(लघुकथा )
डर
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"ये मोंटू के पापा--आतो सुन तो।"--मोंटू(अर्जुन ) के माँ हा बोलिस।
" काये ---का होगे--ले बता "--- जगदीश हा अपन सुवारी ला कहिस।
"का होगे--काला बताववँ--मैं तो सुनके बक्खागे हँव। मन में डर घलो समागे हे।"
"अरे कुछु बताबे के ओरियाते रहिबे।"
"मोंटू हा शादी नइ करवँ काहत हे।"
"तैं कइसे बही-भूतही कस गोठियाथस वो।"
"मैं नहीं तोर बेटा हा बइहा कस गोठियावत हे।"
" कहाँ हे वोहा--कइसे शादी नइ करही। लगिन धरागे हे। कार्ड बँटागे हे। का होगे तेमा? "
"मैं नइ जानवँ,तहीं हा पूछ ले। अपन कुरिया मा खुसरे हे।"
दूनों परानी कुरिया मा आइन त मोंटू हा गुमसुम बइठे राहय।
"कइसे जी का सुनत हँव ---का होगे तेमा--काबर बिहाव नइ करवँ काहत हस?"--जगदीश पूछिस।
मोंटू हा कुछु नइ बोलिस।
"अरे कुछु हूँकबे-भुँकबे के मूड़ ला भेंड़ी कस गड़ियाये बइठे रहिबे। "
"पापा मैं शादी नइ करवँ-तैं जाके केंसिल करदे"--मोंटू कहिस।
"तैं कइसे बोलथस रे। कइसे केंसिल कर देंहूँ। समाज मा मोर नाक ला कटवा देबे का?शादी नइ करना रहिसे--कहूँ लड़की पसंद नइ रहिसे ता सगाई के पहिली बताये रहिते। का कमी हे तेमा लड़की मा? पढ़े-लिखे हे, सुंदर हे।"
"वो बात नइये पापा।"
"त का बात हे?"
"सगाई के दिन वो मोला गुर्री-गुर्री देखत रहिसे। मुंदरी ला तको अनमना कस पहिराइस हे।वोकर मोर संग बिहाव करे के मन नइये तइसे लागथे। फोन करथवँ त उठावय तको नहीं। वोकर मोबाइल अक्सर बिजी बताथे।"
" हत तो रे जकला। ये सब तोर मन के गढ़ना ये--फालतू बात ये।
"मैं कुछु नइ जानवँ। वो लड़की से शादी करबे नइ करवँ।"--अतका कहिके मोंटू उठिस अउ आज के पेपर ला लाके अपन पापा ला देवत कहिस--"येला पढ़के देख।"
चोवा राम वर्मा 'बादल '
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