Wednesday, 8 July 2026

लघुकथा -"भोंदू के मतलब " -मुरारी लालसाव

 लघुकथा   -"भोंदू के मतलब "

           -मुरारी लालसाव 

        इंटरव्यू के ऑफिस म अपन नंबर बुलाये के इंतजार करत अव्वल कुमार सोचत रहिस l का पूछही? तीर म एक झन अउ बइठे रहिस l ओला पूछिस -" अरे भाई  तै का तैयारी करे हस? "

ओहर कहिस -"का तैयारी? जुगाड़ करे ला पड़ही l"

अव्वल कहिस -" का जुगाड़?"  धुरिया घूंचत  कहिस -"अरे भोंदू हस का?" 

"भोंदू मतलब? गुस्सा ला रोक लीस l मने मन सोचिस l जउन गुरूजी मार मार के पढ़ाइस ओहा मोला "भोंदू "नइ कहिस कभू l मुरख़ भले कहिस l मुरख़ कहि कहिके मोला योग्य बना दीस पढ़ा लिखा समझा के l इही बात बताइस "न जुगाड़ काम आवय न नकल बेटा तै सफल होबे त अपने अकल से l" नम्बर आगे भीतर बुलाइस l

बड़े अधिकारी  पूछिस सवाल -"  जमींदार मन के रियासत ला अंग्रेज मन कइसे छिनिस? "

अव्वल कुमार के पास कई ठन उत्तर रहिस फेर आखिर म उही बात ला सोच के कहिस -" रियासत के जमींदार मन "भोंदू " रहिस l"

अधिकारी आँखी ला देखत रहिगे,जवाब ला सुनके l फेर पूछिस -" भोंदू मतलब  पूरा बताओ l"

अव्वल आत्म विश्वास ले कहिस -" जुगाड़ करे ला छोड़ दीस l" अच्छा जाओ l अधिकारी सोचिस -"स्वाभिमानी  हे l "

रिजल्ट आइस त देखिस अव्वल कुमार के नाँव  ऊपर म रहिस l 

-कुम्हारी जिला दुर्ग

समे

 *समे*

एक झिन बड़ मेहनती मनखे रिहिस।वो हर येदे लईका बर,येदे बुढ़ापा बर,येदे आने परिवार बर अइसे सोंच -सोंच के जांगर टोर मेहनत कर बड़ बड़े आदमी बनगे।कमई के मारे वोला न घर परिवार बर समे मिले न संगी जहुंरिया बर। एक दिन सोय जठना म यमराज आगे। वोला देख के पुछथे ते कोन अस? यमराज कथे मे यमराज।तोर दिन बादर पुरगे अब तोला जाना पड़ही।मनखे कथे मोर करा बहुत अकन धन दोगानी हे महराज आधा ल दे दूं हूं कम से कम मोला एक दिन समे दे देहू परिवार संग बिताय बर। यमराज कथे ये नइ हो सके।तब मनखे कथे मोर पूरा धन दोगानी ल ले ले मोला कम से कम एक घंटा के समे दे दे मोर संगी जहुंरिया मन बर चिठ्ठी पाती लिखहूं। यमराज कथे ये नइ हो सके।समे निकल गे।अऊ यमराज ओकर जीव ल हर लेथे।


   फकीर प्रसाद साहू 

          सुरगी 🙏

तोर हाथ मं जस हे* पोखन लाल जायसवाल

 *तोर हाथ मं जस हे*

पोखन लाल जायसवाल 


आमा, बर, पीपर अउ लीम के सुग्घर जुड़ छाॅंव वाला गाॅंव हे बिसाहिन दाई के गाॅंव। बिसाहिन दाई ए गाॅंव मं १६-१७ बछर के उमर मं बिहा के आइस। अठारह झिन के परिवार मं। सब मं बड़ मया। बिसाहिन ल नवा जघा बड़ मया दुलार मिले लगिस। मइके के सुरता तो आवय, फेर इहाॅं सबके मया ओकर कमी ल भर देत रहिस। घर मं सब के काम-बुता बॅंटे राहय। रॅंधई-गढ़ई। गोबर-कचरा। पानी भरई। लइका मन के बेवस्था। घर-दुवार अउ ॲंगना बहरई-बोटरई। सब अपन-अपन बुता मं मस्त रहॅंय। घर मं कभू कोनो कखरो ले मुॅंह नइ फुलाइन। सबो झन मया के सुतरी मं माला सहीं गुॅंथाय रहिन। दिन बीतत गिस। सबके लइका मन के बिहाव होगे। देरानी-जेठानी के बहू मन चार दुआरी ले आइन। मया के सुतरी थोरिक झोल परगे। बड़े परिवार वाला माला टूटे के कगार मं आगे। घर के गोठ घर मं रखिन। बाॅंटा के लाखा पार डरिन। ॲंगना खॅंड़ागे। लइकामन कुरिया मं धॅंधागिन। बॅंटवारा के होवत ले परोसी ल गम नइ लगन दिन। बॅंटवारा के ए बड़ोरा अतके मं शांत नइ होइस। पूरा परिवार तिड़ी-बिड़ी होगे।

अब बिसाहिन तरिया पार के परसार वाले घर मं हॅंड़िया तिपोय लगिस। सास-ससुर, तीनों लइका अउ अपन दूनो मिला ७ झन के परिवार रहिगे। पूरा गाॅंव तरिया के पार मं बसे हे। सुग्घर पुरवाही के गाॅंव। बर-पीपर के छाॅंव मं घाम-पियास थोरको नइ जियानय। खनतिहार मन दस बज्जी लहुटत तरिया पार के जुड़ छाॅंव मं बइठथें। थिराथें। एक-दूसर के सोर-संदेश अउ आरो लेवत असनान करे पाछू अपन-अपन घर हबरथें। कोनो-कोनो अपन लइका मन ला हुत करा रापा-कुदारी मन ल घर पठो देथें। "बंशी! ए बंशी ...बेटा बंशी!! रापा-कुदारी ला घर ले जा बेटा। मैं फुरसुदहा नहा के आहूॅं।" ''ए बंशी! हमरो घर रघु ल आरो दे देबे बेटा, आके गैंती ला ले जही। बर छइहाॅं मं थिरा के नहाहूॅं तेकर पाछू घर आहूॅं।'' पछीना मं नहाय बैसाखू हा गैंती-रापा ला मड़ावत कहिस। रोजगार गारंटी ले लहुटत हावें सब ओसरी-पारी। नवा तरिया बनात हावें। गाॅंव भर के मनखे जाथें। गोदी खनथें। पइसा सरकार के अउ सुभिता गाॅंव बर। गाॅंव के मनखे बर। कतेक सुग्घर योजना हावे। सरकार नहाये बर तो आवय नइ। गाॅंव ल गुजर-बसर करना हे। बड़ भागमानी हे गाॅंव अउ गाॅंव वाले मन।  

बिसाहिन दाई पैंसठ पार कर डरिस। काकरो काकी ए, कोनो के भउजी त अउ कोनो के डोकरी दाई। फेर गाॅंव भर के मनखे बर ओहर बिसाहिन दाई आय। गाॅंव भर मं एके झन उही तो हे, जेन ल सबो अपन घर बुलाथें। ओकर बुता घलव वइसने हे। ओकर हाथ मं जस हावय। कभू कोनो धोखा नइ खाय हे। सबेच बर बरोबर मया दिखाथे ओहर। दाई के बुता ल बड़ लगन ले करथे। लालच अभिन तक ओला छुए नइहे। ओहर अपन सास के बताए रद्दा मं चलत हावे। रद्दा आवय परमारथ के। जस के। सेवा के।  

बिसाहिन दाई मरे-जिये बर एके झन रहिगे हे। तीन बेटी हें। तीनों अपन-अपन घर चल दे हें। सब खुश हें अपन दुनिया मं। उॅंकर घर सियान बबा छे बछर पहिली दुनिया ले चल बसिस। तब ले अकेल्ला बर एक ठोमहा चाउर तिपो के खाथे। बेटी दमाद मन अपन संग लेगे के बात कहिन।  

'अभी तिपो लेहूॅं बेटी हो...। पुरखा मन के डेरौठी मं दीया बारन दौ मोला। जेन दिन जाॅंगर जुवाब दिही, मैं आ जहूॅं।' अइसने तो कहे रहिस वो दिन बिसाहिन दाई ह।  

गाॅंव वाले मन ओला अउ आने कुछ बात के तकलीफ़ नइ होवन दे हें। ओकर बुता ला लइका-सियान सब आले-आले कर देथें। चाहे सुसाइटी ले चाउर लाय के हो त अउ कुछु आने बुता।

बिसाहिन दाई भारी पाॅंव वाले मन घर जा-जा के हाल-चाल पूछत रहिथे। हियाव करथे। ठलहा बइठई ले बने हे। अभिन दुकलहा घर बइठे हावे अउ बीस-पचीस बछर पहिली के दिन ला सुरता करत हावे। बहुरिया ल बतात हावे , 'गरमी के दिन मं खनती-कुदारी अउ ढेलवानी दे के बुता चलय। बैसाख के महीना मं खातू पलई। अब तो सब घर मं न गाय हे, न गाॅंव मं घुरवा-गांगर। चरागन घलव नइ बाॅंचिस।... गाय...बइला-गाड़ी नॅंदावत हे।' दुकलहा के बहू हुंकारू देवत सुनत हावे।

बइला-गाड़ी जेन मं लइका-पिचका समेत सब रनबौर मेला जावॅंन। छेरछेरा के पहिली अतराब भर के मेला। रनबौर मेला।

सुरता के डोरी अब सास ला अमर डारिस। गोरस के दवा बर उॅंकर घर कइसे मनखे आत्ते राहॅंय। ओहर नरियर ले के दवा दे देवय। काहय जस के काम आय। खेत-खार के जिनिस के का पइसा-कौड़ी। 

अपन उमर पहाती मं कइसे ओहर ओला जड़ी-बूटी के जानबा दिस। यहू बताइस। ले बइठ नोनी.... अब मेंहा जाथॅंव। चार छे दिन नइ ऑंव। 

दुकलहा मन बेटा, बहू अउ अपन करके तीन परानी हावे। चार बछर होगे हे ओकर सुवारी लक्ष्मी ल बीते। बपुरा ह बड़ सेवा जतन करिस लक्ष्मी के। फेर, भगवान के मरजी के आगू काखर चलथे? लक्ष्मी हा एक दिन दुकलहा ला ठग के दुनिया ले चल दिस। खेती-खार करइया मन के इही तो पीरा ए। राहेर काड़ी के खोभा/खूंटी पाॅंव मं का गड़िस? एक ठन ओखी होगे, दुनिया ले जाय के। चउमास के दिन राहय। झटपिट-झटपिट रेंगइया लक्ष्मी के पाॅंव मं सरहा गढ़न काड़ी गड़ गिस। दवा दारू करिस। दवा-पानी ले पीरा नइ जनाइस। ऊपर के घाव सूखागे। खेती के बुता माढ़े ले संसो तो बाढ़बे करथे। खेती अपन सेती कहे गे हावे। परोसी दारी साॅंप नइ मरय। इही सोंच के घर के खेती मं दुकलहा अउ लक्ष्मी भिंड़गे। रोपा बियासी झरे चार दिन बीत रहिस। लक्ष्मी के गोड़ मं पीरा जनाय धर लिस। सपसपहा पीरा। डॉक्टर तिर गिस। भीतरे-भीतर पीब भर गे रहिस। पीरा अउ तकलीफ़ दूनो धीरे-धीरे बाढ़े लगिस। ....पाॅंव कटागे, फेर घाव बने नइ होइस अउ एक दिन लक्ष्मी दुकलहा ले नता टोर के भगवान घर चल दिस। ....चढ़े करजा ला उतारे मं दू बछर लग गिस। तब तक बाप बेटा जइसन बनिस, तइसन तिपो के खाइन। बेटा के बिहाव होगे हे, नवा सगा अवइया हावे।  


बिसाहिन दाई बड़े बेटी घर आय रहिस। आज लहुटहूॅं काहत हावे। बेटी कहिस - ले ना दाई दुएच दिन अउ रुक जा। तहान चल देबे। तोर नतनीन हा बारवी के पेपर देवा के आही। वहू एक नज़र देख लेबे। नहीं बेटी तोर दुकलहा कका घर नवा सगा अवइया हावे, चार दिन के रुकइया दस दिन होगे। मोला जायच ल परही। पहली पहलावत आय। ओकर घर कोनो नइहे।  

ओती दुकलहा के बहू पीरा खावत रहिस। पहिली पहिलावत आय। बहू बिचारी पीरा मं तालाबेली करत राहँय। दुकलहा के बेटा पइत घलो इही बिसाहिन दाई हा आय रहिस हे। तब सास के तन ह झुके ल धर ले रहिस। इही जचकी ओकर शुरुआत रहिस। अपन सास के कहे मं ही बिसाहिन दाई के बुता करत हावे। जस कमावत हावे। जचकी के दिन ले सरलग अठुराही-पंदराही बिसाहिन दाई सेवा बजाथे। सँझा-बिहनिया दूनो बेरा लइका अउ महतारी के सेवा करथे। कोनो ला बिसाहिन दाई ले कभू कोनो शिकायत नइ होइस। बिसाहिन दाई घलो सबो घर हरहिंछा आवय-जावय। ओकरो मन कभू छोट नइ होइस। बरोबर गोरस नइ आय ले महतारी बर जड़ी-बूटी घलो देवय। कतको झन ला एकर फायदा मिले हवय। तभे तो अतराब भर ले आय दिन कोनो न कोनो ओकर घर आत्ते रहिथे।

सरपंची बर महिला आरक्षण आय रहे मं गाँव भर के मन निर्बिरोध सरपंच बनाना चाहीन। " मैं अप्पड़ का सरपंची करहूँ, मोला इही मं मजा आवत हे, जचकी करावत मोला सेवा करन दव। एकर ले बड़का अउ का जनसेवा होही? मैं इही मं खुश हौं भई। मोला क्षमा करिहौ... क्षमा दिहौ।" अतकी तो कहे रहिस बिसाहिन दाई ह। गाॅंव के सियानी मोर दारी नइ होवय, मोर दाई-ददा हो।  

अभी बिसाहिन दाई के पाँव घर मं बरोबर माढ़े नइ रहिस, अउ दुकलहा ओला आरो दिस - भौजी! ए भौजी...!!  

वोहर उत्ता-धुर्रा उॅंकर घर पहुँच गिस। बहू नोनी ला देखतेच साठ कहिथे, देखे के बेरा नइ हे बाबू। एला जतका जल्दी होय अस्पताल लेगे बर परही। लइका ह थोरकुन उलट गे हे कस जनावत हे। जचकी के बेरा आ घलव गे हे। धरा-पसरा गाड़ी मँगाके, बिना कोनो देरी करे बहू ल लकठा के अस्पताल लेगे गिस। बहू मुँधरहा के उठे पीरा ले लरघिया गे रहिस। महतारी अउ सास के मया ला तरसत बपुरी हा अपन गोठ काखर मेर कहितिस। ताकत नइ लगा पात रहिस बपुरी ह। महतारी एक्सप्रेस आइस अउ अस्पताल गिनन। डॉक्टरिन मैडम जाँच करे के पाछू तुरते ऑपरेशन करके जच्चा अउ बच्चा ला बचालिस। ऑपरेशन के बाद मैडम बोलिस - "अच्छा हुआ समय रहते पहुँच गये, वरना और देरी होने से जच्चा-बच्चा दोनों को खतरा हो सकता था।.... लक्ष्मी आई है ...बधाई हो...और हाॅं! घबराने वाली कोई बात नहीं है। दोनों स्वस्थ हैं।" दुकलहा अतका सुनके बिसाहिन दाई अउ भगवान ला बार-बार धन्यवाद दे लगिस। 

बिसाहिन दाई ल कहिस, "भउजी! तोरे रहिते, आज मैं हा अपन बहू अउ नतनीन के मुख ल देख पाहूॅं।" बिसाहिन दाई कहिस, "नहीं बाबू! मोर तो कामेच आय सेवा। मैं जचकी दाई हरँव, जच्चा अउ बच्चा बर सोचना मोर काम हरे। दूनो ल कोनो नुकसान झन होवै। इही तो मैं चाहथँव। मोला लागिस कि घर मं रहना खतरा हे, मोर बस के बात नइ हे, ते पाय के इहाँ लाने बर कहेंव।"  

सिरतोन भउजी! तोर हाथ मं जस हावय। आज तक तोर राहत ले गाँव ह कभू कोनो धोखा नी खाय हे। तोर रहिते गाँव के बहू-बेटी मन कोनो तकलीफ नइ पाय हें।  

बाबू गोठियातेच रहिबे धन हमर देरानी के स्वागत मं फटाका फोरबे। तोर घर मं लक्ष्मी हा लहुट के आय हे। देख तो लक्ष्मी देरानी ला... बिसाहिन दाई ह दुकलहा ले हॉंसीं-मजाक करे धर लिस।  

मैं फटाका भर नि फोरँव भउजी! मिठई घलो बँटवाहूँ, मोर लक्ष्मी के स्वागत मं। सही मं मोर लक्ष्मी हा मोर तिर लहुट के आय हे, काहत दुकलहा के आँखी मन भर आइन। ओहर खुदे समझ नइ पाइस कि ए आँसू दुख के रहिन कि सुख के।

 ०००  

पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह)

जिला- बलौदाबाजार-भाटापारा छग

बियंग - "भोंगरा" के पारदर्शीय व्याख्या "

 हास्य बियंग - "भोंगरा" के पारदर्शीय व्याख्या  " 

-मुरारी लाल साव 


"भोंगरा " के लोक व्यवहार मे बड़ा महत्व हे l भोंगरा के अर्थ आर पार दिखना l आकार प्रकार म छोटे बड़े हो सकथे l भोंडू टोड़ूँ, छेदा  छोटे रूप आय l कोनो परदा गोल आकार म फूट जथे आर पार दिखे लगथे  l बुलक जथे कोई चीज वस्तु  उही ला भोंगरा कहिथन l  कपड़ा लत्ता साड़ी धोती घलो बड़े चिराके फट जथे गोल उहू भोंगरा होगे बताथे lभोंडू के व्यापक अर्थ भोंगरा आय l भोंगरा ऊपर कई ठन हाना घलो हे l लोगन मन आचरण चरित्र म जोड़ के लोकोक्ति बनाथे l भोंगरा ले लुकाके गुप्त लेंन देन घलो कर लेथे l भोंगरा ले ताका पासा होथे l भोंगरा ले देखना अउ आमने सामने देखना म अंतर हे l

देखय्या मन जानथे काला कइसे देखना हे?दिखत हे-दिखत हे कइथे lका दिखत हे?काला देखत हे ? कइसे दिखत हे?कइसे देखत हस?काबर देखत हे ? कोन कोन देखे के काम करत हे l हमू मन ला देखना चाही lकामा देखत हे?

बहुत  अकन सवाल उठ जथे l सबो प्रश्न के उत्तर भोंगरा से हे l भोंगरा ले देखथे  तेन भोंदू कहाथे l बने बने मनखे घलो भोंदू बन जथे l  

भोंदू होना बड़े बात आय l अभी के समे म भोंदू बन जाना ठीक हे l ज्ञानी मन ला ज्ञान बघारे बर मौका मिलथे l भोंदू मन सरकार बनाथे l भोंदू जान के अपन खेल खेलथे l उहू मन ला मजा आथे l भोंदू जनता ला घलो सुख मिलथे l हमर इतिहास गवाही हे जमींदार मन भोंदू बना बना के जमीन सकेलिस l भोंदू कहि कहिके पंडित मन दान सकेलिस l भोंदू मन बर भगवान के घलो बने कृपा होथे l 

मंदिर धर्मशाला बन जथे पूजा पाठ चढ़ावा उही मन करथे l

समझदार मन हिसाब करके लेथे देथे l दान पान भोंदू करथे भोग जोग साधू बैरागी बर l 

ये सब भोंगरा ले दिखथे l रीति नीति नियम क़ानून सब भोंगरा ले देख l आर पार सब दिखही l

कोन देखथे,जेला मतलब हे l

काबर देखथे,ढोल पोल ला जाने बर l भोंगरा ले देख के 

ब्लेक मेल करथे l 

 जघा जघा भोंगरा खोजथे l 

एक झन पूछिस थाना कछेरी म घलो l पूछे के का बात हे संगी l

उहें के भोंगर�

सब ला बचाथे l

कछेरी अदालत म एक ले एक भोंगरा पाये जाथे बाहिर के ला अंदर अउ अंदर के ला बाहिर करना सब सिखाथे l

जनता ला सरकार घलो भोंगरा ले देखथे l जनता कइसे चिल्लावत हे?काबर चिल्लावत हे?जनता ला कोन भड़कावत हे ये सब अइसने देखथे l 

भोंगरा ले पइसा आथे जाथे l

कहे के मतलब इही भोंगरा ले देश राज्य के वित्तीय व्यवस्था चुस्त दुरुस्त होथे l 

घर परिवार समाज म घलो भोंगरा के अपन खास महत्व हे l पारदर्शिता ले देखबोन त समाज पूरा पूरा भोंगरा ले दिखथे l आदमी अपने इज्जत ला ढांके ला सीख लय l दूसर के भोंगरा ला खोजत रहिथे l

परिवार के हाल बेहाल परवाह करत हन कहिके अँख मुंदा होगे हे l बेटा के आये जाये के दरवाजा अलग l बेटी बहू के आये जाये के अलग दुवार l काला कहिबे ?अधरथिया होथे लड़थे चिल्लाथे त समझ में आथे l भोंगरा भरे व्यवस्था म रहना हे त अपन आदत आचरण ला ओइसने बनाये ला पड़ही l काला लुकाबे सब कभू न कभू उघरबे करही l

     सारांश म साहित्य के सहारा लेके भोंगरा ला अउ पारदर्शीय बनाये के कोशिश करबो l ककरो अहित मत होय l कोनो ला बुरा झन लगे l सबके भला होय सबके विकास होय इही बात के ध्यान सबो ला रखना हे l  

-कुम्हारी जिला दुर्ग

कइसे बाचही पर्यावरन?* पद्‌मा साहू ‘पर्वणी’

 *कइसे बाचही पर्यावरन?*

                पद्‌मा साहू ‘पर्वणी’

                    खैरागढ़

पर्यावरन हमर जीवन के महत्वपूर्ण  हिस्सा हरे। पर्यावरन के बिना, जीवन के सपना देखई बिना आत्मा के शरीर जइसे होही। पर्यावरन आदिकाल ले मनखे मन के संगी-साथी बने हे। इही पर्यावरन के जंगल-झाड़ी, डोंगरी-पहाड़, नदिया-नरवा, रुख-राई, चिरई-चिरगुन, जीव-जंतु मनखे के सुख-दुःख के गवाही बने हें। नदी, पर्वत-पहाड़, रुखराई ल देवरूप समझ के पूजा करँय। पहिली पर्यावरन, अध्यात्मिक अउ साहित्यिक चेतना के केन्द्र रहिस। आदिकाल मा पर्यावरन मानव जीवन के अधार रहिस। 

वइसने वैदिक काल मा प्रकृति के संरक्षन धरम, संस्कृति अउ जीवनशैली के अभिन्न अंग रहिस। वेद मा प्रकृति ल देवी-देवता मानके सनमान दें । जल, भुइयाँ, वायु अउ पेड़ मन ल नुकसान पहुँचाना वर्जित रहिस। श्रद्धा भाव ले पारिस्थितिकी तंत्र ल संतुलित अउ प्रदूषन मुक्त रखे जाय।


“माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्या” 


अथर्ववेद के ये सुक्त प्रसिद्ध मंत्र के अर्थ हे कि- "पृथ्वी हमर माता हे अउ हमन इंकर संतान। " येकरे सेती धरती के शोषन करई पाप मानँय। जइसे एक लइका अपन महतारी के शोषन नइ कर सकय, वइसने हमन धरती दाई के शोषन नइ कर सकन। में अपन स्कूल पढ़ई के समे मा जब गायत्री परिवार ले जुड़े रेहेंव  त हमन  एकठन मंत्र जागरन करन वो मंत्र हे–


"ॐ द्यौः शांतिरन्तरिक्षं शांतिः पृथ्वी शांतिरापः शांतिरोषधयः शांतिः।

वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः शांतिर्ब्रह्म शांतिः सर्वं शांतिः शांतिरेव शांतिः सा मा शांतिरेधि॥"


ये मंत्र मा ब्रह्मांड के सबो तत्व ले शांत अउ संतुलित रहे के प्रार्थना करे हे।

अगास अउ अंतरिक्ष, पृथ्वी अउ जल, औषध अउ वनस्पति, जब प्रकृति के ये सबो अंग मा 'शांति' संतुलन होही, तभे विश्व अउ सब देव  संग मानव जीवन घलो सुरक्षित अउ शांतिपूर्न रहहीं। ये पर्यावणन संतुलन के सबले प्रसिद्ध मंत्र आय।

अइसने अथर्ववेद के एक ठन मंत्र जेमा धरती दाई ल खोद के ओकर ले कुछ खनिज- माटी निकाले बर घलो विनती के भाव विनम्रता भरे सीख देथे -


"यत्ते भूमे विख्नामि क्षिप्रं तदपि रोहतु। मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमर्पिपम्॥"


हे धरती दाई! "अपन आवश्यकता बर मैं तोर ले जो कुछ भी खोदके निकालहूँ (जइसे खनिज, माटी), वो वोतकी जल्दी वापिस भर जाय।" मैं जाने-अनजाने मा घलो तोर  हिरदे मा कोनो घाव नइ पहुँचावँव। ये मंत्र जंगल के  कटई अउ अधिक खनन ल रोके के चेतावनी देथे।  आदिकाल अउ वैदिक काल मा मानव प्रकृति के दोहन नइ करत रहिन बल्कि जीवन के अधार मान के श्रद्धा विनम्रता के भाव ले प्रकृति ल पूजत रहिन। भौतिक सुख-सुबिधा ल कम रख के प्रकृति के संग जिनगी के मजा लेवत रहिन।

फेर आधुनिक काल के बढ़त समे बिकास के ये दउर मा मनखे के भाव मा धीरलगहा नवा बदलाव आय लगिस। आज के आधुनिक अउ तकनीकी जुग मा जिहाँ मनखे हा अभूतपूर्व तरक्की करे हे, उहें दूसर कोती हमन एक गम्भीर संकट के डहर बढ़त हन। 

     आज मनखे प्रकृति के प्रति उपयोगितावादी भाव रखत हें। मनखे मन प्रकृति ल अपन सुख-सुबिधा अउ आर्थिक बिकास के जरिया मानत हें।  जंगल-भुइयाँ, नदिया-नरवा, रुख-राई डोंगरी-पहाड़ के पूजा तो करत हें फेर इंकर दोहन अपन जरूरत ले जादा करत हें। स्वामित्व के भाव रख के विज्ञान अउ तकनीक के प्रगति के कारन इंसान के भीतर ये भरम पइदा हो गे हे कि वो प्रकृति ऊपर नियंत्रन कर सकथे। आज मनखे अपन आप ल प्रकृति के रक्षक बने के बजाय वोकर स्वामी समझे लगे हें।

   कल-कारखाना, मशीन, शहरीकरन अउ संसाधन मन के अंधाधुंध उपयोग हा धरती के संतुलन ल जम्मो ढंग ले हिला के रख दे हे। अइसन मा पर्यावरन के संबरधन करना सिरिफ गोठ-बात के बिसय नइ हे, भलुक(बल्कि) हमर जीयत रहे बर अब्बड़ जरूरी होगे हे।

पर्यावरन संकट -

हमर पर्यावरन प्रमुख रूप ले मनखे के काम-बूता के कारन खतरा मा हे। रुख-राई के अंधाधुंध कटई, सीमेंट-कंक्रीट के जंगल बनाय बर अंड-संड (गलत-सलत)  ढंग ले रुख-राई मन ल काटे जावत हें, जेकर ले जंगली जिनावर मन के रहे के ठउर उजरत हे अउ हवा मा जहर घुरत हे। एकरे संग-संग

पानी, हवा अउ भुइयाँ, तीनों स्तर मा बढ़त प्रदूषन अपन चरम मा हे। फैक्टरी मन के रासायनिक गंदा  पदार्थ, पानी हा नदिया-नरवा मा मिलत हे, अउ गाड़ी-घोड़ा अउ कारखाना मन के धुआँ हा हवा ल जहरीला बनावत हे।

            प्लास्टिक के जादा उपयोग जेन प्लास्टिक अइसन कचरा आय जेकर नाश कभू नइ होवय। ये हा हमर माटी के उपजाउ पन ल नष्ट करत हे अउ पानी म रहइया जीव मन के जान के दुश्मन बन गे हे।

धरती के बढ़त घाम (ताप ग्लोबल वार्मिंग), खराब गैस मन के जादा निकले के कारन धरती के तापमान ल सरलग बढ़ात हे, जेकर ले पहाड़ के बरफ हा पिघलत हे अउ मौसम के चक्र ह पूरा बिगड़ गे हे। मनखे प्रकृति के बिकट दोहन करके अपने पाँव मा टँगिया मारत हे। मनखे ल अब पर्यावरन ले शुद्ध हवा,पानी माटी, नइ मिल पावत हे। चारो कोती प्रदूषन के दुर्गंध नाक मुँहु ल चपके मा मजबूर करत हे।

अब सवाल खड़ा होथे कि-

 *कइसे बाचही पर्यावरन?*पर्यावरन बचाना काबर जरूरी हे?

पर्यावरन के सीधा जुड़ाव हमर जिनगी ले हे। यदि पर्यावरन सुरक्षित नइ रही, त मनखे के जिनगी के कलपना घलो असम्भव हे। साफ हवा अउ निरमल पानी के बिना मनखे समाज हा गंभीर  बीमारी के शिकार होवत हे। 

जैव विविधता ल बनाय रखे बर रुख-राई अउ पशु-पंछी मन के जीयत रहना जरूरी हे। |

यदि हमन आज ये प्रकृतिक संसाधन मन ल नइ बचाबो, त अवइया पीढ़ी बर सिरिफ आफत अउ बिनाशेच बाचही। जीवन जीना मुस्कुल हो जही ।

हमन खुद के मिहनत अउ जागरुकता ले पर्यावरन ल बचा सकथन। पर्यावरन बचाना सिरिफ सरकार या बड़े संस्था मन के बुता नइ आय। एक सियान अउ सजग नागरिक होय के नाते हमन अपन रोज के जिनगी मा नान्हे-नान्हे बदलाव करके बड़का सुधार के काम कर सकथन। जइसे-


रुख लगाना संस्कार बनावन:- जिनगी के कोनो भी खास मउका मा (जइसे छट्ठी, जनमदिन या तिहार)  कम ले कम एक ठन रुख जरूर लगावन अउ ओला बड़े करत तक संजो के रखन। "एक रुख, सौ बेटा बरोबर" के गोठ ल सार्थक करन।

पानी के एक-एक बूंद बचावन:- पानी ल फोकट मा झन बहावन। पानी अउ बरसाती पानी ल सहेज के रखे के उपाय  ल बढ़ावा देवन।

उपयोग होवइया प्लास्टिक' ल कहिबो 'ना':-हमन हाट बजार जावत बखत संग मा कपड़ा या जूट के झोला धर के जावन। प्लास्टिक के झिल्ली-पॉलीथिन के बहिष्कार करन।

बिजली के सही उपयोग:- बिजली बचावन। जरूरत नइ रहे मा पंखा, लाइट अउ टीवी-कंप्यूटर बंद रखन। जहाँ तक हो सके, सुरुज के उरजा (सौर ऊर्जा) जइसन साधन मन ल अपनावन।

कचरा ल संजोवन:-  सुक्खा अउ गिल्ला कचरा ल अलग-अलग रखन। घर के थोर-बहुत कचरा ले घर मा  खातू बनाय के उदिम करन। अउ अपन सेहत ल बचावन, फसल मन ल, रसायनिक पदार्थ ले बचावन।

प्रकृति ल दोहन के विषय न मानन:- आदिकाल अउ वैदिक काल के जइसे प्रकृति ल सनमान मिलय वइसने आज घलो  मान देवन। प्रकृति के कोनो भी जिनिस ल, अपन जागीर नइ समझन ओकर सही ढंग ले उपयोग करके रक्षा करन।


        पर्यावरन हा हमर दाई महतारी बरोबर आय, जे हमन ल जिनगी देथे। यदि हमन एकर नुकसान करबो, त आखिरी मा हमन अपन खुद के बिनाश करबो। आज बखत के माँग हे कि हमन तरक्की घलो करन अउ कुदरत प्रकृति ल घलो बचा के रखन। प्रकृति के रक्षा च मा हमर अउ ये धरती के सुरक्षा हे। आवव, हमन सबो मिलके संकलप लेवन कि हमन प्रकृति के शोषन नइ, भलुक ओकर पोषन करबो।

            ‘प्रकृतिरेव शरणम्’।

प्रकृति हा हमर असली आश्रय सहारा  हरे।

            ‘वृक्षो रक्षति रक्षितः’।

 जब हमन पेड़-प्रकृति के रक्षा करबो, त प्रकृति हमर रक्षा करही।

आवव मिलके “भुइयाँ ल हरियर बनावन, पर्यावरन बचाके जिनगी सुधारन।"



डॉ पद्‌मा साहू ‘पर्वणी’

 खैरागढ़

 छत्तीसगढ़

हमर संस्कृति के चिन्हारी गहना - गुरिया

 हमर संस्कृति के चिन्हारी गहना - गुरिया


धरती दाई के अँचरा ल निहार के देखबे, त प्रकृति के अद्‌भुत सुघरई, सब ला अपन कोती खींच लेथे । ओरी-ओर रिकिम-रिकिम के पेड़, सबके आने-आने सुग्घर-सुग्घर फूल पात । दूर-दूर तक फइले जंगल, खेत- खार, कल-कल करत झरना, घाटी, नरवा,नदिया इहाँ के सुग्घर अलग-अलग बनावट । रहन-सहन, कोस-कोस म बदलत बोली । प्रकृति अलग-अलग रूप म सबके मन ल मोह लेथे । बिहिनिया होत ही सुरुज के सोनहा बिहान ह मानो धरती के चराचर जीव जगत उठावत हें। ओस के बूंद-पाना म मोती कस चमकथे। चिरई-चिरगुन के मीठ आवाज ले-मन आनंदित हो जथे, तभे तो अइसन अद्‌भुत सुघरई ल देख मयूर तको नाचे ले धर लेथे । अउ जब भारत भुइर्याँ के श्रृंगार के गोठ करथन त प्रकृति के मनोहारी सुघरई, आँखी के आगू झूले ले धर लेथे। उत्तर कोती हिमालय मुकुट कस सऊँरे, तीनों-डाहर समुद्र के लहर जइसन महतारी के गोदी म अठखेली करत हे। हरियर धरती धानी अइसे लागत हे, जइसन पूरा धरती के सुघरई ल अपन अँचरा म समा ले हे। जब इतिहास के पन्ना ल हम पलट के देखथन त सुग्घरता-चाहे काँहीं भी जिनिस के होवय, अपन कोती जरुर खीचथे अउ प्रकृति तो स्वयं म कतेक सुग्घर हे।तभे तो कइथे न--

-सत्यम, शिवम, सुंदरम ।

अउ जब छत्तीसगढ़ महतारी कोती ल देखथन त छत्तीसगढ़ महतारी सुग्घर हरियर लुगरा पहिरे सोला सिंगर करे माँग म सेंदूर, बाल गजरा ले सजे, भाल म गोल बिंदी चमकत, कान म खिनवा, झुमका झूलत रहिथे,जउँन उँखर रूप ल निखार देथे। नाक म नथनी, गला म हँसली-सुतिया, हाथ म चूड़ी कंगन, बहुँटा खनखनावत, एक हाथ म हँसिया धरे - जउँन मेहनत अउ कर्मठता के चिन्हारी आय। त-दूसर हाथ म धान के सुनहरी बाली ।बदन सम्मृद्धि अउ अन्न के बरकत ल दरशाथे। कमर म  करधन, पाँव म बिछिया- पायल छन-छन करत मानो मधुर संगीत के लय बिखेरत हे। ओखर रूप ल देखके अइसे जनाथे, सोला सिंगार करे महतारी के रूप सहीच म ममता के भाव झलकत दिखथे, अउ अइसे लागथे हमर महतारी अपन लइका मन ल अपन गोदी म बइठारे हे।

देख सुग्घरता नारी मन के, दर्पण घलो लजाथें।

माथ के बिंदी, बेनी के गजरा, जब मुच-मुच मुसकाथें।

सुग्घरता तो नारी परानी के नैसर्गिक गुण हरे, अउ जब-हम प्राकृतिक सुग्घरई के बात करथन त छत्तीसगढ़िहिन नारी के श्रृंगार के सादगी विश्व म प्रसिद्ध हे।हमर संस्कृति म नारी मन के श्रृंगार करे के चलन प्राचीन काल ले चले आवत हे। ऐतिहासिक मूर्तिशिल्प म नायक-नायिका के श्रृंगार ल देख के, कतेक भाव-विभोर हो जथन  आज उही गहना सब ला प्रभावित करत हें।

इतिहास कार मन कइथे नारी श्रृंगार के प्रथा, गोदना ले शुरु होय रिहिस होही। जेन वो समे के श्रृंगार राहय । आज फेर उही ह अपन रूप बदल के आय हवय। जेला आज के पीढ़ी के लइका मन टैटू कहिथे। धीरे-धीरे फूल, मोर पाँख, कौड़ी, घोंघी, रंग बिरंग के पथरा, मोती-मूंगा जइसन जिनिस के, श्रृंगार करें ले धरिस तभे तो कहिथे न बहुत कम म श्रृंगार के जिनिस होय के बाद भी बड़ सुग्घर दिखे के प्रकृति ह नारी मन ल अइसे बनाय हें, जइसे लगथे प्रकृति ह नारी के श्रृंगार म दिखत हे।

हमर पुरखा मन इहाँ के मनखे मन बर अलग- अलग राज उँखर रहन-सहन, रीति-रिवाज के हिसाब ले पहिरे-- ओढ़े, सजे सँवारे के जिनिस बनाय हे। जेन नारी व प्रकृति-ले जोड़े राखथे अउ धीरता, परिवार बर आदर्श अउ  समरपन के भाव सिखोथे । काँहीं भी तीज तिहार, मड़ई मेला म जब महिला मन सोला श्रृंगार करके निकलथे त ओखर रूप म चार चाँद लग जथे।वइसे तो नारी अउ पुरुष दूनों अपन रूप ल सँवारे के उदिम आदिकाल ले करत आवत हे। फेर नारी मन के सऊँख पुरुष मन ले कतको जादा होथे। तभे कइथे तको नारी के सोला सिंगार करे ले सुख-समृद्धि आथे। पैरी के झुनुर-झुनुर आवाज ले घर म ऊर्जा के संचार होथे ।श्रृंगार सकारात्मकता भरथे, खुशी अउ मया-पिरित के बढ़वार करथे।

चूड़ी खनकय हाथ म, पायल गावय गीत । 

बिंदी सोहय माथ म, लागय सुग्घर मीत ॥


छत्तीसगढ़ के संस्कृति म गहना गुठा बड़ समृद्ध नजर आथे 'गहना-गुठा सिरिफ श्रृंगार भर नोहय, बल्कि ये हमर संस्कृति-परंपरा अउ पहिचान के जीयत- जागत चिन्हारी आय । गाँव-होवय ते शहर, खासकर तिहार, बर-बिहाव अउ पारंपरिक अवसर म अपन गहना ल पहिन के अपन संस्कृति ल जिंदा राखथे, इहाँ अंगरी ले लेके मुड़ी के खोपा तक नारी श्रृंगार देखे बर मिलथे । जाति सम्प्रदाय अउ क्षेत्र के हिसाब ले येमा फरक जरूर होथे। जइसन विश्व पटल म जब छत्तीसगढ़ के बात होथे, त बस्तर के नारी मन के श्रृंगार जरूर झलकथें। उहाँ के वनांछादित प्रदेश म आदिवासी-जन-जीवन प्रकृति ल पूजत आवत हे। ओखरे सेती उहाँ के श्रृंगार म तको प्रकृति झलकथे। उहाँ के नारी मन ल देखथन त सुग्घर गोदना, गोदाय, मुड़ म सीप-कौड़ी-मोर पंख लगाय, जुड़ा म फूल गजरा अउ बेनी म फुँदरा-झाबा, बनुरिया लगाय, नाक के दूनो कोती बड़े-बड़े फुल्ली पहिरे, सुर्रा कंकनी, नागमोरी अउ कनिहा म घुँघरू वाला करधन पहिरे रहिथे। आदिवासी जन जीवन म कंघी के बड़ महत्तम हे। वोमन बाँस के बने कंघी जरूर राखथे इहाँ के ग्रामीण अंचल के मन कंघी ल प्रेम निवेदन के चिन्हारी तो मानथे ।

अइसने मैदानी क्षेत्र के गोठ करथन त वो चाहे रायपुर होवय या बिलासपुर सब जगा क्षेत्र अनुसार ओकर स्वरूप म थोरको या कोनों जगा बहुत अंतर देखे बर मिलथे । फेर गहना के जेन मूल रूप हे तेन सबो जगा एके हे । पर सुग्घर दिखे के चाह तो हमर जनम जात हरे, हमर करा सोन के गहना राहय या चांदी या फेर गिलवट धातु के, फेर जेन हे-तेने म हमन सुग्घर दिखे के उदिम करते रहिथन ।

माथ माँग म मोती पहिरे, कान फभे तुरकी! 

गहना फभये नारी मन ला, झुमका अउ लुरकी। 

पहिन नाक म नथली मोती, गहना हे सुतिया।

कान खींनवा लटकन सोहय, पहिरय जब रुपिया॥

आज भी हमर पुरखा मन के चिन्हारी गहना गुठा हम ला अपन कोती प्रभावित करथे, अतका सुग्घर- सुग्घर ओखर बनावट डिजाइन आज के आधुनिक युग म तको ओखर अलग पहचान हे । अउ ये सिरिफ नारी मन के श्रृंगार के जिनिस नोहय, येकर पाछू उँखर गहिर सोच रिहिन । तभे तो शुभता के प्रतीक, सुहाग के चिन्हारी संग आज के समे म येकर वैज्ञानिक प्रमाण तको देखब-म मिलत हे।

बिहाता महिला मन सेंदूर, टिकली. चूड़ी, महुर-नखपालिश, मेंहदी, काजर, पावडर, क्रीम, मुहरंगी, कउँड़ी, पाँख, फूल अउ तो अउ कान म दवना पान खोंचे – चुकचुक से दिखत रहिथे।जइसे लुगरा पाटा के पहिरई ह अलग अलग राज के हिसाब ले नारी-के श्रृंगार म मिंझरथे । ओइसने साज श्रृंगार तको मिंझर जथे।जइसन नारी मन अपन चुंदी ल सुग्घर खोपा पारे या बेनी गाथे, पुँदरा लगाय, फूल पाँख अउ गजरा ले सजाथें-सँवारथें। अपन बेनी म चाँदी या डालडा चाँदी के पिन लगाथें। झाबा,बिनुरिया जेन ल बर बिहाव म शुभता मानथन तेन ल लगाके बाल ल सुघराथे ।नारी के साज श्रृंगार गहना केवल परंपरा अउ सुघरई भर ल नइ बढ़ावँय, बल्कि येमा वैज्ञानिक प्रमाण तको मिलथे, जेन नारी के रूप ल सजाथे- सँवारथे अउ ओखर मन ल तको संतुलित राखे म मदद करथे।जइसे

माँग टीका-  जेन ल कई जगा माँग-मोरी 'घलो केहे जाथे ये महिला मन के एकदम खास अउ पवित्र गहना आँय । ये माथा के बीच माँग म पहिरे जाथे, जेन मेर सेंदूर लगाय जाथे । माँग टीका सुघरई ल तो बढ़ाबे करथे, बल्कि ये नारी के सम्मान, गरिमा अउ सुहाग के प्रतीक तको माने जाथे। बिहाव अउ तीज तिहार बार म ये गहना नारी मन के रूप ल निखार देथें

माँग टीका जेन मेर पहिरे जाथे, वो जगा गाथा के बीच आज्ञा चक्र माने जाथे। जेन जगा म हल्का दबाव ले मन शांत अउ तनाव कम होथे। येला पहिरे ले शरीर के तापमान तको सामान्य होथे,अइसे कहिथे लोगन मन।

नथली - नथली सुहाग, सुग्घरता अउ सम्मान के चिन्हारी आय। येला पहिरे ले रूप निखर जाथे, बिहाव के बेरा नववधु के जरूरी श्रृंगार होथे। कई जगा तो नथ, बिहाव म जरूरी हो जथे । फुल्ली नथ सुहागिन मन के सुहाग के चिन्हारी हरे। ये हमर परम्परा अउ संस्कार के तको  चिन्हा आय। ये सुघरई ल तो बढ़ाबेच करथे, फेर वैज्ञानिक रूप म तको येकर प्रमाण मिलथे, नाक के बाँया हिस्सा के संबंध महिला के गर्भाशय ले होथे, काबर नाक के नस गर्भाशय ले जुड़े-होथे, जेखर ले जचकी संबंधी समस्या कम होथे।अइसने कान म-- 

करणफूल 

कई प्रकार के सुग्घर-सुग्घर कान म पहिने के खिनवा, ढार, लवंगपूल तरकी, लुरकी, आयरिंग पहिनथे । अउ अइसे कहे जाय करणफूल ले कान ढकाय रहिथे जेखर ले नारी परानी मन बुराई ल सुने ले दूर राहय।अउ कान के बाहिर म कई ठन नस जुड़े रहिथे, जेन गहना के दबाव ले दबे रहिथे, जेन गुर्दा-अउ कई अंग ल स्वस्थ राखथे । जेन ल आज के भाखा म एक्युप्रेशर पाइंट कहिथे ।

तितरी 

तितरी अतका सुग्घर गोलहूँ, कई रंग के मोती जड़े कान के उपर भाग म पहिनथे अइसने खोटिया ल तको महिला अउ पुरुष दुनो झन पहिनथे इहू ल एके कान म पहिनय अउ सुग्घर फभय।

मंगलसूत्र 

मंगलसूत्र बिहाव के सबले पवित्र गहना माने-जाथे, ये बिहाता के सौभाग्य, सुहाग, अउ पति-पत्नी-के अटूट संबंध के चिन्हारी आय । जब वर अपन दुल्हन के गला म मंगलसूत्र पहिनाथे,त वचन लेथे संग निभाय के रक्षा करे के, जीवन भर साथ रेहे के।ये परंपरा अउ शुभता के संग मानसिक संतुलन बनाय राखथे,शरीर म सोना पहिरे ले रक्त संचार म सुधार होथे।अउ करिया पोत नकारात्मक उर्जा ल सोखथे, अइसे केहे जाथे हमर छत्तीसगढ़ के कई जनजातीय समुदाय के मन मोहर या कलदार पहिनथे, जेन सोना चाँदी या रुपिया ले बने होथे, अउ रेशम या कोसा के धागा ले गुँथाय रहिथे ।

पुतरी –

करिया या लाली पोत म गुँधाय सोना के ठप्पा रुपिया कस या गिलट के बने या सिक्का के बने होथे जेन ल महिला मन अपन छत्तीसगढ़ी वेषभूषा म पूरा गहना ल पहिनथे, अउ अपन परंपरा संस्कृति के चिन्हारी ल बड़ मया ले संजोथे।

सुतिया

ये गोल मोटा असन अउ कड़ा जइसन गला के गहना होथे, जेन गला म एकदम चिपके रहिथे, ये चांदी या गिलेट धातु ले बने गोलहूँ असन दिखथे।

सुर्रा

सुर्रा ल तको गला म पहिनथे, जेन गोल-गोल बड़े माला कस लाख म सोनहा परत चढ़े कई ठन लाल अउ कई ठन सोनहा रंग के रहिथे, जेन ल नौ या ग्यारह विषम संख्या म पहिने जाथे। जेन रेशम के धागा म गुँथाय रहिथे।अइसने हँसली, पटली, कंठा, अउ आजकल ल देखन त किसम-किसम के डिजाइन, लक्ष्मी हार, चोकर ये सब गहना हमर गला मा चिपके रहिथे तब शरीर ले घर्षण करके हमर खून के संचार ल बढ़िया राखथे।

बाजुबंद या बाँहटा –

ये हमर पुरखौती गहना आय, जेखर ले बाँहीं सजथे, जेन ल महिला मन खास मउँका म पहिनथे कुछ जगा येला पुरुष मन तको पहिनथे। ये सोना, चाँदी या गिलेट धातु ले बने, बड़ सुग्घर-सुग्घर डिजाइन के बने होथे।

नागमोरी 

नागमोरी ल तको बाँहीं म पहिनथे जेन साँप के डिजाइन असन होथे।हरैया तको येकरे एक प्रकार हरे

बहुँटा, पहुँची कंकनी करधन, पहिरे सुग्घर पुतरी।

बाँही सजे हे नागमोरी ले, अंगरी म पहिले हे मुंदरी ।

साँटी, टोड़ा, बिछिया, पैरी, अइठी हाथ के हवय गहना । 

गहना फभथे नारी मन ला, सिरतो हवय कहना।


करधन 

करधन हमर श्रृंगार के अहम हिस्सा आय। महिला  मन येला साड़ी या लहंगा के उपर, कोनो भी तीज-तिहार. बर-बिहाब म पहिनथे, लोकगीत मन म भी करधनिया के सुग्घरता के वर्णन देखब म मिलथे। (अलग अलग जगा म येकर अलग-अलग नाम तको हे) ये सोना, चांदी या कोनो भी धातु ले बने होथे, कई डिजाइन अउ कई लर के बने ये करधन सौंदर्य ल तो बढ़ाबे करथे, अउ अइसे घलो केहे जाथे, येला पहिरे ले पेट संबंधी समस्या दूर होथे। मोटापा म राहत मिलथे, महवारी के समय दरद म आराम मिलथे । 

पायल 

पायल के नामे सुनके पायल के छम-छम सुग्घर आवाज के एहसास हो जथे, जब नान-नान लइका मन घुँघरू वाला पायल ल पहिन के रेंगथे त अपने आप सकारात्मकता आ जथे। जब नवा बहुरिया के पायल के छम-छम ले घर गुँजथे त खुशी के उर्जा प्रवाहित होथे । पायल, पैरी, पाजेब तोड़ा, पैजन, जिहाँ गोड़ के सुघरई ल बढ़ाथे उहें ये हमर सुहाग के चिन्हारी संग, सेहत के तको रक्षा करथे, चाँदी के पायल उर्जा के संवाहक होथे, जेन हमर शरीर म उर्जा के संचय म मदद करथे ।उहें हड्डी ल मजबूत करके खून के संचार ल नियंत्रित करके,पाँव के दरद म आराम पहुँचाथे।

बिछिया

बिछिया ल गोड़ के अंगरी म,  खासकर अँगूठा के बाद वाला दूसरइया अंगरी म पहिने जाथे। फेर आजकल सबो अंगरी-म पहिनत हे, जेन बिहाता महिला मन के सुहाग के चिन्हारी आय, बिहाव में बिछिया पहिनाय के खास रस्म तको होथे, बिहाता महिला मन सौभाग्य के प्रतीक अपन सुहाग के चिन्हारी ल हरदम पहिने रहिथे । ये पाँव के सुघरई ल तो बढ़ाबे करथे, फेर येकर वैज्ञानिक पहलू इहू आय येला पहिरे ले गोड़ के नस सीधा गर्भाशय ले होवत हृदय तक जाथे। जेन ह गर्भाशय ल स्वस्थ बनाय रखथे, मासिक चक्र ल नियमित राखथे अउ ब्लड प्रेशर ल तको नियंत्रित करथे । अउ चांदी शरीर के उर्जा ल संतुलित करे म बहुत मदद करथे।

ये गहना गुठा मन ल जब हमन अपन दाई-परदाई मन ल पहिने देखन त कतका सुग्घर जग-जग ले दिखँय । आजो हम सिर ले नख तक गहना पहिने, सियान मन के फोटू ल देखथन त मन भाव-विभोर हो जथे ।आज आधुनिकीकरण के युग म हमर पुरखौती गहना मन अपन चमक ल थोकन खोवत जात हे। अउ  ये सिरतोन-- बात तको आय बदलाव तो प्रकृति के नियम आय। आज के भागमभाग कामकाजी जमाना म कम वजन के, कमल लागत के। नवा-नवा डिजाइन कोती महिला मन के झुकाव होवत हे। ओखर सेती वजनी भारी आभूषण म कमी आवत जात हे। पहिली मनखे मन करा नगद पइसा-कौड़ी नइ राहत रिहिस, त इही, कीमती धातु गहना उँखर पूँजी राहय । जेन ल बेरा बखत भँजा तको लेवय।

आज विकास के दौर म लोगन के आना जाना दूर-दूर शहर-यहाँ तक सात समुंदर पार म होवत हे। तेखर सेती बहुत -अकन गहना के रूप बदल गेहे, अउ हल्का-फुल्का गहना -अपन जगा ले, लेहे। अउ समय के माँग तको  इही आय, फेर अइसे भी नइ हो सकय हमर संस्कृति अउ संस्कार के वाहक गहना गूठा , कहूँ, नँदा तो नइ जही।

फेर आजो देखे बर मिलथे कई ठन सामाजिक संस्था के-महिला मन, काँहीं सामाजिक आयोजन, अपन तीज- तिहार म अपन पारंपरिक गहना-गुठा ल पहिनत हे। अउ सबो ल येला बचाय बर प्रेरित तको करत हे। हमर तो इही प्रयास-हे, हम सब ला अपन संस्कृति के संदेश देवइया, संस्कार के बोध करइया, हमर पुरखा के चिन्हारी ये गहना गुठा ल सँभाल के, सँजो के राखे के जरूरत हे।


गहना गुठा चमके देह म, मया के रंग रचावय। 

माटी के महक संग, अपनों खुशबू बगरावय।

गंगा कस पावन सुग्घर, नारी के मान बढ़ावय। 

संस्कार के सोनहा चिन्हारी, जनम-जनम संग निभावय।



संगीता वर्मा 

आशीष नगर रिसाली भिलाई

घाम "के अलग अलग नाम

 " घाम "के अलग अलग नाम  

       -मुरारी लाल साव 

बेरा याने सुरुज भगवान l घाम लेके आथे l बेरा निकलिस घाम जनाथे l रोजे घाम होथे l ऋतु बदल थे,मौसम बदलथे l उही घाम आने आने जनाथे l अभी भागत जेठ के घाम ला देखत हन,जानत हन,सहत हन l ओकर नाम जेठ हरे -जेठ के घाम l  हर महीना के घाम अपन अनुभूति कराथे l पूस के घाम के अलग आनंद l बरसात आही बरसाती घाम l घाम के संग पानी गिरे ओला कोलिहा के बिहाव घाम कहिथे l "घाम उवत हे घाम उवत हे कोलिहा के बिहाव होवत हे l,लइका मन नाच नाच के गाथे l 

"लोक जीवन म  सब अनुभूति करे हे l  अनुभव होथे ओइसन नाम धर देथन l घाम जियानिस त कहिथन जइसे -लक लक ले घाम,रग रग ले घाम,चक चक ले घाम, टक टक ले घाम,लेसलेसहा घाम,

बदरहा/ बदराहा घाम,

रउंनिया घाम, भोरहा घाम,

 कोवंरहा घाम,कुंवरहा घाम,फुसफुसहा घाम,जोरदरहा घाम,मँझनीहा घाम,संझाउती घाम l आखिर म येदे अउ सुरता आगे  चर चरहा घाम l

सुरता राखे रहू अउ बताहू l

हमर छत्तीसगढ़ी कतका पोठ हे है ना l

-कुम्हारी जिला दुर्ग

बरी*

 *बरी*

बरी के नाम सुनबे तेमे मुहूं मे पानी आ जथे। बरी किसम किसम के होथे।रखिया बरी, पोंगा बरी, अदौरी बरी, सोयाबीन के बरी।फेर सबके सुवाद अलग-अलग होथे,जनाथे। बरी बनाना बड़ पिचकाट के काम आय।वइसे बरी ल कोनो साग संग मिझार के रांध सकथन।फेर बरी के नाम लेथन त फट ले आलू बरी,मुनगा बरी,के नाम आथे।नेंग नत्ता बर घलो बरी के बड़ महत्ता हे। बेटी के बीदा बर, छट्ठी भात म ऐकर नेंग बिना अधूरा रहिथे।

    बरी कहिथन त एक ठन जेल वाले बरी घलो होथे।ये हर भागमानी विशेष किरपा पवइया मन ल मिलथे।जईसे कोनो ल सोला सोमवारी उपवास के पाछु वर मिलथे।अऊ कई झन के बाते अलग रहिथे।फुटहा करम के फुटहा दोना पानी बोहागे चारो कोना। कोनो ह जेल  गेहे एकर मतलब समझ सकथन वो हर कोनो बने कारज तो नी करे होही। बरी कस इंखरो बड़ कैटेगिरी होथे। कोनो गांजा बरी, कोनों दारू बरी, कोनो मडर, अपहरण बरी, कोनो यौनशोषण बरी।गरिबहा (छुटभैया)मन सिरिफ बरी होय के सपना देख सकत हे।अऊ सपना देखे के अजादी तो गरिबे मन ल हे।ठोसहा मन तो सीधा बीसा लेथे। व्यवस्था,बेवस्था म बीजी हे। व्यवस्था बेवस्था के आगू नतमस्तक हे।वो तो गांधारी के  भाग, समझदारी ( किस्मत)रिहिस जेन अपन आंखी म पट्टी बांध लिस अऊ अपन बेटा मन के पाप ल अपन आंखी ले नी देखिस। व्यवस्था के लीला अपरंपार हे जवान ठोसहा मन बरी अऊ चौरासी बछर के बुढ़वा जेल तरी।हो सकत हे सोला सोमवारी मे एकातठन ल भुला गे रिहिस होही।

     कोनो एकात घांव जमानत म बरी होवत हे त कोनो बरी पुट बरी होवत हे।जेन मन बरी पुट बरी होवत हे इही मन भागमानी आय। विशेष किरपा वाले। जेकर लउठी तेकर भइंस।

तमाम सबुतों और गवाहों को देखते हुए 

ठट्ठा दिल्लगी म कही सकत हन कानून सब बर बरोबर होथे?


   कहीं दीप जले कहीं दिल 

   कही जले फटे नोट  मिल।

           फकीर प्रसाद साहू 

                  सुरगी 🙏

नानकुन कथा - " गुपती के राज "

 नानकुन कथा -

   "  गुपती के राज "

हमर सियान बबा नवा नवा तरीका अजमावत रहितीस l ए दफे देखेन l ओकर कनिहा म एक ठन गुपती खोचाये रहिस l गुपती थैली ला कहिथे l चौबीस घंटा लटके रहितिस l गुपती के भीतर पइसा कौड़ी चाबी कुची कुछु नइ रहय l तभो ले फूले रहय l नाती नतनिन म झाँक झाँक के छुवय देखय l "एमा का धरे हस बबा, बताना " कहिके पूछय l एक दिन गुपती ओसक गे रहिस l फेर पूछिस एतो ओसक गेहे कुछु नइये हे l अब बताना गो!

तब सियान बबा कहिथे -" तोर डोकरी दाई के मुँह फूले रहय त मोर गुपती फूले रहय अब ओकर मुँह ओसक गे त गुपती घलो ओसक गे l सब हाँसे ला धर लीस l पहिली रोना धोना रहिस त फूले रहय,हमर घर म हाँसी ख़ुशी समागे हे अब तो l

  मुरारी लाल साव, कुम्हारी

छत्तीसगढ़ी के अमर गीतकार - लक्ष्मण मस्तुरिया

 पुरखा के सुरता   


7 जून - जयंती म विशेष 


    छत्तीसगढ़ी के अमर गीतकार - लक्ष्मण मस्तुरिया 


                       मोर संग चलव रे, मोर संग चलव जी… मंय छत्तीसगढ़िया अंव… पता दे जा रे गाड़ी वाला… पड़की मैना… मंगनी म मांगे मया नइ मिलय… मन डोले रे माघ फगुनवा… घुनही बंसुरिया… सोना खान के आगी… जइसे गीत के लिखइया जन कवि स्व. लक्ष्मण मस्तुरिया के 7 जून के 77वीं  जयंती हे।मस्तुरिया जी हा अपन अपन गीत, कविता अउ गायन के माध्यम ले छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान ला जगाइस अउ सुग्घर ढंग ले अपन हक खातिर लड़े के रद्दा बताइस। वोकर गीत म एक डहर छत्तीसगढ़ महतारी के गजब बखान हे त दूसर कोति छत्तीसगढ़वासी मन के भोला पन के वर्णन के संगे- संग किसान, मजदूर ला जगाय के उपाय हे।

जिनगी भर छत्तीसगढ़िया मन के मान मर्यादा बर लड़इया अइसन क्रान्तिकारी कवि अउ गीतकार

के जनम बिलासपुर जिला के मस्तुरी गाँव म 7 जून 1949 के होय रिहिन हे।शुरुआत के जिनगी गजब संघर्ष ले बीतिस।फेर  राजकुमार कालेज रायपुर

म शिक्षक के रूप म अपन सेवा दिस. बाद म हिंदी विभागाध्यक्ष घलो रिहिन।

जउन मन ह दाउ रामचन्द्र कृत चंदैनी गोंदा ल अपन खूब मिहनत ले ऊँचाई तक पहुँचाइन वोमा लक्ष्मण मस्तुरिया ह प्रमुख रिहिन हे। लक्ष्मण मस्तुरिया ह चंदैनी गोंदा के गीत अउ गायन पक्ष ल गजब सजोर बनाइन।

मस्तुरिया जी के लिखे अउ गाये

गीत ह जनता के बीच गजब लोक प्रिय होइस । छत्तीसगढ़ के आकाशवाणी केन्द्र मन म उंकर गीत ह खूब चलिस।रायपुर दूरदर्शन म गीत प्रसारित होइस। मस्तुरिया जी के गीत ल सुन के मन ह खुशी से झूमे लागथे त कतको गीत ह छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान ल जगाय के काम करिन। मस्तुरिया जी के गीत के खूब आडियो अउ वीडियो रूप बनिस। पान ठेला, होटल के संगे संग बर बिहाव, षट्ठी, कोनो भी सार्वजनिक कार्यक्रम म मस्तुरिया जी के गीत रंग झाझर मंता देय।मस्तुरिया जी के गीत ल सभा -संगोष्ठी म बजा के / गा के जनता म जोश भरे जाथे।स्कूल /कॉलेज के वार्षिक समारोह म मस्तुरिया के गीत ह कार्यक्रम म जान डाल देथे।

लक्ष्मण मस्तुरिया के बारे म डॉ. बल्देव जी ह लिखथे –“लक्ष्मण मस्तुरिया हमर अग्रज कवि हरि ठाकुर जइसन वीर अउ ऋंगार, क्रांति अउ पीरित के अद्वितीय गायक आय .कहूँ -कहूँ उन बहुत करीब हे, लेकिन शैली के थोर बहुत अन्तर तो रहिबेच करही”।

छत्तीसगढ़वासी मन के स्वाभिमान ल वो कइसे जगाइस वोकर उदाहरण देखव                              –सोन उगाथौं माटी खाथौ ।

मान ल देके हांसी पाथौ ।।

खेती खार संग मोर मितानी ।                                                           घाम मयारु हितवा पानी ।।


मोर इही जिनगानी मंय नगरिया अंव ग

किसन के बड़े भइया हलधरिया अंव रे …

झन कह मोला लेढ़वा डोमी करिया अंव ग

सिधा म सिधा नइ तो डोमी करिया अंव रे…

मैं छत्तीसगढ़िया अंव रे…


मोर संग चलव गीत म वोहर छत्तीसगढ़िया मन ल जगाय के काम करथे. बिपत संग जूझे बर कहिथे.

मोर संग चलव रे, मोर संग चलव जी

वो गिरे थके हपटे मन अउ परे

डरे मनखे मन

मोर संग चलव रे, मोर संग चलव ग

बिपत संग जूझे बर भाई मंय बाना बांधे हंव ।

सरग ल पिरथी म ला देहू प्रन अइसे ठाने हंव ।।

मोर सुमता के सरग निसेनी जुरमिल सबो चढ़व रे….

मोर संग चलव रे, मोर संग चलव जी…

मस्तुरिया जी के ऋंगार गीत ल सुन के मन ह मयूर जइसे नाचे ल लगथे. अंतस ह मगन हो जाथे.


पता दे जा ले जा गाड़ी वाला रे

तोर नाम के तोर गाँव के तोर काम के…

पता दे जा…

जियत जागत रहिबे बयरी

भेजबे कभू ले चिठिया

बिना बोले भेद खोले रोये

जाने अजाने पीरीतिया

बिन बरसे उमड़े घुमड़े

जीव मया के बयरी बदरिया

पता दे जा रे गाड़ी वाला…

अइसने “पड़की मैना “गीत ल सुनके हिरदे ल गजब उछाह लागथे.


वारे मोर पड़की मैना, तोर कजरेली नैना

मिरगिन कस रेंगना तोरे नैना

मारे वो चोंखी बान, हाय रे तोर नैना…


वियोग ऋंगार रस मा मस्तुरिया के गीत ल सुन के मया करइया मन के आंसू ह टपक जाथे.


काल के अवइया कइसे आज ले नइ आये

तोला का होगे, रस्ता नइ दिखे बइरी तोर…

का कहूं रस्ता म काहीं अनहोनी होगे

का कहूं छोड़ मया ल संगवारी जोगी होगे

घेरी बेरी डेरी आंखी कइसे फरकाये

तोला का होगे, टीपकी टीपकी आंसू गिरे मोर…


अइसने अउ उदाहरण प्रस्तुत हे..


सरी रतिहा पहागे तैं नइ आये रे

तोला घेरी बेरी बइरी मंय सपनायेंव रे…

अइसन का होगे काम

भूलिगै देह ल परान

का तो महि हौं अभागिन

अपने होगे आन

आ आ नींद बइरी आंखी ले उड़ि जाय रे…


शोषण करइया मन ल मस्तुरिया जी खूब ललकारय .

हम तो लूट गयेन सरकार तुंहर भरे बीच दरबार

खुल्लम -खुल्ला राज म तुंहर अहा अत्याचार

रइहो रइहो खबरदार…

हाय विधाता दिन -दिन बाढै देस म अत्याचारी

परमिट वाले डाकू भइगे जन सेवक सरकारी

सुतरी सुतरी छांद फांद के लूटै पारी -पारी

हांस रे लछमन करम ठठा नइ रोवे म उबार

हम तो लूट गयेन सरकार तुंहरे भरे बीच दरबार…


मस्तुरिया जी ह “सोनाखान के आगी” म शहीद वीर नारायण सिंह के वीरता ल गजब सुग्घर ढंग ले प्रस्तुत करे हवय .


फेर सुरता आगे उही प्रन के ।                                                        फरकिस भुजा बरन ललियाय ।।                                                          आंखी जले लगिस लक लक l                                                              कटरै  दांत , बदन अटियाय  !!                                 


नहीं नहीं संगी ये मरना तो ।

कायर अउ मन हारे के ।।

मोर जिनगी मोर परजा खातिर।

जे मोला मुखिया माने हे ।।


जमींदार मंय सोना खान के ।

सोना उपजै मोर माटी म ।।

जिहां के भुंईधर भूख मरत हे ।

आग बरै मोर छाता म ।।


रचनायें… 

मस्तुरिया के रचना म हमू बेटा भुइंया के (काव्य संग्रह),

चंदैनी गोंदा में लक्ष्मण मस्तुरिया के गीत ,छत्तीसगढ़ के माटी (छत्तीसगढ़ दर्शन ),सोना खान के आगी, माटी कहे कुम्हार से (निबंध संग्रह) अउ घुनही बंसुरिया (गीत संकलन) प्रमुख हे।

मस्तुरिया जी ह सन् 2000 मा बने मोर छइंहा भुइंया, मंजरी सहित कतको छत्तीसगढ़ी फिलिम बर गीत लिखे के सँगे सँग गायन करिन।

कछ बेरा तक लोकासुर मासिक पत्रिका के संपादन घलो करिन।


सम्मान –  छत्तीसगढ़िया जन जागरण के अग्रदूत मस्तुरिया जी ल राज्य सरकार द्वारा जउन सम्मान मिलना रिहिस वो नइ मिल पइस. आंचलिक साहित्य म गजब लिखइया साहित्यकार मन ला शासन द्वारा पं. सुंदर लाल शर्मा सम्मान देय जाथे. वहू नइ देय गिस।जबकि मस्तुरिया जी के कई ठन गीत ह छत्तीसगढ़ के स्वभिमान गीत हरे।पृथक छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन के समय मस्तुरिया के गीत मोर सँग चलव रे… मयँ छत्तीसगढ़िया अवँ …ह शंखनाद के काम करिन।  मस्तुरिया जी ह जनता के प्यार ल सबसे बड़े सम्मान माने. एक चैनल म इंटरव्यू देत समय पूरा दम खम के साथ येला बोले रिहिन हे।

                        हमर छत्तीसगढ़ के कतको साहित्यिक अउ सांस्कृतिक संस्था मन हा मस्तुरिया जी ल सम्मानित करिन येमा छत्तीसगढ़ी काव्य भूषण, लोक स्वर, विशेष प्रतिभा सम्मान, स्व. ठाकुर प्यारे लाल सिंह सम्मान, छत्तीसगढ़ी विभूषण, सृजन सम्मान, रामचंद्र देशमुख बहुमत सम्मान शामिल हे।


  रेडियो म मस्तुरिया जी के गीत ल ननपन ले सुनत हन।गिने चुने जउन गीतकार, गायक मन जनमानस म अपन अलग प्रभाव छोड़िस वोमा लक्ष्मण मस्तुरिया प्रमुख रिहिन हे ।                      मस्तुरिया जी के कवि सम्मेलन म अब्बड़ मांग रहय।छत्तीसगढ़ के सबो प्रमुख शहर अउ कतको गाँव म वोहा काव्य पाठ करे हे।मस्तुरिया जी के लोक प्रियता ल देख के भीड़ भाड़ ल रोके बर वोला आखिरी डहर काव्य पाठ म आमंत्रित करे जाय।मंय हा  मस्तुरिया जी ल  कन्हारपुरी राजनांदगांव,लखोली, राजनांदगांव म आयोजित कवि सम्मेलन के संगे संग छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग अउ प्रांतीय छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के प्रांतीय सम्मेलन म काव्य पाठ करत सुने रहेंव।छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के कार्यक्रम म  मस्तुरिया जी ले भेंट होय ।             मस्तुरिया जी ह 20 जनवरी 1974 म नई दिल्ली के लालकिले म गणतंत्र दिवस के अवसर म आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन म काव्य पाठ करिन। येमा देश के नामी कवि/गीतकार गोपाल दास नीरज, बाल कवि बैरागी, इन्द्रजीत सिंह तुलसी, रामावतार त्यागी, रमानाथ अवस्थी मन संग अपन प्रस्तुति दिस।वो समय मस्तुरिया जी सिरिफ 25  बछर के रिहिन हे।येहर छत्तीसगढ़ म वोकर लोक प्रियता के सबले बड़का उदाहरण हे ।

छत्तीसगढ़ के ये रतन बेटा ह 3 नवंबर 2018 म परम लोक चले गे. श्रद्धेय मस्तुरिया जी ल  सत् सत् नमन हे।


           ओमप्रकाश साहू ‘अंकुर’

         सुरगी, राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़)

मँय नदिया अँव

 मँय नदिया अँव 

मँय नदिया अँव पहाड़ ले निकल के कलकल छलछल अपन लय मा बोहावत निर्मल मीठ जलधारा अँव हाँ भई हाँ मँय नदिया अँव 

पर्वत राज मोर जनम देवइया अउ समुंदर मोर पति आय, मँय अपन महतारी के कोरा ले निकल के, कहूँ धारा के रुप म त कहूँ झरना के रूप म इठलावत, हाँसत गावत, अपन धरती-महतारी के पाँव पखारत, सब ला तर करत । सरलग बोहावत रहिथँव, अउ आखिर म अपन पति समुद्र देव के विशाल-हृदय म समा जथँव ।

तभे तो मोर प्रतिष्ठा म केहे जाथे -

"रविपीत जलातपात्यये पुनरोधेन हि पुण्यते नदी"।

मोर विशाल हृदय अउ मोर रूप ल देख के मोला नद याने दरिया तको केहे जाथे। अउ सरलग बोहावत मोर प्रवाह के सेती प्रवाहिनी, अउ सरिता नाम तको मिले हे। ये भुइयाँ म मोर अलग-अलग रूप के सेती, मोर लइका मन मोर कई ठन नाँव राखे हे-

जइसे - गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी,कृष्णा, कावेरी, नर्मदा सिंधु, महानदी अरपा, शिवनाथ अइसन कई ठन नाँव मोर लइका मन महतारी के रूप म मोर बर आस्था कर पूजा-पाठ करथें । मोर मान गऊँन म कोनो कमी नइ  करय फेर महू ह, अपन लइका मन के मान राखत उँखर हर जरूरत ल पूरा करथँव चाहे वो आर्थिक होवय चाहे सामाजिक या धार्मिक सबो प्रकार म अपन लइका मन के काम आथँव ।

समाय हे मोर धार म, सभ्यता के सुग्घर कहानी ।

जल जंगल ले जिनगी चलथे, बोहाथे जब नदिया के पानी । 


मानव सभ्यता के विकास ल जब  पलट के देखथन त, सिरतोन म जीवन के आरंभ पानी ले होय हे । अउ जब पृथ्वी के निर्माण होइस । तेखर कई बछर बाद धरती याने थल भाग के निर्माण होइस, अउ ये थल भाग म जिंहाँ जलधार बोहावत रिहिस, उही ल आगू चलके नदिया के नाँव ले जाने गिस । हमर पौराणिक साहित्य म नदिया ल महतारी अउ पहाड़ ल पिता केहे  हे,काबर ये पहाड़ पिता बरोबर विशाल ह्र्दय धीर,अडिग,हम सबके रक्षा बर खड़े रहिथे,अउ नदिया कलकल, छलछल बोहावत रसवंती सरस्वती दाई हरे ।

अगास म घुमरत बादर जब बरसा बनके बरसथे तब धरती दाई वोला अपन कोरा म समेट लेथे, अउ इही जल  नदिया म जाके बोहावत रहिथे"

जइसे हमर शरीर के नस म लहू दउँड़त रहिथे ओइसने धरती के लहू बनके ये नदिया मन बोहावत रहिथे। जेन घरती म नव ऊर्जा भरथे।

नदिया के अमृत पानी हमर जीवन के वरवान । 

बार-बार वंदन करँव मँय, सींचय सकल जहान ।


हम देखबे करथन विश्व पटल के थल भाग म कोनो न कोनो नदिया बोहावात रहिथे । आदि काल ले ही नदिया ह महतारी असन हमर पालन पोषण करत आवत हे । धरती दाई संग मनखे, पशु-पक्षी, जीव जनावर, प्रकृति अउ  पूरा समाज के सम भाव ले प्यास बुझावत हे। 

अउ जब हम सभ्यता के बात करथन त हर सभ्यता के शुरुआत नदी के तीर म होय हे जइसे सिंधु घाटी के सभ्यता नील नदी के सभ्यता । ओखरे खेती भारत भुइयाँ ल शस्य श्यामला तको केहे जाथे।

जल बिना हम जिनगी के कल्पना तको नइ कर सकन । ओखरे सेती आदि मानव पहाड़ जंगल ले निकल के, नदिया के तीर म बस्ती बनाय ले धरिस, जिहाँ निस्तारी पीये के पानी ले लेके सबो निस्तारी संग खेती के शुरुआत होइस, धीरे-धीरे विकास के रद्दा गढ़त गाँव अउ शहर बनिस । आज हम देखथन दुनिया के बड़‌का ले बड़‌का शहर नदी या समुंदर के तीर म बसे हे अउ विकसित होय हे, जइसे टेक्स नदी के तीर म लंदन हे, सोन नदी के तीर म पेरिस । भारत म भी गंगा नदी के तट म पटना,वाराणशी कलकत्ता, इलाहाबाद यमुना के तट म दिल्ली अउ जब हम छत्तीसगढ़ के बात करथन त खारून के तट म रायपुर, शिवनाथ के तीर म दुर्ग,अरपा के तीर म बिलासपुर,इन्द्रावती के तीर जगदलपुर अइसने नदिया के तीर-तीर जगा जगा गाँव अउ शहर बसे हे,जे मनखे मन के विकास के कहानी बतावत हें।हम धार्मिक क्षेत्र ल देखन या आर्थिक क्षेत्र ल सबो कोती हमर जीवन के आधार बने हे नदिया 

देथे नदिया सीख हम ला, बाधा ले काबर डरना । 

आवय कतको बाधा इहाँ, तभो कलकल बहते रहना ॥

गंगा, गोदावरी यमुना, सतलज, सिंधु कावेरी, सरयु, कालिंदी, महानदी,शिवनाथ, अरपा, पैरी

सब नदिया के आने-आने नाँव हें, सब सरलग बोहावत हें। फेर कखरो के धार शांत, धीर त कोनों के तेज, कोनो अथाह हे त कोनो सकेला कोनो गहिर त कोनो उथली । सबके अलगे-अलगे गाथा हावय –जइसन हम पावन गंगा मइया के बात करन, राजा भगीरथ के घोर तप ले गंगा मइया ल सरग ले धरती म आय ले पड़िस । जेखर अतका प्रचंड वेग के सेती, भोलेनाथ ल अपन जटा म धारण करें बर पड़िस । अउ येकर जल अतेक पवित्र हवय  कोनो भी पूजा अनुष्ठान गंगा जल बिना पूरा नइ होवय।

* वाल्मीकि रामायण म उल्लेख हे, गोमती नदी करा, गाय मन चरत घुमत राहय, अउ इही गाय के झुण्ड के सेती एखर नाँव गोमती पड़‌गे।

अइसने यमुनोत्री करा ले निकले यम के बहिनी होय के सेती यमुना नदी नांव पड़‌िस। ।

सिंधु नदी के नाँव ले हिंदू अउ हिंदुस्तान के नाँव हमर देश ल मिलिस 

सरस्वती नदी के नाँव माता के नाँव लेहे। गोदावरी नदी बड़ पबरित अउ गउ माता कस सब ला अमृततुल्य जल देवइया, गौतम ॠषि एला धरती म लाय हे। तेखर सेती येला गौतमी नदी तको केहे जाथे। 

*अइसने महानदी के नाँव द्वापर युग म चित्रोत्पला रिहिस। महानदी के नाँव श्रृंगी ॠषि के प्रिय शिष्या महानंदा के नाँव म रखे गेहे ।

अइसने सबो नदी के अलग-अलग नाँव अपन सुग्घर कहानी ये भुइयाँ म गढ़े हे, अउ अतेक पवित्र, तभे तो नहाय के समे हमन ये पक्त्रि नदी के नाँव लेवत ओखर जल के सुरता करत अपन-अपन भाव रखत पवित्र जल म नहा के अपन देह ल पुण्य के भागी मानथन । 

अउ कहिथन - गंगे च यमुने चैव, गोदावरी सरस्वति ।

नर्मदै सिंधु कावेरी, जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु ।


अउ जब अर्थतंत्र के गोठ करथन त आदि काल ले नदिया हमर जीवन जीये के सहारा बने हे। काबर इही नदिया ले हम ला पीये के पानी मिलथे। पशु-पक्षी, पेड़-पौधा के प्यास बुझाये के संग म खेती बारी बर सिंचई के पानी मिलथे, अउ कृषि तो हमर देश के आधार आय। प्राचीन समय ले ही नदी आवागमन अउ व्यापार के माध्यम रिहिस। आप मन सुरता करव जब सड़क मार्ग के सुविधा नइ रिहिस त घाट म डोंगा ही सबों के सहारा बनय जेन आज मनोरंजन अउ नौका बिहार तक सिमट गेहे,आज सड़‌क अउ वायुमार्ग होय ले गाँव अउ शहर तीर जल मार्ग के उपयोग कम होगे हे, फेर समुन्दर तीर म बड़‌का बड़‌का बंदरगाह हे जिहाँ रोजगार होवत हे भारी भरकम सामान के आयात निर्यात इही मार्ग ले होवत हे। नदी म बने बांध के जलस्रोत ले-बिजली उत्पादन होवत हे, सबो जगा औद्योगिक क्षेत्र म नदिया के पानी ल उपयोग करत हे । अउ अइसन कई ठन रोजगार जेन नदी के तीर म—पनपे हे, अउ उहाँ के विकास ल ऊँच अगास में पहुँचावत हे।


गंगा यमुना सरस्वती, सिंधु कावेरी के धार ।

नमन करव नदी महतारी ला, इही जिनगी आधार ॥

अउ जब हम सामाजिक काम कारज कोती ल देखथन त मनखे के जिनगी म अइसे कोन्हों संस्कार नइये जेन नदी ले जुड़े नइ होही, तभे तो लईका के जनम ले लेके मुंडन संस्कार म बाल ल अर्पण करे ले लेके, मृत्यु के समय अस ठंडा करे तक सबो संस्कार नदिया के जल बिना पूरा नइ होवय। ओखरे सेती तो कहिथे भी न जल ले जिनगी शुरू होथे, अउ जल म ही समाप्त होथे।तभे तो हम नदी ल मेरुदंड तको कहिथन । काबर हमर सभ्यता संस्कृति, रीति-रिवाज नदी तीर म ही सम्पन्न होथे। आदि प्राचीन काल म ॠषि मुनि मन नदी के तीर म ज्ञान प्राप्त करे हे।पवरित नदी के तीर म हमर आस्था के चिन्हारी मेला,मड़ई, कुंभ तको होथे जेन कोनो परख ले  कम नइ राहय, लाखो करोड़ भक्त श्रद्धालु पावन नदी म कुंभ नहा के पुण्य लाभ पाथे माघी पुन्नी अउ महाशिवरात्री के बेरा नदी के तीर म मेला भराय मनखे मन के गज‌ब भीड़ अपन हित मीत सगा सोदर ले मिलेक सबके मन के उछाह देखते ही बनथे।अउ जब सांस्कृतिक महत्व के बात करथन त गीत-संगीत म कविता, कहानी बिन नदी के सुघरई ह पुरा नइ होवय ।केहे के मतलब कल्पना ल देखन, कला पेंटिंग, साहित्यक-रचना म नदी के कल-कल धार देखब म मिलथे

  कलकल-कलकल तब नदिया करय, बोहावय फरियर धार।

 बचा लव प्रदूषण ले आज येला,तभे जीवन होही खुशहाल ॥

हमर छत्तीसगढ़ म कई ठन महत्वपूर्ण नदिया हावय -जउँन ह हमर प्रदेश के जीवन रेखा कहलाथे -

जइस महानदी - सबले बड़े अउ प्रमुख नदी आय

इंदावती नदी- बस्तर के प्रमुख नदी

शिवनाथ - महानदी के सहायक नदी अउ दुर्ग जिला के जीवन रेखा आय 

खारून नदी - राजधानी रायपुर के बीच म बोहावत पूरा रायपुर ल सिंचित करथे 

अरपा नदी – बिलासपुर के जीवनदायिनी ये 

हसदेव - कोरबा के महत्वपूर्ण नदी आय

जोंक नदी - महासमुंद क्षेत्र के 

मांड नदी - सरगुजा के जीवनदायिनी

दूधनदी - कांकेर क्षेत्र के

अइसने सबरी नदी, कोटरी नदी अउ संखिनी - डंकिनी नदी बस्तर क्षेत्र म बोहाथे, जिहाँ शंखिनी- डंकिनी नदी के दंतेवाड़ा म संगम हावय, संगम मेर माई दंतेश्वरी के भव्य मंदिर हे जिहाँ माता बिराजे हे।


जब हमन छत्तीसगढ़ राज के नदिया के गोठ करयन त हमर -राजगीत स्वंय नदिया के महत्ता के गाथा गाथे -ये नदिया तो हमर छत्तीसगढ़ महतारी के श्रृंगार आय, महानदी जेन ला चित्रोत्पला के नाँव ले भी जाने जाथे।येला छत्तीसगढ़ के जीवन रेखा गंगा मैया तको केहे जाथे । महानदी धमतरी जिला के सिहावा पर्वत ले निकल के छतीसगढ़ के मैदानी भाग ल सिंचित करत उड़ीसा म बोहावत बंगाल के खाड़ी म समा जथे । छ.ग. म येकर लंबाई 286 किलोमीटर अउ पूरा लंबाई 858 किलोमीटर हवय । येकर सहायक नदी शिवनाथ पैरी, सौंढूर, जोंक, मांड, बोरई, हसदेव, कैलो अउ ईब हरे। महानदी म उड़ीसा म बड़ विशाल -हीराकुंड बांध बने हे । महानदी बेसिन म कई टन जल विद्युत-परियोजना हे, जेखर ले हमन ल बिजली मिलत हे। महानदी म ही गंगरेल परियोजना, हसदेव नदी म बांगो बिलासपुर म जल विद्युत-परियोजना, संबलपुर जिला म हीराकुंड जल विद्युत योजना-सिकासेर जल विद्युत परियोजना । नदिया म बने ये सब परियोजना देश विकास के आज गाथा गढ़त हे ।

महानदी -के पानी ले खेत खार लहलहाबे करथे, फेर महानदी हमर धार्मिक - सांस्कृतिक जीवन म घलो गहिर जुड़ाव हवय। नदी तीर बसे गांव-शहर मन म तिहार बार म, पूजा पाठ अउ मेला लगे रहिथे। महानदी के पबरित  जल ल अपन जिनगी म उपयोग करथे। फेर आज के समय म महानदी घलो कई समस्या ले जूझत हें, जेला बचाय बर कई उदिम शुरू होगे हे।

महानदी अउ कई ठन नदी ल, नमामि गंगे प्रोजेक्ट-म शामिल करे गेहे। जेकर ले गंगा मईया जइसन पबरित ये  नदी के जल ह तको शुद्ध अउ निर्मल राहय ।

शिवनाथ नदी- के बारे म तो अइसे केहे जाथे ये नदी कभू नइ सुखावय, तेखर सेती ये नदी ल सदानीरा केहे जाथे, ये राजनांदगांव  जेला छत्तीसगढ़ के करधनिया, संस्कारधानी कइथे । तेखर उच्चभूमि म अंबागढ़ तहसील के पानाबरस के पहाड़ी ले निकले हे, येकर अँचरा म राजनांदगांव दुर्ग पुष्पित होवत हे । ये नदी राजनांदगांव दुर्ग बिलासपुर अउ जांज‌गीर, चापा होवत, जांजगीर के सोन लोहरसी करा महानदी म समा जथे ।

इंदावती नदी -हमर बस्तर के शान हरे, ये गोदावरी नदी के सबले बड़े सहायक नदी अउ बस्तर के सबले बड़े नदी होय के गौरव मिले हे। ये उड़ीसा के कालाहांडी पठार ले निकले हे अउ ये नदी बस्तर म 370 कि. मी बोहावत, गोदावरी नदी म समा जथे, इंदावती नदी म बहुत ही सुग्घर चित्रकोट जलप्रपात हवय जेन प्रकृति के अद्‌भुत सुधरई म एक हे।

अरपा नदी -अरपा नदी कोती देखथन त ये पेंड्रा पठार ले निकल के बरतोरी, ठाकुर देवा करा शिवनाथ म मिल जथे, पुराण म अइसे केहे गेहे 15 हजार साल पहिली इहाँ मनखे मन बस्ती बनाय रिहिस, तभे आज भी इहाँ आदि काल के पथरा के औजार मिलत हे। जेन नदी बिलासपुर के जीवन आधार रिहिस पीये के पानी ले  लेके खेती खार,साग भाजी बर किसान के सहारा राहय तेन आज शहर के गंदा पानी, कचरा अउ रेती के ढुलाई के सेती पानी के कमी के पीरा ल झेलत हे । आज ये नदी अपन आखरी साँस लेवत हे, समय राहत येकर संरक्षण बर लोगन के अउ सरकार के ध्यान जाना बहुत जरूरी हे। 

अउ हम जब ईब नदी के सुरता करथन त इही सोचथन इहाँ सोना कहाँ ले अइस होही,इहाँ सोना के कण मिलथे  जेन बहुत ही सुग्घर उपहार हरे, जेन ल उहाँ के सोन झरिया के कारज म लगे मनखे मन निकालत रहिथे। ये  नदी अपन धार  के उलटा बोहाथे याने उत्तर ले दक्षिण कोती । छ. ग. के जशपुर जिला म बगीचा तहसील के रानीझूला ले निकल के उड़ीसा म हीराकुंड बाँध के पहिली महानदी म समा जथे ।

अउ जब हम खारून नदी ल देखथन त अइसे लागथे, हमर राजधानी रायपुर येकर कोरा म बइठे खिलखिलावत अपन गौरव गाथा काहत हे। ये नदी बालोद जिला के गुरुर ब्लाक म पेटेचुआ गाँव ले निकल के 250 कि.मी बोहावत,. सिममा रायपुर जिला म सिमगा करा शिवनाथ म मिल जथे, ये करा शिवनाथ अउ खारून के संगम म बाबा सोमनाथ बिराजे हावय, सोमनाथ मंदिर प्रकृति के सुघरई के बीच बने हे,हर साल महाशिवरात्रि म मेला भराथे।

कहन तो नदिया ह मानव सभ्यता ल बसा के राखे हे, अउ ओखर कोरा म सब पुष्पित पल्लवित होवत अपन संस्कृति के गान करत हे। 

तरिया डबरी नदिया पटावत, सुखावत हवय धार । 

जीव जनावर सुसकत हवय, जल बिन मचत हे रार ।

आज जब हम नदिया पर चिंतन करथन त चिंतन नइ होवय आज बल्कि चिंता हमर माथ म उभरे ले धर लेथे। काबर इही नदिया जेन अपन कलकल धार ले सबो चराचर जीव जगत ल जीवन देवत हे,तेन आज आखरी साँस गिनत हे। या कतकोन नदिया तो अइसे हे जेन इतिहास के पन्ना म ही देखे सुने बर मिलथे । भारत म तको सरस्वती नदी जेला बचपन ले सुनत आवत हन अइसने सिन्धु नदी। फेर कहाँ हे ये नदी, विलुप्त होय के कगार म हे, त कतको प्राकृतिक परिवर्तन के खेती त कतको मानवीय सभ्यता के सेती - विकास के अंधी दउँड़ म पटागे त कतको के पाट ह सकलागे । अतका सुग्घर निर्मल नदिया अपन सुघरई ल खोवत जात हे, अउ दूसर के आँसू पोछइया ये नदिया खुदे आँसू बोहावत हे, येकर कारण चाहे औद्योगिक प्रदूषण ल काहन या बाढ़त आबादी ल नदिया ल हम जीवन दात्री मानथन, माँ कहिथन त थोकन सोच के देखव, अपन माँ ल हम अपवित्र कर सकत हन । नहीं न, अपन तीर के नदिया खारून महतारी ल देखन त गाँव शहर के बजबजावत नाली के गंदा पानी के बोझ ढोवत हे, प्रदूषण अउ अतिक्रमण के सेती, अपन असल रूप ल खोवत जात हे।पूजा-पाठ ले निकले फूल-पान ल तको नदी में ठंडा कर देथन । कई घँव सोचे बर हम मजबूर हो जथन, ये पवित्र नदी जिहाँ ले निकले रिहिस कतेक सुग्घर अउ पवित्र रिहिस,फेर मनखे मन अपन मानवीय क्रिया कलाप ले येकर पवित्रता ल नष्ट करत हे, अपन महतारी के अचरा म कचरा नइ फेकना चाही धर्म कर्म अपन जगा हे, ओकर बर अलग कुंड बना के पूजा पाठ के जिनिस ल उही म विसर्जन करना चाही । जेन बाद म खाद के तको काम आही,नदिया के शुद्ध जल ल बचाय बर सरकार तो उदिम करत हे, जइसे नदिया विकास योजना,तटबंधन,संवर्धन बर विकास बोर्ड बनाय हे फेर ये योजना मन अभी भी फलित नइ होय हे,सरकार के संगे संग हम सबो के जिम्मेवारी ये नदी जल ल शुद्ध प्रदूषण करे के उदिम म हाथ बढ़ाना चाही । 

जोड़ दव अब सबो नदिया ला, सबके प्यास बुझाही । 

कलकल-छलछल हाँसत गावत, मिलके राग सुनाही । 

बाढ़, सुखा ल नइ फटकन दय, सब सुनता के गीत गाहीं । 

खेती-खार लहराही तभे, नवा बिहान आहीं ।


आज के बदलत मौसम, पिघलत  बरफ के पहाड़, अउ-जलवायु परिवर्तन के सेती कई जगा बाढ़ त कई जगा सुखा के पीरा ल हमन झेलत रहिथन । हमर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी के अब्बड़ सुरता आथे । वो कतेक सुग्घर कल्पना करे रिहिस सबो नदी ल आपस में जोड़े के कहूँ उँखर सपना पूरा हो जतिस त हमन ला बाढ़- सुखा अउ पानी के समस्या ले मुक्ति मिल जतिस । खेती-बारी बर पानी, जल विद्युत के बढ़ोत्तरी अउ जल परिवहन पर्यटन के क्षेत्र म तको विकास होतिस । ओकर सेती नदी जुड़ाव कोती ध्यान देके बहुते जरूरत हे।

ओखरे सेती तो कहिथन न जल हे त हमन हन, जल ह जीवन आय। जल हे तभे नदिया, नरवा, झरना, जंगल झाड़ी हे, येकरे सेती धरती के सुघरई हे। जल के हम कतको धन्यवाद करन कमतीच हे। काबर जल हे  तभे तो कल हे,पूजा अनुष्ठान म सबले पहिली नदिया के जल ले शुद्धि होथे। शुभता के चिन्हारी कलश म पवित्र नदी के जल भरथन, । पीये ले लेके नहाय धोय तक सबो निस्तारी होथे, पवित्र नदिया मन के नाम ल लेके घर के जल म मिला के पूजा पाठ अनुष्ठान के जल ल तको पवित्र करथन । विश्व के रचयिता भोले नाथ अपन जटा म पवित्र गंगा मइया ल बइठारे हे । कोनो सगा सोदर अइस त एक लोटा जल म ही स्वागत होथे। मृत्यु के आखरी साँस म तको गंगा मइया के जल पियाथे, अउ मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार कर इही नदी म अस्थि अउ राख ल घलो विसर्जन करथे । काहन त ये जिनगी जल ले शुरु होके जल म ही सिरा जथे ।

नदिया- तरिया, कुँआ-बवली, चाहे होवय बादर । 

पानी हवय त मान हवय, मनखे होवय ते सागर ।


मँय, नदिया अँव । सुख होवय चाहे दुख हर कारण म मोर पबरित जल ल मोर लइका मन बउरथे ।हर शुभता के चिन्हारी मोरे जल ल मानथे । मोर मीठ-मीठ धार म मनखे अउ सबो जीव जनावर तर जथे ।तब साहित्यकार मन कहाँ पीछू रइही, मोर अद्भुत रूप ल देख उँखर ह्दय गा उठथे तब भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी के लेखनी बोल पड़थे

"नव उज्जवल जलधार, हार हीरक सी सोहती । 

विच- विच छहरित बूँद, मनु मुक्तामणि पोहती ।


ओखरे सेती मोर एक-एक झन लइका मन से बस इही -विनती हे सब जुरमिल के मोर जल ल  शुद्ध राखे के-उदिम करव । काबर मोर इही जलधारा ह समुंदर में जा के मिलथे। अउ मोर जल प्रदूषित रइही त धीरे-धीरे समुद्र तको प्रदूषित हो जाही। अउ कई घँव हम येकर  परिणाम देखथन घलो, अउ अइसने चलते रइही त स्थिति कतका  भयावह हो जही । काबर समुद्र के पानी फेर बादर बनके बरसथे  अउ उही जल ल पीये ले लेके सबो कारज म हम बउँरथन व थोकन सोंचव- अहसने रइही त हम मनखे मन सँग पूरा जीव जगत का बच पाही।अउ ये प्रकृति ल प्रदूषण ले बचाय के काम सिरिफ अउ सिरिफ हम मनखे मन कर सकत हन ।त ये डाहर चेतलग जरूर होवन, अपन संग दूसरो ल चेतलग करन अउ सरकार ल तको अरजी लगावन ।काबर जल ले ही हमर जिनगी शुरु होथे अउ जल म ही सिरा जथे ।

तभे तो कहिथन न, सुख अउ दुख जीवन नदिया के दू किनारा हरे, नदिया ल सिरिफ पानी बोहावत नदिया झन समझव, ये नदिया भारतीय संस्कृति के सबले बड़े जीवन दर्शन हरे।सुख आवय या दुख आवय, समय के धार कभू रूकय नहीं, जइसन ये नदिया के धार-कल-कल, छल- छल करत निरंतर बोहावत रहिथे ।


नदी के धार ले जुड़े हे, जिनगी के आधार।

धरती के कोरा म लिखथे,हरियर सुख के सार। 

बचालव ये धरोहर ल, प्रकृति के अनुपम उपहार।

जल रइही त कल रइही, खुशहाल रइही संसार।


संगीता वर्मा 

आशीष नगर रिसाली भिलाई

सोचे अउ गुने के बात

 दिनांक ०८/०६/२०२६



सोचे अउ गुने के बात


ऊपरवाले! ए संसार ल बना के जम्मो जड़ चेतन के डोरी के एक छोर ल अपन हाथ म धरे बने नचवाथस। पशु-पक्षी जीव-जंतु मन ल बोले के अधिकार नइ दे हस। बुद्धि घलो नइ दे हस। एक बात हे; पेट सबो ल दे हस। त पेट भरे के उदिम जम्मो झन जानथें। ए बात अलग हे के मनखे ल छोड़ अउ जीव मन खा के अघा जथें। मनखे के भूखे नइ मिटाय। गरीब मन ल नइ कहॅंव। उन बिचारन तो पेज पसिया खा के रहि जथें। ए बात रईसन मन बर आय। अच्छा! इन दूनों के बीच म पिसाथें साधारण कमइया इंसान। जेन ल कथन "मध्यमवर्गीय परिवार"।  


अब भूख कइसे नइ मिटाय? खाहीं त उही दार भात साग। अभी त ए हाल होगे हे के जउन पेज पसिया, बोरे बासी ल मेहनत करइया मन पीयत आवत हें, उही ह अब सबो बर टॉनिक होगे हे।

डर ए बात के लगत हे के उहू ल गरीब गुरबा तिर ले लूट झन लॅंय। खैर! साधारण भूख तो सबो के मिटा जथे। भाई हो,  भगवान ह हरेक आदमी ल अउ उपरहा कई टाइप के भूख दे हवय। कोनो ल अपन दौलत के, कोनो ल हवस के, अउ कोनो क्षेत्र म होय सबले बड़का भूख बिन मिहनत के अगुवाय के....जेला हम शॉर्ट कट कथन। ए शॉर्ट कट के चक्कर म मनखे नाना प्रकार के उदिम करथे। 


ए उदिम हर अभी स्वास्थ्य अउ शिक्षा विभाग म अइसे दॅंउड़त हे के थकबे नइ करत हे।

खासकर शिक्षा विभाग म। बढ़िया इस्कूल ले लेके  डॉक्टरी अउ इंजीनियरिंग के अच्छा से अच्छा कॉलेज म भरती के पहिली परीक्षा लेवई।

दूसर;  एखर बर बड़े बड़े कोचिंग सेंटर, जिंखर मेर जादू के छड़ी रथे काय, अपन चहेता मन ल पास कराए के ठेकेदार, इंखर बढ़ोतरी। मनमाने फीस, लइका के रहे खाए के खर्चा अलग। साधारण कमाने वाला बाप के ताकत नइ रहय इंखर खर्चा उठाए के। बपुरा कइसनो करके इंतजाम करथे। चाहे अपन गोसइनिन के गहना गुरिया बेचय चाहे छोटे मोटे खेत खार ल। भगवान तिर दिन रात बिनती करत रथे अपन लइका के सफलता बर। पढ़इया लइकन दिन रात एक कर देथें। उन अगोरत रथें परीक्षा के दिन ल। वो दिन आ के निकल जथे। जम्मो झन ल आस रथे ए दरी मोर पेपर अच्छा बने हे,मैं निकल जहूॅं कहिके। ओतके म पता चलथे पेपर तो लीक हो चुके हे। रसूखदार के लइकन मेर पहिलिच ले आ गे रहिसे कहिके।  कोचिंग सेंटर 

चलवइया ले लेके परीक्षा नियंत्रक के अधिकारी कर्मचारी सब शामिल रथें एमा। अउ बीच बीच म टुटपुॅंजहा एजेंट, जइसे पान ठेला घलो के रैकेट रथे। अउ पोल खुलत जात हे नेता ले लेके जे बड़े बड़े अधिकारी रथें उंखर सगा संबंधी के पौ बारा...अइसन गड़बड़ी बिन बड़का नेता ऊता के सह पाए के संभव नइए। फेर वाह रे इंखर चरित्तर... कथें नहीं; "नकटा के नाक कटे सवा हाथ बाढ़े" कल्ला काटे बर नानमुन अधिकारी ऊपर एक्शन...बलि दे बर बोकरा खोजते रथें...।


पहिली जनाबे नइ करत रहिस। अभी के ए उदिम म लगे मनखे मन ल अइसन धॉंधली ल तगड़ा कान्फेडेन्शियल रखे म महारत हासिल 

नइए तइसे लगथे। मैनेजमेंट म उन कच्चा हें...तेकरे पाय के जल्दी उजागर होवत हे। लगथे इंखर मैनेजमेंट म ही जयचंद/विभीषण होहीं....


को जनि का का चरित्तर अउ देखे ल मिलही।

ईमानदारी अब एकदम बिदा ले के तैयारी म हे।

लइकन आत्म हत्या करत हें। एमा लिप्त बड़े मन ऊपर सख्त कार्यवाही होना चाही। फेर करहीं कोन? का सत्ता बदले भर ले बदलाव आ जाही?

इहॉं त सबो मौसेरा/कका बड़ा/ममा फुफू के भाइच तॉंय.....


जोहारत....🙏🙏🙏🌹🌹


सूर्यकांत गुप्ता, जुनवानी, भिलाई (छत्तीसगढ़)

घमंड*

 *घमंड*

एक ठन मेढक अपन तीन झन लईका संग जंगल मे नदिया तिर राहत रिहिस।उंकर घुमइ फिरइ उहिचे तक रिहिस। दुनिया दारी ले कोई लेना-देना नइ रिहिस। एक दिन तीनों लईका घुमत घुमत जंगल तिर के गांव मे पहुंच गिस।उहां ओमन खेत म चरत बईला ल देख परिस।वतिक जन जीव ओमन कभू नी  देखे रिहिस।उही समे बईला हर जोर से नरियाइस। तीनो लईका डर के मारे भागत घर आगे।लईका मन ल डर्राय देख के  पूछथे काय होगे।त लईका मन बईला के बात ल बताईस। मेढक जोर ले सांस तिरिस अउ हवा भरके अपन तन फुलाइस।अउ पूछथे का अतिक बड़?लईका मन कहिथे नही ऐकर ले अउ बड़े। मेढक अपन तन ल अउ फुलाइस अउ पुछथे का अतिक बड़।।?लईका मन फेर मुड़ी ल डोलाके नही कहिथे। मेढक ह घमंड के मारे कहिथे आखिर कोनो जीव ओकर ले कइसे बड़े हो सकत हे?अब वो अपन तन ल अतिक फुलाइस के फुट के मरगे।

       

फकीर प्रसाद साहू

पुरखा के सुरता

 पुरखा के सुरता 



9 जून - 7 वीं पुण्यतिथि म विशेष 


लोक संगीत सम्राट- खुमान साव 




कोनो भी अंचल के संस्कृति वो क्षेत्र के पहिचान होथे।येमा वोकर आत्मा ह वास करथे।जब अपन संस्कृति ल जन मानस समाज ह कोनो मंच म प्रस्तुति के रूप म देखथे त उंकर हिरदे म गजब उछाह भर जाथे।  हमर छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति के अलगे पहिचान हे।येला जन -जन तक बिखेरे म जउन महान कलाकार मन के हाथ हे वोमन म स्व. दुलार सिंह साव मंदराजी, स्व. दाऊ रामचंद्र देशमुख, स्व. महासिंग चन्द्राकर, स्व. हबीब तनवीर, स्व. देव दास बंजारे, स्व. झाड़ू राम देवांगन, श्रीमती तीजन बाई, स्व. केदार यादव, स्व. लक्ष्मण मस्तुरिया,स्व.शेख हुसैन, झुमुक दास बघेल, निहाई दास मानिकपुरी, ममता चन्द्राकार, कविता वासनिक, पूना राम निषाद, लालू राम साहू, स्व. मदन निषाद, स्व. गोविन्द निर्मलकर,माला मरकाम, फिदा बाई मरकाम, सूरुज बाई खांडे, चिन्ता दास बंजारे, रामाधार साहू, दीपक चन्द्राकार, शांति बाई चेलक, स्व. भैया लाल हेड़ाऊ,स्व.गंगा राम शिवारे, बद्री विशाल यदु परमानंद,शिव कुमार तिवारी, मिथलेश साहू, घुरवा राम मरकाम, डॉ. पीसी लाल यादव, शिव कुमार दीपक, नवल दास मानिकपुरी अउ संगीतकार श्रद्धेय स्व. खुमान साव के नांव ल आदर के साथ लेय जाथे। खुमान साव जी ह अपन संगीत साधना के बल म छत्तीसगढ़ी लोक संगीत ल खूब मांजिस। हमर लोक गीत ल पश्चिमी अउ फिल्मी संस्कृति ले बचा के माटी के खुशबू ल बिखेरिस। साव जी ह छत्तीसगढ़ के नामी कवि अउ गीतकार मन के गीत ल संगीतबद्ध कर के चंदैनी गोंदा के मंच म प्रस्तुति दिस।

   छत्तीसगढ़ी लोक संगीत बर समर्पित खुमान साव के जनम 5 सितंबर 1929 म राजनांदगॉव के  ग्राम खुर्सीटिकुल (डोंगरगॉव) म होय रिहिन। बाद म ठेकवा (सोमनी )म जाके बसगे। खुमान सर जी के 

बाबू जी के नांव टीकमनाथ साव रिहिन। लोक गीत- संगीत के घर म सुग्घर वातावरण मिलिस काबर कि बाबू जी ह हारमोनियम बजाय।लइका खुमान ह घर म हारमोनियम बजाय म धियान लगाय। फेर 


 रामायण मंडली म हारमोनियम बजाय ल शुरु करिन।खुमान ह नाचा के  पितामह स्व. मंदराजी दाऊ के मौसी के बेटा रिहिन।मंदरा जी दाऊ ह खुमान ल हारमोनियम बजाय बर प्रोत्साहित करिन।खड़े साज म  पहिली बार 13 साल के उमर म बसन्तपुर (राजनांदगॉव) के नाचा कलाकार मन सँग हारमोनियम बजइस। मंदरा जी दाऊ द्वारा संचालित रवेली नाचा पार्टी म  14 साल के उमर म सामिल होगे।साव जी नाचा म हारमोनियम म लोक धुन के सृजन कर छत्तीसगढ़ के माटी के महक ल बिखेरे के सुघ्घर काम करिन। साव जी ह बी. ए. तक शिक्षा प्राप्त करे रिहिन हे। बाद म म्युनिसीपल स्कूल राजनांदगॉव म शिक्षक बनगे।

    साव जी ह सन 1950-51 म राजनांदगॉव म आर्केस्टा पार्टी  चलाइस।छत्तीसगढ़ के कतको शहर के सँगे -सँग महाराष्ट्र अउ मध्यप्रदेश म आर्केस्टा के प्रस्तुति दिस।धीरे से मन ह आर्केस्टा डहर ले उचट गे। 1952 म सरस्वती कला मंडल के गठन करिन। खुमान साव जी के प्रतिभा ल देखके दाऊ रामचंद्र देशमुख ह अब्बड़ प्रभावित होगे। 1952 म दाऊ रामचंद्र देशमुख के गांव पिनकापार (बालोद )म मंडई के समय म नाचा होइस।ये कार्यक्रम म देशमुख जी हा साव जी ल हारमोनियम बजाय बर बुलाइस।1953 म घलो अइसने होइस।ये कार्यक्रम के अइसे प्रभाव पड़िस कि रवेली अउ रिंगनी नाचा पार्टी के विलय होगे।काबर कि येमा रवेली अउ रिंगनी पार्टी के संचालक मन ल छोड़ के बाकी नामी कलाकार मन ह आमंत्रित होय रिहिन हे। लोक संगीत अउ कला डहर कुछ अलग काम करे के इच्छा शक्ति के कारण बछर 1960 म शिक्षक सांस्कृतिक मंडल के गठन करिन। येमा भैया लाल हेडाऊ, गिरिजा सिन्हा, रामनाथ सोनी जइसे बड़का कलाकार मन शामिल होइस।

  साव जी ह सबले पहिली स्व. रामरतन सारथी के 3 गीत मोला मइके देखे के साध, सुनके मोर पठौनी परोसिन रोवन लागे, सोन के चिरइया बोले ल लयबद्ध करिन। 1971 म आकाशवाणी रायपुर म वोकर संगीत निर्देशन म गाना रिकार्ड होइस ।भैया लाल हेड़ाऊ अउ दूसर कलाकार मन ह गीत गाइस। 

दाऊ रामचंद्र देशमुख ह रेडियो म खुमान साव अउ ऊंकर कलाकार मन के गीत ल सुनिस त साव जी ल अपन गांव बघेरा बुलाइस। वो समय दाऊ जी ह छत्तीसगढ़ के लोक कलाकार मन ल सकेल के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के उदिम करत रिहिन। साव जी ह दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा स्थापित चंदैनी गोंदा म हारमोनियम वादक के रूप म शामिल होंगे।चंदैनी गोंदा म साव जी ल अपन प्रतिभा देखाय के सुग्घर मौका  मिलिस।चन्दैनी गोंदा के प्रसिद्धि म संगीत पक्ष के गजब योगदान रेहे हे।येकर श्रेय खुमान साव ल जाथे जउन ह अपन साधना के बल म नामी कवि /गीतकार लाला फूलचंद, द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, रविशंकर शुक्ल, पवन दीवान, प्यारे लाल गुप्त, कोदू राम दलित, राम रतन सारथी, लक्ष्मण मस्तुरिया के गीत ल संगीतबद्ध करके चंदैनी गोंदा म प्रस्तुति दिस।साव जी ह मोर संग चलव रे..., धन धन मोर किसान, घानी मुनी घोर दे, छन्नर छन्नर पैरी बाजे, चिटिक अंजोरी निर्मल छइंहा, मोर धरती मइया जय होवय तोर, पता ले जा रे गाड़ी वाला, बखरी के तुमा नार बरोबर, मोर खेती खार रुमझुम जइसे कतको छत्तीसगढ़ी गीत ल संगीत दिस। ये गीत मन हा अब्बड़ लोकप्रिय होइस अउ आजो जनता के जुबान म बसे हे।


 छत्तीसगढ़ी लोकगीत गौरा गीत, सुवा गीत, बिहाव गीत, करमा ये मन ला लयबद्ध करे म  गजब योगदान हवय।


 लोक संगीत के ये महान

 कलाकार ले मोर पहिली भेंट 17 मार्च 2002 म दिग्विजय स्टेडियम के सभागार म 

आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम म होय रिहिन।

दूसरइया भेंट मानस भवन दुर्ग म आयोजित छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के प्रांतीय अधिवेशन म होइस ।इहां के एक संस्मरण बतावत हवँ।कार्यक्रम ह चालू नइ होय रिहिस।

 साहित्यकार /कलाकार मन के पहुंचना जारी रिहिस।नामी साहित्यकर दानेश्वर शर्मा जी, डा . पीसी लाल यादव जी,खुमान साव जी सहित पांच -छै साहित्यकार स्वागत द्वार के पास खड़े होके एक दूसर ला पयलगी /जय जोहार करत रेहेन। इही बीच एक नव जवान कवि ह अइस अउ साव जी ल नइ पहिचान पाइस।हमर मन ले वो नव जवान कवि ह पूछे लागिस कि ये सामने म खड़े हे वोहा कोन हरे। मंय ह साव जी के परिचय बताय बर अपन जबान खोलत रेहेंव त साव जी ह मोला रोक दिस अउ ओकर से पूछिस कि पहिली तँय ह बता-" तैंहा कोन गांव के हरस। नव जवान सँगवारी ह बोलिस - मेहा बघेरा (दुर्ग) के रहवइया अंव।"

साव जी ह बोलिस कि-' तैंहा बघेरा के हरस तब तो मोला तोला जानेच ल पड़ही।अउ मोर नांव नइ बता पाबे त तोला मारहू किहिस ". ये बात ल सुनके वो नव जवान ह सकपकागे!

 वइसे मंय साव जी के अख्खड़ स्वभाव ले परीचित रेहेन त देरी नइ करत वोला बतायेंव कि - ये महामानव ह चंदैनी गोंदा के संचालक आदरणीय खुमान साव जी हरे। अइसन सुनके वोहा तुरते साव जी ल पयलगी करिन।  साव जी ह वोला मारहू केहे रिहिस वोहा वोकर मुड़ी म हाथ रखके आशीर्वाद प्रदान करिन. ये प्रसंग म हमन मुस्कात रहिगेन। 

  फेर साव जी ह नम्र स्वभाव ले वोकर से किहिस कि - बेटा तैंहा बघेरा रहिथो केहेस तेकर सेति केहेंव कि मोला जाने ल पड़ही ।फेर वो नव जवान ल पूछिस कि दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ल जानथस? श्री विश्वंभर यादव मरहा जी ल जानथस? त वोहा किहिस कि हव दूनों ल जानथव। 

साव जी ह बोलिस कि महू ह दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के घर रिहर्सल मा आंव जी ।तेकर सेति तोला केहेंव रे बाबू कि मोला तोला जाने ल पड़ही. 

ये घटना ले पता चलथे कि साव जी ह नारियल जइसे ऊपर ले

कठोर जरूर दिखय पर अंदर ले गजब नरम स्वभाव के रिहिन। 


साव जी ह  हमर साकेत साहित्य परिषद् सुरगी जिला राजनांदगॉव के वार्षिक समारोह म चार बेर पहुंचिस।2012 म करेला (खैरागढ़) भवानी मंदिर मा आयोजित कार्यक्रम म, 2013 म सुरगी के पंचायत भवन म, 2015 म सुरगी के कर्मा भवन म अउ 2016 म  सुरगी शनिवार बाजार चौक के मुख्य मंच मा आयोजित कार्यक्रम म पहुंच के हमन ल कृतार्थ करिन। 2015 म खुमान साव जी ह साकेत सम्मान स्वीकार कर हमन ल गौरवान्वित कर दिस। वर्ष 2016 म 87 साल के साव जी के चयन संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार -2015  बर चयनित होय के खुशी म  साकेत साहित्य परिषद् सुरगी द्वारा मुख्य सांस्कृतिक मंच सुरगी म नागरिक अभिनंदन करे गिस।

    खुमान सर अब्बड़ स्वाभिमानी रिहिन।2015 अउ 2016 म सम्मानित होय के बेरा म साव जी ह किहिस कि -" मोला जनता से जउन सम्मान मिलथे उही मोर बर सबले बड़का सम्मान हरे। आज तक मेहा राज्य सम्मान अउ पद्मश्री बर आवेदन नइ करे हवँ न अवइया बेरा म करव! हां शासन ह खुद मोला सम्मान देना चाहत हे त दे सकथे।छत्तीसगढ़ के लाखो जनता के प्रेम ह मोर बर सबसे बड़े पुरस्कार हरे। "

   हमर छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के अइसन महान कलाकार ह 9 जून 2019 के दिन 89 साल के उमर म ये दुनियां ल छोड़ के स्वर्गवासी होगे। श्रद्धेय साव जी ल उंकर 7 वीं  पुण्यतिथि म शत् शत् नमन हे।

            

          ओमप्रकाश साहू "अँकुर "                सुरगी, राजनांदगॉव (छत्तीसगढ़)

माटी झोंकनी लुगरा

 *​माटी झोकौंनी लुगरा*

        ​गाँव में बिहनिया जब सुरुज नरायन अपन सोनहा किरन बगराथे, त बइला के घंटी, चिरई-चिरगुन के चहक अउ माटी के सोंधापन ले पूरा गाँव जाग उठथे। हमर गाँव मं रहय शांति - सीधी-सादी, मेहनती अउ अपन मइके के मान रखैया बहू। बिहाव के बाद वो अपन ससुरार ला सुंदर चुक्क ले सजावत मइके अउ ससुरार दुनों घर के इज्जत ला एके जइसन मान देत रिहिस।

​शांति के दाई हमेशा काहय - ​“बेटी, मइके ले मया में देवल लुगरा चाहे कैसनो राहय, ओकर मान ला राखबे, हमन नइ रहिबो त भाई भउजी संग लुगरा गतर बर झगरा झन करबे। भाई भउजी के मान ला भी ओतकेच रखना हे, जतका ते हमर मन के मान रखे हस। हमर पुरखा के कीर्ति हा फरिहर हे एमा कभू दाग मत लगन देबे। भाई के मान तोरो हाथ में हे बेटी। मोर बात ला मान ला रख लेबे।” ​ए बात शांति के मन मं गहिरा बसगे रहिस। शांति के घरवाला समारू गाँव के समझदार अउ मेहनती किसान रहिस। गरीब जरूर रिहिन, फेर स्वाभिमान ले भरपूर। ऊँकर एकेच लइका रहिस - बल्लू। बचपनेच ले अड़ियल अउ जिद्दी। जेन बात मन मं बइठ जावय, ओला पूरा करे बिना चुप नई होय। ओकर जिद के सेती शांति अउ समारू हरदम परेशान रहंय। बल्लू कभू कपड़ा बर, कभू खिलौना बर अइसन रार ठानय कि घर के बर्तन-भांड़ा फेंक देवय। समारू अउ शांति ओला कतको समझाय, फेर ओकर जिद दिन-ब-दिन बाढ़त जात रिहिस।

        पूस के जाड़ हाड़ा  कँपावत रिहिस, बड़हर किसान मन के धान मिंजई बॉंचे रिहिस। छोटे किसान मन बढ़ो डरे रीहिस। गाँव मं एक दिन बड़े मड़ई भराय रिहिस। चारों मुड़ा चकाचौंध रहिस। मड़ई मं टट्टू  सवारी देखके लल्लू के मन अटक गे।

“मोला अभी टट्टू चढ़ना हे, अउ ओकर मालिक ला पूरा पइसा देके ओला घर लाना हे!”  वो अइसन जिद धरिस जऊन गरीब समारू के बस के बाहिर रिहिस।

​समारू ओला हाथ जोड़के समझाइस- “बेटा, अभी हाथ मं पइसा नई हे। फसल बेंचाय हे पैसा मिलही त देखबो। अभी धीरज धर।”

​फेर बल्लू कहाँ मानने वाला रिहिस! वो बीच मड़ई मं जमीन मं लोट-लोट के रोये लगिस, अपन कपड़ा फार डारिस। गाँव के लोगन मन खड़े होकर हाँसय - "देखव, समारू के लइका कइसन तमाशा करत हे, दाई-ददा ला रस्ता मं ला के छोड़ही।"

​समारू लाज के मारे मुड़ गड़ालिस, शांति के आँखी ले धारे-धार आँसू बहे लगिस। ओ दिन शांति ला पहली बेर महसूस होइस कि बल्लू के ये जिद केवल बाल-हठ नई हे, बल्कि ये हा हमर लइका के संस्कार ऊपर ऊँगली उठावत हे। 

         ​ओही बीच शांति के मइके पीपरछेड़ी ले ओकर भतीजी के बिहाव के नेवता आइस। शांति अपन भउजी बर अब्बड़ सुग्घर 'माटी झोकौंनी लुगरा' ले के बड़ जतन ले बक्सा मं सम्हाल के रखे रहिस। वो केवल एक कपड़ा नई रहिस, ओहर मइके के मान, पुरखा मन के असीस अउ ओकर दाई ले मिले संस्कार अउ मया के प्रतीक रिहिस। बिहाव मं जाय बर शांति ओही लुगरा ला निकालिस अउ अगरबत्ती देखा माथा लगा के बक्सा में अउ कपड़ा मन संग धरे बर सिघयावत रीहिस। 

​उही समे बल्लू फिर मड़ई वाले टट्टू ला बिसाए बर पइसा मांगत रार ठान दिस। समारू खेत गे रिहिस, शांति बल्लू ला दुलार करत किहिस -"बेटा, मइके जावतहन, ओती तोर मामा ह तोला नवा कपड़ा देही। अभी जिद झन कर।"

​ए बात ला सुनके बल्लू के गुस्सा सातवाँ आसमान मं चढ़ गे। वो चीखिस - "मोला मामा के कपड़ा नई चाही, मोला अभी पइसा चाही!"

​अउ गुस्से मं अंधरा होके बल्लू ह शांति के हाथ ले ओ पवित्र 'माटी झोकौंनी लुगरा' ला छीन लिस। शांति चिल्लावत रहिगे -"छोड़ बेटा, वो तोर आजी के असीस आय, ओला झन छु।" फेर जिद्दी बल्लू ओला घसीटत बाहिर परछी मं लेगीस अउ ओ कंचन जइसन साफ लुगरा ला गंदा गोबर-माटी मं सान के गोड़ में रौंद दीस। ​शांति अवाक रहिगे। ओकर मइके के मान आज ओकर अपन लइका के पैर के नीचे माटी मं मिलगे रिहिस, वो रोत-रोत बइठगे। समारू जब खेत ले आइस अउ ए दशा ला देखिस, त ओकरो छाती फाटगे। ओ दिन घर मं चूल्हा नई जलिस, बल्लू घलो डर के मारे कोना मं दुबक गे रहिस।

         ​शांति ह रोना-धोना छोड़के एक कड़ा फैसला लिस। ओकर दाई कहय — "मार-पीट ले मनखे नई बदले, ओला ओकर गलती के अहसास कराना जरूरी हे।"  शांति ह ओ माटी मं सने लुगरा ला पहिरलिस। बल्लू अपन दाई ला ओ गंदा-दाग वाले कपड़ा मं देखके झेंपगे।

​समारू ओ दिन बल्लू ला जबरदस्ती संग मं खेत ले गीस। जेठ के दुपहरिया धूप मं, जब धरती आगी उगलत रहिस, समारू ह बल्लू ला गोड़-हाथ मं छाला पड़े किसान मन ला देखाइस। ओकर ददा के घलो बदन पसीना ले तर-बतर रहिस।

​समारू कहिस-

​“देख बेटा, ये जऊन माटी तोर पैर के नीचे हे, एहा हमर अन्नदाता आय। ए माटी मं मेहनत करके कतको पसीना बोहा जाथे, तब जाके दुनिया के अउ खुद के पेट भरथे। तैं जेन तोर महतारी के मइके के सम्मान लुगरा ला माटी मं साने हस, ओला कतको धोबे त दाग नई छूटे। मेहनत अउ इज्जत कमाए मं जिनगी बीत जाथे, फेर एक जिद ओला माटी मं मिला देथे।”

​घर मं शांति ह बल्लू ला गोदी मं बइठा के अपन मइके के कहानी सुनाइस कि कइसे ओकर ददा बल्लू के नाना ह गरीबी मं घलो कभू ककरो आगू हाथ नई फइलाईन, कइसन भूखन लांघन सो गीन फेर अपन ईमान अउ मान ला बचाय राखिन। ​धीरे-धीरे लल्लू के बाल-बुद्धि मं ये बात बइठ गे। ओला आत्मग्लानि होइस कि ओहा अपन दाई-ददा ला कतका दुख दे हे। ओकर जिद्दी मन अब पिघल चुके रहिस। अब वो जिद करना छोड़ दीस, स्कूल मं मन लगा के पढ़े लागिस अउ संझा कुन ददा के काम मं हाथ घलो बंटाए लागिस।

        ​एक साल बीत गे, गाँव मं फेर मड़ई भराय रिहिस, ए दारी समारू अउ बल्लू दुनों दिन-रात मेहनत करके फसल के बने दाम कमाए रहिन। समारू खुश होके बल्लू बर टट्टू सवारी के टिकट ले आनिस अउ कहिस - "ले बेटा, तोर पिछले साल के जिद आज पूरा कर ले।"

​फेर बल्लू मुस्कुरा के किहिस-“ददा, ये टिकट ला मोला झन देव। ओ देखव, रस्ता मं बोधी कका के गरीब लइका मन रोवत हें, ओ मन ला चढ़ा देवव। मोला अब समझ मं आगे हे कि असली खुशी अकेल्ला बर नई, सब्बो संग बांटे मं ही मिलथे, अउ टट्टू चढ़े ले कोई बड़े नई होवय, बड़े त संस्कार ले होथे।”

​बल्लू के मुँह ले अइसन गियान के बात सुनके समारू के सीना गर्व ले चौड़ा होगे। शांति के आँखी मं आँसू आगे, फेर ये आँसू दुख के नई, संतोष के रहिन।

​उही समे शांति के मइके ले ओकर भाई-भउजी मन मड़ई देखे बर ऊँकर घर आईन। ओमन देखिन कि शांति ह आज घलो ओही 'माटी झोकौंनी लुगरा' ला पहिरे हे, जेमा लल्लू के लगाए माटी के हल्के दाग आज घलो दिखत रहिन।

​शांति के भाई ह भावुक होके किहिस - "बहिनी! तैं ह हमर परिवार के लाज रख लेय। ए लुगरा के दाग ये बतावत हे कि कइसन कड़ा समय मं घलो तैं अपन परिवार अउ मइके के संस्कार ला टूटन नई देहस।"

​गांव के सियान मन घलो ओ मन के घर आइन अउ बल्लू के संस्कारी रूप ला देखके कहिन-​“देखव भाई, संस्कार के माटी मं पले लइका कभू बिगड़य नई। शांति सच मं मइके अउ ससुरार दुनों के मान रख लीस। धन्य हे अइसन दाई!”

​ओ दिन शांति अपन पुराना लुगरा ला झाड़त-सवारत मुस्कुराइस। ओकर मन मं अपन दाई के ओही अमर संदेस गूंजत रहिस —

​“माटी झोकौंनी लुगरा सिर्फ कपड़ा नई, परिवार के मान-मरजादा होथे। जेला अड़ियल जिद ह माटी मं साने के कोसिस जरूर करथे, फेर जदि ओमा ममता, संस्कार अउ समझदारी के अमृत डाले जाय, त उही माटी मं सने लुगरा घलो जिनगी के सबसे बड़े ओढ़ना बन जथे।”

लइका मन के जिद ला गुस्सा या मार-पीट ले नहीं, बल्कि सही संस्कार, मेहनत के महत्व अउ धीरज से ही बदले जा सकथे। दाई ददा ले मिले संस्कार मायके-ससुराल के मर्यादा ही विषम परिस्थिति मन में परिवार ला बिखरे ले बचाथे। 

अशोक आकाश

छत्तीसगढ़ी लघुकथा *संसकार अउ स्वभाव*

 छत्तीसगढ़ी लघुकथा

*संसकार अउ स्वभाव*

एक गाँव म दू झिन संगवारी रहिन, दुनो झन के स्वभाव अलग रीहिस। एक झन नीम के पाना जइसन रहय, अउ दूसर चंदन के पाना जइसन।

        गाँव के चौपाल म बइठे एक दिन बहस छिड़गे। नीम-जइसन स्वभाव वाला कहिस, “दुनिया म सब्बो मनखे अपन फायदा देखथे। जइसे नीम के पाना कड़ुवा होथे, तइसने सबके मन घलो कड़ुवा हे।”

चंदन जइसन स्वभाव वाला संगवारी मुस्कुराइस अउ कहिस, “संसार म सब्बो एक जइसन नइ होवय। देखव, गाय घास खाथे फेर दूध देथे। मधुमक्खी फूल ले रस लेके मीठा मधु बनाथे। चंदन ला सांप लपेटे रहिथे, फेर चंदन अपन सुगंध नइ छोड़य।”

ओतके म एक कौवा आके नीम के डार म बइठ गे अउ काँव-काँव करे लगिस। थोरकिन दुरिहा म कोयल आम के रूख म बइठके मीठा सुर छेड़ दिस। चंदन जइसन मनखे कहिस, “देखव, दूनो चिरई एके जंगल के हवंय, फेर बोली अउ संस्कार अलग-अलग हवय।” तभे गाँव के बुढ़वा दाऊ कहिस, “मनखे के पहचान ओकर धन ले नइ, ओकर संस्कार ले होथे। नीम कड़ुवा जरूर होथे, फेर औषधि बनके दूसर के काम आथे। चंदन सुगंध देथे फेर उहू कई ठन काम में बड़ उपयोगी होथे। असल बात ये नइ कि कोन नीम हे अउ कोन चंदन, असल बात ये हे कि अपन प्रकृति ले संसार ला का देथन।”

दाऊ के बात सुनके सब्बो चुप होगे। ओ दिन गाँव वाले समझगे कि संसार म जीव-जंतु, रूख-राई अउ मनखे सबके प्रकृति अलग-अलग हो सकथे, फेर अच्छा संस्कार वाला मन हर जगह सुगंध बगराथे, जइसे चंदन। संस्कार मनखे के सबसे बड़का गहना आय, प्रकृति अलग हो सकथे, फेर अच्छा संस्कार संसार ला सुगंधित बना देथें।

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डॉ अशोक आकाश

बालोद छत्तीसगढ़

लघुकथा) नजर दोस --------

 (लघुकथा)


नजर दोस

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 "कका--कका --कका --ये कका?"

"काये जी, एकदम झकनाये कस कोनो बात ला पूछथच। सोजबाय नइ गोठिया सकच"--मैं थोकुन ओकर उपर झुंझवावत कहेंव।

"झकनायेच के बात हे कका।"

"अच्छा ले बता, काय बात ये तेला?"

"मैं आजकल देखथँव त पाँच साल के लइका ले लेके- जवान, बुढ़वा, बाबू पिला ले लेके, माइलोगिन तक मन---चारे आना बाँचे होहीं तहाँ ले सब चश्मा ओरमायें दिखथें।ये मन फैशन बर नहीं ते घाम ले बाँचे बर पहिरत होहीं न कका?"---वो पूछिच।

" हत तो रे जकला। ओइसन बात नोहय। ये मन ला रात दिन मोबाइल म नजर गड़ाये रहे के सेती नजर दोस होगे हे।"

"पाँच साल के लइका मन ला तको गा।"

"हव तैं पाँच साल के लइका कइथच। आजकल एक साल के कतेक लइका मन मोबाइल मा कार्टून देखे बिना भात बासी ला खाये ला नइ धरयँ"-- मैं कहेंव।

" त ये लइका मन  का मोबाइल ला चालू कर डरथें कका"-वोहा बक्कखाके पूछिस।

" टिकटाक करत मन नहीं  फेर उहू मन सीख जहीं। अभी तो ऊँकर दाई मन चालू करके धराथें।"

सुन के ओकर मुँह उलगे।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हजारी लाल के ऑंसू" छत्तीसगढ़ी कहानी

 "हजारी लाल के ऑंसू"  छत्तीसगढ़ी कहानी 



    हजारी लाल जैसने अपन घर ले बाहिर गोड़ मड़ाईस, परोसी मन घूर-घूर के देखे लगीस। परोन दिन बिहनिया ओकर बेटा शोभित ला पुलिस ऊपर पथरा फेंके के जुलुम में गिरफ्तार करे गे रीहिस। नेता अफसर मन के दिन भर चक्कर काटे के बाद भी शोभित ला घर लाय के कोनो जुगाड़ नइ जमीस। ओकर ऊपर दंगा भड़काय, शासकीय काम में बाधा डाले अउ आतंक मचाय के धारा लगादीस। पारा के सबे मनखे मन ईंकर परिवार के मेहनत अउ तरक्की ला देख के अब्बड़ जलन भाव राखय। एकर सेती ये मन ला दुखी देखके, ओ मन ला पहिली बेर सुख के अनुभति होईस। 

      हजारी लाल अउ ओकर बाई मोना दिन रात इहॉं ले उहॉं घूम-घूमके थकगे, ओकर बदन करियागे, मुहूँ सुटकगे रीहस फेर ओकर दुलरवा बेटा ला छोड़ाय के कोनो जुगाड़ नइ जमिस, न दिन में आराम न रात में नींद। 

इही तो दुनिया आय, मुसीबत में घिरे मनखे के सहारा बने ला छोड़ के ओकर मजबूरी के लाभ उठैया कतको हे। बखत के मार हा बड़े - बड़े बलशाली ला कोकराके मड़ियाय ल मजबूर कर देथे। शोभित प्रजातंत्र के चौथा स्तम्भ पत्रकारिता के क्षेत्र में ईमानदारी से काम करत रीहिस। ओहा जानत रीहिस कि जीवन कैसे जीना हे, का अच्छा हे का बुरा हे। ओकर बचपन के एक दू झन संगवारी मन मंदहा होगे रीहिसे, महतारी मोना के कतको रोक टोक के बाद भी ऊँकर दोस्ती नई छूट सकिस। गलत संगति के सजा अच्छा मनखे ला घलो भुगते ला पर जथे। बेरा के पटकनी में शोभित के उज्जर जिनगी में फोकटे फोकट दाग लगगे। 

ठोकर जीवन के पाठशाला हरे, कुछ मनखे ठोकर खाके सम्हल जथे अउ सुधर जथे, कुछ मनखे मन नवॉं तरीका ले अपडेट होके फेर उही रद्दा में चल पड़थे त कुछ मनखे के जिनगी के दिशा बदल जथे। शोभित हा पत्रकारिता के माध्यम ले सच ला जनता के आगू लाके, भ्रष्टाचारी मन ला एकक करके लाईन में खड़े कर दे रीहिस। एकर सेती शोभित के पॉंव पुट दुश्मन बन गे रीहिस। 

        

​शोभित ह "प्रजातंत्र के चौथा स्तंभ" के मर्यादा निभात, शहर म बनत एक बड़े सरकारी पुल के भ्रष्टाचार के भंडाफोड़ कर दे रीहिस। ओहा अपन रिपोर्ट म सप्रमाण देखाय रीहिस कि कैसे नेता अउ बड़े अफसर मन मिलके घटिया निर्माण सामग्री के प्रयोग करत हें, जेकर सेती कतको मनखे मन के जान ला खतरा हे।

शहर म उही पुल के पास जनता ह विरोध प्रदर्शन करत रीहिस। मंदहा संगवारी मनके उभरौनी में शोभित उहॉं केवल एक पत्रकार के नाते सच ला रिकार्ड करे बर गे रीहिस। अचानक भीड़ म कुछ "भाड़ा के गुंडा" मन घुँसगे, जे मन ला उही भ्रष्टाचारी नेता मन भेजे रीहिन। जइसे ही पुलिस ह भीड़ ला तितर-बितर करे के कोशिश करिस, उही गुंडा मन पुलिस ऊपर पथरा फेंके बर शुरू कर दीस। तब जवाब में शोभित के मंदहा संगवारी मन तक पथरा चला दे रीहिन। शोभित ह अपन कैमरा म ऊँकर मन के चेहरा कैद कर ले रीहिस, जे मन असल म पथरा फेंकत रीहिन त ओकर कैमरा ला छीने बर पुलिस के भेस म कुछ मनखे ओकर ऊपर टूट पड़िन।

​शोभित ह अपन कैमरा ला बचाए बर जब संघर्ष करिस, त ओला "शासकीय काम म रुकावट" अउ "पुलिस ऊपर हमला" के झूठा आरोप में फँसा दीस। ओकर ऊपर पुलिस ऊपर पथरा फेंके, भीड़ ला उकसायके, सरकारी काम में बाधा डारे के झूठ मूठ आरोप लगादीन ताकि दुनिया ला ये लगे कि एक पत्रकार ह दंगा भड़कावत हे।

​हजारी लाल जब जेल म शोभित ले मिलिस, त ओकर ऑंखी म आँसू रीहिस। शोभित ह सिसकत कहिस-

​"बाबू, मैं हाथ म कलम एकर बर धरेंव कि मैं सच लिख सकँव, फेर ये भ्रष्ट तंत्र ह मुहीं ला अपराधी बना दीस।  मैं पुलिस ऊपर पथरा नइ फेंके हौं, मैं तो ओ मनखे मन के चेहरा ला दुनिया ला देखाना चाहत रहेंव, जे मन आम जनता के हक नँगावत हें।"

​हजारी लाल ला अब समझ आइस कि शोभित ला ओकर ईमानदारी के सजा मिले हे। शोभित ह भ्रष्टाचारी मन के ऑंखी के किरकिरी बन गे रीहिस, जेकर सेती ओ मन ओला अपराधी साबित करे म लगगे रीहिन।



​हजारी लाल जैसे ही अपन घर के ओसारी ले बाहिर गोड़ मड़ाईस, आगू चउपाल म बइठे परोसी गजाधर अउ बिदेसी जेन ह मंत्री के चापलूस कार्यकर्ता रीहिन तौन मन एक-दूसर कोती देखके मुस्कुराइन। गजाधर ह जोर से सुनावत कहिस—

​"का होगे हजारी भाई? बड़े जोर-सोर ले बेटा ला पढ़ा-लिखा के पत्रकार बनाये रेहे, अब तो ओहा 'बड़का नाम' कमा लीस! पेपर म ओकर फोटो छपे हे, फेर हाथ म कलम नइ, पथरा हे। अब बताव पुलिस ऊपर हमला करना अउ दंगा भड़काना ही तुहर संस्कार आय का?"

​बिदेसी ह घलो बहती गंगा म हाथ धोवत कहिस— "सही कहत हस गजाधर, अतका घमंड रीहिस एकर परिवार ला अपन तरक्की ऊपर। देख ले, भगवान के घर म अंधेर नइ हे। अइसन औलाद ले तो निसंतान रहना अच्छा हे, जेकर सेती कुल म दाग लग जाय।"

​हजारी लाल के भीतर जैसे कोनो ज्वालामुखी फूट पड़े रीहिस। ओकर बदन गुस्सा अउ दुख ले काँपे लगीस। ओहा थिरकत आवाज संग कड़ा स्वर म कहिस - ​"चुप रहा बिदेसी! अउ तहूँ चुप रा गजाधर! तुमन ला का लगथे कि मोर शोभित अपराधी आय? जेन लइका ह रद्दा म गिरत मनखे ला देख के हॉंसे नहीं, तुरत उठाय बर दौड़ पड़थे, कोनो चहकत चिरई मन ला कभू नइ मारिस, ऊँकर चहकन भरे आजाद जिंदगी में अपन मन के खुशी देखथे। ओहा कभू पुलिस ऊपर पथरा फेंकही? दुशमनी करैया, जलन मरैया मनखे संग हॉंस के गोठियाथे मोर बेटा हा। तुमन तो ओकर मेहनत ले जरत रहेव, एकर सेती आज तुमन ला सुख मिलत हे। फेर सुरता राखहू शोभित के हाथ म पुलिस ह जबरदस्ती के आरोप लगायहे, काबर कि ओकर कलम ह तुँहर चहेता नेता मन के भ्रष्टाचार के पोल खोलत रीहिस।"

​हजारी लाल के ऑंखी ले अंगारा बरसत रीहिस। ओहा आगू कहिस - ​" का सच्चाई ला कालिख पोत के लुकाये जा सकथे, अउ कतक दिन ले? आज मोर बेटा के उज्जर जिनगी में दाग लगादीन बेईमान मन, फेर मोर अंतरात्मा काहत हे कि मोर बेटा निर्दोष हे। तुमन ला तमाशा देखे म मजा आवत हे न? देख लेव... फेर जब सच बाहिर आही, त तुमन अपन मूंह लुकाये बर जगा नइ पाहू।"

​अतका कहिके हजारी लाल हफरगे, मोना ह भीतर ले दौड़ के आइस अउ हजारी के हाथ ला धरके सम्हाल लिस। परोसी मन ह हजारी के अइसे उग्र रूप ला देख के सन्न रहिगे। हजारी लाल के ऑंखी म आँसू अउ गुस्सा के अइसे संगम रीहिस कि सकलाय दसों मनखे मनके बोले के हिम्मत नइ होइस।


       हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानो कोनो ओकर गोड़ म मन भर के सांकर बांध दे होही। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे काली तक शोभित ला "गाँव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।

​हजारी लाल ह कछेरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आँसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गूँठा सब बेंचागे। फेर शोभित जेल के करिया कोठी ले नइ निकल पईस। ​हजारी लाल जब जेल के भारी लोहा के दरवाजा तीर पहुँचिस, त ओकर भेंट जेल के संतरी बचपन के संगवारी भोला ले होईस। भोला के ऑंखी म कोनो दया भाव नई रीहिस, बस एक लालच केवल चमक रीहिस। हजारी लाल ह हाथ जोड़ के बिनती करिस, "भोला भाई, मोर लइका शोभित ले एक बेर मिला दे।"

​भोला ह तिरछी नजर ले देखिस अउ खैनी थूँकत कहिस, "अतका अराम ले नई मिले हजारी। ये जेल आय, इहॉं हवा घलो बिना कीमत के नई मिले। अउ तोर बेटा ऊपर तो 'आतंक' के धारा लगे हे।"

​उही मेर एक दूसर संतरी बंधू घलो आ गे। ओहा धीरे से हजारी लाल ला बाजू म ले जाके फुसफुसाइस, "देख हजारी, हमर साहब मन ला खुश करना पड़थे। जेल के भीतर अपराधी मन लाल बीड़ी, सिगरेट, दारू अउ मोबाइल रिचार्ज तक के बेवस्था हो जाथे, फेर एकर बदला मोटा रकम लगथे अगर तोर बेटा ला बिना मार-पीट के अराम से रखना हे, त 'खर्चा-पानी' के इंतजाम कर।"

​हजारी लाल सन्न रह गे। ओहा सोचिस—बाहिर नेता मन भ्रष्टाचार करत हें अउ ये रक्षक मन भक्षक बने हें। बंधू ह आगू कहिस, "जेन मनखे मन ह शोभित ला फँसाए हे, ओ मन हम ला पैसा दे हे, ओला तंग करे बर। अब अगर तूमन शोभित ला बचाना चाहत हव, त ओकर ले दोगुना रकम देना पड़ही।"

​हजारी लाल के ऑंखी ले टपटप आँसू गिरे लगीस। ओकर मन म हूक उठीस— 'मोला काय मालूम रीहिस भगवान कि न्याय के मंदिर कहे जाने वाले ये जगह म ईमानदारी के नीलामी होथे।'

​शोभित ले मिले बर भोला अउ बंधू ह हजारी लाल ले ओकर हटहा अंगूठी अउ गॉंठ म बंधाय आखिरी के पाँच सौ रूपया घलो झपट लीन। जब हजारी लाल ह शोभित ला देखिस, त ओकर कलेजा फटे कस होगे। शोभित एक कोना म डर्राय दुबके बइठे रीहिस, धीरे से कहिस, "बाबू, इहॉं सबे जिनिस बिकाऊ हे। संतरी मन मोला मोबाइल में बात करे बर कहत रीहिन ताकि मैं तुँहर मन करा फोन लगाके अउ पैसा मंगा सकौं, फेर मैं मना कर देंव। बाबू, ये मन मोला तोड़ना चाहत हें।"

​हजारी लाल ह अपन बेटा के काँपत हाथ ला थामिस अउ संतरी मन कोती देखिस, जेन मन दूरिहा में खड़े होके अइसे हॉंसत रीहिन मानो कोनो शिकार ला फँसा ले हें। हजारी लाल ला समझ आगे कि ये लड़ाई सिर्फ कानून ले नई, बल्कि ये सड़े हुए तंत्र ले घलो हे।

         कोनो मनखे राहय मुसीबत के बेरा सबके मति छिंही-बिंही हो जथे, का करँव काकर करा जाके गोहराँव, कुछू समझ नइ आय। हजारी लाल कोनो बड़ा रहीश नइ रीहिस जे अपन खजाना खोलके लइका ला नियॉंव देवा सकय। ऐसन में ओला अपन बचपना के संगवारी अजीत के सुरता आईस, नवॉंपारा महामाईं मंदिर के पाछू किराया के घर में रहिके न्याय के मंदिर के सेवा करथे, ओकर सहयोगी ममता अउ भारती दूनो के दूनो कई ठन गंभीर मामला ला आसानी से निपटाय हवे। हजारी लाल के मन में जइसे एक आस के दीया जर उठिस। जब दुनिया के रद्दा बंद हो जाथे, तब पुराना संगवारी के सुरता अइसने आथे, जइसे अंधियारी रात में ध्रुव तारा।

      हजारी लाल ह तेवर मंझनिया अपन थके जॉंगर ला घसीटत नवापारा महामाईं मंदिर के पाछू पहुँचिस। उहॉं टीन छानी के साधारण घर के बाहिर बोर्ड टंगे रीहिस— "न्याय अउ सेवा केंद्र"। खिड़की में लगे गुलाबी परदा भीतर ले गोठियाय के आवाज आवत रीहिस।

​हजारी लाल ह थरथरात आवाज लगाईस, "अजीत... ओ अजीत भाई?"

​अंदर ले एक मनखे ह बाहर निकलिस, ओकर चेहरा म सादगी अउ ऑंखी म न्याय के चमक रीहिस। ओकर संग म ममता अउ भारती घलो आईन, वो मन फाइल अउ कानूनी सलाह वाले कागजात धरे रीहिन।

​अजीत ह हजारी लाल ला देखिस त ओकर चेहरा म अचंभा आ गे। "हजारी? तैं ? ये का हाल बना डारे हस?"

​हजारी लाल ह ओकर गोड़ म गिर गे अउ फफक-फफक के रोए लगीस। "अजीत, मैं उजरगे हौं। मोर शोभित... मोर दुलरवा बेटा ला 'दंगाबाज' बना के जेल म डाल दे हें। पुलिस-प्रशासन, संतरी-मंत्री सब ओकर पीछे पड़गे हे। मोला कोनो रद्दा नइ मिलत हे।"

अजीत तुरते उठाइस ​ममता ह पानी पियाइस। भारती ह ओकर बात ला ध्यान से सुनत रहीस अउ झटपट पेन उठा के लिखत रीहीस।

​अजीत ह हजारी लाल के खांध में हाथ मड़ाके कहिस, "हजारी, बिपत के बेरा में कोनो मनखे के ताकत नहीं, ओकर हिम्मत हा साथ देथे, तैं रोवत काबर हस? हिम्मत रख, हमर जवानी के दोस्ती कभू हार मानय? हम न्याय के मंदिर के सेवा करथन, अउ जब तक हमर कलम चलत हे, तब तक कोनो बेकसूर ला जेल म सड़न नइ देन।"

​ममता ह ओकर तरफ देख के कहिस, "हजारी कका, घबरा झन। हमन सुनत अउ पढ़त हन कि शोभित ह भ्रष्टाचार के कोनो बहुत बड़े राज ला उजागर करे बर चाहत रीहिस। ओही राज के डर ले ओला फंसाए गे हे।"

अजीत का सबे मामला ला पूछतगीस हजारी बतावतगीस त भारती ह ओकर फाइल म शोभित के केस के सारा विवरण लिख लीस। सबे मामला ला समझके ममता के मंता भोगागे वो भड़क के कीहिस "कका, ये जेल के संतरी भोला अउ बंधू के भ्रष्टाचार के जतेक सबूत हे, ओकर जमा-जोखा हमन करबो। ईंकर मन के 'मोटा रकम' मांगे के खेल ला हमन मुख्यमंत्री के जनदर्शन अउरी बड़े अधिकारी तक पहुंचाबो।"

​हजारी लाल ला लागिस जइसे ओला कोनो संजीवनी मिल गे हे। अजीत ह ओला भरोसा दिलाइस, "तें चिंता झन कर। आज के रात हमन योजना बनाबो। कल जब तें फेर जेल जाबे, तब शोभित ला कहिबे कि ओकर डरे के कोनो जरूरत नइ हे। शेर के बच्चा हे ओहा, शेर कस बाहर आही।"

        अब तो हजारी लाल के आँसू अब ओकर कमजोरी नइ रीहिस, बल्कि एक ठन संकल्प बन गे रीहिस। अजीत, ममता अऊ भारती के संग मिलके, वो मन जऊन योजना बनाइन, ओमा शोभित के दू भरोसेमंद साथी—गिरिराज अऊ मंटू के भूमिका सबले ज्यादा महत्वपूर्ण रीहिस। ये दूनो झन शोभित के पत्रकारिता के सफर के संगवारी रहिन, जऊन मन आज घलो अपन दोस्त के ईमानदारी म गर्व महसूस करथें।

आगू दिन हजारी लाल जेल के बाहिर संतरी भोला अऊ बंधू के आगू खड़े रहिस। फेर आज ओकर संग गिरिराज अऊ मंटू घलो रहिन। गिरिराज अपन कुर्ता के बटन म छिपे हिडन कैमरा लगाय रहिस, अऊ मंटू दूरिहा ले पूरा मंजर रिकॉर्ड करे बर एक हाई-टेक रिकॉर्डर तैयार रखे रहिस।

हजारी लाल रोय असन नाटक करत कीहिस,

“भोला भइया, घर ले कुछ गहना गिरवी रखके पैसा लाय हवँव। शोभित ला थोड़ा अच्छा खाना दे देहू अऊ एक बेर फोन में बात करा देव।”

लालच म अंधा होगे भोला अऊ बंधू तुरंत पैकेट ले लीन। भोला हॉंसत कहिस,

“हजारी, तैं चिंता झन कर। इहाँ मोबाइल के रिचार्ज, बीड़ी,सिगरेट, तम्बाखू , दारू सब मिलथे, बस तैं पैसा देत रह। में जाके ओला मोबाइल देवथों, तें दस मिनट बात कर ले, फेर ध्यान राखबे अंदर के बात बाहिर नई जाना चाही।”

ओही बखत मंटू इशारा करके गिरिराज ला संकेत दीस। गिरिराज बड़े चालाकी ले बात ला घुमा दिस,

“अरे भोला भइया, ये शोभित तो बड़े जिद्दी हवे। कहिथे बाहिर मोर बदनामी होगे हे। फेर ये बतावव, तूमन मन जऊन ‘मोटा रकम’ लेथव, वो ऊपर तक जाथे का?”

भोला, जऊन ओ बखत नशा म धुत रहिस, अपन बहादुरी अऊ ‘नेटवर्क’ के घमंड म सब राज खोल दीस। वो कहिस,

“ऊपर तक जाथे बेटा, एकरे सेती तो जेल के हर कोना हमर हवे। हम जेन ला चाहबो अपराधी बना देबो, अऊ जेन ला चाहबो रिहा करवा देबो। ये तो नेताजी के आदेश रहिस कि शोभित ला तोड़ना हे, एकरे सेती हमन ओला तड़पाथन।”

सब कुछ रिकॉर्ड होगे रहिस , घूस लेय के वीडियो, जेल के भीतर दारू पार्टी अऊ मोबाइल के व्यवस्था, अऊ सबले बड़े बात नेताजी के इशारा म एक निर्दोष ला फँसाय के इकबालिया बयान। उही साँझ हजारी लाल, अजीत, ममता अऊ भारती ला गिरिराज अऊ मंटू वो रिकॉर्डिंग ला देखा इस अउ बड़े-बड़े स्थानीय अखबार अऊ सोशल मीडिया मन में वायरल करदिस।

आगू दिन बिहनिया होत-होत पूरा शहर म हड़कंप मच गे। जऊन पत्रकार ला ‘दंगाबाज’ कहिके बदनाम करेगे रीहिस, ओकर समर्थन म जनता सड़क म उतर आइन। विपक्षी दल पूरा राज्य में भारी हंगामा मचादिस, जगा-जगा सत्ता पक्ष के किरकिरी होवत रीहिस, आखिर में मुख्यमंत्री के दफ्तर ले जांच के आदेश जारी होगे। मंत्री ला पद ले हटा दे गे रीहिस, जेल प्रशासन म जऊन संतरी मन ‘राजा’ बनके बैठे रहिन, ओ मन ला तुरंत सस्पेंड करदीस। प्रशासनिक व्यवस्था में दुरुस्तीकरण हा सच के ऊपर पड़े परदा उठा दे रीहिस, न्यायालय के फैसला आगे। 


​हजारी लाल अउ ओकर संगवारी अजीत, ममता अउ भारती जेल के गेट के आगू खड़ें रिहिन। आज ओ मन के हाथ म न्यायालय के वो आदेश रीहिस, जेकर बर हजारी लाल ह अपन जीवन के सब ले बड़े संघर्ष करे रीहिस। शोभित के बेकसूर होय के प्रमाण मिल गे रीहिस, अउ ओकर रिहाई के हुकुम होगे रीहिस।

​हजारी लाल के धड़कन बढ़त जात रीहिस। ओकर मन म एक आस रीहिस— 'मोर बेटा निर्दोष साबित हो गेहे,अब अपन बेटा ला घर ले जाहूँ।'

​जेल में बंद संतरी भोला अउ बंधू के चेहरा आज उतरगे रीहिस, काबर कि गिरिराज अउ मंटू के स्टिंग ऑपरेशन ह ओ मन के कमर तोड़ दे रीहिस। जब हजारी लाल, मोना अजीतमन  संग शोभित के कोठरी म पहुँचिस, त शोभित ह दीवाल ला टेक के बइठे रीहिस। ओकर देह म जगह-जगह जखम के निसान रीहिस।

​हजारी लाल ह दौड़ के ओला गोदी म उठा लीस, "बेटा शोभित! देख, तोर बाबू आ गेहे। तें अब आजाद हस, कोनो तोर बाल घलो बांका नइ कर सकिन।"

​शोभित ह अपन बाबू के गोदी में मुड़ी रखिस। ओकर साँस उखड़त रीहिस, फेर ओकर चेहरा म एक संतोष के भाव रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस-"बाबू, मोर रिहाई के अब कोनो जरूरत नइ हे। ये जेल के कोठरी म मंत्री के निर्देश में ये मन मोला अतना मार मारे हे कि मोर शरीर अब टूट चुके हे, फेर मोर कलम ला ओ मन नइ तोड़ पाइन। 

नेता मन के इशारा म मोर ऊपर बहुत टार्चर करिन... बाबू, मैं सच ला देख के मरत हौं, इही मोर सबसे बड़े जीत आय।"

​अतका कहत-कहत शोभित के प्राण ह ओकर ददा के गोदी म ही चिरई कस उड़ागे। हजारी लाल अउ मोना के चित्कार ले जेल के दीवार काँपगे।

​हजारी लाल के ऑंखी ह अब पथरा गे रीहिस। ओकर बेटा ह मर गे रीहिस, फेर ओकर ऑंखी म अभी घलो वो चमक रीहिस, जेमा दुनिया ला सही रद्दा देखे के ताकत रीहिस। महतारी मोना ह काँपत हाथ ले ओकर ऑंखी ला देखिस।

​हजारी लाल ह भारी मन ले कहिस, "शोभित ह हमेशा सच के पहरेदार बन के जीये हे।  शोभित के देह में नील के निसान रीहिस, मानों ओला कोनो बेरहम मनखे ह नइ, बल्कि कोनो जंगली जानवर ह नोच डारे हवय। ओकर पत्रकारिता के धरम ह आज ओकर सजा बन गे रीहिस। गॉंव भर के जेमन तमाशा देखत रीहिन, शोभित के मौत के खबर सुनके सन्न रहिगे। शोभित के पत्रकार संगवारी मंटू हा हजारी लाल ला बताईस कि जब वोहा शोभित ला देखे बर जेल गे रीहिस त ओ हा केहे रीहिस " ध्यान लगा के सुन मंटू भाई, बाबू ला बता देबे अगर मोला कुछू कहीं हो जाही, त मोर ऑंखी ला दान करवा देबे, ताकि मोर मरे के बाद भी ये दुनिया म सच ला देखे बर कोनो के ऑंखी में जीयत राहँव।" आज ओकर देह नइ हे, फेर ओकर ऑंखी तो ये दुनिया म रहिहीं। ये ऑंखी मन वो भ्रष्टाचारी मन ला देखिहीं, जे मन आज भी खुल्लम-खुल्ला घूमत हें।"

​गिरिराज ह आगू बढ़ के कहिस, "कका, तुमन आज एक महान काम करत हव।"

​हजारी लाल ह अपन बेटा के आखिरी इच्छा पूरा करिस। शोभित के ऑंखी ला दान कर दीस। कुछ दिन बाद, हजारी लाल ला पता चलिस कि शोभित के ऑंखी एक अइसे गरीब लइका ला लगे हे, जेकर बाबू ला उही भ्रष्ट नेता हा जमीन ले बेदखल कर दे रीहिस।

​आज जब हजारी लाल ह वो लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित मरे नइ हे। आज भी ओकर बेटा हा कोनो भी अंश में दुनिया में जीयत हे अउ गरीब मनखे के मेहनत भरे जीवन में ईमानदारी के चमक बगरावत दुनिया ला देखत हे। हजारी लाल के ऑंखी ले आँसू गिर जथे, फेर आज ओ आँसू म गम नइ, बल्कि गर्व रहिथे। ओकर अन्तर आत्मा कहिथे -

​"सत्य ला दबाए जा सकथे, फेर ओकर जोत ला बुझाय नइ जा सके। मनखे मर जथे, फेर ओकर विचार अउ ओकर देखे के नजरिया हमेशा अमर रहिथे। सच हा अंगरा आवय, एक दिन उजागर होही।" 


लेखक

डॉ.अशोक आकाश

बईला**

 *बईला** 

एक ठन शेर हर हिरण के शिकार करे बर दंउड़ात राहय।हिरण हर दंउड़त- दंउड़त दू ठन बईला तिर पहुंच के बंचाय बर कहिथे ।करिया बईला,सफेद बईला मन कहिथे हमर राहत ले संसो झन कर।वतका म शेर आगे अऊ कहिथे ये मोर शिकार आय तूमन आगू ले हट जाव।बईला मन जोम दिस ऐकर ले पहिली तोला हमर ले निपटे ल पड़ही।सांगरमोगर(मोठडांट)बईला ल देख के शेर के दाल नी गलिस।अऊ लहुट गे।शेर मने मन गुने लगिस अऊ कोलिहा ल बुला के कहिथे,ते हर कसनो करके दूनो झिन ल एक दूसर ले लड़वा दे।ताहने दूनो झन ल एक एक करके खा जहूं।सबले पहिली कोलिहा हर सादा बईला तिर गिस अऊ कहिथे मे जे बात बताहूं तेला कखरो तिर मत गोठियाबे।अऊ कहिथे तै हर बहुत सुंदर अऊ समझदार हस तेकर सेती करिया बईला तोर ले जलथे।ताहने (फेर) कोलिहा हर करिया बईला तिर जाथे अऊ कहिथे तै हर अतिक मोठडांट ताकत वाला हस अऊ वो सफ़ेद बईला हर कहिथे,हमन ऐकर सेती बंचे हन के मोर मेर समझदारी हे नही ते शेर ह तईहा के खा जतिस।ये हर बने बात नोहे।मेहनत तो तै हर जादा करथस अऊ सबासी वो लुटत हे।अब धीरे-धीरे दूनो बईला मे मन मुटाव लड़ई शुरू हो जथे।अऊ अब दूनो झिन अलग-अलग रेहेके शुरू कर देथे।ऐकर फायदा उठा के शेर हर एक -एक झन ल शिकार बना लेथे।


           फकीर प्रसाद साहू 

                सुरगी 🙏

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के थरहा ग़ज़ल के ग़* पोखन लाल जायसवाल

 *छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के थरहा ग़ज़ल के ग़*

पोखन लाल जायसवाल 

छत्तीसगढ़ी साहित्य मं साहित्य के जम्मो विधा मन मं लिखई-पढ़ई चलत हे। गीत, कहनी ले आगू निबंध, संस्मरण, व्यंग्य सबेच मं कखरो न कखरो कलम चलत हावय। नवा पीढ़ी के लिखइया मन के रुझान छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल डाहन थोरकन जादती दिखे ल मिलत हे। लिखई के पहिली विधा के जानबा होना खच्चित जरूरी बात आय। बिकट झन मन विधा अउ छत्तीसगढ़ी व्याकरण ल थोरकन चेत नइ करत हें, अइसे लगथे।  लिखई च मं लगे हावॅंय। ए बने बात आय, फेर लेखन मं विधा के शिल्प अउ भाषाई शुद्धता घलाव होना चाही। कुछ सुजानिक अउ बुधियार मन घलव एकर सुध नइ लेवत हें। जउन ह छत्तीसगढ़ी बर नकसान के बात आय। संसो के बात घलाव।

   

ए दूनो डाहन चेत करत एक किताब आय हे - ग़ज़ल के ग़। अरुण कुमार निगम के लिखे 'ग़ज़ल के ग़' ल छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के थरहा माने जा सकत हे। सजोर थरहा के रोपा लगे ले फसल पोठ होथे। कहूॅं मउसम संग देथे त सोला आना सुम्मत होथे। ए किताब के पहलइया खंड मं ग़ज़ल के शिल्प अउ बारीकी मन ऊपर गहिर ले चर्चा करे गे हे। जउन ह छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल बर थरहा सहीं हे। ग़ज़ल अउ छंद के तुलनात्मक चर्चा ग़ज़ल के बारीकी मन ल समझे मं सरल हे। मार्गदर्शी भी।

      

ग़ज़ल ल एकर शिल्प अउ कहन शैली ले बड़ कठिन विधा माने जाथे। कारण आय, ग़ज़ल लिखई ह गागर मं सागर ल भरई ए। ग़ज़ल के हर एक शेर अपन आप मं मुकम्मल एक कविता होथे। एक शेर माने दू लाइन मं लिखे बर कम से कम शब्द बउरना अउ भाव ल समोना एला कठिन बनाथे। ग़ज़ल के बह्र मन के जानबा घलो संग्रह मं ज़रूरत के मुताबिक सरल ढंग ले बताय गे हे। 

      

ए किताब ल छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के थरहा कहना कुछ झन के नरी मं नइ उतरही। काबर कि छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल तइहा ले लिखे जावत हे। रामेश्वर शर्मा मन अपन संपादन मं छपे 'छत्तीसगढ़ी काव्य एक विहंगम दृष्टि' मं छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल ल जघा दे हावॅंय। जेन मं पुरखा साहित्यकार मन के संग नवा पीढ़ी के रचनाकार मन के ग़ज़ल शामिल करे गे हें। एकर अलावा कई ठन ग़ज़ल संग्रह घलो 'ग़ज़ल के ग़' के पहिली छप चुके हें। फेर उन मं शामिल ग़ज़ल मन बह्र सम्मत् नइ दिखें। विधा विशेष के गोठ करत खानी ओकर शिल्प ल ताक मं रखे नइ जा सके। शिल्प या बुनावट या स्वरूप ले ही विधा के नाम दिये जाथे। अइसन मं शिल्प मं समझौता ठीक बात नोहय। रचना ल शिल्प के कसौटी मं खरा उतरना च चाही। 

      

'ग़ज़ल के ग़' संग्रह ला खुद अरुण कुमार निगम एक मार्गदर्शिका बताॅंय हवॅंय। उहें डॉ. साकेत रंजन प्रवीर मन अपन भूमिका मं ए संग्रह ल छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के अरुणोदय बताय हें। एकरे संग दूसर भूमिका मं लिखत सूफी हाज़ी डॉ. इसराइल 'शाद' लिखथें - 'केवल ग़ अभी ज़ अउ ल बाकी हे...' ए दूनो भूमिका बताथें कि छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के शुरुआत भर होय हे। एला अभी लम्बा सफ़र तय करना हे। 

      

दूसर खंड मं, अरुण कुमार निगम मन अपन लिखे ग़ज़ल मन के तक्तीअ करत हुए ग़ज़ल ल बह्र मं लिखे के अभ्यास बर सुग्घर मार्गदर्शन करे हें। बिना बह्र के ग़ज़ल हो नइ सकय। छंद के माध्यम ले ग़ज़ल लेखन मं हाथ अजमइया मन ल एक बात के पक्का धियान राखे के हावे कि दूनो के कहन एके नइ हे। फरक हे। कोनो भी एक छंद एक कविता होथे। फेर ग़ज़ल के एक-एक शेर माने दू मिसरा एक कविता ए। 

     

ग़ज़ल ल ओकर कहन शैली ह छंद ले बिल्कुल अलगेच खड़ा करथे। प्रचलित 32 बह्र मं अरुण कुमार निगम के लिखे ग़ज़ल मन प्रभावित करथें। युग के संग ग़ज़ल के तेवर बदल गे हावे। अब केवल रूमानी अंदाज के ग़ज़ल नइ लिखे जावत हे। यहू चीज़ ये संग्रह मं देखब मं आथे। कुल मिला के ए खंड के ग़ज़ल मन नवा लिखइया मन बर मील के पथरा साबित होहीं। 


एक ठन ग़ज़ल के मतला अउ एक शेर देखव -


हमर ननपन के कहानी नॅंदागे।

दया सॅंग मया अउ मितानी नॅंदागे।


बिदेसी हवा मा उड़त हें जवानी 

शरम लाज ऑंखी के पानी नॅंदागे। (पृष्ठ 66)


    कहावत अउ मुहावरा मन ल ग़ज़ल मं समो लेना अरुण कुमार निगम के खासियत हे। गहिर बात समाय घलव हे। एकर ले भाव सौंदर्य मं बढ़ोतरी घला दिखथे।


जात के भेद भाव बिसराके 

चैन के बंसरी बजाना हे। (पृष्ठ 57)


तॅंय बोल धीरे से 'अरुण'

दीवार मा भी कान हे।  (पृष्ठ 78)


सुराजी के मजा ला जान पाही का कभू बइला

फॅंदाय हे जे घानी मा बॅंधे खूॅंटा किंजरना हे। (पृष्ठ 109)

    

संग्रह के तीसर खंड मं ऑनलाइन ग़ज़ल के ग़ के साधक मन के ग़ज़ल शामिल करे गे हें। जेन बताथे कि अवइया बेरा मं  छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल छत्तीसगढ़ी साहित्य मं अपन दमदार हाज़िरी दिही। बशर्ते कि साधक मन ग़ज़ल ला सजोर करे मं सरलग लगे राहॅंय। मिहनत करॅंय।  


मनी राम साहू 'मितान' बड़े बह्र मं बड़े रदीफ संग सुग्घर ग़ज़ल लिखे हें, ग़ज़ल के मतला संग एक शेर पेश हे - 


नवा अब बिहान आही गियाॅं थोरकिन सबर कर।

करू रात हा पहाही गियाॅं थोरकिन सबर कर।।


कला जानथस चिखे के कहे गोठ ला सबन के,

कसा मीठ कस जनाही गियाॅं थोरकिन सबर कर। (पृष्ठ 137)


मिलन मलरिहा के एक मतला अउ शेर प्रस्तुत हे -


एक चिनहा अपन बनाले तैं।

गाॅंव मा जस धरम कमाले तैं।


काम जादा बड़े तो नोहै जी,

पेड़ हर घर गली लगाले तैं। (पृष्ठ 114)


मोहन लाल वर्मा बड़का बात बड़ सहज ढंग ले लिखथें-


आदमी ला गरब अउ भरम होगे हे

बेंच मरजाद ला बेसरम होगे हे। (पृष्ठ 121)


ए संग्रह के कई ठन ग़ज़ल जउन आने-आने रचनाकार के हे, छंद के प्रभाव ले मुक्त नइ हें। ग़ज़ल के कहन/शैली मं कमसल लागत हें। अपन पुरखा मन के लिखे साहित्य के भाव अउ ग़ज़ल के शिल्प मं तालमेल बिठावत ग़ज़ल लिखे जाही त छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल निश्चित रूप ले अपन नवा मुकाम हासिल करही। नवा उॅंचास देके के जिम्मा नवा पीढ़ी के कंधा मं हे। 

 

अभी हिंदी ग़ज़ल मन के तुलना मं छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल मं बहुत कुछ करना बाकी हे। फेर ए कहे जा सकत हे कि छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के भविष्य सुनहर दिखत हावे। 'ग़ज़ल के ग' के थरहा रोपे ले ग़ज़ल के फसल अउ गहादही, लहलहाही, एमा कोनो शक-सुबा नइ हे।


टंकन मं कुछ जघा त्रुटि हावे, जउन ल अवइया संस्करण मं सुधार किए जा सकत हे। चैन हा सब जघा 'चौन' होगे हावय। ग़ज़ल भीतरी पेज़ मं गजल होगे हे। बनाले/सजाले/बलाले....मं  'ले' अलग होना चाही। तभे संयुक्त क्रिया रूप मं भाव स्पष्ट होही। छपाई अउ काग़ज़ के क्वालिटी बढ़िया हे। मुख पृष्ठ आकर्षक हे। डोंगरी पहार संग छत्तीसगढ़ के सुघरई के पहचान झलकत हे।

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल ल नवा दिशा दे के उदिम मं अरुण कुमार निगम के ये उदिम अउ कोशिश अतुलनीय हे। स्तुत्य हे। अभिनंदनीय हे।

अरुण कुमार निगम जी ला हार्दिक बधाई अउ शुभकामना।

०००

संग्रह:  ग़ज़ल के ग़ 

रचनाकार: अरुण कुमार निगम 

प्रकाशन: वैभव प्रकाशन रायपुर 

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पोखन लाल जायसवाल 

पलारी (पठारीडीह)

जिला बलौदाबाजार-भाटापारा (छत्तीसगढ़)