*तोर हाथ मं जस हे*
पोखन लाल जायसवाल
आमा, बर, पीपर अउ लीम के सुग्घर जुड़ छाॅंव वाला गाॅंव हे बिसाहिन दाई के गाॅंव। बिसाहिन दाई ए गाॅंव मं १६-१७ बछर के उमर मं बिहा के आइस। अठारह झिन के परिवार मं। सब मं बड़ मया। बिसाहिन ल नवा जघा बड़ मया दुलार मिले लगिस। मइके के सुरता तो आवय, फेर इहाॅं सबके मया ओकर कमी ल भर देत रहिस। घर मं सब के काम-बुता बॅंटे राहय। रॅंधई-गढ़ई। गोबर-कचरा। पानी भरई। लइका मन के बेवस्था। घर-दुवार अउ ॲंगना बहरई-बोटरई। सब अपन-अपन बुता मं मस्त रहॅंय। घर मं कभू कोनो कखरो ले मुॅंह नइ फुलाइन। सबो झन मया के सुतरी मं माला सहीं गुॅंथाय रहिन। दिन बीतत गिस। सबके लइका मन के बिहाव होगे। देरानी-जेठानी के बहू मन चार दुआरी ले आइन। मया के सुतरी थोरिक झोल परगे। बड़े परिवार वाला माला टूटे के कगार मं आगे। घर के गोठ घर मं रखिन। बाॅंटा के लाखा पार डरिन। ॲंगना खॅंड़ागे। लइकामन कुरिया मं धॅंधागिन। बॅंटवारा के होवत ले परोसी ल गम नइ लगन दिन। बॅंटवारा के ए बड़ोरा अतके मं शांत नइ होइस। पूरा परिवार तिड़ी-बिड़ी होगे।
अब बिसाहिन तरिया पार के परसार वाले घर मं हॅंड़िया तिपोय लगिस। सास-ससुर, तीनों लइका अउ अपन दूनो मिला ७ झन के परिवार रहिगे। पूरा गाॅंव तरिया के पार मं बसे हे। सुग्घर पुरवाही के गाॅंव। बर-पीपर के छाॅंव मं घाम-पियास थोरको नइ जियानय। खनतिहार मन दस बज्जी लहुटत तरिया पार के जुड़ छाॅंव मं बइठथें। थिराथें। एक-दूसर के सोर-संदेश अउ आरो लेवत असनान करे पाछू अपन-अपन घर हबरथें। कोनो-कोनो अपन लइका मन ला हुत करा रापा-कुदारी मन ल घर पठो देथें। "बंशी! ए बंशी ...बेटा बंशी!! रापा-कुदारी ला घर ले जा बेटा। मैं फुरसुदहा नहा के आहूॅं।" ''ए बंशी! हमरो घर रघु ल आरो दे देबे बेटा, आके गैंती ला ले जही। बर छइहाॅं मं थिरा के नहाहूॅं तेकर पाछू घर आहूॅं।'' पछीना मं नहाय बैसाखू हा गैंती-रापा ला मड़ावत कहिस। रोजगार गारंटी ले लहुटत हावें सब ओसरी-पारी। नवा तरिया बनात हावें। गाॅंव भर के मनखे जाथें। गोदी खनथें। पइसा सरकार के अउ सुभिता गाॅंव बर। गाॅंव के मनखे बर। कतेक सुग्घर योजना हावे। सरकार नहाये बर तो आवय नइ। गाॅंव ल गुजर-बसर करना हे। बड़ भागमानी हे गाॅंव अउ गाॅंव वाले मन।
बिसाहिन दाई पैंसठ पार कर डरिस। काकरो काकी ए, कोनो के भउजी त अउ कोनो के डोकरी दाई। फेर गाॅंव भर के मनखे बर ओहर बिसाहिन दाई आय। गाॅंव भर मं एके झन उही तो हे, जेन ल सबो अपन घर बुलाथें। ओकर बुता घलव वइसने हे। ओकर हाथ मं जस हावय। कभू कोनो धोखा नइ खाय हे। सबेच बर बरोबर मया दिखाथे ओहर। दाई के बुता ल बड़ लगन ले करथे। लालच अभिन तक ओला छुए नइहे। ओहर अपन सास के बताए रद्दा मं चलत हावे। रद्दा आवय परमारथ के। जस के। सेवा के।
बिसाहिन दाई मरे-जिये बर एके झन रहिगे हे। तीन बेटी हें। तीनों अपन-अपन घर चल दे हें। सब खुश हें अपन दुनिया मं। उॅंकर घर सियान बबा छे बछर पहिली दुनिया ले चल बसिस। तब ले अकेल्ला बर एक ठोमहा चाउर तिपो के खाथे। बेटी दमाद मन अपन संग लेगे के बात कहिन।
'अभी तिपो लेहूॅं बेटी हो...। पुरखा मन के डेरौठी मं दीया बारन दौ मोला। जेन दिन जाॅंगर जुवाब दिही, मैं आ जहूॅं।' अइसने तो कहे रहिस वो दिन बिसाहिन दाई ह।
गाॅंव वाले मन ओला अउ आने कुछ बात के तकलीफ़ नइ होवन दे हें। ओकर बुता ला लइका-सियान सब आले-आले कर देथें। चाहे सुसाइटी ले चाउर लाय के हो त अउ कुछु आने बुता।
बिसाहिन दाई भारी पाॅंव वाले मन घर जा-जा के हाल-चाल पूछत रहिथे। हियाव करथे। ठलहा बइठई ले बने हे। अभिन दुकलहा घर बइठे हावे अउ बीस-पचीस बछर पहिली के दिन ला सुरता करत हावे। बहुरिया ल बतात हावे , 'गरमी के दिन मं खनती-कुदारी अउ ढेलवानी दे के बुता चलय। बैसाख के महीना मं खातू पलई। अब तो सब घर मं न गाय हे, न गाॅंव मं घुरवा-गांगर। चरागन घलव नइ बाॅंचिस।... गाय...बइला-गाड़ी नॅंदावत हे।' दुकलहा के बहू हुंकारू देवत सुनत हावे।
बइला-गाड़ी जेन मं लइका-पिचका समेत सब रनबौर मेला जावॅंन। छेरछेरा के पहिली अतराब भर के मेला। रनबौर मेला।
सुरता के डोरी अब सास ला अमर डारिस। गोरस के दवा बर उॅंकर घर कइसे मनखे आत्ते राहॅंय। ओहर नरियर ले के दवा दे देवय। काहय जस के काम आय। खेत-खार के जिनिस के का पइसा-कौड़ी।
अपन उमर पहाती मं कइसे ओहर ओला जड़ी-बूटी के जानबा दिस। यहू बताइस। ले बइठ नोनी.... अब मेंहा जाथॅंव। चार छे दिन नइ ऑंव।
दुकलहा मन बेटा, बहू अउ अपन करके तीन परानी हावे। चार बछर होगे हे ओकर सुवारी लक्ष्मी ल बीते। बपुरा ह बड़ सेवा जतन करिस लक्ष्मी के। फेर, भगवान के मरजी के आगू काखर चलथे? लक्ष्मी हा एक दिन दुकलहा ला ठग के दुनिया ले चल दिस। खेती-खार करइया मन के इही तो पीरा ए। राहेर काड़ी के खोभा/खूंटी पाॅंव मं का गड़िस? एक ठन ओखी होगे, दुनिया ले जाय के। चउमास के दिन राहय। झटपिट-झटपिट रेंगइया लक्ष्मी के पाॅंव मं सरहा गढ़न काड़ी गड़ गिस। दवा दारू करिस। दवा-पानी ले पीरा नइ जनाइस। ऊपर के घाव सूखागे। खेती के बुता माढ़े ले संसो तो बाढ़बे करथे। खेती अपन सेती कहे गे हावे। परोसी दारी साॅंप नइ मरय। इही सोंच के घर के खेती मं दुकलहा अउ लक्ष्मी भिंड़गे। रोपा बियासी झरे चार दिन बीत रहिस। लक्ष्मी के गोड़ मं पीरा जनाय धर लिस। सपसपहा पीरा। डॉक्टर तिर गिस। भीतरे-भीतर पीब भर गे रहिस। पीरा अउ तकलीफ़ दूनो धीरे-धीरे बाढ़े लगिस। ....पाॅंव कटागे, फेर घाव बने नइ होइस अउ एक दिन लक्ष्मी दुकलहा ले नता टोर के भगवान घर चल दिस। ....चढ़े करजा ला उतारे मं दू बछर लग गिस। तब तक बाप बेटा जइसन बनिस, तइसन तिपो के खाइन। बेटा के बिहाव होगे हे, नवा सगा अवइया हावे।
बिसाहिन दाई बड़े बेटी घर आय रहिस। आज लहुटहूॅं काहत हावे। बेटी कहिस - ले ना दाई दुएच दिन अउ रुक जा। तहान चल देबे। तोर नतनीन हा बारवी के पेपर देवा के आही। वहू एक नज़र देख लेबे। नहीं बेटी तोर दुकलहा कका घर नवा सगा अवइया हावे, चार दिन के रुकइया दस दिन होगे। मोला जायच ल परही। पहली पहलावत आय। ओकर घर कोनो नइहे।
ओती दुकलहा के बहू पीरा खावत रहिस। पहिली पहिलावत आय। बहू बिचारी पीरा मं तालाबेली करत राहँय। दुकलहा के बेटा पइत घलो इही बिसाहिन दाई हा आय रहिस हे। तब सास के तन ह झुके ल धर ले रहिस। इही जचकी ओकर शुरुआत रहिस। अपन सास के कहे मं ही बिसाहिन दाई के बुता करत हावे। जस कमावत हावे। जचकी के दिन ले सरलग अठुराही-पंदराही बिसाहिन दाई सेवा बजाथे। सँझा-बिहनिया दूनो बेरा लइका अउ महतारी के सेवा करथे। कोनो ला बिसाहिन दाई ले कभू कोनो शिकायत नइ होइस। बिसाहिन दाई घलो सबो घर हरहिंछा आवय-जावय। ओकरो मन कभू छोट नइ होइस। बरोबर गोरस नइ आय ले महतारी बर जड़ी-बूटी घलो देवय। कतको झन ला एकर फायदा मिले हवय। तभे तो अतराब भर ले आय दिन कोनो न कोनो ओकर घर आत्ते रहिथे।
सरपंची बर महिला आरक्षण आय रहे मं गाँव भर के मन निर्बिरोध सरपंच बनाना चाहीन। " मैं अप्पड़ का सरपंची करहूँ, मोला इही मं मजा आवत हे, जचकी करावत मोला सेवा करन दव। एकर ले बड़का अउ का जनसेवा होही? मैं इही मं खुश हौं भई। मोला क्षमा करिहौ... क्षमा दिहौ।" अतकी तो कहे रहिस बिसाहिन दाई ह। गाॅंव के सियानी मोर दारी नइ होवय, मोर दाई-ददा हो।
अभी बिसाहिन दाई के पाँव घर मं बरोबर माढ़े नइ रहिस, अउ दुकलहा ओला आरो दिस - भौजी! ए भौजी...!!
वोहर उत्ता-धुर्रा उॅंकर घर पहुँच गिस। बहू नोनी ला देखतेच साठ कहिथे, देखे के बेरा नइ हे बाबू। एला जतका जल्दी होय अस्पताल लेगे बर परही। लइका ह थोरकुन उलट गे हे कस जनावत हे। जचकी के बेरा आ घलव गे हे। धरा-पसरा गाड़ी मँगाके, बिना कोनो देरी करे बहू ल लकठा के अस्पताल लेगे गिस। बहू मुँधरहा के उठे पीरा ले लरघिया गे रहिस। महतारी अउ सास के मया ला तरसत बपुरी हा अपन गोठ काखर मेर कहितिस। ताकत नइ लगा पात रहिस बपुरी ह। महतारी एक्सप्रेस आइस अउ अस्पताल गिनन। डॉक्टरिन मैडम जाँच करे के पाछू तुरते ऑपरेशन करके जच्चा अउ बच्चा ला बचालिस। ऑपरेशन के बाद मैडम बोलिस - "अच्छा हुआ समय रहते पहुँच गये, वरना और देरी होने से जच्चा-बच्चा दोनों को खतरा हो सकता था।.... लक्ष्मी आई है ...बधाई हो...और हाॅं! घबराने वाली कोई बात नहीं है। दोनों स्वस्थ हैं।" दुकलहा अतका सुनके बिसाहिन दाई अउ भगवान ला बार-बार धन्यवाद दे लगिस।
बिसाहिन दाई ल कहिस, "भउजी! तोरे रहिते, आज मैं हा अपन बहू अउ नतनीन के मुख ल देख पाहूॅं।" बिसाहिन दाई कहिस, "नहीं बाबू! मोर तो कामेच आय सेवा। मैं जचकी दाई हरँव, जच्चा अउ बच्चा बर सोचना मोर काम हरे। दूनो ल कोनो नुकसान झन होवै। इही तो मैं चाहथँव। मोला लागिस कि घर मं रहना खतरा हे, मोर बस के बात नइ हे, ते पाय के इहाँ लाने बर कहेंव।"
सिरतोन भउजी! तोर हाथ मं जस हावय। आज तक तोर राहत ले गाँव ह कभू कोनो धोखा नी खाय हे। तोर रहिते गाँव के बहू-बेटी मन कोनो तकलीफ नइ पाय हें।
बाबू गोठियातेच रहिबे धन हमर देरानी के स्वागत मं फटाका फोरबे। तोर घर मं लक्ष्मी हा लहुट के आय हे। देख तो लक्ष्मी देरानी ला... बिसाहिन दाई ह दुकलहा ले हॉंसीं-मजाक करे धर लिस।
मैं फटाका भर नि फोरँव भउजी! मिठई घलो बँटवाहूँ, मोर लक्ष्मी के स्वागत मं। सही मं मोर लक्ष्मी हा मोर तिर लहुट के आय हे, काहत दुकलहा के आँखी मन भर आइन। ओहर खुदे समझ नइ पाइस कि ए आँसू दुख के रहिन कि सुख के।
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पोखन लाल जायसवाल
पलारी (पठारीडीह)
जिला- बलौदाबाजार-भाटापारा छग
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