पानी के फुहार ( छत्तीसगढ़ी कहानी)
लता के इही बछर देवउठनी एकादशी के दिन बिहाव होय रहिस हे। लता धमतरी म राहत रहिस हे। उहें के कालेज म पढ़ाई करे रहिस हे। ओखर ससुराल तो गाँव म रहिस हे फेर ओमन जगदलपुर म नौकरी करत रहिन हें। लता के पति राहुल अउ लता दूनों झन टीचर रहिन हें।
बिहाव होय के एक महिना के बाद येमन जगदलपुर गिन काबर के छुट्टी रहिस हे। गृहस्थी के कुछ सामान ल कार म रख के लेंगे। एक 'छोटा हाथी' गाड़ी करके ओमा भी फ्रीज, कुलर, बर्तन सोफा सब चल दिस। राहुल बढ़िया घर लेय रहिस हे। सब सामान उहें उतार के लता के घर के सामान ल घलो ले के अइन। लता तीर काम चलाऊ सामान रहिस हे, दू प्लास्टिक के कुर्सी, एक टेबल अउ फोल्डिंग पलंग। सामान ल अपन काम वाली बाई ल दे दिस।
16 जून के स्कूल खुल गे। राहुल अँग्रेजी के शिक्षक रहिस हे अउ लता बॉयलाजी के शिक्षक रहिस हे। एके स्कूल म पढ़ावत रहिन हें।
मानसून के आगमन होगे। आँधी तूफान के संग हल्का फुलका बारीश शुरु होगे। पानी एक दिन गिर के फेर धूप निकल जाये। फेर बारीश फेर गर्मी ले उमस बाढ़त रहिस हे। जुलाई म स्कूल म बात होवत रहिस हे के बारिश म चित्रकोट जलप्रपात के खूबसूरती बाढ़ जथे तब येला देखना चाही। राहुल अउ लता एक दिन सोचथें के जलप्रपात देखे बर जाना चाही।
जुलाई म तेज बारीश के बाद जब धूप निकलिस तब दूनों झन कार ले चित्रकोट बर निकलगें। जगदलपुर ले चालीस किलोमीटर रहिस हे। बिहनिया सात बजे निकलथें अउ साढ़े आठ तक पहुँच जथें। एक सप्ताह के छुट्टी ले ले रहिस हें। सिंचाई विभाग के रेस्ट हाऊस म एक कमरा ले लिन अउ प्रपात के मजा लेवत रहिन हें।
90फीट नीचे पानी गिरथे। आज तो नदी आधा भरगे रहिस हे। बरसात म सात धारा गिरथे अउ बाकी मौसम म चार धारा रहिथे। ये कभू सुखावय नहीं। बारीश म डोंगा बंद हो जथे। दूसर दिन जेन बारीश शुरु होइस त रुकबे नइ करिस। लता अपन काँच के खिड़की ले देखत रहिस हे। हवा म नदी के ओ पार के पेड़ मन नाचत रहिस हे त ओला दिनख के लता के मन नाचे ले लगगे। बारीश राम भर होते रहिस। बिहनिया के धूप म पत्ता मन के पानी के बूंद चाँदी सरिख चमकत रहिस हे। लता नाश्ता करके बाहिर आ जथे। लता प्रपात ल देखथे त तीन चार फीट ही नीचे गिरत रहिस हे। लबालब भरे नदी के चौड़ाई अउ बहाव डर पैदा करत रहिस हे। चुपचाप खड़े रहिस हे त राहुल आ जथे।
"कइसे लता तोला तो पानी,झरना, नदी ,जंगल बहुत पसंद हावय। बने लागत हे ?"
"हाँ" काहत लता ओखर गला म हाथ डाल देथे। "बहुत अच्छा लगत हे। मोला तो ये खूबसूरती के बीच म आना एक सपना लगत हावय।"
"पानी बंद होही त दूसर प्रपात देखे बर जाबो।"
"मोर तो मन नइ भरत हे" काहत जमीन म बइठ गे लता ह। राहुल घलो बइठ जथे अउ एक दूसर के हाथ ल पकड़ लेथें। दूनों झन झरना म गिरत पानी ल देखत रहिथें। धूप अपन रंग देखाना शुरु करथे। गर्मी बाढ़े ले लगथे त पसीना पोछत लता ह अपन सिर ल राहुल के कंधा म रख देथे। देखत देखत बारह बज जथे। दूनों झन खाना खाये के बेरा होगे कहिके कमरा म आथे। खाना खा के आराम करथें।
तभे काम करने वाला कहिथे "अभी तो तीरथगढ़ जाना चाही।"
"कब"
"खाना खा के निकल जाओ, रात तक वापिस आ जाना। यहाँ खाना तैयार मिलही।"
"ठीक हे। खाना मत बनाना।"
खाना खा के एक घंटा आराम करके दूनों झन तीरथगढ़ बर निकल जथें। जगदलपुर के हरियाली, बड़े बड़े वृक्ष लता के मन मोहत रहिस हे। कई गाँव रद्दा म परथे। तरह तरह के नार लगे दिखथे। नार मन छानही म चढ़त रहिस हे। कई जगह अभी भी आम लगे रहिस हे। लता तो बस ये देख ओ देख ही करत रहिस हे। येमन तीरथगढ़ पहुँच जथें। उंहाँ के रेस्ट हाऊस ले नीचे उतरे बर सीढ़ी रहिस हे। अभी आधा रास्ता म बंद कर दे रहिन हें। 300 फीट ले नीचे गिरथे। झरना तो सबके मन मोह लेथे। ऊंहा छोटे आकार के बहुत बंदर घलो रहिस हे।
लता अउ राहुल दूनों झन आधा घंटा तो झरना ले गिरत पानी देखत रहिथें फेर गाइड ल कहिथें "नीचे जाना हे।" गाइड साथ म चलथे। अचानक बारीश शुरु हो जथे। लता अउ राहुल एक दूसर के हाथ ल पकड़ के सीढ़ी उतरे ले लगथें। नीचे जिंहा धारा गिरय उंहा अउ बहुत आकन मंदिर रहिस हे सब डूब गे रहिस हे। लता अपन पैर ल पानी म डुबाना चाहत रहिस हे फेर गाइड ह मना कर दिस। तीनो झन लहुटथें। गाइड पहिली आ जथे। ये मन पानी म भिगत पेड़ पौधा के पानी ल झड़ावत अउ खेलत उपर आथे।आके अपन कपड़ा ल पहिने पहिने ही निचोड़ के पानी ल झड़ाथें अउ गाइड ल खाना बनाये बर कहि देथें। कढ़ी चावल खिलाना कहिथें त गाइड ह इड़हर के कढ़ी बनाथे। तब तक ये मन हवा म अपन कपड़ा ल सुखाथें।
साढ़े आठ बजे खाना खाये बर बइठथें। नौ बज जथे। राहुल अउ लता ल तो पावस के नशा चढ़ गे रहिस हे। हरियाली ल देख के मन नाचत रहिस हे त झरना सरिख हाँसत रहिस हे, नदिया सरिख दउड़त रहिस हे। रात के ग्यारह बजे तक चित्रकूट पहुँचथें।
कार म लता पूरा समय राहुल के कंधा म सिर रखे रखे आथे। दूनों झन एक दूसर के प्रेम म अतेक डूब जथें के कार ल रोके के बाद भी एक दूसर ल पोटारे बइठे रहिथें। जब रेस्टहाउस के लड़का टार्च मारथे तब उतरथें। कमरा म जा के गीला कपड़ा में ही सुत जथें।
दूसर दिन के बिहनिया नवा सुरुज ले के आथे। लता तो बिस्तर ले उतरबे नइ करय बस ब्रश भर करथे। बिस्तर में ही दही पराठा खाथे। खिड़की ले बाहिर समतल बोहावत चित्रकोट के धार ल देखत रहिथे। अगले दिन ओमन ल जगदलपुर लौटना रहिथे। बस दूनों झन आराम करत रहिथें। जब लड़का आके कहिथे के खाना तैयार हावय तब दूनों झन संग में ही नहा के टेबल म आथें। आज के खाना म घलो मिठास रहिस हे। खाना खा के फेर जा के सुत जथें। आज पूरा आराम चलत रहिस हे। रात के आठ बजे निकल के खाना खाथें अउ आज आखरी बार रात म झरना के खूबसूरती ल देखथें। दस बजे तक एक दूसर के हाथ ल पकड़ के बइठे रहिथें।
लता कहिथे "अइसे लगथे के स्वर्ग तो हमर जगदलपुर म हावय, छत्तीसगढ़ के नियाग्रा के खूबसूरती कुछ कम नइये। नदी के दूनो तरफ के बड़े बड़े पेड़ के हरियाली येखर खूबसूरती ल बढ़ाथे। पूरा जगदलपुर हरियाली ले भरे हावय। हमर छत्तीसगढ़ म घलो एक से एक जगह हावय।"
राहुल कहिथे-" तैं खुश त मैं खुश हंव, हाँ हरियाली तो बहुत हावय। तीरथगढ़ म पानी म भीग के कतेक अच्छा लगिस। शरीर के गर्मी खत्म होगे।"
"हा हा हा हा "
चलो अब सुतबो। दूनों झन आ जथे। बिहनिया ले वापस जाये के तैयारी करथें। फेर मन तो इहें अटके रहिस हे। नाश्ता करके फेर बइठ जथे। पावस घलो इंखर प्यार म खुश होत रहिस हे, हल्का बारीश होय ले लगगे। फेर दूनों झन पानी के फुहार म भीग गें। दोपहर के खाना खाके फेर खिड़की तीर बइठ गें। लड़का ल कहिथें "आज रात के खाना खाके जाबो।"
रात के आठ बजे खाना खा के तुरंत कार म वापस हो जथें। लता राहुल के कंधा म सिर रखे रखे सोचत हे असो के पावस बहुत खुशी दिस हे।
सुधा वर्मा
प्लाट नम्बर 69,"सुमन"
सेक्टर 1,गीतांजली नगर,
रायपुर, छत्तीसगढ़
पिन 492001
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