Wednesday, 8 July 2026

तीजन बाई के श्रद्धांजलि म मोर लिखे किताब _*‘‘तीजनगाथा’*_ ’ ले _*रखही राम त लेगही कोन ?*_

 तीजन बाई के श्रद्धांजलि म मोर लिखे किताब _*‘‘तीजनगाथा’*_ ’ ले 

_*रखही राम त लेगही कोन ?*_

ये असार-निसार संसार बाजार-पसरा के एक ठिन परसार हरे। विधाता के रचे मया के मेकराजाला ये। एक न एक दिन अवइया सबो ल इहाँ ले जाए बर परथे। आवाजाही लगे रहिथे सरीदिन, सरलग अउ ओसरीपारी। ये मृतलोक म अवतरे हरेक जीव ल अपन-अपन करम के फल ल भोगे बर परथे। जीवात्मा के भल-अनभल कोनो करम ओकर पाछु ल नइ छोड़य। पीछु जनम के भल करम भाग बनके त अनभल करम बिपत बनके जीवात्मा के संग चलथे।

कोन जानथे, निच्चट गँवार, अनपढ़ अउ गरीब घर-परिवार म अवतरे तीजन बाई का करम करे रिहिसे ? जेन हँ काल के सऊँहत देवता यमराज के फाँदा ल टोर-फाँदके लहुुट आइस अपन डेरा म। ताबूत के दुवार ल उघार साबूत खड़ा होगे अपन कंुदरा म।

बात वो पइत के हरे, जब तीजन बाई छै दिन भर के रिहिसे। फूल हँ झरके लोई भर धरे रिहिसे, माने भइगे ... तीजन बाई अवतरके तियार भर होय रिहिसे।

पारधी परिवार म छेवरिहा माइलोगन मन जँचकी के छठवाँ दिन मुड़ मिंजके नहाथे-धोते। नहा-धोके नवा कपड़ा धारण करथे। छठी माई के पूजा करथे। पूजा करके अपन सही सलामती अउ स्वस्थ लइका खातिर छठी माई के पाँव तरी धन्यवाद पठोथे, जेला बरही नहाना कहिथे।

तीजन बाई के महतारी सुखबती अपन वो नवा-नवा बियाए नान्हे लइका ल बने धोइस-पोंछिस। धो-पोंछके सुग्घर नवा कपड़ा म लपेट लिस अउ परोसिन राधा घर छोड़के नहाए बर तरिया गै। वोतका बेरा झुनुक लाल कुछु काम लेके परोस के डेरा कोति गये राहय।

परोसिन राधा तको लइकुसहीन रिहिस। लइकुसहीन नहीं, भलकुल लइकच रिहिस हावय। जादा चेतलग नइ रिहिसे। लइकाजात कतेक बेर ले एके ठऊर म ठहिरे राहय भला। लइका के जात, न पाँव माड़य न बात ठाढ़य। लइका के मिले लइका उहू खेले बर भागगे। एति घर म नान्हे लइका तीजन बाई अकेल्ला परगे।

थोरके बेरा बुलके ले सुखबती नहाके तरिया ले आगे। घर म लइका के रोए-खेले के थोरको आरो नइ पाइस। महतारी, महतारी होथे। जब तक लइका के किलकारी कान म नइ परय, तब तक महतारी के मन नइ भरय, न माड़य। मनखे मन तो संसो के समुन्दर होथे, ओकरो मन म संसो अवतरगे। लइका ल जिहाँ सुताके गे रिहिस, उहाँ लकर-धकर गिस। लइका ल नइ देख-पाके ठाढ़ सुखागे सुखबती। 

बोमफार के रोए लगिस -‘हाय ! मोर लइका, कोन चोर चोराके लेगे।’

सुखबती के रोवा-राही ल सुनके पारा-परोस के जम्मो मनखे सकेलागे। सब के सब बक्क-खाए एक दूसर के मुँह ल देखत रहिगे। कोनो फोर फरिहा के त कोनो गुपचुप इसारा ले एक दूसर ल पूछे लगिन - 

‘का होगे ?’

सुखबती तो रोवई गवई म चेत ले बिचेत होगे रिहिस। जब कोनो कोति ले कोन्होच हँ कुछु जुवाब नइ पाइस, तब राधाबाई ले ये रोए-गाए के कारण पूछे गिस। सबो के पूछ-परख ले राधाबाई के मन म अपन गलती उफले के डर हमागे। ओकरो बुध छरियागे। उहू घबराके रोए लगिस।

वोतके बेरा परोसी डेरा के एक झिन लइका रामू दऊँड़त आइस अउ हँफरत बताइस -‘कालू (उन्करे पोसवा कुकुर) हँ अपन मुँह म कपड़ा असन कुछु दबाए-चबाए डेरा के पछीत म सपटे बइठे हे।’

तब तक लोगन ल पता चलगे रिहिस के सुखबती के लइका नइ दिखत हावय। अब उन मन ल समझत चिटको देरी नइ लगिस -

‘अच्छा ! त डेरा ल सुन्ना पाके कालू हँ सुखबती के लइका ल उठाके लेगे हावय।’

रामू के गोठ ल सुन सुखबती मारे डरके चीचियाके रोवत बेहोष होगे।

बिना सियान के ध्यान नइ होवय, ध्यान बिना ग्यान नइ मिलय, अउ बिना ध्यान बिना ग्यान के कोनो बूता म सफलता नइ मिलय। मान अउ बड़ई के बात तो गजब दूर के कौड़ी होथे। तेकर सेति सियान मन के उचित मान अउ सम्मान के ध्यान रखना चाही। सियान मनखे ग्यान, ध्यान अउ कल्याण के सऊँहत, सवाँगे, साक्षात मूर्ति होथे। 

सियान मन समझावत कहिन -‘रोए -गाए ले बनत बात बिगड़ जही। कलेचुप राहव। तुँहर हो-हल्ला सुनके कालू बिफड़ परही त जऊँहर हो जही। कालू के मति बिगड़े ले बिन मारे के मारे बिपत बाढ़ जही, आफत आ जही।’ 

मारनेवाला ले बचानेवाला बड़े होथे, तेकर सेति बचानेवाला ल हमर संस्कृति म ईष्वर के दर्जा देहे गे हावय।

जेन कभू ककरो बिगाड़ नइ करे राहय तेकर बिगाड़ कोनो नइ करे सकय। वोकर रक्षा-सुरक्षा खातिर साक्षात मुरली मनोहर गोवर्धन धरके आ जथे। भेष चाहे काकरो होवय, भाषा चाहे काँही होवय, भूषा चाहे कुछु होवय। रूप-स्वरूप तो वोकर बर तुरूप के पत्ता हरे। मँगरा के मँुह मारे हाथी के पीर म, भरे सभा बीच द्रौपदी के चीर म, त इन्द्र के बज्र बरसा म ब्रजवासी मन के धीर म ..... कोन खड़ा होइस हे.....उही मुरली मनोहर बंषी वाले जेला सबो मनमोहना कहिथन। 

सियान मन उपाय सुझावत कहिन -‘झुनुक लाल रोटी धरके पछीत म जावय। कालू ल रोटी के टुहु देखावत वोला अपन तीर म बलावय। कालू मालिक के बात मानके रोटी के लालच म झुनुक लाल तीरन आ जही। अउ जइसे ही कालू लालच म वो कपड़ा के गठरी ल छोड़के रोटी कोति लपकही, ओतकेच बेरा कोनो चेतलग मनखे चतुरई ले सावधानी से जाके झट्ट ले वो गठरी ल ले लानही।’

ये किसम ले सियान मन के रोंठ-पोठ उदीम-उपाय ले तीजन बाई काल के गाल ले उबरके नवा जनम धरिस। झुनुकलाल सुखबती के जिनगी ले वो उदासी के अंधियारा छँटगे।


_धर्मेन्द्र निर्मल_ 

_9406096346_

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