Thursday, 28 May 2026

लघुकथा ) घर के उजार

 (लघुकथा )


घर के उजार

-------------

वसुंधरा हा रोवत दूधमूँहा नोनी ला पाये बिहनिया बर्तन माँजे-धोये ला बइठे हे।आज चाय बनाके तको नइ पिये हे। हाथ हा चलत नइये। मनमाड़े फूले हे। वोकर गोसइया बल्लू हा नशा मा धुत्त सुते हे। रतिहा मारपीट करे हे। अस्सी-पचयासी साल उमर के सियनहिन सास हा हालत ला समझके कइसनो करके अँगना-परछी ला बाहरत हे।

  वसुधा के आँखी टप-टप चूहत हे।बेचारी हा गुनत हे-- दाई ददा मन पाँच साल पहिली कतका सोच-विचार के, मोर बेटी रानी बरोबर रइही कहिके,खुशी-खुशी वोकर बिहाव बल्लू संग करे रहिन हे। एके झन बेटा, पाँच एकड़ खेत, बढ़िया चलत किराना दुकान। महूँ हा कतका जादा खुश रहेंव।

 फेर तीन बछर पहिली सियान ससुर हा जइसे परलोक सिधारिस, बल्लू हा पियक्कड़ मन के संगति मा परके बर्बाद होगे। दुकान तको बंद होगे। रात-दिन गाली गलौच अउ मारपीट--घर मा कलह समागे।जिनगी मा दुख के पहाड़ गिरगे।

 वसुंधरा हा अचानक उठिस अउ खोली मा आके एक ठन बेग मा कपड़ा-लत्ता ला जोर के बाहिर निकलच अउ परछी मा बइठे अपन सास के पाँव परिस। सियनहिन सास हा आशीर्वाद देवत कहिस-- " घर ला तियाग के जावत हस बेटी-- ले जा, आज नइ रोकँव। महूँ नारी अँव, तोर दुख ला समझत हँव। मोर का हे आज जियत हँव-काली सिरा जहूँ। दे तो नोनी ला चूमन दे। "

वसुधा हा वोकर कोरा मा बइठार दिस। सियनहिन हा मया करके वापस देवत कहिस -- ले जावव बेटी। सुखी रइहव।

वसुधा घर ले निकलगे।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

रिसता परगे सिट्ठा*

 *रिसता परगे सिट्ठा*


           छत्तीसगढ़ हा खाली नाँव के छत्तीसगढ़ नोहय येहर अपन भाव ल मनखे मा झलकाथे। फेर जेन किसम के आजकल मइनसे के आदत बेवहार ल देखथन ओमा पहिली के अउ अबके मा गजब अंतर आवत -जावत हे। इहाँ मया -पिरा, सुख -दुख के  आमा,अमली हा कभु जोत्था -जोत्था फरय- फुलय अउ ममहावय, गुरतुर कोइली कस भाखा - बोली अंतस ल मंदरस कस जनावय ।

      अब जतेर के मनखे मेरन सुख सुबिधा संसाधन बाढ़त जावत हे वतरे के मया अँखरा के पतरावत हे। जइसे पेट हा बोजाथे अउ दलिदरी भगाथे , तहाँ  रंग रंग के गोठियाथें। मसीन के सिलाए कपड़ा ल नाप जोंख के बनाय जाथे, जेन हर गजब दिन ले टिकथे। अब रेडिमेंट उठवा के जमाना छा गेहे जउँन ला जइसन जमथे बिसा लेथें। उठवा जिनीस जलदी पटपटाथे अउ चिराथे घलोक , काबर कि ओकर सिलना मजबूत नइ रहाय। उठवा कपड़ा के उठवा मोल, फ्राक, कुरता, पेंट, कंटोप। अब भइगे आज के मया परेम उठवा कपड़ा - लत्ता कस बनके रहिगे हे, बजार म मिल जथे। चरदिनिया... नवा - नवा मा बकबकासी लगथे।

      पहिली नून, तेल, हरदी, मिरचा ल सइघो नाप तउँल के लेवँय अउ सील लोड़हा मा पिसय। अब पाकेट मा बँद मिलत हे। लिखाय रइथे _पहले स्तेमाल करें, फिर विश्वास करें। कोनो दिन नत्ता -रिसता सिमट  जाहि ता गड्डी नइ ते पैकेट मा मिलही। 

वातावरन,परिवेस हर नाता- रिसता ल बनाथे अउ बिगाड़थे। आज कोनो ला काकरो संसो फिकर नइ हे। अब जाइदा रोटी, कपड़ा, मकान के कोनो ल कमी नइ होवत हे, रोजी- रोटी , मंजूरी घरे तीर मा मिलत हे। कोनो ल जाँगर टोर कमाय के जरूरत नइ हे। ना कोनो ल काकरो मेरन हाथ लमाय के जरूरत  पड़त हे, बस इही अहंकार मनसे ला मनसे ले धुरियावत हे। आदमी दू - चार पइसा काय नइ कमइस अपन ल भूलागे।

  सगा- पहुना बर सनमान के भाव मा एक लोटा पानी, गरम चाहा एक मुठा भात अउ मीठ - मीठ गोठबात बने सनबन्ध के गाँठ जोरे के नियम रिहिस हे। आज चाहा ह स्वाहा होगे...ओकर रंग फरियाके मतउला होगे हे।

   सगा - सोदर मन आके दु -  चार दिन रहिके एक दुसर के सुख  - दुख ल जानँय । छोटे बड़े रिसता के मुताबिक आसीरबाद देवय जुग - जुग जियव, दुदे खाव दूधे अँचोव , तुहर पाँव मा काँटा झन गड़य। चुवा लेके ऊँचा उठे के रसता बतावँय । अब अहू नंदागे...। वो दिन परोसी तको पुछय तुँहर घर सगा काय रोटी लाय हे। अब तो सगा रोटी के जघा ल बजरहा खजानी मिठई हर लेलिस । वो समे गजब धुर - धुरके सगा संबंधी तक ल सोरिया लेवयँ । अब तो रिसता टूटे के कगार बनथे। वो बेखत गजब दिन के आय -जाय सगा हर बिताय दिन के सुरता करत हँसय ता दुख के सुरता म रोवय घलोक जेकर ले रिसता खासम खास बन जावय। अब तो तुरते आवत - जावत हें ।

      आज छोटे - छोटे बात ल धरके रिसा के नाता टोरे बर देर नइ करय। कुछ दिन तो माइलोगिन मन बीता भरके चेंदरी बर तको झगरा कर लेवय अउ नहीं ता मुँहु ल ओथार के घर ले निकलय।

      बीच मा टीवी हा गाँव, पारा, मोहल्ला के रिसता ल खतम करिस ओकर ले चार गुना मोबाईल हर दंदोरत हे। अब काल बदल गेहे _  पहिली वर्तमान, भूत, भविष्यकाल होवय अब _  कॉल, मिस कॉल, वीडियो कॉल के जमाना हे। ये सब्बो काल ल लील के मोबाईल हर महाकाल बनके जिनगी ल जंजाल बना देहे । बेरा कुबेरा नइ लगे  दुख के आँसू ल नाख के भार बोहावत हे। साँच,  लबारी के दरसन नइ हे। मोबाईल के आय ले जोहार भेंट कही देबे केहे के जमाना खतम। टुरी - टूरा ल बिना नेंग, लगिन -भाँवर के पल्ला भगा देथे। अब तो सियान के नियाव के घलोक कदर नइ हे।

      बात केवल सगा सोदर के नइ हे इहाँ सग्गे नत्ता -रिसता के तेवर बदल गेहे। अपन हा बैरी परोसी मितान होवत हे। त कभु घर के मेन कार्यक्रम ल ओकर कका, ददा , बबा, भाई - भौजी, फूफा - फूफी, दीदी - भाटो  तक नइ जानय ओकर नइ रेहे ले तको नेंग - दस्तूर के काम बुता ल दुसर मन निपटा देथें। बाँटें भाई परोसी के कहावत ल सिद्ध करत हें। अपन - अपन ल पुछव दुसर के काय जरूरत हे। अब तो नेवता अइसे देथयँ आयल भाही ता आय नइ ते मजा उड़ाय , ओकर बिना काम थोरीक अटक जाहि । अब नत्ता रोवय के गावय..! ना समधी के भेंट ना बहु के जेठ, होगे बिन टंगिया के बेंठ। खँड़े रिसता,  परे डरे रिसता। अब रिसता बोलय नही मुक्का होवत हे, टूटत रिसता ल जोरे राखे बर तुरपाई करेल परही।

     प्रश्न जनमथे _ जाइदा सुख सुविधा लोगन ला भरमा के दुविधा पइदा तो नइ करत हे..?  सबो मइनसे अपनेच जइसन ल संगवारी बनाही ता एक दुसर मा समानता कइसे आही..? 

      रिसता न टूटे हे  न जुरे हे बस रही - रही के खियावत हे। आज कोनो ह कोनो ल नइ सरेखत हे। भई गे नत्ता के कटोरा परत हे जुछ्छा,  रिसता परगे सिट्ठा । 


                      मदन मंडावी

            ढारा, डोंगरगढ़ छ. ग.

आज के भक्ति मार्ग

 आज के भक्ति मार्ग 


मोला लगथे भगवान हा, चाहे जड़ होवय या चेतन, चर होवय या अचर,  सबो बर उंखर सुभाव के अनुसार नियम बनाए हे। कोनो भी होय हमेशा एक समान नइ रहय। बरसात के मौसम ले बसंत ऋतु तक प्रकृति के सुंदरता देखे के लाइक रथे। तहॉं ले पतझड़ शुरू....मनखे यदि अपन सुभाव म सदा बहार रथे त ओला कोनो फरक नइ परय। फेर कहूॅं थोरको प्रसिद्धि पा जथे त ओकर भाव झन पूछौ भाई, सातवॉं आसमान म चढ़ जथे। स्वाभिमान के नॉंव म पइधथे गरब, गुमान, घमंड। अउ दिमाग ओतके 

तेज घलो भागे लगथे। "हर्रा लगे न फिटकरी रंग चोखा" के हाना ल सकार करे लगथे। खोजत रथे कहॉं ले दू पइसा बचा लॅंव, खाली बचा लॅंव नहीं रपोट लॅंव। एकर बर मनखे के चतुराई, चलाकी के जवाब नहीं। हमर असन लेड़गा के दिमाग के ट्यूब लाइट देरी म बरथे। चोक दे बर परथे। फेर ए गरब गुमान जादा दिन नइ चलय। दुनिया ल देखाए बर संत। भीतरे भीतर पनपत हे विकार अनंत। 

           मनखे के पूछ परख गुणवत्ता के अधार म होथे ए बात सही ए। फेर खाली गुणवत्ता काम नइ आवय। चापलूसी चाटुकारिता के बहुत बड़े रोल रथे। काखर पदवी बढ़ाना हे, काला माछी कस निकाल फेंकना हे एकर ऑंकलन बर ए भक्ति मार्ग बहुत ज़रूरी हे। हमर एक अधिकारी रहिन। उन ककरो कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट लिखे के चार खंभा बनाए रहिन। चारो खंभा ल बराबर दस दस नंबर दे रहॅंय। कहॅंय के तुम एक खंभा -काम के गुणवत्ता म भले पूरा नंबर दे के लाइक हौ, लेकिन बाकी तीन खंभा; चापलूसी, सेवक, अउ तीसरा; दूसर काय करत हे ओकर खबर पॅंहुचाना एमा कहूॅं जीरो पा गेव त सब बेकारे हे न.....।  अउ एकर उलटा करके देखौ:- तीन खंभा के तीस नंबर... भले गुणवत्ता म झन पाए रहव। तौ कभू न कभू जीवन म ए बात होवत दिखबे करथे।


जय जोहार 🙏🌹

भरम

 भरम  

             चार जबर मजबूत खंभा के उप्पर टिके रहय ……. एकठिन बडे जिनीस छत । ओखर खाल्हे म जम्मो मनखे अपन जिनगी ल ...... सुख से बितावत रहय । उही छत ल अपन आश्रयदाता मान के ....... ओखर ऊप्पर बिश्वास करके ... ओकर पूजा करय .... । संगे संग चारों ठिन खंभा के भरोसा करके ...... इंखरो पूजा कर लेवय मौका मौका म । पहिली खंभा हा ....... जम्मो झिन के अगुवा रहय । कइसे रहना जीना खाना हे .... अउ काये करना हे ..... तेखर बर नियम बनावय । दूसर खंभा हा सरी काम काज करत ..... देख–रेख करय । तीसर खंभा हा देखय के .... काकरो संग अन्याव झिन होवय । चौथा खंभा हा ...... बने काम के प्रशंसा करय अउ गलती ला उजागर करय । जम्मो खंभा के आपस म बनेच दोस्ती घला रहय । चारो ल इही बात के अभिमान रहय .... के उहीच मन अतका बड छत ल तान के राखे हाबय ।

                     एक दिन .. धन दौलत ..... मान सम्मान के बडोरा अइस । चारों खंभा डगमगाये लागिस । बडोरा के कचरा काडी मन ...... खंभा म चटक के दाग लगाये बर सुरू कर दीस । पहिली खंभा हा ..... बडोरा ला सहे नइ सकिस ..... वो कमजोर होके फोंगला होए लागिस । धीरे धीरे बेईमानी के चारा ...... चोरी के तोप ...... घोटाला के शेयर म ...... कोयला के आगी सचरगे । स्पेक्ट्रम के बस्सावत हावा ...... आगी ल अतका भड़काइस के ..... पहिली खंभा खोरवा होगे । छत ले एकर संग साथ छूटगे । मनखे मन डर्रागे ...... छत झिन गिर जाय कहिके ...... । दूसर खंभा अइसने कमजोर रिहीस ...... एकर वइसने कोन्हो जब्बर अधार नइ रिहीस ...... उप्पर ले गरब के जहर अउ अकर्मन्यता के पाप हा एकर हाथ ला टोर दीस । अभू एकरो संग छूटगे छत ले । सरलग ले दू ठिन खंभा के डगमगाये ले चारों डहर रोआ राही मातगे । फेर छत नइ गिरीस । तीसर खंभा डहर आसा ले ...... टकटकी लगाए देखे लगिस जम्मो । उहू ल भय अउ लालच के अमरबेल अइसे धरिस के वोहा ..... उबर नइ सकिस अउ अपन दिमाग गवां डरिस । एहा तो अतका तक भुलागे कि काला धरके ठाढ़े हे ...... एकरो हाथ ले छत के पेंदी छुटगे । अभू चौथा खंभा उप्पर भरोसा करे के अलावा कोन्हो चारा नइ बांचिस । करीन घला ...... फेर उहू ला प्रलोभन के केंसर अउ कायरता के एड्स धर लिस । अभू एकर न आंखी दिखय न कान सुनावय ....... छत के पेंदी कतका बेर दूरिहागे ...... गम नइ पाइस । भगवान ल सुमिरे के अलावा कहींच नइ बांचिस ..... मनखे करा । 

                      छत गिरे ले ...... कतका नकसानी होही अउ ओखर पूरती कइसे होही ....... तेकरे बिचार सुरू होगे । छत उदुपले गिर जही ....... सोंच सोंच के जम्मो मनखे मन दुबराए लगिन । दिन ..... महिना ....... अउ कतको बच्छर नहाकगे ....... छत जेंव के तेंव अपन ठउर म स्थिर रहय । कोन जनी छत घला हाबे के निये ......... मनखे के मन म शंका उपजगे । खोजा खोज माचगे । पता चलिस ..... छत त हाबे ...... तभे एमन सुरछित हे । फेर ये छत काय माटी के बने हाबय ....... कइसे बने हाबे ....... कतका चेम्मर हे ....... बिगन कोन्हो अधार के कइसे फइले अऊ तने हाबे ...... बिगन धुरी के कइसे लटके हाबे .... इही हा सोंच के बिषय बनगे । 

               सोध उप्पर सोध चलिस । आखिरी म पता लगिस के ..... जइसे हमर धरती हा ..... अपन अउ सुरूज देवता के बीच ...... गुरूत्वाकर्षण बल म लटके हाबय ...... तइसने ये छत हा एक कोती हमर पुरखा मन के बिचार ..... आसीरवाद ……, नियम....... अनुशासन अउ संरछन के बल म ...... त दूसर कोती जनता के बिश्वास ..... प्रेम ...... भाईचारा ..... मेहनतकश के पछीना अऊ ईमानदारी के बल म ...... बिन लौकिक सहारा के लटके हे । 

              ये छत अउ कोन्हो नोहे भइया ....... हमर लोकतंत्र आए ..... जेला तान के राखे के ठेका लेवइया जम्मो खंभा अऊ मेयार मन ....... घुना खावत फोंगला ....... बीमार परे ...... सरत हे ..... बस्सावत हे । अउ छत अभू घला ...... छाती तान के जम्मो मनखे ल सुरक्षा देवत हे । खंभा अऊ मेयार के तिड़ीबिड़ी होये ले ...... मनखे के भरम  घला भकरस ले टूटगे के ...... हमर लोकतंत्र ..... ककरो सहारा म खड़े हे ।

 हरिशंकर गजानंद देवांगन छुरा

लघुकथा - "जे ठो मुँह ते ठन गोठ "

 लघुकथा - 

   "जे ठो मुँह ते ठन गोठ "

     -मुरारी लाल साव 

बेरा बेरा म सब के गोठ सुहाथे l कोन कब कइसे गोठियाही?सुने के बाद पता चलथे l चौरा चौरा म एक से एक दार्शनिक मन असन कतको बइठे मिल जथे l दुनियाँ भर के ठेका लेके बइठे हे l ओइसने 

एक दिन  श्री बी आर बी मिलगे l याने  भकला राम बावरा ओकर पूरा नाम हे l ओला ओकर पूरा नाम लेके बुलाबे त तमक जथे l पजामा धोती पहिने खांध म पटका डारे मेंछा दाढ़ी बढ़ाये पाछू कोती एक हाथ ला लुकाये बड़बड़ावत मिलगे l पूछ परेन -"बी आर बी जी धरती ला कोन धरे हे? बताहू का? " 

'"धरती ला मेह धरे रहेँव  अभीच मड़ायेंव!" कोन लेगे?

सहीच म बौरागे l सुध बुध कति हे ओला उहू पता नहीं l पगला नोहय  भकला नोहय ज्ञानी हे l

हमर पूछे के मतलब ये रहिस धरती ला कोन बोहे हे? फेर पूछ के देखेन -" धरती ला कोन बोहे हे,भकला भइया? 

धोखा होगे  तुंहर नाम ले परेन l

झन पूछ ओकर तरमराना l

गाली बके रहितिस ओकर पहिली हमन ओला महात्मा जी महात्मा जी कहिके मान देन l तब बी आर जी (भकला राम )शांत होइस l शांत होके कहिथे -" धरती ला मही बोहे हँव दिखत नइ ये का? "

ओकर दर्शन ज्ञान ओकर करा बताही त तो  हम जान बो?

बताना महात्मा जी! बताथे -"

मटकी ला देखत हस मोर मुड़ म हे l माटी के बने हे l माटी माने धरती l मटकी ल मही बनाये हँव मही धरे हँव l मही बोहे हँव l" 

जे ठो मुँह तेठन गोठ l ओकर का का नाम धरके बइहा बना दे हे l एम ए तक पढ़ाई करे हे नौकरी घलो नइ मिलिस l छोकरी घलो नइ मिलिस l खोर किंजरा होगे l कोनो कहत हे जांगर  चोट्टा हे l कोनो कहत हे  ओकर जवानी नइ फूटीस तेखर सेती बिहाव नइ करिस l कोनो कोनो तो ओला...l"

आज हमन ला मालूम होइस बड़े ज्ञानी हमर बीच म हे तेला पूछत नइ हन lहमर चौरा म भकला असनआदमी पगला बन के हाबय l उहू ला मंच देये बर पाँच लाख -दस लाख देके 

बैठार तीस त ओकर ज्ञान के लाभ सबला मिलतिस l बाहिर ले बुलाये का जरूरत! सतसंग करना हे सतसंग सुनना हे श्री "बी आर बी "कोती धियान दे ये पड़ही l इही सोच बिचार करके हमन जल�

लघुकथा - " चार धाम यात्रा "

 लघुकथा -

" चार धाम यात्रा " 

   - मुरारी लाल साव 

बस्ती म इही चर्चा फ़ैल गे l चार धाम के यात्रा बर सब जावत हे l अपन अपन ले तैयारी करत हे l आगी लगथे त अतका चिहोर नइ परय जतका चार धाम के चर्चा फैले हे l 

"कहाँ हस गो भइय्या?" चिल्लावत गणेश आगे घर म l

महेश बैठारिस l गणेश कहिथे -" चलना गो चार धाम जाबो "

महेश के अलग बिचार,अलग रस्ता सबले अलग किसिम के मैनखे  हरे l तभो ले जाने बर गणेश के मन ल राखे बर पूछिस -" कोन कोन जात हे तेमा? "

"सब झन जात हे गो, महूँ जाहूँ 

नइ छोड़ँव भइया l"

"जा जा अइसन मौका तोला मिले हे l "

"तहूँ चल ना भउजी घलो जाही l " 

"जा तोर भउजी ला ले जा l "

"वाह तोर बिना कइसे जाही?"

आखिर म महेश कहिस -" 

चार धाम के यात्रा ले चार फल मिलथे वो मोला घर बइठे मिलगे l" आँखी ला छत्कारत, गणेश पूछिस -वो कइसे? "

" चार धाम नइ जाना हे त पूछ? नइ ते जा अब घूंच l"

गणेश जान डरिस भइय्या के सुर आन तान होवत हे l चल दिस उहाँ ले l

महेश फेर गुनिस मैनखे ला तुतारी अउ मुखारी के जरूरत पड़थे l मन अउ बिश्वास,

धरम अउ करम जेकर श्रेष्ठ हे वोला का जरूरत हे चार धाम जाये के? कबीर साहेब के बानी  फोकट  नोहय " तीरथ गये दू झन चित्त चंचल मन चोर l एको पाप न उतरिया लाये दस मन और l" 

गंगोत्री म नहाये के सुख घर में हे घलो हे l 

 पाप धोके आथे उही मन तहाँ उही लद्दी म  म बुड़े रहिथे l

का पुन अउ का तरना? सबो जस के तस l

अमर नइ हो जाय l 

घिलर घिलर के नइ मरही त 

तड़फ तड़फ के मरही l  जेकर करनी करम सुधरय नहीं l 

उही बेरा चाय लेके गंगा आगे l 

महेश कहिथे -" जाना तहूँ चार धाम म l"

गंगा कहिस " तै इंहा रहिबे भोला नाथ  असन l कइसे गंगा तोला छोड़ के जाही l  संग मा रहिबो l तहीं हमर चार धाम तहीं हमर तीरथ l लक्ष्मण मस्तुरिया कवि बने कहे हे  " कहाँ जाबे बड़ दूर हे गंगा पापी मन इहें तरव रे!" महेश फेर उही बानी ल तुक के सुनाथे 

-" तीरथ गये दोई झन चित चंचल मन चोर l एको पाप ना उतरिया दस मन लाये और l"

महेश अउ गंगा दूनो  चार धाम जवइया मन ला देखत  रहिथे l 

मोटर म सबक

सजग साहित्यकार : सुशील भोले डॉ. पीसीलाल यादव

 सजग साहित्यकार : सुशील भोले

डॉ. पीसीलाल यादव

साहित्य समाज के दरपन ये, अउ साहित्य साहित्यकार के सिरजन  ये । साहित्यकार समाज म जउन देखथे, जउन अनुभव करथे तेने ल लिखथे, तब सच ह उजागर होथे । छत्तीसगढ़ी साहित्य बड़ समृद्ध साहित्य हे |  येला समृद्ध करे म हमर कतकोन साहित्यकार मन के योगदान हे । धनीधरम दास, पंडित सुन्दर लाल शर्मा, द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, महाकवि कपिल नाथ कश्यप, पंडित श्याम लाल चतुर्वेदी, लाला जगदलपुरी, नारायण लाल परमार, कोदूराम दलित, विद्याभूषण मिश्र, डॉ. नरेंद्र देव वर्मा , पंडित दानेश्वर शर्मा, मेहत्तर राम साहू, भगवती लाल सेन, उघोराम झखमार, पवन दीवान, विमल पाठक, कुंज बिहारी चौबे, मुकुन्द कौशल अउ कतकोन साहित्यकार मन अपन सिरजन ले छत्तीसगढ़ी साहित्य के ढोली-ढाबा ल भरिन, छतीसगढ़ी साहित्य ल पोठ करिन अउ जीयत भर ले छत्तीसगढ़ी, छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़िया के गोठ करिन । इही सरलग में एक नाँव हे स्वः सुशील भोले के |  सुशील भोले ठेठ छतीसगढ़िया आय । गांव के जनमन, गाँव के उबजन – बाढ़न, गाँव के रहन-रहन तेखरे सेती ओखर सिरजन में गाँव के संस्कृति के दरसन होथे, गाँव के बोली के परसन होथे अउ ते अउ ओखर भाव-सुभाव म मया-दुलार के अरपन होथे |   छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया बर ओखर अंतस म दया - मया पलपलावत राहय | माटी महतारी बर ओखर मया उंखर ये कविता म देखउल देथे –

जा रे मोर गीत तैंहा ,खदर बन जाबे |

बिना घर के मनखे बर, घर बन जाबे । 

बने अस देखत जाबे, कोनों भूख झन मरय, 

पेट के अगिन बर, कोनों लइका झन बेचय । 

अइसन कहूँ देखबे त, तैंहा खदर बन जाबे || 

जा रे मोर गीत तैहा, खदर बम जाबे ॥

ये सोच रिहिस, समझ रिहिस छत्तीसगढ़ के दुख-दरद अउ गरीब-गुरवा के पीरा बर। काबर के ओहा अपन जिनगी म दुख-पीरा  ल झेले रिहिस, अउ सुख-सुविधा ले बाहिर दुख-दुविधा ल मेले रिहिस । सुशील भोले ऊँखर साहित्यिक नाँव ये, सिरतोन, कहिबे त ओखर नाँव रिहिस सुशील कुमार वर्मा । सुशील भोले के जनम भाठापारा, जिला रायपुर म दू जुलाई सन् उन्नीस सौ इकसठ के होय रिहिस । इंखर मूल गाँव आय नगर गाँव, थाना धरसींवा, जिला रायपुर (छ.ग) | माता श्रीमती उर्मिला देवी वर्मा अउ पिता श्री राम चंद्र वर्मा । चार भाई अउ दू बहिनी म येमन मंझला रिहिन | चौथी तक के शिक्षा-दीक्षा भाँठापारा म, 7 वी तक नगर गाँव म अउ आठवीं ले 11 वीं तक के पढ़ई इंखर रायपुर म होइस । कंपोजिंग ट्रेड में आई.टी.आई. करके जिनगी जिए के रद्दा धरिन । पत्नी श्रीमती बसंती देवी वर्मा के सँग जिनगी के रद्दा चतवारत खूब नांव कमइन | अपना पुरखा के नाँव जगइन | कला-साहित्य अउ संस्कृति के सेवा करत । इंखर तीन बेटी हे श्रीमती नेहा वर्मा, श्रीमती वंदना वर्मा अउ श्रीमती ममता वर्मा | इही बेटी मन भाई सुशील भोले के देखरेख करत रिहीन |

सुशील भाले जी के साहित्यिक यात्रा सबले पहिली रायपुर ले प्रकाशित अग्रदूत समाचार पत्र ले होइस, सरकारी प्रेस म नौकरी घलो करिन फेर ऊहाँ ले मन उचट गे । तहाँ ले सन्‌ 1988 ले 2005 तक खुद के व्यवसाय प्रिंटिंग प्रेस के संचालन अउ छत्तीसगढ़ी के मासिक पत्रिका “मयारु माटी" के प्रकाशन करिन, जेखर छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत म खूब शोर होईस । फेर का करबे  आर्थिक स्थिति ठीक नई होय के सेती 13 अंक के बाद ये पत्रिका ‘मयारू माटी’ मुरझागे । कोनो पानी  पलोइया नई मिलिस । आडियो केसेट के रिकार्डिंग स्टूडियो घलो खोलिन, फेर उहू म हाथ चपकागे | 

कहिथे न के जेन सच बोलथे, सच लिखथे , ओखर जिनगी म अड़चन आते रहिथे । जेखर इरादा पक्का होथे, जेन कुछु करे के ठान लेथे, ओहा सरी अड़चन ल उभेल देथे | जिनगी ले जोम देके लड़इया अइसने आय सुशील भोले । कतकोन जगह नौकरी करके सुशील भोले ह बड़ संघर्ष करिन । दैनिक अग्रदूत, दैनिक तरुण छत्तीसगढ़, दैनिक अमृत संदेश, दैनिक छत्तीसगढ़, इत‌वारी अखबार, जय छत्तीसगढ़ अस्मिता (मासिक) के संगे- संग अउ कतको साहित्यिक अउ सामाजिक पत्र – पत्रिका में सहसंपादन के संगे-संग लेखन कार्य घलो करत रिहिन । वइसे तो सुशील भोले जी ल साहित्य सिरजन के प्रेरणा ऊँखर पिता जी श्री रामचद्र वर्मा जी ले मिलिस | काबर कि ओमन खुद लेखक रिहिन, शिक्षक रिहिन अउ ओ समय म संयुक्त मध्यप्रदेश म अनुपम प्रकाशन रायपुर ले प्रकाशित ऊँखर लिखे किताब पाठ्यपुस्तक के रूप म चलत रिहिस। दैनिक अग्रदूत म सन 1983-84 म नौकरी करत बेरा प्रदेश क प्रसिद्ध व्यंगकार प्रो० विनोद शंकर शुक्ल के उन ला मार्गदर्शन मिलिस, तेन हा बड़ फुरमानुक होइस, तहाँ ले भोले जी के लेखन में सक्रियता बढिस । कई ठन पत्र-पत्रिका में कालम लेखन करिन, जेन बड़ लोकप्रिय होइस - 

किस्सा कलयुगी हनुमान के (मयारु माटी -1988-89) 

बेंदरा बिनास (साप्ताहिक छत्तीसगढ़ सेवक - 1988-89)

तरकश अउ तीर (दैनिक नव भास्कर - 1990)

आखर अंजोर (दैनिक तरुण छत्तीसगढ़ - 2006-07)

डहर चलती (दैनिक अमृत संदेश - 2009)

गुड़ी गोठ (साप्ताहिक इतवारी – 2010 – 2015 ) सुशील भोले जी के लेखन केवल कविता तक सीमित नई रिहिस, बल्कि ओमन गीत, कहानी, लेख अउ व्यंग्य लेखन ले छत्तीसगढ़ी साहित्य ल पोठ करिन | ऊँखर प्रकाशित किताब के नाँव ये प्रकार के हे -

 छितका कुरिया (काव्य संग्रह-1988)

 दरस के साघ (लम्बी कविता - 1990)

 जिलनगी के रंग (गीत व भजन संग्रह - 1995)

 ढेंकी (कहिनी संकलन - 2006)

 आखर अंजोर (छ.ग की संस्कृति पर आधारित आलेख - 2006, 2017)

 भोले के गोले ( व्यंग संग्रह - 2015)

 सब ओखरे संतान (मुक्तक संकलन - 2021-22)

 सुरता के संसार (संस्मरण लेखन -  2021-22)

 कोंदा भैरा के गोठ (कालम संकलन - 2024 25) 

कला-साहित्य-संस्कृति के संगे संग सुशील भोले जी के झुकाव अध्यात्म डहर घलो होइस । 1994 से लेके सरलग 2008 तक लगभग 14 बछर ओमन आध्यात्मिक साधना म लीन अउ आत्म ज्ञान के प्राप्ति बर संलग्न रिहिन । इही बेरा "आदि धर्म जागृति संस्थान" के स्थापना घलो करिन | जेखर माध्यम ले आध्यात्मिक जनजागरण के बुता करिन | सुशील भोले जी सन् 1983 ले छत्तीसगढ़ी पृथक राज्य आंदोलन म जमीनी रुप ले जुड़े रिहिन । जिनगी भर छत्तीसगढ़ के लोक जीवन, लोक संस्कृति अउ सामाजिक सरोकार ले सुशील भोले जुड़े रिहिन अउ ऊँखर रचना कार्य म येखर सेती गाँव-गोढ़ा के गोठ उबक के अइस । जिनगी ले जुरे उंखर अध्यात्म काल के रचना देखव, जेमा आज के सच के वर्णन हे-

देख कबीरा सुन्ना परगे, धरम के रद्दा जुन्ना परगे, 

लंदी-फंदी के करनी म, माथ धरे फेर गुन्ना परगे ये | 

छोल चाँच के रद्दा बनाय, सबके रद्दा आगू बढ़ाये,

कागज कलम मसि के लेखा ले अड़हा मन ला ज्ञान गढ़ाये, 

भेड़िया धसान के रेंगना म, फेर एहूँ अप घुन्ना परगे | 

चारों मुड़ा पाखंड नाचत हे, भोगी मन रुप खापत हे, 

सत सेवा के माया जाल म, यौवन के आगी तापत हें | 

बड़े-बड़े बंगला बनथे अब, आश्रम के रूप जुन्ना परगे ,

कइसे करी मानवता रक्षा, यक्ष प्रश्न फेर आज खड़े हे, 

धरम के ठेकादार गऊँटिया, चारों मुड़ा निर्लज्ज खड़े हे | 

परमारथ के कारज म कॉटा - खूँटी अब जुन्ना परगे |

मुँह देखी बात करथे तेन ह मनखे नई होय, त ओहा साहित्यकार कइसे हो सकत हे ? साहित्यकार तो उही आय, जेन आमा ल आमा अउ अमली ल अमली कइथे | सुशील भोले जी सच ल सच, गलत ल गलत किहिन चाहे ओ कोनो होय । छत्तीसगढ़ के जउन सपना हमर पुरखा  मन देखे रिहिन, ओ धरे के धरे रहिगे । राज बने के बाद भी हमला ललाय बर परत हे । कवि के पीरा देखव -

राज बनगे राज बनगे, देखे सपना धुआँ होगे 

चारों मुड़ा कोलिहा मन के, देखो हुआँ- हुआँ होगे। 

का - का सपना देखे रहिन, पुरखा अपन राज बर,

राजनीति के पासा लगथे, महाभारत के जुआँ होगे । 

'ढेंकी' सुशील भोले जी के बहुत प्रसिद्ध कहानी संग्रह आय। 2008 में प्रकाशित ये कहानी संग्रह में 12 ठन कहानी संग्र‌हित हे । जेन में छत्तीसगढ़ी लोकजीवन अउ छत्तीसगढ़ी परिवेश में छतीसगढ़ के रहन-सहन, संस्कार जीवंत होय हे । सुशील भोले जी के भाषा सौंदर्य के बानगी देखव - कहानी ढेंकी में -

“अगास के छाती म मुंदरहा के सुकवा टंगा गे राहय । सुकवा के दिखते सुकवारो के पाँव खटिया छोड़ माटी सँग मितानी बद लय । तहाँ ले सबले पहिली वोकर बुता होवय अपन पहटिया ल जगाना, तेमा वो बेरा राहत बरदी लेके दइहान जा सकय । फेर पाछू वो लिपना - बहारना, मांजना- धोना करय । आजो अपन पहटिया ल जगाय के पाछू तिरिया धरम के बुता म भिड़गे ।"

इंखर कविता संग्रह "दरस के साध" छत्तीसगढ़ ल जाने के, एखर गौरव - गरिमा अउ अस्मिता ल पहिचाने के उदिम आय । "दरस के साध" लम्हरी कविता आय । कवि के साध छत्तीसगढ़ दर्शन के हे -

महानदी के जनम भूमि म, जातेंव फेर मैं तुरते,

सिंगी रिसी के कुटिया छवाय हे, तिही सिहावा ल गुनते । 

महानदी उद्गरे हे तिही, कुंड के पानी पीतेंव, 

फेर निरोगी होके मैं तो, लाख बरिस जीतेंव ।।

सुशील भोले जी लोक संस्कृति के चितेरा आय | ओ अपन नान - नान कविता म माई भाखा म ठेठ शब्द के रंग ले के अपन लेखनी ले जीयत-जागत चित्र बना देवय | “सब ओकरे संतान ये संगी "ऊँखर ये किताब येखर गवाही हे । नई पतियावव त ये परछो लेवव -

मया मरम मीठ बोली, जस देबे तस पाबे, 

जेन पिरीत के संगी होही, तेला तब पोगराबे । 

कतको होवय कंचन काया, या दौलत के ढेरी,

फेर म एखर पर जाबे त, जीवन भर पछताबे ||

x x x

अंगरी धर के रेंगे सीखेंव, पारत तोला गोहार,

  मोर मयारुक दाई हवय, तोला गाड़ा गाड़ा जोहार । 

काल कहूँ अनदेखना करते, कोनों बात के सती,

  त कइसे आज चढ़ पातेंव, सफलता के ये पहार ।। 

"भोले के गोले" जइसे के नांव से पता चलत हे। ये हा व्यंग्य, कहानी अउ लेख के संग्रह आय । जइसे के पहिली ये बात के उल्लेख होगे हे के सुशील‌ भोले जी समर्थ साहित्यकार रिहिन अउ लगभग सबो  विधा म अपन लेखनी चलाय हें । व्यंग्य के एक बानगी देखव –

“दुनिया के नान-नान देश मन ला कोन हथियार बेच बेच के आपस म लड़वावत रहिथे ? त मोला बता अइसन किसम के मरखंडा गोल्लर कस देश के मुखिया ल गरु‌वा बरोबर मान के शांति के नोबल पुरस्कार कइसे दिए जा सकत हे ।" भोले के गोले में हमर छत्तीसगढ़ के विभूति मन ऊपर लेख के संगे-संग, तीज-तिहार अउ लोक संस्कृति ऊपर घलो लेख है | "सुरता के संसार" घलो अइसने नानपन अउ पुरखा मन के सुरता करत कृति आय।

सुशील भोले जी ल ऊँखर साहित्यिक अवदान बर कतको सम्मान मिले हे । जेमा छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग डहर ले सन 1910 म दे गे भाषा सम्मान प्रमुख हे | येहू बात उल्लेखनीय है कि साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा अहमदाबाद गुजरात में 8 अक्टूबर 2017 के गुजराती अउ छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्यिक आयोजन म उनला कविता पाठ बर आमंत्रित करे गे रिहिस, जेमा डॉ. केशरी लाल वर्मा ,डॉ. परदेशी राम वर्मा, रामनाथ साहू जी अउ मीर अली मीर जी घलो भाग ले रिहिन | ये बहुत बड़े उपलब्धि आय | आकाशवाणी अउ दूरदर्शन ले ऊँखर कविता अउ वार्ता के प्रसारण होथे | 

सुशील भोले जी  छत्तीसगढ़ भाषा के सजग साहित्यकार रिहिन | ऊँखर लेखनी ल नई भुलाय जा सके। फेर समय ल कोन जाने हे, कब का हो जही ? कोन ला का पता हे ? 24 अक्टूबर 2018 के भिलाई में डॉ. परदेशी राम वर्मा जी के अगास दिया कार्यक्रम जउन स्व. पवन दीवान जी के सुरता म होवत रिहिस, तेमा बोलत खानी सुशील भोले जी लकवा ग्रस्त होगें। देखो देखो होगे। का होगे, कइसे होगे ? कोनो ल समझ नई अइस | काफी इलाज के बाद भी स्वास्थ्य लाभ नई मिलिस | डेरी अंग एकंगू शिथिल होगे। फेर सुशील भाई के वाह रे जीवटता, ओहा साहित्य सिरजन ल नई छोड़िस । अपन लेखनी ल सतत जारी रखिन। सोशल मिडिया के माध्यम ले अपन लेखन ल जारी रखिन । कभू फोटू  त कभू कविता सबके मन ल मोहे | कला, साहित्य संस्कृति के गोठ खूब वाहवाही लूटिन । तन थके ले, मन नई थके । सम सामयिक विषय ऊपर ऊँखर “कोंदा भैरा के गोठ” ल खूब पाठक मिलिन |  कोनों दिन संस्कृति के बात, त कोनो दिन व्यंग्य | सोशल मिडिया ले लेके अखबार तक म छागे । मन में उमेंद जागिस, उछाह जागिस | सबके साध रिहिस के सुशील भोले सौ  साल जिहीं । बीमार हालत म घलो सभा-गोष्ठी म शामिल हो जाय। अउ अपन बात ल दम-खम ले राखें । फेर का करबे काल के आगू कखरो नई चले । 26 फरवरी 2026 के सुशील भोले जी हमला छत्तीसगढ़ी के सेवा के रद्दा देखात, शांत होंगे। उन ला कोटि-कोटि नमन । 

सच लिखे अउ, सच बोले,

ओखर नॉव , सुशील भोले ।

          डॉ. पीसी लाल यादव 

“ साहित्य कुटीर ”

        गंडई – पंडरिया    

                 जिला – खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (छ.ग)

       मो.-9424113122