*कइसे बाचही पर्यावरन?*
पद्मा साहू ‘पर्वणी’
खैरागढ़
पर्यावरन हमर जीवन के महत्वपूर्ण हिस्सा हरे। पर्यावरन के बिना, जीवन के सपना देखई बिना आत्मा के शरीर जइसे होही। पर्यावरन आदिकाल ले मनखे मन के संगी-साथी बने हे। इही पर्यावरन के जंगल-झाड़ी, डोंगरी-पहाड़, नदिया-नरवा, रुख-राई, चिरई-चिरगुन, जीव-जंतु मनखे के सुख-दुःख के गवाही बने हें। नदी, पर्वत-पहाड़, रुखराई ल देवरूप समझ के पूजा करँय। पहिली पर्यावरन, अध्यात्मिक अउ साहित्यिक चेतना के केन्द्र रहिस। आदिकाल मा पर्यावरन मानव जीवन के अधार रहिस।
वइसने वैदिक काल मा प्रकृति के संरक्षन धरम, संस्कृति अउ जीवनशैली के अभिन्न अंग रहिस। वेद मा प्रकृति ल देवी-देवता मानके सनमान दें । जल, भुइयाँ, वायु अउ पेड़ मन ल नुकसान पहुँचाना वर्जित रहिस। श्रद्धा भाव ले पारिस्थितिकी तंत्र ल संतुलित अउ प्रदूषन मुक्त रखे जाय।
“माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्या”
अथर्ववेद के ये सुक्त प्रसिद्ध मंत्र के अर्थ हे कि- "पृथ्वी हमर माता हे अउ हमन इंकर संतान। " येकरे सेती धरती के शोषन करई पाप मानँय। जइसे एक लइका अपन महतारी के शोषन नइ कर सकय, वइसने हमन धरती दाई के शोषन नइ कर सकन। में अपन स्कूल पढ़ई के समे मा जब गायत्री परिवार ले जुड़े रेहेंव त हमन एकठन मंत्र जागरन करन वो मंत्र हे–
"ॐ द्यौः शांतिरन्तरिक्षं शांतिः पृथ्वी शांतिरापः शांतिरोषधयः शांतिः।
वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः शांतिर्ब्रह्म शांतिः सर्वं शांतिः शांतिरेव शांतिः सा मा शांतिरेधि॥"
ये मंत्र मा ब्रह्मांड के सबो तत्व ले शांत अउ संतुलित रहे के प्रार्थना करे हे।
अगास अउ अंतरिक्ष, पृथ्वी अउ जल, औषध अउ वनस्पति, जब प्रकृति के ये सबो अंग मा 'शांति' संतुलन होही, तभे विश्व अउ सब देव संग मानव जीवन घलो सुरक्षित अउ शांतिपूर्न रहहीं। ये पर्यावणन संतुलन के सबले प्रसिद्ध मंत्र आय।
अइसने अथर्ववेद के एक ठन मंत्र जेमा धरती दाई ल खोद के ओकर ले कुछ खनिज- माटी निकाले बर घलो विनती के भाव विनम्रता भरे सीख देथे -
"यत्ते भूमे विख्नामि क्षिप्रं तदपि रोहतु। मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमर्पिपम्॥"
हे धरती दाई! "अपन आवश्यकता बर मैं तोर ले जो कुछ भी खोदके निकालहूँ (जइसे खनिज, माटी), वो वोतकी जल्दी वापिस भर जाय।" मैं जाने-अनजाने मा घलो तोर हिरदे मा कोनो घाव नइ पहुँचावँव। ये मंत्र जंगल के कटई अउ अधिक खनन ल रोके के चेतावनी देथे। आदिकाल अउ वैदिक काल मा मानव प्रकृति के दोहन नइ करत रहिन बल्कि जीवन के अधार मान के श्रद्धा विनम्रता के भाव ले प्रकृति ल पूजत रहिन। भौतिक सुख-सुबिधा ल कम रख के प्रकृति के संग जिनगी के मजा लेवत रहिन।
फेर आधुनिक काल के बढ़त समे बिकास के ये दउर मा मनखे के भाव मा धीरलगहा नवा बदलाव आय लगिस। आज के आधुनिक अउ तकनीकी जुग मा जिहाँ मनखे हा अभूतपूर्व तरक्की करे हे, उहें दूसर कोती हमन एक गम्भीर संकट के डहर बढ़त हन।
आज मनखे प्रकृति के प्रति उपयोगितावादी भाव रखत हें। मनखे मन प्रकृति ल अपन सुख-सुबिधा अउ आर्थिक बिकास के जरिया मानत हें। जंगल-भुइयाँ, नदिया-नरवा, रुख-राई डोंगरी-पहाड़ के पूजा तो करत हें फेर इंकर दोहन अपन जरूरत ले जादा करत हें। स्वामित्व के भाव रख के विज्ञान अउ तकनीक के प्रगति के कारन इंसान के भीतर ये भरम पइदा हो गे हे कि वो प्रकृति ऊपर नियंत्रन कर सकथे। आज मनखे अपन आप ल प्रकृति के रक्षक बने के बजाय वोकर स्वामी समझे लगे हें।
कल-कारखाना, मशीन, शहरीकरन अउ संसाधन मन के अंधाधुंध उपयोग हा धरती के संतुलन ल जम्मो ढंग ले हिला के रख दे हे। अइसन मा पर्यावरन के संबरधन करना सिरिफ गोठ-बात के बिसय नइ हे, भलुक(बल्कि) हमर जीयत रहे बर अब्बड़ जरूरी होगे हे।
पर्यावरन संकट -
हमर पर्यावरन प्रमुख रूप ले मनखे के काम-बूता के कारन खतरा मा हे। रुख-राई के अंधाधुंध कटई, सीमेंट-कंक्रीट के जंगल बनाय बर अंड-संड (गलत-सलत) ढंग ले रुख-राई मन ल काटे जावत हें, जेकर ले जंगली जिनावर मन के रहे के ठउर उजरत हे अउ हवा मा जहर घुरत हे। एकरे संग-संग
पानी, हवा अउ भुइयाँ, तीनों स्तर मा बढ़त प्रदूषन अपन चरम मा हे। फैक्टरी मन के रासायनिक गंदा पदार्थ, पानी हा नदिया-नरवा मा मिलत हे, अउ गाड़ी-घोड़ा अउ कारखाना मन के धुआँ हा हवा ल जहरीला बनावत हे।
प्लास्टिक के जादा उपयोग जेन प्लास्टिक अइसन कचरा आय जेकर नाश कभू नइ होवय। ये हा हमर माटी के उपजाउ पन ल नष्ट करत हे अउ पानी म रहइया जीव मन के जान के दुश्मन बन गे हे।
धरती के बढ़त घाम (ताप ग्लोबल वार्मिंग), खराब गैस मन के जादा निकले के कारन धरती के तापमान ल सरलग बढ़ात हे, जेकर ले पहाड़ के बरफ हा पिघलत हे अउ मौसम के चक्र ह पूरा बिगड़ गे हे। मनखे प्रकृति के बिकट दोहन करके अपने पाँव मा टँगिया मारत हे। मनखे ल अब पर्यावरन ले शुद्ध हवा,पानी माटी, नइ मिल पावत हे। चारो कोती प्रदूषन के दुर्गंध नाक मुँहु ल चपके मा मजबूर करत हे।
अब सवाल खड़ा होथे कि-
*कइसे बाचही पर्यावरन?*पर्यावरन बचाना काबर जरूरी हे?
पर्यावरन के सीधा जुड़ाव हमर जिनगी ले हे। यदि पर्यावरन सुरक्षित नइ रही, त मनखे के जिनगी के कलपना घलो असम्भव हे। साफ हवा अउ निरमल पानी के बिना मनखे समाज हा गंभीर बीमारी के शिकार होवत हे।
जैव विविधता ल बनाय रखे बर रुख-राई अउ पशु-पंछी मन के जीयत रहना जरूरी हे। |
यदि हमन आज ये प्रकृतिक संसाधन मन ल नइ बचाबो, त अवइया पीढ़ी बर सिरिफ आफत अउ बिनाशेच बाचही। जीवन जीना मुस्कुल हो जही ।
हमन खुद के मिहनत अउ जागरुकता ले पर्यावरन ल बचा सकथन। पर्यावरन बचाना सिरिफ सरकार या बड़े संस्था मन के बुता नइ आय। एक सियान अउ सजग नागरिक होय के नाते हमन अपन रोज के जिनगी मा नान्हे-नान्हे बदलाव करके बड़का सुधार के काम कर सकथन। जइसे-
रुख लगाना संस्कार बनावन:- जिनगी के कोनो भी खास मउका मा (जइसे छट्ठी, जनमदिन या तिहार) कम ले कम एक ठन रुख जरूर लगावन अउ ओला बड़े करत तक संजो के रखन। "एक रुख, सौ बेटा बरोबर" के गोठ ल सार्थक करन।
पानी के एक-एक बूंद बचावन:- पानी ल फोकट मा झन बहावन। पानी अउ बरसाती पानी ल सहेज के रखे के उपाय ल बढ़ावा देवन।
उपयोग होवइया प्लास्टिक' ल कहिबो 'ना':-हमन हाट बजार जावत बखत संग मा कपड़ा या जूट के झोला धर के जावन। प्लास्टिक के झिल्ली-पॉलीथिन के बहिष्कार करन।
बिजली के सही उपयोग:- बिजली बचावन। जरूरत नइ रहे मा पंखा, लाइट अउ टीवी-कंप्यूटर बंद रखन। जहाँ तक हो सके, सुरुज के उरजा (सौर ऊर्जा) जइसन साधन मन ल अपनावन।
कचरा ल संजोवन:- सुक्खा अउ गिल्ला कचरा ल अलग-अलग रखन। घर के थोर-बहुत कचरा ले घर मा खातू बनाय के उदिम करन। अउ अपन सेहत ल बचावन, फसल मन ल, रसायनिक पदार्थ ले बचावन।
प्रकृति ल दोहन के विषय न मानन:- आदिकाल अउ वैदिक काल के जइसे प्रकृति ल सनमान मिलय वइसने आज घलो मान देवन। प्रकृति के कोनो भी जिनिस ल, अपन जागीर नइ समझन ओकर सही ढंग ले उपयोग करके रक्षा करन।
पर्यावरन हा हमर दाई महतारी बरोबर आय, जे हमन ल जिनगी देथे। यदि हमन एकर नुकसान करबो, त आखिरी मा हमन अपन खुद के बिनाश करबो। आज बखत के माँग हे कि हमन तरक्की घलो करन अउ कुदरत प्रकृति ल घलो बचा के रखन। प्रकृति के रक्षा च मा हमर अउ ये धरती के सुरक्षा हे। आवव, हमन सबो मिलके संकलप लेवन कि हमन प्रकृति के शोषन नइ, भलुक ओकर पोषन करबो।
‘प्रकृतिरेव शरणम्’।
प्रकृति हा हमर असली आश्रय सहारा हरे।
‘वृक्षो रक्षति रक्षितः’।
जब हमन पेड़-प्रकृति के रक्षा करबो, त प्रकृति हमर रक्षा करही।
आवव मिलके “भुइयाँ ल हरियर बनावन, पर्यावरन बचाके जिनगी सुधारन।"
डॉ पद्मा साहू ‘पर्वणी’
खैरागढ़
छत्तीसगढ़
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