पतझड़ के पीरा
“तीन बड़का रितु हांवय - बरसात ,जाड़ अउ गर्मी । तीनों रितु के अपन अपन विशेषता हावय। मनखे के जिनगी मा रितु के अबड़ेच प्रभाव पड़थे।बरसात मा पानी गिरे ले खेती होथे जेखर ले मनखे ला जीये खाये बर अन्न मिलथे। जाड़ के दिन मा तरह तरह के साग भाजी निकलथे। गर्मी मा झांझ के मारे घर ले निकले बर मुश्किल हो जाथे ,नदियाँ -तरिया सुखा घलौ जाथे ,भाप बनके उड़ाय पानी हा बादर बनके बरसथे।रितु के बदले ले मनखे के जिनगी घलौ बदलथे जेमा खान पान ,रहन सहन शामिल हावय। तीनों रितु मा लेखक, कवि मन के लेखनी अबड़ेच चलथे जेमा रितु मन के महत्तम मा गीत, कविता कहानी लिखे जाथे।इन तीनों रितु मन के सिवाय अउ रितु घलौ होथे जेमन बड़का तो नो हयँ फेर उखरो अबड़ेच महत्तम हावय । जाड़ अउ गर्मी के बीच मा पतझड़ अउ बसंत आथे। पतझड़ मा पेड़ मन के पाना गिर जाथे ,तहाँ ले बसंत मा नवा पाना उल्होथे। बसंत रितु बर घलौ अबड़े गीत लिखे गिस फेर पतझड़ के पीरा ला जादा नइ लिखे गिस । पतझड़ के रितु अपन संग उदासी लेके आथे ये हा हर बछर फरवरी के महीना के आस पास रहिथे ।
पतझर के पीरा ला उही मनखे समझ सकथे जेहा अपन कोनों मयारुक ला खोय होही । पतझर हा जिनगी के सच्चाई ला दिखाथे ।बसंत मा उल्होय कोवर कोवर लाल गुलाबी पाना जेहा नवजीवन के संदेश देथे तुरते के होय लइका कस कोमल मासूम अउ निर्दोष रहिथे।धीरे धीरे पाना हा ललहुँ गुलाबी ले हरियर होय लागथे बाढ़त लइका सरीक।पाना अभियोच कोवर रहिथे ।अब पाना अउ बाढ़ जाथे तहाँ ले लहलहाय लगथे उल्लास उमंग के संग मा जइसन जवानी हिलोर मारथे मनखे के नस नस मा एक विशेष अवस्था मा ।झूमरत गावत पेड़ फूले फरे लागथे अइसने तो मनखे के जिनगी घलौ होथे। अब पाना अनुभवी सियनहा कस हो जाथे, कलेचुप पतझर आ जाथे हरियर पाना पींयर पड़े लगथे ,सुखाय लगथे अउ एक दिन अपन डारा, अपन पेड़ ला छोड़ गिर जाथे अउ माटी मा मिल जाथे ।मनखे घलौ एक दिन अपन महल अटारी लाव लस्कर ला छोड़ रेंग देथे।अमीर गरीब, राजा प्रजा, सबला एक दिन जाएच बर हे।अब कोनो आघू कोनों पाछू भले जाय। फेर जाय बर परबेच करही।ये माटी के काया ला माटी मा मिल जाना हे ।पाना के झरे के वैज्ञानिक कारण घलौ हावय जाड़ के दिन मा दिन छोटे होय ले तापमान कम हो जाथे तेपाय के क्लोरोफिल बनना कम हो जाय के कारण पोषण के कमी हो जाथे अउ पाना मन सूखा के गिरे लगथे।पाना मन के गिरे ले पानी अउ ऊर्जा दूनों के बचत होथे।
पाना के गिरे ले पेड़ हा उजाड़ उदास खड़े रहिथे ,बेटी के बिदा के बाद के बिहतिया घर हा सुन्ना साँय साँय लगथे तइसन।अपार पीरा रहिथे पेड़ के मन मा ,फेर ये पीरा ला कोनों नी समझ सके ,ना पेड़ हा कखरो से कही सके।मनखे के कई ठन पीरा घलौ तो अव्यक्त रही जाथे।मन के पीरा ला मन मा भरके पेड़ हा बाट जोहथे बसंत के।बसंत के आय ले पेड़ के मन मंजूर झूमरे लगथे।पतझड़ के पीरा हा
प्रसव पीरा सही नवजीवन लेके आथे।इही जिनगी के सार घलौ आय। जन्म मरण ये भुइयाँ जेला मत्युलोक कहे गय हे तेकर अकाट्य सच्चाई आय।
चित्रा श्रीवास
सिरगिट्टी बिलासपुर
छत्तीसगढ़
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