Sunday, 1 March 2026

लघुकथा ) आफत

 (लघुकथा )


आफत

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ट्रेन ला अगोरत स्टेशन मा बइठे-बइठे अपन मोबाइल मा वाट्सऐप, फेसबुक मन ला कोंचकत रहेंव। वोतके बेर एकझन अधेड़ महिला हा आके कहिच--

"ये बाबू थोकुन मोबाइल ला देबे का?"

"काबर वो?"--मैं पूछेंव।

"मोबाइल ला घर मा भुलागेंव हा बाबू। चरडबिया मा आवत हँव कहिके बेटा ला लेगे बर स्टेशन आ जबे कहिके फोन करहूँ?"

नारी परानी के सहायता करना चाही सोचके वोला मोबाइल ला दे देंव।

वोहा थोकुन दूरिहा मा बइठे बीस-पचिस बछर के एक झन नोनी ला थमा दिच। वोहा नम्बर लगा के लम्बा चौड़ा पाँच-छै मिनट ले गोठियाये ला धरलिच। मजबूरी मा मोबाइल ला माँगे ला परगे।

गाड़ी आइच तहाँ ले बइठगेंव। वोमन कती गेइन तेला नइ देख पायेंव। गाड़ी हा स्टेशन ले निकले बस पाये रहिसे एक ठो अनजान नंबर ले कड़क अवाज में फोन अइस- " हलो --हलो--हलो --"

"हलो हलो --तैं कोन अच भइया?"

"अरे तुम कौन हो पहले बताओ? जादा सयाना मत बनो। इसी नम्बर से कुछ देर पहले मेरी पत्नी का फोन आया था? कहाँ है वो। घर से झगड़ के भागी है?"

मोर माथा झंनागे। मन हा कहे ला धरलिच के आज तैं आफत मा परगेच। अउ भलमनसी देखाबे?

मैंहा वो फोन करइया ला कहेंव- "मैं कुछु नइ जानवँ आदरणीय। भल ला भल जानेंव।कुछु परेशानी मा होही कहिके मांगिस ता फोन ला दे परेंव।फेर एक झन अधेड़ महिला हा रायपुर स्टेशन मा माँगे रहिसे। वोमन कती गेइन तेला नइ जानवँ। "

मैं चुपचाप लकर-धकर स्विच आफ करेंव।

जइसे घर पहुँचेंव। सब ले पहिली थाना जाके ये घटना ला लिखवायेंव।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

लघुकथा) -------------- *संस्कृति बदलत हे*

 (लघुकथा)

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*संस्कृति बदलत हे*


          हमर छत्तीसगढ़ मा अपन माटी, अपन संस्कृति,अपन पुरखा अउ सियान मन के सम्मान करे के रिवाज सदियों ले चले आवत हे। अगहन महीना मा दाई अन्नपूर्णा के कृपा हा साक्षात् बरसथे, जब हमर धनहा डोली मा उपजे फसल हा लुआ टोराके कोठार मा आ जथे, माटी महतारी अउ गाँव के देवी देवता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करे के ये बहुत बढ़िहा मौका होथे।

        

             अउ तब फेर सिलसिला चालू होथे मड़ई मेला के, गाँव-गाँव मा उछाव होथे,चार महीना के चौमासा ले थके हारे मन, अपन प्रियजन ला पाके गदगद हो जाथे अउ जिनगी ला नवाँ ढंग नवाँ उमंग ले जीये बर प्रेरणा देथे।


                फेर आज हमर संस्कृति ऊपर घलो शराब के संस्कृति हावी होवत जात हे जउन हमर विरासत ला लीले के जबर ओखी बन गेहे।


         अइसने एकठन गाँव मा मड़ई के आयोजन होइस, सब लोग बाग खुशी मा नाचत गावत राहँय, बाजा-रूंजी संग गाँव के जम्मो लइका, जवान, सियान मन माता देवाला, ठाकुरदेव ला मनावत गुड़ीपारा के चौक मा सकलाय हे, ओतके बेरा मंच ले उद्घोषक हा कहिथे...........!!!


        आप जम्मो ग्रामवासी अउ तीर तखार ले आय पहुना मन के पैलगी करत हँव...... आप सबके हार्दिक स्वागत हे, अभिनंदन हे। गाँव के जम्मो देवी देवता के पूजा अर्चना के बाद अब सबो सियान मन के सम्मान करे जाही। 


         ततकेच बेरा एक झन दरुहा लड़बिड़- लड़बिड़ करत मंच मा चढ़के चिल्लाय बर धर लिस, ओला मंच ले उतारे बर सब हाँव-हाँव करे बर धर लिन, भरभर-भरभर एती-ओती लोगन मन भागत हे,लइका मन के रोवाराही परगे,झूमाझटकी मा सब तितर-बितर होगे,माइक घलो टूटगे,भीड़ हा बगियागे।हमर संस्कृति कोन डहर जात हे,सोंच के मोर मति छरियागे।




🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छग

7354958844

लघुकथा एक दृष्टि*

 *लघुकथा एक दृष्टि*

       कथा साहित्य मं तीन कथा उपन्यास, कहानी अउ लघुकथा शामिल करे जाथे। ए तीनों कथा ला आकार के दृष्टि ले क्रिकेट के भाषा मं टेस्ट, वनडे अउ टी-20 क्रिकेट के जइसे देखे जा सकत हे। फेर शिल्प (बुनावट/बनकट) मं अइसन नि होवय। तीनों मं कथानक, पात्र/चरित्र, संवाद अउ देश-काल या वातावरण चार तत्व मूल रूप ले पाए जाथे। साहित्य के कोनो विधा होवय, ओकर लेखन के अपन एक उद्देश्य होबे च करथे। एहा कथा साहित्य बर घलो लागू होथे। जउन ल कथा साहित्य के पचवइया तत्व माने जाथे।

      हर विधा के अपन एक शिल्प होथे। जेकर ले वो विधा मं लिखे गे जिनिस ला साहित्य के कसौटी मं कसे जाथे। परखे जाथे। बिल्डिंग कतको बनथें, फेर जरुरत के पूर्ति संग आने-आने नाव दिए जाथे। स्कूल, ऑफिस, मंदिर, घर...।

       कथा साहित्य मं सिरिफ लघुकथा हा एक अइसे विधा होथे जेन मं लेखक के प्रवेश मना रहिथे। जउन ल लेखकीय प्रवेश कहे जाथे। जेन मं लेखक अपन गोठ/विचार ला पात्र ले नइ कहवा के खुदे कहि देथे। लेखक कहूॅं लघुकथा मं एक पात्र हे तौ वोला लेखकीय प्रवेश नइ माने जाय। कहानी मं लेखकीय प्रवेश के गुंजाइश पूरा-पूरा रहिथे। लघुकथा टी-20 क्रिकेट जइसे फटाफट चलथे। एके घटना होथे। इही लघुता हा लघुकथा के खासियत आय। कहानी अउ उपन्यास मं उपकथा शामिल हो सकथे। एकर कथानक/घटना क्षण विशेष के होना चाही। लघुकथा मं कालांतर एकदम नाम मात्र के रहिथे। लघुकथा अउ टी-20 क्रिकेट मं अंतर ए रहिथे कि क्रिकेट मं जीत-हार के रूप मं रिजल्ट तय रहिथे। फेर लघुकथा मं बहुत अकन पाठक बर छोड़ दिए जाथे। एक पंच लाइन के संग पूरा करे के प्रयास होथे। जउन ह खासकर संवाद के रूप मं होथे। 

        बहुत झन मन छोटे आकार के कहानी ला लघुकथा समझ  या मान लेथें। कहानी पूरा होय ऊप्पर ले पाठक बर कोनो सवाल नि छोड़े। ओकर उद्देश्य भले कतको सवाल खड़ा करथे।फेर लघुकथा अइसे खत्म करे जाथे कि पाठक के मन मं कई ठन सवाल छोड़ दै। 

       आखिर मं इही कहिहूॅं कि लघुकथा (विधा) अउ लघु कथा (कथा के छोटे रूप) दू अलग-अलग बात आय।

०००

पोखन लाल जायसवाल

भेंड़ा अउ बेन्दरा वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी लोक कथा


भेंड़ा अउ बेन्दरा


वीरेन्द्र ‘सरल‘

एक जंगल में एक भेड़ा अउ बेन्दरा ह अलग-अलग ठउर में रहय। अलग-अलग किंजरे अउ खाय-पिये। एकदिन उदुप ले दुनो झन के एक ठउर में भेट होगे। दुनो झन एक-दूसर के परिचे जानिन अउ मितान बधगे। अब दुनो झन एके संग खाय-पिये अउ किंजरे। जंगल में  चार-तेन्दू असन किसम-किसम के फर ला देख के बेन्दरा ह पेड़ में चढ़े अउ तोड़-तोड़ के खाल्हे में गिरावत जाय, भेड़ा ह सबला सकेल के राखे, बेन्दरा ह पेड़ ले उतरे तहन दुनो मितान मन के अघात ले खाय। अइसने-अइसने अड़बड़ दिन बीतगे। 

एक दिन के बात आय, दुनो मितान जंगल में किंजरे बर गे रहय। बेन्दरा ह चिरई जाम के पेड़ में चढ़के फर ला तोड़त रहय। उही बेरा ओला भेड़ा संग ठट्ठा मढ़ाय के शउख लागिस। 

ओहा भेड़ा ला किहिस-‘‘ मितान फर ला सकेले में आप मन ला गजब बेरा लागथे, फर हा धुर्रा-माटी में सना घला जथे तेखर ला आप मन अपन मुँहू ला उला के मोर कोती ला देखत रहव। मैंहा बने तुक के फर ला आपके मुँहू में फेकहूं तहन आप मन बने गप ले खा लेहू।"

 भेड़ा ह भल - ला - भल जानिस अउ हव कहिके अपन आँखी ला मूंद के अउ मुँहू ला बने खोल के पेड़ उप्पर चढ़े बेन्दरा कोती ला देखे लगिस। मौका पाके बेन्दरा ह भेड़ा के मुँहू में खखार के थूक दिस। 

भेड़ा ह थू-थू करत जंगल कोती भागिस। भेड़ा ह भागत-भागत घनघोर जंगल में पहुँचगे । ओहा निचट थकगे रहय। थोड़किन सुस्ता लेथव कहिके ओहा एक ठन पेड़ के खाल्हे में बइठगे। थकासी के मारे ओखर नींद ह पड़गे। नींद उमचिस तब ओहा देखथे के दिन ह बुड़गे रहय। जंगल ह सांय-सांय करत रहय। अब डर के मारे भेड़ा के जीव ह पोट-पोट करे लगिस।

भेड़ा ह मने-मन गुनत रहय-‘‘हे भगवान! मैंहा तो अलकरहा आफत में फंसगे हवं। रतिहा होही तहन बघवा भालू, हुर्ड़ा-चितवा मन अपन-अपन माढ़ा ले निकल के किंजरही? कहूं उखर नजर मोर उपर पड़ जाही तब तो मोर जीव नइ बांचे, अब मैहा काय करवं?"

डर के मारे भेड़ा ह अपन जीव बचाय बर अउ रतिहा पोहाय बर येती-ओती चारो कोती ठउर खोजे लगिस। तभे ओला जंगल भीतरी बने ढुरी रक्सीन के घर ह दिखगे। ओहा उनिस न गुनिस अउ सोझे उहींचे खुसरगे।

 वतका बेरा ढुरी रक्सीन ह जंगल में किजरे बर निकले रहय। घर ह निच्चट सुन्ना रहय। भेड़ा ह बने हरहिन्छा घर ला चारो कोती किंजर-किंजर के देखिस। उहाँ रंग-रंग के खाय-पिये के जिनिस माढ़े रहय। भेड़ा ह खुश होगे। ओहा पहिली हकन के बने पेटभरहा उहाँ माढ़े मेवा-मिष्ठान ला झड़किस अउ आराम से बइठ के सोचे लगिस। ये ठउर ह तो मोर बर गजब सुघ्घर हे फेर ढुरी रक्सीन ह आके हाँक पारही तब काय कहूं। ढुरी रक्सीन ले बाँचे बर भेड़ा ह एक उपाय सोचिस।

रतिहा होईस तहन ढुरी रक्सीन किंजर के अपन घर पहुँचिस। कपाट ह भीतरी कोती ले बंद रहय। ढुरी रक्सीन ला बड़ा अचरज होईस। ओहा मने मन म गुनिस, अई! मैंहा तो कपाट ला बाहिर ले बंद करके गे रहेव। कोन बैरी मोर घर में खुसरगे हावे दई। 

ओहा गुसिया के चिचियाइस-‘‘अरे! मोर घर में कोन बैरी ह खुसरे हव रे।‘‘

ढुरी रक्सीन के के आरो पाके भेड़ा ह सुकुरदुम होगे। जीव में धुकधुकी समागे। फेर ओहा उप्पर छावा हिम्मत करके किहिस-‘‘अरे! कोन आय रे, मोर नाव नई सुने हावे का? भेड़ा-भेड़ा भेड़-भेड़ाकिन, सांप के आरी बनावव, बिच्छी के तुतारी बनावव, बन भंइसा ला नागर फांदव, ढुरी रक्सीन ला भुंज के खावव अउ बधुवा ला तीन थप्पड़ लगावव।‘‘

अनचिन्हार जिनावर के अइसन अवाज ला सुनके ढुरी रक्सीन के सिट्टी-पिट्टी गुम होगे। डर के मारे ओहा ठाढ़े-ठाढ़ सुखागे। ओहा सोचिस, ये ददा! लागथे कि मोर घर में कोन्हो बड़ा भारी जिनावर ह आके अपन माढ़ा बना डारे हावे। जीव बचाना हे तब इहाँ ले भागे ला पड़ही नई ते पराण नइ बांचे तइसे लागथे। ओहा तुरते उहाँ ले पल्ला भागिस।

रद्दा म ओखर भेट बघवा संग होगिस। बघुआ ह ओला देख के पूछिस-‘‘काय बात आय ढुरी रक्सीन बहिनी! अइसन काबर भागत हस?‘‘

ढुरी रक्सीन रोवत-रोवत किहिस-‘‘ काय बात ला बतावव बघुआ भइया! कोन जनी कोन जिनावर मोर घर में अपन माढ़ा बनाय हावे, हाँक पारथावं तब सांप के आरी बनाव, बिच्छी के तुतारी बनाव , बनभंइसा ला नांगर फांदव, ढुरी रक्सीन ला भुंज के खावव अउ बघुआ ला तीन थप्पड़ लगाववं कहिके मुही ला धमकी देथे।‘‘

 येला सुनके बघुआ ह खखवागे ओहा भड़क के किहिस-‘‘ अरे! ओखर अतेक हिम्मत, मैहा ये जंगल के राजा अवं अउ ओहा मोला तीन थप्पड़ लगाव कहिथे, चल तो भला मैहा देखथवं।‘‘

बघुआ के पाछू-पाछू ढुरी रक्सीन फेर अपन माढ़ा में पहुंँचिस। ये पइत बघुआ ह हाँक पारिस। बघुआ के दहाड़ ला सुनके भेड़ा के होश उड़ागे। ओहा आधा डर आधा बल करके फेर अपन मंतर ला पढ़ दिस। 

   अब तो बघुआ के हिम्मत घला पस्त होगे उहू अपन जीव बचाय बर उहाँ ले भागिस। अइसने-अइसने सांप बिच्छी, बनभंइसा संग रद्दा में ढुरी रक्सीन के भेंट होइस। सबो झन हिम्मत करके ढुरी रक्सीन के घर में जाय अउ भेड़ा के मंतर ला सुनके डर के मारे लहुट जाय। कोन्हो के हिम्मत घर में खुसरके वो अंजान जिनावर ला देखे के नई होय। अब ओ घर में ढुरी रक्सीन ह आय-जाय बर छोड़ दिस अउ भेड़ा ह हरहिन्छा अपन माढ़ा बनाके उहां रहय।    धीरे-धीरे उहाँ के खाय-पिये के सब समान सिरागे। भेड़ा ह ढुरी रक्सीन के घर के बने -बने जिनिस ला खा-पी के बने मोटागे रहय। अब ओहा गुनिस अब इहाँ रहना ठीक नइहे। कभु कहूँ मोर भेद ह खुल जाही तब इहाँ के जिनावर मन मोर पराण ला ले बिना नइ छोड़े। एक दिन झिमझाम देखके भेड़ा उहाँ ले कलेचुप भगागे।

अब भेड़ा ह अपन मितान बेन्दरा के घर पहुँचिस। ओला देख के बेन्दरा ला अपन करनी बर बहुत पछतावा होइस। ओहा लजा के अपन मुड़ी ला नवा के बइठगे। 

भेड़ा ह ओला कहिस-‘‘मितान अब लजाय के कोन्हों बात नइ हे जउन होना रिहिस तउन होगे।‘‘ 

भेड़ा के गोठ सुन के बेन्दरा के हिम्मत बाढ़िस। ओहा भेड़ा ला पूछिस-‘‘कइसे मितान! अतेक दिन ले कहाँ रहेव? बने मोटागे हावव, लागथे मनमाने माल पुआ झड़के हव।‘‘

भेड़ा ह अपन सब हाल - चाल ला साफ-साफ बतादिस। बेन्दरा ललचाके कहिस-‘‘ मितान! महू ला ढुरी रकसीन के घर के पता बता देतेव तो कुछ दिन महू उहां ले मालपुआ झड़क के आ जातेंव अब तो इहां जंगल के सब फल - फलहरी मन झरगे हावे खाय-पिये के कुछु नइ बांचे हे। देखव ना, मैहा कइसे भूख पियास में निच्चट दूबर-पातर होगे हवं।‘‘

भेंड़ा के जीव ह तो भीतरे- भीतर जरत रहय। ओला बने बदला ले के मउका मिलगे। ओहा बेन्दरा ला जंगल में ले जाके ढुरी रक्सीन के घर के पता ला बता दिस अउ ओला समझा के कहिस-‘‘देख मितान! ये घनघोर जंगल में हमेशा बघुआ-भालू, हुर्ड़ा-चितवा के डर बने रहिथे। तुमन भीतरी में खुसर के कपाट ला बंद कर देव अउ कोन्हो आके हाँक पारही तब मैं बतावत हवं उही मंतर ला भीतरीच ले पढ़हू। भेड़ा ह उही सांप ला आरी बनाव, बिच्छी के तुतारी बनावव, बनभंइसा ला नांगर फांदव, ढुरी रक्सीन ला मार के खावं अउ बघुआ ला तीन थप्पड़ लगावव वाला मंतर ला बता के उहाँ ले कलेचुप लहुटगे।

   बेन्दरा ह भीतरी में खुसर के कपाट के संकरी ला लगा दिस अउ भेड़ा के छोड़े जूठा-काठा जिनिस मन ला आरूग समझके खावत-पियत रहे लगिस।

येती बहुत दिन बाद ढुरी रक्सीन ला अपन घर के सुरता आइस। ओहा सोचिस, बहुत दिन तो बितगे हावे। मोर घर में जउन जिनावर ह कब्जा जमाय रिहिस ओहा अब भागगे होही। अइसे सोच के ओहा अपन जुन्ना घर में धमक दिस। 

     ढुरी रक्सीन ह फेर अपन घर के मोहाटी तीर जाके चिचया के कहिस-‘‘अरे! ढुरी रक्सीन के घर में कोन खुसरे हव रे?‘‘ 

बेन्दरा ह डर के मारे भेड़ा के बताय मंतर ला भुलागे अउ हुप-हुप करके येती-ओती उछले-कूदे लगिस। उछले-कूदे के अवाज ला सुनके ढुरी रकसीन ला शंका होगे ओहा कपाट तीर में जाके सेंध डहर ले देखिस, तब उहाँ बेन्दरा ह कूदत रहय। बेन्दरा ला देख के ढुरी रक्सीन के एड़ी के रिस तरवा में चढ़गे। 

     ओहा मने मन किहिस-‘‘रहा ले ले रे बेन्दरा! तोर सेती मैंहा गजब दुख भोगे हवं अब तोर मजा ला बतावत हवं।‘‘      अइसे सोच के ओहा उल्टा पाँव उहाँ ले लहुटगे अउ जंगल  में जाके ये बात ला बघुुआ-भालू, हुर्ड़ा-चितवा,सांप-बिच्छी सब ला बता दिस। सब के जी तो खखुवाय रहय। ओमन सब तुरते बेन्दरा ला मारो-मारो कहिके दौड़िन। सब झन मिल के ढुरी रक्सीन घर के कपाट ला तोड़ दिन अउ बेन्दरा ला पकड़ के वहा मार मारिन कि बेन्दरा मार के मारे दंदरगे।

मार के मारे बेन्दरा सिहरगे रहय। ओहा हाथ जोड़ के सबले माफी मांगत किहिस-‘‘ एक बेर मोर जीव ला बचा देव ददा हो ! आज मैंहा अपने करनी के फल ला भोगत हवं। मैहा अपन मितान भेड़ा के मुँहू में हाँसी-ठट्ठा करत हवं कहिके  थूंक पारे रहेव। हाँसी-हाँसी ह मोर टोटा के फाँसी होगे। आज भगवान ह मोर मुँहू में थूक दिस। मोला मोर करनी के फल मिलगे। इही पाय के कहे जाथे, जइसे करनी तइसे फल, आज नहीं ते मिलही कल।


बोड़रा ( मगरलोड)

जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)

महतारी भाँखा के जतन जरूरी हे

 विश्व महतारी भाँखा दिवस के अवसर मा...


महतारी भाँखा के जतन जरूरी हे


                    छत्तीसगढ़ी...... काय ए? सिर्फ भाषा या बोली? नही छत्तीसगढ़ी हमर मान ए, अभिमान, पहिचान ए। जइसे कोनो ला बंगाली बोलत सुनथन ता जान डरथन कि  वो बंगाल के ए, कोनो ला मराठी बोलत सुनथन ता जान डरथन कि वो महाराष्ट्र के ए, वइसने छत्तीसगढ़ी बोली छत्तीसगढ़ के पहिचान ला बताथे।भाषा या बोली सिर्फ मनखे के नही बल्कि देश, राज अउ अंचल के पहिचान होथे। ता का हमला अपन पहिचान ल भुलाना चाही? नही न…. कोनो लइका के चहेरा मुहरा आचार विचार अउ चाल चलन ल देखत कतको मन बता देथे कि वो फलाना के लइका ए। काबर कि ओ लइका म ओखर ददा दाई के पहिचान दिखथें। वइसने छत्तीसगढ़ी हमर माई बोली आय, जे हम ला पहिचान देथे। रंग रूप, खानपान, पहिनावा ओढ़ना, पार परम्परा अउ संस्कृति संस्कार के संगे संग भाँखा बोली घलो पहिचान के एक आभिन्न भाग आय। यदि हमन अपन बोली भाँखा ले भागबो त हमर पहिचान घलो नँदा जही। कोनो लइका ला ओखर ददा दाई के अलावा दूसर के लइका कहिलाय मा गरब नइ होय, अउ न वो लइका बने काहय। ता काबर फोकट अपन पहिचान ले मुंह मोड़ना? भला छत्तीसगढ़ी बोले अउ  छत्तीसगढिया काहय मा काके शरम? छत्तीसगढ़ी हमर माई बोली ए, जे भारतीय भाषा मा अर्धमागधी अपभ्रंश ले उपजे पूर्वी हिंदी के अंतर्गत आथे। जइसे महतारी के सेवा जतन ओखर बेटा ल ही करना पड़थे, वइसने हम सब छत्तीसगढिया मन ऊपर माई बोली छत्तीसगढ़ी के बढ़वार के भार हवै। कोनो भी भाँखा होय ओखर उतपत्ति बड़ श्रमसाध्य बूता होथे। आज अपन एक बात जमाना मा मनवा के देखव पता चल जही, कि कतका महीनत हे कोनो नवा शब्द गढ़ना अउ मनवाना? अइसन मा हमर पुरखा मनके महीनत बिरथा झन होय, अउ हमर माई बोली जन्मो जनम ये धरा धाम मा मिश्री घोरत रहे। भाँखा भाव के संवाहक होथे, छोटे बड़े कभू नइ होय। अइसन मा कोनो भी भाँखा ला छोटे बड़े कहना हमर नादानी होही। आज हम सब कतको काल्पनिक अउ मनगढ़त फिल्मी बोली भाँखा के नकल करई ला शान समझथन फेर जउन भाँखा हमर अंचल के पहिचान आय ओखर ले भागथन, ये कहाँ तक सही हे?


                      कखरो भी मुख ले निकले कोनो शब्द तब तक भाँखा नइ कहिलाये जब तक कि वो कोनो ला समझ मा नइ आ जाय, नही ते मनखे के आलावा चिरई- चिरगुन, कुकुर- बिलई, कीट- पतंगा आदि जीव जिनावर मनके बोली घलो भाँखा कहिलातिस। कोनो भी भाँखा बोली कागज पाथर मा कतको लिखा जाये, यदि बोलइया समझया नइ रही ता, प्राचीन काल के कतको भाँखा- बोली अउ लिपि कस कोनो संग्राहालय मा माड़े रहि जाही या फेर बिरथा हो जही। मनखे अपन मन के भाव ला भाँखा मा उतारथे, जेला समझ के आन मनखे ओखर संग जुड़थे। भाँखा मनखे ला जीव जानवर ले अलगाथे,भाँखा बिन मनखे, मनखे मनले नइ मिल सके। भाँखा भाव, भजन, भ्रमण सबे बर जरूरी हे। मनखे भले सुख मा दाई, ददा ला नइ सोरियाही, फेर आफत मा ए ददा, ए दाई कहिबेच करथे। कहे के मतलब महतारी अन्तस् मा रचे बसे रहिथे, वइसनेच आय महतारी भाँखा । यदि कोई  छत्तीसगढिया छत्तीसगढ़ी ले भागथे, दुरिहाथे ता वो मनखें समझ के घलो नासमझ बने के ढोंग करथे। छत्तीसगढ़ी मा कुकुर ला तू तू रे कहिबे ता पाछू लग जथे। बिलई ला मुनुमुनु-मुनुमुनु कहिबे ता आ जथे। गाय गरुवा हई आ, ओहो तोतो ला समझथे, कुकरी कुकरा ला कुरु कुरु कहिबे ता समझके तीर मा आ जथे, छेरी घलो हर्रो के बोली ला समझते।  ता हमन तो मनखें आन, थोर बहुत समय लगही बोले समझे मा अउ छत्तीसगढ़ी कोनो आन भाषा घलो नोहे महतारी भाषा ए, ता एला सिर्फ बोलना, लिखना,पढ़ना अउ समझना भर नइहे, बल्कि उचित स्थान अउ सम्मान देवाये बर लगही। तभे ये माटी मा जनम धरेन तेखर कर्जा उतरही। भले देखावा मा मनखे महतारी अउ महतारी भाँखा ला बिसार देथन, फेर आचार, विचार अउ संस्कृति संस्कार के दाता उही आय। महतारी भाँखा के संग मनखे के दया-मया, संस्कृति अउ संस्कार जुड़े होथे। महतारी भाँखा ले दुरिहाना मतलब अपन संस्कृति अउ संस्कार ला तजना हे। आज अपन भाँखा बोली के बढ़वार बर खुदे ला महिनत करे के जरूरत हे। कोनो भी चीज ला बनावत बड़ बेर लगथे, फेर उझारत छिन भर। अइसन मा चलत कोनो भाँखा बन्द हो जाय, दुर्भाग्य के बात हे। जइसे पानी ढलान कोती बहिथे, वइसने भाँखा घलो सरल कोती भागथे। अपन जुन्ना बोली बचन अउ माटी के सुवाद मा नवा जमाना के शब्दकोश ला शामिल करत, कठिन ले सरल के रथ मा सवार होके, उदार भाव ले सबला स्वीकारत, आज कोनो भी भाँखा बोली के अस्तित्व ला बचाये के उदिम करना चाही,तभे नवा जमाना संग जुन्ना बोली भाँखा टिक पाही। छत्तीसगढ़ी सवांगा पहिर के फ़ोटो खींचाय ले कुछु नइ होह, अन्तस् मा निर्मल भाव अउ समर्पण जरूरी हे, नही ते देखावा रूपी सुरसा के मुँह मा कतको चीज समागे। 


                    ये दुनिया बड़ अजब गजब हे। आज नवा जमाना मा मनखे सबे देश राज संग जुड़ के चलत हे। गाँव, शहर ले, शहर, महानगर अउ देश-विदेश ले जुड़े हे। सियान मन हाना मारत कहिथे कि, कोश कोश मा पानी बदले अउ  चार कोश मा बानी।  माने दुनिया मा बड़ अकन भाँखा  हे, जेखर पार पाना मुश्किल हे। आज मनखे सबे संग कदम ले कदम मिलाके चलत हे, अइसन मा एक सम्पर्क भाँखा जरूरत बन जाथे। मनखे ला महतारी भाँखा के संगे संग अपन देश अउ विश्व भर मा प्रचलित मुख्य भाँखा ला बोलना अउ समझना चाही। पहली संचार अउ सोसल मीडिया के अतिक व्यापकता नइ रिहिस, ना सबे मनखे के विश्वभर मा जाना आना, ते पाय के वो समय मनखे मन एक या दुये भाँखा जाने, पर आज अपन अस्तित्व बर महतारी भाँखा के संगे संग सम्पर्क भाँखा ला जानना जरूरी हे। भारत मा आज हिंदी सबे कोती बोले समझे जावत हे। संगे संग व्यापारिक भाषा के रूप मा अंग्रेजी जम्मो देश मा पाँव पसारत हे। मनखे मन ला अपन महतारी भाँखा के संग हिंदी, अउ अंग्रेजी के ज्ञान घलो होना चाही। आज के लइका मानसिक रूप ले ये सब बर तियार हे, कोनो लइका मन  ऊपर  एक ले अधिक भाषा ला बोले सीखे बर कहना, थोपना नही, बल्कि आज के जरूरत के रूप मा, बहुभाषी बनना कहे जाथे। एक भाषा ला धरके चलना आज सम्भव नइ हे, काबर कि मनखे जुड़ चुके हे, सरी दुनिया संग। आज भाषा जमाना के  नवा रूप के संग, सोसल मीडिया मा घलो जघा बनावत जावत हे। सब ला अपन महतारी भाँखा ला नवा दशा दिशा देना चाही, ओखर प्रसिद्धि अउ बढ़वार बर सोचना चाही। अनुवादिक एप, गूगल, टाइपिंग जैसे आज के जरूरी एप मा महतारी भाँखा छत्तीसगढ़ी दिखे, एखर बर आज के बुधियार लइका सियान मन ला बूता करना चाही, ताकि भाषा संस्कृति- संस्कार,साहित्य-समाज संग सोसल मीडिया मा घलो जिंदा रहे अउ सबला सहज समझ आये, तभे भाँखा के उमर बाढ़ही। 


अपन भाँखा के मान करव ,

दूसर भाँखा के सम्मान करव।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


विश्व महतारी भाँखा दिवस के आप सबो ला सादर बधाई,

विश्व महतारी भाषा दिवस” - छत्तीसगढ़ी

 “विश्व महतारी भाषा दिवस” - छत्तीसगढ़ी


घर के जोगी जोगड़ा, आन गाँव के सिद्ध - तइहा के जमाना के हाना आय। अब हमन नँगत हुसियार हो गे हन, गाँव ला छोड़ के शहर आएन, शहर ला छोड़ के महानगर अउ महानगर ला छोड़ के बिदेस मा जा के ठियाँ खोजत हन। जउन मन बिदेस नइ जा सकिन तउन मन विदेसी संस्कृति ला अपनाए बर मरे जात हें। बिदेसी चैनल, बिदेसी अत्तर, बिदेसी पहिनावा, बिदेसी जिनिस अउ बिदेसी तिहार, बिदेसी दिवस वगैरा वगैरा। जउन मन न बिदेस जा पाइन, न बिदेसी झाँसा मा आइन तउन मन ला देहाती के दर्जा मिलगे।


हमन दू ठन दिवस ला जानत रहेन - स्वतंत्रता दिवस अउ गणतन्त्र दिवस। आज वेलेंटाइन दिवस, मातृ दिवस, पितृ दिवस, राजभाषा दिवस, पर्यावरण दिवस अउ न जाने का का दिवस के नाम सुने मा आवत हे। ये सोच के हमू मन झपावत हन कि कोनो हम ला देहाती झन समझे। काबर मनावत हन ? कोन जानी, फेर सबो मनावत हें त हमू मनावत हन। बैनर बना के, फोटू खिंचा के फेसबुक अउ वाट्सएप मा डारबो तभे तो सभ्य, पढ़े लिखे अउ प्रगतिशील माने जाबो।


एक पढ़े लिखे संगवारी ला पूछ पारेंव कि विश्व मातृ दिवस का होथे ? एला दुनिया भर मा काबर मनाथें? वो हर कहिस - मोला पूछे त पूछे अउ कोनो मेर झन पूछ्बे, तोला देहाती कहीं। आज हमन ला जागरूक होना हे। जम्मो नवा नवा बात के जानकारी रखना हे। जमाना के संग चलना हे। लम्बा चौड़ा भाषण झाड़ दिस फेर ये नइ बताइस कि विश्व मातृ दिवस काबर मनाथे। फेर सोचेंव कि महूँ अपन नाम पढ़े लिखे मा दर्ज करा लेथंव।

फेसबुक अउ वाट्सएप मा कुछु काहीं लिख के डार देथंव। 


भाषा ला जिंदा रखे बर बोलने वाला चाही। खाली किताब अउ ग्रंथ मा छपे ले भाषा जिंदा नइ रहि सके। पथरा मा लिखे कतको लेख मन पुरातत्व विभाग के संग्रहालय मा हें फेर वो भाषा नँदा गेहे। पाली, प्राकृत अउ संस्कृत के कतको ग्रंथ मिल जाहीं फेर यहू भाषा मन आज नँदा गे हें  । माने किताब मा छपे ले भाषा जिन्दा नइ रहि सके, वो भाषा ला बोलने वाला जिन्दा मनखे चाही।


भाषा नँदाए के बहुत अकन कारण हो सकथे। नवा पीढ़ी के मनखे अपन पुरखा के भाषा ला छोड़ के दूसर भाषा ला अपनाही तो भाषा नँदा सकथे। रोजी रोटी के चक्कर मा अपन गाँव छोड़ के दूसर प्रदेश जाए ले घलो भाषा के बोलइया मन कम होवत जाथें अउ भाषा नँदा सकथे। बिदेसी आक्रमण के कारण जब बिदेसी के राज होथे तभो भाषा नँदा सकथे। कारण कुछु हो, जब मनखे अपन भाषा के प्रयोग करना छोड़ देथे, भाषा नँदा जाथे। 


छत्तीसगढ़ी भाषा ऊपर घलो खतरा मंडरावत हे। समय रहत ले अगर नइ चेतबो त छत्तीसगढ़ी भाषा घलो नँदा सकथे। छत्तीसगढ़ी भाषा के बोलने वाला मन छत्तीसगढ़ मा हें, खास कर के गाँव वाले मन एला जिंदा रखिन हें। शहर मा हिन्दी अउ अंग्रेजी के बोलबाला हे। शहर मा लोगन छत्तीसगढ़ी बोले बर झिझकथें कि कोनो कहूँ देहाती झन बोल दे। छत्तीसगढ़ी के संग देहाती के ठप्पा काबर लगे हे ? कोन ह लगाइस ? आने भाषा बोलइया मन तो छत्तीसगढ़ी भाषा ला नइ समझें, ओमन का ठप्पा लगाहीं ? कहूँ न कहूँ ये ठप्पा लगाए बर हमीं मन जिम्मेदार हवन। 


हम अपन महतारी भाषा गोठियाए मा गरब नइ करन। हमर छाती नइ फूलय। अपन भीतर हीनता ला पाल डारे हन। जब भाषा के अस्मिता के बात आथे तब तुरंत दूसर ला दोष दे देथन। सरकार के जवाबदारी बता के बुचक जाथन। सरकार ह काय करही ? ज्यादा से ज्यादा स्कूल के पाठ्यक्रम मा छत्तीसगढ़ी लागू कर दिही। छत्तीसगढ़ी लइका मन के किताब मा आ जाही। मानकीकरण करा दिही। का अतके उदिम ले छत्तीसगढ़ी अमर हो जाही?


मँय पहिलिच बता चुके हँव कि किताब मा छपे ले कोनो भाषा जिंदा नइ रहि सके, भाषा ला जिन्दा रखे बर वो भाषा ला बोलने वाला जिन्दा मनखे चाही। किताब के भाषा, ज्ञान बढ़ा सकथे, जानकारी दे सकथे, आनंद दे सकथे फेर भाषा ला जिन्दा नइ रख सके। मनखे मरे के बादे मुर्दा नइ होवय, जीयत जागत मा घलो मुर्दा बन जाथे। जेकर छाती मा अपन देश बर गौरव नइये तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन गाँव के गरब नइये तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन समाज बर सम्मान नइये, तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन भाषा बर मया नइये, तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर स्वाभिमान मर गेहे, तउन मनखे मुर्दा आय। 

जउन मन अपन छत्तीसगढ़िया होए के गरब करथें, छत्तीसगढ़ी मा गोठियाए मा हीनता महसूस नइ करें तउने मन एला जिन्दा रख पाहीं। 


अइसनो बात नइये कि सरकार के कोनो जवाबदारी नइये। सरकार ला चाही कि छत्तीसगढ़ी ला अपन कामकाज के भाषा बनाए। स्कूली पाठ्यक्रम मा छत्तीसगढ़ी भाषा ला अनिवार्य करे। अइसन करे ले छत्तीसगढ़ी बर एक वातावरण तैयार होही। शहर मा घलो हीनता के भाव खतम होही। छत्तीसगढ़ी ला रोजगार मूलक बनावय। रोजगार बर पलायन, भाषा के नँदाए के एक बहुत बड़े कारण आय। इहाँ के प्रतिभा ला इहें रोजगार मिल जाही तो वो दूसर देश या प्रदेश काबर जाही? छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार, लोक कलाकार ला उचित सम्मान देवय, उनकर आर्थिक विकास बर सार्थक योजना बनावय।


छत्तीसगढ़ी भाव-सम्प्रेषण बर बहुत सम्पन्न भाषा आय। हमन ला एला सँवारना चाही। अनगढ़ता, अस्मिता के पहचान नइ होवय। भाषा के रूप अलग-अलग होथे। बोलचाल के भाषा के रूप अलग होथे, सरकारी कामकाज के भाषा के रूप अलग होथे अउ साहित्य के भाषा के रूप अलग होथे। बोलचाल बर अउ साहित्यिक सिरजन बर मानकीकरण के जरूरत नइ पड़य, इहाँ भाषा स्वतंत्र रहिथे फेर सरकारी कामकाज बर भाषा के मानकीकरण अनिवार्य होथे। मानकीकरण के काम बर घलो ज्यादा विद्वता के जरूरत नइये, भाषा के जमीनी कार्यकर्ता, साहित्यकार मन घलो मानकीकरण करे बर सक्षम हें।


सरकार छत्तीसगढ़ी बर जो कुछ भी करही वो एक सहयोग रही लेकिन छत्तीसगढ़ी ला समृद्ध करे के अउ जिन्दा रखे के जवाबदारी असली मा छत्तीसगढ़िया मन के रही। यहू ला झन भुलावव कि जब भाषा मरथे तब भाषा के संगेसंग संस्कृति घलो मर जाथे।


“स्वाभिमान जगावव, छत्तीसगढ़ी मा गोठियावव”


लेखक - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)


चित्र मा मोर कल्पना ला साकार रूप देवइया छन्द के छ परिवार के छन्द साधक ईश्वर साहू "बन्धी"


🙏    🙏    🙏    🙏    🙏

दूधवाला के गोठ//*

 *//दूधवाला के गोठ//*

                  एकझन दूधवाला अपन साइकिल म रोज गांव ले शहर दूध लेके बेचे जावय।एक बार ओकर संग मोर भेंट होय रहिस।ओहा बतावत रहिस कि रोजेच सही एक दिन एकठन घर म दूध देवत रहेंव त ओतकेच बेर घर मालकिन कहिस कि ' आज पावडर वाला दूध देवथ हस का '...?तुरतेच मोर सुरता आ गिस कि दूध म पानी मिलाय बर भूलागे रहेंव। मोर मति मारे गे रहिस।रोज के पानी मिलावट वाला दूध देवत रहेंव अऊ ओ दिन बिना पानी मिलाय आरुग दूध दे पारेंव।

           आज के समे म जमाना उल्टा हे आरुग दूध देबे त पावडर वाला समझथें अऊ पानी मिलाके देबे त उही ल आरुग दूध समझथें काबर कि ओमन आरुग दूध देखे नि रहें।

नवा पीढ़ी बर प्रेरक व्यक्तित्व सुशील भोले*

 

*नवा पीढ़ी बर प्रेरक व्यक्तित्व सुशील भोले*


हमर अंचल के वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुशील भोले जी ह अपन जीवन के कुछ समय नगरगाँव म तको बिताय रिहिस हे। मोर बड़ सौभाग्य रहिन कि भोले जी ल बड़ नजदीक से जाने अउ सुने बर मिलिन, काबर भोले जी के पैतृक गाँव ह मोरो गाँव ये। ओकर जीवन के आदर्श ह केवल कुर्मी समाज भर नहीं वरन पूरा जनमानस ल प्रभावित करे हे। साहित्य के प्रति ओकर अडिग आस्था ल देख के मँय नतमस्तक हो जथव।वइसे तो हमर गाँव ल साहित्यकार के गाँव तको कहि सकथव। डॉ. ध्रुवकुमार वर्मा, रंगू प्रसाद नामदेव जी ह माटी के मान बढ़ाइस।अउ अब श्री सुशील भोले जी ह कलम साधना ले माटी ल  महकावत रिहिन हे। नवा पीढ़ी मा संगीता वर्मा ह आगू आवत हे। मोर बर बड़ गौरव के बात हरे सुशील भोले जी के साथ अनेकों मंच मा काव्य पाठ सँघरा करे के मौका मिलिस हे। एक संवेदनशील, विचारवान अउ जागरूक साहित्यकार के साथ मंच साझा करइ गौरव के बात तो रहिबे करही। हिंदी होय या छत्तीसगढ़ी भाखा कोनो भी विधा मा ओकर कलम सरलग चलते रहय। श्रृंगार होय चाहे शोषण या श्रम होय, उँकर कलम ह लिखे मा नइ डरय। एक निर्भिक साहित्यकार भोले जी के श्रम गीत याद आथे-

*सुन सुन बोली कान पिरागे, आश्वासन के धार बोहागे।*

*घुड़ुर घाड़र लबरा बादर कस, अब तो तोरो दिन सिरागे।*

*हमला आँसू कस बूँद नहीं, अब महानदी कस धार चाही।*

*चिटिक खेत अउ भर्री नहीं, हम ला सफ्फो खार चाही।*

*हमर हाथ मा जबर कमइया, धरती सरी चतवार चाही।*

अइसन गीत के सिरजइया सुशील भोले जी के जन्म 02/07/1961 दू जुलाई उन्नीस सौ इकसठ मा भाटापारा मा होय रिहिस. उकर पिताजी ह उहें गुरुजी रिहिन फेर गाँव उकर मन के नगरगाँव ह आय । पिता स्व. रामचन्द्र वर्मा, माता- स्व. उर्मिला देवी वर्मा, माता पिता के बड़का संतान सुरेश वर्मा दूसरइया सुशील वर्मा मिथलेश वर्मा, कमलेश वर्मा चार भाई अउ दू झन बहिनी प्रभा अउ सरोज वर्मा

पिताजी स्व.राम चन्द्र वर्मा प्राथमिक शाला मा गुरुजी रहिन। उनके पिता जी द्वारा लिखित प्राथमिक हिंदी व्याकरण अउ रचना अनुपम प्रकाशन रायपुर  ले छप के  मध्य प्रदेश राज्य के समे कक्षा तीसरी चौथी पाँचवी के पाठ्य पुस्तक मा चलय। पिताजी के लेखन ले प्रेरणा लेके सुशील जी ह तको लेखन के क्षेत्र मा आइस। सुशील जी के परिवार मध्यम वर्गीय परिवार रिहिस हे।1994 ले 2008 के बीच मा आध्यात्मिक साधना काल मा 

अर्थोपार्जन के काम ले अलग रहे के कारन गरीबी के तको के सामना करे बर पड़े हे परिवार ल। उनकर पिता जी के नाँव नगरगाँव मा दू एकड़ के खेती एक कच्चा मकान अउ एक खलिहान रिहिस चारों भाई मन के बँटवारा होय ले खेती अउ सिकुड़गे।सुशील जी ल संजय नगर, रायपुर के मकान बस बँटवारा मा मिले रिहिस हे।

सुशील जी ह हायर सेकंडरी अउ आई टी आई करे के बाद रोजी रोटी बर प्रेस मा कम्पोजिटर के काम तको करिन, प्रेस मा काम करत आगू बढ़िस अउ दैनिक अग्रदूत साप्ताहिक पत्रिका म उँकर प्रतिभा ल देख के संपादकीय काम के जिम्मेदारी दिस। 1983-84 मा ओकर पहिली कविता के प्रकाशन होइस। प्रदेश के यशस्वी पत्रकार साहित्यकार प्रो. विनोद शंकर शुक्ल जी ह उँकर रचना मा संसोधन करके फेर छपवाइस तब ले सुशील जी के लेखनी ह सरपट दउँड़े बर लगगे। उही बीच मा दैनिक तरूण, दैनिक अमृत संदेश अउ दैनिक छत्तीसगढ़ मा सह संपादक के पद मा तको काम करिन।1988 से 2005 तक खुदे के व्यवसाय बर प्रिंटिंग प्रेस के संचालन अउ मासिक पत्रिका "मयारू माटी" के प्रकाशन संपादन अउ साथे मा आडियो कैसेट रिकार्डिंग स्टूडियो के संचालन तको करिन। 'मयारू माटी' ह छत्तीसगढ़ी भाषा के पहिली संपूर्ण मासिक पत्रिका आय।

सुशील जी के बिहाव श्रीमती बसंती देवी वर्मा से होइस जेकर से तीन बिटिया रत्न नेहा, वंदना, ममता के रूप मा मिलिस। तीनों बिटिया के शादी करके एक तरह से गंगा नहा डरे हे।

सुशील भोले जी के प्रकाशित कृतियाँ मा

*छितका कुरिया (काव्य संग्रह), दरस के साध (लंबी कविता), जिनगी के रंग (गीत अउ भजन* *संकलन), ढेंकी (कहानी संकलन), आखर अंजोर (छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति ल उजागर करत लेख मन के संकलन), भोले के गोले (व्यंग्य संग्रह), सब ओखरे संतान (चारगोड़िया मनके संकलन), सुरता के बादर (संस्मरण)*

कालम लेखन मा भोले जी ह तको अगुवा रिहिन-

तरकश अउ तीर दैनिक नव भास्कर 1990, आखर अंजोर दैनिक तरूण 2006-07, डहर चलती दैनिक अमृत संदेश 2009, गुड़ी के गोठ साप्ताहिक इतवारी अखबार 2010ले 2015, बेंदरा बिनास 1988-89, किस्सा कलयुगी हनुमान के 1988-89,

प्रदेश अउ राष्ट्रीय स्तर मा गंज अकन पत्र पत्रिकाओं मा कविता, कहिनी, समीक्षा, साक्षात्कार नियमित रूप ले प्रकाशन होत राहय।

लहर अउ फूलबगिया आडियो कैसेट मा उँनकर गीत लेखन अउ गायन के एक नवा अंदाज सुने देखे बर मिलथे। भजन गायन अउ गीत गावत तको कइ ठन सांस्कृतिक मंच मा भोले जी दिख जथे। गुजरात के राजधानी अहमदाबाद मा 8 अक्टूबर 2017 मा भारत सरकार के साहित्य अकादमी ह गुजराती अउ छत्तीसगढ़ी साहित्य के आयोजन करे रिहिस जेन मा सुशील भोले जी ह तको कविता पाठ करे रिहिस हे उँकर साथ डा. केशरी लाल वर्मा, डॉ. परदेशी राम वर्मा, रामनाथ साहू अउ मीर अली मीर जी ह तको प्रतिभागी रिहिन हे।

सम्मान अउ पुरस्कार के बात करबो त भोले जी ल 2010 मा  छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग ले आयोजित कार्यक्रम मा भाषा सम्मान ले सम्मानित करे जा चुके हावै। बहुत अकन सामाजिक संगठन साहित्यिक संगठन, सांस्कृतिक संगठन मा भोले जी सम्मानित होय हे।

सुशील भोले जी के रुझान ह बचपन ले अध्यात्म मा हावय तेकरे सेती अध्यात्म मा वोला कबीर दास बहुत पसंद हे।उँकर पसंदीदा लेखक राष्ट्रीय मा मुंशी प्रेमचंद, अंर्तराष्ट्रीय मा गोर्की अउ स्थानीय मा लोक जीवन अउ जन चेतना बगरइया जम्मो लेखक बहुते पसंद हे।

उकरे सेती वोहा छत्तीसगढ़ के मूल आदिधर्म अउ संस्कृति ल बिशेष रूप ले लिखथे, वाचन करथे, अउ प्रकाशन अउ जमीनी स्तर मा पुनस्र्थापित करे के काम करथे। इही कारन आय 1994 से 2008 तकरीब 14 साल तक साहित्य, संस्कृति, कला ला सिरजाय खातिर गृहस्थ जीवन ल अलग करके आध्यात्मिक साधना मा लीन होगे रिहिन। जब गाँव आइन त हमन देख के अकबका गेयेन हमन सोचन येहा साधु बनगे तइसे लागथे कहिके गोठियावन फेर पूछे के हिम्मत नइ जुटा पात रेहेन।

आज उँकर इच्छा रिहिस छत्तीसगढ़ के मूल आदि धर्म अउ संस्कृति के मापदंड मा ही इहाँ के सांस्कृतिक- इतिहास के पुर्नलेखन होवय. उँकर कहना हावय अभी तक जेन भी लिखे हे, लिखाय हे उत्तर भारत ले आय ग्रन्थ के हिसाब ले लिखे हवै। येकरे सेती अइसन कोनों ग्रन्थ ल छत्तीसगढ़ के धर्म संस्कृति इतिहास के मानक नइ मान सकन आज जरूरत हावै छत्तीसगढ़ के संस्कृति अउ धर्म, इतिहास ल इहाँ के अपन मूल संदर्भ मा लिखा जाय। इही कहना रिहिस हे भोले जी के।

वर्तमान मा भोले जी 24 अक्टूबर 2018 से लकवा ले ग्रसित रिहिस, तभो ले घर मा रहिके साहित्य साधना अनवरत करत रहय। नवा पीढ़ी बर सीखे के एक सबक आय अतका दुख तकलीफ मा अइसन जीवटता वाले व्यक्ति ल मँय बचपन से देखत सुनत आवत रेहेंव।

दुख के पहाड़ टूट अँधियारी रात भोले जी के जीवन मा आइस, हम सब के पूरा बिश्वास रिहिस निराशा के बादर छटही अउ भोले जी के जिनगी मा सूरज नवा बिहान लेके आही। अइसन कामना करत श्री सुशील भोले जी बर भगवान ले आशीष माँगे रेहेन।जिनगी के गाड़ी बने चलत तको रिहिस अउ रोज बड़े बिहनिया ले सोशल मीडिया म सक्रिय होके अपन रचना ल पोस्ट तको करय। आखिरी दम तक भोले जी छत्तीसगढ़ के माटी के महक अउ स्वाभिमान ल लोगन के बीच रखत गिस हे। फेर आज दिनाँक 26/02/2026 गुरुवार अचानक असामयिक निधन के खबर मन ला झकझोर के रख दिस।उँकर असामयिक काल के गाल म जाना पूरा छत्तीसगढ़ अउ हम सब के लिए अपूर्णीय क्षति हरे।माटी के लाल भोले जी ल श्रद्धांजलि स्वरूप श्रद्धा के फूल अर्पित करत हँव। भगवान वोला अपन श्री चरणों म स्थान दय।

वर्तमान मा भोले जी के परिवार के पता हे-41-191 डॉ बघेल गली संजय नगर टिकरापारा रायपुर छत्तीसगढ़

मोबाइल 98269-92811

आलेख

-विजेंद्र वर्मा

ग्रा. पो. नगरगाँव (धरसींवा)

जिला -रायपुर (छत्तीसगढ़)

मोबा. नं.9424106787

इंटरव्यूह* (छत्तीसगढ़ी लघु कथा) - डाॅ विनोद कुमार वर्मा

 .            *इंटरव्यूह* (छत्तीसगढ़ी लघु कथा)


                            - डाॅ विनोद कुमार  वर्मा 


        ' बच्चा मँय काली भक्त हँव। काली माता तोर कल्याण करही।'

       ' धन्यवाद महराज! '

     ' बच्चा सौ रूपये दे दे। मँय  तोर बर देवी माता ले मन्नत माँग लेहूँ! '

     ' बाबा, मोर करा देहे बर पइसा नि हे। इन्टरव्यूह देहे बर स्टेशन ले पैदल ही जावत हँव! '

     ' दान नि देबे त माता तोला इंटरव्यूह मा फेल करा देही। माता के प्रकोप ले डर! '

        ' माते तो जगत कल्याणी हे। ओकर अइसना निम्नस्तरीय सोच नि  हो सके! '

       ' बेवकूफ, जा गंदी नाली मा गिर! मोर श्राप हे!!'

    अमितेश के हाथ-पैर काँपे ला धर लीस फेर कोनो तरा वोहा संभल गे अउ इंटरव्यूह देहे पहुँचिच् गे। 

       थोरकुन दिन बाद रिजल्ट घोषित होइस। अमितेश नायब तहसीलदार सलेक्ट हो गे रहिस!

पतझड़ के पीरा

 पतझड़ के पीरा 




         “तीन  बड़का रितु हांवय - बरसात ,जाड़ अउ गर्मी । तीनों रितु के अपन अपन  विशेषता हावय। मनखे के जिनगी मा रितु  के अबड़ेच  प्रभाव पड़थे।बरसात मा पानी गिरे ले खेती होथे जेखर ले मनखे ला जीये खाये बर अन्न मिलथे। जाड़ के दिन मा तरह तरह के साग भाजी निकलथे। गर्मी मा झांझ के मारे घर ले  निकले बर मुश्किल हो जाथे ,नदियाँ -तरिया सुखा घलौ जाथे ,भाप बनके उड़ाय पानी हा बादर बनके बरसथे।रितु के बदले ले मनखे के जिनगी घलौ बदलथे जेमा खान पान ,रहन सहन शामिल हावय। तीनों रितु  मा लेखक, कवि मन के लेखनी  अबड़ेच चलथे जेमा रितु मन के महत्तम मा गीत, कविता कहानी लिखे जाथे।इन तीनों रितु मन के सिवाय अउ रितु घलौ होथे जेमन बड़का तो नो हयँ फेर उखरो अबड़ेच महत्तम हावय । जाड़ अउ  गर्मी के बीच मा पतझड़ अउ बसंत आथे। पतझड़ मा पेड़ मन के पाना गिर जाथे ,तहाँ ले बसंत मा नवा पाना उल्होथे। बसंत रितु बर घलौ अबड़े गीत लिखे गिस फेर पतझड़ के पीरा ला जादा नइ लिखे गिस । पतझड़ के रितु अपन संग उदासी लेके आथे ये हा हर बछर फरवरी के महीना के आस पास रहिथे ।

          पतझर के पीरा ला उही मनखे समझ सकथे जेहा अपन कोनों मयारुक ला  खोय होही । पतझर हा जिनगी के सच्चाई ला दिखाथे ।बसंत मा उल्होय कोवर कोवर  लाल गुलाबी पाना जेहा नवजीवन के संदेश देथे तुरते के होय लइका कस कोमल मासूम अउ निर्दोष रहिथे।धीरे धीरे पाना हा ललहुँ गुलाबी ले हरियर होय लागथे बाढ़त लइका सरीक।पाना अभियोच कोवर रहिथे ।अब पाना अउ बाढ़ जाथे तहाँ ले लहलहाय लगथे उल्लास उमंग के संग मा जइसन जवानी हिलोर मारथे मनखे के नस नस मा एक  विशेष अवस्था मा ।झूमरत गावत पेड़ फूले फरे लागथे अइसने तो मनखे के जिनगी घलौ होथे। अब पाना अनुभवी सियनहा कस हो जाथे, कलेचुप पतझर आ जाथे हरियर पाना पींयर पड़े लगथे ,सुखाय लगथे अउ एक दिन अपन डारा, अपन पेड़ ला छोड़ गिर जाथे अउ माटी मा मिल जाथे ।मनखे घलौ एक दिन अपन महल अटारी लाव लस्कर ला छोड़ रेंग देथे।अमीर गरीब, राजा प्रजा, सबला एक दिन जाएच बर हे।अब कोनो आघू कोनों पाछू भले जाय। फेर जाय बर परबेच करही।ये माटी के काया ला माटी मा मिल जाना हे ।पाना के झरे के  वैज्ञानिक कारण घलौ हावय जाड़ के दिन मा दिन छोटे होय ले तापमान कम हो जाथे तेपाय के क्लोरोफिल बनना कम हो जाय के कारण पोषण के कमी हो जाथे अउ पाना मन सूखा के गिरे लगथे।पाना मन के गिरे ले पानी अउ ऊर्जा दूनों के बचत होथे।

             पाना के गिरे ले पेड़ हा उजाड़ उदास खड़े रहिथे ,बेटी के बिदा के बाद के बिहतिया घर हा सुन्ना साँय साँय लगथे तइसन।अपार पीरा रहिथे पेड़ के मन मा ,फेर ये पीरा ला कोनों नी समझ सके ,ना पेड़ हा कखरो से कही सके।मनखे के कई ठन पीरा घलौ तो अव्यक्त रही जाथे।मन के पीरा ला  मन मा भरके पेड़ हा बाट जोहथे बसंत के।बसंत के आय ले पेड़ के मन मंजूर झूमरे लगथे।पतझड़ के पीरा हा 

प्रसव पीरा सही नवजीवन लेके आथे।इही जिनगी के सार घलौ आय। जन्म मरण ये  भुइयाँ जेला मत्युलोक कहे गय हे तेकर अकाट्य सच्चाई आय।



चित्रा श्रीवास

सिरगिट्टी बिलासपुर

छत्तीसगढ़