संस्मरण
वह फ्राक वाली तीजन
मेरा मामा गाँव महका है। हम लोग गनियारी को पार करके जाते थे। वहाँ की डबरी मेरे नानाजी ने बनवाया था। गाँव जाते समय हम लोग वहाँ कभी कभी उतर कर हाथ पैर धोते थे। हमारे मामाजी लोगों के ये लोग जानते थे। हम दोनों की उमर बराबर है।
वहाँ पर खेलते रहती थी, उसके साथ दो तीन और बच्चे रहते थे। मुझे तो कोई मिल भर जाये, खेलना बात करना शुरु कर देती थी। मैं दौड़ते वहाँ चली जाती थी उसके साथ खेलती थी। वहाँ पर खुले मे ये लोग चटाई बनाते थे और झाड़ू। मामा जी चटाई वहीं से ले जाते थे।
मेरे लिये तीजन नाम अनोखा था इस कारण ये मुझे याद रही।जब भी मामा जी आते थे तो तीजन की उन्नति के बाते में बताते थे।
मेरी शादी हो गई तो एक बार गाँव में ही नाचा रखे थे तब तीजन का एक घंटे का कार्यक्रम रखे थे। क्योंकि मामा जी के गाँव की थी।
उसके बाद मैं विवेकानंद आश्रम में मिली। उसका कार्यक्रम था।
दो घंटे तक चला था। आत्मानंद जी सामने जमीन पर बैठ कर पूरा सुन रहे थे। जब उतरी तो हम लोग बाजे के कमरे के बाहर में मिले। वहाँ पर बैठी थी।माँ ने पूछा "चिन्हत हस तीजन?"
" वह देखती रही फिर नहीं करके सिर हिला दी। स्वामी जी हंस रहे थे। माँ ने कहा "महका मोर मइके आये। जेठूलाल झुमुकलाल मोर भाई आये।"
वह तुरंत बोली ",रायपुर वाली फूफू आस का?"
पैर पड़ने झुकने लगी तो माँ ने उसके दोनों हाथ को पकड़ लिया।"ये कोन आये?"
हाँ मोर संगवारी बेबी आये।"
मेरे हाथ को पकड़ कर बोलती है " मोर असन संग खेले बर आवस बहिनी।"
दोनों मुस्कुराते रहे। यही हमारी सालों पहली प्यारी मुलाकात थी। उसके बाद एक बार और कार्यक्रम हुआ थख मैं देखकर वापस आ गई।
पहले हम लोग बड़े थे दाऊ थे करके। वह मिलने में झिझकती थी। पर अब वह बड़ी हो गई थी। मुझे उससे मिलने में अच्छा नहीं लग रहा था। मिलती तो हम लोग क्या बातें करते। बचपन के प्यार भरे सम्बंधों के बीच का समय के अन्तराल का सन्नाटा। मैं उसके बचपन का डिलडौल और फ्राक को याद करती हूँ। आज वह एक छोटे से गाँव गनियारी से निकल कर पूरी दुनिया की हो गई है।
सुधा वर्मा, 5/7/2026
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