Thursday, 28 May 2026

लघुकथा ) घर के उजार

 (लघुकथा )


घर के उजार

-------------

वसुंधरा हा रोवत दूधमूँहा नोनी ला पाये बिहनिया बर्तन माँजे-धोये ला बइठे हे।आज चाय बनाके तको नइ पिये हे। हाथ हा चलत नइये। मनमाड़े फूले हे। वोकर गोसइया बल्लू हा नशा मा धुत्त सुते हे। रतिहा मारपीट करे हे। अस्सी-पचयासी साल उमर के सियनहिन सास हा हालत ला समझके कइसनो करके अँगना-परछी ला बाहरत हे।

  वसुधा के आँखी टप-टप चूहत हे।बेचारी हा गुनत हे-- दाई ददा मन पाँच साल पहिली कतका सोच-विचार के, मोर बेटी रानी बरोबर रइही कहिके,खुशी-खुशी वोकर बिहाव बल्लू संग करे रहिन हे। एके झन बेटा, पाँच एकड़ खेत, बढ़िया चलत किराना दुकान। महूँ हा कतका जादा खुश रहेंव।

 फेर तीन बछर पहिली सियान ससुर हा जइसे परलोक सिधारिस, बल्लू हा पियक्कड़ मन के संगति मा परके बर्बाद होगे। दुकान तको बंद होगे। रात-दिन गाली गलौच अउ मारपीट--घर मा कलह समागे।जिनगी मा दुख के पहाड़ गिरगे।

 वसुंधरा हा अचानक उठिस अउ खोली मा आके एक ठन बेग मा कपड़ा-लत्ता ला जोर के बाहिर निकलच अउ परछी मा बइठे अपन सास के पाँव परिस। सियनहिन सास हा आशीर्वाद देवत कहिस-- " घर ला तियाग के जावत हस बेटी-- ले जा, आज नइ रोकँव। महूँ नारी अँव, तोर दुख ला समझत हँव। मोर का हे आज जियत हँव-काली सिरा जहूँ। दे तो नोनी ला चूमन दे। "

वसुधा हा वोकर कोरा मा बइठार दिस। सियनहिन हा मया करके वापस देवत कहिस -- ले जावव बेटी। सुखी रइहव।

वसुधा घर ले निकलगे।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

रिसता परगे सिट्ठा*

 *रिसता परगे सिट्ठा*


           छत्तीसगढ़ हा खाली नाँव के छत्तीसगढ़ नोहय येहर अपन भाव ल मनखे मा झलकाथे। फेर जेन किसम के आजकल मइनसे के आदत बेवहार ल देखथन ओमा पहिली के अउ अबके मा गजब अंतर आवत -जावत हे। इहाँ मया -पिरा, सुख -दुख के  आमा,अमली हा कभु जोत्था -जोत्था फरय- फुलय अउ ममहावय, गुरतुर कोइली कस भाखा - बोली अंतस ल मंदरस कस जनावय ।

      अब जतेर के मनखे मेरन सुख सुबिधा संसाधन बाढ़त जावत हे वतरे के मया अँखरा के पतरावत हे। जइसे पेट हा बोजाथे अउ दलिदरी भगाथे , तहाँ  रंग रंग के गोठियाथें। मसीन के सिलाए कपड़ा ल नाप जोंख के बनाय जाथे, जेन हर गजब दिन ले टिकथे। अब रेडिमेंट उठवा के जमाना छा गेहे जउँन ला जइसन जमथे बिसा लेथें। उठवा जिनीस जलदी पटपटाथे अउ चिराथे घलोक , काबर कि ओकर सिलना मजबूत नइ रहाय। उठवा कपड़ा के उठवा मोल, फ्राक, कुरता, पेंट, कंटोप। अब भइगे आज के मया परेम उठवा कपड़ा - लत्ता कस बनके रहिगे हे, बजार म मिल जथे। चरदिनिया... नवा - नवा मा बकबकासी लगथे।

      पहिली नून, तेल, हरदी, मिरचा ल सइघो नाप तउँल के लेवँय अउ सील लोड़हा मा पिसय। अब पाकेट मा बँद मिलत हे। लिखाय रइथे _पहले स्तेमाल करें, फिर विश्वास करें। कोनो दिन नत्ता -रिसता सिमट  जाहि ता गड्डी नइ ते पैकेट मा मिलही। 

वातावरन,परिवेस हर नाता- रिसता ल बनाथे अउ बिगाड़थे। आज कोनो ला काकरो संसो फिकर नइ हे। अब जाइदा रोटी, कपड़ा, मकान के कोनो ल कमी नइ होवत हे, रोजी- रोटी , मंजूरी घरे तीर मा मिलत हे। कोनो ल जाँगर टोर कमाय के जरूरत नइ हे। ना कोनो ल काकरो मेरन हाथ लमाय के जरूरत  पड़त हे, बस इही अहंकार मनसे ला मनसे ले धुरियावत हे। आदमी दू - चार पइसा काय नइ कमइस अपन ल भूलागे।

  सगा- पहुना बर सनमान के भाव मा एक लोटा पानी, गरम चाहा एक मुठा भात अउ मीठ - मीठ गोठबात बने सनबन्ध के गाँठ जोरे के नियम रिहिस हे। आज चाहा ह स्वाहा होगे...ओकर रंग फरियाके मतउला होगे हे।

   सगा - सोदर मन आके दु -  चार दिन रहिके एक दुसर के सुख  - दुख ल जानँय । छोटे बड़े रिसता के मुताबिक आसीरबाद देवय जुग - जुग जियव, दुदे खाव दूधे अँचोव , तुहर पाँव मा काँटा झन गड़य। चुवा लेके ऊँचा उठे के रसता बतावँय । अब अहू नंदागे...। वो दिन परोसी तको पुछय तुँहर घर सगा काय रोटी लाय हे। अब तो सगा रोटी के जघा ल बजरहा खजानी मिठई हर लेलिस । वो समे गजब धुर - धुरके सगा संबंधी तक ल सोरिया लेवयँ । अब तो रिसता टूटे के कगार बनथे। वो बेखत गजब दिन के आय -जाय सगा हर बिताय दिन के सुरता करत हँसय ता दुख के सुरता म रोवय घलोक जेकर ले रिसता खासम खास बन जावय। अब तो तुरते आवत - जावत हें ।

      आज छोटे - छोटे बात ल धरके रिसा के नाता टोरे बर देर नइ करय। कुछ दिन तो माइलोगिन मन बीता भरके चेंदरी बर तको झगरा कर लेवय अउ नहीं ता मुँहु ल ओथार के घर ले निकलय।

      बीच मा टीवी हा गाँव, पारा, मोहल्ला के रिसता ल खतम करिस ओकर ले चार गुना मोबाईल हर दंदोरत हे। अब काल बदल गेहे _  पहिली वर्तमान, भूत, भविष्यकाल होवय अब _  कॉल, मिस कॉल, वीडियो कॉल के जमाना हे। ये सब्बो काल ल लील के मोबाईल हर महाकाल बनके जिनगी ल जंजाल बना देहे । बेरा कुबेरा नइ लगे  दुख के आँसू ल नाख के भार बोहावत हे। साँच,  लबारी के दरसन नइ हे। मोबाईल के आय ले जोहार भेंट कही देबे केहे के जमाना खतम। टुरी - टूरा ल बिना नेंग, लगिन -भाँवर के पल्ला भगा देथे। अब तो सियान के नियाव के घलोक कदर नइ हे।

      बात केवल सगा सोदर के नइ हे इहाँ सग्गे नत्ता -रिसता के तेवर बदल गेहे। अपन हा बैरी परोसी मितान होवत हे। त कभु घर के मेन कार्यक्रम ल ओकर कका, ददा , बबा, भाई - भौजी, फूफा - फूफी, दीदी - भाटो  तक नइ जानय ओकर नइ रेहे ले तको नेंग - दस्तूर के काम बुता ल दुसर मन निपटा देथें। बाँटें भाई परोसी के कहावत ल सिद्ध करत हें। अपन - अपन ल पुछव दुसर के काय जरूरत हे। अब तो नेवता अइसे देथयँ आयल भाही ता आय नइ ते मजा उड़ाय , ओकर बिना काम थोरीक अटक जाहि । अब नत्ता रोवय के गावय..! ना समधी के भेंट ना बहु के जेठ, होगे बिन टंगिया के बेंठ। खँड़े रिसता,  परे डरे रिसता। अब रिसता बोलय नही मुक्का होवत हे, टूटत रिसता ल जोरे राखे बर तुरपाई करेल परही।

     प्रश्न जनमथे _ जाइदा सुख सुविधा लोगन ला भरमा के दुविधा पइदा तो नइ करत हे..?  सबो मइनसे अपनेच जइसन ल संगवारी बनाही ता एक दुसर मा समानता कइसे आही..? 

      रिसता न टूटे हे  न जुरे हे बस रही - रही के खियावत हे। आज कोनो ह कोनो ल नइ सरेखत हे। भई गे नत्ता के कटोरा परत हे जुछ्छा,  रिसता परगे सिट्ठा । 


                      मदन मंडावी

            ढारा, डोंगरगढ़ छ. ग.

आज के भक्ति मार्ग

 आज के भक्ति मार्ग 


मोला लगथे भगवान हा, चाहे जड़ होवय या चेतन, चर होवय या अचर,  सबो बर उंखर सुभाव के अनुसार नियम बनाए हे। कोनो भी होय हमेशा एक समान नइ रहय। बरसात के मौसम ले बसंत ऋतु तक प्रकृति के सुंदरता देखे के लाइक रथे। तहॉं ले पतझड़ शुरू....मनखे यदि अपन सुभाव म सदा बहार रथे त ओला कोनो फरक नइ परय। फेर कहूॅं थोरको प्रसिद्धि पा जथे त ओकर भाव झन पूछौ भाई, सातवॉं आसमान म चढ़ जथे। स्वाभिमान के नॉंव म पइधथे गरब, गुमान, घमंड। अउ दिमाग ओतके 

तेज घलो भागे लगथे। "हर्रा लगे न फिटकरी रंग चोखा" के हाना ल सकार करे लगथे। खोजत रथे कहॉं ले दू पइसा बचा लॅंव, खाली बचा लॅंव नहीं रपोट लॅंव। एकर बर मनखे के चतुराई, चलाकी के जवाब नहीं। हमर असन लेड़गा के दिमाग के ट्यूब लाइट देरी म बरथे। चोक दे बर परथे। फेर ए गरब गुमान जादा दिन नइ चलय। दुनिया ल देखाए बर संत। भीतरे भीतर पनपत हे विकार अनंत। 

           मनखे के पूछ परख गुणवत्ता के अधार म होथे ए बात सही ए। फेर खाली गुणवत्ता काम नइ आवय। चापलूसी चाटुकारिता के बहुत बड़े रोल रथे। काखर पदवी बढ़ाना हे, काला माछी कस निकाल फेंकना हे एकर ऑंकलन बर ए भक्ति मार्ग बहुत ज़रूरी हे। हमर एक अधिकारी रहिन। उन ककरो कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट लिखे के चार खंभा बनाए रहिन। चारो खंभा ल बराबर दस दस नंबर दे रहॅंय। कहॅंय के तुम एक खंभा -काम के गुणवत्ता म भले पूरा नंबर दे के लाइक हौ, लेकिन बाकी तीन खंभा; चापलूसी, सेवक, अउ तीसरा; दूसर काय करत हे ओकर खबर पॅंहुचाना एमा कहूॅं जीरो पा गेव त सब बेकारे हे न.....।  अउ एकर उलटा करके देखौ:- तीन खंभा के तीस नंबर... भले गुणवत्ता म झन पाए रहव। तौ कभू न कभू जीवन म ए बात होवत दिखबे करथे।


जय जोहार 🙏🌹

भरम

 भरम  

             चार जबर मजबूत खंभा के उप्पर टिके रहय ……. एकठिन बडे जिनीस छत । ओखर खाल्हे म जम्मो मनखे अपन जिनगी ल ...... सुख से बितावत रहय । उही छत ल अपन आश्रयदाता मान के ....... ओखर ऊप्पर बिश्वास करके ... ओकर पूजा करय .... । संगे संग चारों ठिन खंभा के भरोसा करके ...... इंखरो पूजा कर लेवय मौका मौका म । पहिली खंभा हा ....... जम्मो झिन के अगुवा रहय । कइसे रहना जीना खाना हे .... अउ काये करना हे ..... तेखर बर नियम बनावय । दूसर खंभा हा सरी काम काज करत ..... देख–रेख करय । तीसर खंभा हा देखय के .... काकरो संग अन्याव झिन होवय । चौथा खंभा हा ...... बने काम के प्रशंसा करय अउ गलती ला उजागर करय । जम्मो खंभा के आपस म बनेच दोस्ती घला रहय । चारो ल इही बात के अभिमान रहय .... के उहीच मन अतका बड छत ल तान के राखे हाबय ।

                     एक दिन .. धन दौलत ..... मान सम्मान के बडोरा अइस । चारों खंभा डगमगाये लागिस । बडोरा के कचरा काडी मन ...... खंभा म चटक के दाग लगाये बर सुरू कर दीस । पहिली खंभा हा ..... बडोरा ला सहे नइ सकिस ..... वो कमजोर होके फोंगला होए लागिस । धीरे धीरे बेईमानी के चारा ...... चोरी के तोप ...... घोटाला के शेयर म ...... कोयला के आगी सचरगे । स्पेक्ट्रम के बस्सावत हावा ...... आगी ल अतका भड़काइस के ..... पहिली खंभा खोरवा होगे । छत ले एकर संग साथ छूटगे । मनखे मन डर्रागे ...... छत झिन गिर जाय कहिके ...... । दूसर खंभा अइसने कमजोर रिहीस ...... एकर वइसने कोन्हो जब्बर अधार नइ रिहीस ...... उप्पर ले गरब के जहर अउ अकर्मन्यता के पाप हा एकर हाथ ला टोर दीस । अभू एकरो संग छूटगे छत ले । सरलग ले दू ठिन खंभा के डगमगाये ले चारों डहर रोआ राही मातगे । फेर छत नइ गिरीस । तीसर खंभा डहर आसा ले ...... टकटकी लगाए देखे लगिस जम्मो । उहू ल भय अउ लालच के अमरबेल अइसे धरिस के वोहा ..... उबर नइ सकिस अउ अपन दिमाग गवां डरिस । एहा तो अतका तक भुलागे कि काला धरके ठाढ़े हे ...... एकरो हाथ ले छत के पेंदी छुटगे । अभू चौथा खंभा उप्पर भरोसा करे के अलावा कोन्हो चारा नइ बांचिस । करीन घला ...... फेर उहू ला प्रलोभन के केंसर अउ कायरता के एड्स धर लिस । अभू एकर न आंखी दिखय न कान सुनावय ....... छत के पेंदी कतका बेर दूरिहागे ...... गम नइ पाइस । भगवान ल सुमिरे के अलावा कहींच नइ बांचिस ..... मनखे करा । 

                      छत गिरे ले ...... कतका नकसानी होही अउ ओखर पूरती कइसे होही ....... तेकरे बिचार सुरू होगे । छत उदुपले गिर जही ....... सोंच सोंच के जम्मो मनखे मन दुबराए लगिन । दिन ..... महिना ....... अउ कतको बच्छर नहाकगे ....... छत जेंव के तेंव अपन ठउर म स्थिर रहय । कोन जनी छत घला हाबे के निये ......... मनखे के मन म शंका उपजगे । खोजा खोज माचगे । पता चलिस ..... छत त हाबे ...... तभे एमन सुरछित हे । फेर ये छत काय माटी के बने हाबय ....... कइसे बने हाबे ....... कतका चेम्मर हे ....... बिगन कोन्हो अधार के कइसे फइले अऊ तने हाबे ...... बिगन धुरी के कइसे लटके हाबे .... इही हा सोंच के बिषय बनगे । 

               सोध उप्पर सोध चलिस । आखिरी म पता लगिस के ..... जइसे हमर धरती हा ..... अपन अउ सुरूज देवता के बीच ...... गुरूत्वाकर्षण बल म लटके हाबय ...... तइसने ये छत हा एक कोती हमर पुरखा मन के बिचार ..... आसीरवाद ……, नियम....... अनुशासन अउ संरछन के बल म ...... त दूसर कोती जनता के बिश्वास ..... प्रेम ...... भाईचारा ..... मेहनतकश के पछीना अऊ ईमानदारी के बल म ...... बिन लौकिक सहारा के लटके हे । 

              ये छत अउ कोन्हो नोहे भइया ....... हमर लोकतंत्र आए ..... जेला तान के राखे के ठेका लेवइया जम्मो खंभा अऊ मेयार मन ....... घुना खावत फोंगला ....... बीमार परे ...... सरत हे ..... बस्सावत हे । अउ छत अभू घला ...... छाती तान के जम्मो मनखे ल सुरक्षा देवत हे । खंभा अऊ मेयार के तिड़ीबिड़ी होये ले ...... मनखे के भरम  घला भकरस ले टूटगे के ...... हमर लोकतंत्र ..... ककरो सहारा म खड़े हे ।

 हरिशंकर गजानंद देवांगन छुरा

लघुकथा - "जे ठो मुँह ते ठन गोठ "

 लघुकथा - 

   "जे ठो मुँह ते ठन गोठ "

     -मुरारी लाल साव 

बेरा बेरा म सब के गोठ सुहाथे l कोन कब कइसे गोठियाही?सुने के बाद पता चलथे l चौरा चौरा म एक से एक दार्शनिक मन असन कतको बइठे मिल जथे l दुनियाँ भर के ठेका लेके बइठे हे l ओइसने 

एक दिन  श्री बी आर बी मिलगे l याने  भकला राम बावरा ओकर पूरा नाम हे l ओला ओकर पूरा नाम लेके बुलाबे त तमक जथे l पजामा धोती पहिने खांध म पटका डारे मेंछा दाढ़ी बढ़ाये पाछू कोती एक हाथ ला लुकाये बड़बड़ावत मिलगे l पूछ परेन -"बी आर बी जी धरती ला कोन धरे हे? बताहू का? " 

'"धरती ला मेह धरे रहेँव  अभीच मड़ायेंव!" कोन लेगे?

सहीच म बौरागे l सुध बुध कति हे ओला उहू पता नहीं l पगला नोहय  भकला नोहय ज्ञानी हे l

हमर पूछे के मतलब ये रहिस धरती ला कोन बोहे हे? फेर पूछ के देखेन -" धरती ला कोन बोहे हे,भकला भइया? 

धोखा होगे  तुंहर नाम ले परेन l

झन पूछ ओकर तरमराना l

गाली बके रहितिस ओकर पहिली हमन ओला महात्मा जी महात्मा जी कहिके मान देन l तब बी आर जी (भकला राम )शांत होइस l शांत होके कहिथे -" धरती ला मही बोहे हँव दिखत नइ ये का? "

ओकर दर्शन ज्ञान ओकर करा बताही त तो  हम जान बो?

बताना महात्मा जी! बताथे -"

मटकी ला देखत हस मोर मुड़ म हे l माटी के बने हे l माटी माने धरती l मटकी ल मही बनाये हँव मही धरे हँव l मही बोहे हँव l" 

जे ठो मुँह तेठन गोठ l ओकर का का नाम धरके बइहा बना दे हे l एम ए तक पढ़ाई करे हे नौकरी घलो नइ मिलिस l छोकरी घलो नइ मिलिस l खोर किंजरा होगे l कोनो कहत हे जांगर  चोट्टा हे l कोनो कहत हे  ओकर जवानी नइ फूटीस तेखर सेती बिहाव नइ करिस l कोनो कोनो तो ओला...l"

आज हमन ला मालूम होइस बड़े ज्ञानी हमर बीच म हे तेला पूछत नइ हन lहमर चौरा म भकला असनआदमी पगला बन के हाबय l उहू ला मंच देये बर पाँच लाख -दस लाख देके 

बैठार तीस त ओकर ज्ञान के लाभ सबला मिलतिस l बाहिर ले बुलाये का जरूरत! सतसंग करना हे सतसंग सुनना हे श्री "बी आर बी "कोती धियान दे ये पड़ही l इही सोच बिचार करके हमन जल�

लघुकथा - " चार धाम यात्रा "

 लघुकथा -

" चार धाम यात्रा " 

   - मुरारी लाल साव 

बस्ती म इही चर्चा फ़ैल गे l चार धाम के यात्रा बर सब जावत हे l अपन अपन ले तैयारी करत हे l आगी लगथे त अतका चिहोर नइ परय जतका चार धाम के चर्चा फैले हे l 

"कहाँ हस गो भइय्या?" चिल्लावत गणेश आगे घर म l

महेश बैठारिस l गणेश कहिथे -" चलना गो चार धाम जाबो "

महेश के अलग बिचार,अलग रस्ता सबले अलग किसिम के मैनखे  हरे l तभो ले जाने बर गणेश के मन ल राखे बर पूछिस -" कोन कोन जात हे तेमा? "

"सब झन जात हे गो, महूँ जाहूँ 

नइ छोड़ँव भइया l"

"जा जा अइसन मौका तोला मिले हे l "

"तहूँ चल ना भउजी घलो जाही l " 

"जा तोर भउजी ला ले जा l "

"वाह तोर बिना कइसे जाही?"

आखिर म महेश कहिस -" 

चार धाम के यात्रा ले चार फल मिलथे वो मोला घर बइठे मिलगे l" आँखी ला छत्कारत, गणेश पूछिस -वो कइसे? "

" चार धाम नइ जाना हे त पूछ? नइ ते जा अब घूंच l"

गणेश जान डरिस भइय्या के सुर आन तान होवत हे l चल दिस उहाँ ले l

महेश फेर गुनिस मैनखे ला तुतारी अउ मुखारी के जरूरत पड़थे l मन अउ बिश्वास,

धरम अउ करम जेकर श्रेष्ठ हे वोला का जरूरत हे चार धाम जाये के? कबीर साहेब के बानी  फोकट  नोहय " तीरथ गये दू झन चित्त चंचल मन चोर l एको पाप न उतरिया लाये दस मन और l" 

गंगोत्री म नहाये के सुख घर में हे घलो हे l 

 पाप धोके आथे उही मन तहाँ उही लद्दी म  म बुड़े रहिथे l

का पुन अउ का तरना? सबो जस के तस l

अमर नइ हो जाय l 

घिलर घिलर के नइ मरही त 

तड़फ तड़फ के मरही l  जेकर करनी करम सुधरय नहीं l 

उही बेरा चाय लेके गंगा आगे l 

महेश कहिथे -" जाना तहूँ चार धाम म l"

गंगा कहिस " तै इंहा रहिबे भोला नाथ  असन l कइसे गंगा तोला छोड़ के जाही l  संग मा रहिबो l तहीं हमर चार धाम तहीं हमर तीरथ l लक्ष्मण मस्तुरिया कवि बने कहे हे  " कहाँ जाबे बड़ दूर हे गंगा पापी मन इहें तरव रे!" महेश फेर उही बानी ल तुक के सुनाथे 

-" तीरथ गये दोई झन चित चंचल मन चोर l एको पाप ना उतरिया दस मन लाये और l"

महेश अउ गंगा दूनो  चार धाम जवइया मन ला देखत  रहिथे l 

मोटर म सबक

सजग साहित्यकार : सुशील भोले डॉ. पीसीलाल यादव

 सजग साहित्यकार : सुशील भोले

डॉ. पीसीलाल यादव

साहित्य समाज के दरपन ये, अउ साहित्य साहित्यकार के सिरजन  ये । साहित्यकार समाज म जउन देखथे, जउन अनुभव करथे तेने ल लिखथे, तब सच ह उजागर होथे । छत्तीसगढ़ी साहित्य बड़ समृद्ध साहित्य हे |  येला समृद्ध करे म हमर कतकोन साहित्यकार मन के योगदान हे । धनीधरम दास, पंडित सुन्दर लाल शर्मा, द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, महाकवि कपिल नाथ कश्यप, पंडित श्याम लाल चतुर्वेदी, लाला जगदलपुरी, नारायण लाल परमार, कोदूराम दलित, विद्याभूषण मिश्र, डॉ. नरेंद्र देव वर्मा , पंडित दानेश्वर शर्मा, मेहत्तर राम साहू, भगवती लाल सेन, उघोराम झखमार, पवन दीवान, विमल पाठक, कुंज बिहारी चौबे, मुकुन्द कौशल अउ कतकोन साहित्यकार मन अपन सिरजन ले छत्तीसगढ़ी साहित्य के ढोली-ढाबा ल भरिन, छतीसगढ़ी साहित्य ल पोठ करिन अउ जीयत भर ले छत्तीसगढ़ी, छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़िया के गोठ करिन । इही सरलग में एक नाँव हे स्वः सुशील भोले के |  सुशील भोले ठेठ छतीसगढ़िया आय । गांव के जनमन, गाँव के उबजन – बाढ़न, गाँव के रहन-रहन तेखरे सेती ओखर सिरजन में गाँव के संस्कृति के दरसन होथे, गाँव के बोली के परसन होथे अउ ते अउ ओखर भाव-सुभाव म मया-दुलार के अरपन होथे |   छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया बर ओखर अंतस म दया - मया पलपलावत राहय | माटी महतारी बर ओखर मया उंखर ये कविता म देखउल देथे –

जा रे मोर गीत तैंहा ,खदर बन जाबे |

बिना घर के मनखे बर, घर बन जाबे । 

बने अस देखत जाबे, कोनों भूख झन मरय, 

पेट के अगिन बर, कोनों लइका झन बेचय । 

अइसन कहूँ देखबे त, तैंहा खदर बन जाबे || 

जा रे मोर गीत तैहा, खदर बम जाबे ॥

ये सोच रिहिस, समझ रिहिस छत्तीसगढ़ के दुख-दरद अउ गरीब-गुरवा के पीरा बर। काबर के ओहा अपन जिनगी म दुख-पीरा  ल झेले रिहिस, अउ सुख-सुविधा ले बाहिर दुख-दुविधा ल मेले रिहिस । सुशील भोले ऊँखर साहित्यिक नाँव ये, सिरतोन, कहिबे त ओखर नाँव रिहिस सुशील कुमार वर्मा । सुशील भोले के जनम भाठापारा, जिला रायपुर म दू जुलाई सन् उन्नीस सौ इकसठ के होय रिहिस । इंखर मूल गाँव आय नगर गाँव, थाना धरसींवा, जिला रायपुर (छ.ग) | माता श्रीमती उर्मिला देवी वर्मा अउ पिता श्री राम चंद्र वर्मा । चार भाई अउ दू बहिनी म येमन मंझला रिहिन | चौथी तक के शिक्षा-दीक्षा भाँठापारा म, 7 वी तक नगर गाँव म अउ आठवीं ले 11 वीं तक के पढ़ई इंखर रायपुर म होइस । कंपोजिंग ट्रेड में आई.टी.आई. करके जिनगी जिए के रद्दा धरिन । पत्नी श्रीमती बसंती देवी वर्मा के सँग जिनगी के रद्दा चतवारत खूब नांव कमइन | अपना पुरखा के नाँव जगइन | कला-साहित्य अउ संस्कृति के सेवा करत । इंखर तीन बेटी हे श्रीमती नेहा वर्मा, श्रीमती वंदना वर्मा अउ श्रीमती ममता वर्मा | इही बेटी मन भाई सुशील भोले के देखरेख करत रिहीन |

सुशील भाले जी के साहित्यिक यात्रा सबले पहिली रायपुर ले प्रकाशित अग्रदूत समाचार पत्र ले होइस, सरकारी प्रेस म नौकरी घलो करिन फेर ऊहाँ ले मन उचट गे । तहाँ ले सन्‌ 1988 ले 2005 तक खुद के व्यवसाय प्रिंटिंग प्रेस के संचालन अउ छत्तीसगढ़ी के मासिक पत्रिका “मयारु माटी" के प्रकाशन करिन, जेखर छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत म खूब शोर होईस । फेर का करबे  आर्थिक स्थिति ठीक नई होय के सेती 13 अंक के बाद ये पत्रिका ‘मयारू माटी’ मुरझागे । कोनो पानी  पलोइया नई मिलिस । आडियो केसेट के रिकार्डिंग स्टूडियो घलो खोलिन, फेर उहू म हाथ चपकागे | 

कहिथे न के जेन सच बोलथे, सच लिखथे , ओखर जिनगी म अड़चन आते रहिथे । जेखर इरादा पक्का होथे, जेन कुछु करे के ठान लेथे, ओहा सरी अड़चन ल उभेल देथे | जिनगी ले जोम देके लड़इया अइसने आय सुशील भोले । कतकोन जगह नौकरी करके सुशील भोले ह बड़ संघर्ष करिन । दैनिक अग्रदूत, दैनिक तरुण छत्तीसगढ़, दैनिक अमृत संदेश, दैनिक छत्तीसगढ़, इत‌वारी अखबार, जय छत्तीसगढ़ अस्मिता (मासिक) के संगे- संग अउ कतको साहित्यिक अउ सामाजिक पत्र – पत्रिका में सहसंपादन के संगे-संग लेखन कार्य घलो करत रिहिन । वइसे तो सुशील भोले जी ल साहित्य सिरजन के प्रेरणा ऊँखर पिता जी श्री रामचद्र वर्मा जी ले मिलिस | काबर कि ओमन खुद लेखक रिहिन, शिक्षक रिहिन अउ ओ समय म संयुक्त मध्यप्रदेश म अनुपम प्रकाशन रायपुर ले प्रकाशित ऊँखर लिखे किताब पाठ्यपुस्तक के रूप म चलत रिहिस। दैनिक अग्रदूत म सन 1983-84 म नौकरी करत बेरा प्रदेश क प्रसिद्ध व्यंगकार प्रो० विनोद शंकर शुक्ल के उन ला मार्गदर्शन मिलिस, तेन हा बड़ फुरमानुक होइस, तहाँ ले भोले जी के लेखन में सक्रियता बढिस । कई ठन पत्र-पत्रिका में कालम लेखन करिन, जेन बड़ लोकप्रिय होइस - 

किस्सा कलयुगी हनुमान के (मयारु माटी -1988-89) 

बेंदरा बिनास (साप्ताहिक छत्तीसगढ़ सेवक - 1988-89)

तरकश अउ तीर (दैनिक नव भास्कर - 1990)

आखर अंजोर (दैनिक तरुण छत्तीसगढ़ - 2006-07)

डहर चलती (दैनिक अमृत संदेश - 2009)

गुड़ी गोठ (साप्ताहिक इतवारी – 2010 – 2015 ) सुशील भोले जी के लेखन केवल कविता तक सीमित नई रिहिस, बल्कि ओमन गीत, कहानी, लेख अउ व्यंग्य लेखन ले छत्तीसगढ़ी साहित्य ल पोठ करिन | ऊँखर प्रकाशित किताब के नाँव ये प्रकार के हे -

 छितका कुरिया (काव्य संग्रह-1988)

 दरस के साघ (लम्बी कविता - 1990)

 जिलनगी के रंग (गीत व भजन संग्रह - 1995)

 ढेंकी (कहिनी संकलन - 2006)

 आखर अंजोर (छ.ग की संस्कृति पर आधारित आलेख - 2006, 2017)

 भोले के गोले ( व्यंग संग्रह - 2015)

 सब ओखरे संतान (मुक्तक संकलन - 2021-22)

 सुरता के संसार (संस्मरण लेखन -  2021-22)

 कोंदा भैरा के गोठ (कालम संकलन - 2024 25) 

कला-साहित्य-संस्कृति के संगे संग सुशील भोले जी के झुकाव अध्यात्म डहर घलो होइस । 1994 से लेके सरलग 2008 तक लगभग 14 बछर ओमन आध्यात्मिक साधना म लीन अउ आत्म ज्ञान के प्राप्ति बर संलग्न रिहिन । इही बेरा "आदि धर्म जागृति संस्थान" के स्थापना घलो करिन | जेखर माध्यम ले आध्यात्मिक जनजागरण के बुता करिन | सुशील भोले जी सन् 1983 ले छत्तीसगढ़ी पृथक राज्य आंदोलन म जमीनी रुप ले जुड़े रिहिन । जिनगी भर छत्तीसगढ़ के लोक जीवन, लोक संस्कृति अउ सामाजिक सरोकार ले सुशील भोले जुड़े रिहिन अउ ऊँखर रचना कार्य म येखर सेती गाँव-गोढ़ा के गोठ उबक के अइस । जिनगी ले जुरे उंखर अध्यात्म काल के रचना देखव, जेमा आज के सच के वर्णन हे-

देख कबीरा सुन्ना परगे, धरम के रद्दा जुन्ना परगे, 

लंदी-फंदी के करनी म, माथ धरे फेर गुन्ना परगे ये | 

छोल चाँच के रद्दा बनाय, सबके रद्दा आगू बढ़ाये,

कागज कलम मसि के लेखा ले अड़हा मन ला ज्ञान गढ़ाये, 

भेड़िया धसान के रेंगना म, फेर एहूँ अप घुन्ना परगे | 

चारों मुड़ा पाखंड नाचत हे, भोगी मन रुप खापत हे, 

सत सेवा के माया जाल म, यौवन के आगी तापत हें | 

बड़े-बड़े बंगला बनथे अब, आश्रम के रूप जुन्ना परगे ,

कइसे करी मानवता रक्षा, यक्ष प्रश्न फेर आज खड़े हे, 

धरम के ठेकादार गऊँटिया, चारों मुड़ा निर्लज्ज खड़े हे | 

परमारथ के कारज म कॉटा - खूँटी अब जुन्ना परगे |

मुँह देखी बात करथे तेन ह मनखे नई होय, त ओहा साहित्यकार कइसे हो सकत हे ? साहित्यकार तो उही आय, जेन आमा ल आमा अउ अमली ल अमली कइथे | सुशील भोले जी सच ल सच, गलत ल गलत किहिन चाहे ओ कोनो होय । छत्तीसगढ़ के जउन सपना हमर पुरखा  मन देखे रिहिन, ओ धरे के धरे रहिगे । राज बने के बाद भी हमला ललाय बर परत हे । कवि के पीरा देखव -

राज बनगे राज बनगे, देखे सपना धुआँ होगे 

चारों मुड़ा कोलिहा मन के, देखो हुआँ- हुआँ होगे। 

का - का सपना देखे रहिन, पुरखा अपन राज बर,

राजनीति के पासा लगथे, महाभारत के जुआँ होगे । 

'ढेंकी' सुशील भोले जी के बहुत प्रसिद्ध कहानी संग्रह आय। 2008 में प्रकाशित ये कहानी संग्रह में 12 ठन कहानी संग्र‌हित हे । जेन में छत्तीसगढ़ी लोकजीवन अउ छत्तीसगढ़ी परिवेश में छतीसगढ़ के रहन-सहन, संस्कार जीवंत होय हे । सुशील भोले जी के भाषा सौंदर्य के बानगी देखव - कहानी ढेंकी में -

“अगास के छाती म मुंदरहा के सुकवा टंगा गे राहय । सुकवा के दिखते सुकवारो के पाँव खटिया छोड़ माटी सँग मितानी बद लय । तहाँ ले सबले पहिली वोकर बुता होवय अपन पहटिया ल जगाना, तेमा वो बेरा राहत बरदी लेके दइहान जा सकय । फेर पाछू वो लिपना - बहारना, मांजना- धोना करय । आजो अपन पहटिया ल जगाय के पाछू तिरिया धरम के बुता म भिड़गे ।"

इंखर कविता संग्रह "दरस के साध" छत्तीसगढ़ ल जाने के, एखर गौरव - गरिमा अउ अस्मिता ल पहिचाने के उदिम आय । "दरस के साध" लम्हरी कविता आय । कवि के साध छत्तीसगढ़ दर्शन के हे -

महानदी के जनम भूमि म, जातेंव फेर मैं तुरते,

सिंगी रिसी के कुटिया छवाय हे, तिही सिहावा ल गुनते । 

महानदी उद्गरे हे तिही, कुंड के पानी पीतेंव, 

फेर निरोगी होके मैं तो, लाख बरिस जीतेंव ।।

सुशील भोले जी लोक संस्कृति के चितेरा आय | ओ अपन नान - नान कविता म माई भाखा म ठेठ शब्द के रंग ले के अपन लेखनी ले जीयत-जागत चित्र बना देवय | “सब ओकरे संतान ये संगी "ऊँखर ये किताब येखर गवाही हे । नई पतियावव त ये परछो लेवव -

मया मरम मीठ बोली, जस देबे तस पाबे, 

जेन पिरीत के संगी होही, तेला तब पोगराबे । 

कतको होवय कंचन काया, या दौलत के ढेरी,

फेर म एखर पर जाबे त, जीवन भर पछताबे ||

x x x

अंगरी धर के रेंगे सीखेंव, पारत तोला गोहार,

  मोर मयारुक दाई हवय, तोला गाड़ा गाड़ा जोहार । 

काल कहूँ अनदेखना करते, कोनों बात के सती,

  त कइसे आज चढ़ पातेंव, सफलता के ये पहार ।। 

"भोले के गोले" जइसे के नांव से पता चलत हे। ये हा व्यंग्य, कहानी अउ लेख के संग्रह आय । जइसे के पहिली ये बात के उल्लेख होगे हे के सुशील‌ भोले जी समर्थ साहित्यकार रिहिन अउ लगभग सबो  विधा म अपन लेखनी चलाय हें । व्यंग्य के एक बानगी देखव –

“दुनिया के नान-नान देश मन ला कोन हथियार बेच बेच के आपस म लड़वावत रहिथे ? त मोला बता अइसन किसम के मरखंडा गोल्लर कस देश के मुखिया ल गरु‌वा बरोबर मान के शांति के नोबल पुरस्कार कइसे दिए जा सकत हे ।" भोले के गोले में हमर छत्तीसगढ़ के विभूति मन ऊपर लेख के संगे-संग, तीज-तिहार अउ लोक संस्कृति ऊपर घलो लेख है | "सुरता के संसार" घलो अइसने नानपन अउ पुरखा मन के सुरता करत कृति आय।

सुशील भोले जी ल ऊँखर साहित्यिक अवदान बर कतको सम्मान मिले हे । जेमा छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग डहर ले सन 1910 म दे गे भाषा सम्मान प्रमुख हे | येहू बात उल्लेखनीय है कि साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा अहमदाबाद गुजरात में 8 अक्टूबर 2017 के गुजराती अउ छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्यिक आयोजन म उनला कविता पाठ बर आमंत्रित करे गे रिहिस, जेमा डॉ. केशरी लाल वर्मा ,डॉ. परदेशी राम वर्मा, रामनाथ साहू जी अउ मीर अली मीर जी घलो भाग ले रिहिन | ये बहुत बड़े उपलब्धि आय | आकाशवाणी अउ दूरदर्शन ले ऊँखर कविता अउ वार्ता के प्रसारण होथे | 

सुशील भोले जी  छत्तीसगढ़ भाषा के सजग साहित्यकार रिहिन | ऊँखर लेखनी ल नई भुलाय जा सके। फेर समय ल कोन जाने हे, कब का हो जही ? कोन ला का पता हे ? 24 अक्टूबर 2018 के भिलाई में डॉ. परदेशी राम वर्मा जी के अगास दिया कार्यक्रम जउन स्व. पवन दीवान जी के सुरता म होवत रिहिस, तेमा बोलत खानी सुशील भोले जी लकवा ग्रस्त होगें। देखो देखो होगे। का होगे, कइसे होगे ? कोनो ल समझ नई अइस | काफी इलाज के बाद भी स्वास्थ्य लाभ नई मिलिस | डेरी अंग एकंगू शिथिल होगे। फेर सुशील भाई के वाह रे जीवटता, ओहा साहित्य सिरजन ल नई छोड़िस । अपन लेखनी ल सतत जारी रखिन। सोशल मिडिया के माध्यम ले अपन लेखन ल जारी रखिन । कभू फोटू  त कभू कविता सबके मन ल मोहे | कला, साहित्य संस्कृति के गोठ खूब वाहवाही लूटिन । तन थके ले, मन नई थके । सम सामयिक विषय ऊपर ऊँखर “कोंदा भैरा के गोठ” ल खूब पाठक मिलिन |  कोनों दिन संस्कृति के बात, त कोनो दिन व्यंग्य | सोशल मिडिया ले लेके अखबार तक म छागे । मन में उमेंद जागिस, उछाह जागिस | सबके साध रिहिस के सुशील भोले सौ  साल जिहीं । बीमार हालत म घलो सभा-गोष्ठी म शामिल हो जाय। अउ अपन बात ल दम-खम ले राखें । फेर का करबे काल के आगू कखरो नई चले । 26 फरवरी 2026 के सुशील भोले जी हमला छत्तीसगढ़ी के सेवा के रद्दा देखात, शांत होंगे। उन ला कोटि-कोटि नमन । 

सच लिखे अउ, सच बोले,

ओखर नॉव , सुशील भोले ।

          डॉ. पीसी लाल यादव 

“ साहित्य कुटीर ”

        गंडई – पंडरिया    

                 जिला – खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (छ.ग)

       मो.-9424113122

भोकवा

 भोकवा 


बात ल जउन समझथें उन सम्हल के चलथें। जउन नइ समझॅंय उन रहि जथें भोकवा। मनखे अपन काम निकाले बर कतेक चतुरा होथे, कोनो चीज के महत्तम ल कइसे गिरा के अपन स्वारथ साधथे एकर बढ़िया उदाहरण देखौ;


दू झन राहगीर अपन अपन गॉंव जात रहॅंय।एक झन अपन बइलागाड़ी म धान  लादे रहय।

फेर खुद रेंगत गाड़ी म फॅंदाए बइला ल हॉंकत जाय। रद्दा म खाए पिए के समान नइ धरे रहिस काय। दूसर मनखे तिरन धान पान नइ रहिस। हॉं सॅंग म एक झोला धरे रहिस जेमा सेतुआ रहय। भूख मिटाए के बढ़िया चीज। तुरते घोरव अउ पी लव। 

          ए बात ल ओ धान ले जइया जान डरिस। अब ओकर दिमाग कुलबुलाय लगिस के कइसे मैं एकर सेतुआ ल पावॅंव कहिके। यहू सोंचिस के फोकट म नइ लॅंव एकर बदला म धान दे देहूॅं कहिके। बड़ चतुरा। बाते बात म सेतुआ वाले ल कहत हे... भाई! तॅंय भूख मिटाए बर ए का पिचकाट वाले समान धर के रेंगत हस जी...ओला समझावत कहत हे 


सेतुआ मन मेतुआ 

जब घोरब जब घारब 

तब खाब तब जाब---अउ

धान--- 

धान बिचारी भली 

कूटी खाई चली


सेतुआ वाले भाई रहय भोकवा, ए बात ल सुन के अपन सेतुआ ल धान वाले ल देके ओकर तिर ले धान ले लिस.....बाकी जउन हे तउन हवयच


जोहारत 🙏🙏🙏🌹🌹


सूर्यकांत गुप्ता, जुनवानी, भिलाई (छत्तीसगढ़)

पानी के फुहार ( छत्तीसगढ़ी कहानी)

 पानी के फुहार ( छत्तीसगढ़ी कहानी)


 लता के इही बछर देवउठनी एकादशी के दिन बिहाव होय रहिस हे। लता धमतरी म राहत रहिस हे। उहें के कालेज म पढ़ाई करे रहिस हे। ओखर ससुराल तो गाँव म रहिस हे फेर ओमन जगदलपुर म नौकरी करत रहिन हें। लता के पति राहुल अउ लता दूनों झन टीचर रहिन हें। 


बिहाव होय के एक महिना के बाद येमन जगदलपुर गिन काबर के छुट्टी रहिस हे। गृहस्थी के कुछ सामान ल कार म रख के लेंगे। एक 'छोटा हाथी' गाड़ी करके ओमा भी फ्रीज, कुलर, बर्तन सोफा सब चल दिस। राहुल बढ़िया घर लेय रहिस हे। सब सामान उहें उतार के लता के घर के सामान ल घलो ले के अइन। लता तीर काम चलाऊ सामान रहिस हे, दू प्लास्टिक के कुर्सी, एक टेबल अउ फोल्डिंग पलंग। सामान ल अपन काम वाली बाई ल दे दिस।


16 जून के स्कूल खुल गे। राहुल अँग्रेजी के शिक्षक रहिस हे अउ लता बॉयलाजी के शिक्षक रहिस हे। एके स्कूल म पढ़ावत रहिन हें।


मानसून के आगमन होगे। आँधी तूफान के संग हल्का फुलका बारीश शुरु होगे। पानी एक दिन गिर के फेर धूप निकल जाये। फेर बारीश फेर गर्मी ले उमस बाढ़त रहिस हे। जुलाई म स्कूल म बात होवत रहिस हे के बारिश म चित्रकोट जलप्रपात के खूबसूरती बाढ़ जथे तब येला देखना चाही। राहुल अउ लता एक दिन सोचथें के जलप्रपात देखे बर जाना चाही।


जुलाई म तेज बारीश के बाद जब धूप निकलिस तब दूनों झन कार ले चित्रकोट बर निकलगें। जगदलपुर ले चालीस किलोमीटर रहिस हे। बिहनिया सात बजे निकलथें अउ साढ़े आठ तक पहुँच जथें। एक सप्ताह के छुट्टी ले ले रहिस हें। सिंचाई विभाग के रेस्ट हाऊस म एक कमरा ले लिन अउ प्रपात के मजा लेवत रहिन हें। 


90फीट नीचे पानी गिरथे। आज तो नदी आधा भरगे रहिस हे। बरसात म सात धारा गिरथे अउ बाकी मौसम म चार धारा रहिथे। ये कभू सुखावय नहीं। बारीश म डोंगा बंद हो जथे। दूसर दिन जेन बारीश शुरु होइस त रुकबे नइ करिस। लता अपन काँच के खिड़की ले देखत रहिस हे। हवा म नदी के ओ पार के पेड़ मन नाचत रहिस हे त ओला दिनख के लता के मन नाचे ले लगगे। बारीश राम भर होते रहिस। बिहनिया के धूप म पत्ता मन के पानी के बूंद चाँदी सरिख चमकत रहिस हे। लता नाश्ता करके बाहिर आ जथे। लता प्रपात ल देखथे त तीन चार फीट ही नीचे गिरत रहिस हे। लबालब भरे नदी के चौड़ाई अउ बहाव डर पैदा करत रहिस हे। चुपचाप खड़े रहिस हे त राहुल आ जथे।

"कइसे लता  तोला तो पानी,झरना, नदी ,जंगल बहुत पसंद हावय। बने लागत हे ?"


"हाँ" काहत लता ओखर गला म हाथ डाल देथे। "बहुत अच्छा लगत हे। मोला तो ये खूबसूरती के बीच म  आना एक सपना लगत हावय।"

"पानी बंद होही त दूसर प्रपात देखे बर जाबो।"

"मोर तो मन नइ भरत हे" काहत जमीन म बइठ गे लता ह। राहुल घलो बइठ जथे अउ एक दूसर के हाथ ल पकड़ लेथें। दूनों झन झरना म गिरत पानी ल देखत रहिथें। धूप अपन रंग देखाना शुरु करथे। गर्मी बाढ़े ले लगथे त पसीना पोछत लता ह अपन सिर ल राहुल के कंधा म रख देथे। देखत देखत बारह बज जथे। दूनों झन खाना खाये के बेरा होगे कहिके कमरा म आथे। खाना खा के आराम करथें। 


तभे काम करने वाला कहिथे "अभी तो तीरथगढ़ जाना चाही।"


"कब"

"खाना खा के निकल जाओ,  रात तक वापिस आ जाना। यहाँ खाना तैयार मिलही।"


"ठीक हे। खाना मत बनाना।"


खाना खा के एक घंटा आराम करके दूनों झन तीरथगढ़ बर निकल जथें। जगदलपुर के हरियाली, बड़े बड़े वृक्ष लता के मन मोहत रहिस हे। कई गाँव रद्दा म परथे। तरह तरह के नार लगे दिखथे। नार मन छानही म चढ़त रहिस हे। कई जगह अभी भी आम लगे रहिस हे। लता तो बस ये देख ओ देख ही करत रहिस हे। येमन तीरथगढ़ पहुँच जथें। उंहाँ के रेस्ट हाऊस ले नीचे उतरे बर सीढ़ी रहिस हे। अभी आधा रास्ता म बंद कर दे रहिन हें। 300 फीट ले नीचे गिरथे। झरना तो सबके मन मोह लेथे। ऊंहा  छोटे आकार के बहुत बंदर घलो रहिस हे। 


लता अउ राहुल दूनों झन आधा घंटा तो झरना ले गिरत पानी  देखत रहिथें फेर गाइड ल कहिथें "नीचे जाना हे।" गाइड साथ म चलथे। अचानक बारीश शुरु हो जथे। लता अउ राहुल एक दूसर के हाथ ल पकड़ के सीढ़ी उतरे ले लगथें। नीचे जिंहा धारा गिरय उंहा अउ बहुत आकन मंदिर रहिस हे सब डूब गे रहिस हे। लता अपन पैर ल पानी म डुबाना चाहत रहिस हे फेर गाइड ह मना कर दिस। तीनो झन लहुटथें। गाइड पहिली आ जथे। ये मन पानी म भिगत पेड़ पौधा के पानी ल झड़ावत अउ खेलत उपर आथे।आके अपन कपड़ा ल पहिने पहिने ही निचोड़ के पानी ल झड़ाथें अउ गाइड ल खाना बनाये बर कहि देथें। कढ़ी चावल खिलाना कहिथें त गाइड ह इड़हर के कढ़ी बनाथे। तब तक ये मन हवा म अपन कपड़ा ल सुखाथें।


साढ़े आठ बजे खाना खाये बर बइठथें। नौ बज जथे। राहुल अउ लता ल तो पावस के नशा चढ़ गे रहिस हे। हरियाली ल देख के मन नाचत रहिस हे त झरना सरिख हाँसत रहिस हे, नदिया सरिख दउड़त रहिस हे। रात के ग्यारह बजे तक चित्रकूट पहुँचथें। 

कार म लता पूरा समय राहुल के कंधा म सिर रखे रखे आथे। दूनों झन एक दूसर के प्रेम म अतेक डूब जथें के कार ल रोके के बाद भी एक दूसर ल पोटारे बइठे रहिथें। जब रेस्टहाउस के लड़का टार्च मारथे तब उतरथें। कमरा म जा के गीला कपड़ा में ही सुत जथें।


दूसर दिन के बिहनिया नवा सुरुज ले के आथे। लता तो बिस्तर ले उतरबे नइ करय बस ब्रश भर करथे। बिस्तर में ही दही पराठा खाथे। खिड़की ले बाहिर समतल बोहावत चित्रकोट के धार ल देखत रहिथे। अगले दिन ओमन ल जगदलपुर लौटना रहिथे। बस दूनों झन आराम करत रहिथें। जब लड़का आके कहिथे के खाना तैयार हावय तब दूनों झन संग में ही नहा के टेबल म आथें। आज के खाना म घलो मिठास रहिस हे। खाना खा के फेर जा के सुत जथें। आज पूरा आराम चलत रहिस हे। रात के आठ बजे निकल के खाना खाथें अउ आज आखरी बार रात म झरना के खूबसूरती ल देखथें। दस बजे तक एक दूसर के हाथ ल पकड़ के बइठे रहिथें।


लता कहिथे "अइसे लगथे के स्वर्ग तो हमर जगदलपुर म हावय, छत्तीसगढ़ के नियाग्रा के खूबसूरती कुछ कम नइये। नदी के दूनो तरफ के बड़े बड़े पेड़ के हरियाली येखर खूबसूरती ल बढ़ाथे। पूरा जगदलपुर हरियाली ले भरे हावय। हमर छत्तीसगढ़ म घलो एक से एक जगह हावय।"


राहुल कहिथे-" तैं खुश त मैं खुश हंव, हाँ हरियाली तो बहुत हावय। तीरथगढ़ म पानी म भीग के कतेक अच्छा लगिस। शरीर के गर्मी खत्म होगे।"

"हा हा हा हा "

चलो अब सुतबो। दूनों झन आ जथे। बिहनिया ले वापस जाये के तैयारी करथें। फेर मन तो इहें अटके रहिस हे। नाश्ता करके फेर बइठ जथे। पावस घलो इंखर प्यार म खुश होत रहिस हे, हल्का बारीश होय ले लगगे। फेर दूनों झन पानी के फुहार म भीग गें। दोपहर के खाना खाके फेर खिड़की तीर बइठ गें। लड़का ल कहिथें "आज रात के खाना खाके जाबो।"


रात के आठ बजे खाना खा के तुरंत कार म वापस हो जथें। लता राहुल के कंधा म सिर रखे रखे सोचत हे असो के पावस बहुत खुशी दिस हे। 

सुधा वर्मा

प्लाट नम्बर 69,"सुमन"

सेक्टर 1,गीतांजली नगर,

रायपुर, छत्तीसगढ़

पिन 492001

नानकुन कहानी " मुड़ी ला मुड़वा "

 नानकुन कहानी 

    " मुड़ी ला मुड़वा "

   -मुरारी लाल साव 

आज से 60बछर पहली मोर उमर 6साल के रहिस तब के बात आय l बाबूजी हेचकारत लाके बैठार दय नाउ ठाकुर रामलाल के तीर l ओहा अपन अपन दूनो माड़ी के बीच मोर मुड़ी ला चपक के बाल काटय l सजवा ले कैची निकाल के कच कच कच कच करके कैची ला बजावय l जी डर्रावय l मुड़ी हालय त अउ जोर से माड़ी म कस के -" चुप रा  दाऊ, चुप मंडल के बाबू, मुड़ी ला मूड़त हँव l कट जाही..! कहय l चेथी ला धरे रहय l पूरा हो जय त असीस देवत कहय -"देख दरपन म कतका सुन्दर दिखत हस l" बाबू जी कहय  ले पाँव पर तोला सुन्दर बना दीस l " मुड़ी घलो मुड़वायेव पाँव घलो परेंव तभे सुन्दर होयेंव l

ओकर सजवा म चार आना घलो चढ़ाये हँव मुड़ मुड़ौनी l "

मुड़ी मुड़ाए के संस्कार चलत रहीस l

अबअइसे लगत हे कोनो मुड़ी ला मूड़त हे   दाऊ दाऊ कहिके भूलवार के राम लाल बनके l मुड़ी के जघा म रोजगार ला चपक के मुड़ौनी बरोबर घूस लेवत हे l मुड़ अब अइसे कटवावत हे चुप रहिके l

लोक-जीवन ले लोक-भाखा सँग लोक-ग्यान नँदावत जात हे

 लोक-जीवन ले लोक-भाखा सँग लोक-ग्यान नँदावत जात हे


"बात-बात मा बात बाढ़े, पानी मा बाढ़े धान।

तेल-फूल मा लइका बाढ़े, फोही मा कान।" सच कहे जाय तब आज छोट-छोट बात मा मनखे कतिक उलझ जात हे। "बात के काला धरबे, न मुड़ न कान।"

हमर डोकरी दाई हर अइसने गजब हाना कहिके अपन बात ल लखाय। कोन जानी ओ हर कहाँ-कहाँ ले हाना लाया। एक दिन ओहर कहिस-" डार के झुके बेंदरा, पाग के झुके किसान।" 

जब डोकरी दाई हर ये हाना ल काहय तब ओ समे मा हमला समझ मा कूछू नइ आय। सब मुड़ी के उप्पर ले निकल जाय। अब जब गुनतथन तब अरथ हर समझ मा आथे। कतका गुड़ार्थ राहय ओकर हाना मा। 

 सही कहा जाय तब हाना हर लोक के अनुभव आय। कोनो समे मा मनखे हर अपन जिनगी मा सुख अउ दुख अनुभूत करिस होही, तब सोझे ओकर मुहू ले अइसने शब्द निकल गिस होही। अउ आगू जा के लोक मा प्रचारित हो गीस होही। बहुत अकन हाना आज हमला सोचे बिबस करथे। 

"रिस खाय बुध ल अउ बुध खाय परान ला।" कतका बड़का बात आय, जेला लोक हर सहज कही दे गेहे। आजो मनखे जब गुस्सा जाथे तब ओहर खुद परान दे देथे या दूसर के परान ले लेथे। आज अखबार मन मा रोज ये तरह के समाचार पढ़े बर मिल जाथे। अइसना लोक-निंदा करना आज कतका सहज होगे। ख़ासकर राजनीति मा तो ये हर बहुते सहज हो गेहे। तब लोक कही देथे- "हड़िया के मुहू मा परइ ल ढाँकबे, मनखे के मुहू मा काला ढाँकबे।" 

लोक के बात मा जउन लोक-शिक्षा हे, ओहर आज नँदावत जात हे। जइसे-जइसे शिक्षा के प्रचार-प्रसार होत हे वइसे-वइसे लोक-शिक्षा मनखे भुलावत जात हे। आज हाना के बउरइया मनखे नइ दिखय। आज लोक-जीवन ले लोक-भाखा सँग लोक-ग्यान नँदावत जात हे। 

 सही कहा जाय तब येला संजो के जब तक येला संजो के नइ राखे जाही तब तक लोक-ग्यान ले अवइया पीढ़ी हर येकर ले वंचित रहही।


बलदाऊ राम साहू

मन दीयाँर होथे

 मन दीयाँर होथे


      ​   सुरता मन पाछू नई छोड़य, बेरा तो गुजर जथे फेर सुरता जस के तस माड़े रहिथे। जीवन में जे मनखे मन अपन मनके रेंगथे, ओकर जिनगी ला मन के दीयाँर हा चुन चुनके खा देथे। बृजभूषण हमर गॉंव के बड़का कलाकार रीहिस जेन हा देश बिदेश में अपन कला के डंका बजावत रीहिस। जब भी बृजभूषण घर आवय ओकर घर 'कला कुंज' में कलाकार मन के मण्डली के रास माड़ जाय। अवैया कार्यक्रम के तैयारी में ओकर घर सिगबिग-सिगबिग करे, मोटर गाड़ी के रेला लगे राहय। कोनो चाय नाश्ता बनात बॉंटथे, कोनो गावत बजाथे, सबके अलग-अलग काम बँटाय राहय। कलाकार के चहल-पहल ले बृजभूषण के घर अब्बड़ सुग्घर लागे। महतारी रोहणी देवी तो अब आरामी कुर्सी के शोभा बनके रहिगे रीहिस, ओकर सेवा करैया मन के कोनो कमी नई रीहिस। सात साल के बेटा जगमोहन अउ चार साल के बेटी मुनमुन चंदा सुरुज बरोबर घर में अंजोर बगरावत रीहिस। बृजभूषण अउ ओकर बाई माधवी के जोड़ी कोनो मुड़ा ले मेल नइ खावय, ऊँकर मन के खाप कभू नइ माड़िस। माधवी रसायन शास्त्र में एम एस सी करे के बाद नेट के संग जीआरएफ पास करके कालेज में रसायन शास्त्र के विभागाध्यक्ष बनगे रीहिस। वो बहुँत होनहार रसायनशास्त्री रीहिस, कालेज में रसायन शास्त्र के प्रोफेसर बने के सपना पूरा करे के बाद ओकर घर दू भाग में बँटा गे रीहिस, एक डाहन कला ला समर्पित बृजभूषण ला सिरिफ कला ही दीखय तो दूसर कोती माधवी ला सिरिफ अपन रसायन शास्त्र के नवा प्रयोग । दूनो झन के बीच आठ- आठ, दस-दस दिन तक भी कोनो बातचीत मेल मिलाप नइ राहय, दूनो के दूनो अपन काम में व्यस्त रहिके जीवन चक्र ला झेलत रीहिन। लइका मन के कोनो देखैया नइ रीहिस, आया के भरोसा पलत लइका मन एक दूसर के आँसू ला पोंछे ला सीख गे रीहिस। न कोनो बृजभूषण के रोकैया रीहिस, न कोनो माधवी के टोकैया। दूनो के दूनो अपन मर्जी के मालिक बन के सिरिफ अपन फैसला सुना देवय, जिहॉं जाना हे चल देवय। बिन नियम कायदा कानून अनुशासन के तो देश नइ चले, त घर कहॉं ले चल पातिस। संगत बने रहिथे त सद् गति जल्दी मिल जही, कुसंगति में पड़ जथे त दुर्गति होवत देरी नइ लगे। संगति बने मनखे के संग हो जथे त राक्षस हा तक देवालय जावत-जावत देवता बन जथे अउ कुसंगति में पड़के देवता तक राक्षस बन जथे। बीड़ी पियैया के संग रहैया मनखे आठ पंदरा दिन तो बीड़ी के धुंगिया सूँघत रहिथे ताहन खुदे बीड़ी धुंके ला धर लेथे। जइसन -जइसन संगति रहिथे तइसन-तइसन असर जरूर पड़थे। 


      बृजभूषण के कलाकार संगवारी मन सब के सब मंचीय अनुशासन के पालन करे फेर ओकर घर में अनुशासन नाम के कोनो चीज नइ रीहिस, जेला जतका पैसा लगथे सब अपन मन के मालिक रीहिस। ये मन हा भोंगर्रा होथे जी मनखे ला भटका देथे, मन हा दींयार बरोबर तको होथे  जे हा जिनगी के पटरी ला चुन-चुनके खा देथे। एकरे सेती साधू संत मन, मन ला बस में करे के उदिम जीवन भर करथे। 


        'कला कुंज' रोज संझा जगमग-जगमग करे फेर वो जगमगई में कोनो रस नइ रीहिस। देखैया मन ला कोन जनी का के सेती आय ते कुछू कमी लागे। एक सांझ घलो वो दुवारी में दीया बरत रहिस, फेर ओकर अंजोर मा खुशी नहीं आने दिन ले जादा किसम के सुन्नापन अऊ सन्नाटा छाय रीहिस। स्कूल बस ले चहकके घर पहुँचत सात साल के जगमोहन अपन हाथ मा 'रिजल्ट' धरे ठाढ़े रीहिस, जेमा सुग्घर अक्षर मा 'प्रथम' लिखे रहिस। ओ चाहत रीहिस कि अपन ये पहिली जीत ला अपन बापू बृजभूषण के गोड़ मा मड़ा देय, जेकर नाच-गाना अऊ कला के डंका जम्मो देस मा बाजत रहिथे। पर ओ दिन घर मा कोनो नई रहिस, न बापू के तबला के थाप रहिस, न महतारी माधवी के किताब मन ले आवे वाला रसायन शास्त्र के ओ गंध।

​      गरीब मनखे टूटथे त कोनो देखैया नइ राहय लेकिन जब बड़े मनखे मन टूटके बिखरथे तब सबे मनखे मन ऊँकर मनके टूटके बिखरे के विश्लेषण करत रहिथे। जब काकरो करम फूटथे तभे ऐसन दुर्गति होथे जैसन दुर्गति बृजभूषण अउ ओकर बाई के होय रीहिस। 

​बृजभूषण, कला के दुनिया के वो सुरुज रीहिस जेकर उवे ले चारों कोती ताली के गड़गड़ाहट गूंजत रहिस। फेर ये दारी वो 'प्रोग्राम' मा गिस त लहुटके नइ आइस। अफवा उड़िस कि ओहा कोनो नचइया टूरी के संग कहूँ दूरिहा अपन नवा संसार बसा लीस। अभी ये घाव ह भरे नइ रीहिस कि महतारी माधवी घलो अपन ममता के गला घोंट दीस। ओहा घलो अपन संगी मास्टर के संग घर-दुआर छोड़ के निकल गे।

​पाछू छूटगे तीन परानी- सियनहिन दादी, चार साल के नानचुन मुनमुन, सात साल के जगमोहन, कला कुंज के बड़का घर अउ लम्बा खेती बाड़ी। 

​"जग्गू भैया ददा, दाई कतका बखत मा आही? मोला भूख लागत हे," मुनमुन के ये गोठ ह सात साल के लइका ला रातों-रात सियान बनादीस।

​    

          जब अपने नत्ता रिश्तेदार मन अमानुस बेवहार करथे त नत्ता गोत्ता के सरी डोरी टूटके छिहीं-बिहीं हो जथे। ​दुख के पहाड़ अभी टूट के गिरे ही रीहिस कि जगमोहन के तीनो बुआ तारिणी, शुभमणि अऊ अंकिता जेमन बड़े-बड़े घर मा ब्याहे रीहिन, संवेदना जताय के बहाना आइन, ऊँकर हाथ में दुलार नहीं, कोर्ट के नोटिस रीहिस। ओ मन ला अपन भाई-भउजी अउ भतीजा भतीजी इहॉं तक दाई के मया ले कोनो मतलब नई रहिस, ओकर नजर तो 'कला कुंज' के जमीन अऊ जायदाद मा गड़े रीहिस।

​बुआ मन कोर्ट मा बटवारा के केस ठोक दीन। सात साल के लइका जेला अभी दुनियादारी के ज्ञान नई रीहिस, ओहा वकील अऊ कछेरी के चक्कर ला का जानतिस, फेर बखत के लबडेना जेन मनखे ला परथे पीरा ला उहिच हा जानथे। दादी के रोवई गिड़गड़ई के कोनो असर बुआ मन ला नइ पड़िस। ऊँकर आँखी में तो स्वार्थ के पट्टी बंधा गे रीहिस। ओ मन ला एक छोटे से कोठरी मा रेहे बर मजबूर कर दीन। जगमोहन ह अपन आँसू ला पी गे। ओहा कसम खाइस कि ये दुख ला ओहा अपन कमजोरी नहीं, ताकत बनाही । दिन में मंडी मा चहा पानी पियाके समोसा आलूगुंडा बेंच के , सांझ कुन होटल मा बरतन माँजे, बॉंचे समोसा आलूगुंडा अउ चहा धरके घर आवय अउ अपन दादी अउ नानचुन नोनी मुनमुन संग खा पी के सुत जावय। रतिहा कंडिल के अंजोर में अपन भविष्य लिखत जगमोहन हा बहिनी मुनमुन के पढ़ई लिखई के बनेच ध्यान रखय। जीवन के घटनाक्रम काकरो धरे बॉंधे नइ राहय। कोन जनी कब काकर संग का घटना हो जही कोनो नइ जानय। जब जगमोहन नौंवी पास होईस तब ओकर होटल के मालिक मालकिन मन एक्सीडेंट में गुजरगे। अब तो होटल के सबे भार जगमोहन ऊपर आगे। चौंक के टपरी के होटल ला चमकावत जगमोहन ला देरी नइ लागिस। दू साल के सफर में ओकर होटल के पूरा शहर में नाम होगे। धीरे से  जगमोहन ह अपन मेहनत ले सहर के सबसे बड़े 'बिजनेसमेन' बन गे। अब तो ओहा ओ 'कला कुंज' ला फेर खरीद ली, जेला ओकर बुआ मन बेच डारे रीहिन।

    जेन मनखे मन अपन का दूसरा के भी घर ओदारे रहिथे, ओ पापी मन के अंत हो के रहिथे। एक दिन जगमोहन ला अपन बाबू अऊ दाई के खबर मिलिस। बाबू बृजभूषण, जेहा कला के घमंड मा अपन परिवार ला त्यागे रीहिस, ओकर अंत बड़े भयानक होइस। ओ नचइया टूरी ह ओकर जवानी भर के कमाई ल गठियाके जम्मो पैसा-कउड़ी ला लूट लीस अऊ जब बुढ़ापा मा ओकर हाथ-गोड़ चलना बंद होइस, त ओला कोढ़ी कह के सड़क मा छोड़ दीस। बृजभूषण के अंत एक अनाथालय मा बेसहारा हालत मा होइस।

​ओइसने ओकर दाई माधवी घलो सुख नई पा सकिस। जेन मास्टर संगवारी संग गुलछर्रा उड़ायबर अपन नान-नान लइका मन ला छोड़े रहिस, उही मनखे ह रसायन विभागाध्यक्ष माधवी ला खानगी में फँसा के नौकरी ले निकलवा दिस, ओकर चरित्र ऊपर लॉंछन लगाके ओला धोखा दे दीस, माधवी कोनो मेर मुहूँ देखायके लइक नइ रीहिस। वो हा पगलाय घूमत सड़क मा भीख मांगत-मांगत दम तोड़ दीस। जब जगमोहन ला ये पता चलिस, त ओकर करेजा फाटगे, फेर वक्त ह हाथ ले निकल चुके रहिस।


        ​एक दिन जगमोहन के बंगला मा तीन बुढ़िया मन आइन, लुगरा फटे रीहिस, आँखी मा आँसू अऊ देह मा कतको बीमारी। ये मन ओकर तीनो बुआ रीहिन। ओकर बेटा मन ओ मन ला घर ले निकाल दे रीहिन।

​"जग्गू ... हम ला छमा कर दे बेटा, हमन ह पापी अन, हम ला कहूँ मेर थोकिन जगा दे दे।" तारिणी बुआ मड़िया के कीहिस।

​जगमोहन ह ओ मन ला घर में राख लीस। ओकर मन में कोनो बदला के भाव नई रहिस।

    ​आज जगमोहन तीर सब कुछ हे। धन-दौलत, मान-सम्मान अऊ ओकर बहिनी मुनमुन घलो सुखी हे। पर आज घलो ओहा रात मा सुतथे त ओला सपना मा उही सात साल के लइका दिखथे, जेनहा 'रिजल्ट' धरे अपन दाई-ददा ला खोजत हे।

​ओला आज घलो ओ रसायण के गंध अऊ बापू के घूँघरू के आवाज ह डर्हुवाथे। इंसान गरीबी ले तो बाहिर निकल जथे, फेर बचपना के वो घाव ले कभू बाहिर नई निकल सके, जेला अपन मन दे रहिथे। बुआ मन ला ओहा सहारा तो दे दीस, फेर ओकर मन के कोना मा बइठे ओ लइका ह आज घलो सिसकत हे।

​सुरता मन पाछू नई छोड़य... ओ मन तो साया बन के संग चलथे।

          ०००

लेखक

डॉ.अशोक आकाश

कोहंगाटोला बालोद, छत्तीसगढ़

491226

मो.9755889199

लघुकथा- " हाथ के रेखा "

 लघुकथा-

             " हाथ के रेखा "

         -मुरारी लाल साव 

आज से दस साल के पहिली के घटना ए l भागबली अपन हाथ ला एक बहुत बड़े पंडित ज्ञानी हस्त रेखा आचार्य के पास जाके देखाये रहिस l दूर दूर से अउ लोग आये रहिन अउ बहुत मनखे l सब के कहना इही रहिस "महराज बने बताथे हाथ ला देख के सब सही होथे l"

इही भरोसा भगबली ला रहिस l महराज ला अपन हाथ ला देखावत पूछे रहिस -" महराज मोरो भाग्य ला बने बताबे?

" का पूछना हे? "

"जउन हाथ म लिखाये हे तेन ला बता!"

"कुछु बड़े समस्या?" महराज पूछिस l 

भागबली कहिस -" अभी तो बिहाव नइ होये  l बिहाव होये रहतीस त बड़े समस्या रहतिस l बिहाव होही कि नइ होही अउ कइसे पत्नि आही?के झन लइका होही? इही सब ला पूछना हे l "

महराज हँसत कहिस " ला देखा जेवनी हाथ ला दे l "

संड़ौवा काड़ी ला रेंगावत कहिस -" तोर भाग्य म तीन बाई हे! भागबली अचरज म "तीन तीन झन!"  ऊपर वाले घलो का सोच के लिख दे हे?

महराज -" जइसन करम ओकर ओइसन भाग्य रेखा हाथ म होथे lपूर्व जन्म के अनुसार l"

"तोर एके झन लइका होही l

सहीच म!  हाथ के रेखा म लिखाये हे ना l कहूँ बिहाव नइ करहूँ कभू तभो?

महराज कहिस -" होना हे होके रहि l करम म दान धरम  जुड़े ले भाग्य बदल घलो जही l

भाग बली डर के मारे आज तक बिहाव नइ करिस l हाथ के रेखा का बताथे? बताइय्या के पीछू पड़े हे l ए मन कहाँ तक ककरो जिनगी ला पढ़े हे? का गढ़े हे?

"

डिजिटल क्रांति अउ साहित्य

 डिजिटल क्रांति अउ साहित्य 

********** 

     परिवर्तन प्रकृति के अमोघ नियम आय त साहित्य अउ साहित्यकार के लेखन ऊपर भी तो ए नियम हर लागू होही न ? चिटिक धीर धर के साहित्य के इतिहास के पन्ना पलट लिहिन ..। 

 वाचिक साहित्य उपदेशात्मक रहिस , पीढ़ी दर पीढ़ी मुँहखरा चलत रहिस ...1. एक राजा एक रानी रहिन 2 . गरीब बाम्हन के कथा , 2. बेंदरा अउ मंगर के कथा अउ बहुत अकन ...ए सबो कथा समाज ल सही दिशा मं ले जाए के उदिम रहिस । 

 लिपि के आविष्कार हर साहित्य ल नवा दिशा देखाइस त मुद्रण के आविष्कार हर साहित्य ल लिखित रुप मं आम आदमी तक पहुँचाइस .... कविता , कहानी , लेख के बहुतायत रहिस , पत्रिका भी छपे लागिस 'उदन्त मार्तंड 'के सुरता करव न ? 30 मई 2026 के दिन पत्रकारिता के दू सौ साल पुर जाही । लिखित साहित्य के प्राचीन अउ अर्वाचीन विधा मन के विकास होइस चाहे गद्य होय या पद्य ...। 

     विज्ञान के नवा देन हर लेखन माने साहित्य ल नवा रस्ता मं ले चलिस जेला डिजिटल क्रांति के नांव मिलिस । सन 1997 मं सोशल मीडिया के शुरुआत होइस जेला sixdegrees.com  के रुप मं पहिचान मिलिस । सन 2000 ले ब्लॉग मं साहित्यकार मन लिखे लगिन ...। सन 2004 मं फेसबुक आइस जेन मं साहित्यकार लिखे तो लगिन । सन 2009 / 10 मं साहित्यकार मन कविता , लघुकथा , समीक्षा ,संस्मरण , रिपोर्ताज असन विधा मं लिखे लगीन तभो कहे च बर परही के निजी जीवन के घटना , गोठ बात माने जन्मदिन , श्रद्धांजलि असन समाचार आजो बहुत दिखथे । 

     आजकल तो लगभग 100 मिलियन मनसे फेसबुक , इंस्टाग्राम , व्हाट्सएप , यू ट्यूब के जरिए मन के बात कहत , लिखत चलत हें .. डिजिटल क्रांति हर अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम बन गए हे ..। on line साहित्यिक कार्यक्रम घलाय तो होते च रहिथे साहित्य अउ साहित्यकार मन बर ये परिवर्तन हर वरदान आय । ध्यान देहे बर परही के डिजिटल साहित्य ल पुस्तक रुप देहे के बेर कोन विधा के अंतर्गत ओकर गिनती होही ? दूसर बात के व्हाट्सएप साहित्य , इंस्टाग्राम साहित्य , फेसबुक साहित्य के अभिव्यक्ति अउ क्रम बद्धता मं भी तो अंतर मिलबेच करही । 

     व्हाट्सएप मं लेख , कहानी , उपन्यास , संस्मरण ल धारावाहिक रुप मं प्रस्तुत करे जा सकत हे फेर फेसबुक , इंस्टाग्राम , यूट्यूब , ब्लॉग आदि मं तो धारावाहिकता मं बाधा परबे च करही । अइसन समय मं ये अभिव्यक्ति ल साहित्य के कोन विधा के अंतर्गत राखबो ? आजकल कई झन साहित्यकार डिजिटल मीडिया के साहित्य ल संग्रहित करके पुस्तक रुप मं प्रकाशित करवावत हें ...। बने बात आय काबर के जेन भी तरह से होय बढ़ोतरी तो साहित्य के ही होवत हे । अब तो A I के युग आगे , जेकर चर्चा फेर कोनो दिन करबो ...। 

    सोशल मीडिया मं बगरे साहित्य के विधा मन तो जुन्ना ,नवा दुनों हें फेर जौन मन अपन सुख , दुख ल सोशल मीडिया के सहारे बगरावत हें ओहू हर तो गने जाही न भाई ?  अवइया दिन मं सोशल मीडिया के साहित्य चर्चा करे जाही त साहित्यिक विधा मन के अधार मं नही बल्कि व्हाट्सएप , फेसबुक , इंस्टाग्राम , ब्लॉग , यू ट्यूब  आदि के द्वारा करे जाही ...चिटिक फोरिया के कहे जाय त व्हाट्सएप मं कोन , कब काय लिखिस त अइसनहे  फेसबुक , इंस्टाग्राम के लेखन ....। 

  जरुरी बात के ये सोशल मीडिया मं बगरे  लेखन हर  मूल रूप से साहित्य ही तो आय त एला किताब के रुप मं प्रकाशित करवाना घलाय तो जरूरी  हे तभे तो  यांत्रिक लेखन हर लिखित  साहित्य के रुप मं इतिहास बनही ..। अब लोकाक्षर के जम्मो लिखइया , पढ़इया मन मोर बिनती ल सुनव , पढ़व अउ अपन सोशल मीडिया के लेखन ल पुस्तक रुप देवव । 

  कोन अघुवा के कोन पिछुवा गे एला झन गुनव ..साहित्य के इतिहास लिखइया मन ऊपर एकर जिम्मा ल छोड़ देवव ...!

          सरला शर्मा 

           दुर्ग

बेटी-माई ला सरेखे के उदिम आय: हमर नेंग-जोंग*

 *बेटी-माई ला सरेखे के उदिम आय: हमर नेंग-जोंग*

पोखन लाल जायसवाल 

    लोकजीवन मं नोनी मन ला पर के धन कहे जाथे। दूसर कोठा के लक्ष्मी कहि देथें। जिहाॅं वो अवतरे रहिथें, उहाॅं वो मन ला इही सुने मिलथे कि अपन घर जाबे त सब सउॅंक ला पूरा कर लेबे। अभी चूल्हा चौकी ला सीख ले। माने जिहाॅं वो अवतरे रहिथें उहाॅं उॅंकर कोनो अधिकार नहीं। उॅंकर सपना सपना नोहे। सपना धरे रहि जथे। 

     बाबू पाछू बाबू अवतरे मं परिवारजन मन अउ परोसी मन कहिथें बाॅंटा लेवइया हिस्सेदार आगे। कहूॅं नोनी अवतर गे ता ये गोठ कभू सुने ला नइ मिलय। बबा-डोकरी दाई संग ददा के मुॅंह घलाव उतर जथे। कोन जनी नोनी संग अइसन हीन मान काबर? 

     अभी कुछ बछर ले मनसे के सोच बदले हावय। तब ले एक भाव अभियो देखे सुने मिलथे, कि बेटी अपन घर चल दिही ता हरहिंच्छा हो जहूॅं। गंगा नहा लेहूॅं। मुड़ के बोझा उतर जही। अइसन कतको किसम के गोठ। जे मनसे ते मुॅंह अउ ओतके गोठ। एकरे आड़ मं नोनी मन ऊप्पर धियान कमती दिये जाथे। पढ़ई-लिखई, ओनहा-लत्ता, काम-बुता सबेच मं भेदभाव देखे ला मिलथे। भरोसा कम रहिथे। ठीक हे थोर बहुत त पाबंदी होना चाही। समाज के ॲंगरी उठे झन, एकर बर सावचेत रहना ज़रूरी हावय।

    हाथ पिंवरा के बिदा दे दिन, मतलब छुटकारा पागे। नोनी मन बर मइके मं कुछु नइ रहि जाय। तइहा के पुरखा सियान मन अपन संतान नोनी मन ले जुराव बने राहय, एकर बर कतको नेंग-जोंग बना के रखिन। सरी नेंग-जोंग मन बेटी-माई ला सुख-दुख मं सरेखे के उदिम ऑंय। जेकर बहाना नोनी मन बर मइके के मुहाटी खुले राहय। उॅंकर हीन मान झन हो। सब संग मया-बॅंधना जुरे राहय। एक लोटा पानी निकलत रहय। नोनी मन घलाव एक लोटा पानी के आसरा मं जमीन-जायदाद डाहन नज़र नइ उठाॅंय। हिरक के नइ देखॅंय। पटवारी मेर हाॅंसत-हाॅंसत दसखत कर देथें। 

     राखी अउ तीजा-पोरा के पौराणिक महत्ता अपन कोती हे। हमर छत्तीसगढ मं ए दूनो तिहार दू कुल बर बड़का तिहार आय। जेन बेटी-माई के परगोत्री होय पाछू मइके संग मया के सुतरी मं उन ला बाॅंधे राखथे। एकर अलावा पुरखा मन कई ठन नेंग-जोंग बनाय हावॅंय। जउन ह परम्परा के रूप मं तब ले चले आवत हें। ए नेंग-जोंग मं जन्म अउ मरण तक कई ठन हें, जेन बेटी-माई ले जुरे हावॅंय। एकरे बहाना उन ला मान दे गे हावय। इही नेंग-जोंग के बहाना नोनी मन के पूछ परख होथे। फेर कुछ मन के ऑंखी मं एहर गड़े लग गे हावय। उन ला खोट दिखथे। ए खोट उॅंकर सोच के खोट आय। मनसे आज नवा आदत पाल डरे हे, चन्नी मं दूध दुहे के। अपन चद्दर ला तानथे अउ चिरागे त एकर दोष दूसर के मुड़ी मं खपल देथे।

    कानून कब के बने हावय, तब ले एक लोटा पानी के आस मं बाॅंटा ला भुला जथे। भाई बाॅंटा ले लिही त भाई-भतीजा बर का बाॅंचही? बहिनी हर सोचथे। देनगी लुगरा के दिन पुरही? फेर एकर मरम का हो थे, कोनो दुखियारिन हा बताहीं। नेंग-जोंग मं लुकाय ठट्ठा दिल्लगी अउ मजा ला पइसा मं सरेखहीं, ओ का जानही।

    छट्ठी-छेवारी के बखत घर मं खुशहाली होथे। बर बिहाव घलाव खुशहाली के घड़ी होथे। नवा घर या दुकान के कथा पूजा मं हाथा देके नेंग जइसन सुख के अवसर मं जम्मो हितवा मन सकलाथें, तौ बहिनी-माई के काबर अनदेखा होवय? इही गुनान करत बुधियार सियान मन कुछ नेंग बना दिन। अपने घर परिवार के मनसे वहू हरे। त का नवा कपड़ा-लत्ता ओकर बर नि बिसाना चाही,? इही ला उन बहाना बना नेंग कहि दिन। का गलत हावे एमा? फेर नवा जुग के मुड़पिरवा मन के भेजा मं बात समाय तब। दारूपानी बर कमती मत होवय, भले घर मं आये बहिनी-माई मन के मान मत होवय।

     सुख बस मं नइ दुख के घड़ी मं पूरा दसकरम के होवत ले नोनी मन दोनिया देवाथें। रांध-गढ़ के खवाथें। डेरउटी मं दीया बारथे। का उॅंकर ए समर्पण ले देनगी लुगरा हा भारी हे? एकाध झन होहीं जउन मन कुछु अउ बात के रिस ला लुगरा ला झलझलहा हे, एक ठन चेंदरी के पुरतन नइ हन कहिके ताना मार देथे। फेर उॅंकर अंतस् मं अइसन कुछु नइ राहय। हम ला मानना चाही कि हमर घर-परिवार के उत्सल मं नेंग-जोंग मन बेटी-माई के सम्मान बर बनाय गे हावय। ए नेंग मन परिवार ला एक सुतरी मं पिरो माला जस गुंथे के उदिम हरे। अतका माने ला परही कि नेंग-जोंग मन बेटी-माई के मइके आए के धरखन आय । ए धरखन ला बचाय रखे के जुम्मेवारी हमर हे। तभे परिवार के एकजुटता बाॅंचही। नइ ते एकाकी जीवन के चलत मनसे अवसाद ले उबर नइ पाही। 

०००

पोखन लाल जायसवाल 

पलारी (पठारीडीह)

जिला बलौदाबाजार-भाटापारा 

मोबाइल - 9977252202

मुसवा

 *मुसवा*

एक ठन बड़े घर मे सैंकड़ा अकन मुसवा राहय।वो मन अराम से खाय अऊ खतरा जान के बिला मे खुसर जाय।फेर एक दिन बिलई आगे।मुसवा ल देख के ओकर मुंह मे पानी आगे।अउ उहेंच अपन डेरा जमा लिस। अंधियार मे मौका देख के मुसवा मन ल खाय लगिस।बिलई के सेती मुसवा मन के गिनती (संख्या)घटत गिस।तब हलाकान होके मुसवा मन मिटिंग बुलाइस ताकि बिलई ले बचे के उपाय खोज सके।कई ठन सुझाव आईस फेर कोनो ठंसा नि परिस।तब एक ठन सियान मुसवा ह कहिथे , कोनो (अगर)बिलई के गला म घंटी बांध दे जही त ओकर अवाज ल सुनके बिला म खुसर जबो।ऐ बात ल सुनके सब मुसवा खुश होगे।तब एक झन समझार मुसवा ह कहिथे बात तो बने हे फेर घंटी ल बांधही कोन।ऐला सुनके सब मुसवा कलेचुप होगे। कोनो करा ऐकर जवाब नइ रिहिस।वतका बेरा म बिलई के आरो ल सुनके सब मुसवा डर के मारे बिल म खुसरगे।

         फकीर प्रसाद साहू 

                सुरगी 🙏

पांच छत्तीसगढ़ी लोककथा -रामनाथ साहू

 पांच छत्तीसगढ़ी लोककथा -रामनाथ साहू


 -


            *डोकरी अउ अगास*                       --------------------------        



पांच छत्तीसगढ़ी लोककथा -रामनाथ साहू                 




                 1. पान अउ ढेला                            


                  --------------------       



           ये जगह म ,आज  खेत  नइये। बहुत पहिली...बहुत- बहुत पहिली,येकरा एक ठन खेत रहिस।येकर संग म अउ बहुत अकन ,खेत रहिन ।                     





            खेत रहिन, तब रुख- राई मन रहिन ,एकदम गझिन...सघन वन ..अइसन । अउ जब रुख राई मन रहिन ,तब  पान-पतइ मन गिरबे करें । खेत म माटी के एकठन ढेला रहिस ।वोकरे तीर म एक ठन  चौड़ा थारी असन  पान हर आ गिरीस। दुनों के दुनों ,एक दूसर ल पसन्द करे लॉगिन । अउ आपस म सुख-दुख गोठियाय लॉगिन । धीरे- धीरे वोमन के  मित्रता हर परवान चढ़े लागिस,अउ वोमन आपस  मितान घलव बद डारिन ।मितान बनिन।संग म जिये मरे के कसम खाईन ।




                एक दिन बड़ जोर से बड़ौरा आइस,अउ  पान हर उड़ियाय कस करिस। तब ...मोर रहत ले तुंहला कुछु नइ होय मितान...कहत ढेला,पान उप्पर चढ़ के बोला लदक दिस । पान उड़ियाय ले बांच गय । पान वोला हृदय कमल ले आभार दिस ।





                            अइसनहेच एक दिन रटा -तोड़,मूसलाधार वर्षा होइस । ढेला के मूड म एक बूंदी गिरीस के,पान हर तुरतेच वोकर उप्पर म चढ़ गिस ।ढेला हर घूरे ले बांच गइस  ।                    





         अइसन  सुख -दुख म एक दूसर के काम आवत,वोमन बड़ दिन ल हाँसी -खुशी रहिन । फेर एक दिन,विधाता के लीला...!गर्रा-धुंका, आंधी-तूफान...बरसात...सकल पदारथ  एके संग म आइन। ढेला हर कूद के पान उप्पर चढ़ गय।फेर पानी के मोठ... मोठ बूंदी ले वोकर अङ्ग -भङ्ग होय लागिस।वोहर गले के शुरू हो गय रहिस । मितान...!मोर रहत ल तुंहला कुछु नइ होय, कहत पान, वोकर उप्पर चढ़ गय।तभे जोर से गर्रा वोला,उड़ियाय लागिस।मितान... मोर रहत ल तुंहला कुछु नइ होय ।ढेला ललकारिस अउ पान उप्पर फेर चढ़ गय। कभु पानी...कभु ....गर्रा -धुंका।कभु  पान तरी,ढेला उपर त कभु ,त कभु पान उप्पर म ढेला ल बचावत । पान चिथात गिस, अउ ढेला घुरत...!फेर जीवन अउ मृत्यु के ये  जंग ल दुनो मिल के बहादुरी के साथ लड़त, छेवर म पान चिथा-पुदका के उड़ गय, अउ अपन मित्र ल बचाते -बचात ढेला घूर गय ।




                                      अउ ये कत्था हर पुर गय ।       






 -





-




            2.चोर अउ खटिया


            --------------------------






         अगास मा एक ठन डोकरी डोकरा मन के जोड़ा रहत रहिस। डोकरा हर बढ़ाई रहीस।फेर जइसन चलागत अउ हाना हे -




           बइगा के डौकी ठड़गी के ठड़गी



           बढ़ई के डौकी बर भुईंया गोदरी।




        कहे के मतलब  हे बइगा हर अपन घरवाली ल जतने नई सकत ये अउ वोहर निपूती हे, बाल बच्चा नई ये। अउ बढ़ई के सुवारी  हर कभु खटिया नई  पाय। वोहर भुइयां म सुतथे।




            तब येहू डोकरी भुईंया म सुते। भुईंया म सुते ले वोकर कनिहा पिराय लगिस। अइसन म एक दिन वो डोकरी हर अपन गोसान बढ़ई पर भड़क गए। भड़क का गय,वोहर तो अब बढ़ई डोकरा ऊपर भीड़  गय रहिस।वोकर चुन्दी मुड़ी ल नीछत रहिस। बढ़ाई थर थर थर थर काँपत आन बुता ला छोड़ के डोकरी बर खटिया बनाय बर लग गय।




        तब वोहर लकड़ी मन ला छोले करोय। अइसन करे ले जउन बुरादा अउ छिलपा निकलिस वोहर अगास म बगर गय। अउ आज ले घलव वो छिलपा बुरादा मन बगरे दिखथें(आकाश गंगा -The Milky Way)। बढ़ई के कुटेला (एक तारा मंडल ) हर दिखथें। सब जगमग जगमग चमकत रथें।




             खटिया बन गय। आज डोकरी मजा के खटिया म सूत गए। तभे घर म तीन झन चोर मन पेलिन। वोमन डोकरी के खटिया ला उठा के ले जात रहिन। लेकिन खटिया के खुरा रहे चार और चोर रहीन तीन। एकर सेती खटिया हर डगमग डगमग डोले लगीस। एकर ले डोकरी जाग गय। अउ उतर के चोर मन ल सुध के बुतात ल ठठाइस। अउ एकठन लंबा डोर म वोमन ल खटिया के एकठन खुरा म। बांध दिस। आज ले वो तीनो चोर मन खटिया के वो खुरा ले बंधाय हें।





( येहर हिंदी वांग्मय के सप्तर्षि -क्रतु ,पुलह, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ अउ मारीचि आंय । अंग्रेजी वांग्मय के  Ursa Major ये। वशिष्ठ के तीर म -मंझ के चोर तीर म एकठन नानकुन तारिका दिखथे।येहर वशिष्ठ पत्नी -अरुंधती ये। जउन येला देख लेथे, वोकर नेत्र ज्योति बढ़िया माने जाथे।)











            3.कहाँ जात हस बिलई   


             -------------------------------             



"कहाँ जात हस बिलई...?" 



"बिरईन* काटे ।" 



"बिरईन ल का करबे बिलई ?" 



" चोरिया गाँथ हाँ ।" 



" चोरिया ल का करबे बिलई ?" 



"मछी धर हाँ ।" 



"कइसे मछी धरबे बिलई ?" 



"छापा छींचहाँ...!" 



"कइसे छापा छींचबे बिलई ?" 



"खुपुल- खापल खुपुल -खापल ..." 



"मछी धरके का करबे बिलई ? " 



"वोमन ल राँधहाँ...!" 



"कइसे राँधबे बिलई  ?" 



"चनन मनन चट के खाय के बेर गट ले..." "मछी ल रान्ध के का करबे बिलई ?" 



" खाहाँ गप गप ले " 



"खा के का करबे बिलई ?" 



"राजा के कोठी के गोड़ा तरी सुतहाँ !"



 "सुत उठ के का करबे बिलई ?" 



" नरियहाँ...!" "कइसे नरियाबे बिलई...?" "म्याऊँ...म्याऊँ ...भाकू...उंई... उंई भाकू...उंई... उंई...! 



"बस ...बस...बस...! "








               



            4.डोकरी अउ अगास*                                   ------------------------------        





                              अभी तो अगास हर कतेक न कतेक धूर म हावे । पहिली अइसन नि रहिस । पहिली अगास हर मनखे के अमरउ म रहिस । मनखे मन के, जइसन मन लागे तइसन अगास के तारा -जोगनी मन ल छू लेंय । वोमन ल एती - वोती हलचल कर लेंय । वोमन ल अपन मन मुताबिक सजा लेंय । सुरुज हर घलव तिरेच ल नाहके। वो बखत  वोहर थोर -थोर सुलगे के शुरू होय रहिस , तेकर सेती वोमे कम अंजोर अउ अउ कम गर्मी रहिस ।                   





           आन मनखे मन के पीठ हर बने रहिस फेर डोकरी के पीठ हर कुबरी हो गय रहिस । एक दिन वोहर अपन ठूठी बहिरी ल धरके अंगना ल बाहरत रहिस खुरूर... खुरूर...!




                         तभे वोकर पीठ के कूबड़ ल अगास हर छू दिस ।डोकरी ल पिराईस तब वो रिस म भर गय अउ अगास ल अपन ठूठी बहिरी के मूंठ म मार दिस अउ कहिस -जा रे... जा ! बहुत धूर छिंगल जा ! 




                       तब ले अगास हर बड़ धूर छिंगल गय वोहर भाग पराइस । 



-






             5.चंदा -सुरुज


            -----------------------                    




      एकझन   सोनारिन डोकरी रहिस। वोहर बनेच सियान हो गय रहिस, तभो ले वोकर हाथ म विक्कट अकन कलाकारी हर भरे रहिस ।  वोहर बनेच झन लइका- पिचका मन  ल जोरे रहे अउ वोमन ल खेल -खेलवारी म,  सोन अउ चांदी के गहना बनाय बर सिखो देय । लइका- पिचका मन वोला सदाकाल झामेंच रहंय। 




      सोनारिन डोकरी रोज खुद बड़ अकन गहना बनाय। अउ वो बने गहना मन ल अगास म ,खूंटी लगा के टाँगत जाय। वोकर वो गहना मन अगास म झिकिर- मिकिर करत चमकत रहंय। 




            एक दिन डोकरी सोन ले गहना बनात-बनात थक गय, फेर अब ले भी बनेच बड़े सोन के लोंदा हर बांचेच रह गय रहिस। तब वो डोकरी हर ,रिस म वो लोंदा ल पूरब कोती फेंक दिस... जा... रे... कहत। तब वोई लोंदा वो गोला हर पूरब दिशा म जाके जगमग जगमग बरे लागिस अउ वोई हर सुरुज बन गय।




         आगु दिन डोकरी हर चांदी के गहना बनात- बनात फेर थक गिस,तब फेर वोहर बाँचे चांदी के लोंदा ल पच्छिम दिशा म फेंक दिस... जा रे कहत, तब वो चांदी के लोंदा वो चांदी के गोला हर चंदा बन गय। 




            अब डोकरी सोनारिन करा सोन- चांदी सिरा गय,तब वोहर फुर्सत ले सुतिस। वोकर नाक घरर ...घरर बाजिस।तब सबो लइका -पिचका मन ,ताली बजात अपन घर कोती भाग पराइन।




         फेर वो सोन अउ चांदी के गोला मन रोजेच येती ल वोती ढुलत हें अउ सोनारिन के बनाय अउ सजाय सबो गहना मन खूंटी म टँगाय हें। ये गहना मन ल अपछरा (अप्सरा)मन , अपन मन  के मुताबिक पहिन लेथें तब फिर निकाल के जस के तस टांग देथें।




       फेर खूंटी नई होय के सेती ये सोन अउ चांदी के गोलवा मन पूरब ले पच्छिम ढुलत रहिथें।




रामनाथ साहू


देवरघटा(डभरा)


जिला -सक्ती (छत्तीसगढ़)


-495688




-




  

हड़ताल अउ सिनेमा - 10(संस्मरण)

 हड़ताल अउ सिनेमा - 10(संस्मरण)

रायपुर म जैनधर्म वाला मन के प्रवचन चलत रहिस हे। अणुव्रत वाले आचार्य तुलसी के प्रवचन चलत रहिस हे। सन् 1970 के बात आये मैं नवमी म पढ़त रहेंव। एक दिन ओ ह माता सीता के बारे म कुछ कहि दिस। पहली रायपुर म तोड़फोड़ शुरु होगे। दूसर दिन जब स्कूल लगगे तब रायपुर बंद कराना शुरु होगे। कालेज के लड़कामन स्कूल मन ल बंद कराये ले लगगें। मैं बूढ़ापारा म जे आर दानी गर्ल्स उच्चतर माध्यमिक शाला म पढ़त रहेंव। उंहा के चेनल गेट ल बंद कर दे गेस। दोपहर के स्कूल रहिस हे। सवा बारह बजे करीब चार लड़का अइन अउ चिल्लाये ले लगगें "स्कूल बंद करो, स्कूल बंद करो।"

प्राचार्य ले बात करिन त भूटानी मैडम बोलिस के 'लड़की मन ल अतेक दंगा म नइ छोड़न। समय में ही स्कूल छूटही। बहुत लड़की मन रिक्शा म आथें त अभी कइसे जाहीं?' 


लड़का मन बोलिन के 'कोनो भी लड़की ल कुछु नइ होवय। सब के जाये के जिम्मेमेदारी हमर आये।' 


स्कूल छुटके। सब लड़की स्कूल के बाहिर आगें।  कुछ लड़का मन लड़की मन के संग संग चलत रहिन हें। काबर के पहिली ले ही इंहा दू गुट चलत रहिस हे। एक ब्राम्हणपारा अउ दूसर बैजनाथ पारा। हमेंशा दूनो के बजेच लड़ाई, मारपीट होवत राहय।


हमर ग्रुप निकलिस त बूढ़ा तरिया ले जब सत्तीबाजार डाहर मुड़त रहेन त आगू भीड़ दिखिस त हमन श्याम टॉकीज डाहर मुड़ गेन। श्याम टॉकिज म थोरिक रुक जथन सोचेन। उंहा के गेटकीपर कहिस 'अंदर हॉल में बैठ जाओ पैसा नहींं लगेगा।' हमन सोचे ले लगगेन। मैं अउ वीणा तिवारी साथ म रहेन। अउ लड़कीमन रहिस हे फेर सुरता नई आवत हे शायद रत्नप्रभा तिवारी रहिस हे। हमन करीब दस बारह झन लड़कीमन  सिनेमा देखे बर बइठ गेन। हॉल म चार पांच झन बइठे रहिन हें। हमन तीन बजे निकलेन तब तक चारो डाहर शांति होगे रहिस हे। हमन सत्तीबाजार डाहर चल देन। जइसे अजंता बुक डिपो तीर पहुँचेन त चार पांच लड़कामन बइठे रहिन हें।

"कहाँ ले आवत हव"

" रद्दा बंद रहिस हे त श्याम टॉकिज म रुक गे रहेन"

"ठीक से जाना" बोले के बाद हांका लगइन "लड़कीमन ल सीधा जावन देव"

 हमन चुपचाप चलत रहेन। पूरा रोड म सन्नाटा रहिस हे। हमन कंकाली अस्पताल के सामने गेन त फेर सात आठ झन लड़का खड़े रहिन हें। एक झन पूछथे, स्कूल ड्रेस म कहां रहेव? तब एक झन लड़का वीणा ल पहिचान लीस। ओ ह लड़का मन कहिस "जान दे ब्राह्मणपारा वाले के बहिनी आये।

वीणा ल बहुत झन मन पहिचानत रहिन हें। कन्हैयालाल तिवारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नातिन अउ पंकज तिवारी के बेटी रहिस हे। आज पंकज तिवारी के नाम ले ब्रामहणपारा म स्कूल हावय। वीणा ले बड़े चार भाई रहिन हें। ओ मन चौक म अक्सर खड़े राहंय। छोटे से रायपुर के लड़कामन के गेंग एक दूसर ल जानंय। हमन ब्राम्हणपारा चौक पहुँचेन त गांधी जी के मूर्ति तीर वीणा के भाइ संग अउ लड़कामन खड़े रहिन हें। सब लड़की मन रद्दा म अपन अपन घर चल दिन। अब आखरी म मैं बांचे रहेंव। वीणा के भैय्या पूछिस 'सुधा अकेले जायेगी?'


मोर चेहरा के डर देखके भैय्या मोला छोड़े बर गीस। आमापारा ले मुड़ के स्वीपर कालोनी पार करके ईदगाहभाठा हिन्दूस्पोर्टिंग मैदान तक छोड़ दिस। मैं छः नम्बर गली म  मुड़ के अपन घर चल देंव। 

मोर माँ बैठक के दरवाजा म गली के दूनो तरफ ल पारी पारी ले देखत बइठे रहिस हे। मैं गेट ल खोलके अँगना म आ गेंव त माँ घलो उठ के अंगना म आ गे। 


मैं मस्कुरावत रहेंव त पूछिस "स्कूल ल बंद करवा दें हें काहत रहिन हें तोर स्कूल खुल्ला रहिस हे का?" मैं हाथ गोड़ धोवत धोवत पूरा घटना ल बता देंव। अब चाय बना के माँ ल देंव अउ मैं टिफिन के रोटी ल निकाल के चाय संग खायेंव। मोर पसंदीदा नाश्ता चाय रोटी। बिहनिया चाय रोटी अउ शाम के चाय पराठा। शांति तो होगे फेर माँ ह दूवारी म बइठे बइठे अवइया जवइया वाले मन संग बात करके समाचार लेवत राहय। ये हमर माँ के दिनचर्या म रहिस हे। रात के हमर पिताजी जेन ल काका काहत रहेन अइस त सब बात सुनके चुप ही रहिस। बस अतका कहिस के "स्कूल ले सीधा घर आना चाही। आगे से कहीं अउ जाये के जरुरत नइये।"


घर साइंस कालेज इंजिनियरिंग कालेज के तीर म रहिस हे। आये दिन दंगा होवत राहय त लड़का मन हमरे मोहल्ला म आके  लुकावंय। फोन के जमाना नइ रहिस हे। घर के बाहिर गेस त बस इंतजार ही आखरी हथियार राहय।


आज अतेक क्राइम होवत हावय। दस बछर ले तो दू ही समाचार मिलथे बलात्कार अउ खून। आज छः महिना के बेटी ले सत्तर बछर के डोकरी दाई घलो सुरक्षित नइये। आज बेटी बस म स्कूल जाथे तब भी महतारी के जान सुखावत रहिथे। घर आ जथे तब ही ओ मन भर के सांस लेथे।

हमन ओ समय म एक ही बात देखेन छेड़छाड़ अउ एक से एक डॉयलॉग। हा हा हा हा । आज हँसी आथे सुरता करके। दानी स्कूल ले आवन त चार पाँच अड्डा राहय जिंहा लड़कामन खड़े रांहय। अइसना वाक्य बोलंय के डर के संग हाँसी आवय।

" ये पीली चुन्नी वाली आज रात के खिड़की घोल के रखबे।

"मैं काली आवत हंव बने नाश्ता कराबे।"

मोर भाग्य अच्छा रहिस हे जेन सुंदर भी नइ रहेंव, सांवली सलोनी , मोला कुछ सुने बर नइ मिलिस। हा हा हा।"


ओ कुछ बछर के समय अइसना रहिस हे तब कालेज म बहुत हड़ताल होवय अइ सत्तीबाजार  ब्राम्हणपारा अउ बैजनाथपारा म गुंडागर्दी अउ मारपीट होवत राहय।


माता सीता के ऊपर बोले के बाद तो हड़ताल बहुत चलिस मारपीट होइस। फेर लड़की मन सुरक्षित रहिन हें। सुरक्षा के जिम्मेदारी रायपुर दादागिरी करने वाला लड़का मन लेय रहिन हें। पुलिस ल हमेंशा बोलंय 'किसी भी लड़की को कुछ नहीं होगा।'


सन् 1965  ले 1980 तक जब कोई घटना सुने नइ रहेंन। ये हमर पढ़ाई के समय रहिस ह। बाद म कलयुग अपन गोड़ पसारना शुरु कर दिस। बीच के बेरा म नारी भ्रूण हत्या होवत रहिस हे दहेज के कारण। बाद म बलात्कार के कारण। जब भी बलात्कार के घटना सुनथंव त ओ सिनेमाघर सुरता आथे। ओ दिन हमन दू घंटा बइठ के सीधा लड़कामन के निगरानी म अपन अपन घर पहुँच गेन। 1980-90 तक लड़की मन सुरक्षित रहिंन हें। लोगन अपन बेटी ल आसपास के घर के भरोसा म बेटी ल छोड़ देवंय। आज बाप दादा ले घलो बेटी सुरक्षित नइये। ये सुरता येखरे कारण अइस। समय कतेक बदल के हावय। चालीस बछर म बेटी अकेल्ला दुनिया घूमत हावय फेर अस्मिता सुरक्षित नइये। हमन युवा रहेन त ये लड़कामन ही हमर अस्मिता के रक्षक रहिन हें।

सुधा वर्मा,12/4/2026

मन दीयाँर होथे

 मन दीयाँर होथे


      ​   सुरता मन पाछू नई छोड़य, बेरा तो गुजर जथे फेर सुरता जस के तस माड़े रहिथे। जीवन में जे मनखे मन अपन मनके रेंगथे, ओकर जिनगी ला मन के दीयाँर हा चुन चुनके खा देथे। बृजभूषण हमर गॉंव के बड़का कलाकार रीहिस जेन हा देश बिदेश में अपन कला के डंका बजावत रीहिस। जब भी बृजभूषण घर आवय ओकर घर 'कला कुंज' में कलाकार मन के मण्डली के रास माड़ जाय। अवैया कार्यक्रम के तैयारी में ओकर घर सिगबिग-सिगबिग करे, मोटर गाड़ी के रेला लगे राहय। कोनो चाय नाश्ता बनात बॉंटथे, कोनो गावत बजाथे, सबके अलग-अलग काम बँटाय राहय। कलाकार के चहल-पहल ले बृजभूषण के घर अब्बड़ सुग्घर लागे। महतारी रोहणी देवी तो अब आरामी कुर्सी के शोभा बनके रहिगे रीहिस, ओकर सेवा करैया मन के कोनो कमी नई रीहिस। सात साल के बेटा जगमोहन अउ चार साल के बेटी मुनमुन चंदा सुरुज बरोबर घर में अंजोर बगरावत रीहिस। बृजभूषण अउ ओकर बाई माधवी के जोड़ी कोनो मुड़ा ले मेल नइ खावय, ऊँकर मन के खाप कभू नइ माड़िस। माधवी रसायन शास्त्र में एम एस सी करे के बाद नेट के संग जीआरएफ पास करके कालेज में रसायन शास्त्र के विभागाध्यक्ष बनगे रीहिस। वो बहुँत होनहार रसायनशास्त्री रीहिस, कालेज में रसायन शास्त्र के प्रोफेसर बने के सपना पूरा करे के बाद ओकर घर दू भाग में बँटा गे रीहिस, एक डाहन कला ला समर्पित बृजभूषण ला सिरिफ कला ही दीखय तो दूसर कोती माधवी ला सिरिफ अपन रसायन शास्त्र के नवा प्रयोग । दूनो झन के बीच आठ- आठ, दस-दस दिन तक भी कोनो बातचीत मेल मिलाप नइ राहय, दूनो के दूनो अपन काम में व्यस्त रहिके जीवन चक्र ला झेलत रीहिन। लइका मन के कोनो देखैया नइ रीहिस, आया के भरोसा पलत लइका मन एक दूसर के आँसू ला पोंछे ला सीख गे रीहिस। न कोनो बृजभूषण के रोकैया रीहिस, न कोनो माधवी के टोकैया। दूनो के दूनो अपन मर्जी के मालिक बन के सिरिफ अपन फैसला सुना देवय, जिहॉं जाना हे चल देवय। बिन नियम कायदा कानून अनुशासन के तो देश नइ चले, त घर कहॉं ले चल पातिस। संगत बने रहिथे त सद् गति जल्दी मिल जही, कुसंगति में पड़ जथे त दुर्गति होवत देरी नइ लगे। संगति बने मनखे के संग हो जथे त राक्षस हा तक देवालय जावत-जावत देवता बन जथे अउ कुसंगति में पड़के देवता तक राक्षस बन जथे। बीड़ी पियैया के संग रहैया मनखे आठ पंदरा दिन तो बीड़ी के धुंगिया सूँघत रहिथे ताहन खुदे बीड़ी धुंके ला धर लेथे। जइसन -जइसन संगति रहिथे तइसन-तइसन असर जरूर पड़थे। 


      बृजभूषण के कलाकार संगवारी मन सब के सब मंचीय अनुशासन के पालन करे फेर ओकर घर में अनुशासन नाम के कोनो चीज नइ रीहिस, जेला जतका पैसा लगथे सब अपन मन के मालिक रीहिस। ये मन हा भोंगर्रा होथे जी मनखे ला भटका देथे, मन हा दींयार बरोबर तको होथे  जे हा जिनगी के पटरी ला चुन-चुनके खा देथे। एकरे सेती साधू संत मन, मन ला बस में करे के उदिम जीवन भर करथे। 


        'कला कुंज' रोज संझा जगमग-जगमग करे फेर वो जगमगई में कोनो रस नइ रीहिस। देखैया मन ला कोन जनी का के सेती आय ते कुछू कमी लागे। एक सांझ घलो वो दुवारी में दीया बरत रहिस, फेर ओकर अंजोर मा खुशी नहीं आने दिन ले जादा किसम के सुन्नापन अऊ सन्नाटा छाय रीहिस। स्कूल बस ले चहकके घर पहुँचत सात साल के जगमोहन अपन हाथ मा 'रिजल्ट' धरे ठाढ़े रीहिस, जेमा सुग्घर अक्षर मा 'प्रथम' लिखे रहिस। ओ चाहत रीहिस कि अपन ये पहिली जीत ला अपन बापू बृजभूषण के गोड़ मा मड़ा देय, जेकर नाच-गाना अऊ कला के डंका जम्मो देस मा बाजत रहिथे। पर ओ दिन घर मा कोनो नई रहिस, न बापू के तबला के थाप रहिस, न महतारी माधवी के किताब मन ले आवे वाला रसायन शास्त्र के ओ गंध।

​      गरीब मनखे टूटथे त कोनो देखैया नइ राहय लेकिन जब बड़े मनखे मन टूटके बिखरथे तब सबे मनखे मन ऊँकर मनके टूटके बिखरे के विश्लेषण करत रहिथे। जब काकरो करम फूटथे तभे ऐसन दुर्गति होथे जैसन दुर्गति बृजभूषण अउ ओकर बाई के होय रीहिस। 

​बृजभूषण, कला के दुनिया के वो सुरुज रीहिस जेकर उवे ले चारों कोती ताली के गड़गड़ाहट गूंजत रहिस। फेर ये दारी वो 'प्रोग्राम' मा गिस त लहुटके नइ आइस। अफवा उड़िस कि ओहा कोनो नचइया टूरी के संग कहूँ दूरिहा अपन नवा संसार बसा लीस। अभी ये घाव ह भरे नइ रीहिस कि महतारी माधवी घलो अपन ममता के गला घोंट दीस। ओहा घलो अपन संगी मास्टर के संग घर-दुआर छोड़ के निकल गे।

​पाछू छूटगे तीन परानी- सियनहिन दादी, चार साल के नानचुन मुनमुन, सात साल के जगमोहन, कला कुंज के बड़का घर अउ लम्बा खेती बाड़ी। 

​"जग्गू भैया ददा, दाई कतका बखत मा आही? मोला भूख लागत हे," मुनमुन के ये गोठ ह सात साल के लइका ला रातों-रात सियान बनादीस।

​    

          जब अपने नत्ता रिश्तेदार मन अमानुस बेवहार करथे त नत्ता गोत्ता के सरी डोरी टूटके छिहीं-बिहीं हो जथे। ​दुख के पहाड़ अभी टूट के गिरे ही रीहिस कि जगमोहन के तीनो बुआ तारिणी, शुभमणि अऊ अंकिता जेमन बड़े-बड़े घर मा ब्याहे रीहिन, संवेदना जताय के बहाना आइन, ऊँकर हाथ में दुलार नहीं, कोर्ट के नोटिस रीहिस। ओ मन ला अपन भाई-भउजी अउ भतीजा भतीजी इहॉं तक दाई के मया ले कोनो मतलब नई रहिस, ओकर नजर तो 'कला कुंज' के जमीन अऊ जायदाद मा गड़े रीहिस।

​बुआ मन कोर्ट मा बटवारा के केस ठोक दीन। सात साल के लइका जेला अभी दुनियादारी के ज्ञान नई रीहिस, ओहा वकील अऊ कछेरी के चक्कर ला का जानतिस, फेर बखत के लबडेना जेन मनखे ला परथे पीरा ला उहिच हा जानथे। दादी के रोवई गिड़गड़ई के कोनो असर बुआ मन ला नइ पड़िस। ऊँकर आँखी में तो स्वार्थ के पट्टी बंधा गे रीहिस। ओ मन ला एक छोटे से कोठरी मा रेहे बर मजबूर कर दीन। जगमोहन ह अपन आँसू ला पी गे। ओहा कसम खाइस कि ये दुख ला ओहा अपन कमजोरी नहीं, ताकत बनाही । दिन में मंडी मा चहा पानी पियाके समोसा आलूगुंडा बेंच के , सांझ कुन होटल मा बरतन माँजे, बॉंचे समोसा आलूगुंडा अउ चहा धरके घर आवय अउ अपन दादी अउ नानचुन नोनी मुनमुन संग खा पी के सुत जावय। रतिहा कंडिल के अंजोर में अपन भविष्य लिखत जगमोहन हा बहिनी मुनमुन के पढ़ई लिखई के बनेच ध्यान रखय। जीवन के घटनाक्रम काकरो धरे बॉंधे नइ राहय। कोन जनी कब काकर संग का घटना हो जही कोनो नइ जानय। जब जगमोहन नौंवी पास होईस तब ओकर होटल के मालिक मालकिन मन एक्सीडेंट में गुजरगे। अब तो होटल के सबे भार जगमोहन ऊपर आगे। चौंक के टपरी के होटल ला चमकावत जगमोहन ला देरी नइ लागिस। दू साल के सफर में ओकर होटल के पूरा शहर में नाम होगे। धीरे से  जगमोहन ह अपन मेहनत ले सहर के सबसे बड़े 'बिजनेसमेन' बन गे। अब तो ओहा ओ 'कला कुंज' ला फेर खरीद ली, जेला ओकर बुआ मन बेच डारे रीहिन।

    जेन मनखे मन अपन का दूसरा के भी घर ओदारे रहिथे, ओ पापी मन के अंत हो के रहिथे। एक दिन जगमोहन ला अपन बाबू अऊ दाई के खबर मिलिस। बाबू बृजभूषण, जेहा कला के घमंड मा अपन परिवार ला त्यागे रीहिस, ओकर अंत बड़े भयानक होइस। ओ नचइया टूरी ह ओकर जवानी भर के कमाई ल गठियाके जम्मो पैसा-कउड़ी ला लूट लीस अऊ जब बुढ़ापा मा ओकर हाथ-गोड़ चलना बंद होइस, त ओला कोढ़ी कह के सड़क मा छोड़ दीस। बृजभूषण के अंत एक अनाथालय मा बेसहारा हालत मा होइस।

​ओइसने ओकर दाई माधवी घलो सुख नई पा सकिस। जेन मास्टर संगवारी संग गुलछर्रा उड़ायबर अपन नान-नान लइका मन ला छोड़े रहिस, उही मनखे ह रसायन विभागाध्यक्ष माधवी ला खानगी में फँसा के नौकरी ले निकलवा दिस, ओकर चरित्र ऊपर लॉंछन लगाके ओला धोखा दे दीस, माधवी कोनो मेर मुहूँ देखायके लइक नइ रीहिस। वो हा पगलाय घूमत सड़क मा भीख मांगत-मांगत दम तोड़ दीस। जब जगमोहन ला ये पता चलिस, त ओकर करेजा फाटगे, फेर वक्त ह हाथ ले निकल चुके रहिस।


        ​एक दिन जगमोहन के बंगला मा तीन बुढ़िया मन आइन, लुगरा फटे रीहिस, आँखी मा आँसू अऊ देह मा कतको बीमारी। ये मन ओकर तीनो बुआ रीहिन। ओकर बेटा मन ओ मन ला घर ले निकाल दे रीहिन।

​"जग्गू ... हम ला छमा कर दे बेटा, हमन ह पापी अन, हम ला कहूँ मेर थोकिन जगा दे दे।" तारिणी बुआ मड़िया के कीहिस।

​जगमोहन ह ओ मन ला घर में राख लीस। ओकर मन में कोनो बदला के भाव नई रहिस।

    ​आज जगमोहन तीर सब कुछ हे। धन-दौलत, मान-सम्मान अऊ ओकर बहिनी मुनमुन घलो सुखी हे। पर आज घलो ओहा रात मा सुतथे त ओला सपना मा उही सात साल के लइका दिखथे, जेनहा 'रिजल्ट' धरे अपन दाई-ददा ला खोजत हे।

​ओला आज घलो ओ रसायण के गंध अऊ बापू के घूँघरू के आवाज ह डर्हुवाथे। इंसान गरीबी ले तो बाहिर निकल जथे, फेर बचपना के वो घाव ले कभू बाहिर नई निकल सके, जेला अपन मन दे रहिथे। बुआ मन ला ओहा सहारा तो दे दीस, फेर ओकर मन के कोना मा बइठे ओ लइका ह आज घलो सिसकत हे।

​सुरता मन पाछू नई छोड़य... ओ मन तो साया बन के संग चलथे।

          ०००

लेखक

डॉ.अशोक आकाश

कोहंगाटोला बालोद, छत्तीसगढ़

491226

मो.9755889199

पेट्रोल अऊ घमंड - डुमन लाल ध्रुव

 पेट्रोल अऊ घमंड 

                          - डुमन लाल ध्रुव 

गांव के चौपाल मा बुजूर किसान मन बइठे रिहिन। कोनो बीड़ी फूंकत रिहिस त कोनो हा अपन पुरखा मन के जमाना ला सुरता करत रिहिस। उही बेरा गांव के सबले बुजूर आदमी मनराखन ददा हा किहिस -

“अरे भइया, वो जमाना कुछ अउ रिहिस। जब हमन साइकिल ले हाट बाजार जात रेहेन, खेत जात रेहेन  त शरीर मा जान रिहिस। अब देखव हर घर मा मोटर साइकिल, गाड़ी, पेट्रोल अउ डीजल के धुआं… मनखे त मशीन बन गेहे।”

सब झिन चुपचाप सुनत रिहिन।

गांव के जवान लइका सुकांत हा अपन चमचमात मोटर साइकिल मा आइस। आतेच किहिस - “ददा, अब जमाना बदल गेहे। साइकिल ले काबर जाबो ? मोटर गाड़ी मा टाइम बचथे।”

मनराखन ददा मुस्कराइस - “टाइम त बचथे बेटा  फेर जिनगी घटत हे। पेट्रोल के भाव सुनके तो अब कलेजा कांपत हे।”

सब हंस परिन, फेर हंसी के भीतर चिंता लुकाय रिहिस।

आज के समय मा गांव होवय या शहर, हर आदमी पेट्रोल के भरोसा मा चलत हे। खेत के पंप, ट्रैक्टर, बाइक, बस, कार… सब कुछ तेल के ऊपर टिके हे। फेर तेल के दाम हा अइसने बढ़त जात हे जइसे आगी मा घी डार देय।

सुकांत के बाबू, जीवन लाल किसान, हर महीना हिसाब लगावत थक जाथे। खाद महंगा, बीज महंगा, ऊपर ले डीजल महंगा। ट्रैक्टर चलाना भारी पड़त हे।

एक दिन जीवन लाल हा अपन बेटा सुकांत ला किहिस - “बेटा, अब बिना जरुरत बाइक नइ निकालना। खेत तक साइकिल ले चल जाया कर।”

सुकांत हा हंस दिस -  “का बाबू! गांव वाले हंसही त।”

जीवन लाल गुस्सा होगे -  “हंसय दे। जब पेट्रोल सौ - दू सौ के पार जाही तब सबके हंसी निकल जाही।”

बात मजाक मा टलगे, फेर समय हा धीरे-धीरे अपन रंग दिखाना शुरु कर दिस।

कुछ महीना बाद पेट्रोल के भाव फेर बढ़गे। गांव के चौक मा लोगन के भीड़ लगगे। पेट्रोल पंप वाला बोर्ड बदलत रिहिस।

एक आदमी किहिस - “लगथे अब बाइक मा हवा भराके चलाना पड़ही।”

दूसर हा किहिस - “अब तो साइकिल वालेच मन राजा बनही।”

गांव के मास्टर साहब, जे पढ़े-लिखे अउ समझदार रिहिन, किहिन - “देखव भाई, प्रकृति हा सबके हिसाब बराबर करथे। जब मनखे जरुरत ले जियादा भागथे तब समय ओखर औकात दिखाथे।”

मास्टर साहब के बात सबके मन ला छू दिस।

गांव के बुजूर सियान मन बतावत रिहिन कि पहिली के समय मा लोगन दस-दस कोस साइकिल चलाके हाट बाजार जावय। शरीर मजबूत रहय। बीमार कम पड़त रिहिन। अब मोटर गाड़ी के चलते आदमी आलसी होगे। पांच कदम चलना भारी लगथे।

पहिली बिहान होतेच गांव के गली मा साइकिल के घंटी सुनाई देत रिहिस। अब मोटर के कर्कश आवाज गूंजथे।

पहिली हवा साफ रिहिस। अब धुआं भर गेहे।

पहिली आदमी हा खेत मा मेहनत करय। अब मोबाइल मा आंखी गड़ाके बइठे रहिथे।

गांव के डॉक्टर हा भी कहे लागिस - “शुगर, ब्लड प्रेशर, मोटापा… ये सब नई बीमारी नोहय। ये आलसी जिनगी के परिणाम आय।”

एक दिन गांव मा भारी बरसात होइस। सड़क खराब होगे। कतको मोटर साइकिल फंसगे। तब मनराखन ददा हा अपन पुराना साइकिल निकालिस अउ आराम ले निकलगे।

लोगन हा देखके हंसे भी अउ सोच मा पड़ गेन।

मनराखन ददा किहिस - “देखव, साइकिल पेट्रोल नइ मांगय। बस आदमी के ताकत मांगथे।”

धीरे-धीरे गांव के कुछ जवान मन फेर साइकिल चलाना शुरु करिन। कोनो बाजार जाय त साइकिल ले जाय। कोनो स्कूल जाय त पैदल निकल जाय।

फेर दुनिया अतका जल्दी सुधरथे का ?

शहर के चमक-दमक गांव तक पहुंच गे रिहिस। हर आदमी ला नई बाइक चाही, नई कार चाही। शादी-बियाह मा गाड़ी के लाइन देखाके लोगन इज्जत माने लगिन।

सुकांत घलो सोचत रिहिस - “अगर मोर पास बड़ी बाइक रही त गांव वाले मान बढ़ाहीं।”

ऊधारी लेके बाइक खरीद लीस।

पहिली कुछ दिन मजा आइस। गांव मा घूमिस, दोस्त मन के संग फर्राटा भरिस। फेर जब हर हफ्ता पेट्रोल भरवाना पड़िस, तब समझ मा आइस के गाड़ी खरीदना आसान हे, चलाना कठिन हे।

एक दिन पेट्रोल पंप मा लंबा लाइन रिहिस। सुकांत अपन जेब टटोलिस। पइसा कम पड़गे।

उही बेरा पीछे खड़े एक बुजूर सियान हा किहिस -  “बेटा, पेट्रोल अब गरीब मन के बस के बात नइ रिहिस।”

सुकांत के मन मा मनराखन ददा के बात गूंजे लागिस।

दूसर दिन वो साइकिल निकालके खेत गीस।

पहिली-पहिली शरम लागिस। फेर हवा लगिस। शरीर हल्का महसूस होइस।

रद्दा मा कतको लोगन  हंसिन -  “का सुकांत ! बाइक बेच डारे का ?”

सुकांत मुस्कराइस - “नइ रे, पेट्रोल हा हमन ला बेच डारिस।”

सब ठहाठा मार के हंस परिन।

फेर बात सिरतोन रिहिस।

धीरे-धीरे गांव के लोगन समझे लागिन के जिंदगी के असली सुख दिखावा मा नइ, संतुलन मा हे।

गांव के स्कूल मा मास्टर साहब हा एक दिन बच्चा मन ला पढ़ावत किहिन -  “बच्चों, धरती मा तेल सीमित हे। एक दिन ये खत्म हो जाही। तब आदमी ला फिर अपन पुरखा के तरीका अपनाना पड़ही।”

एक बच्चा पूछिस -  “सर, तब का फेर साइकिल चलाही ?”

मास्टर साहब मुस्कराइन -  “हो सकथे अउ पैदल घलो।”

बच्चा मन हंस परिन।

फेर ये हंसी के भीतर भविष्य के सच्चाई छुपे रिहिस।

अब गांव के कई किसान मन सोलर पंप के बात करे लगिन। कतको लोगन इलेक्ट्रिक गाड़ी के चर्चा करे लगिन। फेर बिजली खुद महंगी होवत रिहिस।

समस्या सिरिफ पेट्रोल के नई रिहिस। समस्या आदमी के लालच के रिहिस।

जतका सुविधा बढ़िस, ओतके जरुरत बढ़त गे।

पहिली आदमी दू जोड़ी कपड़ा मा खुश रिहिस। अब अलमारी भर कपड़ा होके भी दुखी हे।

पहिली गांव के लोगन मिलके काम करय। अब हर कोई अपन मोबाइल मा खोए हे।

मनराखन ददा एक दिन चौपाल मा किहिस -  “मनखे हा प्रकृति ले दूर होगे हे। अउ जब आदमी प्रकृति ले दूर होथे  तब दुख करीब आ जाथे।”

सब चुप रिहिन।

सच बात कड़वा होथे।

गांव के नौजवान अब शहर भागत रिहिन। शहर मा नौकरी, पैसा, गाड़ी के सपना देखत रिहिन। फेर शहर के जिंदगी मा चैन कहां रिहिस ?

भारी ट्रैफिक। धुआं। महंगाई। तनाव।

एक दिन सुकांत के दोस्त मानू शहर ले लहुटिस। थकान ओखर चेहरा मा साफ दिखत रिहिस।

मानू किहिस -  “भाई, शहर मा पइसा त मिलथे फेर सुकून नइ मिलय।”

सुकांत पूछिस - “गाड़ी खरीदेस ?”

मानू हंसिस - “गाड़ी खरीदे हंव फेर पेट्रोल भरवात-भरवात जेब खाली हो जाथे।”

सब हंस परिन।

फेर गांव के बुजूर सियान मन के आंखी मा चिंता रिहिस।

समय बदलत रिहिस। पेट्रोल के दाम बढ़त रिहिस। जिंदगी कठिन होवत रिहिस।

एक दिन गांव मा बइक बुलाए गीस। मास्टर साहब, किसान, नौजवान सब जुटिन।

विचार होइस कि गांव मा जादा साइकिल उपयोग करे जाही। नजदीक काम बर पैदल जाही। पेड़ लगाय जाही। जरुरत ले जियादा गाड़ी नई चलाय जाही।

कतको लोगन मजाक उड़ाइन -  “ए सब ले का होही ?”

मनराखन ददा किहिस - “बूंद-बूंद ले घड़ा भरथे।”

गांव के स्कूल मा साइकिल रैली निकले लागिस। बच्चा मन नारा लगाइन -

“पेट्रोल बचाओ, धरती बचाओ।”

धीरे-धीरे गांव के वातावरण बदले लागिस।

सुकांत अब रोज बिहान साइकिल चलाय लगिन। शरीर तंदरुस्त होगे। खरचा कम होगे। मन शांत रहय लागिस।

एक दिन वो अपन बाबू ला किहिस - “बाबू, तुमन सही कहत रेहेव।”

जीवन लाल मुस्कराइस -  “समय सबला सिखाथे बेटा।”

मनराखन ददा अब बुजूर होगे रिहिस। फेर गांव वाले आज भी ओखर बात धियान ले सुनथे।

एक दिन संझौती बेरा ओहर किहिस- “समय हा सबले बड़े गुरु आय। आदमी चाहे कतको उड़ ले  आखिर धरती मा उतरना पड़थे।”

गांव मा हवा बहत रिहिस। कहीं दूर साइकिल के घंटी बजत रिहिस।

जइसे पुरखा मन के आवाज फेर लहुटत होवय।

आज दुनिया तेज भागत हे। गाड़ी के रफ्तार बढ़त हे। फेर आदमी के मन खाली होत जात हे।

पेट्रोल के भाव सिरिफ जेब नई जलावत हे ये आदमी के सोच ला भी बदलत हे।

शायद आने वाला समय मा फेर वो दिन आही जब लोगन सादगी के कीमत समझही। जब साइकिल चलाना शरम नई, गरब के बात होही। जब प्रकृति संग जीना आधुनिकता माने जाही।

काबर के आखिर मा समय हा अपन औकात जरुर दिखाथे।

अउ समय के आगे, ना पेट्रोल टिकथे, ना घमंड।

               - डुमन लाल ध्रुव 

            मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

                पिन - 493773

लघुकथा - " भूलऊ राम भुलागे "

 लघुकथा - 

" भूलऊ राम भुलागे "


सबो बात सब जघा सुरता नइ आवय l सुरता आही त ओ बेरा  नइ रहय l भूलऊ राम घलो सुरुज भूल्हा ताय l 

मिलगे बिहनिया ले भूलऊ मुखारी धरे तरिया कोती जात l 

पूँछ परेंव -" काली के गोठ ला नइ बताएस गो? "

"का बात ला?" 

"गंगा जल के कसम खवाये रहेस ओला!"

"हाँ, हाँ  ओला भुलागेँव बताये बर फेर  बताना घलो उचित नइ समझेंव l

"काबर  गो?" 

मोरो टुरा उही कोचिंयाई गिरी म लगे हे l चार पइसा कमावत हे l भुला जा अब l

"बने बेराआवत हे कइसे भुला जबो? हमन अब पियन  खान दन  बारी बखरी  दैहान म l

कमांडो तही चलावत रहेस ना भूलऊ l  तोला सुरता हम देवाबो l " 

सुखऊ के गोठ ला सुनत भूलऊ भूलवारे धर लीस 

"अरे भाई  तोला लेगहूँ, तैयार रहिबे अच्छा जघा लेघहूँ  अब सुरता नइ भुलावय बने आदमी बन के आबे l"

सुखऊ जान डरिस राजधानी 

धुरिहा नइ हे l कभू कभू नाम घलो  काम बना देथे l

लघुकथा - " हलो भइय्या " - मुरारी लाल साव

 लघुकथा - " हलो भइय्या "

            -  मुरारी लाल साव 


मोबाईल बाजिस तुरत उठाइस "हलो भइय्या.... I "

  "हलो.. I 

"लड़की देखत हव का भइय्या बिहाव करे बर "

"हव "!  "कइसन लड़की देखत हव?" हमरो रिश्ता म एक लड़की हे पढ़े लिखे हे l "

"का करत हे तुंहर इहाँ के लड़का ह?" 

" अभी अइसने  ठलहा हे l "

"का उमर चलत हे?"

"35-36के होगे हे नौकरी देखतहे !"

" एहु लड़की के उमर ओइसने 34के होगे हे लड़का देखत l" 

नौकरी करत हे अलवा जलवा l

"त..  आके देख लो l"

"नोनी बने हे पढ़े लिखे हे काम बूता म हुशियार हे l "

"ले बताबो l"

ठीक हे भैय्या l"

अइसने मोबाईल ले कतको रिश्ता खोजत खोजत थक गे बुधिया ह अपन बहिनी के लड़की बर l  अचानक बहुत दिन के बाद मोबाइल आथे -"हलो 

हाँ हलो भैय्या "

"तुंहर इहाँ लड़की हे बर बिहाव के लाइक l" 

बुधिया कुछ नई कहि सकीस ए दफे l  दुःखी मन ले कहिस -" भइय्या, लड़की  ऊपर कोती चल दिस l कोनो लड़का देखे l नइ आइस l "

"ओहो!बड़ दुःख होइस l

हास्य व्यंग्य "बने करेस भगवान...!"

 हास्य व्यंग्य 

"बने करेस भगवान...!"

      मुरारी लाल साव 

भगवान के गोड़ ला छुके पाँव परे के आदत तो नइ रहिस फेर कोशिश म लगे रहिथंव  उंकर दुनों गोड़ टमरा तो जतिस एको घा l उंकर गोड़ म धुर्रा नइ माढ़े होही l "मंदिरवा म का करे जइबो घट ही के देव ला मनाइबो... I 

फोटू म उंकर चेहरा मुँहरन हाथ पाँव सब दिखथे l गोड़ छूवे के रिवाज हे माने ला परही l जेन गोड़ छूही उही ला मिलथे कइथे सब l कोनो नइ बाँचे हे एकाध झन होही जेन पाँव नइ परत होही l जोन जइसन पाँव परे हे ओला ओइसने फल /जीवन /ज्ञान / मुक्ति /सुख समृद्धि मिले हे l 

माँ बाप कोती धियान नइ जाय l भगवान ले बढ़के हे सौहें दिखत हे l माँ बाप सब कुछ तोरेच बर करथे l तोरेच बर करत करत मर घलो जथे l ए ज्ञान ला देये बर गुरु महात्मा साधू संत आके बताथे l माँ बाप ला भगवान  जान l माँ बाप के गोड़ छुओ सुबह शाम l प्रवचन ताय  कहना ओकर काम l कोनो सुनत नइ हे, कोनो धरत नइ हे सोला आना बात ला l माँ बाप के गोड़ के धुर्रा के कोनो धोवइय्या नइ हे l जुग बीतत हे l मूरख ला कोन समझाही गुरु l चेताये समझाये अउ सिखाये बर गुरु आघूवाइस l गुरु के  गोड़ ला धरो सेवा करो चपको  तभे ज्ञान अउ भगवान मिलही l श्री गुरु चरन सरोज रज.... I गुरु घलो छाँट निमार के चेला ला सही काम बूता म लगाके पोठ बनाथे l उही पोठ चेला तहाँ अपन  खुद गुरु बने म लग़ जाथे l  आश्रम मोटर गाड़ी  म चेत  रखथे l गुरु गरु अस लगथे l गुरु गुड़ रही जथे,चेला शक़्कर हो जथे l गुरु के गोड़  धुर्रा म लद्दी म बोजागे हे, पाँव परे के मन नइ होवय l 

जतका गुरु हे ओतका भगवान  बनगे l भगवान घलो अकक्ल उही मन ला दीस l जतका गुरु के जतका चेला पाँव पराये बर आघू होगे हे गोड़ ला लमाके के बइठे हे l पाहन पूजे हरि मिले 

तो मै पूंजू पहाड़... I 

जेने मिलिस तेकर गोड़ ला बिन देखे पाँव परेंव l कोन जनी कब   भगवान के गोड़ आघू म आ जही तरे के मौका मिल जाय l 

बने करेस भगवान  हमला मइनखे बना के राखेस l राक्षक प्रवृत्ति झन बाढ़े l अंहकार झन बाढ़े मर्यादा म सब रह

नशा सोशल मीडिया के

 नशा सोशल मीडिया के


आजकल सूचना अउ संचार के जमाना मा सरी दुनिया के शोर-खबर हा घर बैठे मिल जथे। ये साधन हा हम सब के बीच  मा अपन पहुँच बना डरे हे। फेर मनखे-मन के आदत हा पड़ोसी घर ला ताँके-झाँके के जादा रहिथे। पुरखा-सियान मन के कहना रहिस कि कभू अपनो घर ला झाँक के देख ले करव रे बाबू हो। शुरू-शुरू मा हमला ये बात के रहस्य हा समझे मा नइ आत रहिस। फेर सोशल मीडिया ला झाँके मा जम्मों बिसकुटा के खइरपा हा अपने-अपन खुलत गीस।तब समझ मा आइस येकर बुखार हा कतका नशीला हे। आजकल कन्हों जरूरी संदेश ला एक आदमी ले दूसर आदमी तक पहुँचाय बर सोशल मीडिया के एकतरफा उपयोग होवत हे।सोच-समझ के बउरे मा येकर लाभ तो हे फेर अनर-बनर बउरे मा शारीरिक, मानसिक अउ आर्थिक हानि के संभावना घलव हे। येमा एके ठन मेसेज ला एके घाँव मा कतको झन ला भेजे के वेवस्था हावय।आज देश के बहुत बड़े आबादी के हाथ मा स्मार्टफोन के पहुँच हे। कतको पढ़ईया लइका-मन अपन घर बैठे आनलाइन एजूकेशन एप ले जुड़के पड़ई-लिखई जैसे महत्वपूर्ण काम ला करत हें। बड़े-बड़े कंपनी वाले मन अपन आफिस के कई ठन काम ला अपने घर मा बैठ के आनलाइन निपटाय के उदीम करत रहिथें। कोरोना के समय मा येकर उपयोग ला भला कोन हा भुला सकथे। तब आफिस के सरी काम घर बैठे होवत रहिस। येकर ले आय-जाय के खरचा के संग समय के बचत हो जाय। कला जगत हा घलव एकर ले अछूता नइ हे। देश होय चाहे विदेश इहाँ ले लेके उहाँ तक छोटे ले लेके बड़े कलाकार-मन अपन कला के प्रदर्शन बर इही माध्यम ला चयन करके दूर-दराज तक अपन पहुँच बनाए मा सफल होवत हे।

           ओ गुजरे दिन के सुरता ला समोख के रखना घलव जरूरी हे जब मनखे-मन सिरिफ टेलिफोन के नाव ला सुने बस रहिन। अखबार, पोस्टर अउ सनीमा के चित्र ला देख के टेलिफोन के शकल-सूरत ला जानिन। जब शहर डहर जाना होइस तब लोगन-मन सेठ-साहूकार-मन ला उनकर दुकान मा गोठियावत देख के येकर मुखा दर्शन कर पाइन। फेर एक लंबा समय निकले के बाद विज्ञान अउ तकनीक के क्षेत्र मा समाज हा बहुत बड़े बदलाव के अनुभव करिस। नब्बे के दशक मा टीवी हा निम्न मध्यम वर्गीय परिवार तक अपन पहुँच बनाइस। आबादी के हिसाब ले बड़े गाँव मन मा टेलिफोन तार के माध्यम ले संचार सेवा के शुरुआत हो गे रहिस। फेर येकर लाभ कस्बा अउ शहर के आसपास के गाँव-मन ला ही मिल पाइस। इक्कीसवीं सदी के शुरुआत मा संचार-सेवा के क्षेत्र मा एक क्रांतिकारी बदलाव आइस। जिहाँ किफायती दर मा लगभग प्रत्येक गाँव बर एक मोबाइल टावर के संग डब्ल्यूएलएल के एक सेट देय के योजना लांच करे गीस। ये योजना ले सूचना-संचार के क्षेत्र मा व्यापक परिवर्तन होइस।

            फेर येकर माध्यम ले दूर-दराज के मनखे-मन ले सीधा बातचीत अउ आवश्यक जानकारी तुरत प्राप्त कर के सुविधा मिलिस। फेर मनखे के जिनगी मा तेजी ले बदलाव लाइस ये मोबाइल हा। शुरूआती दौर मा मनखे के जिनगी मा बातचीत के काम ला आसान करे बर मोबाइल हा कीपैड मा सवार होगे हमर बीच मा आइस। समय के साथ नवा-नवा तकनीक के अविष्कार ले साफ्टवेयर अपग्रेड होवत गीस अउ आज एन्ड्राइड अउ आईफोन जैसे स्मार्टफोन हा हम सब के हाथ मा आगे हे।आज के दौर मा येकर बिना दुनिया हा अधूरा हे। इतिहास ला खोधियाय मा पता चलथे कि येकर अविष्कार अमेरिका के इंजिनियर मार्टिन कूपर हा 1973 मा करे रहिस।धीरे-धीरे कंप्यूटर अउ सॉफ्टवेयर के विकसित जुगलबंदी ले मोबाइल फोन हा नवा-नवा एप के माध्यम ले ज्ञान-विज्ञान के दुनिया मा अपन डंका बजावत हे। येमा अपन पसंद के कई ठन एप ला अपलोड करके जानकारी के संग दिनचर्या ला सरल बनाय जा सकथे। मौसम के जानकारी हा किसान भाई मन बर बड़ महत्व के होथे। कब पानी गिरही, कब सुक्खा रही अउ कब पाला पड़ही येकर जानकारी मौसम के एप ले समय रहत मिल जथे। तब किसान हा फसल के बोनी अउ कटाई ला समय रहते सफलतापूर्वक निपटा डारथे। अइसने ढंग ले बैंक मा पैसा-कौड़ी के लेन-देन बर यूपीआई , गुगल पे, फोन पे, अनजाना शहर मा मैप के जरिए ट्रेफिक के जानकारी, रेडियो, टीवी, घड़ी, कलेंडर,पंचांग अउ ट्विटर कई ठन एप हवय।वाट्सएप,फेसबुक, यूट्यूब अउ इंस्टाग्राम ले अपन अभिव्यक्ति ला आडियो, विडियो अउ लिखित रूप मा दुनियाभर मा सेकंड भर मा पहुँचा सकथन। 

       अलग-अलग जगह मा दूर-दराज मा बैठे सब मनखे-मन ले आडियो अउ वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए गोठबात के सुविधा हा बहुत बड़े इनाम घलव आय।नवा पीढ़ी के लइका-मन मोबाइल के बारे मा एक-एक ठन जानकारी ले अपडेट रहिथें। तेपाय के पचास साल के सियान-मन हा पाँच साल के लइका के आगू मा पानी भरत नजर आथें। येकर अतिक नशा कि लइका-मन के हाथ ले कहुँ मोबाइल ला नँगा लेबे ते वोमन टेंशन मा आ जथें। अरे काला बताबे मरे-मारे बर  जोम देथें। येकर नशा अतिक कि थोरको भी खयाल नइ रखे कते हा माँ हरे अउ कते हा बाप हरे।अभी मोबाइल के इही महिमा ला देखते रहेन कि विज्ञान के दुनिया मा एआई हा मेछरावत आके अपन धमक कायम कर दीस। येहर तो अइसे करिश्मा आय जेकर कन्हों जुवाब नइहे। 

             गोठ ला आगू बढ़ाबे तब येती मोबाइल मा आडियो-विडियो देखे-सुने के तकनीक हा लोक कला के मंचीय बेवस्था के पाया ला हिला के रख देहे। गाँव-गँवतरी मा नाचा-गम्मत, पंथी, पंडवानी अउ भरथरी जइसन लोक कला के अंकाल परे कस होगे हे। मोबाइल मा मिलने वाला मनोरंजन के सामग्री-मन मंचीय प्रस्तुति ले बहुत सस्ता हे। तेकर सेती सब येकरे पाछू-पाछू भागत हें। खास बात तो यहू हे कि येला जब समय मिले तब देखे जा सकथे। साथ ही समय के बचत बोनस मा। दृश्य-श्रव्य मनोरंजन के क्षेत्र मा येहा सिनेमा उपर सबले जादा प्रभाव डारे हे। आज आम जनता-मन सिनेमा घर मा बैठके फिलिम देखना पसंद नइ करें। तेकर सेती कई सिनेमा घर बदहाली के शिकार हे। आज सोशल मीडिया हा समाज ला अपन गिरफ्त मा ले डरे हे। गूगल, इंस्टाग्राम, फेसबुक ,यूट्यूब, ट्विटर अउ व्हाट्सएप्प जइसन एप हा ज्ञान के खजाना तो आय। फेर येकर ले समय जैसे मूल्यवान चीज के बरबादी घलव हे। जब येला देखना शुरू करबे ते तँय देखते रहि जबे। मोहनी-थापनी डारे कस समय कइसे पहाथे कुछु समझे मा नइ आय। ये दिशा मा होवत शोध ले यहू पता चले हे कि स्मार्टफोन चलइया दीदी-भैया मन चौबीस घंटा मा औसतन तीन घंटा अपन मोबाइल में व्यस्त रहिथें।

 विडंबना ला देखव ये मोबाइल के सेती आजकल हुशियार मनखे-मन घलव डिजिटल अरेस्ट के शिकार होवत जात हें। अउ घबराहट मा अपन मेहनत के गाढ़ी कमई ला गवाँवत हें। विद्वान-मन के कहना हे कि सोशल मीडिया के सेती दुनिया के दूरी हा सिमट के मोबाइल मा समा गे हे ।फेर घर भीतरी के किस्सा-कहानी हा कुछ अलगेच हे। इहाँ तो एक ठन सोफा मा तीर-तीर मा बैठे परिवार वाले मन हा गजब दूरिहा होगे हें। काबर कि सबके हाथ मा एन्ड्राइड मोबाइल हे। अउ सबे मन मोबाइल के विशाल समुंदर मा खुसर के तउँरे के आनंद लेना चाहत हें।

             मार्केट मा किसम-किसम के मोबाइल के आय ले नवा पीढ़ी के बहुत लइका-मन मा येकर मनमाने बुखार चढ़े हवय। येमन जरूरी काम-धाम ला छोड़ के मोबाइल खरीदे मा अपन ध्यान लगा देथें। तेकर कारण उनकर आर्थिक स्थिति के ऊपर भी बहुत फरक पड़त हे। ये लइका-मन छोटे-छोटे वीडियो देखके, रील बनाय मा अपन कीमती समय बर्बाद करत हें। अउ अपन पढ़ाई-लिखाई ले दूर होवत जात हे।सही कहिबे ते अभिव्यक्ति के आजादी के नाम मा इही सोशल मीडिया हा आजकल धरम-जात अउ वर्ग-भेद के नवा अध्याय वाला अखाड़ा घलव बनगे हवय। येकरे आड़ मा दबंगई के खुलेआम खेल चलत हे।गाली-गलौच के उत्पादन अउ वितरण केंद्र के रूप मा येकर इस्तेमाल हद ले जादा होवत जात हे। मनखे समाज मा अब समरसता के भाव हा खंडित होय कस जनाथे। काबर कि कोई ला जातिगत गाली देना हे, तलवार लहरावत प्रदर्शन करना हे तेकर बर अब ये धरती हा बड़ उर्वरा होगे हे। कते हा प्रधानमंत्री जैसे पद मा बैठे व्यक्ति ला जातिगत गाली देवत समाज मा अपन विशिष्टता प्रमाणित करे के होड़ मा लगे हे। कते हा बाबा अंबेडकर ला गरियावत हे, त कते हा समाज-सुधारक महापुरुष मन के मान-मर्दन करके अपन औकात दिखावत हे। तब लिल्हर लुरू-बुटु मन के का हालत होवत होही तेकर सहज अंदाजा लगाय जा सकथे।समझ मा ये नइ आवय कि येमन ला अइसन करे के साँस-पानी कहाँ ले मिलत हे। तलवार लहरावत कोई भी ला मारे-काटे के फतवा जारी करे के हिम्मत हा तो जगजाहिरे हे। अउ कमजोरहा मनखे-मन अंगरीच दिखा दिही ओतकीच मा अइसे ओइला देथे ते ओकर जमानत मिलना मुश्किल हो जथे। कते हा हिंदू देवी-देवता उपर अभद्र टिप्पणी करत हें ता कते हा दूसर धरम उपर घटिया टिप्पणी करके सुर्खी बटोरत हे। इहाँ संविधान अउ धार्मिक ग्रंथ मन ला चीर-फाड़ करे ले बाज घलव नइ आत हें।महापुरुष मन के मूर्ति-मन ला खंडित करके धौंस जमाय के नवा संस्कृति के उदय होवत  हे। ये सब  असमाजिक घटना ला सोशल मीडिया मा वायरल करके ये मन बड़े शान के साथ अपन धृष्टता के परिचय घलव देवत हें।

         यूट्यूब ला देखे मा ये मनोरंजन अउ ज्ञान के खजाना आय। ओकरे संगे-संग येहा मिथ्या सूचना-समाचार के भंडार घलव आय। जेन ला जो मन लगीस वो वइसने वीडियो बनाके यूट्यूब मा अपन तमाशा देखावत हे। कभू-कभू अइसे लगथे मानो ये बउराय यूट्यूबर-मन अपन विशिष्टता सिद्ध करे बर धमा-चौकड़ी मचावत होही का। आप मन खुदे अनुमान लगा सकथो कि इनकर बिगड़ेपना ह डिजिटल इंडिया के नवाचार आय कि अत्याचार। इही कड़ी मा व्हाट्सएप, फेसबुक अउ इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्म-मन हा यूट्यूब ले जादा तो नइ फेर थोरको कम घलव नइ हे।अइसे भी देश के जनता-मन अपन कीमती समय के मूल्यांकन कहाँ कर पावत हे। अपन तीर-तखार के मनखे-मन ला मोबाइल मा घंटो धुनी रमाय देख के आप-मन येकर खुदे परछो पा सकथो। ये मोबाइल के नशा हा छोटे-बड़े ,अमीर-गरीब सबके चेत-बुध  ला चीथ डरे हे। कोई भी नशा होवय हद ले जादा हा नाश  के कारण बन जाथे। सही कहिबे ते डिजिटल युग के ये नशा हा भविष्य बर खतरनाक संकेत घलव देवत हे। तेकर कारण जागरूक रहना बहुत जरूरी हे। आशा हे बुधियार अउ गुणी-ज्ञानी जनता-मन ये नशा ला अपन तीर मा कभू ओधन नइ दीहीं। अउ घर-परिवार, समाज के सुख-समृद्धि, देश के विकास अउ मानवता बर सदा संकल्पित रइहीं।


महेन्द्र बघेल