मँय नदिया अँव
मँय नदिया अँव पहाड़ ले निकल के कलकल छलछल अपन लय मा बोहावत निर्मल मीठ जलधारा अँव हाँ भई हाँ मँय नदिया अँव
पर्वत राज मोर जनम देवइया अउ समुंदर मोर पति आय, मँय अपन महतारी के कोरा ले निकल के, कहूँ धारा के रुप म त कहूँ झरना के रूप म इठलावत, हाँसत गावत, अपन धरती-महतारी के पाँव पखारत, सब ला तर करत । सरलग बोहावत रहिथँव, अउ आखिर म अपन पति समुद्र देव के विशाल-हृदय म समा जथँव ।
तभे तो मोर प्रतिष्ठा म केहे जाथे -
"रविपीत जलातपात्यये पुनरोधेन हि पुण्यते नदी"।
मोर विशाल हृदय अउ मोर रूप ल देख के मोला नद याने दरिया तको केहे जाथे। अउ सरलग बोहावत मोर प्रवाह के सेती प्रवाहिनी, अउ सरिता नाम तको मिले हे। ये भुइयाँ म मोर अलग-अलग रूप के सेती, मोर लइका मन मोर कई ठन नाँव राखे हे-
जइसे - गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी,कृष्णा, कावेरी, नर्मदा सिंधु, महानदी अरपा, शिवनाथ अइसन कई ठन नाँव मोर लइका मन महतारी के रूप म मोर बर आस्था कर पूजा-पाठ करथें । मोर मान गऊँन म कोनो कमी नइ करय फेर महू ह, अपन लइका मन के मान राखत उँखर हर जरूरत ल पूरा करथँव चाहे वो आर्थिक होवय चाहे सामाजिक या धार्मिक सबो प्रकार म अपन लइका मन के काम आथँव ।
समाय हे मोर धार म, सभ्यता के सुग्घर कहानी ।
जल जंगल ले जिनगी चलथे, बोहाथे जब नदिया के पानी ।
मानव सभ्यता के विकास ल जब पलट के देखथन त, सिरतोन म जीवन के आरंभ पानी ले होय हे । अउ जब पृथ्वी के निर्माण होइस । तेखर कई बछर बाद धरती याने थल भाग के निर्माण होइस, अउ ये थल भाग म जिंहाँ जलधार बोहावत रिहिस, उही ल आगू चलके नदिया के नाँव ले जाने गिस । हमर पौराणिक साहित्य म नदिया ल महतारी अउ पहाड़ ल पिता केहे हे,काबर ये पहाड़ पिता बरोबर विशाल ह्र्दय धीर,अडिग,हम सबके रक्षा बर खड़े रहिथे,अउ नदिया कलकल, छलछल बोहावत रसवंती सरस्वती दाई हरे ।
अगास म घुमरत बादर जब बरसा बनके बरसथे तब धरती दाई वोला अपन कोरा म समेट लेथे, अउ इही जल नदिया म जाके बोहावत रहिथे"
जइसे हमर शरीर के नस म लहू दउँड़त रहिथे ओइसने धरती के लहू बनके ये नदिया मन बोहावत रहिथे। जेन घरती म नव ऊर्जा भरथे।
नदिया के अमृत पानी हमर जीवन के वरवान ।
बार-बार वंदन करँव मँय, सींचय सकल जहान ।
हम देखबे करथन विश्व पटल के थल भाग म कोनो न कोनो नदिया बोहावात रहिथे । आदि काल ले ही नदिया ह महतारी असन हमर पालन पोषण करत आवत हे । धरती दाई संग मनखे, पशु-पक्षी, जीव जनावर, प्रकृति अउ पूरा समाज के सम भाव ले प्यास बुझावत हे।
अउ जब हम सभ्यता के बात करथन त हर सभ्यता के शुरुआत नदी के तीर म होय हे जइसे सिंधु घाटी के सभ्यता नील नदी के सभ्यता । ओखरे खेती भारत भुइयाँ ल शस्य श्यामला तको केहे जाथे।
जल बिना हम जिनगी के कल्पना तको नइ कर सकन । ओखरे सेती आदि मानव पहाड़ जंगल ले निकल के, नदिया के तीर म बस्ती बनाय ले धरिस, जिहाँ निस्तारी पीये के पानी ले लेके सबो निस्तारी संग खेती के शुरुआत होइस, धीरे-धीरे विकास के रद्दा गढ़त गाँव अउ शहर बनिस । आज हम देखथन दुनिया के बड़का ले बड़का शहर नदी या समुंदर के तीर म बसे हे अउ विकसित होय हे, जइसे टेक्स नदी के तीर म लंदन हे, सोन नदी के तीर म पेरिस । भारत म भी गंगा नदी के तट म पटना,वाराणशी कलकत्ता, इलाहाबाद यमुना के तट म दिल्ली अउ जब हम छत्तीसगढ़ के बात करथन त खारून के तट म रायपुर, शिवनाथ के तीर म दुर्ग,अरपा के तीर म बिलासपुर,इन्द्रावती के तीर जगदलपुर अइसने नदिया के तीर-तीर जगा जगा गाँव अउ शहर बसे हे,जे मनखे मन के विकास के कहानी बतावत हें।हम धार्मिक क्षेत्र ल देखन या आर्थिक क्षेत्र ल सबो कोती हमर जीवन के आधार बने हे नदिया
देथे नदिया सीख हम ला, बाधा ले काबर डरना ।
आवय कतको बाधा इहाँ, तभो कलकल बहते रहना ॥
गंगा, गोदावरी यमुना, सतलज, सिंधु कावेरी, सरयु, कालिंदी, महानदी,शिवनाथ, अरपा, पैरी
सब नदिया के आने-आने नाँव हें, सब सरलग बोहावत हें। फेर कखरो के धार शांत, धीर त कोनों के तेज, कोनो अथाह हे त कोनो सकेला कोनो गहिर त कोनो उथली । सबके अलगे-अलगे गाथा हावय –जइसन हम पावन गंगा मइया के बात करन, राजा भगीरथ के घोर तप ले गंगा मइया ल सरग ले धरती म आय ले पड़िस । जेखर अतका प्रचंड वेग के सेती, भोलेनाथ ल अपन जटा म धारण करें बर पड़िस । अउ येकर जल अतेक पवित्र हवय कोनो भी पूजा अनुष्ठान गंगा जल बिना पूरा नइ होवय।
* वाल्मीकि रामायण म उल्लेख हे, गोमती नदी करा, गाय मन चरत घुमत राहय, अउ इही गाय के झुण्ड के सेती एखर नाँव गोमती पड़गे।
अइसने यमुनोत्री करा ले निकले यम के बहिनी होय के सेती यमुना नदी नांव पड़िस। ।
सिंधु नदी के नाँव ले हिंदू अउ हिंदुस्तान के नाँव हमर देश ल मिलिस
सरस्वती नदी के नाँव माता के नाँव लेहे। गोदावरी नदी बड़ पबरित अउ गउ माता कस सब ला अमृततुल्य जल देवइया, गौतम ॠषि एला धरती म लाय हे। तेखर सेती येला गौतमी नदी तको केहे जाथे।
*अइसने महानदी के नाँव द्वापर युग म चित्रोत्पला रिहिस। महानदी के नाँव श्रृंगी ॠषि के प्रिय शिष्या महानंदा के नाँव म रखे गेहे ।
अइसने सबो नदी के अलग-अलग नाँव अपन सुग्घर कहानी ये भुइयाँ म गढ़े हे, अउ अतेक पवित्र, तभे तो नहाय के समे हमन ये पक्त्रि नदी के नाँव लेवत ओखर जल के सुरता करत अपन-अपन भाव रखत पवित्र जल म नहा के अपन देह ल पुण्य के भागी मानथन ।
अउ कहिथन - गंगे च यमुने चैव, गोदावरी सरस्वति ।
नर्मदै सिंधु कावेरी, जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु ।
अउ जब अर्थतंत्र के गोठ करथन त आदि काल ले नदिया हमर जीवन जीये के सहारा बने हे। काबर इही नदिया ले हम ला पीये के पानी मिलथे। पशु-पक्षी, पेड़-पौधा के प्यास बुझाये के संग म खेती बारी बर सिंचई के पानी मिलथे, अउ कृषि तो हमर देश के आधार आय। प्राचीन समय ले ही नदी आवागमन अउ व्यापार के माध्यम रिहिस। आप मन सुरता करव जब सड़क मार्ग के सुविधा नइ रिहिस त घाट म डोंगा ही सबों के सहारा बनय जेन आज मनोरंजन अउ नौका बिहार तक सिमट गेहे,आज सड़क अउ वायुमार्ग होय ले गाँव अउ शहर तीर जल मार्ग के उपयोग कम होगे हे, फेर समुन्दर तीर म बड़का बड़का बंदरगाह हे जिहाँ रोजगार होवत हे भारी भरकम सामान के आयात निर्यात इही मार्ग ले होवत हे। नदी म बने बांध के जलस्रोत ले-बिजली उत्पादन होवत हे, सबो जगा औद्योगिक क्षेत्र म नदिया के पानी ल उपयोग करत हे । अउ अइसन कई ठन रोजगार जेन नदी के तीर म—पनपे हे, अउ उहाँ के विकास ल ऊँच अगास में पहुँचावत हे।
गंगा यमुना सरस्वती, सिंधु कावेरी के धार ।
नमन करव नदी महतारी ला, इही जिनगी आधार ॥
अउ जब हम सामाजिक काम कारज कोती ल देखथन त मनखे के जिनगी म अइसे कोन्हों संस्कार नइये जेन नदी ले जुड़े नइ होही, तभे तो लईका के जनम ले लेके मुंडन संस्कार म बाल ल अर्पण करे ले लेके, मृत्यु के समय अस ठंडा करे तक सबो संस्कार नदिया के जल बिना पूरा नइ होवय। ओखरे सेती तो कहिथे भी न जल ले जिनगी शुरू होथे, अउ जल म ही समाप्त होथे।तभे तो हम नदी ल मेरुदंड तको कहिथन । काबर हमर सभ्यता संस्कृति, रीति-रिवाज नदी तीर म ही सम्पन्न होथे। आदि प्राचीन काल म ॠषि मुनि मन नदी के तीर म ज्ञान प्राप्त करे हे।पवरित नदी के तीर म हमर आस्था के चिन्हारी मेला,मड़ई, कुंभ तको होथे जेन कोनो परख ले कम नइ राहय, लाखो करोड़ भक्त श्रद्धालु पावन नदी म कुंभ नहा के पुण्य लाभ पाथे माघी पुन्नी अउ महाशिवरात्री के बेरा नदी के तीर म मेला भराय मनखे मन के गजब भीड़ अपन हित मीत सगा सोदर ले मिलेक सबके मन के उछाह देखते ही बनथे।अउ जब सांस्कृतिक महत्व के बात करथन त गीत-संगीत म कविता, कहानी बिन नदी के सुघरई ह पुरा नइ होवय ।केहे के मतलब कल्पना ल देखन, कला पेंटिंग, साहित्यक-रचना म नदी के कल-कल धार देखब म मिलथे
कलकल-कलकल तब नदिया करय, बोहावय फरियर धार।
बचा लव प्रदूषण ले आज येला,तभे जीवन होही खुशहाल ॥
हमर छत्तीसगढ़ म कई ठन महत्वपूर्ण नदिया हावय -जउँन ह हमर प्रदेश के जीवन रेखा कहलाथे -
जइस महानदी - सबले बड़े अउ प्रमुख नदी आय
इंदावती नदी- बस्तर के प्रमुख नदी
शिवनाथ - महानदी के सहायक नदी अउ दुर्ग जिला के जीवन रेखा आय
खारून नदी - राजधानी रायपुर के बीच म बोहावत पूरा रायपुर ल सिंचित करथे
अरपा नदी – बिलासपुर के जीवनदायिनी ये
हसदेव - कोरबा के महत्वपूर्ण नदी आय
जोंक नदी - महासमुंद क्षेत्र के
मांड नदी - सरगुजा के जीवनदायिनी
दूधनदी - कांकेर क्षेत्र के
अइसने सबरी नदी, कोटरी नदी अउ संखिनी - डंकिनी नदी बस्तर क्षेत्र म बोहाथे, जिहाँ शंखिनी- डंकिनी नदी के दंतेवाड़ा म संगम हावय, संगम मेर माई दंतेश्वरी के भव्य मंदिर हे जिहाँ माता बिराजे हे।
जब हमन छत्तीसगढ़ राज के नदिया के गोठ करयन त हमर -राजगीत स्वंय नदिया के महत्ता के गाथा गाथे -ये नदिया तो हमर छत्तीसगढ़ महतारी के श्रृंगार आय, महानदी जेन ला चित्रोत्पला के नाँव ले भी जाने जाथे।येला छत्तीसगढ़ के जीवन रेखा गंगा मैया तको केहे जाथे । महानदी धमतरी जिला के सिहावा पर्वत ले निकल के छतीसगढ़ के मैदानी भाग ल सिंचित करत उड़ीसा म बोहावत बंगाल के खाड़ी म समा जथे । छ.ग. म येकर लंबाई 286 किलोमीटर अउ पूरा लंबाई 858 किलोमीटर हवय । येकर सहायक नदी शिवनाथ पैरी, सौंढूर, जोंक, मांड, बोरई, हसदेव, कैलो अउ ईब हरे। महानदी म उड़ीसा म बड़ विशाल -हीराकुंड बांध बने हे । महानदी बेसिन म कई टन जल विद्युत-परियोजना हे, जेखर ले हमन ल बिजली मिलत हे। महानदी म ही गंगरेल परियोजना, हसदेव नदी म बांगो बिलासपुर म जल विद्युत-परियोजना, संबलपुर जिला म हीराकुंड जल विद्युत योजना-सिकासेर जल विद्युत परियोजना । नदिया म बने ये सब परियोजना देश विकास के आज गाथा गढ़त हे ।
महानदी -के पानी ले खेत खार लहलहाबे करथे, फेर महानदी हमर धार्मिक - सांस्कृतिक जीवन म घलो गहिर जुड़ाव हवय। नदी तीर बसे गांव-शहर मन म तिहार बार म, पूजा पाठ अउ मेला लगे रहिथे। महानदी के पबरित जल ल अपन जिनगी म उपयोग करथे। फेर आज के समय म महानदी घलो कई समस्या ले जूझत हें, जेला बचाय बर कई उदिम शुरू होगे हे।
महानदी अउ कई ठन नदी ल, नमामि गंगे प्रोजेक्ट-म शामिल करे गेहे। जेकर ले गंगा मईया जइसन पबरित ये नदी के जल ह तको शुद्ध अउ निर्मल राहय ।
शिवनाथ नदी- के बारे म तो अइसे केहे जाथे ये नदी कभू नइ सुखावय, तेखर सेती ये नदी ल सदानीरा केहे जाथे, ये राजनांदगांव जेला छत्तीसगढ़ के करधनिया, संस्कारधानी कइथे । तेखर उच्चभूमि म अंबागढ़ तहसील के पानाबरस के पहाड़ी ले निकले हे, येकर अँचरा म राजनांदगांव दुर्ग पुष्पित होवत हे । ये नदी राजनांदगांव दुर्ग बिलासपुर अउ जांजगीर, चापा होवत, जांजगीर के सोन लोहरसी करा महानदी म समा जथे ।
इंदावती नदी -हमर बस्तर के शान हरे, ये गोदावरी नदी के सबले बड़े सहायक नदी अउ बस्तर के सबले बड़े नदी होय के गौरव मिले हे। ये उड़ीसा के कालाहांडी पठार ले निकले हे अउ ये नदी बस्तर म 370 कि. मी बोहावत, गोदावरी नदी म समा जथे, इंदावती नदी म बहुत ही सुग्घर चित्रकोट जलप्रपात हवय जेन प्रकृति के अद्भुत सुधरई म एक हे।
अरपा नदी -अरपा नदी कोती देखथन त ये पेंड्रा पठार ले निकल के बरतोरी, ठाकुर देवा करा शिवनाथ म मिल जथे, पुराण म अइसे केहे गेहे 15 हजार साल पहिली इहाँ मनखे मन बस्ती बनाय रिहिस, तभे आज भी इहाँ आदि काल के पथरा के औजार मिलत हे। जेन नदी बिलासपुर के जीवन आधार रिहिस पीये के पानी ले लेके खेती खार,साग भाजी बर किसान के सहारा राहय तेन आज शहर के गंदा पानी, कचरा अउ रेती के ढुलाई के सेती पानी के कमी के पीरा ल झेलत हे । आज ये नदी अपन आखरी साँस लेवत हे, समय राहत येकर संरक्षण बर लोगन के अउ सरकार के ध्यान जाना बहुत जरूरी हे।
अउ हम जब ईब नदी के सुरता करथन त इही सोचथन इहाँ सोना कहाँ ले अइस होही,इहाँ सोना के कण मिलथे जेन बहुत ही सुग्घर उपहार हरे, जेन ल उहाँ के सोन झरिया के कारज म लगे मनखे मन निकालत रहिथे। ये नदी अपन धार के उलटा बोहाथे याने उत्तर ले दक्षिण कोती । छ. ग. के जशपुर जिला म बगीचा तहसील के रानीझूला ले निकल के उड़ीसा म हीराकुंड बाँध के पहिली महानदी म समा जथे ।
अउ जब हम खारून नदी ल देखथन त अइसे लागथे, हमर राजधानी रायपुर येकर कोरा म बइठे खिलखिलावत अपन गौरव गाथा काहत हे। ये नदी बालोद जिला के गुरुर ब्लाक म पेटेचुआ गाँव ले निकल के 250 कि.मी बोहावत,. सिममा रायपुर जिला म सिमगा करा शिवनाथ म मिल जथे, ये करा शिवनाथ अउ खारून के संगम म बाबा सोमनाथ बिराजे हावय, सोमनाथ मंदिर प्रकृति के सुघरई के बीच बने हे,हर साल महाशिवरात्रि म मेला भराथे।
कहन तो नदिया ह मानव सभ्यता ल बसा के राखे हे, अउ ओखर कोरा म सब पुष्पित पल्लवित होवत अपन संस्कृति के गान करत हे।
तरिया डबरी नदिया पटावत, सुखावत हवय धार ।
जीव जनावर सुसकत हवय, जल बिन मचत हे रार ।
आज जब हम नदिया पर चिंतन करथन त चिंतन नइ होवय आज बल्कि चिंता हमर माथ म उभरे ले धर लेथे। काबर इही नदिया जेन अपन कलकल धार ले सबो चराचर जीव जगत ल जीवन देवत हे,तेन आज आखरी साँस गिनत हे। या कतकोन नदिया तो अइसे हे जेन इतिहास के पन्ना म ही देखे सुने बर मिलथे । भारत म तको सरस्वती नदी जेला बचपन ले सुनत आवत हन अइसने सिन्धु नदी। फेर कहाँ हे ये नदी, विलुप्त होय के कगार म हे, त कतको प्राकृतिक परिवर्तन के खेती त कतको मानवीय सभ्यता के सेती - विकास के अंधी दउँड़ म पटागे त कतको के पाट ह सकलागे । अतका सुग्घर निर्मल नदिया अपन सुघरई ल खोवत जात हे, अउ दूसर के आँसू पोछइया ये नदिया खुदे आँसू बोहावत हे, येकर कारण चाहे औद्योगिक प्रदूषण ल काहन या बाढ़त आबादी ल नदिया ल हम जीवन दात्री मानथन, माँ कहिथन त थोकन सोच के देखव, अपन माँ ल हम अपवित्र कर सकत हन । नहीं न, अपन तीर के नदिया खारून महतारी ल देखन त गाँव शहर के बजबजावत नाली के गंदा पानी के बोझ ढोवत हे, प्रदूषण अउ अतिक्रमण के सेती, अपन असल रूप ल खोवत जात हे।पूजा-पाठ ले निकले फूल-पान ल तको नदी में ठंडा कर देथन । कई घँव सोचे बर हम मजबूर हो जथन, ये पवित्र नदी जिहाँ ले निकले रिहिस कतेक सुग्घर अउ पवित्र रिहिस,फेर मनखे मन अपन मानवीय क्रिया कलाप ले येकर पवित्रता ल नष्ट करत हे, अपन महतारी के अचरा म कचरा नइ फेकना चाही धर्म कर्म अपन जगा हे, ओकर बर अलग कुंड बना के पूजा पाठ के जिनिस ल उही म विसर्जन करना चाही । जेन बाद म खाद के तको काम आही,नदिया के शुद्ध जल ल बचाय बर सरकार तो उदिम करत हे, जइसे नदिया विकास योजना,तटबंधन,संवर्धन बर विकास बोर्ड बनाय हे फेर ये योजना मन अभी भी फलित नइ होय हे,सरकार के संगे संग हम सबो के जिम्मेवारी ये नदी जल ल शुद्ध प्रदूषण करे के उदिम म हाथ बढ़ाना चाही ।
जोड़ दव अब सबो नदिया ला, सबके प्यास बुझाही ।
कलकल-छलछल हाँसत गावत, मिलके राग सुनाही ।
बाढ़, सुखा ल नइ फटकन दय, सब सुनता के गीत गाहीं ।
खेती-खार लहराही तभे, नवा बिहान आहीं ।
आज के बदलत मौसम, पिघलत बरफ के पहाड़, अउ-जलवायु परिवर्तन के सेती कई जगा बाढ़ त कई जगा सुखा के पीरा ल हमन झेलत रहिथन । हमर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी के अब्बड़ सुरता आथे । वो कतेक सुग्घर कल्पना करे रिहिस सबो नदी ल आपस में जोड़े के कहूँ उँखर सपना पूरा हो जतिस त हमन ला बाढ़- सुखा अउ पानी के समस्या ले मुक्ति मिल जतिस । खेती-बारी बर पानी, जल विद्युत के बढ़ोत्तरी अउ जल परिवहन पर्यटन के क्षेत्र म तको विकास होतिस । ओकर सेती नदी जुड़ाव कोती ध्यान देके बहुते जरूरत हे।
ओखरे सेती तो कहिथन न जल हे त हमन हन, जल ह जीवन आय। जल हे तभे नदिया, नरवा, झरना, जंगल झाड़ी हे, येकरे सेती धरती के सुघरई हे। जल के हम कतको धन्यवाद करन कमतीच हे। काबर जल हे तभे तो कल हे,पूजा अनुष्ठान म सबले पहिली नदिया के जल ले शुद्धि होथे। शुभता के चिन्हारी कलश म पवित्र नदी के जल भरथन, । पीये ले लेके नहाय धोय तक सबो निस्तारी होथे, पवित्र नदिया मन के नाम ल लेके घर के जल म मिला के पूजा पाठ अनुष्ठान के जल ल तको पवित्र करथन । विश्व के रचयिता भोले नाथ अपन जटा म पवित्र गंगा मइया ल बइठारे हे । कोनो सगा सोदर अइस त एक लोटा जल म ही स्वागत होथे। मृत्यु के आखरी साँस म तको गंगा मइया के जल पियाथे, अउ मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार कर इही नदी म अस्थि अउ राख ल घलो विसर्जन करथे । काहन त ये जिनगी जल ले शुरु होके जल म ही सिरा जथे ।
नदिया- तरिया, कुँआ-बवली, चाहे होवय बादर ।
पानी हवय त मान हवय, मनखे होवय ते सागर ।
मँय, नदिया अँव । सुख होवय चाहे दुख हर कारण म मोर पबरित जल ल मोर लइका मन बउरथे ।हर शुभता के चिन्हारी मोरे जल ल मानथे । मोर मीठ-मीठ धार म मनखे अउ सबो जीव जनावर तर जथे ।तब साहित्यकार मन कहाँ पीछू रइही, मोर अद्भुत रूप ल देख उँखर ह्दय गा उठथे तब भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी के लेखनी बोल पड़थे
"नव उज्जवल जलधार, हार हीरक सी सोहती ।
विच- विच छहरित बूँद, मनु मुक्तामणि पोहती ।
ओखरे सेती मोर एक-एक झन लइका मन से बस इही -विनती हे सब जुरमिल के मोर जल ल शुद्ध राखे के-उदिम करव । काबर मोर इही जलधारा ह समुंदर में जा के मिलथे। अउ मोर जल प्रदूषित रइही त धीरे-धीरे समुद्र तको प्रदूषित हो जाही। अउ कई घँव हम येकर परिणाम देखथन घलो, अउ अइसने चलते रइही त स्थिति कतका भयावह हो जही । काबर समुद्र के पानी फेर बादर बनके बरसथे अउ उही जल ल पीये ले लेके सबो कारज म हम बउँरथन व थोकन सोंचव- अहसने रइही त हम मनखे मन सँग पूरा जीव जगत का बच पाही।अउ ये प्रकृति ल प्रदूषण ले बचाय के काम सिरिफ अउ सिरिफ हम मनखे मन कर सकत हन ।त ये डाहर चेतलग जरूर होवन, अपन संग दूसरो ल चेतलग करन अउ सरकार ल तको अरजी लगावन ।काबर जल ले ही हमर जिनगी शुरु होथे अउ जल म ही सिरा जथे ।
तभे तो कहिथन न, सुख अउ दुख जीवन नदिया के दू किनारा हरे, नदिया ल सिरिफ पानी बोहावत नदिया झन समझव, ये नदिया भारतीय संस्कृति के सबले बड़े जीवन दर्शन हरे।सुख आवय या दुख आवय, समय के धार कभू रूकय नहीं, जइसन ये नदिया के धार-कल-कल, छल- छल करत निरंतर बोहावत रहिथे ।
नदी के धार ले जुड़े हे, जिनगी के आधार।
धरती के कोरा म लिखथे,हरियर सुख के सार।
बचालव ये धरोहर ल, प्रकृति के अनुपम उपहार।
जल रइही त कल रइही, खुशहाल रइही संसार।
संगीता वर्मा
आशीष नगर रिसाली भिलाई
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