Sunday, 1 March 2026

लघुकथा) -------------- *संस्कृति बदलत हे*

 (लघुकथा)

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*संस्कृति बदलत हे*


          हमर छत्तीसगढ़ मा अपन माटी, अपन संस्कृति,अपन पुरखा अउ सियान मन के सम्मान करे के रिवाज सदियों ले चले आवत हे। अगहन महीना मा दाई अन्नपूर्णा के कृपा हा साक्षात् बरसथे, जब हमर धनहा डोली मा उपजे फसल हा लुआ टोराके कोठार मा आ जथे, माटी महतारी अउ गाँव के देवी देवता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करे के ये बहुत बढ़िहा मौका होथे।

        

             अउ तब फेर सिलसिला चालू होथे मड़ई मेला के, गाँव-गाँव मा उछाव होथे,चार महीना के चौमासा ले थके हारे मन, अपन प्रियजन ला पाके गदगद हो जाथे अउ जिनगी ला नवाँ ढंग नवाँ उमंग ले जीये बर प्रेरणा देथे।


                फेर आज हमर संस्कृति ऊपर घलो शराब के संस्कृति हावी होवत जात हे जउन हमर विरासत ला लीले के जबर ओखी बन गेहे।


         अइसने एकठन गाँव मा मड़ई के आयोजन होइस, सब लोग बाग खुशी मा नाचत गावत राहँय, बाजा-रूंजी संग गाँव के जम्मो लइका, जवान, सियान मन माता देवाला, ठाकुरदेव ला मनावत गुड़ीपारा के चौक मा सकलाय हे, ओतके बेरा मंच ले उद्घोषक हा कहिथे...........!!!


        आप जम्मो ग्रामवासी अउ तीर तखार ले आय पहुना मन के पैलगी करत हँव...... आप सबके हार्दिक स्वागत हे, अभिनंदन हे। गाँव के जम्मो देवी देवता के पूजा अर्चना के बाद अब सबो सियान मन के सम्मान करे जाही। 


         ततकेच बेरा एक झन दरुहा लड़बिड़- लड़बिड़ करत मंच मा चढ़के चिल्लाय बर धर लिस, ओला मंच ले उतारे बर सब हाँव-हाँव करे बर धर लिन, भरभर-भरभर एती-ओती लोगन मन भागत हे,लइका मन के रोवाराही परगे,झूमाझटकी मा सब तितर-बितर होगे,माइक घलो टूटगे,भीड़ हा बगियागे।हमर संस्कृति कोन डहर जात हे,सोंच के मोर मति छरियागे।




🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छग

7354958844

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