Thursday, 28 May 2026

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जनजीवन मा तीज तिहार के महत्व अउ वैज्ञानिक दृष्टिकोण*

 *छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जनजीवन मा तीज तिहार के महत्व अउ वैज्ञानिक दृष्टिकोण*


हमर छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति मा तिहार मन के विशेष महत्ता हे चाहे वो हरेली हो, राखी, अक्ती, देवारी, जेठौनी, छेरछेरा या तीजा तिहार हो। सबो तिहार के अपन-अपन महत्व हे। अइसने हमर, छत्तीसगढ़ अउ पूरा देश मा तीज तिहार के विशेष महत्व हे। तीज तिहार सिरिफ ब्रत उपवास नो हरे, ये तिहार नारी के सनमान के परब आय, नारी के आत्म स्वाभिमान के, सामाजिक ताना-बाना के परब आय। सादगी अउ सामूहिकता के परब, नारी के ‘अटूट संकल्प’ ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा-विश्वास के परब आय। अउ इही सामाजिक परिवेश मा नैतिक मूल्य, धीरज, प्रेम के तिहार आय। इहाँ के तीज-तिहार केवल मनोरंजन या रोटी-पीठा पकवान तक सीमित नइ हे। अगर हम एकर पाछू के छिपे परंपरामन के परत हटा के देखबो, त येमा गहरा वैज्ञानिक, पर्यावरनीय अउ मनोवैज्ञानिक रहस्य छुपे हे।


*आध्यात्मिक अउ वैज्ञानिक रूप* –    आध्यात्मिक रूप ले, जब तीज तिहार ल देखथन त एला ‘हरिततालिका तीज’ कहे जाथे। ये माता सती के (जेकर ददा प्रजापति दक्ष दाई प्रसूति) अग्निकुंड मा अपन प्रान के दाह करे के बाद लगभग 108 जनम के बाद पार्वती के रूप मा हिमालयराज ( हिमवान ) अउ मैनावती के बेटी के रूप मा जनम लिस। जेकर नाम पर्वत पुत्री के कारन पार्वती ( शैलपुत्री) कहाइस। पार्वती भगवान शिव ले अगाध भक्ति, प्रेम विश्वास रखे। जब होकर बिहाव भगवान विष्णु के संग होही कहिन, तब माता पार्वती घर ले दूर जंगल मा  गिन अउ भगवान शिव ल पति के रूप मा पाय बर त्याग-समर्पन के संग तपस्या करिन  एकरे सेती एला कहिथें ‘हरतालिका’, शाब्दिक अर्थ मा देखा जाय तब ‘हर’ मतलब ‘हरण’, ‘आलिका’ मतलब ‘सखी’, सखी के द्वारा पार्वती के हरन करके जंगल मा तपस्या करना। भौतिक सुख सुविधा ल छोड़ के आध्यात्मिक सुख के प्राप्ति करना ए हरे हरितालिका तीज-तिहार।

    हरतालिका  तीजा ल वैज्ञानिक दृष्टिकोण ले देखन त कोनो भी  काम या लक्ष्य के प्राप्ति बर एकांत मा काम करना बहुत जरूरी होथे। जब हमन  कोनो कठिन अउ बड़का काम करथन त मन,  बुद्धि, विवेक ल शांत रखे बर एकांत अउ  शुद्ध वातावरण के जरूरत होथे। जेन हा, चिंतन, करे बर, साधना करे बर, बहुत जरूरी होथे।  एकरे ले कोनो भी कारज या लक्ष्य सही दिशा मा प्राप्त  होथे। एकरे  सेती माता पार्वती जंगल, निर्जन वन, प्राकृतिक पर्यावरन के बीच म रहिके अपन साधना करिन अउ अपन लक्ष्य ल पाइन ।

         तीज-तिहार हा ग्रामीण जनमानस मा अपन बहुत बड़े महत्व रखथे। भादो महीना के  अँजोरी पाख (शुक्ल पक्ष) तीज के  होथे ये तिहार। तीजा के एक हफ्ता पहिली कृष्ण जन्माष्टमी, पोरा ले  ददा-भाई मन बेटी बहिनी मन ल तीजा लिवाय बर जाथें। बेटी-माई मन हा ददा-भाई के अगोरा मा रद्दा जोहथ रहिथें कि कब ददा-भाई मन आही अउ कब हमन अपन मइके के घर-अँगना मा जाबो। ददा-भाई मन जब बेटी के ससुराल मा आथें त एक बेटी के ससुराल अउ मइके  के रिश्ता मजबूत होथे। हिरदे के भाव प्रगाढ़ होथे। 


*करु भात के महत्व वैज्ञानिक दृष्टि अउ आध्यात्मिक दृष्टि ले * – तीज तिहार मा करुभात के बड़ महत्व हे। करुभात के दिन करेला के साग बनाय जाथे। इही करु करेला ‘करुभात' आध्यात्मिक दृष्टि ले मन के शुद्धि,  बैराग, संयम के प्रतीक आय। कठिन निर्जला ब्रत के पहिली करेला के सेवन उपसहीन मन के भीतरी भाव मा सांसारिक मोह-माया अउ सवाद ले दूर हिरदे के बहिरी, भीतरी ला शुद्ध करे के  आध्यात्मिक साधना आय । |जिनगी के दुख ल सही के कड़वाहट ल सही के सुख के अगोरा मा आगू बढ़े के प्रतीक आय। जब तक जिनगी मा दुख नइ होय तब तक सुख के भान नइ होवय। 

      वैज्ञानिक रूप रूप मा देखे जाय त करेला के तासीर जुड़ होथे जब बेटी-माई मन तीन दिन के निराहार निर्जला तीजा उपास रहिथें तब ये करु करेला ओकरमन के शरीर मा ऊर्जा के काम करथे। अउ छोटे-मोटे शारीरिक रोग ल दूर करथे। शरीर के विषाक्त पदार्थ ला जलाय मा काम करथे।

           छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति मा करुभात के दिन बेटी-माई मन ए पारा ले ओ पारा दाई-ददा, कका-काकी, मीत-मितान घर  करुभात खाय बर जाथें त ये जनजीवन मा पारिवारिक जुड़ाव, सामाजिक एकता, सामाजिक समरसता के प्रतीक आय। कोनो, सबो घर जाके भात नइ खावँय फेर भाव रखथें। वैज्ञानिक दृष्टिकोण ले देखन त बेटी-माई मन मइके मा आके अपन ससुराल के जवाबदारी ले दू-चार दिन बर सुस्ता के, घर परिवार के संग; सखी सहेली के संग मन के भारी पन ला हल्का करथें। मानसिक थकान ले मुक्ति पाथें। एक दूसर ले सुख-दुख, मया-दुलार बाँटथें। इही प्रेम भाव रिश्ता ल मजबूत बनाथे। फेर अब देखे सुने मा मिलथे कि तिहार बार मा घलो परिवार मा मनखे मन एकाकी होवत जावत हें। फोन मा बुलावा भेज देथें । बेटी-माई मन ल प्रेम से खायबर त खायबर बइठे बर घलो बुलाय मा जोर परे  धर ले हे, अना-कानी करे धर ले हें; अइसे दिन आवत हे। मनखे मन अब अपने-अपने घर मा अकेल्ला तिहार मना लेथें। एकर ले पारिवारिक जुड़ाव, सामाजिक समरसता कमजोर होवत हे। तिहार बार के महता घटे ल धर ले हे। तब समरसता, जोड़े पर अनायास मोर चार पंक्ति निकलगे।


चल-चल दीदी जाबो सबझन, खाए बर करुभात।

दाई-ददा कका-काकी ले, करबो सुख-दुख बात।।


मिलबो सखी सहेली  मनले, करबो  गुरतुर  गोठ।

होही मइके के  दया-मया, सगरो  दिन  बर पोठ।।


समरसता  के  मया  बहाबो, गाबो  मिलके  गीत।

सुम्मत के  डोरी  मा  रहिबो, होही  चोखा  प्रीत।।


       करुभात के बाद आथे बेटी-माई मन के निर्जला तीन दिन के उपास के बारी। आध्यात्मिक दृष्टिकोण देखे जाय तब तीजा उपास मा महिला / नारीमन नदिया या तरिया के रेती या करिया माटी ल ला के शिव-पार्वती के प्रतिमा बनाथे। चाउर पिसान के,  रंगोली के चौक पुरथें अउ घर ल सुग्घर सजाथें । ये दर्शाथे कि ईश्वर के भक्ति मा आडंबर के नइ बल्कि ये माटी के जइसे मन के सादगी,  पवित्रता के आवश्यकता हे। शिवलिंग बना के फुलेरा साजथें। जेमा पाँच धागा या बाँस के कमचील के पाँच डंडी मा आमा, बिही, कदम, गोंदा, तरोई के नार फूल ले सजाथें। ये हा हमर प्रकृति ले जुड़े रहे के शिक्षा देथे।

  वैज्ञानिक दृष्टिकोण ले देखन त  नदिया के माटी ल लाके शिवलिंग बनाना प्रकृति ले जुड़े  रहे के सुग्घर हिस्सा आय।  बिना प्रकृति के जीवन संभव नइ हे। तरिया-नदिया के माटी पानी तन-मन ल जुड़ छाँव देथे। नदिया,  तरिया, माटी, पथरा, पेड़-पौधा, जीव-जंतु सबके सनमान करना, सुरक्षा करना, सफई रखना हमर फरज हे। चौक पुरना, गोबर ले लीपना। एकर पीछे कारन हे, घर मा नकारात्मक ऊर्जा  ल आय ले रोकना। ये ये गोबर, चाउर मा लीपना हा घर ला पवित्र करेथे। मन ल शुद्ध करेथे, पवित्रता के भाव जगाथे। जब तीजा तिहार के ए तीज उपास ल हमन आध्यात्मिक दृष्टि ले देखथन त  सांसारिक बंधन ले भौतिक सुख-सुविधा ले दूर परमात्मा के प्राप्ति के परब आय जेमा बहू-बेटी मन अपन पति के दीर्घायु सुख शांति बर ये उपास  रखथें। रात भर भजन-कीर्तन करथें। ये आस्था संसार के व्यावहारिक पति के संग असली पति असली प्रिया परमात्मा ल जाने के परब आय तीजा। निर्जला उपास रहिके नारी मन अपन इन्द्री ल, संयमित रखथें। अउ जेन मन  अपन इंद्रिय ल जीत के भूख-प्यास के तितिक्षा करथें। शारीरिक सुख के त्याग करके भीतर के,  परमात्मा ल जगाथें निश्छल भक्ति-भजन करके बुद्धि-विवेक के माध्यम ले; उही ल परम आनन्द के प्राप्ति होथे। जइसे माता पार्वती ल परम आनंद के प्राप्ति होइस। ये हरे सही उपास के अर्थ।

  

    अइसने  ब्रत, उपास ल जब वैज्ञानिक दृष्टिकोण, ले देखन त बरसात के मौसम मा हमर पाचन शक्ति धीमा हो जथे। तीजा के कड़ा उपास शरीर के पाचन तंत्र ल आराम देथे  अउ संचित टॉक्सिन्स (जहरीला तत्व) ल शरीर ले बाहिर निकालथे। एकर ले शरीर मा नवा ऊर्जा मिलथे। फेर आज ये सबो आध्यात्मिक अउ वैज्ञानिक दृष्टिकोन ल लोगन मन नइ समझ पावत हें। अवैया पीढ़ी मन ब्रत, तीज-तिहार के पाछू मा छुपे वैज्ञानिक दृष्टिकोन ल  अइसने मा कइसे जान पाहीं? एकरे सेती  आज जनमानस मा बेटी-माई मन ल वर्तमान के ढोल-ढकोसला ल छोड़ के अपन, वास्तविक संस्कृति अउ परंपरा, आध्यात्म दर्शन ल अपन नवा पीढ़ी  के लइका मन ल जनाय के जरूरत हे। तब अवैया समे मा तीजा के सार्थकता बने रही नइ  ते तीजा खाली घूमे-फिरे, खाए-पिए मौज-मस्ती अउ सेल्फी ले के दिन बन जही।


*सनमान के प्रतीक लुगरा के महत्ता* – उपास के पूरा होय  के बाद बहू-बेटी, दाई-माई मन मुन्देरहा ले उठ के नहा-धो के नवा-नवा लुगरा-कपड़ा पहिनथें। भगवान के पूजा-पाठ करके भोग प्रसादी लगा के अपन उपास के पारण करथें।  अउ सात्विक आहार छत्तीसगढ़ के पारंपरिक भोजन, पकवान ठेठरी, खुरमी, बरा सोहारी, सिंघाड़ा के संग ब्रत ल खोलथें। तीज तिहार के खारा-मीठा पकवान जीवन मा मधुरता घोलथे।  तब ये उपास मा सनमान के प्रतीक,  बेटी-माई मन ल मइके  ले लुगरा उपहार के रूप मा मिलथे। ये लुगरा नारी के सनमान, मइके के मान-मरियादा के प्रतीक आय। बेटी के ससुराल अउ मइके ल जोड़े के परम्परा आय। जेन ल दाई-ददा मन पाँव पोंछ लेहू बेटी कहिके देथें। जेकर भाव ल बेटी मन ही समझ सकथे। लुगरा ल देख के बेटी मन, मइके के सुरता, दाई-ददा, भाई- बहिनी के सुरता करथें जेमा प्रेम छुपे रहिथे। वो  मूल्यवान कीमती होथे। आजकल कतको देखे बर मिलथे कि भाईबंध मन संपन्न होय के बाद घलो बेटी-माई ल पाँव पोछे के लईक तक लुगरा कपड़ा नइ दे सकत हें उल्टा उँकर अधिकार ल छिनत हें। अपमान देवत हें। अउ कहिथें लुगरा पुरही का? लुगरा पूरे नइ वो तो मइके  के सनमान होथे जेन बेटी के ससुराल मा प्रदर्शित करथे कि बहू के मइके के भाव का हे। इही ल घर-परिवार के चार सदस्य मन  देखथें। बेटी-माई मन अपन मइके मा भाई-भउजी ले मीठ बोली के आसा रखथे। धीरे धीरे यहू भाव घटत जावत हे। जेकर ले पारिवारिक समरसता के जघा समाज मा दुरिहाव देखे बर मिलत हे। तभो कतकों बेटी मन मइके वाले के फभित्ता झन होय कहिके गम खावत हें।  अइसन स्थिति आज समाज मा बहुत देखे बर मिलत हावय जेन दुख के बात आय।


 *प्रकृति ले जुड़े हे तीजा-तिहार*- हम छत्तीसगढ़ के जनमानस मा, लोक संस्कृति मा, तीजा तिहार, धार्मिक अनुष्ठान या पारिवारिक लोक संस्कृति भर नो हरे, बल्कि ये मनखे अउ प्रकृति के अटूट अंतरसंबंध के तिहार आय। जेमा हरियाली चारों कोती कर देखे बर मिलथे।  खेत के हरियर-हरियर धान, हरिहर पेड़-पौधा मन मनखे के अंतस ल खुशी व उल्लास ले भर देथे। बाग-बगइचा मा तीज के झूला मा बेटी-माई मन झुलना झुलथें।  हवा मा फूल के महक, कोयल के कुक, हवा के सनसनाहट, प्राकृतिक नजारा के आनन्द अंतस ल ऊर्जा अउ उमंग ले भर देथे। ए तिहार प्रकृति ले जुड़े के अउ प्रकृति के संरक्षन के सीख देथे।  

   ये ढंगले छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति मा तीजा तिहार जनमानस के बीच आध्यात्मिक दृष्टिकोन, वैज्ञानिक दृष्टिकोन, सामाजिक समरसता, प्रकृति ले जुड़े के परब आय। इही हमर लोक संस्कृति के प्रान हरे। नारी स्वाभिमान के तिहार हरे। इही लोक संस्कृति मन, त्याग-समर्पन, प्रेम, नैतिकता के शिक्षा देथे। येला हमन ला अपन नवा पीढ़ी के लइका मन ल सिखाना बहुत जरूरी हे। तीज-तिहार हमर संस्कृति के गहना आय जेमा बेटी मन के आत्मसम्मान, त्याग-समर्पन, प्रेम के रूप झलकथे। तब मोरो भाव बेटी मन बर अइसन ढंग ले झलक थे-


    बेटी अँगना के फुलवा कस, महके बनके सदाबहार।

    मइके  आथे  आशा  धर  ये, पाये  बर  बड़ मया दुलार।।

    त्याग-समर्पन अउ जप-तप ले, बने रहै प्रभु अमर सुहाग।

    पानी-पसिया  गुरतुर  बोली, संग मिलै  मइके  के  राग।।


डॉ पद्‌मा साहू *पर्वणी*

खैरागढ़ छत्तीसगढ़

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