Wednesday, 8 July 2026

छत्तीसगढ़ी लघुकथा *संसकार अउ स्वभाव*

 छत्तीसगढ़ी लघुकथा

*संसकार अउ स्वभाव*

एक गाँव म दू झिन संगवारी रहिन, दुनो झन के स्वभाव अलग रीहिस। एक झन नीम के पाना जइसन रहय, अउ दूसर चंदन के पाना जइसन।

        गाँव के चौपाल म बइठे एक दिन बहस छिड़गे। नीम-जइसन स्वभाव वाला कहिस, “दुनिया म सब्बो मनखे अपन फायदा देखथे। जइसे नीम के पाना कड़ुवा होथे, तइसने सबके मन घलो कड़ुवा हे।”

चंदन जइसन स्वभाव वाला संगवारी मुस्कुराइस अउ कहिस, “संसार म सब्बो एक जइसन नइ होवय। देखव, गाय घास खाथे फेर दूध देथे। मधुमक्खी फूल ले रस लेके मीठा मधु बनाथे। चंदन ला सांप लपेटे रहिथे, फेर चंदन अपन सुगंध नइ छोड़य।”

ओतके म एक कौवा आके नीम के डार म बइठ गे अउ काँव-काँव करे लगिस। थोरकिन दुरिहा म कोयल आम के रूख म बइठके मीठा सुर छेड़ दिस। चंदन जइसन मनखे कहिस, “देखव, दूनो चिरई एके जंगल के हवंय, फेर बोली अउ संस्कार अलग-अलग हवय।” तभे गाँव के बुढ़वा दाऊ कहिस, “मनखे के पहचान ओकर धन ले नइ, ओकर संस्कार ले होथे। नीम कड़ुवा जरूर होथे, फेर औषधि बनके दूसर के काम आथे। चंदन सुगंध देथे फेर उहू कई ठन काम में बड़ उपयोगी होथे। असल बात ये नइ कि कोन नीम हे अउ कोन चंदन, असल बात ये हे कि अपन प्रकृति ले संसार ला का देथन।”

दाऊ के बात सुनके सब्बो चुप होगे। ओ दिन गाँव वाले समझगे कि संसार म जीव-जंतु, रूख-राई अउ मनखे सबके प्रकृति अलग-अलग हो सकथे, फेर अच्छा संस्कार वाला मन हर जगह सुगंध बगराथे, जइसे चंदन। संस्कार मनखे के सबसे बड़का गहना आय, प्रकृति अलग हो सकथे, फेर अच्छा संस्कार संसार ला सुगंधित बना देथें।

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डॉ अशोक आकाश

बालोद छत्तीसगढ़

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