Wednesday, 8 July 2026

हजारी लाल के ऑंसू" छत्तीसगढ़ी कहानी

 "हजारी लाल के ऑंसू"  छत्तीसगढ़ी कहानी 



    हजारी लाल जैसने अपन घर ले बाहिर गोड़ मड़ाईस, परोसी मन घूर-घूर के देखे लगीस। परोन दिन बिहनिया ओकर बेटा शोभित ला पुलिस ऊपर पथरा फेंके के जुलुम में गिरफ्तार करे गे रीहिस। नेता अफसर मन के दिन भर चक्कर काटे के बाद भी शोभित ला घर लाय के कोनो जुगाड़ नइ जमीस। ओकर ऊपर दंगा भड़काय, शासकीय काम में बाधा डाले अउ आतंक मचाय के धारा लगादीस। पारा के सबे मनखे मन ईंकर परिवार के मेहनत अउ तरक्की ला देख के अब्बड़ जलन भाव राखय। एकर सेती ये मन ला दुखी देखके, ओ मन ला पहिली बेर सुख के अनुभति होईस। 

      हजारी लाल अउ ओकर बाई मोना दिन रात इहॉं ले उहॉं घूम-घूमके थकगे, ओकर बदन करियागे, मुहूँ सुटकगे रीहस फेर ओकर दुलरवा बेटा ला छोड़ाय के कोनो जुगाड़ नइ जमिस, न दिन में आराम न रात में नींद। 

इही तो दुनिया आय, मुसीबत में घिरे मनखे के सहारा बने ला छोड़ के ओकर मजबूरी के लाभ उठैया कतको हे। बखत के मार हा बड़े - बड़े बलशाली ला कोकराके मड़ियाय ल मजबूर कर देथे। शोभित प्रजातंत्र के चौथा स्तम्भ पत्रकारिता के क्षेत्र में ईमानदारी से काम करत रीहिस। ओहा जानत रीहिस कि जीवन कैसे जीना हे, का अच्छा हे का बुरा हे। ओकर बचपन के एक दू झन संगवारी मन मंदहा होगे रीहिसे, महतारी मोना के कतको रोक टोक के बाद भी ऊँकर दोस्ती नई छूट सकिस। गलत संगति के सजा अच्छा मनखे ला घलो भुगते ला पर जथे। बेरा के पटकनी में शोभित के उज्जर जिनगी में फोकटे फोकट दाग लगगे। 

ठोकर जीवन के पाठशाला हरे, कुछ मनखे ठोकर खाके सम्हल जथे अउ सुधर जथे, कुछ मनखे मन नवॉं तरीका ले अपडेट होके फेर उही रद्दा में चल पड़थे त कुछ मनखे के जिनगी के दिशा बदल जथे। शोभित हा पत्रकारिता के माध्यम ले सच ला जनता के आगू लाके, भ्रष्टाचारी मन ला एकक करके लाईन में खड़े कर दे रीहिस। एकर सेती शोभित के पॉंव पुट दुश्मन बन गे रीहिस। 

        

​शोभित ह "प्रजातंत्र के चौथा स्तंभ" के मर्यादा निभात, शहर म बनत एक बड़े सरकारी पुल के भ्रष्टाचार के भंडाफोड़ कर दे रीहिस। ओहा अपन रिपोर्ट म सप्रमाण देखाय रीहिस कि कैसे नेता अउ बड़े अफसर मन मिलके घटिया निर्माण सामग्री के प्रयोग करत हें, जेकर सेती कतको मनखे मन के जान ला खतरा हे।

शहर म उही पुल के पास जनता ह विरोध प्रदर्शन करत रीहिस। मंदहा संगवारी मनके उभरौनी में शोभित उहॉं केवल एक पत्रकार के नाते सच ला रिकार्ड करे बर गे रीहिस। अचानक भीड़ म कुछ "भाड़ा के गुंडा" मन घुँसगे, जे मन ला उही भ्रष्टाचारी नेता मन भेजे रीहिन। जइसे ही पुलिस ह भीड़ ला तितर-बितर करे के कोशिश करिस, उही गुंडा मन पुलिस ऊपर पथरा फेंके बर शुरू कर दीस। तब जवाब में शोभित के मंदहा संगवारी मन तक पथरा चला दे रीहिन। शोभित ह अपन कैमरा म ऊँकर मन के चेहरा कैद कर ले रीहिस, जे मन असल म पथरा फेंकत रीहिन त ओकर कैमरा ला छीने बर पुलिस के भेस म कुछ मनखे ओकर ऊपर टूट पड़िन।

​शोभित ह अपन कैमरा ला बचाए बर जब संघर्ष करिस, त ओला "शासकीय काम म रुकावट" अउ "पुलिस ऊपर हमला" के झूठा आरोप में फँसा दीस। ओकर ऊपर पुलिस ऊपर पथरा फेंके, भीड़ ला उकसायके, सरकारी काम में बाधा डारे के झूठ मूठ आरोप लगादीन ताकि दुनिया ला ये लगे कि एक पत्रकार ह दंगा भड़कावत हे।

​हजारी लाल जब जेल म शोभित ले मिलिस, त ओकर ऑंखी म आँसू रीहिस। शोभित ह सिसकत कहिस-

​"बाबू, मैं हाथ म कलम एकर बर धरेंव कि मैं सच लिख सकँव, फेर ये भ्रष्ट तंत्र ह मुहीं ला अपराधी बना दीस।  मैं पुलिस ऊपर पथरा नइ फेंके हौं, मैं तो ओ मनखे मन के चेहरा ला दुनिया ला देखाना चाहत रहेंव, जे मन आम जनता के हक नँगावत हें।"

​हजारी लाल ला अब समझ आइस कि शोभित ला ओकर ईमानदारी के सजा मिले हे। शोभित ह भ्रष्टाचारी मन के ऑंखी के किरकिरी बन गे रीहिस, जेकर सेती ओ मन ओला अपराधी साबित करे म लगगे रीहिन।



​हजारी लाल जैसे ही अपन घर के ओसारी ले बाहिर गोड़ मड़ाईस, आगू चउपाल म बइठे परोसी गजाधर अउ बिदेसी जेन ह मंत्री के चापलूस कार्यकर्ता रीहिन तौन मन एक-दूसर कोती देखके मुस्कुराइन। गजाधर ह जोर से सुनावत कहिस—

​"का होगे हजारी भाई? बड़े जोर-सोर ले बेटा ला पढ़ा-लिखा के पत्रकार बनाये रेहे, अब तो ओहा 'बड़का नाम' कमा लीस! पेपर म ओकर फोटो छपे हे, फेर हाथ म कलम नइ, पथरा हे। अब बताव पुलिस ऊपर हमला करना अउ दंगा भड़काना ही तुहर संस्कार आय का?"

​बिदेसी ह घलो बहती गंगा म हाथ धोवत कहिस— "सही कहत हस गजाधर, अतका घमंड रीहिस एकर परिवार ला अपन तरक्की ऊपर। देख ले, भगवान के घर म अंधेर नइ हे। अइसन औलाद ले तो निसंतान रहना अच्छा हे, जेकर सेती कुल म दाग लग जाय।"

​हजारी लाल के भीतर जैसे कोनो ज्वालामुखी फूट पड़े रीहिस। ओकर बदन गुस्सा अउ दुख ले काँपे लगीस। ओहा थिरकत आवाज संग कड़ा स्वर म कहिस - ​"चुप रहा बिदेसी! अउ तहूँ चुप रा गजाधर! तुमन ला का लगथे कि मोर शोभित अपराधी आय? जेन लइका ह रद्दा म गिरत मनखे ला देख के हॉंसे नहीं, तुरत उठाय बर दौड़ पड़थे, कोनो चहकत चिरई मन ला कभू नइ मारिस, ऊँकर चहकन भरे आजाद जिंदगी में अपन मन के खुशी देखथे। ओहा कभू पुलिस ऊपर पथरा फेंकही? दुशमनी करैया, जलन मरैया मनखे संग हॉंस के गोठियाथे मोर बेटा हा। तुमन तो ओकर मेहनत ले जरत रहेव, एकर सेती आज तुमन ला सुख मिलत हे। फेर सुरता राखहू शोभित के हाथ म पुलिस ह जबरदस्ती के आरोप लगायहे, काबर कि ओकर कलम ह तुँहर चहेता नेता मन के भ्रष्टाचार के पोल खोलत रीहिस।"

​हजारी लाल के ऑंखी ले अंगारा बरसत रीहिस। ओहा आगू कहिस - ​" का सच्चाई ला कालिख पोत के लुकाये जा सकथे, अउ कतक दिन ले? आज मोर बेटा के उज्जर जिनगी में दाग लगादीन बेईमान मन, फेर मोर अंतरात्मा काहत हे कि मोर बेटा निर्दोष हे। तुमन ला तमाशा देखे म मजा आवत हे न? देख लेव... फेर जब सच बाहिर आही, त तुमन अपन मूंह लुकाये बर जगा नइ पाहू।"

​अतका कहिके हजारी लाल हफरगे, मोना ह भीतर ले दौड़ के आइस अउ हजारी के हाथ ला धरके सम्हाल लिस। परोसी मन ह हजारी के अइसे उग्र रूप ला देख के सन्न रहिगे। हजारी लाल के ऑंखी म आँसू अउ गुस्सा के अइसे संगम रीहिस कि सकलाय दसों मनखे मनके बोले के हिम्मत नइ होइस।


       हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानो कोनो ओकर गोड़ म मन भर के सांकर बांध दे होही। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे काली तक शोभित ला "गाँव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।

​हजारी लाल ह कछेरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आँसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गूँठा सब बेंचागे। फेर शोभित जेल के करिया कोठी ले नइ निकल पईस। ​हजारी लाल जब जेल के भारी लोहा के दरवाजा तीर पहुँचिस, त ओकर भेंट जेल के संतरी बचपन के संगवारी भोला ले होईस। भोला के ऑंखी म कोनो दया भाव नई रीहिस, बस एक लालच केवल चमक रीहिस। हजारी लाल ह हाथ जोड़ के बिनती करिस, "भोला भाई, मोर लइका शोभित ले एक बेर मिला दे।"

​भोला ह तिरछी नजर ले देखिस अउ खैनी थूँकत कहिस, "अतका अराम ले नई मिले हजारी। ये जेल आय, इहॉं हवा घलो बिना कीमत के नई मिले। अउ तोर बेटा ऊपर तो 'आतंक' के धारा लगे हे।"

​उही मेर एक दूसर संतरी बंधू घलो आ गे। ओहा धीरे से हजारी लाल ला बाजू म ले जाके फुसफुसाइस, "देख हजारी, हमर साहब मन ला खुश करना पड़थे। जेल के भीतर अपराधी मन लाल बीड़ी, सिगरेट, दारू अउ मोबाइल रिचार्ज तक के बेवस्था हो जाथे, फेर एकर बदला मोटा रकम लगथे अगर तोर बेटा ला बिना मार-पीट के अराम से रखना हे, त 'खर्चा-पानी' के इंतजाम कर।"

​हजारी लाल सन्न रह गे। ओहा सोचिस—बाहिर नेता मन भ्रष्टाचार करत हें अउ ये रक्षक मन भक्षक बने हें। बंधू ह आगू कहिस, "जेन मनखे मन ह शोभित ला फँसाए हे, ओ मन हम ला पैसा दे हे, ओला तंग करे बर। अब अगर तूमन शोभित ला बचाना चाहत हव, त ओकर ले दोगुना रकम देना पड़ही।"

​हजारी लाल के ऑंखी ले टपटप आँसू गिरे लगीस। ओकर मन म हूक उठीस— 'मोला काय मालूम रीहिस भगवान कि न्याय के मंदिर कहे जाने वाले ये जगह म ईमानदारी के नीलामी होथे।'

​शोभित ले मिले बर भोला अउ बंधू ह हजारी लाल ले ओकर हटहा अंगूठी अउ गॉंठ म बंधाय आखिरी के पाँच सौ रूपया घलो झपट लीन। जब हजारी लाल ह शोभित ला देखिस, त ओकर कलेजा फटे कस होगे। शोभित एक कोना म डर्राय दुबके बइठे रीहिस, धीरे से कहिस, "बाबू, इहॉं सबे जिनिस बिकाऊ हे। संतरी मन मोला मोबाइल में बात करे बर कहत रीहिन ताकि मैं तुँहर मन करा फोन लगाके अउ पैसा मंगा सकौं, फेर मैं मना कर देंव। बाबू, ये मन मोला तोड़ना चाहत हें।"

​हजारी लाल ह अपन बेटा के काँपत हाथ ला थामिस अउ संतरी मन कोती देखिस, जेन मन दूरिहा में खड़े होके अइसे हॉंसत रीहिन मानो कोनो शिकार ला फँसा ले हें। हजारी लाल ला समझ आगे कि ये लड़ाई सिर्फ कानून ले नई, बल्कि ये सड़े हुए तंत्र ले घलो हे।

         कोनो मनखे राहय मुसीबत के बेरा सबके मति छिंही-बिंही हो जथे, का करँव काकर करा जाके गोहराँव, कुछू समझ नइ आय। हजारी लाल कोनो बड़ा रहीश नइ रीहिस जे अपन खजाना खोलके लइका ला नियॉंव देवा सकय। ऐसन में ओला अपन बचपना के संगवारी अजीत के सुरता आईस, नवॉंपारा महामाईं मंदिर के पाछू किराया के घर में रहिके न्याय के मंदिर के सेवा करथे, ओकर सहयोगी ममता अउ भारती दूनो के दूनो कई ठन गंभीर मामला ला आसानी से निपटाय हवे। हजारी लाल के मन में जइसे एक आस के दीया जर उठिस। जब दुनिया के रद्दा बंद हो जाथे, तब पुराना संगवारी के सुरता अइसने आथे, जइसे अंधियारी रात में ध्रुव तारा।

      हजारी लाल ह तेवर मंझनिया अपन थके जॉंगर ला घसीटत नवापारा महामाईं मंदिर के पाछू पहुँचिस। उहॉं टीन छानी के साधारण घर के बाहिर बोर्ड टंगे रीहिस— "न्याय अउ सेवा केंद्र"। खिड़की में लगे गुलाबी परदा भीतर ले गोठियाय के आवाज आवत रीहिस।

​हजारी लाल ह थरथरात आवाज लगाईस, "अजीत... ओ अजीत भाई?"

​अंदर ले एक मनखे ह बाहर निकलिस, ओकर चेहरा म सादगी अउ ऑंखी म न्याय के चमक रीहिस। ओकर संग म ममता अउ भारती घलो आईन, वो मन फाइल अउ कानूनी सलाह वाले कागजात धरे रीहिन।

​अजीत ह हजारी लाल ला देखिस त ओकर चेहरा म अचंभा आ गे। "हजारी? तैं ? ये का हाल बना डारे हस?"

​हजारी लाल ह ओकर गोड़ म गिर गे अउ फफक-फफक के रोए लगीस। "अजीत, मैं उजरगे हौं। मोर शोभित... मोर दुलरवा बेटा ला 'दंगाबाज' बना के जेल म डाल दे हें। पुलिस-प्रशासन, संतरी-मंत्री सब ओकर पीछे पड़गे हे। मोला कोनो रद्दा नइ मिलत हे।"

अजीत तुरते उठाइस ​ममता ह पानी पियाइस। भारती ह ओकर बात ला ध्यान से सुनत रहीस अउ झटपट पेन उठा के लिखत रीहीस।

​अजीत ह हजारी लाल के खांध में हाथ मड़ाके कहिस, "हजारी, बिपत के बेरा में कोनो मनखे के ताकत नहीं, ओकर हिम्मत हा साथ देथे, तैं रोवत काबर हस? हिम्मत रख, हमर जवानी के दोस्ती कभू हार मानय? हम न्याय के मंदिर के सेवा करथन, अउ जब तक हमर कलम चलत हे, तब तक कोनो बेकसूर ला जेल म सड़न नइ देन।"

​ममता ह ओकर तरफ देख के कहिस, "हजारी कका, घबरा झन। हमन सुनत अउ पढ़त हन कि शोभित ह भ्रष्टाचार के कोनो बहुत बड़े राज ला उजागर करे बर चाहत रीहिस। ओही राज के डर ले ओला फंसाए गे हे।"

अजीत का सबे मामला ला पूछतगीस हजारी बतावतगीस त भारती ह ओकर फाइल म शोभित के केस के सारा विवरण लिख लीस। सबे मामला ला समझके ममता के मंता भोगागे वो भड़क के कीहिस "कका, ये जेल के संतरी भोला अउ बंधू के भ्रष्टाचार के जतेक सबूत हे, ओकर जमा-जोखा हमन करबो। ईंकर मन के 'मोटा रकम' मांगे के खेल ला हमन मुख्यमंत्री के जनदर्शन अउरी बड़े अधिकारी तक पहुंचाबो।"

​हजारी लाल ला लागिस जइसे ओला कोनो संजीवनी मिल गे हे। अजीत ह ओला भरोसा दिलाइस, "तें चिंता झन कर। आज के रात हमन योजना बनाबो। कल जब तें फेर जेल जाबे, तब शोभित ला कहिबे कि ओकर डरे के कोनो जरूरत नइ हे। शेर के बच्चा हे ओहा, शेर कस बाहर आही।"

        अब तो हजारी लाल के आँसू अब ओकर कमजोरी नइ रीहिस, बल्कि एक ठन संकल्प बन गे रीहिस। अजीत, ममता अऊ भारती के संग मिलके, वो मन जऊन योजना बनाइन, ओमा शोभित के दू भरोसेमंद साथी—गिरिराज अऊ मंटू के भूमिका सबले ज्यादा महत्वपूर्ण रीहिस। ये दूनो झन शोभित के पत्रकारिता के सफर के संगवारी रहिन, जऊन मन आज घलो अपन दोस्त के ईमानदारी म गर्व महसूस करथें।

आगू दिन हजारी लाल जेल के बाहिर संतरी भोला अऊ बंधू के आगू खड़े रहिस। फेर आज ओकर संग गिरिराज अऊ मंटू घलो रहिन। गिरिराज अपन कुर्ता के बटन म छिपे हिडन कैमरा लगाय रहिस, अऊ मंटू दूरिहा ले पूरा मंजर रिकॉर्ड करे बर एक हाई-टेक रिकॉर्डर तैयार रखे रहिस।

हजारी लाल रोय असन नाटक करत कीहिस,

“भोला भइया, घर ले कुछ गहना गिरवी रखके पैसा लाय हवँव। शोभित ला थोड़ा अच्छा खाना दे देहू अऊ एक बेर फोन में बात करा देव।”

लालच म अंधा होगे भोला अऊ बंधू तुरंत पैकेट ले लीन। भोला हॉंसत कहिस,

“हजारी, तैं चिंता झन कर। इहाँ मोबाइल के रिचार्ज, बीड़ी,सिगरेट, तम्बाखू , दारू सब मिलथे, बस तैं पैसा देत रह। में जाके ओला मोबाइल देवथों, तें दस मिनट बात कर ले, फेर ध्यान राखबे अंदर के बात बाहिर नई जाना चाही।”

ओही बखत मंटू इशारा करके गिरिराज ला संकेत दीस। गिरिराज बड़े चालाकी ले बात ला घुमा दिस,

“अरे भोला भइया, ये शोभित तो बड़े जिद्दी हवे। कहिथे बाहिर मोर बदनामी होगे हे। फेर ये बतावव, तूमन मन जऊन ‘मोटा रकम’ लेथव, वो ऊपर तक जाथे का?”

भोला, जऊन ओ बखत नशा म धुत रहिस, अपन बहादुरी अऊ ‘नेटवर्क’ के घमंड म सब राज खोल दीस। वो कहिस,

“ऊपर तक जाथे बेटा, एकरे सेती तो जेल के हर कोना हमर हवे। हम जेन ला चाहबो अपराधी बना देबो, अऊ जेन ला चाहबो रिहा करवा देबो। ये तो नेताजी के आदेश रहिस कि शोभित ला तोड़ना हे, एकरे सेती हमन ओला तड़पाथन।”

सब कुछ रिकॉर्ड होगे रहिस , घूस लेय के वीडियो, जेल के भीतर दारू पार्टी अऊ मोबाइल के व्यवस्था, अऊ सबले बड़े बात नेताजी के इशारा म एक निर्दोष ला फँसाय के इकबालिया बयान। उही साँझ हजारी लाल, अजीत, ममता अऊ भारती ला गिरिराज अऊ मंटू वो रिकॉर्डिंग ला देखा इस अउ बड़े-बड़े स्थानीय अखबार अऊ सोशल मीडिया मन में वायरल करदिस।

आगू दिन बिहनिया होत-होत पूरा शहर म हड़कंप मच गे। जऊन पत्रकार ला ‘दंगाबाज’ कहिके बदनाम करेगे रीहिस, ओकर समर्थन म जनता सड़क म उतर आइन। विपक्षी दल पूरा राज्य में भारी हंगामा मचादिस, जगा-जगा सत्ता पक्ष के किरकिरी होवत रीहिस, आखिर में मुख्यमंत्री के दफ्तर ले जांच के आदेश जारी होगे। मंत्री ला पद ले हटा दे गे रीहिस, जेल प्रशासन म जऊन संतरी मन ‘राजा’ बनके बैठे रहिन, ओ मन ला तुरंत सस्पेंड करदीस। प्रशासनिक व्यवस्था में दुरुस्तीकरण हा सच के ऊपर पड़े परदा उठा दे रीहिस, न्यायालय के फैसला आगे। 


​हजारी लाल अउ ओकर संगवारी अजीत, ममता अउ भारती जेल के गेट के आगू खड़ें रिहिन। आज ओ मन के हाथ म न्यायालय के वो आदेश रीहिस, जेकर बर हजारी लाल ह अपन जीवन के सब ले बड़े संघर्ष करे रीहिस। शोभित के बेकसूर होय के प्रमाण मिल गे रीहिस, अउ ओकर रिहाई के हुकुम होगे रीहिस।

​हजारी लाल के धड़कन बढ़त जात रीहिस। ओकर मन म एक आस रीहिस— 'मोर बेटा निर्दोष साबित हो गेहे,अब अपन बेटा ला घर ले जाहूँ।'

​जेल में बंद संतरी भोला अउ बंधू के चेहरा आज उतरगे रीहिस, काबर कि गिरिराज अउ मंटू के स्टिंग ऑपरेशन ह ओ मन के कमर तोड़ दे रीहिस। जब हजारी लाल, मोना अजीतमन  संग शोभित के कोठरी म पहुँचिस, त शोभित ह दीवाल ला टेक के बइठे रीहिस। ओकर देह म जगह-जगह जखम के निसान रीहिस।

​हजारी लाल ह दौड़ के ओला गोदी म उठा लीस, "बेटा शोभित! देख, तोर बाबू आ गेहे। तें अब आजाद हस, कोनो तोर बाल घलो बांका नइ कर सकिन।"

​शोभित ह अपन बाबू के गोदी में मुड़ी रखिस। ओकर साँस उखड़त रीहिस, फेर ओकर चेहरा म एक संतोष के भाव रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस-"बाबू, मोर रिहाई के अब कोनो जरूरत नइ हे। ये जेल के कोठरी म मंत्री के निर्देश में ये मन मोला अतना मार मारे हे कि मोर शरीर अब टूट चुके हे, फेर मोर कलम ला ओ मन नइ तोड़ पाइन। 

नेता मन के इशारा म मोर ऊपर बहुत टार्चर करिन... बाबू, मैं सच ला देख के मरत हौं, इही मोर सबसे बड़े जीत आय।"

​अतका कहत-कहत शोभित के प्राण ह ओकर ददा के गोदी म ही चिरई कस उड़ागे। हजारी लाल अउ मोना के चित्कार ले जेल के दीवार काँपगे।

​हजारी लाल के ऑंखी ह अब पथरा गे रीहिस। ओकर बेटा ह मर गे रीहिस, फेर ओकर ऑंखी म अभी घलो वो चमक रीहिस, जेमा दुनिया ला सही रद्दा देखे के ताकत रीहिस। महतारी मोना ह काँपत हाथ ले ओकर ऑंखी ला देखिस।

​हजारी लाल ह भारी मन ले कहिस, "शोभित ह हमेशा सच के पहरेदार बन के जीये हे।  शोभित के देह में नील के निसान रीहिस, मानों ओला कोनो बेरहम मनखे ह नइ, बल्कि कोनो जंगली जानवर ह नोच डारे हवय। ओकर पत्रकारिता के धरम ह आज ओकर सजा बन गे रीहिस। गॉंव भर के जेमन तमाशा देखत रीहिन, शोभित के मौत के खबर सुनके सन्न रहिगे। शोभित के पत्रकार संगवारी मंटू हा हजारी लाल ला बताईस कि जब वोहा शोभित ला देखे बर जेल गे रीहिस त ओ हा केहे रीहिस " ध्यान लगा के सुन मंटू भाई, बाबू ला बता देबे अगर मोला कुछू कहीं हो जाही, त मोर ऑंखी ला दान करवा देबे, ताकि मोर मरे के बाद भी ये दुनिया म सच ला देखे बर कोनो के ऑंखी में जीयत राहँव।" आज ओकर देह नइ हे, फेर ओकर ऑंखी तो ये दुनिया म रहिहीं। ये ऑंखी मन वो भ्रष्टाचारी मन ला देखिहीं, जे मन आज भी खुल्लम-खुल्ला घूमत हें।"

​गिरिराज ह आगू बढ़ के कहिस, "कका, तुमन आज एक महान काम करत हव।"

​हजारी लाल ह अपन बेटा के आखिरी इच्छा पूरा करिस। शोभित के ऑंखी ला दान कर दीस। कुछ दिन बाद, हजारी लाल ला पता चलिस कि शोभित के ऑंखी एक अइसे गरीब लइका ला लगे हे, जेकर बाबू ला उही भ्रष्ट नेता हा जमीन ले बेदखल कर दे रीहिस।

​आज जब हजारी लाल ह वो लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित मरे नइ हे। आज भी ओकर बेटा हा कोनो भी अंश में दुनिया में जीयत हे अउ गरीब मनखे के मेहनत भरे जीवन में ईमानदारी के चमक बगरावत दुनिया ला देखत हे। हजारी लाल के ऑंखी ले आँसू गिर जथे, फेर आज ओ आँसू म गम नइ, बल्कि गर्व रहिथे। ओकर अन्तर आत्मा कहिथे -

​"सत्य ला दबाए जा सकथे, फेर ओकर जोत ला बुझाय नइ जा सके। मनखे मर जथे, फेर ओकर विचार अउ ओकर देखे के नजरिया हमेशा अमर रहिथे। सच हा अंगरा आवय, एक दिन उजागर होही।" 


लेखक

डॉ.अशोक आकाश

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