(लघुकथा )
आफत
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ट्रेन ला अगोरत स्टेशन मा बइठे-बइठे अपन मोबाइल मा वाट्सऐप, फेसबुक मन ला कोंचकत रहेंव। वोतके बेर एकझन अधेड़ महिला हा आके कहिच--
"ये बाबू थोकुन मोबाइल ला देबे का?"
"काबर वो?"--मैं पूछेंव।
"मोबाइल ला घर मा भुलागेंव हा बाबू। चरडबिया मा आवत हँव कहिके बेटा ला लेगे बर स्टेशन आ जबे कहिके फोन करहूँ?"
नारी परानी के सहायता करना चाही सोचके वोला मोबाइल ला दे देंव।
वोहा थोकुन दूरिहा मा बइठे बीस-पचिस बछर के एक झन नोनी ला थमा दिच। वोहा नम्बर लगा के लम्बा चौड़ा पाँच-छै मिनट ले गोठियाये ला धरलिच। मजबूरी मा मोबाइल ला माँगे ला परगे।
गाड़ी आइच तहाँ ले बइठगेंव। वोमन कती गेइन तेला नइ देख पायेंव। गाड़ी हा स्टेशन ले निकले बस पाये रहिसे एक ठो अनजान नंबर ले कड़क अवाज में फोन अइस- " हलो --हलो--हलो --"
"हलो हलो --तैं कोन अच भइया?"
"अरे तुम कौन हो पहले बताओ? जादा सयाना मत बनो। इसी नम्बर से कुछ देर पहले मेरी पत्नी का फोन आया था? कहाँ है वो। घर से झगड़ के भागी है?"
मोर माथा झंनागे। मन हा कहे ला धरलिच के आज तैं आफत मा परगेच। अउ भलमनसी देखाबे?
मैंहा वो फोन करइया ला कहेंव- "मैं कुछु नइ जानवँ आदरणीय। भल ला भल जानेंव।कुछु परेशानी मा होही कहिके मांगिस ता फोन ला दे परेंव।फेर एक झन अधेड़ महिला हा रायपुर स्टेशन मा माँगे रहिसे। वोमन कती गेइन तेला नइ जानवँ। "
मैं चुपचाप लकर-धकर स्विच आफ करेंव।
जइसे घर पहुँचेंव। सब ले पहिली थाना जाके ये घटना ला लिखवायेंव।
चोवा राम वर्मा 'बादल '
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