Thursday, 30 April 2026

सुरता सुशील भोले

 सुरता सुशील भोले


छत्तीसगढ़ी भाखा ल बढ़ावा देवइया, कला संस्कृति अउ साहित्य के संग-संग भाषा बर स्वाभिमान 

के सकेला करइया सुशील वर्मा “भोले“ जी के जनम 2 जुलाई सन 1961 म भाठापारा म होय रहिस हे। उंखर पिता जी स्व. श्री रामचन्द्र  वर्मा जी, माता स्व. श्रीमती उर्मिला देवी वर्मा जी, के घर म दूसर संतान के रूप म जनम लेय रहिस हे। श्री भोले जी मन चार भाई अउ दू बहिन हावंय। श्री भोले के पिता श्री प्राथमिक शाला म गुरुजी रिहीन। ओमन आदर्श शिक्षक रहिन अउ उंखर लिखे हिन्दी व्याकरण के किताब मिडिल स्कूल म चलत रहिस हे। पिता के शिक्षा अउ संस्कार सुशील ल मिले रहिस हे। अउ एकर से भोले जी ल अड़बड़ लाभ मिलिस। उंखर प्रतिभा सबो डाहर दिखे ले लगगे।आध्यात्मिक रुचि घलो ओखर चिन्हारी रहिस हे। वरिष्ठ साहित्यकार के संग संग पत्रकार, स्तम्भकार, साहित्य के पुरोधा रहिन हें।


 जेन मनखे म  प्रतिभा होथे ओ ह हर परिस्थिति म अपन ल साबित करत जाथे। कखरो मोहताज नइ राहय। प्रतिभा ह मौका मिलते ही उजागर होय ले लग जथे। सुशील के चौथी तक के पढ़ाई जनम स्थान भाठापारा  म होइस ओखर बाद सातवीं तक के पढ़ाई नगरगांव म अउ ८वीं ले 11वीं तक के पढ़ाई रायपुर म होय रहिस हे। ऐखर पिताजी ह एक प्रिंटिंग प्रेस खोले रहिस हे। ओला इही म रुचि होगे  प्रिंटिंग प्रेस लाइन वाला विषय म आई टीआई के कोर्स ल पास कर लीन। कंपोजिंग के काम करे ले लगगें।


 सुशील भोले ह अपन साहित्यिक यात्रा सबले पहिली दैनिक अग्रदूत समाचार पत्र ले शुरू करे रहिस हे।  सन 1983-84 म स्वयं के कविता, कहानी के प्रकाशन शुरु करे ले लगगें। ये लेखन के शुरुआत सरलग चलत रहिस हे जेन अंतिम सांस तक "कोंदा भैरा के गोठ" तक चलिस। ये बीच म दैनिक अग्रदूत, दैनिक तरुण छत्तीसगढ़ म सहसम्पादक के रूप म अपन सेवा दिन। समाचार, पत्र-पत्रिका म काम करत करत घर के प्रिंटिंग प्रेस के संचालन शुरू कर दिन। एक स्टूडियो स्थापित करिस। मासिक समाचार पत्रिका “मयारू माटी” के रुप म पहिली छत्तीसगढ़ी पत्रिका निकाले ले लगगें। 9 दिसम्बर 1987 ले निकलत रहिस हे। इहाँ ले साहित्यिक समाचार पत्र के प्रकाशन तो शुरु होबे करिस, येखर अलावा अपन स्टूडियो म ऑडियो गीत, कैसेट म रिकॉर्डिंग घलो होय ले लगगे। 


भोले जी  के जीवन के एक पक्ष आध्यात्मिक जीवन के घलो रहिस हे जेमा कठिन तप ,धियान, साधना ह सरलग 1994 ले 2000 तक 14 बच्छर तक चलिस। ओ ह शिव भक्त रहिस हे, शिवजी के साधना करिस। ए साधना के बाद सुशील वर्मा ले सुशील भोले लिखे ले लगगें। साधना ले आध्यात्मिक रहस्य ल जानिन अउ ओला आत्मज्ञान मिलिस। ओहर हमेंशा काहय "बिना आध्यात्म के जिनगी ल मुक्ति नई मिलय।”


छत्तीसगढ़ राज बने के बाद हमेंशा इंहा के आदिधर्म अउ मूल संस्कृति के बात करय।येखर बर एक संस्था के स्थापना करिस अउ  जोर दरहा काम शुरु करे रहिस हे। अपन हर लेख म इंहा के तीज तिहार म हमर आदि संस्कृति के बात ल बतावय। "आज जेन तरिका ले तीज तिहार ल मनाथन ओ हर हमर सँस्कृति नोहय।ओ ह उत्तर भारत ले आए हावय जेन ल हमर ऊपर थोपे गे हावय। हमन ल अपन सँस्कृति के रक्षा करना हे, अउ ओखर प्रचार-प्रसार करना हे। बाहरी पूजा विधि जेन ल हमर उपर थोपे गे हावय ओला बदलव। हमर संस्कृति ल चिन्हव अउ बचावव।"


भोले जी ह छत्तीसगढ़ के निर्माण बर घलो काम करिस। । इंहा के अस्मिता अउ संस्कृति बर अपन आप ल समर्पित कर दिस।  भोले ह अपन बात ल छत्तीसगढ़ी  भाखा साहित्य के माध्यम से पोट्ठ ढंग ले रखय ले लग गीन। भोले जी जब अपन मासिक पत्रिका “ मयारू माटी” के शुरुवात करिन त सबसे पहिली येमा छतीसगढ़ी भाखा के उपयोग करिन।ये छत्तीसगढ़ी भाषा के पहिली पत्रिका रहिस हे। ये ह उंखर भाषा के प्रति प्रेम ल देखाथे। ऐमन जिनगी भर छत्तीसगढ़ी भाखा के उपयोग करे के बात करिन, अउ अपन राज के बोली भाखा के चिन्हारी ल जिनगी भर निभाइन।  भाषा के अतेक सेवा के बाद भी ओला ओ सम्मान नइ मिलिस जेन मिलना रहिस हे।


सुशील ह हर अखबार म छत्तीसगढ़ी भाषा के बीज ल बोये के काम करिन। जईसे ही ओ अखबार म छत्तीसगढ़ी स्थापित हो जतिस त छोड़ के दूसर अखबार म आ के फेर छत्तीसगढ़ी शुरु करतिस। "इतवारी" साप्ताहिक पत्रिका जेन ह शुद्ध हिन्दी के रहिस हे उंहा के सह सपादक रहिस हे। ओखर हर अंक म छत्तीसगढ़ी कहानी, निबंध, पुस्तक समीक्षा निकालत रहिस हे। सुशील ह जिंहा जिंहा छत्तीसगढ़ी भाषा के बीज डारे हावय ओ ह आज लहलहावत हावय।


ओखर हिंदी के कविता कहानी मन घलो बहुत ही स्तरीय रहिस हे। ऐखर कविता मन ल देशबन्धु के प्रधान संपादक ललित सुरजन जी बहुत पसंद करय। कइ बेर ओखर कविता मन ल सुनय घलो अउ छापय घलो। ओमा के एक कविता खास रहिस हें...


पत्थर-पत्थर बोल रहा है,

मन की आंखें खोल रहा है,

तेरे श्रम का हर-एक पल,

इतिहास बन बोल रहा है।।

चलो आज फिर दीप जला दें

श्रम के सभी ठिकानों पर..।


भोले जी के प्रकाशित साहित्य 

छितका कुरिया(काव्य संग्रह (1988)

दरस के साथ(लंबी कविता (1989)

जिनगी के रंग ( गीत व भजन संग्रह (1995)

ढेंकी (कहिनी संकलन (2006)

आखर अँजोर (छ ग के सँस्कृति उपर आलेख  (2006) दूसर संस्करण (2017)

भोले के गोले ,काव्य संग्रह (2015)

सब ओखरे संतान (चार गोड़िया के संकलन 2021-22)

सुरता के संसार (संस्मरण के संकलन 2021-22)

कोंदा भैरा के गोठ 2024

भोले जी ह कइ अखबार अउ पत्रिका म कॉलम लिखे रहिस हे...

बेंदरा बिनास (साप्ताहिक छत्तीसगढ़  सेवक 88-89)

किस्सा कलयुगी हनुमान के (मयारू माटी 88-89)

तरकश अउ तीर (दैनिक नव भास्कर 1990)

आखर अँजोर (दैनिक तरुण छ. ग. 2006-2007)

डहर चलती(दैनिक अमृत सन्देश 2009)

गुड़ी के गोठ (साप्ताहिक इतवारी 2010 लोगों 2015 तक)


राष्ट्रीय स्तर के अनेक पत्र-पत्रिका मन म अउ छत्तीसगढ़ म कविता कहानी लेख, समीक्षा साक्षात्कार मन के नियमित प्रकाशन होवत रहिस हे।

“लहर” अउ “फूल बगिया” ऑडियो कैसेट म गीत लेखन अउ गायन करे रहिस हे।

अनेक साहित्यिक,सांस्कृतिक मंच मन म गीत अउ भजन गायव।


भोले जी ल छत्तीसगढ़ राज भाषा आयोग दूवारा राज भाषा सम्मान 2010 म मिलिस। कइ ठन सामाजिक,धार्मिक,साहित्यिक संस्था ले घलो सम्मान मिलिस।

भारत सरकार साहित्य अकादमी दूवारा

गुजराती एउ छत्तीसगढ़ी भाषा 2017 के सम्मेलन म भागीदारी घलो करे रहिस हे। 

मोर ले ओखर बहुत ही अच्छा सम्बंध रहिस हे। मोर छोटे भाई आये, बहुत ही लाड़ दुलार ले मोर घर साइकिल ले आ जावय। बहुत जुवर ले बइठय घलो। हमेंशा साहित्यिक चर्चा ही करय। मैं ओखर घर बेटी मन के बिहाव म गेंव। ओखर अलावा बइठे बर भी गेंव। जब तबीयत खराब रहिस हे तब दू बेर देखे बर भी गेंव।  अभी मोर पुस्तक के विमोचन म चार जनवरी के बलाये रहेंव त कोई लेगही तब जाहुँ कहिस। अभी  बारह फरवरी के फोन करे रहेंव पुस्तक समीक्षा बर तब कहिस के "तबीयत ठीक नइये कमजोरी आगे हे, अभी पढ़ना लिखना बंद कर दे हंव दीदी।"

मैं ह "आराम कर भाई।" कहेंव 

मोला का पता रहिह हे के छोटे भाई सुशील लम्बा आराम करे बर चल दिही। मोर बर ओ ह इनसाइक्लोपीडिया रहिस हे। बहुत कुछ जानकारी लेवत राहंव। ओ ह छत्तीसगढी भाषा अउ संस्कृति बर अपन पूरा जीवन दे दिस। आज भी मोला ओखर साधना के बाद के समय के सुरता आवत हें। जब मोर घर आके बहुत कुछ बतावय। मोर आध्यात्मिक रुचि ल देखके बहुत खुलके बात करय। ओखर घर के एक कुरिया के कोना म रखे करिया रंग के बड़े से शिवलिंग मोर आंखी के आगू म आ गे। जेखर ओ ह पूजा करय अउ ओखर सामने म साधना करय। कोनो ल ओला देखाये बर नइ लेगत रहिस हे। आज सुशील उही शिवलिंग म समागे। जेन सम्मान ओला मिलना रहिस हे तेन सम्मान ओला सरकार ले नइ मिलिस। 

सुधा वर्मा 25/2/2026

ठग-जग* (छत्तीसगढ़ी कहानी) '

 .                       *ठग-जग* (छत्तीसगढ़ी कहानी) '


                           - विनोद कुमार वर्मा 


          ' रानी दुर्गावती योजना मा प्रदेश के नोनी मन ला 18 साल पूरा होय के पाछू डेढ़ लाख रूपया मिलही। एक अप्रैल 2026 ले एहा लागू किए जाही। एही सत्र मा विधेयक लाए जाही।  ' - ये छत्तीसगढ़ी समाचार ला रेडियो मा सुनके जब्बर उछाह मा रामलाल अपन सुवारी ले कहिस- ' अरे सुनत हस! हमर बिटिया सतरा के हो गे हे। ओला डेढ़ लाख मिलही! छै महीने बाद दिवाली हे। उही दिन तो 2008 में जनमे रहिस! '

         ' का सही मा रानू के बाबू? भगवान भला करे! सरकार हा कतका कुछु करत हवय हमर बर! ...... अपन कमाई ले तो तँय ढेला घलो नि खरीदे सकस! '

      ' का बात करथस ओ रानू के दाई, सकरो-दिन लड़े के जुगत बनाय  रहिथस! ......  पाछूच्च महीना तो बिटिया बर नावा सेंडिल खरीदे रहेंव! '

     ' हाँ हाँ,  बिटिया बड़े होवथ हे त सैंडिल तो खरीदबेच्च! ....ओकर सहेली के पापा अपन बेटी ला जनम-दिन मा पचास हजार के नया आई फोन दे हवय! '

    ' त मँय कहाँ ले लावँव अतेक पैसा? बैंक मा एक लाख जमा हे, ओकर ले बाबू के कालेज के थर्ड इयर के फीस जमा करहूँ ! ..... ओला खर्च कइसे करँव ? '

     ' ठीक बात हे।  ...... मँय सोचत रहेंव कि बाबू के आखिरी बछर के पढ़ाई बर अपन सोन के माला ला बेच दूहूँ। ...... संसी झन कर! चार बछर के पढ़ाई खतम होय के पाछू बाबू  ला नौकरी मिलही त हमार माली हालत सुधर जाही! '

       ' आजकल नौकरी कहाँ मिलत हे भाग्यवान?  '

     ' सुनव जी! रानू बर एक ठिन लैपटाप खरीद देवा। कालि मातारानी के पूजा करत-करत मन्नत माँगत रहिस, एला मँय सुने रहेंव। .... ओकर पढ़ाई मा बहुत काम आही न ? .....  फेर नोनी हा बोलय कुछु निहीं। '

      घड़ी भर सोचे के बाद रामलाल बोलिस- ' ठीक हे लैपटाप खरीद देहूँ अउ एक ठिन नावा मोबाईल घलो! बैंक मा पइसा हे उही ले खरीद देहूँ। छै महीने बाद रानू ला योजना के डेढ़ लाख मिलही त ओला बैंक मा जमा कर देहूँ। ..... रानू बर तो मँय अभी तक कुछु घलो नि कर पाय हँव। वो बिचारी कुछ कहे तो घलो निहीं  ...... फेर  बाबू के पढ़ई बर अब तोला गहना बेचे के जरूरत नि परे!  '

         रानू आज बहुत खुश रहिस। ओकर मन्नत हा जो पूरा होने वाला हे। ओला नावा मोबाइल अउ लैपटाप मिलने वाला हे! ' चइत नवरात मा खरीदहूँ '- कहत रहिस बाबू हा। दाई-बाबू के गोठ-बात ला ओहा रंधनीखोली ले सुन डारे रहिस! तब उनकर गोठ-बात ला सुनके ओकर कजरारी आँखी ले आँसू के बूंदी मोती कस टप-टप टपकत रहिस। 

          एक हप्ता बाद विधानसभा मा पारित वित्त बजट के समाचार अखबार मन मा प्रमुखता ले छपिस। जेमा के एक समाचार ला स्कूल के लाइब्रेरी मा पढ़ते-पढ़त रानू के आँसू ढरके लगिस- ' रानी दुर्गावती योजना के अन्तर्गत प्रदेश के बालिकाओं को 18 साल पूरा होने पर डेढ़ लाख रूपये मिलेंगे। प्रदेश में रानी दुर्गावती योजना का लाभ एक अप्रैल 2026 के बाद जन्म लेने वाली बेटियों को मिलेगा। '

          ये तो अइसने बात होगे न! कि किसान मन ला 2042 मा मिलइया धान के बोनस बर एसों के सत्र मा विधेयक पारित करे हें!

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होरी के रंग* (त्वरित टिप्पणी) *सुकुवा तारा* (लघुकथा)

 *होरी के रंग* (त्वरित टिप्पणी)


                   *सुकुवा तारा* (लघुकथा)


                                 -डाॅ विनोद कुमार वर्मा 


          ' तोर स्टेटस् ला देखेंव मितान। बढ़िया लिखे हस। भाई सुशील भोले ला सुकुवा तारा के संज्ञा देहे हस। '

      ' हाँ मितान! छत्तीसगढ़ी साहित्य के सुकुवा तारा हे भाई सुशील भोले। ओकर असामयिक निधन के समाचार ले पूरा साहित्य विरादरी व्यथित हे।आज होरी तिहार के दिन लोकसदन समाचार पत्र सा भाई सुशील भोले उपर दू पृष्ठ के विशेष परिशिष्ट निकाले हे। ओही मा मोर लेख छपे हवय। '

        ' ओ तो ठीक हे मितान। फेर एक बात मोला समझ मा नि आइस ? '

       ' का बात ? '

       ' कतकोन साहित्यकार अउ कृषि वैज्ञानिक मन ला तँय अपन लेख मा सुकुवा तारा के संज्ञा दे हस। मँय सब ला पढ़थँव अउ गुनथँव। सुकुवा तारा तो एक्का ठिन हे! '

     ' सुन मितान, ये-सब-मन मोर बर सुकुवा तारा हें। तँय तो जानतेच्च हस कि साहित्यकार मन कतकोन लिखथें या  कृषि वैज्ञानिक मन कतकोन अपन गोठ-बात किसान मन ला बताथें फेर ओमन ला एकर कोई पइसा-कौड़ी नि मिलय। अइसने महूँ ला नि मिलय। हमन उजियार मा नि घूमन बल्कि अंधियार मा कोई बात -कोई सूत्र ला ढूढ़थन जेकर ले किसान, आम आदमी या अंधियार मा दिन बितइया लोगन मन ला उजियार मिले। कभू -कभू वो सूत्र मिल जाथे अउ समाज अउ देश ला फायदा मिलथे। चालीस बरस पहिली एक इकड़ मा 15 बोरा घलो धान नि उपजत रहिस।आज चालीस बोरा उपजत हे। एहा तो कोनो वैज्ञानिक के ही कोशिश के परिणाम होही कि जादा उपज देने वाला धान के जाति बनाइस। अइसने साहित्यकार मन समाज अउ देश के अंधियार कोती के बात ला सामने लाथें त सरकार अउ बड़े लोगन मन  सचेत होथे अउ उहाँ उजियार लेके जाथें।  एकरे खातिर साहित्यकार अउ वैज्ञानिक मन ला सुकुवा तारा कहिंथँव! '

     ' बात तो ठीक कहत हस मितान! '

    ' एहा  कोनो मजाक के बात नि होवय मितान, तँय हाँस झन! ...... साहित्यकार मन करा बड़े संसाधन नि रहे। ओमन हवाई जहाज या बीस लाख के गाड़ी मा नि घूँमय! ओमन अपन जाँगर के भरोसा मा ही अपन काम करिथें। ..... भाई सुशील भोले कस कतकोन साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ी साहित्य मा अंजोर बगराय हें। ओही अंजोर मा महूँ देख-टमर के अंधियारी रात मा घलो रेंग देथँव। जादा सुकुवा तारा रहे मा तो मोइच्च ला फायदा हे! '

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आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाए जावत हे । बने बात आय थोरकुन पीछू

 आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाए जावत हे । बने बात आय थोरकुन पीछू 

डहर जाए के मन होइस त सुरता आइस ...। 

    सन् 1900 के पहिली संसार के कोनो देश राज मं महिला मन ल बरोबरी करे के अधिकार नइ रहिस न सामाजिक न राजनैतिक न पारिवारिक स्तर मं फेर का ? महिला मन मं जागृति आए बर सुरु होइस त सन् 1909 के 28 फरवरी के बिहनिया बेरा अमेरिका मं महिला मन छोटकुन बैठक करीन । 

 1910 मं ए बैठक मं अंतर्राष्ट्रीय महिला जागरण के बात चिटिक जोरहा उठिस । 

1911 मं अमेरिकन महिला मन के संग अउ कई देश के महिला मन संगठन बनाये बर सुरू कर दिहिन ...बरोबरी के चर्चा जोर पकड़े लगिस । 

    आवागमन के असुविधा , सम्पर्क के अभाव के संग पोट्ठ नेतृत्व के कमी के चलते ए आंदोलन हर अपन अपन देश , राज , समाज तक रुंधा गिस तभो गुंगुआत तो रहिबे करिस । समय जात देरी तो लगय नहीं ...60 साल ले ऊपर होगिस ...चिंव चांव कभू काल सुना जावय फेर कोनो देश मं जबरदस्त आंदोलन नइ होइस ..। 

    सन् 1975 मं महिला मन फेर जागिन एदारी अमेरिका के महिला मन यूरोपीय देश के संगे संग भारत के जागरुक महिला मन से सम्पर्क , बातचीत , चिट्ठी पत्री के माध्यम से संगठन के उद्देश्य ल बगराइन सुरता राखे लाइक बात एहर आय के तब तक दूनों विश्व युद्ध खतम हो गए रहिस भारत असन कई देश मं नारी शिक्षा बगर गए रहिस । एतरह यूनाइटेड नेशंस हर 8 मार्च ल अंतर्राष्टीय महिला दिवस मनाए के घोषणा करिस । 

  सबले जरुरी बात जेला सुरता करत हन के 1909 के पहिली महिला मन ल ..

1 वोट देहे के अधिकार नइ रहिस 

2 पुरुष मन के बरोबर तनखा नइ मिलत रहिस । 

3 महत्पूर्ण पद मं महिला मन के स्थापना नइ होवत रहिस । 

4 महिला मन ल सामाजिक , राजनीतिक समानता नइ मिलत रहिस । 

        आज 8 मार्च 2026 आय प्रश्न हे अतका साल बाद जब महिला मन ल राष्ट्रपति असन पद मिलत हे , सेना , मेडिकल , इंजीनियरिंग मं जगह मिले बर शुरु हो गए हे त अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के जरुरत काबर हे ? दूसर बात अगर जरुरत हे त कोन क्षेत्र मं हे , ओ क्षेत्र मं कोन तरह से उदिम करना चाही ? 

      संगवारी मन ! चिटिक थिरा के सबो झन गुनव न ? एला आदेश नहीं अनुरोध समझिहव । 

       सरला शर्मा

कारी कमौत के खुशबू-1(संस्मरण)

 कारी कमौत के खुशबू-1(संस्मरण)


काली कार म हमन दुर्ग जात रहेन। सुरता आये ले लगगे के लइकापन म हमन दुर्ग जावन त जी ई रोड के दूनो डाहर खेत राहय। भिलाई जंक्शन रहिस हे त बहुत अकन रेल खड़े राहय। बस ल रोक के कोनो मेर के कुँआ म पानी पीयन। धान के फसल के बेरा म अब्बड़ खुशबू आवय। अधिकतर मढ़रिया दाऊ मन के खेत रहिस हे। सुगंधित धान 'कारी कमौत' लगावंय। हवा चलय त ये धान के खुशबू रोड तक आवय। 

हमन अपन मामा गाँव माहका जावन त भिलाई तीन म उतर जावन। मामा के नौकर आये राहय। बैलगाड़ी पटरी के ओ पार खड़े राहय। तब लोहा के पेटी चलय। गाँव पेटी ले के जावंय। हमरो माँ पेटी लेगय। पेटी ल नौकर ह मुड़ म बोह लेवय। माँ संग हमन दूनो भाई बहिनी रेंगत जावन। बहुत अकन माल गाड़ी पटरी म खड़े राहय। हमन रेल के नीचे ले झुक झुक के निकलत जान। पेटी ल सरका के नौकर ह निकालय। चार पाँच रेल पटरी पार करके ओ पार पहुँचन। बइला ल गाड़ी म फांदय। हमन बइठन। पेटी ल गाड़ी के आगू म बांध लेवय। अब छाकड़ा गाड़ी दउड़य। थोरिक देर में ही गाँव पहुँच जान।व बीच म तरिया परय त उतर के हाथ गोड़ धो लेवन। तीजन बाई के गाँव गनियानी ल पार करन त इंहाँ छींद के चटाई अउ बाहरी बनावत देखन। 

मामा गाँव पहुँचन त पीपर के छाँव म बइला गाड़ी ढिलावय। सामने म बियारा रहिस हे। ममा अगोरत खड़े राहय। हमन उतर के घर आवन। पीपर पेड़ के बाद नहर नाली रहिस हे। ये ह तरिया म पानी भरे के काम आवय।

नहर नाली के ओ पार लाइन से हमर नाना मन के घर रहिस हे। आखरी वाला हमर मामा के घर रहिस हे।


दीवाली के छुट्टी म जावन त दिन रात खुशबू म साँस भर जावय। गर्मी म जावन तभो खुशबू राहय फेर घर तक।  अँगना म कलमी आमा के रुख रहिस हे। मोर मामा घर मोर तीन चार बहिनी मोर उमर के राहंय हमर मन के धमाचौकड़ी पूरा डेढ़ महिना चलय।


नहर म नहाना, तरिया म गोड़ धोना, तरिया पार के आमा तोड़ना, कुँआ पार के चँदैनी गोंदा, बेल के मजा लेवन। सबले ज्यादा खुशी तो बरगद के जटा ल धर के झूलन अउ तरिया म कूदन। ये सब शहर म कहाँ मिलही? बियारा म बोईर के रुख रहिस हे त गर्मी म ओखर गुठली मिलय तेन ल बिन के घर लानन। मंझनिया भर ओला फोरन। सांझ के ठंडा पानी म नून अउ चिरौंजी डार के शरबत पियन अउ मामा मन ल घलो देवन। वाह अइसना स्वाद कोनो अउ शरबत म नइ मिलय, चिरौंजी ल चबा के नून पानी पियत जाव। ठंडा पानी अपन अपन बर बनावन। हाँसी के बात आये न के ठंडा पानी बनाये कइसे जाथे? हा हा हा। एक कांसा के लोटा म पानी भर के ओखर मुँह ल कपड़ा म बांध देवव अउ ओला मियार म उल्टा टांग देवव। पानी बरफ असन ठंडा हो जथे। डेढ़ महिना के बाद घर आये के बेरा म सब अब्बड़ सुरता आवय। सबले बड़े बात सुगंधित चावल ह भुलाये नइ भूलय।

 कार म बइठे बइठे सुरता आवत हे कारी कमौत धान के खुशबू के। आज बीज ह घलो नंदागे। भिलाई स्टील प्लांट के हवा सब ल निगल दिस।

सुधा वर्मा 8/3/2026

“आदर्श शिक्षिका” – डाॅ. विनोद कुमार वर्मा

 

.                *आदर्श शिक्षिका* (छत्तीसगढ़ी कहानी)


                                 - डाॅ विनोद कुमार वर्मा     


                                (01)    


        सामाजिक विज्ञान के नवा शिक्षिका डाॅ ममता कुँअर जइसे कक्षा मा पहुँचिस- 10 वीं कक्षा के विद्यार्थी मन खड़े होके ताली पीट के ओकर वेलकम करिन। 35 बरस के ओ, गोरी-चिट्टी, चंदा मा चढ़े मधुरस कस देह, सब्बो सुन्दरता मानो बड़े-बड़े आँखी मा समा गे रहिस। चुम्बकीय व्यक्तित्व, राष्ट्रपति ले पुरस्कृत ममता मा शिक्षिका के सबो गुण कुटकुट ले भराय रहिस। 

          ' धन्यवाद, सब बने-बने हावव ? '

     ' हाँ बने-बने मैम! ' - समवेत स्वर सुनई परिस।

        ' बने-बने नि अन मैम! '- एक लइका के जोरहा आवाज सुनाई परिस। पूरा कक्षा मा हाँसी के लहर दउड़ गे। 

       ' का होगे, बता भाई का बात हे? '

      ' मोर नाम श्याम एक्का हे। रमेश टोप्पो मोला कठफोड़वा कहिके चिढ़ाथे! '

     ' मैम, पहिली एहा मोला कछुआ बोलिस त मँय ओला कठफोड़वा बोलेव! '

     कक्षा मा फेर हाँसी के लहर दउड़ गे। तभे एक झन लड़की बोलिस- 'मैम, मोर नाव धनेश्वरी वैष्णव हे। लालू तिग्गा मोला बंदरिया कहिथे! ' 

      पूरा कक्षा मा फेर हाँसी के लहर दौड़ गे।

      ' मैम, धनेस्वरी वैष्णव मोला मुंडक कहिके चिढ़ाथे! अब मोर मुड़ मा कम बाल हे त मँय का करँव? ' - लालू तिग्गा बोलिस। 

       कक्षा मा फेर हाँसी के लहर दौड़ गे। नवा शिक्षिका ममता कुँअर घलो हाँसे लगिस। थोरकुन देर बाद बोलिस- ' लइका हो,  सबो जीव-जन्तु हमर सहोदर हें। हमन सहअस्तित्व के भावना के कारण ही आज जीवित हन। अगर एक-दूसर ले लड़त रहितेन त आज कोनो नि रहितिस! न ओमन न हमन! ....  हमन ला जम्मो चर-अचर, पेड़-पौधा अउ जीव-जंतु के सम्मान करना चाही! हमन ला एक-दूसर के घलो सम्मान करना चाही। '

       ' मैम, का शेर, बाघ भालू घलो हमर सहोदर हे? '

      ' हाँ फेर नरभक्षी जानवर मन ले अपन रक्षा करना भी जरूरी हे। जंगली जानवर मन के बुद्धि- विवेक मनुष्य जइसन नइ रहे। '

        ' अउ कुछु पूछे बर हे? '

         ' नो, मैम! '

       ' मँय आज अउ कुछु नइ 

पढ़ावँव। आज के बाद तीन दिन के छुट्टी हे। खेलव-कूदव अउ पढ़व घलो।  ..... कक्षा मा सबले होशियार कोन हे ?। ' 

      ' मैम, धनेश्वरी वैष्णव। चार दिन पाछू इंटर-स्टेट वाद-विवाद  प्रतियोगिता मा इनाम जीते हे! '

        ' शाबास धनेश्वरी, एक होम वर्क देवत हँव। ये कक्षा के पढ़इया जम्मो विद्यार्थी मन के सरनेम ला तो जानतेच्च होबे। ओमन के अर्थ अपन बाबूजी ले पूछके या  इंटरनेट मा खोजके सोमवार के कक्षा मा बताबे। '

      ' ठीक हे मेम, मँय तैयारी कर लेहूँ। '

     ' लालू तिग्गा,  तुम मंडूक के बारे मा जानकारी सोमवार को बताओगे! धनेश्वरी तोला मंडूक कहिथे न! '

      ' जी मैम। '

           सोमवार के मँय छत्तीसगढ़ के आदिवासी मन के सामाजिक जनजीवन उपर गोठ-बात करहूँ। एहा तुँहर कोर्स के बहुत महत्वपूर्ण चैप्टर हे।'


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             कक्षा मा पिन-ड्राप साइलेन्स रहिस। सबले पाछू लाइन मा  प्राचार्य डाॅ भारद्वाज बइठे रहिन। ओमन देखना चाहत रहिन कि अतेक बहुचर्चित शिक्षिका कइसे  पढ़ाथे? ..... ममता कुँअर के व्याख्यान चलत रहिस।- 

       '  पौराणिक भूज्ञान के अनुसार हजारों बरस पाछू जंबू द्वीप के अन्तर्गत विशाल भारत वर्ष अवस्थित रहिस। वर्ष के अर्थ ही पृथ्वी के एक बड़े भूखंड होथे। तब इहाँ जंगल-पहाड़ अउ नदियाँ के लकठा मा मनखे मन रहँय। ओ समे हमर देश मा कृषि, ऋषि अउ अरण्य संस्कृति फलत-फूलत रहिस। लोक संस्कृति ले लोक साहित्य, ऋषि संस्कृति ले श्लोक साहित्य अउ अरण्य संस्कृति ले वनौकस नृत्य कला उपजिस। वो समे आज जइसन बंगला, मोटर-गाड़ी नइ रहिस। लोगन-मन घास-फूस के झोपड़ी, खोह-गुफा या पेड़ के उपर मचान बनाके नदिया के तीर मा समूह बनाके रहत रहिन। एक समूह ले दूसर समूह के दूरी सैकड़ों मील रहिस। ओमन ला जंगली जानवर ले घलो जान जाय के बहुत खतरा रहिस एकरे खातिर बिहनिया ले लेके रात तक घर के लकठा मा अलाव जलाके राखें। आगी ले जंगली जानवर मन बहुत डर्राथें! '

         ' बहुत बढ़िया! ' - प्राचार्य डाॅ भारद्वाज कुछ ऊँचा आवाज मा बोलिस। 

      ' धन्यवाद सर!  लोगन मन समूह मा रहत रहिन, ताकि हिंसक जंगली जानवर ले मुकाबला कर सकें। एहा जीवित रहे अउ पीढ़ी ला आघू बढ़ाय के संघर्ष रहिस। जम्मो समूह के अलग-अलग नाम रहिस। कोई ऋषि-मुनि के नाम रखँय जइसे शांडिल्य, भारद्वाज, अगस्त्य। कोई नदी के जइसे गंगाजल सरस्वती, कोई पर्वत के जइसे सुमेर, बिन्ध्य त कोई पेड़-पौधों या जानवर के। ताकि ओकर समूह के कोनो आदमी आन समूह के आदमी ले कभू-कहूँ भेंट हो जावय त ओकर पहचान हो सके कि कोन समूह के मनखे हे! '

        ' बहुत इन्ट्रेसटिंग  है मैम! ये तो हमन कभू सोचेच्च नइ रहेंन! '

      ' हाँ बच्चों। घनघोर जंगल मा रहइया वनवासी मन पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, कीट-पतंगा, मछली, फल, निर्जीव वस्तु जइसे लोहा, नमक, फल आदि ला घलो अपन पहिचान बनाय रहिन। इही ला पाछू बेरा मा गोत्र कहि दिन। वनवासी मन घनघोर जंगल मा रहँय। ओमन पशु-पक्षी अउ पेड़-पौधा ले बहुत मया करें। '

' नोनी धनेश्वरी, वनवासी मन के गोत्र के बारे मा का पढ़ के आये हस तेला मोर लक्ठा मा आके  सब ला बता! '

       ' जी मैम, बतावत हँव। छत्तीसगढ़ के वनवासी या आदिवासी मन के गोत्र के सुग्घर-सुग्घर अर्थ हे। एला इंटरनेट मा खोजेंव त घंटो पढ़त रहेंव। ओमन के गोत्र के अर्थ ला बतावत हँव। 

          कुजुर = लता, तिर्की =चील पक्षी, खाखा = कौआ पक्षी, केरकेटा = केकड़ा, खलखो = कबूतर, तिग्गा = बंदर, एक्का = कछुआ, मिंज = मछली, लकड़ा = शेर, बखला = बगुला पक्षी, खेस = धान, बेक = नमक, पन्ना = लोहा, टोप्पो = कठफोड़वा पक्षी, किन्द्रो = फल, बारा/बड़ा = बरगद, बरवा = जंगली कुत्ता ये सबो हमर छत्तीसगढ़ के वनवासी मन के गोत्र हें। '

       जोरहा ताली परिस। प्राचार्य डाॅ भारद्वाज बोलिस- ' शाबास बेटी! तँय हमर स्कूल के आन-बान अउ शान अस। '

.    ' लालू तिग्गा! तोला मुंडक कहिके धनेश्वरी चिढ़ाथे! ' - मैडम ममता पूछिस।

     ' हाँ मैम! '

     ' मुंडक के बारे का पढ़के आय हस? '

     ' मैम, एहा उपनिषद के एक नाम आय। उपनिषद मन के रचना काल ईसापूर्व 1000 ले ईसापूर्व 300 माने जाथे। ये हा वेद के अंतिम भाग हे एकरे सेथी एला बेदान्त घलो कहिथें। एकर कुल संख्या 108 हे। ओमे ले 13 मन प्रसिद्ध हें- ईश, केन, माण्डूक् ,     तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, श्वेताश्वतर, बृहदारण्यक,  कौषीतकि, मुंडक, प्रश्न, मैत्रायणीय। कुछ उपनिषद  के रचना गद्य मा हे त कुछ उपनिषद के रचना पद्य मा! '

        प्राचार्य साहब खड़े होके ताली बजाय  लगिन। - ' वाह बेटा, शाबास! '

    तभे मैडम डाॅ ममता कुँअर बोलिस- ' सर! अतेक कुछ तो महूँ ला नि मालूम फेर दुनों लइका अपन स्तर ले ये जानकारी जुटाय हें! '

      ' मैडम, ममता आपके पढ़ाय के तरीका ला देख लेहें। आप एक आदर्श शिक्षिका हॅव। मोर सौभाग्य हे कि आप हमर स्कूल मा पदस्थ होय हॅव। '

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Story written by-


डाॅ विनोद कुमार वर्मा 

व्याकरणविद्, कहानीकार,  समीक्षक 

बिलासपुर छत्तीसगढ़ 


मो- 98263 40331



कहानी समीक्षा (छत्तीसगढ़ी)

“आदर्श शिक्षिका” – डाॅ. विनोद कुमार वर्मा


छत्तीसगढ़ी साहित्य म कहानीकार डाॅ. विनोद कुमार वर्मा के लिखे कहानी “आदर्श शिक्षिका” एक प्रेरणादायक अउ ज्ञानवर्धक कहानी आय। ये कहानी म लेखक ह एक आदर्श गुरु के व्यक्तित्व, शिक्षा के महत्व अउ विद्यार्थी मन के जिज्ञासा ला बहुत सुंदर ढंग ले प्रस्तुत करे हवय।

कहानी के मुख्य पात्र डाॅ. ममता कुँअर हें, जेन ह सामाजिक विज्ञान के नवा शिक्षिका बनके स्कूल म आथें। ममता कुँअर के व्यक्तित्व आकर्षक, व्यवहार मधुर अउ पोठ गुनी हवय। ओहर विद्यार्थी मन संग अपनापन के साथ गोठियाथें अउ पढ़ई ला रोचक बनाथें।

कहानी के सुरूआत म विद्यार्थी मन एक-दूसर ला जानवर के नाम ले चिढ़ाथें। ए स्थिति ला देखके ममता कुँअर ह बहुत समझदारी ले लइका मन ला समझाथें कि प्रकृति के जम्मो जीव-जंतु हमर सहोदर हें अउ हमन ला सबो के सम्मान करना चाही। ए बात कहानी म सहअस्तित्व अउ मानवता के सुंदर संदेश देथे।

लेखक ह कहानी म छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज के गोत्र परंपरा के बारे म घलो जानकारी दे हवय। जइसे – तिग्गा (बंदर), एक्का (कछुआ), टोप्पो (कठफोड़वा), लकड़ा (शेर), मिंज (मछली) आदि। ए जानकारी के माध्यम ले पाठक मन ला आदिवासी संस्कृति अउ परंपरा के झलक मिलथे। ये बात कहानी ला सिरिफ मनोरंजक नइ, बल्कि ज्ञानवर्धक घलो बनाथे।

कहानी के भाषा बहुत सरल अउ बोलचाल के छत्तीसगढ़ी आय। संवाद शैली म लिखे गे होय के कारण कक्षा के माहौल बहुत जीवंत लगथे। पाठक ला अइसने अनुभव होथे जइसे वो खुद कक्षा म बइठ के पढ़ई सुनत हवय।

कहानी के एक खास बात ए घलो आय कि ममता कुँअर ह विद्यार्थी मन ला रटंत पढ़ई के बदला खोज अउ अध्ययन के आदत सिखाथें। ओमन लइका मन ला अपन सरनेम के अर्थ खोजे बर कहिथें। ए तरीका शिक्षा के सही उद्देश्य ला दिखाथे।

कहानी के अंत म प्राचार्य डाॅ. भारद्वाज ह ममता कुँअर के पढ़ाय के तरीका देखके ओला “आदर्श शिक्षिका” कहिथें। एही से कहानी के शीर्षक घलो सार्थक बन जाथे।

“आदर्श शिक्षिका” एक अइसन कहानी आय जेन म शिक्षा, संस्कृति अउ मानवीय मूल्य मन के सुंदर समन्वय दिखथे। ये कहानी शिक्षक मन बर प्रेरणा अउ विद्यार्थी मन बर ज्ञान के स्रोत आय। डाॅ. विनोद कुमार वर्मा के ये रचना छत्तीसगढ़ी कहानी साहित्य म एक सुग्घर अउ उपयोगी योगदान कहे जा सकथे।

– कवि मिलन मलरिहा

मल्हार, जिला बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 🙏

लाँघन”

 लघुकथा



“लाँघन”



अम्मा अबड़े भूख लागत हे वो।तीनों लइकन रँधिया के अचरा ला तीरे लागिन।रुकव अभी हेर के देवत हवँ गोड़ धोवत रँधिया हा कहिस।चार -पाँच घर के झाड़ू पोंछा बर्तन करत बारा बज गिस ।मैडम मन ओला खाये बर नाश्ता देहे रहिन हे तेला पन्नी मा भर के धर लेहे रहिस रँधिया हा।सबो ला एक ठन थारी मा ढार दिस।लइकन मन झपट झपट  के खाय लगिन।तभेच सोहन हा लड़बड़ लड़बड़ करत आइस अउ लइकन मन ले लूट के खा दिहिस ।लइकन मन रोये लागिन ता उँका गारी देवत बाहिर निकल गिस।लइकन मन के करलाई ला देख रँधिया के छाती फाटे लागिस। रँधिया हा महिना के पंदरा हजार कमा लेवय उही ले घर के खर्चा चलावय।उहूँ पइसा हा दारू के लग्गा लग जावय ओखर घरवाला अखंड दरुहा हावय ।सोहन होश मा राहय ता कुछु बुता काम कर लेवय तहाले पइसा मिले तेला दारू मा उड़ा देवय।मारपीट के रँधिया के पइसा ला घलौ लूट के ले जावय।लुका चोरा के धरे अपन पइसा ले रँधिया अपन घर चलावय तभो ले अइसन कोनों दिन नइ होही जब ओमन दुनो जुआर पेट भर खाइन होंही।जे घर मन मा बुता करे जावय उहाँ हर महिना रँधिया हा उधारी पइसा पहिली ले ले डारे रहय।

           चुप हो जावव लइकन मन मोर खाता मा महतारी वंदन के पइसा आ गिस हवय सुने हवँ।आज नहा धो के बैंक जाहूं तुँहर बर खाई खजेना घलो लाहूँ।आज रतिहा हमन पेट भर खाबों।

   सिरतोन अम्मा आज हमन पेट भर खाये ला पाबोन छोटकू हा पूछिस।

हाँ बेटा रँधिया हा ओला पोटारत किहिस।

सँझा ऱँधिया खाई खजेना लाइस।आज कुकरी घलौ राँधे हे।लइकन मन हाँस हाँस खावत हे रँधिया हा लइकन मन ला खावत देख मुचकात हे तभे कहाँ ले सोहन हा गरजत घूमरत बादर कस आ गिस रँधिया करा दारू बर पइसा माँगे लगिस।रँधिया हा  पइसा नी देंव कहिस ता लात घूस्सा मा मारे लगिस।रँधिया अचेत गिर गिस।आधा रतिहा रँधिया ला होश आइस त देखिस लइकन मन रोवत सुत गय हें। सोहन के कुछु पता नी हे वोहा जम्मो भात साग ला खा डारे हे अउ रँधिया के लुकोय पइसा ला लेग गिस हे।उठके एक लोटा पानी ला गट गट पी उही मेर रँधिया हा आज तीसर दिन लाँघन सुत गिस।



चित्रा श्रीवास

सिरगिट्टी बिलासपुर

छत्तीसगढ़