलिस घाम जनाथे l रोजे घाम होथे l ऋतु बदल थे,मौसम बदलथे l उही घाम आने आने जनाथे l अभी भागत जेठ के घाम ला देखत हन,जानत हन,सहत हन l ओकर नाम जेठ हरे -जेठ के घाम l  हर महीना के घाम अपन अनुभूति कराथे l पूस के घाम के अलग आनंद l बरसात आही बरसाती घाम l घाम के संग पानी गिरे ओला कोलिहा के बिहाव घाम कहिथे l "घाम उवत हे घाम उवत हे कोलिहा के बिहाव होवत हे l,लइका मन नाच नाच के गाथे l 

"लोक जीवन म  सब अनुभूति करे हे l  अनुभव होथे ओइसन नाम धर देथन l घाम जियानिस त कहिथन जइसे -लक लक ले घाम,रग रग ले घाम,चक चक ले घाम, टक टक ले घाम,लेसलेसहा घाम,

बदरहा/ बदराहा घाम,

रउंनिया घाम, भोरहा घाम,

 कोवंरहा घाम,कुंवरहा घाम,फुसफुसहा घाम,जोरदरहा घाम,मँझनीहा घाम,संझाउती घाम l आखिर म येदे अउ सुरता आगे  चर चरहा घाम l

सुरता राखे रहू अउ बताहू l

हमर छत्तीसगढ़ी कतका पोठ हे है ना l

-कुम्हारी जिला दुर्ग