लूट के चक्रबिहू
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चालीस तीर्थ यात्री मन के दल हरिद्वार के एकठन धर्मशाला ले रायपुर वापस आये के तैयारी मा लगे हन।सबके बेग,घोला- झंगड़ी जोरावत हे। धर के आये रहिन हे एक -दू ठन, अब होगे हे तीन -चार ठो।इहाँ ले लगभग 80 -90 किमी दूरिहा बड़का स्टेशन सहारनपुर ले रात के बारा बजे छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस पकड़ना हे। वापसी बर उही आखिरी ट्रेन। अचानक दल के मुखिया हा पूछिस--"बतावव स्टेशन कामा जाबो। "
"कामा जाबो --- "चलो बस स्टैंड। उहाँ ले बस पकड़ लेबो।"--एक झन कहिस।
"हाँ, बात तो सही हे। बस स्टैंड दूरिहा हे टेम्पो मा जाये ला परही। अउ उहाँ बस सही टाइम मा नइ मिलिच ता का होही?--मुखिया कहिस।
" त अइसे करथन मुखिया जी।एकठो प्राइवेट बस कर लेथन। लगेज तको जादा हे। इहाँ ले अराम से दू बजे निकलबो तभो सात-आठ बजे तक उहाँ पहुँच जबो " -- एक झन दीदी कहिस।'
वोकर विचार मा सब सहमत होगेन। दू-तीन झन जाके बस करके, चार हजार एडवांस देके आगें। ठीक दू बजे धर्मशाला ले 40-50 मीटर दूरिहा खड्डा चौक
मा बस खड़ा होही अइसे बताये गिस।
बस के अगोरा करत ढई बजगे। हम सब घबराये ला धरलेन। मुखिया हा बस वाले ला फोन कर-करके परशान होगे। बस वाले हा अचानक फोन करके कहिस--
" पुलिस वाले खड्डा चौक में बस को नहीं जाने दे रहे हैं। बस आगे के चौक में लगा है वहीं आ जाओ।"
" वाह वहाँ काबर आएंगे। तुम तो यहाँ तक आने के बात किए थे?'--मुखिया कहिस।
" आना है तो जल्दी टेक्सी करके आ जाओ। जादा बात मत करो। नहीं तो मैं चला। "--बस वाला धमकावत कहिस
सुनेंन त काटो त खून नहीं। सकपकाये मुखिया कहिस- "चलो टेक्सी मा उहाँ तक जाबो।"
देखते देखत बीस- पचीस ठो टेक्सी धर्मशाला तीर गिधवा कस मंडराये ला धरलीन। प्रति सवारी सौ रुपिया मा बात होइस। जाके बस मा समान रखके बइठेन त साँस मा साँस आइच।
रात के नौ बजे बस सहारनपुर पहुँचके रुकगे। बस वाला कहिस--"चलो उतरो।"
हमन पूछेंन-- " स्टेशन तो नइ दिखत ये। आगे का? "
वो हा टेंचरही मारत कहिस-- "वो 500 मीटर आगे हे।"
" तो वहाँ तक चलो ना। बात स्टेशन तक छोड़ने की हुई थी। "-मुखिया कहिस।
"ये रेलगाड़ी नहीं है, बस है, यहीं तक आती है। चलो जल्दी खाली करो। बहस मत करो।"
वो हा रास्ते मा किराया के पूरा पइसा ला ले ले राहय। हमन भोंदू बनगेन। सब उतरगेन तहाँ ले स्टेशन-स्टेशन काहत कहाँ ले बतरकिरी कस टेक्सी वाला मन झपागें। प्रति सवारी सौ रुपिया मा स्टेशन तक छोड़ें के बात होगे। सब लकर-धकर बइठगेन। स्टेशन ले उही साठ-सत्तर मिटर दूरिहा मा जम्मों टेक्सी रुकगें। फेर उही चलो उतरो-उतरो होगे।
मैं कहेँव स्टेशन तीर लेग न जी भईया, अतेक दूरिहा मा उतारत हस।
वो मोर बात ला अनसुना करके समान ला उतार दिच। सबे टेक्सीवाला मन ओइसने करिन अउ किराया लेके फरार होंगे। तहाँ ले लाली कुर्ता वाले कुली मन आगे। पूछे ल धरलिन--" कहाँ जाओगे, कौन से ट्रेन में जाओगे? "
हमन बतायेन--" रायपुर--छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस। "
" ठीक है, वो उधर उसपार, तीन नंबर में आएगी.बहुत दूर में है। तुम लोगों का लगेज ज्यादा है। जिस बोगी में तुम लोगों का रिजर्वेशन है वहीं पर छोड़ देंगे। सौ सौ रुपिया लगेगा। "
मरता क्या न करता सौ सौ रुपिया देके प्लेटफार्म मा आगेन तब जी मा जी आइच।
गाड़ी आके खड़ा होइच तब पता चलिस कि वो बोगी तो बनेच दूरिहा मा आगू मा हे। वो कुली मन सही जगा मा लानें हें कहिके कोनो डिस्प्ले ला नइ देख पाये रहेन--विश्वास घात होगे।
हम सब लकर धकर बेग मन ला घिरलावत दऊड़ेन। दुये चार झन पहुँच पाइन। गाड़ी छूटेबर सीटी मारे ला धरलिच। सबके हालत खराब होगे।गाड़ी धीरे धीरे सरके ला धरलिच।कई झन माई लोगिन मन रोये ला धरलिन।अचानक फेर बीस-तीस झन लाल कुर्ता वाले मन आके संगे संग दऊँड़त कहे ला धरलिन --चलो चलो बैठो --समान हम चढ़ा देते हैं। दो दो सौ रपिया लगेगा। हव काहत जेन बोगी मेर पहुँचे राहन तेने मा खुसर गेन। ओमन समान ला दरवाजा मा फेंक फेंक के चढ़ा के दू दी सौ अइंठ लिन। रेंगत गाड़ी रुकगे जेन पाँच मिनट ले रूके रहिस। अइस त तो दू मिनट नइ रूके रहिस।
मैं बइठे-बइठे सोचत हँव--ये लूट के चक्रबिहू बनाये मा-- बस वाला, टेक्सी वाला मन के, कुली मन के अलावा अउ कोनो शामिल रहिसे का?
चोवा राम वर्मा 'बादल '
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