मुक्त दिवस आय तेकर सेती
"डिग्री दुकान म नॉन अटेंडेंस के खेल"
(छत्तीसगढ़ी व्यंग्य)
अभी अभी के बात आय शहर के बड़ नामी-गिरामी प्रायवेट कॉलेज के प्राचार्य ल
शिक्षा के लोकव्यापीकरण के उदिम बर सम्मान मिलिस। प्रिंट मीडिया सोशल मीडिया वोकर अतेक गुनगान करे लगिस कि हजार मुख वाले बपुरा शेष नाग रहितिस ते अपन फन ल कलेचुप सकेल चुरमुरा के बईठ जतिस। फेर कॉलेज के थीम ल जम्मो शहर जानथे -"एडमिशन लो, ड्रीम लो, अटेंडेंस कौन पूछथे? "कॉलेज" ल "कमाई-लेज" बना डारे हें। "कॉलेज कम, दुकान जादा"। रंधईया खवईया दूनों खुश त कोन ल काय मतलब। फेर जेन लइका रोज कॉलेज आवत हें वोकर मन के पीरा ले कोनो ल काय वास्ता? इहि बात ल मँय पूछेंव- कस सर जी अईसन अन्याय काबर करथव जी? वो कथे- "जिंकर लौठी उँखर भैंस" अउ "समरथ को नही दोष गुसाईं "बात फोकट मा नइ कहे गे हावय। रेगुलर अटेंडेंस वाले स्टूडेंट मन जब एक्जाम के समे नॉन अटेंडेंस वाले मन ल देखथें त फ्यूचर म धनवान बने बर प्रेरित होथें। मन म संकल्प जगथे कि अपन पाहरो म अपन लोग लइका मन ल नॉन अटेंडेंस म पढाहूँ। वोकर लॉजिक सुन के बेहोश होवत-होवत बाँचेव। मन कहिस यहा का अंधेर गर्दी हे।
कॉलेज' के बोर्ड पढ़ के लगथे कि ज्ञान बांटत हें।भीतर जाके देखबे त ज्ञान नई, हाजिरी बेंचावत हे।प्रिंसिपल साहब कहिथे - "बेटा, क्लास आना जरूरी नइये, फीस आना जरूरी हवय।" स्टूडेंट घर मा सूतत रहिथे, हाजिरी रजिस्टर मा अपने आप 'प्रेजेंट' हो जाथें। अउ कहूँ रेगुलर अवईया स्टूडेंट एक दिन अब्सेंट हो जाही त सौ रुपिया फाइन ह कम्पलसरी हे। कॉलेज के नाम 'पढ़ाई-ऐप', फेर लगथे काम गड़बड़ाई ऐप'। एडमिशन अउ आने- आने फीस ल जाने बर कहूँ फोन करबे, कतको किलौली कर ले। ददा रे ददा!वोमन जानकारी कभू नइ देवँय। सोझ कालेज बलाथें। मोबाइल फोन धरके ऑफिस म खुसर नइ सकस।"सावधानी हटी दुर्घटना घटी"। उहाँ कम बोले अउ जादा समझे के बात होथे। "गागर म सागर समई काय होथे तेला जानना हे त उहाँ जाके अपन जीवन ल धन्य कर सकथन।"
जादातर क्लास रूम ल ऊपर मंजिल म बिना शौचालय सुविधा के रखे के कारन ल पूछेंव। बड़ दार्शनिक अंदाज म बताइस कि कतकोन मैरिड फीमेल स्टूडेंट्स मन ल प्रेगनेंसी पीरियड म घेरी-घांव सीढ़ी के चढ़ई-उतरई ले नॉर्मल जचकी के संभावना जादा रहिथे। गोठ सुनके मोर टोंटा सुखागे। दू गिलास पानी गट-गट ले एकसस्सू पियेंव तभे अंतस जुड़ाइस।
नॉन अटेंडेंस डीलिंग सेंटर म पेरेंट्स पूछथे - "सर जी, लड़का कइसन पढ़त हे?" जवाब मिलथे - "बहुत बढ़िया। एको दिन अब्सेंट नइये। रिजल्ट के दिन जरूर आहू। फोटो खिंचवाये बर। फोटू ल फ्लेक्स बनवाके चौक- चौराहा म लगाबोन। फोटू देख के तोर लइका के कैम्पस सलेक्शन के श्योर चाँस रइही। संसो झन कर तोर लइका के अस्सी परसेंट ले उपराहा लाय के ठेका हमर कॉलेज ह लेय हावय। "जइसन- जइसन देहू रे गार्जियन तइसन-तइसन देबो असीस हो। कोनो काय कर लिही हमर दाँत ल अपन पीस हो।।"
लाई डिटेक्टर मशीन कतेक असरदार हे तेला तो जांच एजेंसी कोर्ट कचहरी मन जानतेच्च हें। देश के बड़े-बड़े घोटाला बाज मन ल ये लाई डिटेक्टर मशीन म बइठारे ले एकोकन झूठ नइ बहिराइस न उदबत्ती जलिस। सबूत नइ मिले ले छेल्ला गोल्लर कस अभो घूमतेच्च हें। मने मन कल्पना करे लगेंव कि वैज्ञानिक मन ल "लाई आउटर टेबलेट" (झूठ बहिरावन वटी) बनाय के उदिम करना चाही। जब जुलाब गोली सक्सेस हे त यहू ह होई जाही! येकर सक्सेस होय ले नॉन अटेंडेंस फीस लेउल प्राचार्य संग गोठ-बात करे म कईसन- कईसन बात बहिराही वोला सुनके कतको कवि साहित्यकार मन खंडकाव्य महाकाव्य लिख सकत हें। जइसे:-पचहत्तर परसेंट अटेंडेंस का नियम? अरे ! वो तो पचहत्तर हजार फीस जमा करते साट पूरा हो जाथे। बाकी प्रैक्टिकल के नंबर तो 'गिफ्ट' मा मिल जाथे। संग मा कॉलेज के डायरी-कैलेंडर फ्री।"पहिली डिग्री बर पढ़ना परत रहिस, अब खरीदना परथे। कॉलेज वाले कहिथे - पढ़े बर नई, बड़े बर एडमिशन लो।" कॉलेज के किस्सा सुनबे त दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के मस्त डायलॉग 'जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी ' के सुरता आथे। इहाँ क्लासरूम मा मकड़ी ह अपन जाला बुनत रहिथे अऊ टीचिंग नॉन टीचिंग स्टॉफ मन ऑफिस मा नोट गिनत रहिथें। साहू मैडम पूछथे- सुनो मिश्रा मैडम वो पूरण कोठारी सेकण्ड सेम का ऊपर वाला अमाउंट आपके पास ही है न?
जी मैडम मैंने उनसे अस्सी लिया है पर मैंने उसे पचास का ही रिसिप्ट दी हूँ।
अच्छा हाँ वो जागृति लास्ट सेम वाली जो प्रेग्नेंट है उसका ऊपर वाला डील कर ली न? पचास से ज्यादा ही लेना उनसे।' उँखर आँखी म चमक अउ बड़ कुटिल मुस्कान ल देख के स्टाफ रूम म बइठे जम्मों झन सर मैडम के मुँहू म लार आय कस लगगे।
एडमिशन के दिन साहब हाथ जोड़ के कहिथे - "बेटा, टेंशन नई लेना। पढ़ाई-लिखाई तो बहाना हे, असली काम तो हाजिरी बनाना हे।" लईका पूछथे - "सर, क्लास कब आना हे?"जवाब मिलथे - "क्लास? अरे वो तो एग्जाम के एक दिन पहिली 'क्रैश कोर्स' मा निपटा देबो। तैं बस फीस के किश्त टाइम मा पटा दे।"
अटेंडेंस के जुगाड़ इहाँ 'उंगली' से नई, 'अंगूठी' ले होथे। एक लाख देबे त, पूरा सेमेस्टर प्रेजेंट। दो लाख देबे, टॉपर की लिस्ट मा नाम अऊ फोटो खिंचवाये बर स्टेज फ्री। मास्टर जी खुद कहिथे -"बेटा, कॉलेज तो आये-जाये के जगह नईये। ये तो 'डिग्री-ए.टी.एम हवय - पैसा डालो, सर्टिफिकेट निकालो।" पेरेंट्स मीटिंग मा सबके सामने सौ परसेंट रिजल्ट के बैनर टंगा जाथे, अऊ पाछू लाइब्रेरी मा किताब के जघा ताला लटकत रहिथे। अब तो हाल अईसन हवे कि लड़का नौकरी बर इंटरव्यू दे बर जाथे त इंटरव्यू लेवईया सेटिंग बाज अधिकारी ह पूछथे - " तुम्हे क्या आता है?" लईका कहिथे - "सर, अटेंडेंस के बिना पास होना आता है।
_"पहिली कॉलेज ज्ञान के मंदिर रहिस, अब कलेक्शन-सेंटर बन गेहे। इहाँ सरस्वती के पूजा कभू नइ होवय, लक्ष्मी गिने जाथे। पेपर के पहिली, सेटिंग हो जथे। एग्जाम के महीना भर पहिली 'रेट-कार्ड' जारी हो जाथे। नोटिस बोर्ड मा लिखाये रहिथे - "सप्लाई क्लियर कराना हे? संपर्क करो।"
थ्योरी मा पास होना हे? - बीस हजात लगही।
प्रैक्टिकल मा फुल नंबर? - तीस हजार अऊ गुरुजी बर 'खुशी के मिठाई' अलग से।
'बैक-पेपर' क्लियर? - अरे वो तो 'कॉम्बो-ऑफर' मा हो जाही।
स्टूडेंट एग्जाम हॉल मा जाथे त कलम नई, फोन ले जाथे। गार्ड साहब खुद कहिथे - "बेटा, आराम से लिख। व्हाट्सएप ग्रुप मा आंसर भेज दे हंव।"कॉपी जांचे वाला मास्टर जी लाल पेन से नई, पे टी एम' ले नंबर देवत हे।पेरेंट्स रिजल्ट देख के खुश हो जाथे - "वाह बेटा,अस्सी परसेंट लाये हस।" बेटा मने मन मा कहिथे - " पापा मेरे पापा अस्सी परसेंट तो कॉलेज वाले लाये हावँय, मँय तो बड़ भाग ले तोर असन पापा पाय हँव दू लाख देय पाये हँव।"
कन्वोकेशन के दिन फोटो सेशन होथे। सब लइका गाउन पहिन के 'डिग्री' लहराथें। प्रिंसिपल साहब माइक मा कहिथे -"हमर कॉलेज के होनहार सबो लइका मन अफसर बनहीं।" पाछू बइठे चपरासी मन मा कहिथे - "साहब,अफसर नहीं तोरे जइसन जुगाडू 'फ्रॉड' बनहीं।" पहिली नकल करे वाला रेस्टिकेट होवय, अब नकल करईया मन बेस्ट प्रिंसिपल अवार्ड' ले जाथे। कॉलेज के 'प्लेसमेंट' तो नई होवय, पेमेंट' पक्का हो जाथे।
रोशन साहू 'मोखला' (राजनांदगांव)
7999840942
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