Tuesday, 10 February 2026

चुनाव लड़ई आज नइ हे बस के-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 चुनाव लड़ई आज नइ हे बस के-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


                   चुनाव शब्द सुनत बने आदमी के माथा ठनक जाथे, काबर कि आजकल के चुनाव मा दुनिया भरके चोचला अउ शाम दाम दंड सबे देखे सुने बर मिलथे। फेर चुनावी रंग मा रंगे कतको मनखें मन भारी खुश दिखथें। रोज रोज नास्ता पानी, दारू मुर्गा, पइसा जे मिलथे। चुनाव हमर अधिकार अउ कर्तव्य घलो आय, येमा भाग लेना जरूरी हे। चुनाव शब्द ला यदि विच्छेद करके देखन ता "चुन आव" माने चुनाव। फेर आजकल तो चुन आव नही चुन लाव चलत हे। आव शब्द मा सादगी शालीनता विनम्रता ईमानदारी सोच घलो सकथन, फेर लाव मा एखर कल्पना ही बेकार हे। मोर कहे के मतलब कि प्रतिनिधि मन चुन के आवत नइहें बल्कि चुन के लाए जावत हे, वो भी पइसा दारू मुर्गा अउ किसम किसम के लोभ लालच द्वारा। जे जन प्रतिनिधि खर्चा करत हे, देख देखावा अउ हो हल्ला करत हें ओखरे दावेदारी दिखथे। जे आज के समय बर बड़ चिंतन के विषय हे। कतको झन मन काहत फिरथें कि एक घांव तो चुनाव के बेरा भर नेता मन जनता ला देथे, जनता तीर हाथ जोड़थे, ताहन छू मंतर हो जथे, ता उंखर ले पइसा कौड़ी अउ खर्चा पानी लेय मा का हरज?  फेर का हमर मत के कीमत सिर्फ एक पाव दारू, एक ठन मुर्गा, 500 पइसा या एक ठन साड़ी या सूट हे? नही न, ता काबर ये प्रलोभन ला हमन झोंकत हन? अउ हमर लेय के कारण ही दारू मुर्गा या पइसा बँटई के बीमारी बढ़ते जावत हे। आज के स्थिति परिस्थिति ला देखत काहन ता चुनाव माने धन बाँटना लुटाना फेसन बनगे हे। लोगन के नजर मा बाँटही तिही नेता आय। अइसन मा आम आदमी या कोनो गरीब आदमी तो चुनावे नइ लड़ सके। अउ अइसने होवत घलो हे। दू नम्बर के कमाई वाले या धनाढ्य मन तो चुनाव मा खर्चा कर सकथें फेर गरीब मन तो मर जही। कतकों मन खेत खार ला बेच भांज के घलो चुनावे लड़थें फेर यदि नइ जीत पाय ता मरना हो जथे। कई झन सज्जन अइसनो काहत दिख जथे कि जे जे देवत हे तेखर ला खाव अउ वोट मन के देव, फेर ये तो गलत आय न? अउ अइसन गलत ला फोकटे लालच रूपी गिधान पालके काबर बढ़ाना? सहज पंच, सरपंच, अउ पार्षद के चुनाव मा आज 10-15 लाख फूका जावत हे, सांसद विधायक के चुनाव ला छोड़। सबे अइसन कर सके यहू सम्भव नइहें, अइसन मा हम जनता मन खुदे अपन पैर मा कुल्हाड़ी मारत हन। जे दिही ते वसूलबे करही। चुनाव घरी हमन लालच मा रथन ताहन चुनाव के बाद, जीते प्रत्याशी लालच मा पड़ जथे। जीत गे तेखर तो बल्ले बल्ले हे, फेर जरा सोचव घर दुवार गिरवी रखके चुनाव मा हारे प्रत्याशी के का गत होवत होही? चुन आवत हे ता ठीक नही ते लागा बोड़ी के आरी मा चुनावत हे।  जीत तो एक ला मिलथे फेर बाकी मन तो दुच्छा हो जथे, अइसन सदमा ले कतको प्रत्याशी जिनगी भर घलो उबर नइ पाय। पहली बात तो चुनाव मा धन बल लुटाना गलत बात हे, शासन घलो एखर खिलाफ हे, फेर जनता ही मुंह फार के बइठे हन ता कोनो का कर सकही? आजकल फ्री के रेवड़ी, लोक लुभावन वादा, दारू, मुर्गा, पइसा, भीड़ भाड़, खरीद फरोख ये सब चुनाव जीते के हथियार बन गे हे। जे बने अउ ईमानदार प्रत्याशी कर शायदे रथे। अइसन मा हमन थोर बहुत लालच के चक्कर मा अपन राज पाठ अउ कुर्सी ला गिनहा आदमी मनके हाथ मा बेचत हन। आलाकमान घलो टिकट उही  ला देथे जे खर्चा कर सके, अइसन मा छोट मंझोलन के मरना हे।

                 एक जमाना रहे जब नेता अभिनेता के हजारों लाखों दीवाना रहय, फेर आज तो रैली, सभा,समाज आदि बर घलो पइसा मा आदमी जुगाड़े बर लगथे। तब कहीं जाके भीड़ दिखथें। इज्जत बनाए मा उमर गुजर जाथे फेर गंवाए मा छिन नइ लागे, ये बात शाश्वत हे, कतको बड़े नेता, अभिनेता हो जाए, करनी के फल विधना देथेच। पइसा खर्चे मा चरदिनिया चकाचोंध मिल सकथे, फेर सबके जुबां मा समाए बर आजो आदमी के व्यवहार, ज्ञान, काम धाम काम आथे। पइसा पाके कखरो भी जयकार कर देना कहाँ शोभा देथे, लेकिन आज हमीच अइसने करत हन। अउ एखर फायदा उठावत हें बड़का मन।  का हम छोट मन जिनगी भर गुलामी करे बर बने हन? का हमन ला पद पाए के अधिकार नइहे? यदि हे ता आँय बाँय खर्चा चुनाव मा काबर? चुनाव मतलब बड़े बड़े बैनर, बाजा गाजा, सभा, संसद, भीड़ भाड़, दारू मुर्गा, देख देखावा के पुलिंदा काबर? आज के स्थिति देखत तो इही लगथे कि चुनाव मतलब चुनाव, लागा बोड़ी के आरा मा। साफ सुधरा अउ ईमानदार प्रत्याशी कर पइसा नइहे ता आज वो जीतेच नइ सके, अउ चुनाव लड़े के घलो नइ सोचे। आपो मन अपन छाती मा कखरो गरीब के दारू मुर्गा पइसा ला खावत पीयत बेरा सोचव कि जे करत हव ते का बने हे? यदि नहीं ता फेर ये बीमारी काबर फलत फूलत हे। यदि अइसने ये बीमारी बढ़त जाही ता लोकतंत्र के कुर्सी मा कोनों सच्चा सेवक नइ बइठ पाही। एखर दोषी हमी मन ही होबो। अउ आज इही सब होवत हे। 

                एकात दू अपवाद के आलावा आज, कुर्सी बिना खर्चा पानी के नइ मिलत हे। एखरे डर मा बने मनखें येला दलदल समझ के किनारा हो जावत हे अउ दू नम्बरी के आदमी मन राजनीति के पंडित बनत जावत हे।  हम तो ननपन ले इही सुनत आय हन फोकट के कखरो नइ पँचे, चाहे नेता हो या फेर जनता। अइसन मा फोकटिया का के हांव हांव अउ खांव खांव? राजनीति सेवा रिहिस ते आज का होगे हे? देखते हन। यदि आज हम सब फोकट के रेवड़ी अउ लोभ लालच ला नइ छोडबों ता काली कोनो बाहरी अंग्रेज के नहीं बल्कि कुर्सी मा काबिज नेता मन के गुलाम हो जबों। जे मन आज बड़ चालाकी ले चार फेक के चालीस अंदर करत हे। खैर जगई सुतई अपने हाथ मा हे। फिरहाल मोर हाथ मा कलम हे ता लिख परेंव। कोनो ला करू कस्सा लगिस होही ता माफी देहू।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)