(29 जून कबीर जयंती विशेष)
संत कबीर अउ गुरु के महत्ता...
भक्ति काल म कबीर,सूर,तुलसी,रहीम जइसन महान संत/कवि होइन जेन भक्ति मार्ग ला आलोकित करिन। भक्तिमार्ग म तुलसी दास जी सगुण विचारधारा ला आत्मसात करिन उँहे संत कबीर निर्गुण भक्ति धारा के अप्रतिम कवि के रूप मा स्थापित होइन । एक डहर मुगल शासन अउ दूसर डहर हिंदू समाज म फैले आडंबरवाद के बीच एक समाज सुधारक रूप में संत कबीर समाज ला दिशा दे के काम करिन । उन एकमात्र संत होइन जेन निडर होके हिंद अउ मुसलमान दूनों ला फटकारिन। ये काम तलवार के धार पर रेंगे ले कमतर नइ रहिस।
संत कबीर निर्गुण ब्रम्ह के उपासक रहिन। उँकर राम के दशरथ पुत्र राम से दूर दूर तक कोनो लेना देना नइ रहिन। कबीर अपन संदेश मा जेन हरि की बात करथे वो तो निराकार,अजन्मा अउ अविनाशी हे। उँकर उपासना के पद्धति घला निर्गुण हे। समाज म व्याप्त पाखंड अउ आडंबर ला खतम करे खातिर कबीर निर्गुण ब्रम्ह के सहारा लिन। भगवान के प्राप्ति बार कबीर हा गुरु के महत्ता उपर बल दिन। उँकर अनुसार -यदि गुरु
अउ भगवान दूनों एक सँग आ जाय तब पहिली गुरु के पाँव छूना चाही तेकर बाद भगवान के। काबर भगवान के परिचय तो गुरु ही बताय हवय -
गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय॥
गुरु के महानता बतात हुए संत कबीर कहिथे कि तीन लोक अउ नवग्रह मा गुरु ले बड़का कोनो नइ हे। कर्ता (विधाता ) घलो अपन विधान म बँधे
होय के कारण कर्मफल ल बदल नइ सकय फेर गुरु प्रारब्ध के कर्मफल ला सुकृति में बदले के ताकत रखथे -
तीन लोक नौ खंड में, गुरु से बड़ा न कोय्।
करता जो ना करि सकै, गुरु करे सो होय।।
मनखे के शरीर जहर ले भरे हवय अउ गुरु अमृत के खान आय। तन म भरे जहर के काट अमृत (गुरु) ही हे। यदि सिर कटा के भी (सब कुछ अर्पित करके भी) गुरु मिल जाय तभो ये सौदा सस्ता हवय ;-
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान॥
संत कबीर कहिथे- गुरु बनाय म बहुत ही सावधानी के ज़रूरत होथे। मनखे मन ला चेतात उन कहिथे कि जइसे पानी ल छान के पीये जाथे वइसने गुरु ल भी जान समझ के बनाये जाना चाही। काबर पानी बिना छाने पीये ले बीमारी के संभावना होथे वइसने गुरु के चयन यदि गलत होगे तब मनखे 84 योनि मा भटकत रहिथे। उँकर भवसागर ले पार होना संभव नइ हे :-
गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि ।
बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि।।
गुरु के महत्ता बतात संत कबीर कहिथे - यदि भगवान रिसा जाय तब गुरु के पास जघा हवय जिंहाँ हम ठहर सकत हन। फेर यदि गुरु रिसागे ता मनखे के पास ठहरे बर कोई जघा नइ हे। येकर सेती हर हाल म गुरु के आदर करना चाही-
कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥
सच्चा गुरु शिष्य के सबो भरम ला दूर करथे। गुरु यदि सही रइही तभे शिष्य के शंका समाधान हो सकत हवय। यदि गुरु शिष्य के शंका समाधान नइ कर सकत हे तब अइसन गुरु ला त्यागे बर एक पल भी देर नइ करना चाही -
जो गुरु ते भ्रम न मिटे,भ्रान्ति न जिसका जाय।
सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय।
मनखे ल हमेंशा इही प्रयास करना चाही कि कभू ककरो ले माँगे ल झन परय। माँगना मरे के समान हवय। सतगुरु हमन ला इही शिक्षा देथे कि जीवन में कभू भीख झन माँगव,येकर ले मरना भला हे-
माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख ।
माँगन से तो मरना भला,यह सतगुरु की सीख ॥
गुरु अउ शिष्य यदि लोभी अउ लालची हवय तब ये जान लव कि उन दूनों गलत डोंगा मा बइठे हवय। जइसे पथरा के डोंगा म बइठ के नदिया ला पार नइ करे जा सकय वइसने यदि गुरु अउ शिष्य लोभी अउ लालची होगे तब जीवन के नैया पार करना असंभव हवय :-
गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दाँव।
दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पाथर की नाँव।।
चेला यदि कुबुद्धि रूपी कीचड़ ले भरे हवय तब गुरु अपन ज्ञान रूपी जल ले धो के चेला ल विवेकी बना देथे। शिष्य के कई जन्म के मोरचा /जंग (बुराई) ल गुरु हा ज्ञान रूपी जल ले एक पल मा धो देथे :-
कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय ।
जनम जनम का मोरचा, पल में डारे धोय ।।
गुरु कुम्हार सरिक अउ शिष्य माटी के घड़ा सरिक होथे। जइसे कुम्हार माटी के घड़ा ला भीतर ले सहारा देके बाहिर ले चोट करके सुन्दर बनाथे वइसने गुरु हा शिष्य के बुराई ला अपन ज्ञान के चोट मार के विवेकी बनाथे -
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है,गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट ।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर मारै चोट ।।
संत कबीर कहिथे कि गुरु के बिना ज्ञान मिलना कठिन हे। यदि सत्य ला पहचानना हवय तब गुरु के शरण म जाए ल परही। दोष अर्थात मन के विकार अज्ञानता ल केवल गुरु ही मिटा सकथे। सच-झूठ, पाप-पुण्य,अच्छाई-बुराई येकर पहिचान गुरु ही करा सकथे-
गुरु बिन ज्ञान न उपजै,गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को,गुरु बिन मिटे न दोष॥
गुरु के समान दाता (दानी) कोनो दूसरा नइ हो सकय अउ शिष्य के समान कोई याचक (माँगनेवाला) घलो नइ हो सकय। ज्ञान रूपी अनमोल संपत्ति जेन तीनो लोक के संपत्ति ल भी बढ़ के हे शिष्य जब माँगथे तब गुरु वोला दे देथे। अर्थात ज्ञान रुपी संपदा ल गुरु हा शिष्य के माँगे म सहर्ष दे देथे -
गुरु समान दाता नहीं,याचक शीष समान।
तीन लोक की सम्पदा,सो गुरु दिन्ही दान॥
संत कबीर गुरु के महिमा अपार बताय हवय। यदि सम्पूर्ण पृथ्वी ल कागज बना लिया जाय, जंगल के सबो पेंड़ ला कलम बना लिया जाय अउ सातों समुद्र के पानी ल स्याही बना लिया जाय तब भी गुरु के महिमा ल लिखे नइ जा सकय अर्थात गुरु के महिमा अपरंपार हे -
सब धरती कागद करूँ,लिखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ,गुरु गुण लिखा न जाय॥
मनखे के जब अच्छा दिन होथे तब वो गुरु सो जा के उँकर ज्ञान के लाभ नइ लेवय। अपन सुख के दिन ल मनखे मौज मस्ती म बिता देथे। गुरु के भक्ति नइ करय येकर सेती बाद म केवल पछतावा ही मिलथे। जइसे चिड़िया के चुगे जे बा रखवारी करे ले का फायदा वइसने समय रहत गुरु के बानी बचन के लाभ नइ लेस त बाद में कोई फायदा नइ हे-
आछे दिन पाछे गए,गुरु सों किया न हेत।
अब पछताये होत क्या,चिड़ियाँ चुग गईं खेत।।
संत कबीर यथार्थवादी रहिन। कपोल काल्पनिक बात के उन जमके विरोध करिन। तीर्थ यात्रा उपर सीधा प्रहार करत उन कहिथे-
तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार ।
सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार ।
अर्थात तीरथ करे ले केवल एक पुण्य मिलथे, संत के संगति मिल जाय तब चार फल के प्राप्ति होथे। फेर यदि सच्चा गुरु मिल जाय तब जीवन मा अनेक फल के प्राप्ति होथे। येकर सेती तीरथ ल छोड़ के मनखे ला सच्चा गुरु के खोज करना चाही।
देखा जाय तो संत कबीर हा गुरु ला भगवान के बराबरी मा ला के खड़ा करिन। हिन्दुस्तान के इतिहास म कबीर ही पहिली संत आय जेन अतका बेबाक़ी के साथ गुरु ल भगवान तुल्य स्थान दिन।
सचमुच संत कबीर अउ उँकर संदेश दूनो अद्वितीय रहिस।
अजय अमृतांशु
भाटापारा (छत्तीसगढ़)
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