Saturday, 14 February 2026

छत्तीसगढ़ी हास्य लोक कथा हाथी अउ कोलिहा वीरेन्द्र सरल

 छत्तीसगढ़ी हास्य लोक कथा

हाथी अउ कोलिहा

वीरेन्द्र सरल

       एक जंगल म एक ठन हाथी अउ एक ठन कोलिहा रहय। कोलिहा ह बहुत चतुरा अउ मतलबिहा रिहिस अउ हाथी बपरा ह निचट सिधवा। दुनो झन जंगल म अलग-अलग किंजरे अउ खाय-पिये। अलग -अलग ठउर म रहय। एक दिन दुनो झन के भेंट होगे। हाथी अउ कोलिहा ह एक-दुसर के रहे बसे के ठउर -ठिकाना पूछिन अउ मितान बधगे।

        एक दिन के बात आय। कोलिहा किहिस-‘‘मितान अब तो ये मेर के सबो फल-फलहरी मन सिरागे हावे। थोड़किन जंगल भीतरी जाय ले ही भोजन-पानी के बेवस्था हो पाही तइसे लागथे। ये मेर  जादा दिन ले रहिबो तब तो भूख-पियास म पराण छूट जही।‘‘

             हाथी ह कोलिहा संग दूरिहा जंगल म जाय बर राजी होगे।

   बिहान दिन दुनो मितान किंजरत-किंजरत घनघोर जंगल म पहुंचगे। कोेलिहा ह हाथी के पीठ म बइठे रहय अउ सब पेड़ मन के फल-फलहरी ला मनमाने झड़के। हाथी बपरा ह कहुं-कहुं मेर बड़े पेड़ मन के हरियर पत्ता ला खावत जाय। कोलिहा ला काय जियान पड़तिस, ओहा तो हाथी के पीठ म बइठे रहय फेर बिहिनया ले संझा तक रेंगत-रेंगत हाथी के जांगर थकगे। ओहा लस खागे फेर मितान के मया म कलेचुप रेंगत रिहिस।

     जब चार-तेन्दू खावत-खावत कोलिहा ला पियास लागिस तब ओहा हाथी ला किहिस-‘‘मितान! पेट तो भरगे फेर अब तो मोला गजब पियास लागत हे। टोंटा ह सुखावत हे। मोर बर कांहचो ले पानी खोज तभे जीव ह बांचही।‘‘

     अब हाथी ह चारो मुड़ा पानी खोजे लगिस फेर कोन्हो मेर पानी के बूंद नइ दिखिस।

 हाथी ला एक उपाय सूझिस, ओहा कोलिहा ला किहिस-‘‘तैहा मोर पीठ ला छोड़ के सूड़ म बइठ जा। मैहा सूड़ ला उप्पर कोती टांगहूं। तहन तैहा  दूरिहा-दूरिहा ला देखबे, हो सकथे कहूं मेर पानी दिख जाय? तोला दिखही तब महू ला बताबे। तहन उहां लेगहूं।

    कोलिहा ह अइसनेच करिस फेर कहूं मेर पानी के बूंद नइ दिखिस। अब कोलिहा ह पानी बिना छटपटाय लगिस।

      हाथी किहिस-‘‘ मितान! अब तो तोर जीव ह पियास म छूटी जही तइसे लागथे। तोर जीव बंचाय के अब एकेच उपाय हे। तैहा मोर पेट भीतरी खुसर जा अउ मोर पेट मे जउन पानी भरे हे ओला पीके निकल जबे। शर्त बस इही हे कि तैहा मोर पेट भीतरी के उप्पर डहर भर ला झन देखबे।

     कोलिहा हाथी के पेट भीतरी खुसरगे अउ सोसन भर पानी पिस। पियास बुझाइस तहन हाथी के कहे बात ह सुरता अइस। ओहा सोचे लगिस कि मितान ह काबर मोला उप्पर कोती ल देखे बर मना करे हे?  लालच म ओहा उप्पर डहर ल देख दिस। हाथी के पेट म ओखर  लाल-लाल करेजा ह लफ-लफ करत रिहिस।

      कोलिहा मसखया जीव तो आय। अड़बड़ दिन ले ओला मांस खाय बर घला नइ मिले रिहिस। हाथी के करेजा ला देख के ओखर जीव ह ललचागे। ओहा हाथी के करेजा ला खाय ला धरलिस। हाथी ह पेट पीरा म तड़फेे लगिस फेर कोलिहा ल थोड़को दया नइ लागिस।

   पेट पीरा म हाथी के जीव छूटगे। ओहा उहीच मेर मरगे। ओखर मुंहू ह बंद होगे। अब कोलिहा ह हाथी के पेट भीतरी फंसगे। निकले ते निकले कइसे? कोलिहा ह हाथी के पेट भीतरी धंधाके हड़बड़ावत रहय।

    ठउका उहीच बेरा म महादेव-पारवती मन ये धरती ल किंजरे बर आय रिहिन अउ उही रद्दा ले गुजरत रिहिन। ओमन मरे हाथी ला देख के ओखर तीर म आइन। हाथी के पेट भीतरी कोलिहा ह हड़बड़ावय तब हाथी के पेट ह हाले। महादेव-पारवती ला शंका होइस। ओमन सोचिन, ये मरे हाथी के पेट म कोन खुसरे हे?

      महादेव ह ललकार के किहिस-‘‘ये मरहा हाथी के पेट भीतरी कोन जीव खुसरे हस रे?‘‘

पेट भीतरी ले कोलिहा किहिस-‘‘ये हाथी के पेट भीतरी कोन खुसरे हे तउन ला पूछने वाल तैहा कोन होथस?‘‘

      महादेव किहिस-‘‘ अरे! मैं संसार के सबले बड़े देवता महादेव अवं। अब तै बता तैहा कोन हरस?‘‘

 पहिली तो येला सुनके कोलिहा ह डर्रागे फेर आधा डर, आधा बल करके किहिस- ‘‘मैहा महादेव के बड़े भाई सहादेव अवं। तैहा कोन्हो सिरतोन के महादेव होबे तब मनमाने पानी बरसा के देखा।‘‘

     महादेव ह गुसियागे अउ मनमाने पानी गिरा दिस। पानी म भींग के मरहा हाथी के देहें ह फुलगे अउ ओखर मुहूं ह उलगे। मउका पाके कोलिहा ह उले मुंहूं कोती ले निकल के पल्ला भगिस।

     ओला पकड़हूं  कहिके महादेव ओला गजब कुदाइस फेर अमराबेच नइ करिस।

      महादेव ला अब कोलिहा ला पकड़े के जिद होगे। ओहा सोचिस, रहा ले ले रे कोलिहा! तैहा मोर मारे पानी बुड़े नइ बांचस। मैहा तो तोला पकड़ के हाथी के करेजा ला खा के मारे के सजा तो देबेच करहूं। 

महादेव ह कोलिहा के निगरानी करे लगिस तब पता चलिस कि कोलिहा ह जंगल के देवता तरिया म रोज बिहिनिया पानी पिये बर आथे।

    एक दिन महादेव ह उही तरिया के पानी भीतरी लुका के बइठे रिहिस। कोलिहा ह जब पानी पिये बर आइस अउ अपन गोड़ ला तरिया भीतरी डार के पानी पिये लगिस तब महादेव ह ओखर गोड़ ल चिमचिम ले धर लिस अउ किहिस-‘‘ ले अब कइसे भागबे रे कोलिहा।‘‘

    पहली तो कोलिहा ह डर्राइस फेर चालाकी करत किहिस-‘‘या! महादेव ह मोर गोड़ के भोरहा म तरिया पार के पीपरी पेड़ के जड़ ला जमा के धरे हावे अउ मोर गोड़ ला धरे हवं कहिके खुश होवत हे।‘‘

     महादेव ह कोलिहा के बात ला सिरतेान पतिया के ओखर गोड़ ला छोड़ दिस अउ पीपरी पेड़ के जड़ ला जमा के धरलिस। गोड़ ह छूटिस तहन कोलिहा फेर उहां ले पल्ला भागिस। जब कोलिहा के चतुराई ह महादेव ला समझ म आइस तब ओहा फेर कोलिहा ला कुदाइस फेर ओला अमराबेच नइ करिस।

      महादेव सोचिस, ये कोलिहा ह तो बड़ चतुरा हे। मुही ला चुतिया बना के भाग जथे फेर येला पकड़ना जरूरी हे। अब तो मोर इज्जत के सवाल हे।

     एक दिन महादेव ह मनखे के भेष धरके उही रद्दा म मरे असन पड़े रिहिस जउन रद्दा म कोलिहा ह रोज किंजरे बर जावय। मरहा मनखे ला देख के कोलिहा ह जान डारिस कि ये तो महादेव आय अउ मोला पकड़े बर फेर चाल चले हे।

      कोलिहा ह महादेव के तीर म जाके चिचियावत किहिस- ‘‘ये दई! कोन बपरा ह रद्दा म मरगे हावे फेर मैहा येखर मास ला नइ खाववं। मोर ददा ह कहे हे कि जब तक मरहा मनखे ह जम्हाई नइ लिही तब तक ओखर मास ला खाय ले पाप पड़थे।‘‘

       येला सुनके महादेव सोचिस, मैहा कोन्हो नइ जम्हाहूं तब तो येहा मोर मास ला खाय बर मोर तीर म नइ आवय अउ येहा तीर म नइ आही तब येला कइसे पकड़हूं? अइसे सोच के महादेव ह जम्हा पारिस। 

      महादेव ल जम्हावत देख के कोलिहा ह दूरिहा म भागगे अउ किहिस- ‘‘महादेव! तैहा तो अतका घला नइ जानस कि मरहा मनखे ह कोन्हो जम्हाही? मोला पकड़े बर तैहा चाल चले हस तेला तो मैहा पहिली ले जान डारे रहेंव तिही पाय के मैहा चाल चले हव।‘‘ अतका कहिके कोलिहा ह फेर उहां ले पल्ला भागिस। महादेव फेर ठगा गे।

    एक दिन महादेव फेर ओ कालिहा ला पकड़े बर चाल चलिस। ओहा जंगल के डुमर पेड़ तीर जा के अड़बड़ अकन डुमर ला सकेल के ओखर ढेंरी बना लिस अउ उही डुमर ढेंरी के भीतरी म खुसर के कलेचुप बइठगे।

     जब कोलिहा ह डुमर खाय बर ओ मेर आइस तब ढेंरी ल देख सब समझगे। ओहा जान डारिस कि ये ढेंरी के भीतरी म महादेव ह लुका के बइठे हावे अउ मोला पकड़े के अगोरा करत हे। 

कोलिहा ह फेर चाल चलिस अउ दूरिहा ले किहिस-‘‘कोन बिचारा गरीब ह डुमर ल एक ठउर म सकेल के गे हावे। पर के मिहनत के जिनिस ला खा के काबर फोकट काखरो सरापा-बखाना सुनना। ये ढेंरी ले कोन्हो अपने- अपन ढुल के दू चार ठन डुमर मन अलगा जही तब उही ला खा के अपन मन ला मढ़ा ले बो भैया। हम तो पर के कमई ला कभु खाय नइ हन तब आज खा के काबर पाप के भागी बनबो, नइ खावन ददा।‘‘

     कोलिहा के गोठ ला सुनके डुमर ढेंरी के भीतरी म लुकाय महादेव ह अपन अंगरी म कोचक के दू चार ठन डुमर ला ढेंरी ले गिराहूं कहिके कोचक पारिस। सबो डुमर ह ढेंरी ले ढुलके बगरगे। कोलिहा ल महादेव ह दिखगे। कोलिहा फेर उहां ले जी-पराण दे के भागिस। महादेव ह ओला गजब कुदाइस फेर ओहा पकड़ म आबे नइ करिस।

     कोलिहा के मारे महादेव के जीव ह हलाकान होगे रहय। अब महादेव ह ओला पकड़े बर एक ठन अउ उदिम सोचिस। ओहा लासा के एक झन डोकरी के मूर्ति बना दिस अउ ओखर हाथ म बरा-सोंहारी, बरी-बिजौरी, चिला-चौसेला, फरा-मुठिया धरा दिस अउ ओ मूर्ति ला उही तरिया पार म बइठार दिस जउन म कोलिहा ह पानी पिये बर आवय।

     जब कोलिहा ह पानी पिये बर आइस अउ रंग-रंग के खाय-पिये के जिनिस धरके डोकरी ला तरिया पार म बइठे देखिस तब ओखर मन ललचागे।

 ओहा डोकरी के तीर मे जाके किहिस-‘‘आज काय तिहार आय ममा दाई! अड़बड़ अकन रोटी-पीठा ला धरके ये तरिया पार म चुप्पे लुका के मुसुर-मुसुर एके झन झड़कत हस। तोर बरा सोहारी ला महूं ला देना ममा दाई।‘‘

     अब लासा के बने डोकरी के मूर्ति ह काय गोठियातिस? कोलिहा तीन-चार बेर ले मांगिस फेर डोकरी ह हूं हां कहींच नइ करिस। कोलिहा ह भड़कगे अउ ओखर हाथ के रोटी ला झटक के भागहूं कहिके तीर म जाके रोटी ला झटके लगिस। कोलिहा ह डोकरी ला हाथ लगाइस तहन लासा म ओखर हाथ ह चटक गे।

      कोलिहा ह अपन हाथ ला छोड़ाय बर डोकरी ल एक लात मारिस तब ओखर पांव घला चटकगे। अइसने-अइसने कोलिहा के दुनो हाथ अउ पांव ह लासा के बने डोकरी म चटकगे। 

     ये सब ला दूरिहा म लुका के महादेव ह देखत रिहिस। ओहा कोलिहा के तीर म आके किहिस- ‘‘आज मोर फांदा म फंसे हस रे कोलिहा! अब देख तोला कइसे मजा चखाहूं? गजब दिन ले मोला हलाकान करे हस। अब तो तोर ले सबे बदला ल लेहूं।‘‘

     महादेव ह कोलिहा के घेंच ल कस के डोरी म बांध दिस अउ ओला तिरत-तिरत अपन घर लानिस। एक ठन कुरिया म बांध के ओला धांध दिस। अब महादेव रोज बिहिनया उठे अउ सबले पहिली ओ चतुरा कोलिहा ला दू-चार डंडा मारे।

      रोज महादेव के मार के मारे कोलिहा ह दंदरगे। मार के मारे ओखर देहें पांव ह फूलगे। ओहा उहां ले भागे के उदिम लगावय फेर कहीं उदिम नइ मिलत रिहिस।

      एक दिन संझाती के बात आय। महादेव-पारवती मन ह किंजरे बर गे रिहिन। उही बेरा एक ठन दूसरा कोलिहा ह कोनजनी कहां ले घुमत-फिरत चतुरा कोलिहा के कुरिया मेर पहुंचगे अउ खिड़की कोती ले झांक के देखिस। 

भीतरी म बंधाय अपन संगवारी ला देख के कहिस- ‘‘कस सगा! तैहा महादेव के घर म काय करत हस? तैहा तो मार छिहिल-छिहिल दिखत हस। बने मोटा घला गे हस।‘‘ 

   चतुरा कोलिहा ल अब उहां ले भागे के उपाय मिलगे। ओहा नवा कोलिहा ला किहिस-‘‘काय करबे सगा! इहां महादेव-पारवती ह मोला रोज बिहिनिया मनमाने मेवा-मिष्ठान खवाथे। रंग-रंग के खाय बर देथे। मोर खाय के मन नइ रहय तभो गजब जोजिया के खवाथे। मैहा तो इहां के मेवा-मिष्ठान ला खा-खा के मर जहूं तइसे लागथे। मेवा-मिष्ठान खवई में मोर जी ह असकट लाग गे हावे।‘‘

  चतुरा कोलिहा के बात ला सुनके नवा कोलिहा के जीव ललचागे। मुंहूं ले लार टपके लगिस। ओहा किहिस- ‘‘तोर किसमत गजब ऊँचा हे भैया! तैहा इहां खा-खा के मरत हस अउ मैहा लांधन-भूखन मरत हवं। मोरो मन मेव- मिष्ठान खाय के होथे फेर मैहा तो करमछड़हा हवं। ले जावत हवं भैया, राम-राम।‘‘

     चतुरा कोलिहा किहिस- ‘‘अरे यार! तैहा तो मोर सगा भाई अस। तोर पीरा मोर पीरा आय। एक काम कर। ये खिड़की डहर ले बुलक के  मोर तीर आ अउ मोर घेंच के बंधना ला खोल दे। ये बधना ला मैहा तोर घेेंच म बांध देथव। हम दुनो के मुंहरन-गढ़न तो एकेच हावे। महादेव-पारवती मन ह चिन्हे ला तो सके नहीं। ओमन तोला, मोला आय कहिके गजब मेवा-मिष्ठान खवाही। खावत-खावत जब तोर जीव ह असकटा जही तब मोला बता देबे। मैहा इहां आके फेर तोर जगा म बंधा जहूं।‘‘

      लालच के मारे नवा कोलिहा ह चतुरा कोलिहा के जाल म फँसगे। ओहा खिड़की डहर ले बुलक के चतुरा कोलिहा मेर आइस अउ ओखर घेंच के बंधना ला खोल दिस। चतुरा कोलिहा ह अपना बंधना म नवा कोलिहा के घेंच ल बांध के मुस्कावत उहां ले छू लंबा होगे। चतुरा कोलिहा ह जंगल म भागत -भागत सोंचत रहय, महादेव के मार ले लटपट बांचे हवं ददा। अब ओ ललचहा कोलिहा ला मरन दे साले ल, मोला काय करना हे।

        बिहान दिन महादेव ह धंधाय कोलिहा के कुरिया म आइस अउ नवा कोलिहा ला चतुरा कोलिहा समझ के  भदाभद डंडा म मारे लगिस। नवा कोलिहा ह मार म दंदरगे। 

ओहा हाथ जोड़ के किहिस-‘‘मोला मत मार ददा! मैहा तोर घर के मेवा-मिष्ठान ह अइसने होथे कहिके जाने रहितेंव तब इंहा कभु नइ झपाय रहितेंव। मैंहा पहिली वाला कोलिहा नोहवं ददा। ओ लबरा ह लबारी मार के इहां मोला फंसाके भागगे हावे।‘‘

     महादेव पूछिस -‘‘तब तैहा कोन हरस? अउ इहां चतुरा कोलिहा  के फांदा म कइसे फंसगेस? 

नवा कोलिहा ह रोवत-कलपत सब बात ला बने फोरिया के महादेव ला बतादिस।

     चतुरा कोलिहा के चतुराई ला सुनके महादेव घला दंग रहिगे। ओहा किहिस-‘‘ तैहा लालच करके इहां फंसे हस। तोला तो लालच के फल मिलबेच करही। मैहा तो तोला छोड़ देवत हवं फेर तोला अब सदा दिन रतिहा ये संसार के पहरा देना पड़ही। रात भर म चार बेर हुंआ-हुंआ करके मनखे मन ला सवचेत करे बर पड़ही। पहिली संझाती हुंआ-हुंआ करबे। तहन सोवा पड़ती करबे ओखर बाद अधरतिहा करबे अउ फेर मुंधरहा करबे। ये काम मंजूर हे तब बोल, नहीें ते अउ पड़ही डंडा म।‘‘

    नवा कोलिहा मुड़ी नवा के हव किहिस अउ रतिहा  म संसार के चार बेर पहरा दे बर तैयार होगे। महादेव ह ओला छोड़ दिस। नवा कोलिहा हफटत- गिरत जंगल डहर भागिस। कहे जाथे उही दिन ले रतिहा बेरा कोलिहा मन चार बेर हुंआ-हुंआ करके आज तक पहरा देवत हे अउ जब तक संसार रही तब तक पहरा देतेच रही। मोर कहानी पूरगे, दार भात चुरगे।

 वीरेन्द्र सरल

बोड़रा ( मगरलोड )

जिला-धमतरी, छत्तीसगढ़

दुख के कारन कहाँ हे?* व्यंग्य -द्वारिका वैष्णव

 *दुख के कारन कहाँ हे?*

व्यंग्य -द्वारिका वैष्णव 

दुख के कारन ये आय कि महूँ एक संवेदनशील मनखे अँव, भले शकल ले नई दिखँव। सुभाव मोर नीचट पेनपेनहा, रोनहा लईका के तरा हे। दूसर के दुख देखंव निहीं कि मोर भीतर के संवेदनशीलता हर जड़काला मा घाम मा राखे नरियर तेल के तरा टघले उपर टघले धरथे।


फेर ये दरी मोर संवेदनशीलता हर थोरकुन आहत कस होगे। कइसे? इही कहिनी ला एमेर आपके आघू राखत हंव। मोर नजर मा दुखी दिखत ये प्रानी ले अइसे तो न मोर कोनो नता-रिसता हे न जान-चिन्हार। बस सांझ के मोर घूमे जाय के समय ये डहर मा आत दिख जाथे। मैं जात रथंव वो आत रथे। वो एक सूरदास आय। बने ऊंच पूर, स्वस्थ, अच्छा पेंट कमीज पहिरे, काला चश्मा लगाय, अपन संगी के कांधा मा हाथ रखे बजार जात दिख जाथे। वोकर नाव नई जानँव ए पाय के मैं वोकर नांव सूरदास ही रख देत हंव। अइसे हम अंधा मन ला सूरदास ही कथन, भले ऊंकर नाम रेवालाल हो या हरि परसाद। वो डहर भर ऊंचा अवाज मा गोठियात दिखथे अउ वोकर संगी हाँ-हूँ कहत रथे। बस ! वोकर मोर अतकेच भेंट होथे। तबले मैं जे घंव वोला देखथों, हर बार वोकर अंधवा होय के दुख मा बुड़ जाथों। का करबे, संवेदनशीलता के कमजोरी ले अइसे हो जाथे। कपड़ा लत्ता, गोठ-बात ले वो भीख मांगत होही अइसे भी नई लगे। जइसे कि हम हर सूरदास के बारे मा सोंच लेथन। देख नई सके अतकेच कारन का पर्याप्त नइये कि वोकर जिनगी मा का कमी हे? मैं सोच मा पर जाथों" कइसे वो अतेक पहाड़ जइसे जिनगी ला बिताही? ये संगवारी वोकर कै दिन काम आही? लरे-परे मा कोन एकर सेवा जतन करही? कोन खाय-पीये बर कहीं? अगर जनम ले अंधरा होही ता बने करके रसगुल्ला काला कथें अउ बरा कइसे होथे, जानबे नई करत होही? हमर कस ये जंगल, नदी, पहाड़, मेला, तिहार, बरबिहाव, नाचगाना, प्रेम अउ प्रेमरोग ला घलो नई जानत होही?"


मोर हिरदे हर दुख मा पलपला गे अउ अतका सोंच के आंखी के कोन्टा हर भींज गे।

"बचपन मा ये न कभू तलाब मा कूद-कूद के नहाय होहीं न कभू छू-छूअउल, रेसटीप खेले होही। भौंरा, बाँटी, अउ रूख मा चढ़ के आमा बोईर टोरे ला भी नई जाने होही। पंगत के पतरी मा कहाँ मेर लड्डू अउ बालूसाही हे अउ कहाँ मेर बरा-पुड़ी कोन बतात होही? काबर मनखे ला अतेक दुख देथस भगवान! कोन एकर संग बिहाव करही? काकर लईका ल ये कोरा मा खेलाही? अंधवा बना के एकर तो जिनगी के सबो मजा ही छीन लेहे।"

भगवान ले मोर शिकायत बाढ़ते जात है। संवेदनशील मनखे एकर ले जादा कर का सकत है?

"अइसे दीन-हीन जिनगी ले तो एकर मर जाना अच्छा।"

मैं सीधा समस्या के आसान अउ अंतिम निदान मा आ जाथों। एती सूरदास कब के बाजार जा चुके है।

हमर सही छोटे अउ गरीब आम आदमी बर सुखी जिनगी के इही मतलब आय, जेकर ले सूरदास वंचित हो गय है। हमर जीवन के किताब मा सुख के मतलब अपार धन दौलत, गाड़ी मोटर, बंगला, बड़े-बड़े पद, कुरसी, विदेस भ्रमन अउ सुरा सुन्दरी जइसे पन्ना बिलकुल नइये। हम तो अतकेच मा खुस हन।

एक दिन सूरदास फेर दिखीस। आज वोकर हाथ मा एक ठन बड़े झोला रहिस। वो अपन साथी ले कहत रहिस "सुन ना चंदू! आज बने ताजा पइन्हा मछरी मिलही न! त आधा किलो ले लेबो, नई तो फेर चिकन तो मिलबेच करही। बड़ दिन होगे यार! एको पव्वा मारे।"

सुनके मोर संवेदनशील हिरदे ला थोरकुन चोट पहुँचिस। मैं एला जतेक दुखी समझथंव ओतका दुखी ये नई दिखे। फेर मैं सोचेंव "अरे एहू तो इंसान आय, एहू ला तो हर वो चीज खाय-पीये के अधिकार हे जेन हमन ला हे। एमा गलत का हे? "मोर मन मा वोकर तरफ के कोनो वोकिल कस अवाज उठिस।

"सोंच तो? ओकर जगह अगर तैं होते त का होतिस?" बस मोला वोकर दुख ला भोगे के कारन मिलगे। अब मैं डहर भर अपन ला अंधवा समझत चले जात रहेंव। मोर मुंह ले - "जाने वालों जरा मुड़ के देखो इधर, एक इंसान हूँ।" "दोस्ती" पिक्चर के गीत निकले लगिस। मोला उम्मीद रहीस, एको ठन गाड़ी मोर तीर आके रूकही अउ वोमा ले कोनो कहीं - "कहाँ जाबे बबा! आ बइठ गाड़ी मा मैं छोड़ देहूँ।" फेर अइसे नई होईस बल्कि एक ठन बाईक वाला भरपूर ब्रेक मारत आघू मा आगे कहिस "मरबे का डोकरा ? अंधवा अस का? अभी तो बोजा गे रहे।"

मैं होस मा आ गेंव। एकर ले जादा मोर ले अंधवा होय के एक्टिंग नई हो सके। फेर मोर सोचे के संवेदनशील घोड़ा दउड़ते रहिस "अगर मैं सचमुच अंधवा हो गेंव त का करहूँ? महाकवि सूरदास कस न मोर मन मा भगवान के भक्ति जागे हे न मैं महाकवि जॉन मिल्टन कस 'पैराडाईज लॉस्ट' लिख सकंव?" अब मोला अपन अतेक संवेदनशील होके सोंचे ऊपर गुस्सा आत रहिस।" घूमे निकले हस त बने प्रसन्न मन घूम, दुनिया के तमाम लफड़ा अपना मुड़ ऊपर काबर बोंह लेथस?" मन के भीतर ले ए दरी कोनो अउ वोकिल फटकारिस ।

ए बीच कतको दिन बीतगे। डहर मा सूरदास नई दिखीस। अउ मैं कोनो दुख भी नई देखेंव। ए पाय के मोर मुंह ले "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना" अउ "बदन पे सितारे लपेटे हुए" जइसे बहुत से सियान मन ला नई सूट करने वाला गीत निकलिस। मोर  

संवेदनशीलता भोथरा झन जाय ये सोंच के मैं सूरदास के बारे मा सोचेंव भी - "कहाँ गे होही? काबर नई दिखत हे? काहीं वोकर संगी छोड़ के भाग तो नई गे?" तभे संजोग ले सूरदास डहर मा आवत दिखगे। फेर ये का? आज वोकर संग ओकर संगी निहीं, एक जवान, बने पहिरे ओढ़े, आंखी मा काजर, मुँह मा लाली, माथा मा सेन्दूर लगाय नवा दुल्हन कस स्त्री रहिस। सूरदास ओकर बांही धरे हमेसा के तरह गोठियात आवत रहिस। तब का सूरदास के बिहाव होगे? पुराना आदत अनुसार अभी मोर धियान सूरदास उपर नई होके वोकर बाई तरफ रहिस। "अतेक जवान टूरी अउ ये सूरदास?" देख के कोन जनि काबर बने नई लगिस।


तभे मन के भीतर ले ओकर डहर के वोकिल फेर खड़ा होगे, कहिस "अरे तहूँ तो चाहत रहे एकर जिनगी मा कोनो होतिस जेन एकर धियान राखतिस। अब का तकलीफ हे? सूरदास ला भी वो सब खुशी पाय के अधिकार हे जेन समान्य आदमी ल है। भगवान सब के साथ न्याय करथे अउ दुख काकरो जीवन मा सदा के लिये नई रहे।"

वोकिल के बात तो ठीक हे फेर मोर उही भगवान ले अब अतकेच बिनती हे कि बिहाव करे हर सूरदास के दुख पाय के दूसर कारन झन हो जाय। बाकी मोला कोई तकलीफ नइये। मैं अपन संवेदनशीलता के उपयोग कहूँ अउ कर लेहूँ।


अब भी मोला सूरदास बाजार आवत अपन बाई संग दिख जाथे फेर अब अंतर अतके दिखथे कि अब सूरदास चुप, सुनत दिखथे अउ बाई बोलत, बहुत बोलत दिखथे। अब कोनो बताहू, दुख के कारन कहाँ हे?सूरदास मा, ओकर बाई मा, या फेर मोरे मा?

छत्तीसगढ़ी लोककथा कुकरी के लइका वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी लोककथा

कुकरी के लइका

वीरेन्द्र ‘सरल‘

हमर छत्तीससगढ़ म अनादि काल ले सवनाही बरोय के परम्परा चले आवत हे। सवनाही म कुकरी के अंडा नहीं ते चियां बरोय के नियम हावे। 

    एक समे के बात आय। सवनाही म कोन्हों गांव के सियान मन ला  कुकरी के अंडा य चिंया नइ मिलिन तब ओमन कुकरीच ला बरो दिन। कोनजनी भगवान के काय मरजी रिहिस कि ये बखत के कुकरी ह मरिस नहीं। कुकुर-माकर अउ कोलिहा ले अपन आप ल बचा डारिस  अउ गांव लें निर्जन जंगल कोती भागगे। कुकरी ह गाभिन घला रहय। 

        समय आइस तहन कुकरी ह चार ठन अंडा दिस अउ ओला सेंय लगिस। कुछेक दिन बीते ले चारो अंडा ल फोड़िस। चारो अंडा ले चार किसम के जीव निकलिस। एक अंडा ले बइला, दूसर ले बघनीन, तीसर ले राक्षसीन अउ चौथा ले मनखे। येमन ला देख के कुकरी बक खागे। फेर अपन कोख ले उपजाय जीव बर सब महतारी ल घातेच मया होथे। ओ कुकरी ह चारो झन ला अपन लइका समझ के उखर पालन-पोषण करे लगिस। अइसने-अइसने बहुत समय बीतगे। 

    कुकरी ह डोकरी होगे अउ लइका मन जवान। एक दिन कुकरी अपन चारो लइका मन ल समझवात किहिस-‘‘देखव बेटी-बेटा हो! अब मैंहा सियान हो गे हवं। तुम चारो झन मोरे कोख ले जन्में हव फेर चारो के रहनी-खानी अलग-अलग आय। बइला अव मनखे ह गांव-शहर के रहवइय्या जीव आय अउ बघनीन अउ राक्षसीन ह जंगल के जीव आय। तुमन आपस म एक दूसर के बोली-भाखा ला घला समझ लेथव। एके संग खेलत-खावत, छोटे ले बड़े होय हव। अब तुमन अपन-अपन रहिनी-खानी के ठउर म चल देव, फेर जिनगी भर मया के डोरी म बंधाय रहे के किरिया खा लेव। एक-दूसर के सुख-दुख के बेरा म सहयोग घला करहू अउ बने मजा ले अपन जिनगी जीहूं। अतका समूझा के कुकरी ह मरगे।

       सबो भई-बहिनी मिलके कुकरी के क्रियाकरम ला करिन। सब झन अपन कुकरी दाई के गोठ ला अपन हिरदे के अछरा म गठिया के राख लिन। अब मनखे अउ बइला ह गांव डहर आगे अउ बघनीन अउ राक्षसीन ह जंगल कोती चल दिस।

रेंगत-रेंगत बइला अउ मनखे ह जंगल ले बहुत दूरिहा कोन्हों गांव के तीर म पहुँचिस अउ थोकिन सुस्ताय बर एक पेड़ के छइहां म बइठगे। दूनो भाई आपस म गोठ बात करे लगिन। रद्दा म अवइय्या-जवइय्या मन बइला अउ मनखे ला बातचीत करत देख के अचरज म पड़ जाय। कोनहों ह पूछे तब मनखे ह बइला ल अपन सगे बड़े भैया आय कहिके बतावय।

    धीरे-धीरे ये बात ह ओ गांव के गौटिंया के कान म पहुँचिस। पेड़ के खाल्हें म गौटिंया के संगे-संग गांव भर के मनखे जुरियागे। कोन्हो ला ओ मनखे के बात उप्पर विश्वास नइ होवय तभो ले गौंटिया ह मनखे ला किहिस-‘‘अच्छा बात आय भाई! ये बइला ह तोर सगे भाई आय फेर तैंहा परदेशी मनखे न तो गांव में घर हे अउ न खार म खेत। तोर मन होही तब तैहा मोर घर नौकरी कर ले।

मनखे किहिस-‘‘मैंहा तो तोर बात ला मानहूँ फेर आपो मन ल मोर एक शर्त ला मानना पड़हीं। मोर बड़े भाई बइला ह जतका बेरा ले काम करे के मन होही वतकेच  बेर ले कमाही। उपरहा कमाही कहिके कोन्हों येला मारही-पीटही य डराही-धमकाही तब मैंहा तुरते नौकरी ला छोड़ दुहूं। येहा मोरे संग रही अउ येखरो खाय-पिये के चारा-पानी ला आप मन ला दे बर पड़ही।"

         गौटिया ह तैयार होगे। मनखे घला उखर घर नौेकर लगे बर तैयार होगे। अब ओमन गौटिया के घर चल दिन। पहिली दिन रहय, गौंटिया ह उखर मन केे बने आव-भगत करिस। बिहान दिन ले बइला अउ मनखे केे काम शुरू होगे। ओमन बहुत मिहनत करिन। उखरे मिहनत के परसादे गौंटिया के धन ह दिन दूनी रात चौगुणी बाढ़े लगिस अउ गौंटिया ह अतराप भर ले जादा मंडल होगे।

       धन बाढ़िस तहन गौंटिया के गरब घला बाढ़गे। अब ओहा मनखे अउ बइला ला दुख-दंड दे बर लगिस। दुनो झन ले कस के काम तो लेवय फेर खाय-पिये के जीनिस दे बर कंजूसी करय। एक दिन दुनो भाई मन म विचार करिन अउ ओ गौंटिया घर के नौकरी ला छोड़ दिन।

      नौकरी छोड़ के ओमन रेंगत-रेंगत एक अइसे राज म पहुँचगे जिहां के राजकुूमारी ह परण करे रहय कि जउन मनखे ह माड़ी भर चिखला म रेंग के आही अउ एक कोसा पानी भर में अपन गोड़ के चिखला ला खलखल ले धो डारही तेखरे संग मैंहा बिहाव करहूँ। ये परण के सेती राजकुमारी के उमर बाढ़गे रिहिस। राजा गजब चिन्तित रहय।

   राजकुमारी के परण ला सुनके मनखे अपन भाई बइला ला पुछिस-‘‘भैया माड़ी भर सनाय चिखला ला एक कोसा पानी म कइसे धोय जा सेकथे?

 मन के  बात गड़रिया जाने सही बइला किहिस-‘‘राजकुमारी संग बिहाव करे के सउख हे तब सुन, माड़ी भर चिखला म रेंग के जा। कुछ समे सुस्ताय के समे मांग, पहिली ले एक ठन पत्ती बरोबर पातर लिकड़ी काड़ी ला राखे रह। चिखला सुखाही तहन सब ल रमंज के निकाल दे। अउ बांचे-खोंचे ला पातर लिकड़ी म रखोड़ दे तहन कोसा भर पानी ला तेल असन चुपड़ के धो डार। येमें कोन बड़े बात आय।"

         मनखे ह राजा के दरबार म जा के राजकुमारी के शर्त ला पूरा करे केे दावा कर दिस। बिहान दिन ओ मनखे के परीक्षा ले गिस। बइला के बताय अक्कल मुताबिक मनखे ह शर्त ला जीत डारिस अउ राजकुमारी संग ओखर बिहाव घला होगे। मनखे ह अपन सुआरी ला समझादिस, ये बइला नोहे मोर सगे बड़े भाई आय। जतका जेठ ला आदर सत्कार दे जाथे वतेकच आदर सत्कार येला देना हे। सुआरी घला अपन गोसान के बात ला गठिया के राख लिस। 

       अब राजकुमारी ह बइला ल अपन जेठ समझे अउ बइला ह राजकुमारी ल अपन भाई बहू। ओमन अब दु ले तीन होगे रिहिन। अउ ओ राज ले दूरिहा निकल के दूसर राज म एक गौटिया के घर नौेकर लगगे।

              गौटिया ह रोजी-पानी तो बने देवय फेर रिहिस नीयतखोर। ओखर नीयत ह राजकुमारी बर गड़गे। ओहा मने-मन सोचय, ये बइला चरवाहा संग अतेेक सुन्दर राजकुमारी ह नइ फबय। येला तो मोर अंगना के शोभा होना चाही, मोर सुआरी बनना चाही। मोर गौटनीन तो एखर एड़ी के धोवन के पुरतन घला नइहे। 

       ओहा राजकुमारी ला किसम-किसम के लालच दे के अपन सुवारी बनाय बर उदिम करय। फेर राजकुमारी ह पतिव्रता नारी रहय बपरी ह। ओखर लालच म आना तो छोड़ ओखर कोती ला हिरख के घला नइ देखय।

अब गौटिया ह ओला पाय बर छल के सहारा ले के विचार करिस अउ ओखर गोसान ला जान सहित मरवाय के उपाय सोचे लगिस। 

     ओहा अपन भेदिया संगवारी ला एकर उपाय पूछिस। भेदिया ह किहिस-‘‘ गौटिया ओहा तो आपके नौकर आय। ओला अइसन बुता तियारो जेमे मरेच के बुता रहय। बुता काम करत-करत कहूं मर जही तब कोन्हों आपके उपर शक घला नइ करय। मने सांप घला मर जही अउ लउठी घला नइ टूटे। " भेदिया ह गौटिया के कान म फुसुर-फुसुर उपाय बताय लगिस।

      बिहान दिन गौटिया ह अपन ओ नौकर ला बला के कहिस-‘‘ मोर गौंटनीन के आँखी आय हे। बैद्य ह कहे हे कि गौटनीन के आँखी म राक्षसीन के दूध ला लगाय बिना ओहा ठीक होबे नइ करय। जा रे भई! तैहा कइसनो करके राक्षसीन के दूध के बेवस्था कर तब बनही। मोर गौटनीन के आंखी के सवाल हे। कहूँ अंधरी-कानी झन हो जाय रे ददा।‘‘

     नौकर के मन निचट उदास होगे। ओहा घर आइस अउ बिना खाय-पिये कलेचुप सुतगे। 

      अपन भाई के दशा देख के बइला ला चिन्ता होगे। ओहा पूछिस-‘‘काय बात आय भाई। आज तैहा निचट मनटूटहा दिखत हस।‘‘ 

      नौकर ह सबो बात ला अपन बड़े भाई बइला ला बता दिस। तब बइला किहिस-‘‘ अरे निचट लेड़गा अस रे भाई। येमे कौन बड़े बात आय। भुलागेस ननपन के बात ला। आखिर हमर बहिनी राक्षसीन ह कब काम आही?"

      नौकर ह बिहान दिन जंगल चल दिस अउ घनघोर जंगल म पहुंच के अपन बहिनी ला गोहारे लगिस। जंगल म चिरई चांव करे न कौआ कांव। मनखे के गोहार सुन के कोन जनी कोन डहर ले राक्षस के दु झन पिला मन निकलगे अउ मनखे ला खाबो कहिके ओखरे डहर दौड़े लगिस। मनखे डर्रागे। ओहा तुरते हाथ जोड़ के पांव परत हवं भांचा, पांव परत हवं कहिके चिचिया लगिस। येला सुनके राक्षस के पिला मन सोचे लगिन येतो हमन ला भांचा कहत हे मतलब ये हमर ममा आय। लइका मन ओला मार के खाय के विचार ला छोड़ दिन अउ अपन घर म लेगके ओखर सुवागत-सत्कार करे लगिन।

      थोड़िकेच बेर म राक्षसीन घला पहुँचगे। मनखे तुरते ओखर पांव म घोलंड के पांव परत हवं दीदी कहिस अउ अपन कुकरी दाई के सुरता कराइस। राक्षसीन अपन भाई ला देख के गदगद होगे। दुनो भाई-बहिनी एक-दूसर के हालचाल जानिन। सुख-दुख के गोठ गोठियाइन। मनखे अपन इहां जंगल म आय के कारण ला बता दिस।

    बिहान दिन राक्षसीन ह किहिस-‘‘ भैया। गजब दिन होगे ननपन के बिछड़े बड़े भैया संग घला भेट नइ होय हे। तोर संग म महुं जाके बड़े भाई के दर्शन कर लेतेंव अउ उहींचे गौटिया के आघू म दूध निकाल के दे देतेंव।"

         मनखे कहिस-‘‘ये तो अड़बड़ खुशी के बात आय दीदी! चल न भांचा मन ला घला ले जथन।‘‘ 

     राक्षसीन ह अपन दुनो झन पिला मन ला लेके अपन मनखे भाई संग ओखर गांव डहर रेंगे लगिस। जब ओमन गांव तीर म पहुँचिन तब राक्षसीन अउ ओखर पिला मन ला देख के गांव वाले मन डर के मारे थर-थर कांपे लगिन। ये बात ला सुन के तो गोटिया-गौटिनीन अउ ओखर भेदिया के जीव सन्न होगे। ओमन अपन पराण बंचाय के उपाय सोचे लगिन। गौटियां ह डर के मारे गांव के सियान मन संग  गांव के सियार म पहुँचके मनखे अउ राक्षसीन के पांव म गिरगे अउ किहिस-‘‘अब मय कभू तोर भाई ला कोन्हों किसम के खतरा वाले काम नइ तियारंव। एक बेर मोला माफी दे देव बहिनी। तुम अपन बसेरा म लहुट जाव।‘‘ 

       राक्षसीन मने मन मुस्काइस अउ मनखे संग ओखर घर आके अपन बड़े भाई बइला संग भेट करिस। सुख-दुख के गोठ गोठियास अउ चार पहर रात ला बिताके अपन बसेरा कोती लहुटगे। राक्षसीन अउ ओखर पिला मन अपन घर डहर लहुटिन तभेच गौटिया अउ गांव वाले मन के जीव हाय लागिस।

      कुछेक दिन बीतिस तहन भेदिया ह गौटिया ला फेर मनखे ला मारे के उपाय बताइस। अब गौटिया ह अपन नौकर मनखेेेे ला किहिस-‘‘ ये पइत वैद्य ह बघनीन के दांत मंगाय हे।‘‘

    मनखे फेर संशो म पड़गे तब बइला ह समझाइस-" अरे भकला ! फेर तोर सुरता भुलागे। जंगल म तो हमर छोटे बहिनी बघनीन रहिथे। तैहा जा अउ अपन समस्या ला बता। बघनीन बहिनी घला राक्षसीन दीदी असन भांचा मन ला धरके गांव म आही तब ये गौटियां ला पता चलही। हमर परिवार कइसन हे?"

         मनखे ह फेर बिहान दिन घनघोर जंगल म जाके बघनीन दीदी, बघनीन दीदी कहिके गोहार पारे लगिस। बिहनिया के गोहारत जब संझा होगे तब एक गुफा के भीतरी ल बधनीन निकल के मनखे ला गुर्री-गुर्री देखे लगिस। मनखे तुरते बधनीन के पांव म गिरके पायलगी करिस अउ बचपन के गोठ ला गोठियाय लगिस। बघनीन ला घला अपन कुकरी दाई के कहे गोठ के सुरता आगे। ओहा मनखे ला अशिष दिस अउ घनघोर जंगल म आय के कारण पूछिस। 

        मनखे ह सब बात ला साफ-साफ बतादिस। बघनीन गुर्रावत किहिस-‘‘ अच्छा, तब तोर गौटिया ला मोर दाँत चाही। चल भैया मैहा अपन पिला मन संग तोर गांव जाहूँ अउ ओ रोगहा गौटियां के आघू म खडे होके कहूं चल कतना दांत चाही तोड़ ले।‘‘ 

      बघनीन अपन पिला मन संग मनखे के संगे-संग रेंगे लगिस। रात भर रेंगिन तब बिहनिया होवत मनखे के गांव पहुँचिन। गांव वाला मन बघनीन अउ ओखर पिला मन ला देखिन तब ठाड़ सुखागे। डर के मारे  घर के कपाट-बेड़ी ला लगाके सब अपन-अपन घर म खुसरगे। गौटिया अउ ओखर भेदिया ला पता चलिस तब तो ओमन डर के मारे थर-थर कांपे लगिन। मनखे जब बघनीन के संग गौटिया के घर के मोहाटी म पहुँचिस तब गौटियां ह घर के भीतरेच ले चिल्ला-चिल्ला के माफी मांगे लगिस अउ बघनीन ला जंगल म लहुटे के अर्जी-विनती करे लगिस।

   बघनीन अउ मनखे एक-दूसर ल देख के मुस्काइन अउ लहुटके मनखे के घर आगे। बड़े भइया बइला के पांव पल्लगी करिस। सुख दुख गोठियाइन अउ संझाती जंगल कोती लहुटगे।

     अब मनखे अउ गौटिया के दुश्मनी ह अउ जादा बाढ़गे। गौटिया ह पहिली ये पता लगवाइस कि मनखे ल अतेक अक्कल कोन बताथे। तब ओला पता चलिस कि ये सब अक्कल ल ओखर बड़े भाई बइला ह देथे। अब  गौटिया ह सोचे लगिस , जब तक बइला नइ मरही तब तक मनखे ला मारना सम्भव नइ हे। ओहा अब पहिली बइला ला मरवाय के उदिम सोचे लगिस। गौटिया अपन भेदिया ला बला के पूछिस, बइला ला मरवाय के कहीं उदिम सोच। 

     भेदिया किहिस-‘‘ ये मे कोन बड़े बात आय गौटिया। तोर जब्बर गोल्लर संग ओखर लड़ई के मुकाबला करवा देथन। तोर गोल्लर ह बइला ला मार के जीत जही। कोन्हों ला तोर चाल के पता तक नइ लगही । सब झन इही सोचही कि खेल म जीत-हार तो लगेच रहिथे। गौटिया ल भेदिया के बात पसंद आइस।

        ओहा बिहान दिन अपन नौकर मनखे के घर जाके किहिस-‘‘ सुने हव तोर भाई बइला ह गजब बलवान हे। काली पोरा के तिहार घला हे। तोर भाई संग मोर गोल्लर के लड़ई बजवा के देख लेथन । तोर भाई कहूँ जीत जही तब मैंहा तोला थारी भर सोन के मोहर इनाम म देहूँ।"

                मनखे ह गौटिया के चाल ल समझगे अउ किहिस-‘‘भाई ! येला मैं अक्केला कइसे बता सकथंव। पहिली बड़े भैया ल पूछ लेथंव। ओखर सहमति होही तभे ये मुकाबला हो सकथे।"

गौटिया  ह फेर एक थारी सोन के मोहर के लालच देके कहिस-‘‘ बने सोच-समझ ले । अपन भाई ला घला पूछ ले अइसन मउका घेरी-बेरी नइ आवय।" अतका कहिके गौटिया ह अपन नौकर के घर ले निकलगे।

       मनख अब निचट मनटूटहा होगे। बइला ह अपन भाई ल निच्चट मनटूटहा देखके पूछिस-‘‘ तब ओहा सबो बात ला ओला सफा-सफा बता दिस अउ गोहार पार के रोय लगिस।"

  बइला किहिस- "देख भाई! अब रोय ले काम नइ चलय। ये संसार म जउन भी जनम लेथे सब ला एक दिन मरना पड़थे। अब मोर ये संसार ले बिदा होय के पारी आगे तइसे लागथे। भगवान के इही मर्जी हे। तब तै काय कर सकथस अउ मै काय कर सकहूँ। फेर तैहा थोड़को संशो-फिकर झन कर। मरे के पाछू घला मोर आत्मा तोर मदद करत रही। कोन्हों तोर बाल-बांका नइ कर सकय।"     अब तैहा मोर बात ल बने चेत लगा के सुन-‘‘ लड़ई म जब मोर पराण छूट जही तब तैहा मोर दुनो आंखी, मोर पूंछ अउ आघू के दुनो गोड़ ल काट के रख् लेबे।"

       पोरा के दिन गौटिया के गोल्लर अउ मनखे के बइला के लड़ई के ढिढोरा सुन के अतराप भर के मनखे लड़ई के मैदान म सकलागे। बइला अउ गोल्लर ल मैदान म उतारे गिस। बइला ह चारों मुड़ा किंजर-किंजर के सब सकलाय मनखे मन ला देखिस, अपन भई मनखे ला नजर भर के देखिस अउ हरि नाम के समिरन करत गोल्लर संग भिड़गे। कभु गोल्लर पटकाय अउ कभु बइला। अइसने-अइसने उवत के लड़ई ह बुड़त ले चलगे। आखिरी म बइला ह अइसे पटकाइस कि उठबे नइ करिस। ओखर पराण छुटगे रहिस।

    लड़ई देख के सब मनखे अपन -अपन घर चल दिन। जीते के खुशी के मारे गौटिया ह अपन गोल्लर ला फूल -माला पहिरा के गांव भर किंजारिस अउ अपन घर आगे।

 ओती लड़ई के सुन्ना मैदान म मनखे ह अपन भाई बइला के लाश ला पोटार के गोहार पार के -पार के रोय लगिस। आज ओहा निच्चट अनाथ होगे रहिस। बइला के रहत ले ओला कभु अपन दाई-ददा के सुरता नइ आय रिहिस फेर आज ओहा अपन आप ला मुरहा समझे लगिस। 

      ओहा रोवत-रोवत घर आय बार लहुटे लगिस तभे ओला अपन भाई बइला के कहे बात ह सुरता आगे। ओहा तुरते मरे बइला के दुनो आंखी, पूंछ अउ आघू के गोड़ ला काट के रख लिस अउ बइला के किरियाकरम करके आँसू ढारत घर आगे। घर पहुँचके मनखे ह बइला के दुनो आंखी, पूंछ अउ गोड़ ला अपन पूजा-कुरिया म रख दिस।

             अब मनखे ह रोज बिहिनया उठ के स्नान ध्यान करके पहिली ओखर पूजा करय तभे अपन काम-बुता ला शुरू करय। अइसने-अइसने गजब दिन बीतगे।

    अब येती गौटिया ह सोचे लगिस मोर रद्दा के जब्बर कांटा बइला तो मरगे। अब मनखे ला कोन अक्कल बताही। अब तो मैहा ओखर घरवाली ला अपन घरवाली बना के रहूँ। एक दिन गौटिया ह मौका देख के सोवा पड़ती सुनसनहा रतिहा अपन गुंडा-बदमाश मन ला हाथ हथियार धराके मनखे के घरवाली के अपहरण करे बर भेजिस।

          गुंडा बदमाश मन मनखे के हाथ-पांव ला बांध के ओखर सुवारी ला लेगे लगिन। ओ बेरा मनखे के सहायता करे बर कोनहो नइ रिहिन। मनखे ला अपन भाई के कहे बात ह सुरता आगे। ओहा अपन भाई बइला ला सुमरत किहिस-‘‘ अब तो मोर घर के मान-मर्यादा के रक्षा बस तिही कर सकत हस भैया।"

    मनखे के बस अतका कहना रिहिस कि बइला के पूंछ ह डोर बनके गौटिया सहित ओखर सब गंडा बदमाश मन ल कसके बांध दिस अउ ओखर गोड़ ह ठेंगा बनके सब के धुनई शुरू कर दिस। मार के मारे सब झन हाय-हाय कहिके दंदरत रहय अउ बचाव-बचाव के गोहार पारत रहय अउ बइला के दुनो आंखी ह भांवा मांछी बनके सब ला खखोल-खखोल के चाबे लगिस। 

        गौटियां अउ ओखर गुंडा-बदमाश मन के आंखी- कान फूलगे। डर के मारे ओमन सबके सब पल्ला भागिन।

 कइसनो करके दुख के कारी रतिहा बीतगे। बिहिनया जब गांव वाले मन गोहार ला सुनिन तब सब मनखे के घर सकलाइन अउ जब ओमन ल गौटियां के करनी के पता चलिन तब सब खखार-खखार के ओखर मुहूं म थूके लगिन।

     गांव म कटाकट बइठका होइस अउ गांव भर के मनखे मन गौटिया ले मनमाने डाड़  - बोड़ी ले के ओखर बहिस्कार कर दिन। सब झन मनखे बर सोग मरत अपन गांव म रहे के अउ सुख -दुख म काम आय के वचन दिन फेर मनखे ह अब ओ गांव ला छोड़ना उचित समझके उहां ले अपन सुवारी सहित निकलगे। मोर कहानी पुरगे, दार भात चुरगे।

वीरेन्द्र सरल

बोड़रा , मगरलोड

जुला-धमतरी , छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ी हास्य लोक कथा भाँचा के चतुराई अउ ममा के करलाई वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी हास्य लोक कथा

भाँचा के चतुराई अउ ममा के करलाई

वीरेन्द्र ‘सरल‘

एक गाँव म एक झन लेड़गा रहय। लेड़गा निचट गरीब रहय। लेड़गा जवान होगे रिहिस फेर कभु अपन ममा घर ला नइ देखे रिहिस। एक दिन लेड़गा अपन दाई ला किहिस-‘‘दाई! मोर संगी-जहुंरिया मन सब अपन ममा घर के गोठ गोठियाथे फेर मय ह आज ले अपन ममा घर ला नइ देखे हवं। सुने हवं ओमन अड़बड़ मंडल हे।‘‘ 

           दाई किहिस-‘‘हव बेटा, सिरतोन बात आय। फेर मंडल म गरीब मनखे ला कहाँ चिन्हथे? तैहा जिद करथस तब काली चल देबे।‘‘

              बिहान दिन लेड़गा अपन ममा गांव जाय बर निकलगे। बिहनिया के रेंगत-रेंगत लेड़गा ह संझाती अपन ममा गाँव पहुँचिस। 

     ममा-मामी मन लेड़गा के जादा स्वागत-सतकार नइ करिन। फेर गरीबी के सेती  लेड़गा ह गजब दिन ले उहींचे रतियागे। बहुत दिन बाद जब ओला अपन दाई के सुरता आइस तब ओहा उहां ले घर जाय के मन करिस अउ अपन मन के बात ला ममा-मामी मन ला बताइस।

           लोकलाज के डर म बडे ममा किहिस-‘‘जाय बर तो जाबे भांचा फेर दीदी ह तोर ममा घर ले काय लाने हस कही तब काला बताबे? मोर बात मानथस ते हमर घर ले एक ठन भंइसी ला ले जा।"

      लेड़गा ह बने गाभिन भइंसी मिलही कहिके खुश होगे। फेर ओखर ममा ह ओला एक ठन मरही-खुरही बुड़गी भंइसी ला धरा दिस।

लेड़गा भंइसी ला धर के घर लानत रहय फेर भंइसी ह तो रस्ताच म मरगे। लेड़गा ह ओला माटी दे के उही मेरन बइठगे अउ सोचे लगिस दाई ह पुछही तब काय बताहुँ। थोड़िक देर म एक झन मोची ह आके मरे भंइस के खाल ला उतारे लगिस। लेड़गा ह मोहो के मारे मरे भइंस के आधा खाल ल मोची ला जिद करके मांग डारिस अउ ओला धरके घर आगे।

                घर म ओला देख के ओखर दाई ह अड़बड़ गारी-बखाना दिस अउ रिस म कहि दिस जा येला बेच के  मिले पइसा म जहर -महुरा खा के मर जा। 

       लेड़गा ह दाई के बात ला सिरतोन समझगे अउ गली -गली  भंइस के खाल ले लेव कहिके गोहार पारे लगिस। अब कोन ह भंइस के खाल ल लिही। सब झन लेड़गा ला मार गारी देके भगा देवय।

   लेड़गा भारी मुसीबत म फंसगे अब जाय ते जाय कहां घर म जाहूँ तब दाई गारी दिही अउ बेचहुं कहिथव तब पारा-मोहल्ला के मनखे मन गारी देथे।

     थक हार के लेड़गा ह अपन गाँव ले बाहिर खेतखार डहर आगे। अउ बघुवा-चितवा के डर म रात बिताय बर तरिया पार के एक जब्बर पीपर पेड़ म चढ़गे।

      अधरतिहा होइस तहन कोन जनी कहाँ ले चार झन चोर मन चोरी के माल धरके उही पेड़ के खाल्हे म सकलाइन अउ अपन माल के बटवारा करे लगिन। उखर गोठ-बात ला सुन के लेड़गा डर्रागे अउ डर के मारे ओखर हाथ ले भंइसा के खाल ह छूटगे। 

         खाल ह जझरंग ले उही चोरहा मन उपर गिरगे। चोरहा मन पेड़ म कोन्हो भूत-प्रेत हे कहि के डर के मारे चोरी के माल ला उही मेर छोड़ के भाग गे।

      जब रतिहा पोहाइस। अगास म सुकवा उइस अउ बेरा पंगपगाय लगिस तब लेड़गा आधा-डर, आधा बल करके पेड़ ले खाल्हे उतरिस अउ भइस के खाल ला टार के देखिस तब ओ मेरन सोन के अड़बड अकन मोहर, सोना-चांदी , हीरा- मोती पड़े रहय। लेड़गा ह सब ला सकेल के मोटरा डारिस अउ मुड़ म बोही के मुंढरहा ले अपन घर आगे।

    लेड़गा के दाई ह पूछिस तब कहिस-‘‘ भंइस के खाल ह बड़ मंहगी म बेचाय हे ये सब ओखरे कीम्मत आय।"   बिहान दिन लेड़गा अपन दाई ला अपन ममा घर भेज के उहीं ले एक ठन काठा मंगवाइस अउ नाप के एक काठा सोन के मोहर अपन ममा घर भेज दिस।

    ममा मन काठा भर सोन के मोहर ला देख के पूछिन तब डोकरी किहिस-‘‘ तुमन जउन भंइस दे रहेव उही भइंस के मरे के बाद येहा ओखर खाल के कीम्मत आय।"   ममा मन सोचिन-‘‘अरे! बुड़गी भइंसी के खाल के अतेक कीम्मत हे तब हमर घर तो सौ ठन भंइस हे, सब ला मार के उंखर खाल ला बेचबे तब तो हमन मालामाल हो जबो।

      डोकरी ह अपन घर लहुटिस तहन सब ममा मन मिलके अपन घर के सबो भंइसी ला मार डारिन अउ उंखर खाल ल निकाल के अपन गाड़ा म जोर के भइंस के खाल ले लेव कहिके चिचियाये लगिन।

  जउन सुने तउने ओमन ला मारे अउ गारी देवत भगा देवय। ममा मन ला अतका मार परिन कि ओमन मार के मारे ददंरगे अउ आखिर म सबो खाल ल गांव के बाहिर फेक के अपन घर लहुटिन।

  उखर घरवाली मन घर के गाय-भंइस के बारे म पूछिन तब ओमन सबो किस्सा ला सफा-सफा बता दिन। घर के मनखे मन घला अड़बड़ गारी बखाना दिन फेर काय करय गलती तो करे रहय सब के मार गारी खा के कले चुप रहे रिहिन।

    ममा मन सबो भाई सोचे लगिन ये लेड़गा भांचा के चक्कर म हमन अपन गाय-भंइस ला मार डारेन। अब येखर बदला चुकाय बर लेड़गा के घर ला आगी लगा देथन। दुनो महतारी बेटा भुंजा के मर जही तहन उंखर सबो चीज बस हमर हो जही।

   ओमन बिहान दिन अधरतिहा लेड़गा के घर ला आगी लगाय बर तियारी के संग पहुँचगे अउ सुनसनहा देख के आगी लगा के भागगे।

   येती उही बेरा लेड़गा अउ ओखर दाई के नींद उमंचगे। ओमन गोहार पारिन तहन गांव वाले मन सकलाके सब कोई मिल-जुल के उंखर चीज बस ला बाहिर निकालिन। लेड़गा अउ दाई के जीव तो बांचगे फेर उंखर घर ह जर बर के राख होगे। लेड़गा के दाई ह आगी लगाइय्या मन ला सरापा-बखाना देवत मुड़ धरके रोय लगिस। 

      तब लेड़गा ह समझवात किहिस-‘‘झन रो दाई! घुरवा के दिन बहुरथे कहिथे। जउन मन आगी लगाय हे एक दिन उंखरो घर ह जर बर के राख होही अउ हमर करम म रही  तो हमर ये जरहा घर ह महल-अटारी बन जही।"

      बिहान दिन लेड़गा ह अपन जरे घर के सब राख ला सकेल के बोरा म भर लिस अउ गांव-गांव किंजर के जरे घर के राख ले लेव कहिके गोहार पारे लगिस। गोहार ला सुनके सब झन ओला जकहा-भूतहा समझे अउ  गारी-बखाना देवय।

    कोन्हों लेवाल नइ मिलिस तब फेकहूं कहिके लेड़गा ह बोरा के राख ला घुरवा डहर लेगत रहिस। तब उही रस्ता म पता नहीं कोन राज के राजा-रानी मन भेष बदल के किंजरे बर निकले रहय अउ उखर रथ के चक्का ह बिगड़गे रहय। राजा-रानी मन ओला बनावत-बनावत थकगे रहय।

  राजा-रानी मन लेड़गा ला देख के सहायता मांगत किहिन-‘‘भैया! तैहा तोर बइला गाड़ी म हमन ला हमर राज म पहुँचा दे। हमर पाछू आके अपन रथ ला बना के लेगत रहिबो।"

    लेड़गा किहस-‘‘ले गे बर तो लेग दुहूँ फेर मोर गाड़ा म जोराय बोरा मन म सोन-चांदी, हीरा-मोती भराय हे। मोर गाड़ा म बइठहु तब तुमन ला जम्हई नइ लेना हे। मोला मोर गुरू महराज ह कहे हे कि तोर गाड़ा म बइठके कोन्हों ह जम्हाही, तब बोरा म भराय सोन -चांदी मन सब राख हो जही।"

  राजा-रानी मन बोरा म काय भरय हे तउन ला देखबे नइ करिन। जल्दी घर पहुँचे के हड़बड़ी म लेड़गा के शर्त ला मान के गाड़ा म बइठ गे अउ लेड़गा ह राजा के बताय रस्ता म गाड़ा खेदे लगिस। 

     संझाती के गाड़ा चलत-चलत रात पोहागे। बेर उगे अउ मंझनिया घला होगे। रात भर के उसनिंधा म राजा-रानी ल जम्हाई आगे। 

      लेड़गा गाड़ा ले उतर के रिसागे अउ किहिस-‘‘मय ह समझाय रहेंव तभो ले तुमन मोर बात ला नइ मानेव अब मोरा बोरा म भराय सबो सोन-चांदी मन राख होगे। तुंहर मन के सेती मय ह कंगला होंगेव।"

   लेड़गा के बात ला सुन के राजा-रानी मन सकपकागे। राजा ह एक ठन बोरा के मुहड़ा ला खोल के देखिस। सिरतोन म ओ बोरा म राख रहय। 

        राजा ह लेड़गा के चाल ला समझ नइ पाइस अउ ओखर बात ला सिरतोन समझ के किहिस-‘‘ मैंहा ये राज  के राजा अवं। मोर राजधानी के राजमहल म चल मैं तोरा  सबो बोरा के राख के बदला सब बोरा म सोन के मोहर भर के दुहूं। तैहा विपत्ति के बेरा म मोर संग दे हे हस।‘‘

          लेड़गा मने - मन खुश होइस अउ बनें एक मन के आगर गाड़ा ला खेदे लगिस। 

        संझाती लेड़गा ह राज-रानी के संग म उखर राज महल म पहुँचगे। राज करमचारी मन लेड़गा के अड़बड़ स्वागत-सत्कार करिन। अउ बिहान दिन राजा ह लेड़गा के सबो बोरा के राख ला फेंकवा के ओमे सोन के मोहर भरवा के ओखर गाड़ा म जोरवादिस।

   लेड़गा भारी खुश होके अपन घर पहुँचिस। ओखर दाई ह पुछिस तब लेड़गा ह किहिस-‘‘ दाई! ये सबो ह हमर जरे घर के राख के कीम्मत आय। जा, ममा घर जाके सबो किस्सा ल बताबे अउ काठा मांग के लानबे।"

    डोकरी ह काठा मांग के ले आनिस। लेड़गा ह ओमे एक काठा सोन के मोहर भर के पहुँचाय बर किहिस। डोकरी ह एक काठा सोन के मोहर ला अपन मइके म छोड़ के आगे।

    येती लेड़गा के ममा मन सोचे लगिन। लेड़गा के नानकुन झोपड़ी ल हमन आगी लगाय रहेन अउ उही झोपड़ी के राख के कीम्मत ह दस बोरा सोन के मोहर मिलगे। तब हमर घर कुरिया ह तो बड़े जान बाड़ा आय, ये ला आगी फूंक के एखर राख ला बेचबो तब तो सौ बोरा ले जादा सोन के मोहर मिलही।

   ममा मन अपन मन के बात ला अपन घरवाली मन ला बताइन। सब झन ओमन लेड़गा के देखी - सीखा अइसन काम करे बर मना करिन फेर ओमन मानबे नइ करिन अउ अपने मन खुदे अपन घर ला आगी लगा दिन। घर ह जर-बर के राख होगे।

      बिहान दिन उहू मन सब राख ला सकेल के बोरा म भरिन अउ गाड़ा म जोर के गली-गली राख ले लेव राख कहिके गोहार पारे लगिन। बिहनिया के चिचियात-’चिचियात संझा होगे फेर उखर राख ल कोन्हो ले बर तियार नइ होइन। जिही सुने उही ओमन ला गारी-बखाना देवय अउ मारपीट के भगा देवय।

   जब कोन्हो लेवाल नइ मिलिस तब ओमन आखिर म थक - हार के  सब राख ला फोकट म कुम्हार घर दे के आगे अउ मुड़ धर के रोय लगिन फेर अब पछताये ले काय होही। इही ला कहिथे, देखी-सीखा लागे बाय, चुम-चांट के सबो जाय।

  देखथे-देखथ झोपड़ी म रहवइय्या लेड़गा ह मंडल होगे अउ महल म रहवइय्या ओखर ममा मन कंगला हो के झोपड़ी म रहे लगिस। इही ला कहिथे, रोगहा ला छोड़ के बनाय रोगही, तोर करम के भोग ला कोन भोगही। अउ पर बर खांचा खने अपने झपाय।

  मोर कहिनी पुरगे, दार भत

वीरेन्द्र सरल

छत्तीसगढ़ी लोक कथा करम के नांगर ल भूत जोंतय वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी लोक कथा

करम के नांगर ल भूत जोंतय

वीरेन्द्र ‘सरल‘

  एक गांव म एक झ लेड़गा रहय। काम बुता कुछ नइ करय। ओखर दाई ओला अड़बड़ खिसयावय। लेड़गा के दाई जब सियान होगे अउ लेड़गा जवान, तब रिस के मारे डोकरी ओला अड़बड़ गारी-बखाना दिस।

     लेड़गा हाथ जोड़के किहिस-‘‘ले दाई अब जादा झन खिसया। काली ले महुं कुछु बुता - काम करके चार पैसा कमा के तोर हाथ में दुहूं।"

 डोकरी खुश होगे अउ बिहान दिन आज मोर बेटा ह कमाय बर जाही कहिके लेड़गा बर सात ठन मुठिया रोटी रांध के मोटरी म जोर दिस। 

      लेड़गा रोटी  ल धरके कमाय बर जावत हवं कहिके घर ले निकल गे। फेर जनम के अलाल अउ कोढ़िया, कहीं काम - बूता ला तो जानय तको नहीं। ओखर आदत- बेवहार ला जान के कोन्हों ओला अपन संग काम म लेगबे नइ करिन। लेड़गा के मन म दाई के डर समागे। ओहा दूसर गांव डहर रेगें लगिस अउ उहां के खार के एक  तरिया पार म पीपर रूख के छइहां म बइठगे।

     मंझनिया के बेरा रहय। निचट सुनसान। न चिरई-चींव करे न कौआ कांव। लेड़गा ल  भूख लागिस तब ओहा दाई के जोरे मोटरी के रोटी ला निकालिस अउ लालच के मारे रोटी ल गिन-गिन के चिचिया के कहय-‘‘एक ला खांव के कि सातो ल खांव। एक ला खांव कि सातो ल खांव। एक ला ----।‘‘

             लेड़गा ह जउन पीपर के छइहां म बइठे रहय। ओमें सतबहिनी रहय। लेड़गा के गोठ ला सुनके सतबहिनी मन डर्रागे। ओमन लेड़गा ला कोनहो बइगा-गुनिया समझिन। 

      एक झन सत बहिनी ह परगट होके किहिस-‘‘कस भैया! हमन तोर काय बिगाड़े हन जउन तुमन घेर-बेरी एक ला खावं कि सातो ला खांव कहत हव। हमन ला झन खा भैया, ये दे मैं तुमा देवत हवं तेला रख ले। ये में हीरा- मोती , पन्ना-पुखराज, सोना-चाँदी के दाना भराय हे। येला ले जा, तोर सबो गरीबी ह दूरिहा जाही अउ तैहा मंडल हो जबे।‘‘

    लेड़गा ह तुमा ला धर के अपन गांव डहर रेंगिस। अउ खुशी के मारे सबले पहिली अपन मितान घर जाके सतबहिनी मन के कहे बात ला बता दिस। 

                ओखर मितान-मितानिन मन लालच म आगे। सतबहिनी मन के दे तुमा ला लुकादिन अउ दूसरा तुमा ला लेड़गा के आघू म काट के देखावत किहिन-‘‘ ‘‘देखे, ये मे तो कुछ नइ हे। सतबहिनी मन तोला ठग दिन, समझे?‘‘     लेड़गा सतबहिनी मन ला गारी देवत अपन घर पहुंचिस।      लेड़गा के जाय के बाद ओखर मितान-मितानिन मन तुमा ला काट के देखिन तब बक खागे। सिरतोन म ओमे हीरा-मोती, पन्ना-पुखराज, सोना-चांदी के दाना भराय रहय।

          येती लेड़गा फेर बिहान दिन अपन दाई ला सात ठन मुठिया बनाय बर किहिस अउ ओला धरके सोझे उही तरिया पार के पीपर पेड़ के छइंहा म जाके बइठगे। अउ एक ला खांव कि सबो ला खांव कहिके के चिचियाय लगिस।

                फेर एक झन सतबहिनी ह परगट होके पुछिस-‘‘अब काय होगे। काली तुमा दे रहेन तेहा कहां हे?‘‘ 

     लेड़गा अपन मितान घर के सब बात ला सफा-सफा बता दिस। ये बखत ओ सतबहिनी ह लेड़गा ला एक ठन बोकरा देवत किहिस-‘‘ ये दे येला ले जा।  ये बोकरा ला गुदगुदाबे तहन बोकरा ह सोने-सोन के मोहर ला उछरही। सब ला सकेल ले बे तहन तोर गरीबी दूर हो जही।‘‘

    लेड़गा ह बोकरा ला धर के अपन घर आवत रिहिस। ये बखत ओखर मितान ह पहिलीच ले  लेड़गा के अगोरा करत अपन घर के मोहाटी  म खड़े रहय। लेड़गा ला बोकरा धर के आवत देख के ओहा खुश होके जय-जोहार करिस अउ लेड़गा ला अपन घर ले आनिस।

        मितान जान के लेड़गा ह सब बात ला बता दिस। मितान ह लेड़गा ल चाहा गुड़ लाने बर दुकान भेज दिस अउ सतबिहनी मन के दे बोकरा ला लुका के वइसनेच दूसरा बोकरा ल ला के बांध दिस। 

              लेड़गा दुकान ले लहुटिस। तहन बोकरा ला गुदगुदाय। अब नकली बोकरा ह कहाँ ले सोन के मोहर उछरय।

     "मितान किहिस-‘‘सतबहिनी मन फेर तोला ठग दिन।‘‘

 अब लेड़गा के जीव बगियागे। एड़ी के रिस तरवा म चढ़गें। ओहा सतबहिनी मन ला गारी देवत बिहान दिन फेर सरी मंझनिया सात ठन मुठिया धरके उही पीपर पेड़ मेरन पहुँचिस अउ चिचिया के किहिस-‘‘आज तो एको झन ल नइ बचावंव, सातो के सातो ल खाहूँ।‘‘

  डर के मारे सातो बहिनी मन परगट होके हाथ जोड़के खड़े होके किहिस-‘‘अब काय कम पड़गे?‘‘

    लेड़गा किहिस-‘‘तुमन जउन बता के देथव ओमन सबो नकली आय न तुमा म हीरा-मोती भराय हे अउ न बोकरा ह सोन के मोहर उछरय।"

बड़े सतबहिनी ह जान डारिस ये सब एखर मितान के करस्तानी आय। असली जिनिस ल लुका देथे अउ येला नकली ल धरा देथे। ये बखत ओहा एक ठन नानकुन डिबिया ल दे के किहिस-‘‘आज सबले पहिली अपन मितान घर जाबे अउ बताबे, येमे संसार के सबले कीमती जिनिस हे।‘‘

    लेड़गा ओ डिबिया ल धरके लहुटगे। अउ सबले पहिली अपन मितान घर पहुँच के सब बात ला सफा-सफा बता दिस।

       ललचाहा मितान ओ डिबिया ल तुरते अपन कुरिया म ले जा के खोलिस। डिबिया खुलते साठ ओमे भराय केवास ह उड़ा के मितान-मितानिन के देहें म चटकगे अउ मनमाने खजवाना शुरू करिस। अड़बड़ दवई -पानी लगाइस फेर खजरी माढ़बे नइ करिस। मितान-मितानिन मन जान डारिन ये देवतहा केवास आय। जब तक लेड़गा के असली तुमा अउ बोकरा ल नइ लहुटाबो तब तक ये खजरी माढ़ने वाला नइ हे। ओमन लेड़गा के गोड़ म घोलंड के माफी मांगिन अउ ओखर असली जिनिस ल लहुटाइन तभे उखर खजरी माढ़िस।

    लेड़गा ह असली तुमा अउ बोकरा ल लेके अपन घर पहुँचगे। तुमा ला काट के देखिस तब सिरतोन म  ओमें हीरा-मोती, पन्ना-पुखराज अउ सोना-चांदी भराय रहय। थोडेच दिन म लेड़गा ह मंडल होगे अउ अतराप भर म लेड़गा मंडल के नाव म प्रसिद्ध होगे। मोर कहानी पुरगे, दार भात चुरगे।

बोड़रा, मगरलोड

जिला-धमतरी , छत्तीसगढ़

लोक-संवेदना, संघर्ष और सांस्कृतिक चेतना के कवि - डॉ. जीवन यदु - डुमन लाल ध्रुव

 लोक-संवेदना, संघर्ष और सांस्कृतिक चेतना के कवि - डॉ. जीवन यदु

                    - डुमन लाल ध्रुव  

    कविता जब केवल सौंदर्य का अनुशासन न रहकर समाज की चेतना का दस्तावेज बन जाती है तब वह अपने रचयिता को कालजयी बना देती है।छत्तीसगढ़ी कविता और गीत परंपरा में डॉ. जीवन यदु ऐसे ही कवि हैं जिनकी रचनाएं केवल साहित्यिक पाठ नहीं है  लोक-जीवन का जीवंत इतिहास हैं। उन्हें देश और प्रदेश में “जब तक रोटी के प्रश्नों का” और “छत्तीसगढ़ ला कहिथे धान के कटोरा” जैसी चर्चित रचनाओं के कारण व्यापक पहचान मिली किंतु यह पहचान उनके विराट रचना-संसार की केवल एक झलक है। वस्तुतः धान के कटोरा उनकी सैकड़ों गीत-कविताओं में से एक प्रतिनिधि रचना मात्र है। उनकी काव्य-संपदा इतनी व्यापक, विविध और बहुस्तरीय है कि उसे केवल लोकप्रियता के पैमानों से नहीं आंका जा सकता। डॉ. जीवन यदु की कविता छत्तीसगढ़ी समाज के श्रम, संघर्ष, संस्कृति और स्वप्नों की सामूहिक अभिव्यक्ति है।

लोक और जनपक्षधरता की जड़ें

डॉ. जीवन यदु की कविता का मूल स्रोत लोक है। यह लोक न तो आदर्शीकृत है और न ही रोमानी। यह श्रमरत मनुष्य का लोक है किसान, मजदूर, स्त्री, चरवाहा, गायक और कलाकार का लोक। उनकी कविता खेतों की मेड़ से उठती है और खलिहान, हाट-बाजार, इप्टा के मंच तथा आकाशवाणी के प्रसारण कक्षों तक पहुंचती है।

इप्टा  के मंचों पर उनके गीत गाए जाना इस बात का प्रमाण है कि उनकी कविता जनसंघर्ष और जनसंस्कृति की परंपरा से गहराई से जुड़ी है। वहीं आकाशवाणी से उनके गीतों का प्रसारण इस लोक-कविता को व्यापक सामाजिक स्वीकृति प्रदान करता है। यह द्वैत लोक और संस्थान डॉ. जीवन यदु की काव्य-यात्रा को विशिष्ट बनाता है।

    जीवन यदु के गीतों में सुरों की बहुलता है। उनके यहां

ओज है  जो शोषण और अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है,

माधुर्य है जो जीवन की कठोरता के बीच भी करुणा और सौंदर्य बचाए रखता है और कबीर जैसा फक्कड़ स्वर है जो किसी सत्ता, पाखंड या प्रतिष्ठान से भयभीत नहीं होता।

छत्तीसगढ़ी लोकध्वनियां और देशज शब्दावली उनकी कविता में सजावट नहीं  संरचना का आधार है। यह कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ में जहां-जहां जिस-जिस कोटि का स्वर जीवन यदु ने सुना उसे उन्होंने उपयुक्त शब्द-योजना और लय देकर गीत का रूप दिया। उन्होंने न केवल नए शब्द रचे वहीं नए तालों, मिश्र सुरों और लयों का सृजन भी किया।

   “छत्तीसगढ़ ला कहिथे धान के कटोरा” केवल एक गीत नहीं है। यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। यह गीत न जाने कितने कंठों से फूटा है और आज भी फूट रहा है। कई पीढ़ियों के गायक-गायिकाओं ने इन गीतों के सहारे अपनी पहचान बनाई, लोक में सम्मान पाया और समाज को तृप्त किया।

  छत्तीसगढ़िया जुग बदलिस फेर छोड़िन नहीं कछोरा।

भइया धान के कटोरा।

       यह पंक्ति परिवर्तन और निरंतरता दोनों का प्रतीक है। आधुनिकता के बीच भी अपनी जड़ों से जुड़े रहने का आग्रह इसमें स्पष्ट दिखाई देता है।

संघर्ष, विश्वास और उजास

डॉ. जीवन यदु की कविता में संघर्ष की अभिव्यक्ति के साथ-साथ गहरा विश्वास भी है। उनकी कविता निराशा में नहीं डूबती वह संघर्ष को उजास में बदलने का प्रयत्न करती है। वे मानते हैं कि आज विज्ञान और तकनीक की तीव्र चुनौती को यदि कोई विधा स्वीकार कर सकती है तो वह कविता है क्योंकि कविता ही मनुष्य को संवेदनशील बनाए रखती है।

उनकी पंक्तियां छत्तीसगढ़ के जनजीवन को एक नई रोशनी देती है ।


नवा बिहाती कस दिखथे रे इंहा के डोली धनहा ।

गाय असन सिधवख होथंय रे जम्मो हमर किसनहा ।। 

माता देवाला के धज्जा अस उज्जर होथय मन हा।

भेलई के लोहा-कस दिखथय रे छत्तीसगढ़िया तन हा।।

यहां किसान केवल उत्पादनकर्ता नहीं  संस्कृति का वाहक है।

जीवन यदु की कविता स्थिर नहीं है। वह समय के साथ आगे बढ़ती है और मनुष्य को नए समाज की ओर ले जाती है। “बादर करय साहूकारी” जैसी कविताएं सामाजिक अन्याय और शोषण की तीखी प्रतीकात्मक व्याख्या प्रस्तुत करती है - 

 बादर करय साहूकारी ऊपर ले गुर्राय।

वोकर डर म सुरुज चंदा मुंहु ला लुकाय।।

यहां बादल शोषक व्यवस्था का प्रतीक है  जो उजास को ढक लेता है। उनके बिंब इतने सशक्त हैं कि अमूर्त भाव मूर्त हो उठते हैं। काव्यशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो डॉ. जीवन यदु की कविता में बिंब-विधान अत्यंत सशक्त है। बिंब उनके यहां केवल दृश्य नहीं अनुभूति के वाहक हैं। भाषा इस प्रक्रिया की अनिवार्य शर्त है। एक बिंब सृष्टा की अनुभूति को रूपाकार देता है और उसमें व्याप्त संवेदना व विचार का सामान्यीकरण करता है।

“रहिबे हुसियार भइया” कविता में यह स्पष्ट दिखाई देता है - रखवारी राखे बने रहिये गया रखवार भइया।

देखत हस दिन बादर ला, रहिबे हुसियार भइया।।

यह चेतावनी भी है  लोक-बुद्धि भी और समय का संकेत भी।

मेरे लिए डॉ. जीवन यदु केवल एक कवि या साहित्यिक व्यक्तित्व नहीं हैं। खैरागढ़ से जुड़े मेरे आत्मीय संबंधों के कारण उनकी रचनाएं मेरे लिए स्मृतियों का हिस्सा भी है। खैरागढ़ जहां संगीत, साहित्य और लोक-संस्कृति की समृद्ध परंपरा है वहां जीवन यदु की कविता एक परिचित स्वर की तरह लगती है। उनकी रचनाएं वहां केवल सुनी नहीं जाती  अपनायी जाती हैं।

    खैरागढ़ की सांस्कृतिक चेतना और जीवन यदु की लोकधर्मी कविता के बीच एक स्वाभाविक संवाद है। शायद इसी कारण उनकी कविताएं मुझे आलोचक से अधिक सहभागी बनाती है।

         डॉ. जीवन यदु की काव्य-यात्रा का आरंभ 1973 में आकाशवाणी से प्रसारण के साथ होता है और आज भी उनकी रचनाएं उतनी ही प्रासंगिक हैं। उनकी कविता छत्तीसगढ़ी साहित्य की धरोहर है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-पुंज। वे उन कवियों में हैं जिन्होंने कविता को जीवन से अलग नहीं किया  जीवन को कविता बना दिया।

 आज डॉ. जीवन यदु का जन्मदिन है। यह दिन केवल एक कवि के जन्म का नहीं  छत्तीसगढ़ की लोक-संवेदना,

संघर्ष और सांस्कृतिक चेतना के उत्सव का दिन है। आपकी लेखनी ने लोक को स्वर दिया

संघर्ष को शब्द और भविष्य को उजास। खैरागढ़ की आत्मीय स्मृतियों के साथ आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं। आप दीर्घायु हों, स्वस्थ रहें और आपकी कविता यूं ही छत्तीसगढ़ की आत्मा बनकर गूंजती रहे। 

            - डुमन लाल ध्रुव 

       मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

            पिन - 493773

       मोबाइल - 9424210208

छत्तीसगढ़ी लोक कथा सूरजभान वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी लोक कथा

सूरजभान


वीरेन्द्र ‘सरल‘

एक राज में एक राजा राज करय। एक दिन के बात आय राजा-रानी मन अपन राजमहल के छत में बइठ के पासा खेलत रहय। राजा ह खेल-खेल में अपन राज-पाट, महल अटारी, धन-दोगानी सब ला रानी के हाथ हार गे रहय। अब राजा ला डर होगे कि रानी के मन में कहूँ लालच समा जाही अउ मोला देश निकाला देवा के अपने ह राजपाट सम्हाल लिही तब मोर काय गति होही? 

राजा गजब बेर ले अपन हारे बाजी ला जीते के उदिम करिस फेर सफल नइ होइस। अब ओहा डर के मारे छल के सहारा लिस अउ आजू-बाजू, ऊपर-नीचे ला देखे लगिस। ठउका उहीच बेरा एक ठन पक्षी ह छत के ऊपर ले उड़ाइस।

 ओला देख के राजा ह रानी ला किहिस-‘‘अभी-अभी जउन पक्षी ह ये छत ले उड़िहा के गिस हावे तउन ह कागा आय कि कोयली तउन ला पहिली बता, मैहा ओला कागा कहत हवं। रानी किहिस-‘‘ नहीं राजा साहब! महूँ ह ओला देखे हवं ओहा कागा नोहे, कोयली आय।‘‘

 अब राजा ह इहीच बात में बाजी लगा दिस अउ किहिस-‘‘देख तैहा कोयली कहत हवस अउ मैंहा कागा। हमन इहीच मेरन बइठे रहिबो। हमर करमचारी मन ओ पक्षी के पता लगा के बताही कि ओहा कोयली आय कि कागा। कहूँ कागा होही तब तैहा मोर हारे सब राजपाट ला मोला लहुटाबे अउ मोर राज ले निकल जबे अउ कोयली होही तब मैहा सब राजपाट ला  तोला सउप के साधु बनके जंगल में चल देहूँ, ठीक हे?‘‘ रानी घला बाजी लगाय बर तैयार होगे।

राजा ह अपन नेगी, जोगी, पाड़े, परधान मन ला पाँच पंच बनाके अपन बाजी के बात ला बता दिस अउ ओ पक्षी के पता लगाय के आदेश कर दिस। पंच मन पता लगाय बर राजमहल ले बाहिर निकलके ओ पक्षी ला खोजे लगिन। पंच मन ला ओ पक्षी ह नदिया खड़ में बइठे दिखिस। ओमन ओला पकड़ के देखिन तब ओहा कोयली निकलिस। 

पंच मन सोचिन कहूँ सिरतोन बात ला बताबो तब तो हमर राजा ह बाजी हार जही अउ ओला साधु बनके जंगल जाना पड़ जही। रानी ला भले देश निकाला हो जाय हमन ला काय करना हे, फेर अपन राजा ला बचाना तो हमर धरम आय। इही सोच के ओमन सुन्ता होइन अउ राज महल में लहुटके आगे। 

राजा-रानी मन उखरेच अगोरा करत रिहिन। पंच मन किहिन-‘‘जउन पक्षी में आप मन बाजी लगाय रहेव ओहा कागा आय, कोयली नोहे। राजा के बात सही हे अउ रानी ह बाजी हारगे हावे। राजा के चाल ह सफल होगे रिहिस ओहा मने-मन में हाँसिस अउ बाजी के मुताबिक रानी ला राज ले निकलना पड़गे।

रानी बिचारी अम्मल में(गर्भवती) रहय फेर काय करे बपरी ह बाजी हारे के सजा ला तो भुगतना पड़िस। रानी ह येती-ओती भटकत-भटकत एक घनघोर जंगल में पहुँचगे। उहाँ एक झन साधु ह तपस्या करत रहय। रानी ह उखरे तीर अपन दुःख ला बता के शरण माँगिस। साधु ला ओखर बर दया आगे, ओहा रानी ला अपन बेटी समझ के अपन कुटिया में राख लिस। रानी ह साधु के सेवा-जतन करय अउ साधु ह रानी के खाना-खरचा देवय। नौ ले दस महीना पुरिस तहन रानी ह उहीच कुटिया में एकदिन बेर उत्ती बेरा में सुंदर-रूपस बेटा ला जनम दिस। साधु ह ओ लइका के जनम के बेरा अउ ओखर चेहरा के चमक ला देख के ओखर नाव सूरजभान धर दिस।

धीरे-धीरे समे बीते लगिस। अब सूरजभान अट्ठारह साल के नौजवान होगे रिहिस। एक दिन के बात आय, उहीच रद्दा में बैपारी मन के एक दल निकलिस। 

बैपारी मन अपन अपन-वाहन बर घोड़ा-हाथी, बइला-भइंसा राखे रिहिन। इखर देख-रेख बर ओमन एक झन नौकर घला खोजत रिहिन। उखर नजर उदुप ले सूरजभान ऊपर पड़गे। ओमन अपन मन के बात ला सूरजभान ला बताइन। सूरजभान तैयार होगे अउ अपन दाई अउ साधु महराज ला बैपारी मन के बात ला बता दिस। रानी अउ साधु दुनों झन ओला बैपारी मन के संग जाय के अनुमति दे दिन। सूरजभान बैपारी मन संग आघू बढ़गे।

सूरज भान ला बैपारी मन संग रहत बहुत दिन होगे रिहिस। एक दिन के बात आय। जंगल में बैपारी मन एक जगा अपन डेरा जमाय रिहिन। बैपारी मन भोजन बनात रिहिन अउ सूरज भान ह सब हाथी, घोड़ा, बइला, भइंसा मन ला पानी पियाय बर तीर के तरिया डहर लेगे रिहिस। तभे उदुप ले ओखर नजर रद्दा ले थोड़किन दूरिहा के भुड़ु में पड़िस। भुड़ु मेर दु झन गजब सुघ्घर राजकुमारी अस नोनी मन पासा खेलत रिहिन। सूरजभान ह कलेचुप सपट के ओमन ला देखे लगिस। सूरजभान ला उहीच बेरा जम्हाई आगे। ओखर आरो पाके पासा खेलइया एक झन नोनी ह चिरई असन फुर्र के अगास में उड़ागे अउ एक झन सीता माता असन धरती में समागे। सूरजभान ह अब हिम्मत करके तीर में जाके देखिस तब एक ठन गजब सुंदर पासा ह उही मेरन पड़े रहय जउन ला हड़बड़ी में ओ नोनी मन भूलागे रिहिन। सूरजभान ओ पासा ला धरके अपन डेरा में लहुटगे। सब बात ला बैपारी मन के मुखिया ला बता के ओ पासा ला भेट करिस। मुखिया ओ पासा ला अपन तीर जतन के राख लिस। बहुत दिन ले बैपार करे के बाद बैपारी मन के दल अपन राज डहर लहुटे लगिन। सूरजभान ला जंगल में साधु के कुटिया में छोड़ के बैपारी मन अपन राज लहुटगे।

बैपारी मन बहुत दिन के बाद अपन राज पहुँचके अपन राजा संग भेट करे बर राजमहल में पहुँचिन। बैपारी मन के मुखिया ह सूरजभान के दे पासा ला राजा ला भेट करिस। पासा के सुंदरता ला देख के राजा मोहागे।

 ओहा मुखिया ला किहिस-‘‘पासा तो गजब सुन्दर हे फेर येखर जोड़ी अउ गोंटी मन कहाँ हे?‘‘ 

राजा के गोठ सुनके मुखिया अकबकागे। कहीं जुवाब नइ दे सकिस। अब राजा गुसियागे। मुखिया सोचिस मरगेन ददा, इही ला कथे ‘सुख बर आँखी आंजे, आँखी फूट जाय‘। अउ ‘बुड मरे नहकौनी दे‘। हमन कहत रेहेन राजा ह पासा ला देख के खुश होही फेर इहाँ तो उल्टा काल होगे ददा। 

मुखिया ला चुप देख के राजा कहिस-‘‘जतका जल्दी हो सके येखर जोड़ी पासा अउ गोटी मन ला लान के देव नहीं ते तुमन ला सब झन ला फाँसी टांग दे जाही।‘‘ 

बैपारी मन सब बात ला साफ-साफ बताइन फेर राजा ह मानबे नइ करिस अउ पासा पाय के अपन जिद में अड़ दिस। मुखिया के जी रोआसी होगे, काबर कि ‘जीव के डर महा कठिन‘।

  मुखिया ह घर आके अपन सब बैपारी भाई मन ला राजा के जिद ला बता दिस। सब बैपारी मन डर्रागे, ओमन बिहानेच दिन फेर अपन घोड़ा, हाथी, बइला अउ भइंसा गाड़ा में समान जोर के बैपार करे बर निकलिन अउ सोझे उहीच रस्ता में अइन जउन डहर सूरजभान के घर रिहिस।

सूरजभान के घर पहुँच के ओमन ओला अपन संग चले के जिद करे लगिन। सूरजभन ढेरियात रहय। बैपारी मन ओला रंग-रंग के लालच दिन तब ले नइ मानिस तब मारे-काटे के धमकी दे लगिन। सूरजभान जीव के डर में उखर मन संग जाय बर तैयार होइस।

बैपारी मन उहीच रद्दा में आघू बढ़िन अउ पहिलीच वाला ठउर में अपन डेरा जमा के सूरजभान ला किहिन-‘‘इहीच मेरन के कोन जगह ले तैहा ओ पासा ला लाय रेहे। अब ओखर जोड़ी अउ गोटीं मन ला खोज के लान नहीं ते तोर जीव  नइ बाँचे।‘‘

सूरजभान काय करे बपरा ह, भगवान ला सुमरत ओहा फेर उही भुड़ु मेरन जाके कलेचुप सपट के पहली वाली नोनी मन के बाट जोहे लगिस। गजब बेरा ले अगोरा करे के पाछू सूरजभान ला अगास के कैना ह उतरत दिखिस। अगास कैना ह उतरिस तहन भुड़ु डहर ले घला एक झन कैना निकलिस। सूरज भान समझगे कि येहा पाताल कैना होही। दुनो कैना मन फेर पासा खेले लगिन। सूरजभान ह तुरते उखर तीर में पहुँचगे। ओखर आरो पाके कैना मन छप होगे। ये पइत भुड़ु तीर में कुछुच नइ रिहिस। सूरजभान अड़बड़ बेरा ले ओ मेरन पासा ला खोजे लगिस। तब तक उही मेरन बैपारी मन घला पहुँचगिन।

 अब सूरजभान ओमन ला किहिस-‘‘देख गा मुखिया! आप मन एक बहुत लम्बा डोर लानव, ओमे मोर कनिहा ला बाँधव, मैहा डोर के सहारा में ये भुड़ु भीतरी खुसरत हवं। तुमन एक-एक करके इही मेर पहरा दुहू। जब मोला पासा अउ गोटी मन मिल जही तब मैहा डोर ला हला के इशारा करहूँ तब तुमन डोर ला झीकहू।‘‘ 

मुखिया दउड़त गिस अउ तुरते गजब लम्बा डोर बिसा के ले आनिस। सब बैपारी मन डोर में सूरजभान के कनिहा ला बाँध दिन अउ ओला भुड़ू भीतरी उतारे लगिन।

सूरजभान ह डोर के सहारा लेके धीरे-धीरे पाताल लोक में उतरगे। उहाँ  सोन के एक ठन सतखंडा महल के अँगना में पाताल कैना ह सोन के मचोली में ढेलवा झूलत बइठे रहय। 

ओहा सूरजभान ला देख के अकबकागे अउ पूछे लगिस-‘‘अरे! मुत्युलोक के मनखे, मैहा इहाँ मरत हवं ते मरत हवं, तैहा इहाँ जीव ला देबर काबर झपागेसं?‘‘ सूरजभान सब बात ला साफ-साफ बता दिस। पाताल कैना घला सुसकत-सुसकत बताइस कि महूँ धरती के एक राज के राजकुमारी अवं। इहाँ के राक्षस ह मोर अपहरण करके ले आने हे।  अब पाताल कैना ह सूरजभान ला अपन घर रख लिस। कुछ समें बाद दुनों झन में प्रेम होगे। 

पाताल कैना के रखवार एक झन राक्षस ह रहय। ओहा कोन्हों मनखे ला देखे तब मार के खा डारे। पाताल कैना ह अपन मंतर ले सूरजभान ला दिन भर मांछी बनाके राखे अउ रतिहा राक्षस ह किजंरे बर निकले तब ओला फेर मनखे बना दे। राक्षस ह ये बात के गम नइ पाय रिहिस। अइसने-अइसने गजब दिन होगे।

एक दिन पाताल कैना किहिस-‘‘सूरजभान! हम दुनों मनखे के जात। तोर-हमर प्रेम होगे हावे तब हमन ला बिहाव कर लेना चाही। तैहा जब तक मोर संग बिहाव नइ करबे तब तक मैहा ओ पासा अउ गोंटी मन ला नइ देववं।‘‘ 

सूरजभान अलकरहा बीच में फँसगे रहय। ओहा सोचिस कि बिना पासा अउ गोटी के लहुटे में बैपारी मन मार डारही। तेखर ले बिहाव करना ही ठीक हे। ओहा पाताल कैना संग बिहाव करे बर तैयार होगे।

अब पाताल कैना किहिस-‘‘जब तक मोर रखवार राक्षस ह जियत रही तब तक तोर हमर बिहाव नइ हो सके। मोर संग बिहाव करना हे तब तोला एक काम अउ करना पड़ही। मोर रखवार राक्षस ह मनखे मन के बैरी आय, ओहा कोन्हों तोला देख पारही तब मार डारही। ओहा तोला मारे, ओखर पहिली तैहा ओला मार डार। फेर ओला बल में नइ मार सकस काबर कि ओखर जीव ह ओखर काया में नइहें इहाँ ले सात कोश दूरिहा एक समुंदर हावे। समुंदर के खड़ में एक ठन खजूर के बहुत ऊँच पेड़ हावे। ओमें सोन के पिजड़ा टंगाय हे अउ ओमे एक ठन सुआ धंधाय हे। ओ सुवा ला मारबे तभेच ये राक्षस ह मरही अउ हमर बिहाव हो सकही। ये बात ला राक्षस के डर के मारे मैहा आज तक कोन्हो ला नइ बताय हवं। प्रेम के खातिर तोला भर बतावत हवं।‘‘

उहीच रतिहा जब राक्षस ह शिकार करे बर निकलिस तब सूरजभान अउ पाताल कैना ह समुंदर के खजूर के पेड़ तीर पहुँचिस। सूरजभान लटपट में पेड़ में चढ़िस अउ सुआ ला मार दिस। येती सुआ मरिस अउ ओती राक्षस घला पटियागे। ओखर जीव छूटगे।

 अब पाताल कैना अउ सूरजभान ह भगवान ला गवाही समझ के हरहिन्छा बने बिहाव कर डारिन।   अइसने-अइसने गजब दिन बीतगे। मौका देख के सूरजभान ह एक दिन पाताल कैना ला पासा अउ गोटी मन के बात ला सुरता कराइस अउ पाताल लोक ले धरती लहुटे के विचार रखिस। पाताल कैना राजी-खुशी तैयार होगे। ओमन तैयार होके बैपारी मन के लमाय डोर में मचोली ला बाँधिन।

 सूरजभान घेरी-बेरी पाताल कैना ला समझा के किहिस-‘‘सब सामान ला बने सुरता करके राख ले, आधा बीच में जाके कहूं समान ला भुलागे हवं कहिके मत कहिबे।‘‘ 

पाताल कैना ह सबो किसम ले तैयार होइस तहन सूरजभान ह डोर ला हला के बैपारी मन ला इशारा करिस।

 भुड़ु के ऊपर बइठे बैपारी मन समझगे कि हमर काम होगे अउ सूरजभान ह डोर ला झीकें के इशारा करत हावे। ओमन सब झन मिल-जुल के डोर ला झींके लगिन।

अभी डोर के सहारा में सूरजभान अउ पाताल कैना ह आधाच बीच में पहुँचे रिहिन तभेच पाताल कैना किहिस-‘‘स्वामी! सब समान ला तो सुरता करके धरे हवं फेर मोर सिंगार पेटी ला भुला पारेंव। मोर सिंगार पेटी ला लान के देवव तभेच इहाँ ले जाबो।‘‘ 

सूरजभान ओला कतको समझाइस फेर पाताल कैना ह अपन जिद में अड़ दिस अउ रोय लगिस। अब सूरजभान काय करे बपरा ह ओखर सिंगार पेटी ला लाय बर ओहा फेर पाताल लोक में उतरगे। येती बैपारी मन ओला आवत हे समझ के डोर ला झींके लगिन। डोर ह ऊपर कोती झींकागे अउ सूरजभान ह पाताल लोक में फँसगे।

डोर के आखिरी छोर ह भुड़ु के बाहिर मे निकलिस तब बैपारी मन देखथे कि सोन के मचोली में गजब सुंदर राजकुमारी ह बइठे रहय। ओखर हाथ में पासा के जोड़ी अउ गोटीं मन रहय। ओमन तुरते पासा अउ गोटी मन ला पाताल कैना के हाथ ले झटक लिन अउ ओला जबरन अपन घोड़ा में बइठार के घर लहुटे लगिन।

 पाताल कैना ह हाथ-पाँव जोड के कलप-कलप के सूरजभान ला पाताल लोक ले निकाले के विनती करिस फेर कोन्हों ला ओखर ऊपर दया नइ लागिस।

बैपारी मन अपन देश राज लहुटगिन। बिहान दिन उखर मुखिया ह राजकुमारी अउ पासा ला राजा ला भेट कर दिस। राजा बहुत खुश होके बैपारी मन ला इनाम दिस अउ पाताल कैना ला अपन राजमहल में राखलिस। 

अब ओ राजा ह पाताल कैना संग बिहाव करहूँ कहिके जिद करे। पाताल कैना बताय तभो ले ओखर बात ला सुनबे नइ करय।

 पाताल कैना किहिस-‘‘मोला एक साल के समें दे जाय। एक साल के भीतर मोर सूरजभान कोन्हों नइ लहुटही तब मैहा तुंहर संग बिहाव कर लेहूँ।‘‘ 

राजा तैयार होगे अउ पाताल कैना के रेहे-बसे बर राजमहल के एक खोली में अलग बेवस्था कर दिस।

येती सूरजभान ह पाताल लोक में फँसे-फँसे रात-दिन भगवान के नाव ला सुमर के अपन जीव ला बचाय बर गोहराय लगिस। बैकुंठ के भगवान एक दिन पाताल लोक में किंजरे बर आइस तब ओला देखिस अउ ओखर बर दया करके ओला पाताल लोक ले धरती में लान के छोड़ दिस।

  सूरजभान ह धरती में आके देखथे तब भुड़ु मेरन कहींच नइ रहय। ओहा पाताल कैना के शोर-संदेश ले बर येती-ओती, जंगले-जंगल भटके लगिस। भिखारी मन अस माँगत-खावत सूरजभान ह उही राज में पहुँचगे जिहाँ के राजा के महल में पाताल कैना ह धंधाय रहय। ओहा दिनभर भीख माँगे अउ रतिहा एक झन कुम्हार के परछी में पड़े रहय। काया ह सूखा के काँटा होगे रहय। जांगर ह थकगे रहय। बस मुँहु में पाताल कैना के नाव भर रहय। कपड़ा-लत्ता के कहीं ठिकाना नइ रहय।

येती अइसे-तइसे करके साल भर के समें बीतत रहय। राजा अउ पाताल कैना के बिहाव के तैयारी घला शुरू होगे रहय। पाताल कैना रात-दिन रो-रो के सूरजभान के नाव ला जपत रहय अउ ओखर आय के अगोरा करत रहय।

पाताल कैना ह एक दिन राजमहल में जाके राजा ला किहिस-‘‘ मैहा जतका दिन के मियाद माँगे रहेंव तउन तो पूरा होगे हावे। मोला तो तुंहर संग बिहाव करेच बर पड़ही। फेर मोर एक ठन बिनती हे कि बिहाव के पहिली मोला सूरजभान के कहानी सुने के शउख हे। पहिली मोला सूरजभान के कहानी सुना देव तभेच मैहा बिहाव करहूँ, नहीं ते जहर खाके अपन प्राण ला तज दुहुँ। 

येला सुनके राजा ह सन्न खागे। ओहा बाप पुरखा काखरो मुहूं ले सूरजभान के कहानी नइ सुने रहिस। 

राजा मन में सोचिस अब काय करे जाय। राजा ला एक ठन उदिम सूझिस, ओहा बिहान दिन राज भर में ढिंढोरा पिटवा दिस कि जउन मनखे राजमहल में आके पाताल कैना ला सूरजभान के कहानी सुना दिही ओला एक थारी सोन के मोहर इनाम में दे जाही। महीना दिन बीतगे फेर राजमहल में कोन्हों मरे रोवइय्या नइ आइस। राजा ला फिकर होय लगिस।

एक दिन राजा के ढिंढोरा अउ इनाम के बात ह सूरजभान के कान में पड़िस। 

ओहा ओ गाँव के मुखिया ला राजमहल के पता पूछिस अउ किहिस-‘‘सूरजभान के कहानी ला मैहा जानथव। मैहा ये कहानी ला पाताल कैना ला सुना सकथव।‘‘ ओखर गोठ ला सुनके सब झन गजब हाँसे अउ खिल्ली उड़ावत कहय, वाह रे भिखमंगा! जउन कहानी ला बड़े-बड़े विद्वान मन नइ जानत हे तउन ला तैहा जानबे, पगला गे हस तइसे लागथे?‘‘

 फेर सूरजभान घेरी-बेरी इहीच बात ला घोरिस तब ओ गाँव के मुखिया ह ओखर बात ला राजा तीर पहुँचादिस। राजा तुरते अपन रथ भेजवा के सूरजभान ला बलवा लिस अउ राज भर में फेर ढिंढोरा पिटवा दिस कि काली राजमहल के आधू में सूरजभान के कहानी सुनाय जही। 

बिहान दिन राजमहल के आघू में राजभर के मनखे सकलागे उहाँ मनमाने भीड़ होगे । सब के मन में सूरजभान के कहानी सुने के साध रहय। राजा अउ पाताल कैंना के आघू में ऊँच पीढा में भिखारी ला बइठारे गिस। अब कहानी शुरू होईस।

राजा-रानी के पासा अउ राजा के छल ले कहानी शुरू होईस। जइसे-जइसे कहानी आधू बढ़त गिस। तइसे-तइसे राजा के चेत घला चढत गिस। कोयली ला छल से कागा बताके रानी ला देश निकाला दे के बात ओला सुरता आइस। ओहा दम साधे कहानी सुने लगिस। कहानी ला सुनके पाातल कैना के आँखी ले टप-टप आँसू चूहे ला लगिस। 

कहानी सिराइस तहन पाताल कैना ह स्वामी कहिके जोर से चिचयाइस अउ दउड़ के सूरजभान के पाँव में गिरगे। दुनो झन के मिलन होगे।

अब राजा ह सूरजभान ला पूछिस-‘‘कस जी परदेशिया! तोला ये कहानी ला कोन सुनाय हावे।‘‘ 

सूरजभान किहिस-‘‘ये कहानी नोहे राजा साहब! सिरतोन बात आय। आधा किस्सा ह मोर महतारी ऊपर बीते हे अउ आधा ह मोर ऊपर। दुनो ला मिला के कहानी बनाय हवं।‘‘

 येला सुनके राजा ह अचरज में पड़गे, ओहा जान डारिस कि सूरजभान मोरेच बेटा आय अउ येखर महतारी ह मोर रानी। 

राजा ह सूरजभान ला काबा भर पोटार के मया करे लगिस। अब ओ भिखमंगा परदेशिया ह राजकुमार सूरजभान बनगे। 

राजा ह पाताल कैना अउ सूरजभान के बिहाव कर दिस। कुछ दिन के बाद राजा ह अपन बेटा-बहू के संग जंगल में साधु के कुटिया में पहुँचगे। अपन गलती बर रानी ले क्षिमा माँसिग अउ ओला रथ में बइठार के सन्मान के साथ परघा के राजमहल में ले आनिस। अइसे किसम ले सब झन के बने मेल-भेट होगे। अब सब झन बने खइन-कमइन राज करिन। मोर कहानी पुरगे दार भात चुरगे।

बोड़रा, मगरलोड

जिला-धमतरी, छत्तीसगढ़