Thursday, 28 May 2026

बेटी-माई ला सरेखे के उदिम आय: हमर नेंग-जोंग*

 *बेटी-माई ला सरेखे के उदिम आय: हमर नेंग-जोंग*

पोखन लाल जायसवाल 

    लोकजीवन मं नोनी मन ला पर के धन कहे जाथे। दूसर कोठा के लक्ष्मी कहि देथें। जिहाॅं वो अवतरे रहिथें, उहाॅं वो मन ला इही सुने मिलथे कि अपन घर जाबे त सब सउॅंक ला पूरा कर लेबे। अभी चूल्हा चौकी ला सीख ले। माने जिहाॅं वो अवतरे रहिथें उहाॅं उॅंकर कोनो अधिकार नहीं। उॅंकर सपना सपना नोहे। सपना धरे रहि जथे। 

     बाबू पाछू बाबू अवतरे मं परिवारजन मन अउ परोसी मन कहिथें बाॅंटा लेवइया हिस्सेदार आगे। कहूॅं नोनी अवतर गे ता ये गोठ कभू सुने ला नइ मिलय। बबा-डोकरी दाई संग ददा के मुॅंह घलाव उतर जथे। कोन जनी नोनी संग अइसन हीन मान काबर? 

     अभी कुछ बछर ले मनसे के सोच बदले हावय। तब ले एक भाव अभियो देखे सुने मिलथे, कि बेटी अपन घर चल दिही ता हरहिंच्छा हो जहूॅं। गंगा नहा लेहूॅं। मुड़ के बोझा उतर जही। अइसन कतको किसम के गोठ। जे मनसे ते मुॅंह अउ ओतके गोठ। एकरे आड़ मं नोनी मन ऊप्पर धियान कमती दिये जाथे। पढ़ई-लिखई, ओनहा-लत्ता, काम-बुता सबेच मं भेदभाव देखे ला मिलथे। भरोसा कम रहिथे। ठीक हे थोर बहुत त पाबंदी होना चाही। समाज के ॲंगरी उठे झन, एकर बर सावचेत रहना ज़रूरी हावय।

    हाथ पिंवरा के बिदा दे दिन, मतलब छुटकारा पागे। नोनी मन बर मइके मं कुछु नइ रहि जाय। तइहा के पुरखा सियान मन अपन संतान नोनी मन ले जुराव बने राहय, एकर बर कतको नेंग-जोंग बना के रखिन। सरी नेंग-जोंग मन बेटी-माई ला सुख-दुख मं सरेखे के उदिम ऑंय। जेकर बहाना नोनी मन बर मइके के मुहाटी खुले राहय। उॅंकर हीन मान झन हो। सब संग मया-बॅंधना जुरे राहय। एक लोटा पानी निकलत रहय। नोनी मन घलाव एक लोटा पानी के आसरा मं जमीन-जायदाद डाहन नज़र नइ उठाॅंय। हिरक के नइ देखॅंय। पटवारी मेर हाॅंसत-हाॅंसत दसखत कर देथें। 

     राखी अउ तीजा-पोरा के पौराणिक महत्ता अपन कोती हे। हमर छत्तीसगढ मं ए दूनो तिहार दू कुल बर बड़का तिहार आय। जेन बेटी-माई के परगोत्री होय पाछू मइके संग मया के सुतरी मं उन ला बाॅंधे राखथे। एकर अलावा पुरखा मन कई ठन नेंग-जोंग बनाय हावॅंय। जउन ह परम्परा के रूप मं तब ले चले आवत हें। ए नेंग-जोंग मं जन्म अउ मरण तक कई ठन हें, जेन बेटी-माई ले जुरे हावॅंय। एकरे बहाना उन ला मान दे गे हावय। इही नेंग-जोंग के बहाना नोनी मन के पूछ परख होथे। फेर कुछ मन के ऑंखी मं एहर गड़े लग गे हावय। उन ला खोट दिखथे। ए खोट उॅंकर सोच के खोट आय। मनसे आज नवा आदत पाल डरे हे, चन्नी मं दूध दुहे के। अपन चद्दर ला तानथे अउ चिरागे त एकर दोष दूसर के मुड़ी मं खपल देथे।

    कानून कब के बने हावय, तब ले एक लोटा पानी के आस मं बाॅंटा ला भुला जथे। भाई बाॅंटा ले लिही त भाई-भतीजा बर का बाॅंचही? बहिनी हर सोचथे। देनगी लुगरा के दिन पुरही? फेर एकर मरम का हो थे, कोनो दुखियारिन हा बताहीं। नेंग-जोंग मं लुकाय ठट्ठा दिल्लगी अउ मजा ला पइसा मं सरेखहीं, ओ का जानही।

    छट्ठी-छेवारी के बखत घर मं खुशहाली होथे। बर बिहाव घलाव खुशहाली के घड़ी होथे। नवा घर या दुकान के कथा पूजा मं हाथा देके नेंग जइसन सुख के अवसर मं जम्मो हितवा मन सकलाथें, तौ बहिनी-माई के काबर अनदेखा होवय? इही गुनान करत बुधियार सियान मन कुछ नेंग बना दिन। अपने घर परिवार के मनसे वहू हरे। त का नवा कपड़ा-लत्ता ओकर बर नि बिसाना चाही,? इही ला उन बहाना बना नेंग कहि दिन। का गलत हावे एमा? फेर नवा जुग के मुड़पिरवा मन के भेजा मं बात समाय तब। दारूपानी बर कमती मत होवय, भले घर मं आये बहिनी-माई मन के मान मत होवय।

     सुख बस मं नइ दुख के घड़ी मं पूरा दसकरम के होवत ले नोनी मन दोनिया देवाथें। रांध-गढ़ के खवाथें। डेरउटी मं दीया बारथे। का उॅंकर ए समर्पण ले देनगी लुगरा हा भारी हे? एकाध झन होहीं जउन मन कुछु अउ बात के रिस ला लुगरा ला झलझलहा हे, एक ठन चेंदरी के पुरतन नइ हन कहिके ताना मार देथे। फेर उॅंकर अंतस् मं अइसन कुछु नइ राहय। हम ला मानना चाही कि हमर घर-परिवार के उत्सल मं नेंग-जोंग मन बेटी-माई के सम्मान बर बनाय गे हावय। ए नेंग मन परिवार ला एक सुतरी मं पिरो माला जस गुंथे के उदिम हरे। अतका माने ला परही कि नेंग-जोंग मन बेटी-माई के मइके आए के धरखन आय । ए धरखन ला बचाय रखे के जुम्मेवारी हमर हे। तभे परिवार के एकजुटता बाॅंचही। नइ ते एकाकी जीवन के चलत मनसे अवसाद ले उबर नइ पाही। 

०००

पोखन लाल जायसवाल 

पलारी (पठारीडीह)

जिला बलौदाबाजार-भाटापारा 

मोबाइल - 9977252202

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