Friday 5 July 2024

स्वच्छ भारत अभियान

 स्वच्छ भारत अभियान 

                    गाँव ला स्वच्छ बनाये के संकल्प ले चुनई जीत गे रहय । फेर गाँव ला स्वच्छ कइसे बनाना हे तेकर , जादा जनाकारी नइ रहय बपरी ल । जे स्वच्छता के बात सोंच के , चुनई जीते रहय , तेमा अऊ शासन के चलत स्वच्छता अभियान म , बड़ फरक दिखय । बहुत दिन ले बांचे के कोशिस करिस , फेर छेरी के दई कब तक खैर मनाही , लपेटा म आगे अऊ वहू संघरगे शासन के अभियान म । अपन गाँव ल स्वच्छ बनाये बर , घरो घर , सरकारी कोलाबारी बना डरिस । एके रसदा म , केऊ खेप , नाली , सड़क अऊ कचरा फेंके बर टांकी ...। गाँव म हाँका परगे के , कनहो मनखे ला , गाँव के खेत खार तरिया नदिया म , दिशा मैदान बर नइ जाना हे , जे जाही , तेकर ले , डांड़ बोड़ी वसूले जाही । कागज म , गाँव के भौतिक कचरा के , अधकचरा नियंत्रण होगे फेर , एक कोती गाँव उहीच करा के उहीच कर , अऊ दूसर कोती , मनखे के मन म सकलाये कचरा , शौचालय के संखिया ले जादा बाढ़हे बर धर लिस ।  

                    एक दिन के बात आय , एक ठिन तिहार म , उही गाँव के भगवान ल , अबड़ अकन भोग लगिस । भगवान घला कभू खाये निये तइसे , उनिस न गुनिस , पेट के फूटत ले खा डरिस । रथियाकुन पेट पदोये लागिस । भगवान सोंचिस मंदिर भितरी म करहूँ , त पुजेरी सोंचही भगवान घला मंदिरेच म .......। चुपचाप लोटा धरिस अऊ निकलगे भाँठा ..... । जइसे बइठे बर धरिस , कोटवार के सीटी के अवाज सुनई दिस । भगवान सोंचिस – कोटवार हा कहूँ मोरे कोती आगे अऊ चिन डरिस त बड़ फजित्ता हो जही । धकर लकर हुलिया बदलिस तब तक , कोटवार पहुँचगे अऊ केहे लागिस – तैं नइ जानस जी , हमर गाँव हा ... ओ डी एफ ... घोषित हे , इहाँ खुल्ला म शौच मना हे । भगवान पूछिस ‌- कती जगा बईठँव , तिहीं बता ? कोटवार खिसियावत किथे – तोर घर शौचालय निये तेमा , भाँठा पहुँच गेस गंदगी बगराये बर ।  भगवान किथे – मोला तो पूरा गाँवेंच हा शौचालय दिखत हे अऊ अतेक गंदा के , बइठना मुश्किल हे । कोटवार अकबकागे , सोंचत रहय .. कइसे गोठियाथे बिया हा ... । 

                    भगवान फोर के बतइस - मंदिर म धरम के ठेकेदार मन , कोंटा कोंटा तक म अपन सोंच के शौच म ... दुर्गति कर देहें । कोटवार किथे – मंदिर मा रहिथस त , पुजारी अस का जी ? तोर घर म तो  शौचालय हाबे , उहें नइ बइठथे गा .... । भगवान किथे - मोर तो कतको अकन घर हे बाबू , जेकर गिनती निये । मंदिर म मोर नाव ले अपन अपन रोटी सेंक के , मोर रेहे के जगा म शौच कर देथें । मस्जिद म रहिथँव त , अलगाववाद अऊ कट्टरवाद के पीप ला , जतर कतर शौच कस बगरा देथे । गिरिजाघर म खुसर जथँव त , वहू मन , लबारी के प्रचार प्रसार करत ...... पूरा खोली म , एक ला दूसर ले लड़ाये के बैचारिक कचरा ल घुरवा कस , बगरावत रहिथे । 

                    थोकिन सांस लेवत फेर केहे लागिस ‌‌‌- आम जनता के घर के , सरकारी शौचालय के तो बाते निराला हे । बनते बनत देखथँव , ओकर हरेक ईंटा म मिस्त्री , ठेकेदार अऊ इंजीनियर के , शौच के निशान पहिली ले मौजूद हे । शौचालय बनतेच बनत , इँकर भ्रस्टाचार के गंदगी ले निकले बदबू म , नाक दे नइ जाय । कोटवार किथे – तोर पारा के पंच ला नइ बताते जी ..... । भगवान किथे - उहू ला बतायेंव , थोरेच दिन म एक ठिन ओकरो नाव के , बइमानी के शौच लगे ईंटा चढ़गे । सरपंच तो अऊ नहाकगे रहय , ओहा जगा जगा के शौचालय म धोखाधड़ी के कांड़ लगावत किंजरत रहय । अधिकारी मन करा का शिकायत करतेंव - ओमन कपाट बर , लबारी के फ्रेम तैयार करत रहय , जेमा सरहा मइलहा लालच के पेनल , वहू अतका भोंगरा के ........ बिगन झाँके जना जाये के , कती मनखे भीतरि म खुसरे हे । बिधायक के घर म , फरेब के पलस्तर लगाये के , योजना बनत देखेंव । दिल्ली तक पहुँच गेंव , उहां येकर संरक्षण बर , मौकापरस्ती के छड़ अऊ विस्वासघात के सीमेंट म , फकत आँकड़ा के छत , बनत रहय । उहू छत के हाल तो झिन पूछ बइहा ....... , अतका टोंड़का ........ अऊ हरेक टोंड़का ले , देश ला बर्बाद करइया , किरा बिलबिलावत .... बदबूदार सोंच , बूंद बूंद करके टपकत , गंदगी बगरावत रहय । अभू तिहीं बता कोटवार , कति जगा जाके गोहनावँव । कति मनखे , मोर बर , स्वच्छ शौचालय बना सकत हे ? मोर देस म स्वच्छ भारत के कल्पना कइसे अकार लिही ? 

                      कोटवार किथे - जब अतेक ला जानथस , त , तिहीं नइ बइठ जतेस दिल्ली म । कोन गंदा बगराये के हिम्मत करतिस । भगवान जवाब देवत किहिस – मय भगवान अँव बेटा । मय सरग म शासन कर सकत हँव फेर , तोर भारत म शासन , मोर बर मुश्किल का ...... असंभव हे । कोटवार लंबा सांस भरत किथे - का करबे भगवान – जेला अच्छा जानके दिल्ली म बईठारथन तेमन ...... उहाँ बइठते साठ , कोन जनी काये खाथे .. , का पचथे ....... का नइ पचय ......., संसद भितरी म , गंदगी बगराना शुरू कर देथे , इही गंदगी हा , जम्मो देश म , धिरलगहा , एती ओती , जेती तेती , जतर कतर , बगरके देश ला जहरीला बना देथे । जे मनखे संसद म खुसर नइ सके तिही मन , तोरे कस लोटा धरके , गंदगी करे के जगा अऊ मौका तलाशत किंजरत रहिथे .......। 

                     कलेचुप लोटा धरके भगवान हा मंदिर म खुसरिस ओकर बाद से .. कभू निकले के हिम्मत अऊ इच्छा दुनों नइ करिस । 

    हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

हाथा दे के परम्परा

 : लेख 

      हाथा दे के परम्परा

      हाथा दे के परम्परा बड़ जुन्ना हे।ये परम्परा छत्तीसगढ़ के संगे संग पूरा देश में हवय।भारतीय संस्कृति में हाथा ल बड़ सुभ माने गे हे।हाथा ल हिंदी म पंचसूलक कहे जाथे। हाथा दुनों खाली हाथ म कुमकुम या हरदी ल एक ठिंन थारी म घोर के हाथ म सान के घर के दीवार म छापे जाथे। हमर छत्तीसगढ़ म चौऊर पिसान या गहूँ पिसान ल पानी म घोर के ओमा हरदी या बंदन मिलाके हाथा दे जाथे।

            नवा घर के गृहप्रवेश के पूजा के बेरा म घर के मुख्य दरवाजा म हाथा दे जाथे।गृहप्रवेश के पूजा हाथा बगैर पूरा नी माने जाये। कथा-पूजा ,तीज-तिहार,जन्म संस्कार ,बर बिहाव म हाथा दे के परम्परा हे। नवा बहुरिया के घर म गृहप्रवेश होथे त नवा बहुरिया ह घर के मुख्य दरवाजा म हाथा देथे। हाथा ह हिंदू धर्म म बड़ सुभ अउ समृद्धि कारक माने गे हे। हाथा या पँचसूलक के साथ म स्वास्तिक बनाये जाथे। हाथा के छापा बनाये ले घर म सुख शांति रहिथे। घर के लोगन मन ल हर काम-काज म सफलता मिलथे।घर म कलह-क्लेश के नाश होथे। घर म बुरी आत्मा, भूत प्रेत के नजर नी लगे। हाथा ल लछमी माने जाथे।हाथा दे ले घर म साक्षत लछमी माँ बिराजमान होथे। घर म अन्न -धन के कोनो कमी नी होवे ।अईसे माने जाथे।

          हाथा के परम्परा ह बड़ प्राचीन हे। जुन्ना बेरा म जब कैमरा अउ फोटू नी रहीस तब परदेस जवईया मन ह अपन परिवार वाला के याद बर ओखर हाथा ल कागज म छाप के ले गे अउ ओ हाथा ल देख के  खुस होवे। रवींद्र नाथ टैगोर के कहिनी काबुलीवाला में एखर जिक्र हे।

           पूजा-कथा या तीज तिहार ,बर बिहाव म हाथा सुहागिन या कुंवारी कन्या  मन देथे। हाथा देवईया सुहागिन या कुंवारी कन्या मन ल हाथा दे के बदला म कुछु पईसा, कपड़ा या अन्न धन दे जाथे। हाथा घर के मुख्य दरवाजा, धान के कोठी, तिजोरी, पूजा घर, अउ मंदिर म दे जाथे। कई जगह म गोबर के हाथा दे जाथे।अईसे मान्यता हे कि गोबर के हाथा दे ले बुरी आत्मा और भूत प्रेत के नजर नई लगे। हाथा देवई हमर संस्कृति के परिचायक हे। जेला नवा पीढ़ी भुलात जाथे।

                     डॉ. शैल चन्द्रा

                    रावण भाठा,नगरी

                    जिला-धमतरी

                   छत्तीसगढ़

आदरणीय सम्पादक महोदय,

                                  सादर नमस्कार!

                  उक्त लेख मौलिक अप्रकाशित है।

                      डॉ. शैल चन्द्रा

छत्तीसगढ़ी कहिनी* *सबला बड़खा धरम*

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             *छत्तीसगढ़ी कहिनी*



             *सबला बड़खा धरम*

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          महाविद्यालय के सभाकक्ष मा सबो पढ़ईया  लईका मन ठुला गय रहिन। आज युवा उत्सव के तीसर दिन रहिस। मंच म स्वामी विवेकानंद के आदम कद तेल चित्र  हर  माढ़े रहिस । फुल - पान,अगरबत्ती के बाद  म ये  जगहा हर  बहुत नीक लागत हो रहीस । 


        आज के विषय  रहिस,  'मोर धरम:दू पद म ' ।एक प्रकार ले  एहर विवेकानंद के विश्व धर्म सम्मेलन  के सुरता म  एकठन छोटकुन खेलवारी घलव रहिस ।   मंच संचालक पलीहा हर  थोरकुन म अपन बात रखत बारी बारी ले  भाग लेवइया मन ल बलाय के शुरू  कर दिस-


        "मोर नॉव जुनैद आय।इस्लाम मोर धरम ये।अउ मोला अपन मुसलमान होय म बड़ा फख्र हे।इस्लाम ल अगर एक शब्द म आप कहना चाहो तब वो शब्द हर ये -ईमान। अगर हर मनखे ईमान ल साध लेय तब सब सधा जाही।"


          कतेक न कतेक अउ कतका बेर ल ताली हर बजिस।


"मैं पीटर,  पहिली मोर नाव पीतर लाल रहिस।बपतिस्मा होइस अउ मैं पीटर बन गय ।मैं अब ईसाई अंव ।ईसाई धरम ल एक शब्द म कहबे तब वोहर 'प्रेम' ये।सच्चा  ईसाई  करा प्रेम के छाण अउ आन कछु नइ रहय। वोकर कोई बैरी नइ रहय।वोहर नफरत जानबे नइ करे। प्रेम अउ प्रेम ...सब बर प्रेम एइच हर सच्चा ईसाइयत आय ।"


" मैं श्याम सुंदर ..आप सब झन ल जोहर हे।मैं हिन्दू अंव ।हिन्दू धरम ल एक पद म समझे बर हे तब  'सत' आय।   अउ सत्याचरण  का ये।

।  मनसा वाचा कर्मणा ऐक्य, मन म जउन है वोहर कण्ठ ले निकले अउ वोइच्छ ल हाथ  हर करे । अउ ये सब परहित बर रहे-

परहित सरिस धरम नही भाई ।

पर पीड़ा सम नही    अधमाई ।


       हिन्दू धर्म के बस यई हर सरल रूप आय ।ताली फेर बड़ जोर ले बजिस ।


   जसबीर सिख धर्म ल समर्पण, त अजित मांडे बौद्ध धर्म ल मध्यम मार्ग अउ समन्वय बताइस । उदित हर तप ल जैन धर्म के प्रान कहिस।


          सब बोल  डारिन ।


"अरे चन्द्रशेखर ..!तोर कुछु भी धरम नइ ये का।"प्रोफेसर असलम कहिन।


"है सर जी, मोरो धरम हे ।" चन्द्रशेखर कहिस ।


"तंय तो हिन्दू होवस न । तहुँ कुछु बोल ।"


"हिन्दूत्व मोर धरम ....पीछु ये।पहिली मोर धरम राष्ट्र धर्म ये। एहू धरम हर  देश म सदा सदा ले रहे हे ।सिंधु काल,वैदिक काल ल लेके चाणक्य , चन्दबरदाई से लेके माखनलाल चतुर्वेदी तक ए धरम के अस्तुति म कहत नइ थके ये । यई राष्ट्र धर्म हर मोर् धर्म ये। स्वतन्त्रता, समानता , मितानी अउ सब ल न्याय ।एइ हर मोर  राष्ट्र धर्म के चिन्हारी ये ।"चन्द्रशेखर अतका कह के चुप रह गया ।


"अरे एहर तो अइसनहेच धरम ये ,वोहू भी सब बर ।मान ..मान नही त झन मान।"जूही नोनी झर्रस ल अइसन कहिस।


"नही जूही, चन्द्रशेखर हर एकदम  ठीक कहत हे। हिन्दू, सिख ,मुसलिम ये सब धर्म मन तारा जोगनी येँ ।तब  राष्ट्र धर्म हर  चन्द्रमा  आय ..सुरुज आय।राष्ट्र धर्म हर धर्म भर नोहय वोहर परम् धर्म  ये। एकरे कोरा म सब धर्म आके  थिराथें । "प्रोफेसर असलम एक प्रकार ले आज के सभा के उपसंहार करत कहिन ।


     राष्ट्र धर्म ...परम् धर्म..  सबला बड़खा धरम ...उँकर गुरु गम्भीर अवाज एक पइत फेर गुंजिस ।


     विवेकानंद के तैल चित्र के तीर म उदबत्ती मन अभी ले जलतेच रहिन अउ उँकर सुवास ले जगहा हर महमहातेच रहिस ।



*रामनाथ साहू*


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दुलार ‌‌ चन्द्रहास साहू

 दुलार 

                        ‌‌  चन्द्रहास साहू

                         मो 8120578897


सिरतोन अब्बड़ थकासी लाग गे आज बुता के करत ले। फेर बुता तो सिराबेच नइ करे।....अउ एक बुता सिरा जाथे तब आने बुता मुहूॅं फार के ठाड़े रहिथे। बेरा पंगपंगाती ले उठे हावंव अउ बिन अतरे सरलग बुता करत हॅंव तभो ले एको बुता नइ सिराये। कनिहा मा पीरा भरगे । माथ धमके लागिस। आज तो चहा घला नइ पीये हावंव। टिक.. टिक...करत दीवाल घड़ी ला देखेंव। नौ बजके पचपन मिनट, दस बजत हाबे। अब तो चहा के तलब अउ बाढ़गे। फेर बिन दूध वाला ....? इही तो दुख आवय बहिनी !  घरो घर कुकुर पोस डारे हाबे तब कहाॅं ले गाय के दूध मिलही ? 

ननपन मा तो पारा-परोस मा बिन मांगे दूध मही मिल जावय। इही बहाना राम भजन अउ हाल-चाल के जानबा घला हो जावय। खाॅंसी-खोखड़ी होवय वोतकी मा गाॅंव के कोरी अकन हितु-पिरितु मन पुछ डारे फेर अब तो एक दूसर के जानबा नइ होवय। भलुक सरी दुनिया हाथ मा धरे मोबाइल मा समागे हाबे फेर परोसी के सुध नइ लेवय। मरके अईठ जाथे, सर जाथे अउ‌ बस्साये लागथे तब जानबा होथे पारा-परोस के मन ला। अइसना तो बदलत हाबे हमर देश अउ समाज हा। हे भगवान ! अउ कतका बदलही हमर छत्तीसगढ़ हा...? मानवता अउ संवेदना हा सिरा जाही का ये दुनिया ले  ? जी घुरघुरासी लागिस जम्मो ला गुणत-गुणत। हाॅल के सोफा मा बइठ गेंव अब।

"काकी काहंचो नइ मिलिस दूध हा।''

दूध बर पठोये रेहेंव तौन लइका लहुट के बताइस।

"मेंहा तो जानत रेहेंव बाबू ! वोकरे सेती आगू ले चहा चढ़ा डारे रेहेंव गा !''

अब लइका ला मेहनताना देये लागेंव। मया के मेहनताना। देवर के लइका आवय आज पढ़े ला नइ गेये हाबे। वोकर स्कुल के मास्टर मन वेतन बढ़ाओ कहिके हड़ताल मा हाबे। तोस अउ बिस्कुट ला देयेंव अउ इंडक्शन कुकर ले चहा उतार के दू कप मा ढ़ारेंव। मोर कप मा लिम्बु निचोड़ेंव अउ पीये लागेंव चहा ला। ....अउ दू घूंट चहा के चुस्की लेयेंव अउ अइसे लागिस जइसे  मूड़ पीरा हा माढ़गे। अंग-अंग मा नवा ऊर्जा के संचार समागे। मने-मन अंगरेज मन ला धन्यवाद दे डारेंव। भलुक अब्बड़ अत्याचारी करे हव रे परलोकिया हो फेर चहा ला हमर देश मा लान के बने करे हव। चहा के आखिरी घूंट हा उरकिस अउ उदुप ले नजर हा बाथरुम कोती गिस। गंदला कपड़ा के पहार परे रिहिस। अब तो फेर माथ पीरा उमड़गे । मोर, मोर लइका के अउ पटवारी साहब माने मोर पति परमेश्वर के कपड़ा-लत्ता। ...बनियान अउ चड्डी ? सिरतोन धरती फाट जातिस अउ समा जातेंव अइसे लागिस। ...फेर कहाॅं ले धरती फाटही ? महतारी हा बेटी के दुख ला नइ देख सकिस तब सीता बर धरती हा फाटगे...अउ मोर दाई हा मोर दुख ला नइ देख सकिस तब मोर बर वाशिंग मशीन बिसा के पठोये हाबे।.... रहा ले ले वो !  तब बुता करहूं। सिरतोन साहब ला अब्बड़ बरजेंव। भलुक अपन कुर्ता-पेंट ला झन कांच फेर चड्डी-बनियान ला धो देये करे कर जी अइसे फेर वो तो बड़का साहब आवय अउ मेंहा ..? तभो ले अब्बड़ ठोसरा मारथे। घर मा रही के का करथस ?  चार झन के जेवन बनाथस।  दू कुरिया ला झाड़ू-पोछा करथस।..बस ताहन दिन भर सुतथस। टीवी देखथस येकर ले जादा का बुता करथस ? सिरतोन  दुनिया के जम्मो नारी के जिनगी हा इही यक्ष प्रश्न मा अरहजगे हाबे तब मेंहा कइसे बांच सकहूं ?

चार झन के जेवन, दू कुरिया के जतन येकर ले जादा का बुता  ?

जम्मो ला गुणत-गुणत अब कनिहा अउ माथ मा  बाम लगा के दीवान मा ढ़लंग के कम्मर ला सोझियायेंव। झटकुन आँखी लटके लागिस। रातकुन बने ढंग के नींद नइ‌ परे  रिहिस। लइका के यूनिट टेस्ट रिहिस । बिहनिया ले स्कूल पठोये के संसो अउ रिविजन करवाये के जिम्मेदारी। सिरतोन लइका मन के भलुक यूनिट टेस्ट होथे फेर महतारी बर तो बोर्ड के वार्षिक परीक्षा हो जाथे। काॅपी कहाॅं हे मम्मी ? किताब नइ मिलत हे, तब चेप्टर के गोठ। ...अउ ट्यूशन वाली मैडम के नखरा। हाय ...! जम्मो ला मैनेज करना हे तभो ले गोसइया के ठोसरा। घर मा रही के का बुता करथस ? जइसे घर के देख-रेख हा कोनो बुता नो हरे।

खट्...खट् मोहाटी बाजिस अउ कपाट ला खोलेंव। लइका के पीठ  मा लदाये क्विंटल भर के बेग ला उतारेंव। अंग्रेजी मीडियम के स्कूल आवय ना, आनी-बानी के किताब-कॉपी के बोझा ला बोहो के जाये ला परथे उप्पर ले लंच बॉक्स अउ पानी बाॅटल....! लइका छटाक भर अउ बस्ता किलो भर। भाग ले सातवी पढ़हइया नोनी आवय। छोटका क्लास मा अतका तब बड़का क्लास मा अउ कतका बोझा रही ते ?

अब लइका हा सोफा मा बइठिस अउ मेंहा धकर-लकर जूता-मोजा ला हेरे लागेंव। अब लइका के नखरा शुरु होगे। बेटी यूनिफॉर्म गंदला होगे हाबे वो ! हेर दे अउ गोड़-हाथ ला धो तब फुरसुदहा बइठ के जेवन कर ले बेटी ! फेर बेटी हा तो कनघटोर होगे। कोनो गोठ ला नइ सुनत हाबे मोर। 

"आ बेटी ! मेंहा हेर देथो यूनिफॉर्म ला।''

बेटी तो अब रिमोट ला धर के फटफीट-फटफीट चैनल बदलत हाबे। एक कार्टून मनपंसद नइ आवत हाबे आने चैनल चालू करत हाबे। चेचकार के अपन कोती तीरेंव लइका ला अउ सोज्झे बाथरूम मा धकेलेंव तब जाके यूनिफॉर्म ला चेंज करिस टूरी हा। अइसे लागिस जइसे प्रथम विश्व युद्ध जीत गेंव मेंहा अउ अब द्वितीय विश्व युद्ध जीते के उदिम करत हॅंव। 

डायनिंग टेबल मा बइठारेंव अउ खाना ला परोसेंव - कढ़ी भात । लइका तो देखते साठ जच्छार होगे।

"ये का साग आवय मम्मी ?''

लइका तमतमावत किहिस।

"कढ़ी साग तो आवय बेटी ! मही नइ मिलिस तब आमा‌ खोटली डार के बनाये हावंव।''

लइका ला समझाये के उदिम करेंव फेर लइका तो अब बीख उगले लागिस ।

"मार्बल टाईल्स लगे चकाचक करोड़ों के घर । बड़का टीवी फ्रिज कुलर वेस्टर्न आर्ट ले साजे  एक लाख  पैसठ हजार रुपिया के डायनिंग टेबल अउ ओमा खाना खाना हे तब आमा खोटली के बने कढ़ी भात ....।  हा....हा.... ये गरीबो वाला खाना.....हा ...हा..... बहुत नाइंसाफी है मम्मी ये तो....। सबका हिसाब होगा....बराबर होगा।''

लइका कोनो फिलिम के डायलॉग मारे लागिस।

"चुप रह ! ढ़ोंगयही टूरी !''

लइका ला बरजेंव अउ मनाये लागेंव। 

"का करबे बेटी ! घर मा कुछू साग-भाजी नइ रिहिस तब इही ला बना डारे हंव वो ! सब्बो किसम के खाये ला परथे बेटी ! कभु दुखम तब कभु सुखम । ... रातकुन बनाहूं ना वो ! तोर पसंद के सब्जी- मटर पनीर। गउकिन ईमान से बेटी !''

मेंहा किरिया खा डारेंव।

"मम्मी सुनो !''

तुम्हारी आदत थी वादा तोड़ने की,

मगर, 

इन्ही आदतों ने मेरी आस तोड़ दी।''

टूरी अब शायरी झाड़े लागिस अउ गुनगुनाये लागिस।

वादा तो टूट जाता है....।

अपन हाथ ले दू कौरा खवाये हॅंव अउ जम्मो भात ला छोड़ दिस अब। हाथ धोइस अउ मोबाइल ला कोचके लागिस।

"खा ले बेटी!''

अब्बड़ मनाये हॅंव फेर जम्मो अबिरथा होगे। सिरतोन तो आवय मुही ला मार्केट जाये के बेरा नइ मिलिस। अउ हमर साहब जी ला ? भलुक अपन साहब मन बर दारु बिसाये बर शरम नइ आवय अउ घर के सब्जी-भाजी लेये बर शरम आथे, मार्केट मा झोला धरके रेंगे बर शरम आथे गोसइया ला। साग-भाजी बिसाये मा मान सम्मान सिरा जाही .? नाक कटा जाही....?...अउ दारु बिसाथे तब ?

"मम्मी ! मेंहा पिज्जा लेये बर जावत हॅंव।''

टूरी सायकल निकालत किहिस। अब्बड़ बरजेंव फेर नइ मानिस मोर गोठ ला अउ पैडिल मारत चल दिस साहू पिज्जा सेंटर कोती। पइसा तो धरे हस कि नही....पुछते रही गेंव। ....अउ हमर घर पइसा के का कमती ? जी कलपगे मोर। टूरी के बेवहार ला देखके। बड़की के ये रंग तब अभिन तो चौथी पढ़इया नान्हे टूरा के का होही भगवान ! ...आगू नांगर टेड़गा हाबे तब पाछू नांगर के का ठिकाना ? मेंहा तो सबरदिन मान-सम्मान देये बर सीखोये हॅंव। मीठ बोली बोले बर सीखोये हॅंव फेर लइका के बेवहार..? लइका उप्पर नही भलुक मोर परवरिश उप्पर प्रश्न चिन्ह लगगे। सिरतोन जम्मो कोई भोकवी कहिथे मोला। लइका मन घला। का सिरतोन भोकवी हावंव का ? जौन अपनेच लइका के परवरिश नइ कर सकंव। .. अउ लइका ला जम्मो सीखोना  महतारीच हा सीखोही, ददा के कोनो बुता नइ हे का ?

              जम्मो ला गुणत-गुणत लइका के छोड़ल भात ला खाये हॅंव। आरुग सितागे रिहिस फेर का करंव ? नइ खाये ला भावय तभो ले झन फेंकाये कहिके खाये ला परथे अन्न महतारी ला।  

खट्.... खट्... मोहाटी के कपाट बाजिस।

जाके कपाट ला खोलेंव अउ देखेंव। मोहाटी मा मुचकावत मोटियारी ठाड़े रिहिस। 

"सील-लोड़हा ले ले बहिनी !''

मेंहा आखी ला नटेरत  ससन भर देखेंव मोटियारी ला । मुड़ी मा सील पट्टी बोहे रिहिस। खांध मा चोंगा बोहे रिहिस अउ ओमा नानकुन लइका जुगुर-जुगुर देखत रिहिस। एक झन बारा तेरह बच्छर के नोनी हा अचरा ला धरके जेवनी कोती ठाड़े रिहिस अउ तीसरइया आठ दस बच्छर के टूरा हा डेरी कोती ठाड़े रिहिस।

"बेरा ले कुबेरा आ जाथो। नइ लेवंव सील लोड़हा। अभिन कुछू जरुरत नइ हाबे। मिक्सी-फिक्सी के जबाना मा कोन सील लोड़हा बिसाथे ते ?''

रट्ट ले कहेंव। मोटियारी के चमकत चेहरा बुतागे। 

"बहिनी! भलुक कुछू ला झन बिसा फेर मोर लइका मन ला खाये बर कुछू दे दे। ये डेरउठी ले कभू बिन खाये नइ गेये हावंव। गौटनीन दाई कहाॅं हाबे ? नइ दिखत हाबे। आरो करके बता दे, मनटोरा आये हाबे। सील लोड़हा वाली मनटोरा ला जानथे वोहा।''

मोटियारी मोर सास ला पुछत  किहिस अउ बरपेली घर मा खुसरगे। बइठे बर केहेंव अउ एक लोटा पानी पीये बर देयेंव। पानी ला पीयिस गड़गड़-गड़गड़ अउ आरो करे लागिस। येती वोती ला देखे लागिस। 

"दाई ! का करत हावस वो ?''  

"नइ हाबे दीदी ! दाई हा।''

हार लगे फोटू ला देखावत केहेंव अउ मोटियारी बम्फाड़ के रोये लागिस।

"मोला कभु लांघन नइ पठोये गौटनीन दाई !...अहहा....।''

"सबरदिन मोर पहिरे ओढ़े बर नवा-नवा ओन्हा कपड़ा देयेस वो ! ....अहहा....।''

"मोर लइका मन ला अब्बड़ दुलार करे हस दाई...!....अहहा....। ''

गो....गो.... हिच्च....।

मोटियारी ससन भर रोइस । सिरतोन अतका तो बटवारा लेवइया वोकर बेटी मन घला नइ रोइस अपन दाई के मरनी मा। आज सौंहत दिखत हाबे लहू ले जादा गहरा रिश्ता अनचिन्हार ले घला हो सकथे। मोरो आँखी ले अब अरपा-पैरी उफान मारे लागिस। अपन मन ला समझायेंव अउ चुप होयेंव। जम्मो कोई बर जेवन निकालेंव अब। मोर बेटी के जहुंरिया लइका तो अघागे खावत ले कढ़ी भात ला। एकसरिया, दूसरइया, तीसरइया तीन परोसा खाये लागिस नोनी हा। ...अउ मोटियारी हा घला दूसरइया मांग डारिस।

"आमा खोटली डार के कढ़ी ला अब्बड़ सुघ्घर बनाये हस बहिनी ! अब्बड़ गुरतुर हाबे वो। अघावत ले खाये हॅंव वो ! अब्बड़ दिन मा।''

मोटियारी किहिस। सिरतोन वोकर चेहरा दमकत रिहिस अब। उछाह के उजास आवय येहाॅं। दोनगी के दूधपीया लइका घला ढ़कार मारत हाबे अब । 

"अब तो किचन मा मिक्सी अउ आनी-बानी के जिनिस आगे हे बहिनी ! हमरो धंधा वोकरे सेती मार खा गे हाबे वो ! अब अइसन पथरा के का बुता ? तभो ले मन नइ माढ़े अउ किंजार लेथन गाॅंव -गाॅंव,पारा-पारा। फेर कतका ला किंजरबे वो ?  पहिली तो मोहाटी मा सुस्वागतम लिखाये राहय। कपाट ला ढ़केल के चल देवन। अब तो घरो घर कुकुर पाले हाबे। कुत्ते से सावधान लिखाये रहिथे। डर लागथे काकरो घर जाये-आये बर। हबराहा कुकुर मन गरीब ला देखते साठ भुके लागथे अउ मोटियारी होगे तब तो दू गोड़ के कुकुर घला लार टपकाथे।''

मोटियारी अब्बड़ मरम के गोठ ला किहिस अउ अब्बड़ आसीस दिस।

"तोर कुटूम्ब के मान बढ़े वो !''

"लोग लइका मन दूधे खावय अउ दूधे अचोवव वो !''

"तोर गोड़ मा कांटा झन गढ़े बहिनी!''

"....अउ तोर चुरी अम्मर राहय वो बहिनी!''

अहा......मोटियारी के अतका आशीर्वचन। मन अघागे। सौंहत कोनो भगवान उतरे हाबे अंगना मा अइसे लागत हाबे। 

अब तो मोर लइका घला आगे रिहिस। पिज्जा ला धरके। मोर रिस तरवा मा चढ़गे। 

"बेटी! भात-बासी ला खाये बर केहेंव तब मुहूॅं नइ चलिस। ....अउ पिज्जा नपाके ले आनेस। कहाॅं ले पइसा पायेस तौनो ला बताना उचित नइ समझेस। जौन ला नइ खावंव कहिके छोड़े रेहेस। तौने ला ये लइका अउ सील वाली दीदी हा अघावत ले खाइस। अभिन नानचुन हावस जादा झन उड़ा वो !'' 

"मम्मी ! तेहां घलो तो कभु पिज्जा नइ खाये हावस वो! तोरो मन करत होही ? मोर नानी हा पइसा धराये रिहिस तौने पइसा ले लाने हॅंव वो  पिज्जा ला । .....अउ अकेल्ला खाये के रहितिस तब उही कोती ले खाके नइ आ जातेंव मम्मी।''

".... ले मम्मी खा ले।''

बेटी अब एक प्लेट मे ले आनिस मोर बर पिज्जा ला अउ आने प्लेट मा मोटियारी बर ले आनिस।

"अई, अइसना रहिथे बहिनी ! पिज्जा हा।''

मोटियारी देख के किहिस अउ लइका मन घला ललचावत रिहिस।‌... अब मोटियारी अउ वोकर लइका मन घला पिज्जा खावत हाबे। अउ मोला तो अपन हाथ ले मोर मयारुक बेटी हा खवावत हाबे। 

"....अउ तेहां बेटी ?''

ले मम्मी तेहां ससन भर खा। मेंहा तो खातेच रहिथो। 

नोनी किहिस अउ एक कुटका ला दुलरवा बेटा बर राखिस। वोकर स्कूल के छुट्टी सांझकुन होही। देवर के बेटा घला आ गे रिहिस अब जम्मो कोई बांट के पिज्जा खाये लागेंन । 

"ले बहिनी बइठो। अब, महूं हा  सोज्झे अपन घर जाहूं। तुंहर मया पाके आज माइके सुरता आगे। मोर कोती ले येला राख ले।''

मोटियारी किहिस सील ला देवत। 

"नइ राखव दीदी ! तेहां बेचके दू पइसा कमाबे। मोला अभिन जरुरत नइ हाबे फेर जब जरूरत होही तब तोर करा ले बिसा लुहूं।''

"नही बहिनी ! येला अब अपन घर नइ लेगो मेंहा। तुंहर घर के मोर गौटनीन दाई हा अब्बड़ हियाव करे रिहिस हमर‌। अब्बड़ करजा हाबे मोर उप्पर।

"तभो ले झन दे।''

".....मोर भतीजी के बिहाव बर वोकर फुफू कोती ले ये जोरन आवय मोर कोती ले राख ले। नोनी मन कब बड़े हो जाथे जानबा नइ होवय। अभिन ले बर-बिहाव के जोरन ला करत रहिबे तब एक-एक जिनिस हा वो  बेरा बर पूरा होथे। राख ले बहिनी मोर गरीब के चिन्हारी ला। ..अउ जिनगी के का भरोसा बहिनी ! जीयत रहिबोन कि उड़ा जाबोन ते ..? वोकरे सेती राख ले।''

मोटियारी अब गिलोली करे लागिस । अब तो मना करे के कोनो जगा घला नइ दिखत हाबे। एक नत्ता-गोत्ता अउ जुड़त हाबे। एक मया अउ बाढ़त हाबे।

"ठीक हाबे ....ले आन।''

महूं हा अब वोकर मया के आगू मा हरा गेंव। सील ला झोकेंव अउ अब देवता कुरिया मा लेग गेंव।... अउ अब जतन देयेंव। अब अइसे लागत हाबे जइसे अब मोर नोनी हा बड़े  होगे अउ अब बिहाव के तियारी करत‌‌‌ हाबो। ....अउ सिरतोन दाई-ददा मन तो बेटी के बिहाव के तियारी वोकर जनम धरते साठ शुरु कर देथे। 

कुरिया मा गेयेंव अउ सौ-सौ के दू नोट लानके मोटियारी के दूनो लइका ला धरायेंव।

भलुक अब्बड़ नही किहिस फेर आज नत्ता-गोत्ता जुरियावत हाबे।

"अपन मामी कोती ले देवत पइसा ला मना नइ करे भांची-भांचा हो !... झोंक ले। ...अउ येदे लुगरा मोर ननंद बर...!''

मेंहा केहेंव अउ मोटियारी के खांध मा नवा लुगरा ला डार देंव। मोटियारी अब एक बेरा अउ गोहार पार के रो डारिस। अउ सिरतोन महूं तो रो डारेंव नवा नत्ता-गोत्ता पाये के उछाह मा। खोर के निकलत ले देखेंव मोटियारी अउ लइका मन ला। ...अउ मोर नोनी के उप्पर नजर थिरागे। आमा खोटली के कढ़ी भात खावत रिहिस।

"अब्बड़ सुघ्घर बनाये हावस मम्मी सब्जी ला। मजा आगे अउ ये ईज्जा-पिज्जा मा पेट नइ भरे मम्मी ! पेट भरथे ते तोर हाथ के जेवन मा। मोर हिरोइन मम्मी !''

लइका अब दाई बरोबर दुलार करत महूं ला खाना खवावत हाबे।...एक कौरा.... दू कौरा.....।

...अउ मोर आँखी मा फेर अरपा-पैरी छलछलाये लागिस। सिरतोन नारी के मन कतका कोंवर होथे...?  दू टिपका आँसू बोहाइच जाथे।

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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

पिन 493773

मो. क्र. 8120578897

Email ID csahu812@gmail.com

   

नेपाल यात्रा

 नेपाल यात्रा

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विगत दिवस (6 से17 जून 2024) तक भगवान पशुपतिनाथ के अहैतुकी कृपा अउ भागवताचार्य पं०प्रदीप चौबे के प्रेरणा अउ मार्गदर्शन मा छत्तीसगढ़ के 140 झन तीर्थ यात्री मन के जत्था संग मोर सपत्नीक नेपाल देश के तीर्थयात्रा सकुल सम्पन्न होइस।

 6जून के रतिहा 9 बजे दुर्ग नवतनवा एक्सप्रेस के एसी बोगी B6मा यात्रा के उत्साह मा लकर-धकर बइठेन।भाटापारा स्टेशन ले ट्रेन छूटिस तेन हा 7 तारीख के रतिहा 9 बजे गोरखपुर स्टेशन पहुँचिस।उहाँ उतर के यात्रा प्रबंधक हा जिहाँ ठहरे अउ भोजन पानी के व्यवस्था करे रहिस हे तिहाँ विश्राम करेन।गोरखनाथ मंदिर के नजदीक के वो धर्मशाला हा छत्तीसगढ़़िया तीर्थयात्री मन ले कोजबिज कइया करत रहिसे। बिहानभर गोरखनाथ मंदिर के दर्शन अउ अन्य जगा,गीता प्रेस आदि ला घूमे के बाद दोपहर 2बजे काठमांडू बर बस मा सफर शुरु होइस।

   नेपाल देश हा हिमालय के गोद मा बसे हे जेकर सीमा तीन तरफ ले भारत अउ एक तरफ ले तिब्बत(चीन) ले लगे हावय। हमर देश के मन बिहार अउ उत्तर प्रदेश ले जा सकथे।हमन गोरखपुर ले लगे सोनाली बार्डर ला पार करके काठमांडू जिहाँ पशुपतिनाथ के मंदिर हे तेकर दर्शन बर प्रस्थान करेन।

    नेपाल देश जाये बर भारतीय मन ला पासपोर्ट नइ लगय फेर आधार कार्ड अउ सामान मन के चेकिंग जरूर होथे। लगभग 24 घंटा के बस मा सफर (अधिकांश) पहाड़ के उपर पहाड़ी रास्ता) के बाद संझा 4 बजे काठमांडू पहुँचेन।उहाँ के रामनाथ होटल मा ठहरे के व्यवस्था रहिसे। नहाँ धोके आधा किलोमीटर दूरिहा मा स्थित भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन बर चल देयन। भीड़ जादा नइ रहिसे तेकर सेती आधे घंटा मा भगवान पशुपतिनाथ के भव्य दर्शन होगे।यात्रा के पूरा थकावट मिटगे अउ मंदिर परिसर मा अपार शांति के अनुभव होस।अइसे लागिस के जिनगी धन्य होगे। 

     काठमांडू मा पं० प्रदीप चौबे जी के पाँच दिन के भागवत के आयोजन सुबह 9बजे ले दोपहर 12 बजे तक होवय। अब तो बड़े बिहनिया ले रोज पशुपतिनाथ के दर्शन तहाँ ले दिनभर ले लेके रात दू-तीन बजे तक नेपाल के दर्शनीय धार्मिक, प्राकृतिक अउ ऐतिहासिक जगा मन के भ्रमण के सिलसिला चालू होइस।एक दू रात तो दूरी जादा होये के सेती काठमांडू ले बाहिर तको रुके ला परिस।

  काठमांडूच मा पशुपतिनाथ मंदिर के अलवा स्वयंभूनाथ मंदिर,बौद्ध मंदिर,बौद्धस्तूप, पाटन दरबार, विष्णुमंदिर आदि बहुत कस जगा ला देखेन।एकर अलावा काठमांडू ले बाहिर के डोलेश्वर महादेव, मनोकामना देवी मंदिर, जनकपुर आदि के भ्रमण अउ दर्शन करेन।

   नेपाल हा पहाड़, नदिया , गहिर खाई अउ कटकट ले जंगल वाला बहुतेच मनोरम देश आय। माँउटएवरेस्ट सहित अउ सात ठो संसार के ऊँचा चोटी मन इँहें हें,200 ले आगर नदिया हें। 3000--5000 मीटर गहिरा खाई जेला देखे मा कँपकँपासी लागथे।एकदम खराब अउ खतरनाक सड़क जेमा वाहन 20कि०मी०के स्पीड ले जादा नइ चलत होही --इँहे हे।

   एक दू दिन तो खाई मन ला देख के अबड़ेच डर लागिच।सबले जादा डर तो लगभग 5000 मीटर के ऊँच चोटी मा बिराजे मनोकामना देवी के दर्शन बर रोप वे मा जावत-आवत लागिस ओइसनहे माता जानकी के मइके जनकपुर जाये के बेरा खराब पहाड़ी सड़क मा झूलना कस डोलत बस के सफर हा लागिस।

  नेपाल मा हम ला ग्लोबल वार्मिंग के तको अनुभव होइस।काठमांडू मा भारी उमस अउ 30-32 डिग्री तापमान रहिस।इहाँ एक बात के अउ अजरच लागिस के एक जगा (दर्शनीय स्थल) ले दूसर जगा जाये बर लहुट के काठमांडूच आये ला परै।शायद उहाँ सड़क कनेक्टिविटी नइये।

  नेपाल मा गाँव-गौतरी हम ला  नइ दिखिस। जो भी बसाहट हे वो सब सड़क के तीरे-तीर दिखिस।

    नेपाल मा एक अनुभव अउ होइस के उहाँ शराब के नदिया तको बोहावत रहिथे।गली-गली,हर ठेला-दुकान मा शराब बिकथे।

   कुल मिलाके अद्भुत अउ मनोरम देश के हमर यात्रा वापसी नवतनवा होके भारत मा प्रवेश के संग 17 जून के संझा 5 बजे अपन घर हथबंद पहुँच के सकुशल सम्पन्न होगे।

🙏🙏🙏

चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़़

समाज ला सत् अउ अहिंसा के रद्दा दिखईया*-

 *समाज ला सत् अउ अहिंसा के रद्दा दिखईया*- 

                      *सद्गुरु कबीर* 


                           - *वसन्ती वर्मा* 


       कबीरपंथ अउ बड़े-बड़े कतको विद्वान मन के मानना हे के संत कबीर जइसन ग्यानी पुरुस पिछले दू हजार बरस मा ए जगत मा कोनो पैदा नई होय हे। सद्गुरु कबीर साहब के बानी हा मनखे मन के जीवन मा गहरा प्रभाव डाले हे। जिनगी के डोरी मा उनखर विचार ह माला कस गुथाँय हवय। धर्म अउ समाज के जम्मो पक्छ मा उनखर विचार ह-  विवेकपूर्ण समाधान प्रस्तुत करे हे। समाज अउ मनखे, राजा अउ रंक, नगर अउ गाँव, मानव अउ पसु जगत, चेतन अउ जड़, आत्मा अउ परमात्मा सबो के सार बात ला कबीर साहेब हा सुघ्घर अउ सरल ढंग ले बरनन करें हें। एखरे सेथी कबीरपंथ मा संत कबीर ला ‘ *सद्गुरु*’ के दर्जा मिले हवय।

सद्गुरु कबीर साहेब के जनम् सन् 1398 के जेठ पुन्नी के दिन होय रहिस, ते पाय के *जेठ पुन्नी* के दिन ‘ *कबीर जयंती*’ मनाय जाथे। फेर कबीरपंथी मन के मानना हे के कबीर साहब के जनम एखर पन्द्रह दिन पहिली जेठ अमावस के दिन होय रहिस। एही दिन कबीर साहेब हा तरिया के भीतर पुराइन पान के बीच खोखमा फूल के ऊपर प्रगट होय रहिन। ते पाय के कबीर पंथी मन जेठ अमावस के दिन बरसाइत उपास रहि के ‘ *प्रगट दिवस* ’ मनाथें। एखर बाद कबीर साहेब 120 बरस तक ये धरती मा प्रगट रुप मा रहिन।

           सद्गुरु कबीर मांस, मदिरा सेवन, वेस्यावृत्ति, जुआ, चोरी जइसन सामाजिक बुराई ला जड़ से खत्म करे के उपदेस दिन। 


 *माँस भखै मदिरा पिवै, धन वेस्या सों खाय।* 

 *जुआ खेलि चोरी करै, अन्त समूला जाय।।* 


         सद्गुरु कबीर के दृस्टि मा जेन मनुष्य के हिरदे म प्रेम अउ जीव के प्रति करुणा के संचार नि होय ओहा मुरदा समान ए।


 *जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जानु मसान।* 

 *जैसे खाल लुहार के, स्वांस लेत बिनु प्रान।।* 


      सद्गुरु कबीर समाजवादी अउ समतावादी महापुरुष रहिन। उनखर विचार मा जौन व्यक्ति ऊंच-नीच के भेद नि करे वोहा भगवान के समान ए।


 *लोहा, कंचन सम करि जाना, ते मूरत होवय भगवाना।* 


     सद्गुरु कबीर जब ए धरती मा अवतरित होईन ओ समय स्त्री मन अर्धगुलामी के जीवन जीयत रहिन, ओमन के बलात् धर्म परिवर्तन कराए जात रहिस। सद्गुरु कबीर स्त्री मन के गुलामी के विरोध करिन ता उन ला पंडित, मौलवी, सामंत-राजा मन के जबरजस्त विरोध झेलना पडि़स। सद्गुरु कबीर सबो ला ललकार के कहिन।


 *नारी निन्दा मत करो, नारी नर की खान।* 

 *नारी से नर होत है, धु्रव, प्रहलाद समान।।* 


      संत कबीर के मानना रहिस कि समाज मा न जादा गरीब होना चाही न जादा अमीर। उनखर विचार मा जादा संचित धन ला जरुरतमंद ला बांट देना चाही।


 *जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम।* 

 *दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानों काम।।* 


         सद्गुरु कबीर के सबले बड़े ग्यान के बात ऐ रहिस के ओमन गृहस्थ अउ विरक्त दुनों ला मुक्ति के अधिकारी मानिन। कबीरपंथ मा घर परिवार छोड़ के जंगल पहाड़ मा परमात्मा ल खोजे बर नी कहे गे हे, न ही यज्ञ-हवन करे बर, न ही माला जपे बर कहे गे हे। कबीर पंथ मा सहज उपासना पूजा-पाठ के विधान हावय जेला स्त्री-पुुरुष दोनों कर सकत हें। वास्तव म कबीर पंथ ला ‘पारिवारिक धर्म पंथ’ कहे जाय ता कोई बड़े बात नी होय।

संत कबीर के जीवन दरसन के महात्मा गांधी के उपर बहुत प्रभाव पडि़स। संत कबीर अहिंसा अउ सत् के रद्दा मा चले के उपदेस जीवन भर दीन, तव गांधी जी ह सत्य अउ अहिंसा ला स्वराज के लड़ाई मा अपन हथियार बनाईन। कबीर साहब के पालन-पोसन जुलाहा परिवार मा होईस, ते पाय के सूत काते के चरखा हा जीवन भर ओखर साथ रहिस। गांधीजी घलो चरखा ला अपनाईस अउ स्वराज के लड़ाई मा चरखा ला लेके चलिन। वास्तव मा चरखा मा लगातार कर्म करे के मर्म छुपे हे। लइका जवान, बूढ़ा, नारी-पुरुस सबो कोई चरखा मा सूत कात सकत हें दिन मा घलो अउ रात मा घलो। एमे बहुत जादा श्रम के आवश्यकता नि होय, फेर एला सबो कोई लगातार चला सकत हे।

         सद्गुरु कबीर साहब हा छै सौ बरस पहले मनुष्य जाति के उत्थान पर जो उपदेस दे रहिन, ओहा आज घलाव वइसनेच प्रासंगिक हे। मानव समाज हा हमेसा सद्गुरु कबीर के रिणी रही।


 *सत्गुरु हम सू रीझि करि, एक कहा परसंग।* 

 *बरसा बादल प्रेम का, भीग गया सब अंग।।* 


         सद्गुरु कबीर साहेब के जीवन दर्सन अउ समाज सुधार बर ऊँकर उपदेस हर मध्यकाल के भारतीय समाज के ऊपर अतेक जादा प्रभाव पडि़स के उन-ला ज्ञान-दीप लेकर अवतरित आत्म-ज्ञानी संत माने गईस। सद्गुरु कबीर साहेब के अवतरन मध्यकाल मा- अइसे समय मा होइस जब राजा-महाराजा-नवाब-सामंत मन के आपसी लड़ाई के कारण पूरा भारतीय समाज आतंकित रहिस। लूटमार, हत्या, बलात्कार जइसे जघन अपराध ले आम आदमी अपन रक्छा करे में असमर्थ रहिन। तब सद्गुरु कबीर साहेब ह आम आदमी मन में आत्मबल के संचार करके ओला नवा रद्दा दिखाईन। हिन्दु-मुसलमान समुदाय म व्याप्त पाखण्ड, कुरीति, भ्रमपूर्ण आचरन के निंदा के साथ-साथ क्रूरता अउ हिंसा के उपहास करिन अउ ओला रोके प्रयास करिन।


 *ना जाने तेरा साहिब कैसा है।* 

 *मस्जिद भीतर मुल्ला पुकारे, क्या साहिब तेरा बहिरा है?* 

 *चिउंटी के पग नेवर बाजे, सो भी साहब सुनता है।* 

 *पंडित होय के आसन मारें, लंबी माला जपता है।* 

 *अंदर तेरे कपट कतरनी, सो भी साहब लखता है।* 

 *सब सखिया मिलि जेवन बैठी, घर भर करै बड़ाई।* 

 *हिंदुअन की हिंदुवाई देखी, तुरकन की तुरकाई।* 

 *कहै कबीर सुनौ भई साधो कौन राह है जाइ।।* 


       ग्यान-दीप ले के अवतरित संत कबीर ल केवल गुरु नि माने गईस बल्कि उन ला सत् के राह दिखईया अर्थात् सद्गुरु के रुप मा भारतीय समाज ह मान्य करिस। हिंदू अउ मुस्लिम दुनो समाज के रहईया मन कबीर साहेब ल सद्गुरु के रूप मा जानिन, मानिन अउ उन ला ईश्वर के साक्षात् रुप मान के पूजिन। गुरु के बारे म संत कबीर ह कहिन -


 *गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढि़-गढि़ काढ़ै खोट* 

 *अन्तर  हाथ  सहार  दे,  बाहिर  बाहे  चोट।।* 


         अर्थात् गुरु कुम्हार ए अउ सिस्य कुंभ (घड़ा) हे। जइसे कुम्हार कच्चा घड़ा के भीतर एक हाथ ले सहारा दे थे अउ दूसर हाथ ले बाहर से चोट मार-मार के घड़ा ल ओकर आकार देथे अउ साथ-ए-साथ घड़ा बनात जतका भी कंकड़-रोड़ा आदि मट्टी म मिलथे ओला चुन-चुन के फेंक देथे वइसने गुरु ह सिस्य ल सही आकार देथे अउ सही रद्दा दिखाथे।


- वसन्ती वर्मा, बिलासपुर

संत कबीर साहेब

संत कबीर साहेब

 *कबीरपंथ के छत्तीसगढ़ म विस्तार के सारगर्भित संकलन योग्य जानकारी।..... वंशगुरू दयानंद साहेब के संतान नि होय के कारण गुरुमाता कलाप देवी ह गृन्धमुनिनाम साहेब ला दू बरस के उमर म गोद लिन अउ वंशगद्दी परंपरा आघू बढ़िस।* 

     *अइसे माने जाथे कि  यदि आवश्यक होही त गुरु गोसाई के वंशज के कोनो सुयोग्य बालक ला गोद लेके वंश परंपरा ला आघू बढ़ाय जाही अउ गद्दी सौंपे जाही। फेर गृन्धमुनिनाम साहेब ला गोद लेहे के बाद छत्तीसगढ़ के कबीरपंथी समाज अउ अनेक साधू महंत मन विरोध म काबर उतर गिन अउ खरसिया म नया गुरुगद्दी स्थापित करिन जेन हर अभी घलो निहंग परम्परा म आघू बढ़त हे?*

      *आचार्य गृन्धमुनिनाम साहेब ला गोद लेहे के विरोध के मूल कारण ये रहिस कि ओमन गुरु गोसाई परिवार ले संबंधित नि होके ब्राह्मण परिवार के संतान रहिन। विरोध करने वाला मन के कहना रहिस कि चूकिं गृन्धमुनिनाम साहेब गुरु गोसाई परिवार ले संबंधित नि हे त उनकर गोद लेहे म वंश खंडन होवत हे। ये विरोध के स्वर दशकों तक बने रहिस अउ कालांतर म षड़यंत्र के तहत गृन्धमुनिनाम साहेब के प्रथम पुत्र के जहर देके हत्या कर दिये गिस।...... कबीरपंथ के वर्तमान चौदहवें धर्मगुरु आचार्य प्रकाशमुनिनाम साहेब वस्तुतः गृन्धमुनिनाम साहेब के द्वितीय सुपुत्र हैं। जहाँ तक मोर जानकारी हे आचार्य गृन्धमुनिनाम  साहेब जौन ब्राह्मण परिवार ले गोद लिये गे हें वोही परिवार ले संबंधित सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार स्व निरुपमा शर्मा घलो रहिन।* 

       *कालान्तर म पंथ गुरु गृन्धमुनिनाम साहेब कबीर धर्म के उद्भट विद्वान के रूप म देश भर म स्थापित होइन अउ देश भर के कबीरपंथी विद्वान साहित्यकार मन ला एक मंच म लाके कबीर पंथ के प्रचार-प्रसार म अपन जीवन ला समर्पित करिन।* 

     *आचार्य गृन्धमुनिनाम साहेब के विद्वता, समर्पण अउ सार्वभौम मान्यता के कारण विरोध के स्वर स्वतः खत्म होगे। सन् 1991 म आचार्य  गृन्धमुनिनाम साहेब के निधन के बाद वर्तमान आचार्य प्रकाशमुनिनाम साहेब पंथ के 14 वें आचार्य के रूप म गद्दी म बइठिन।* 

       *छत्तीसगढ़ म कबीरपंथ के बारे म कुछ ऐतिहासिक जानकारी जेन ला परिस्थितिवश विस्मृति के गर्भ म ढकेल दिये गे हे- आज वोही जानकारी साझा करे हौं।* 🙏🌹


             - डाॅ विनोद कुमार वर्मा