Wednesday, 8 July 2026

माटी झोंकनी लुगरा

 *​माटी झोकौंनी लुगरा*

        ​गाँव में बिहनिया जब सुरुज नरायन अपन सोनहा किरन बगराथे, त बइला के घंटी, चिरई-चिरगुन के चहक अउ माटी के सोंधापन ले पूरा गाँव जाग उठथे। हमर गाँव मं रहय शांति - सीधी-सादी, मेहनती अउ अपन मइके के मान रखैया बहू। बिहाव के बाद वो अपन ससुरार ला सुंदर चुक्क ले सजावत मइके अउ ससुरार दुनों घर के इज्जत ला एके जइसन मान देत रिहिस।

​शांति के दाई हमेशा काहय - ​“बेटी, मइके ले मया में देवल लुगरा चाहे कैसनो राहय, ओकर मान ला राखबे, हमन नइ रहिबो त भाई भउजी संग लुगरा गतर बर झगरा झन करबे। भाई भउजी के मान ला भी ओतकेच रखना हे, जतका ते हमर मन के मान रखे हस। हमर पुरखा के कीर्ति हा फरिहर हे एमा कभू दाग मत लगन देबे। भाई के मान तोरो हाथ में हे बेटी। मोर बात ला मान ला रख लेबे।” ​ए बात शांति के मन मं गहिरा बसगे रहिस। शांति के घरवाला समारू गाँव के समझदार अउ मेहनती किसान रहिस। गरीब जरूर रिहिन, फेर स्वाभिमान ले भरपूर। ऊँकर एकेच लइका रहिस - बल्लू। बचपनेच ले अड़ियल अउ जिद्दी। जेन बात मन मं बइठ जावय, ओला पूरा करे बिना चुप नई होय। ओकर जिद के सेती शांति अउ समारू हरदम परेशान रहंय। बल्लू कभू कपड़ा बर, कभू खिलौना बर अइसन रार ठानय कि घर के बर्तन-भांड़ा फेंक देवय। समारू अउ शांति ओला कतको समझाय, फेर ओकर जिद दिन-ब-दिन बाढ़त जात रिहिस।

        पूस के जाड़ हाड़ा  कँपावत रिहिस, बड़हर किसान मन के धान मिंजई बॉंचे रिहिस। छोटे किसान मन बढ़ो डरे रीहिस। गाँव मं एक दिन बड़े मड़ई भराय रिहिस। चारों मुड़ा चकाचौंध रहिस। मड़ई मं टट्टू  सवारी देखके लल्लू के मन अटक गे।

“मोला अभी टट्टू चढ़ना हे, अउ ओकर मालिक ला पूरा पइसा देके ओला घर लाना हे!”  वो अइसन जिद धरिस जऊन गरीब समारू के बस के बाहिर रिहिस।

​समारू ओला हाथ जोड़के समझाइस- “बेटा, अभी हाथ मं पइसा नई हे। फसल बेंचाय हे पैसा मिलही त देखबो। अभी धीरज धर।”

​फेर बल्लू कहाँ मानने वाला रिहिस! वो बीच मड़ई मं जमीन मं लोट-लोट के रोये लगिस, अपन कपड़ा फार डारिस। गाँव के लोगन मन खड़े होकर हाँसय - "देखव, समारू के लइका कइसन तमाशा करत हे, दाई-ददा ला रस्ता मं ला के छोड़ही।"

​समारू लाज के मारे मुड़ गड़ालिस, शांति के आँखी ले धारे-धार आँसू बहे लगिस। ओ दिन शांति ला पहली बेर महसूस होइस कि बल्लू के ये जिद केवल बाल-हठ नई हे, बल्कि ये हा हमर लइका के संस्कार ऊपर ऊँगली उठावत हे। 

         ​ओही बीच शांति के मइके पीपरछेड़ी ले ओकर भतीजी के बिहाव के नेवता आइस। शांति अपन भउजी बर अब्बड़ सुग्घर 'माटी झोकौंनी लुगरा' ले के बड़ जतन ले बक्सा मं सम्हाल के रखे रहिस। वो केवल एक कपड़ा नई रहिस, ओहर मइके के मान, पुरखा मन के असीस अउ ओकर दाई ले मिले संस्कार अउ मया के प्रतीक रिहिस। बिहाव मं जाय बर शांति ओही लुगरा ला निकालिस अउ अगरबत्ती देखा माथा लगा के बक्सा में अउ कपड़ा मन संग धरे बर सिघयावत रीहिस। 

​उही समे बल्लू फिर मड़ई वाले टट्टू ला बिसाए बर पइसा मांगत रार ठान दिस। समारू खेत गे रिहिस, शांति बल्लू ला दुलार करत किहिस -"बेटा, मइके जावतहन, ओती तोर मामा ह तोला नवा कपड़ा देही। अभी जिद झन कर।"

​ए बात ला सुनके बल्लू के गुस्सा सातवाँ आसमान मं चढ़ गे। वो चीखिस - "मोला मामा के कपड़ा नई चाही, मोला अभी पइसा चाही!"

​अउ गुस्से मं अंधरा होके बल्लू ह शांति के हाथ ले ओ पवित्र 'माटी झोकौंनी लुगरा' ला छीन लिस। शांति चिल्लावत रहिगे -"छोड़ बेटा, वो तोर आजी के असीस आय, ओला झन छु।" फेर जिद्दी बल्लू ओला घसीटत बाहिर परछी मं लेगीस अउ ओ कंचन जइसन साफ लुगरा ला गंदा गोबर-माटी मं सान के गोड़ में रौंद दीस। ​शांति अवाक रहिगे। ओकर मइके के मान आज ओकर अपन लइका के पैर के नीचे माटी मं मिलगे रिहिस, वो रोत-रोत बइठगे। समारू जब खेत ले आइस अउ ए दशा ला देखिस, त ओकरो छाती फाटगे। ओ दिन घर मं चूल्हा नई जलिस, बल्लू घलो डर के मारे कोना मं दुबक गे रहिस।

         ​शांति ह रोना-धोना छोड़के एक कड़ा फैसला लिस। ओकर दाई कहय — "मार-पीट ले मनखे नई बदले, ओला ओकर गलती के अहसास कराना जरूरी हे।"  शांति ह ओ माटी मं सने लुगरा ला पहिरलिस। बल्लू अपन दाई ला ओ गंदा-दाग वाले कपड़ा मं देखके झेंपगे।

​समारू ओ दिन बल्लू ला जबरदस्ती संग मं खेत ले गीस। जेठ के दुपहरिया धूप मं, जब धरती आगी उगलत रहिस, समारू ह बल्लू ला गोड़-हाथ मं छाला पड़े किसान मन ला देखाइस। ओकर ददा के घलो बदन पसीना ले तर-बतर रहिस।

​समारू कहिस-

​“देख बेटा, ये जऊन माटी तोर पैर के नीचे हे, एहा हमर अन्नदाता आय। ए माटी मं मेहनत करके कतको पसीना बोहा जाथे, तब जाके दुनिया के अउ खुद के पेट भरथे। तैं जेन तोर महतारी के मइके के सम्मान लुगरा ला माटी मं साने हस, ओला कतको धोबे त दाग नई छूटे। मेहनत अउ इज्जत कमाए मं जिनगी बीत जाथे, फेर एक जिद ओला माटी मं मिला देथे।”

​घर मं शांति ह बल्लू ला गोदी मं बइठा के अपन मइके के कहानी सुनाइस कि कइसे ओकर ददा बल्लू के नाना ह गरीबी मं घलो कभू ककरो आगू हाथ नई फइलाईन, कइसन भूखन लांघन सो गीन फेर अपन ईमान अउ मान ला बचाय राखिन। ​धीरे-धीरे लल्लू के बाल-बुद्धि मं ये बात बइठ गे। ओला आत्मग्लानि होइस कि ओहा अपन दाई-ददा ला कतका दुख दे हे। ओकर जिद्दी मन अब पिघल चुके रहिस। अब वो जिद करना छोड़ दीस, स्कूल मं मन लगा के पढ़े लागिस अउ संझा कुन ददा के काम मं हाथ घलो बंटाए लागिस।

        ​एक साल बीत गे, गाँव मं फेर मड़ई भराय रिहिस, ए दारी समारू अउ बल्लू दुनों दिन-रात मेहनत करके फसल के बने दाम कमाए रहिन। समारू खुश होके बल्लू बर टट्टू सवारी के टिकट ले आनिस अउ कहिस - "ले बेटा, तोर पिछले साल के जिद आज पूरा कर ले।"

​फेर बल्लू मुस्कुरा के किहिस-“ददा, ये टिकट ला मोला झन देव। ओ देखव, रस्ता मं बोधी कका के गरीब लइका मन रोवत हें, ओ मन ला चढ़ा देवव। मोला अब समझ मं आगे हे कि असली खुशी अकेल्ला बर नई, सब्बो संग बांटे मं ही मिलथे, अउ टट्टू चढ़े ले कोई बड़े नई होवय, बड़े त संस्कार ले होथे।”

​बल्लू के मुँह ले अइसन गियान के बात सुनके समारू के सीना गर्व ले चौड़ा होगे। शांति के आँखी मं आँसू आगे, फेर ये आँसू दुख के नई, संतोष के रहिन।

​उही समे शांति के मइके ले ओकर भाई-भउजी मन मड़ई देखे बर ऊँकर घर आईन। ओमन देखिन कि शांति ह आज घलो ओही 'माटी झोकौंनी लुगरा' ला पहिरे हे, जेमा लल्लू के लगाए माटी के हल्के दाग आज घलो दिखत रहिन।

​शांति के भाई ह भावुक होके किहिस - "बहिनी! तैं ह हमर परिवार के लाज रख लेय। ए लुगरा के दाग ये बतावत हे कि कइसन कड़ा समय मं घलो तैं अपन परिवार अउ मइके के संस्कार ला टूटन नई देहस।"

​गांव के सियान मन घलो ओ मन के घर आइन अउ बल्लू के संस्कारी रूप ला देखके कहिन-​“देखव भाई, संस्कार के माटी मं पले लइका कभू बिगड़य नई। शांति सच मं मइके अउ ससुरार दुनों के मान रख लीस। धन्य हे अइसन दाई!”

​ओ दिन शांति अपन पुराना लुगरा ला झाड़त-सवारत मुस्कुराइस। ओकर मन मं अपन दाई के ओही अमर संदेस गूंजत रहिस —

​“माटी झोकौंनी लुगरा सिर्फ कपड़ा नई, परिवार के मान-मरजादा होथे। जेला अड़ियल जिद ह माटी मं साने के कोसिस जरूर करथे, फेर जदि ओमा ममता, संस्कार अउ समझदारी के अमृत डाले जाय, त उही माटी मं सने लुगरा घलो जिनगी के सबसे बड़े ओढ़ना बन जथे।”

लइका मन के जिद ला गुस्सा या मार-पीट ले नहीं, बल्कि सही संस्कार, मेहनत के महत्व अउ धीरज से ही बदले जा सकथे। दाई ददा ले मिले संस्कार मायके-ससुराल के मर्यादा ही विषम परिस्थिति मन में परिवार ला बिखरे ले बचाथे। 

अशोक आकाश

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