सजग साहित्यकार : सुशील भोले
डॉ. पीसीलाल यादव
साहित्य समाज के दरपन ये, अउ साहित्य साहित्यकार के सिरजन ये । साहित्यकार समाज म जउन देखथे, जउन अनुभव करथे तेने ल लिखथे, तब सच ह उजागर होथे । छत्तीसगढ़ी साहित्य बड़ समृद्ध साहित्य हे | येला समृद्ध करे म हमर कतकोन साहित्यकार मन के योगदान हे । धनीधरम दास, पंडित सुन्दर लाल शर्मा, द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, महाकवि कपिल नाथ कश्यप, पंडित श्याम लाल चतुर्वेदी, लाला जगदलपुरी, नारायण लाल परमार, कोदूराम दलित, विद्याभूषण मिश्र, डॉ. नरेंद्र देव वर्मा , पंडित दानेश्वर शर्मा, मेहत्तर राम साहू, भगवती लाल सेन, उघोराम झखमार, पवन दीवान, विमल पाठक, कुंज बिहारी चौबे, मुकुन्द कौशल अउ कतकोन साहित्यकार मन अपन सिरजन ले छत्तीसगढ़ी साहित्य के ढोली-ढाबा ल भरिन, छतीसगढ़ी साहित्य ल पोठ करिन अउ जीयत भर ले छत्तीसगढ़ी, छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़िया के गोठ करिन । इही सरलग में एक नाँव हे स्वः सुशील भोले के | सुशील भोले ठेठ छतीसगढ़िया आय । गांव के जनमन, गाँव के उबजन – बाढ़न, गाँव के रहन-रहन तेखरे सेती ओखर सिरजन में गाँव के संस्कृति के दरसन होथे, गाँव के बोली के परसन होथे अउ ते अउ ओखर भाव-सुभाव म मया-दुलार के अरपन होथे | छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया बर ओखर अंतस म दया - मया पलपलावत राहय | माटी महतारी बर ओखर मया उंखर ये कविता म देखउल देथे –
जा रे मोर गीत तैंहा ,खदर बन जाबे |
बिना घर के मनखे बर, घर बन जाबे ।
बने अस देखत जाबे, कोनों भूख झन मरय,
पेट के अगिन बर, कोनों लइका झन बेचय ।
अइसन कहूँ देखबे त, तैंहा खदर बन जाबे ||
जा रे मोर गीत तैहा, खदर बम जाबे ॥
ये सोच रिहिस, समझ रिहिस छत्तीसगढ़ के दुख-दरद अउ गरीब-गुरवा के पीरा बर। काबर के ओहा अपन जिनगी म दुख-पीरा ल झेले रिहिस, अउ सुख-सुविधा ले बाहिर दुख-दुविधा ल मेले रिहिस । सुशील भोले ऊँखर साहित्यिक नाँव ये, सिरतोन, कहिबे त ओखर नाँव रिहिस सुशील कुमार वर्मा । सुशील भोले के जनम भाठापारा, जिला रायपुर म दू जुलाई सन् उन्नीस सौ इकसठ के होय रिहिस । इंखर मूल गाँव आय नगर गाँव, थाना धरसींवा, जिला रायपुर (छ.ग) | माता श्रीमती उर्मिला देवी वर्मा अउ पिता श्री राम चंद्र वर्मा । चार भाई अउ दू बहिनी म येमन मंझला रिहिन | चौथी तक के शिक्षा-दीक्षा भाँठापारा म, 7 वी तक नगर गाँव म अउ आठवीं ले 11 वीं तक के पढ़ई इंखर रायपुर म होइस । कंपोजिंग ट्रेड में आई.टी.आई. करके जिनगी जिए के रद्दा धरिन । पत्नी श्रीमती बसंती देवी वर्मा के सँग जिनगी के रद्दा चतवारत खूब नांव कमइन | अपना पुरखा के नाँव जगइन | कला-साहित्य अउ संस्कृति के सेवा करत । इंखर तीन बेटी हे श्रीमती नेहा वर्मा, श्रीमती वंदना वर्मा अउ श्रीमती ममता वर्मा | इही बेटी मन भाई सुशील भोले के देखरेख करत रिहीन |
सुशील भाले जी के साहित्यिक यात्रा सबले पहिली रायपुर ले प्रकाशित अग्रदूत समाचार पत्र ले होइस, सरकारी प्रेस म नौकरी घलो करिन फेर ऊहाँ ले मन उचट गे । तहाँ ले सन् 1988 ले 2005 तक खुद के व्यवसाय प्रिंटिंग प्रेस के संचालन अउ छत्तीसगढ़ी के मासिक पत्रिका “मयारु माटी" के प्रकाशन करिन, जेखर छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत म खूब शोर होईस । फेर का करबे आर्थिक स्थिति ठीक नई होय के सेती 13 अंक के बाद ये पत्रिका ‘मयारू माटी’ मुरझागे । कोनो पानी पलोइया नई मिलिस । आडियो केसेट के रिकार्डिंग स्टूडियो घलो खोलिन, फेर उहू म हाथ चपकागे |
कहिथे न के जेन सच बोलथे, सच लिखथे , ओखर जिनगी म अड़चन आते रहिथे । जेखर इरादा पक्का होथे, जेन कुछु करे के ठान लेथे, ओहा सरी अड़चन ल उभेल देथे | जिनगी ले जोम देके लड़इया अइसने आय सुशील भोले । कतकोन जगह नौकरी करके सुशील भोले ह बड़ संघर्ष करिन । दैनिक अग्रदूत, दैनिक तरुण छत्तीसगढ़, दैनिक अमृत संदेश, दैनिक छत्तीसगढ़, इतवारी अखबार, जय छत्तीसगढ़ अस्मिता (मासिक) के संगे- संग अउ कतको साहित्यिक अउ सामाजिक पत्र – पत्रिका में सहसंपादन के संगे-संग लेखन कार्य घलो करत रिहिन । वइसे तो सुशील भोले जी ल साहित्य सिरजन के प्रेरणा ऊँखर पिता जी श्री रामचद्र वर्मा जी ले मिलिस | काबर कि ओमन खुद लेखक रिहिन, शिक्षक रिहिन अउ ओ समय म संयुक्त मध्यप्रदेश म अनुपम प्रकाशन रायपुर ले प्रकाशित ऊँखर लिखे किताब पाठ्यपुस्तक के रूप म चलत रिहिस। दैनिक अग्रदूत म सन 1983-84 म नौकरी करत बेरा प्रदेश क प्रसिद्ध व्यंगकार प्रो० विनोद शंकर शुक्ल के उन ला मार्गदर्शन मिलिस, तेन हा बड़ फुरमानुक होइस, तहाँ ले भोले जी के लेखन में सक्रियता बढिस । कई ठन पत्र-पत्रिका में कालम लेखन करिन, जेन बड़ लोकप्रिय होइस -
किस्सा कलयुगी हनुमान के (मयारु माटी -1988-89)
बेंदरा बिनास (साप्ताहिक छत्तीसगढ़ सेवक - 1988-89)
तरकश अउ तीर (दैनिक नव भास्कर - 1990)
आखर अंजोर (दैनिक तरुण छत्तीसगढ़ - 2006-07)
डहर चलती (दैनिक अमृत संदेश - 2009)
गुड़ी गोठ (साप्ताहिक इतवारी – 2010 – 2015 ) सुशील भोले जी के लेखन केवल कविता तक सीमित नई रिहिस, बल्कि ओमन गीत, कहानी, लेख अउ व्यंग्य लेखन ले छत्तीसगढ़ी साहित्य ल पोठ करिन | ऊँखर प्रकाशित किताब के नाँव ये प्रकार के हे -
छितका कुरिया (काव्य संग्रह-1988)
दरस के साघ (लम्बी कविता - 1990)
जिलनगी के रंग (गीत व भजन संग्रह - 1995)
ढेंकी (कहिनी संकलन - 2006)
आखर अंजोर (छ.ग की संस्कृति पर आधारित आलेख - 2006, 2017)
भोले के गोले ( व्यंग संग्रह - 2015)
सब ओखरे संतान (मुक्तक संकलन - 2021-22)
सुरता के संसार (संस्मरण लेखन - 2021-22)
कोंदा भैरा के गोठ (कालम संकलन - 2024 25)
कला-साहित्य-संस्कृति के संगे संग सुशील भोले जी के झुकाव अध्यात्म डहर घलो होइस । 1994 से लेके सरलग 2008 तक लगभग 14 बछर ओमन आध्यात्मिक साधना म लीन अउ आत्म ज्ञान के प्राप्ति बर संलग्न रिहिन । इही बेरा "आदि धर्म जागृति संस्थान" के स्थापना घलो करिन | जेखर माध्यम ले आध्यात्मिक जनजागरण के बुता करिन | सुशील भोले जी सन् 1983 ले छत्तीसगढ़ी पृथक राज्य आंदोलन म जमीनी रुप ले जुड़े रिहिन । जिनगी भर छत्तीसगढ़ के लोक जीवन, लोक संस्कृति अउ सामाजिक सरोकार ले सुशील भोले जुड़े रिहिन अउ ऊँखर रचना कार्य म येखर सेती गाँव-गोढ़ा के गोठ उबक के अइस । जिनगी ले जुरे उंखर अध्यात्म काल के रचना देखव, जेमा आज के सच के वर्णन हे-
देख कबीरा सुन्ना परगे, धरम के रद्दा जुन्ना परगे,
लंदी-फंदी के करनी म, माथ धरे फेर गुन्ना परगे ये |
छोल चाँच के रद्दा बनाय, सबके रद्दा आगू बढ़ाये,
कागज कलम मसि के लेखा ले अड़हा मन ला ज्ञान गढ़ाये,
भेड़िया धसान के रेंगना म, फेर एहूँ अप घुन्ना परगे |
चारों मुड़ा पाखंड नाचत हे, भोगी मन रुप खापत हे,
सत सेवा के माया जाल म, यौवन के आगी तापत हें |
बड़े-बड़े बंगला बनथे अब, आश्रम के रूप जुन्ना परगे ,
कइसे करी मानवता रक्षा, यक्ष प्रश्न फेर आज खड़े हे,
धरम के ठेकादार गऊँटिया, चारों मुड़ा निर्लज्ज खड़े हे |
परमारथ के कारज म कॉटा - खूँटी अब जुन्ना परगे |
मुँह देखी बात करथे तेन ह मनखे नई होय, त ओहा साहित्यकार कइसे हो सकत हे ? साहित्यकार तो उही आय, जेन आमा ल आमा अउ अमली ल अमली कइथे | सुशील भोले जी सच ल सच, गलत ल गलत किहिन चाहे ओ कोनो होय । छत्तीसगढ़ के जउन सपना हमर पुरखा मन देखे रिहिन, ओ धरे के धरे रहिगे । राज बने के बाद भी हमला ललाय बर परत हे । कवि के पीरा देखव -
राज बनगे राज बनगे, देखे सपना धुआँ होगे
चारों मुड़ा कोलिहा मन के, देखो हुआँ- हुआँ होगे।
का - का सपना देखे रहिन, पुरखा अपन राज बर,
राजनीति के पासा लगथे, महाभारत के जुआँ होगे ।
'ढेंकी' सुशील भोले जी के बहुत प्रसिद्ध कहानी संग्रह आय। 2008 में प्रकाशित ये कहानी संग्रह में 12 ठन कहानी संग्रहित हे । जेन में छत्तीसगढ़ी लोकजीवन अउ छत्तीसगढ़ी परिवेश में छतीसगढ़ के रहन-सहन, संस्कार जीवंत होय हे । सुशील भोले जी के भाषा सौंदर्य के बानगी देखव - कहानी ढेंकी में -
“अगास के छाती म मुंदरहा के सुकवा टंगा गे राहय । सुकवा के दिखते सुकवारो के पाँव खटिया छोड़ माटी सँग मितानी बद लय । तहाँ ले सबले पहिली वोकर बुता होवय अपन पहटिया ल जगाना, तेमा वो बेरा राहत बरदी लेके दइहान जा सकय । फेर पाछू वो लिपना - बहारना, मांजना- धोना करय । आजो अपन पहटिया ल जगाय के पाछू तिरिया धरम के बुता म भिड़गे ।"
इंखर कविता संग्रह "दरस के साध" छत्तीसगढ़ ल जाने के, एखर गौरव - गरिमा अउ अस्मिता ल पहिचाने के उदिम आय । "दरस के साध" लम्हरी कविता आय । कवि के साध छत्तीसगढ़ दर्शन के हे -
महानदी के जनम भूमि म, जातेंव फेर मैं तुरते,
सिंगी रिसी के कुटिया छवाय हे, तिही सिहावा ल गुनते ।
महानदी उद्गरे हे तिही, कुंड के पानी पीतेंव,
फेर निरोगी होके मैं तो, लाख बरिस जीतेंव ।।
सुशील भोले जी लोक संस्कृति के चितेरा आय | ओ अपन नान - नान कविता म माई भाखा म ठेठ शब्द के रंग ले के अपन लेखनी ले जीयत-जागत चित्र बना देवय | “सब ओकरे संतान ये संगी "ऊँखर ये किताब येखर गवाही हे । नई पतियावव त ये परछो लेवव -
मया मरम मीठ बोली, जस देबे तस पाबे,
जेन पिरीत के संगी होही, तेला तब पोगराबे ।
कतको होवय कंचन काया, या दौलत के ढेरी,
फेर म एखर पर जाबे त, जीवन भर पछताबे ||
x x x
अंगरी धर के रेंगे सीखेंव, पारत तोला गोहार,
मोर मयारुक दाई हवय, तोला गाड़ा गाड़ा जोहार ।
काल कहूँ अनदेखना करते, कोनों बात के सती,
त कइसे आज चढ़ पातेंव, सफलता के ये पहार ।।
"भोले के गोले" जइसे के नांव से पता चलत हे। ये हा व्यंग्य, कहानी अउ लेख के संग्रह आय । जइसे के पहिली ये बात के उल्लेख होगे हे के सुशील भोले जी समर्थ साहित्यकार रिहिन अउ लगभग सबो विधा म अपन लेखनी चलाय हें । व्यंग्य के एक बानगी देखव –
“दुनिया के नान-नान देश मन ला कोन हथियार बेच बेच के आपस म लड़वावत रहिथे ? त मोला बता अइसन किसम के मरखंडा गोल्लर कस देश के मुखिया ल गरुवा बरोबर मान के शांति के नोबल पुरस्कार कइसे दिए जा सकत हे ।" भोले के गोले में हमर छत्तीसगढ़ के विभूति मन ऊपर लेख के संगे-संग, तीज-तिहार अउ लोक संस्कृति ऊपर घलो लेख है | "सुरता के संसार" घलो अइसने नानपन अउ पुरखा मन के सुरता करत कृति आय।
सुशील भोले जी ल ऊँखर साहित्यिक अवदान बर कतको सम्मान मिले हे । जेमा छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग डहर ले सन 1910 म दे गे भाषा सम्मान प्रमुख हे | येहू बात उल्लेखनीय है कि साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा अहमदाबाद गुजरात में 8 अक्टूबर 2017 के गुजराती अउ छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्यिक आयोजन म उनला कविता पाठ बर आमंत्रित करे गे रिहिस, जेमा डॉ. केशरी लाल वर्मा ,डॉ. परदेशी राम वर्मा, रामनाथ साहू जी अउ मीर अली मीर जी घलो भाग ले रिहिन | ये बहुत बड़े उपलब्धि आय | आकाशवाणी अउ दूरदर्शन ले ऊँखर कविता अउ वार्ता के प्रसारण होथे |
सुशील भोले जी छत्तीसगढ़ भाषा के सजग साहित्यकार रिहिन | ऊँखर लेखनी ल नई भुलाय जा सके। फेर समय ल कोन जाने हे, कब का हो जही ? कोन ला का पता हे ? 24 अक्टूबर 2018 के भिलाई में डॉ. परदेशी राम वर्मा जी के अगास दिया कार्यक्रम जउन स्व. पवन दीवान जी के सुरता म होवत रिहिस, तेमा बोलत खानी सुशील भोले जी लकवा ग्रस्त होगें। देखो देखो होगे। का होगे, कइसे होगे ? कोनो ल समझ नई अइस | काफी इलाज के बाद भी स्वास्थ्य लाभ नई मिलिस | डेरी अंग एकंगू शिथिल होगे। फेर सुशील भाई के वाह रे जीवटता, ओहा साहित्य सिरजन ल नई छोड़िस । अपन लेखनी ल सतत जारी रखिन। सोशल मिडिया के माध्यम ले अपन लेखन ल जारी रखिन । कभू फोटू त कभू कविता सबके मन ल मोहे | कला, साहित्य संस्कृति के गोठ खूब वाहवाही लूटिन । तन थके ले, मन नई थके । सम सामयिक विषय ऊपर ऊँखर “कोंदा भैरा के गोठ” ल खूब पाठक मिलिन | कोनों दिन संस्कृति के बात, त कोनो दिन व्यंग्य | सोशल मिडिया ले लेके अखबार तक म छागे । मन में उमेंद जागिस, उछाह जागिस | सबके साध रिहिस के सुशील भोले सौ साल जिहीं । बीमार हालत म घलो सभा-गोष्ठी म शामिल हो जाय। अउ अपन बात ल दम-खम ले राखें । फेर का करबे काल के आगू कखरो नई चले । 26 फरवरी 2026 के सुशील भोले जी हमला छत्तीसगढ़ी के सेवा के रद्दा देखात, शांत होंगे। उन ला कोटि-कोटि नमन ।
सच लिखे अउ, सच बोले,
ओखर नॉव , सुशील भोले ।
डॉ. पीसी लाल यादव
“ साहित्य कुटीर ”
गंडई – पंडरिया
जिला – खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (छ.ग)
मो.-9424113122