Sunday, 1 March 2026

भेंड़ा अउ बेन्दरा वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी लोक कथा


भेंड़ा अउ बेन्दरा


वीरेन्द्र ‘सरल‘

एक जंगल में एक भेड़ा अउ बेन्दरा ह अलग-अलग ठउर में रहय। अलग-अलग किंजरे अउ खाय-पिये। एकदिन उदुप ले दुनो झन के एक ठउर में भेट होगे। दुनो झन एक-दूसर के परिचे जानिन अउ मितान बधगे। अब दुनो झन एके संग खाय-पिये अउ किंजरे। जंगल में  चार-तेन्दू असन किसम-किसम के फर ला देख के बेन्दरा ह पेड़ में चढ़े अउ तोड़-तोड़ के खाल्हे में गिरावत जाय, भेड़ा ह सबला सकेल के राखे, बेन्दरा ह पेड़ ले उतरे तहन दुनो मितान मन के अघात ले खाय। अइसने-अइसने अड़बड़ दिन बीतगे। 

एक दिन के बात आय, दुनो मितान जंगल में किंजरे बर गे रहय। बेन्दरा ह चिरई जाम के पेड़ में चढ़के फर ला तोड़त रहय। उही बेरा ओला भेड़ा संग ठट्ठा मढ़ाय के शउख लागिस। 

ओहा भेड़ा ला किहिस-‘‘ मितान फर ला सकेले में आप मन ला गजब बेरा लागथे, फर हा धुर्रा-माटी में सना घला जथे तेखर ला आप मन अपन मुँहू ला उला के मोर कोती ला देखत रहव। मैंहा बने तुक के फर ला आपके मुँहू में फेकहूं तहन आप मन बने गप ले खा लेहू।"

 भेड़ा ह भल - ला - भल जानिस अउ हव कहिके अपन आँखी ला मूंद के अउ मुँहू ला बने खोल के पेड़ उप्पर चढ़े बेन्दरा कोती ला देखे लगिस। मौका पाके बेन्दरा ह भेड़ा के मुँहू में खखार के थूक दिस। 

भेड़ा ह थू-थू करत जंगल कोती भागिस। भेड़ा ह भागत-भागत घनघोर जंगल में पहुँचगे । ओहा निचट थकगे रहय। थोड़किन सुस्ता लेथव कहिके ओहा एक ठन पेड़ के खाल्हे में बइठगे। थकासी के मारे ओखर नींद ह पड़गे। नींद उमचिस तब ओहा देखथे के दिन ह बुड़गे रहय। जंगल ह सांय-सांय करत रहय। अब डर के मारे भेड़ा के जीव ह पोट-पोट करे लगिस।

भेड़ा ह मने-मन गुनत रहय-‘‘हे भगवान! मैंहा तो अलकरहा आफत में फंसगे हवं। रतिहा होही तहन बघवा भालू, हुर्ड़ा-चितवा मन अपन-अपन माढ़ा ले निकल के किंजरही? कहूं उखर नजर मोर उपर पड़ जाही तब तो मोर जीव नइ बांचे, अब मैहा काय करवं?"

डर के मारे भेड़ा ह अपन जीव बचाय बर अउ रतिहा पोहाय बर येती-ओती चारो कोती ठउर खोजे लगिस। तभे ओला जंगल भीतरी बने ढुरी रक्सीन के घर ह दिखगे। ओहा उनिस न गुनिस अउ सोझे उहींचे खुसरगे।

 वतका बेरा ढुरी रक्सीन ह जंगल में किजरे बर निकले रहय। घर ह निच्चट सुन्ना रहय। भेड़ा ह बने हरहिन्छा घर ला चारो कोती किंजर-किंजर के देखिस। उहाँ रंग-रंग के खाय-पिये के जिनिस माढ़े रहय। भेड़ा ह खुश होगे। ओहा पहिली हकन के बने पेटभरहा उहाँ माढ़े मेवा-मिष्ठान ला झड़किस अउ आराम से बइठ के सोचे लगिस। ये ठउर ह तो मोर बर गजब सुघ्घर हे फेर ढुरी रक्सीन ह आके हाँक पारही तब काय कहूं। ढुरी रक्सीन ले बाँचे बर भेड़ा ह एक उपाय सोचिस।

रतिहा होईस तहन ढुरी रक्सीन किंजर के अपन घर पहुँचिस। कपाट ह भीतरी कोती ले बंद रहय। ढुरी रक्सीन ला बड़ा अचरज होईस। ओहा मने मन म गुनिस, अई! मैंहा तो कपाट ला बाहिर ले बंद करके गे रहेव। कोन बैरी मोर घर में खुसरगे हावे दई। 

ओहा गुसिया के चिचियाइस-‘‘अरे! मोर घर में कोन बैरी ह खुसरे हव रे।‘‘

ढुरी रक्सीन के के आरो पाके भेड़ा ह सुकुरदुम होगे। जीव में धुकधुकी समागे। फेर ओहा उप्पर छावा हिम्मत करके किहिस-‘‘अरे! कोन आय रे, मोर नाव नई सुने हावे का? भेड़ा-भेड़ा भेड़-भेड़ाकिन, सांप के आरी बनावव, बिच्छी के तुतारी बनावव, बन भंइसा ला नागर फांदव, ढुरी रक्सीन ला भुंज के खावव अउ बधुवा ला तीन थप्पड़ लगावव।‘‘

अनचिन्हार जिनावर के अइसन अवाज ला सुनके ढुरी रक्सीन के सिट्टी-पिट्टी गुम होगे। डर के मारे ओहा ठाढ़े-ठाढ़ सुखागे। ओहा सोचिस, ये ददा! लागथे कि मोर घर में कोन्हो बड़ा भारी जिनावर ह आके अपन माढ़ा बना डारे हावे। जीव बचाना हे तब इहाँ ले भागे ला पड़ही नई ते पराण नइ बांचे तइसे लागथे। ओहा तुरते उहाँ ले पल्ला भागिस।

रद्दा म ओखर भेट बघवा संग होगिस। बघुआ ह ओला देख के पूछिस-‘‘काय बात आय ढुरी रक्सीन बहिनी! अइसन काबर भागत हस?‘‘

ढुरी रक्सीन रोवत-रोवत किहिस-‘‘ काय बात ला बतावव बघुआ भइया! कोन जनी कोन जिनावर मोर घर में अपन माढ़ा बनाय हावे, हाँक पारथावं तब सांप के आरी बनाव, बिच्छी के तुतारी बनाव , बनभंइसा ला नांगर फांदव, ढुरी रक्सीन ला भुंज के खावव अउ बघुआ ला तीन थप्पड़ लगाववं कहिके मुही ला धमकी देथे।‘‘

 येला सुनके बघुआ ह खखवागे ओहा भड़क के किहिस-‘‘ अरे! ओखर अतेक हिम्मत, मैहा ये जंगल के राजा अवं अउ ओहा मोला तीन थप्पड़ लगाव कहिथे, चल तो भला मैहा देखथवं।‘‘

बघुआ के पाछू-पाछू ढुरी रक्सीन फेर अपन माढ़ा में पहुंँचिस। ये पइत बघुआ ह हाँक पारिस। बघुआ के दहाड़ ला सुनके भेड़ा के होश उड़ागे। ओहा आधा डर आधा बल करके फेर अपन मंतर ला पढ़ दिस। 

   अब तो बघुआ के हिम्मत घला पस्त होगे उहू अपन जीव बचाय बर उहाँ ले भागिस। अइसने-अइसने सांप बिच्छी, बनभंइसा संग रद्दा में ढुरी रक्सीन के भेंट होइस। सबो झन हिम्मत करके ढुरी रक्सीन के घर में जाय अउ भेड़ा के मंतर ला सुनके डर के मारे लहुट जाय। कोन्हो के हिम्मत घर में खुसरके वो अंजान जिनावर ला देखे के नई होय। अब ओ घर में ढुरी रक्सीन ह आय-जाय बर छोड़ दिस अउ भेड़ा ह हरहिन्छा अपन माढ़ा बनाके उहां रहय।    धीरे-धीरे उहाँ के खाय-पिये के सब समान सिरागे। भेड़ा ह ढुरी रक्सीन के घर के बने -बने जिनिस ला खा-पी के बने मोटागे रहय। अब ओहा गुनिस अब इहाँ रहना ठीक नइहे। कभु कहूँ मोर भेद ह खुल जाही तब इहाँ के जिनावर मन मोर पराण ला ले बिना नइ छोड़े। एक दिन झिमझाम देखके भेड़ा उहाँ ले कलेचुप भगागे।

अब भेड़ा ह अपन मितान बेन्दरा के घर पहुँचिस। ओला देख के बेन्दरा ला अपन करनी बर बहुत पछतावा होइस। ओहा लजा के अपन मुड़ी ला नवा के बइठगे। 

भेड़ा ह ओला कहिस-‘‘मितान अब लजाय के कोन्हों बात नइ हे जउन होना रिहिस तउन होगे।‘‘ 

भेड़ा के गोठ सुन के बेन्दरा के हिम्मत बाढ़िस। ओहा भेड़ा ला पूछिस-‘‘कइसे मितान! अतेक दिन ले कहाँ रहेव? बने मोटागे हावव, लागथे मनमाने माल पुआ झड़के हव।‘‘

भेड़ा ह अपन सब हाल - चाल ला साफ-साफ बतादिस। बेन्दरा ललचाके कहिस-‘‘ मितान! महू ला ढुरी रकसीन के घर के पता बता देतेव तो कुछ दिन महू उहां ले मालपुआ झड़क के आ जातेंव अब तो इहां जंगल के सब फल - फलहरी मन झरगे हावे खाय-पिये के कुछु नइ बांचे हे। देखव ना, मैहा कइसे भूख पियास में निच्चट दूबर-पातर होगे हवं।‘‘

भेंड़ा के जीव ह तो भीतरे- भीतर जरत रहय। ओला बने बदला ले के मउका मिलगे। ओहा बेन्दरा ला जंगल में ले जाके ढुरी रक्सीन के घर के पता ला बता दिस अउ ओला समझा के कहिस-‘‘देख मितान! ये घनघोर जंगल में हमेशा बघुआ-भालू, हुर्ड़ा-चितवा के डर बने रहिथे। तुमन भीतरी में खुसर के कपाट ला बंद कर देव अउ कोन्हो आके हाँक पारही तब मैं बतावत हवं उही मंतर ला भीतरीच ले पढ़हू। भेड़ा ह उही सांप ला आरी बनाव, बिच्छी के तुतारी बनावव, बनभंइसा ला नांगर फांदव, ढुरी रक्सीन ला मार के खावं अउ बघुआ ला तीन थप्पड़ लगावव वाला मंतर ला बता के उहाँ ले कलेचुप लहुटगे।

   बेन्दरा ह भीतरी में खुसर के कपाट के संकरी ला लगा दिस अउ भेड़ा के छोड़े जूठा-काठा जिनिस मन ला आरूग समझके खावत-पियत रहे लगिस।

येती बहुत दिन बाद ढुरी रक्सीन ला अपन घर के सुरता आइस। ओहा सोचिस, बहुत दिन तो बितगे हावे। मोर घर में जउन जिनावर ह कब्जा जमाय रिहिस ओहा अब भागगे होही। अइसे सोच के ओहा अपन जुन्ना घर में धमक दिस। 

     ढुरी रक्सीन ह फेर अपन घर के मोहाटी तीर जाके चिचया के कहिस-‘‘अरे! ढुरी रक्सीन के घर में कोन खुसरे हव रे?‘‘ 

बेन्दरा ह डर के मारे भेड़ा के बताय मंतर ला भुलागे अउ हुप-हुप करके येती-ओती उछले-कूदे लगिस। उछले-कूदे के अवाज ला सुनके ढुरी रकसीन ला शंका होगे ओहा कपाट तीर में जाके सेंध डहर ले देखिस, तब उहाँ बेन्दरा ह कूदत रहय। बेन्दरा ला देख के ढुरी रक्सीन के एड़ी के रिस तरवा में चढ़गे। 

     ओहा मने मन किहिस-‘‘रहा ले ले रे बेन्दरा! तोर सेती मैंहा गजब दुख भोगे हवं अब तोर मजा ला बतावत हवं।‘‘      अइसे सोच के ओहा उल्टा पाँव उहाँ ले लहुटगे अउ जंगल  में जाके ये बात ला बघुुआ-भालू, हुर्ड़ा-चितवा,सांप-बिच्छी सब ला बता दिस। सब के जी तो खखुवाय रहय। ओमन सब तुरते बेन्दरा ला मारो-मारो कहिके दौड़िन। सब झन मिल के ढुरी रक्सीन घर के कपाट ला तोड़ दिन अउ बेन्दरा ला पकड़ के वहा मार मारिन कि बेन्दरा मार के मारे दंदरगे।

मार के मारे बेन्दरा सिहरगे रहय। ओहा हाथ जोड़ के सबले माफी मांगत किहिस-‘‘ एक बेर मोर जीव ला बचा देव ददा हो ! आज मैंहा अपने करनी के फल ला भोगत हवं। मैहा अपन मितान भेड़ा के मुँहू में हाँसी-ठट्ठा करत हवं कहिके  थूंक पारे रहेव। हाँसी-हाँसी ह मोर टोटा के फाँसी होगे। आज भगवान ह मोर मुँहू में थूक दिस। मोला मोर करनी के फल मिलगे। इही पाय के कहे जाथे, जइसे करनी तइसे फल, आज नहीं ते मिलही कल।


बोड़रा ( मगरलोड)

जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)

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