(लघुकथा)
नजर दोस
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"कका--कका --कका --ये कका?"
"काये जी, एकदम झकनाये कस कोनो बात ला पूछथच। सोजबाय नइ गोठिया सकच"--मैं थोकुन ओकर उपर झुंझवावत कहेंव।
"झकनायेच के बात हे कका।"
"अच्छा ले बता, काय बात ये तेला?"
"मैं आजकल देखथँव त पाँच साल के लइका ले लेके- जवान, बुढ़वा, बाबू पिला ले लेके, माइलोगिन तक मन---चारे आना बाँचे होहीं तहाँ ले सब चश्मा ओरमायें दिखथें।ये मन फैशन बर नहीं ते घाम ले बाँचे बर पहिरत होहीं न कका?"---वो पूछिच।
" हत तो रे जकला। ओइसन बात नोहय। ये मन ला रात दिन मोबाइल म नजर गड़ाये रहे के सेती नजर दोस होगे हे।"
"पाँच साल के लइका मन ला तको गा।"
"हव तैं पाँच साल के लइका कइथच। आजकल एक साल के कतेक लइका मन मोबाइल मा कार्टून देखे बिना भात बासी ला खाये ला नइ धरयँ"-- मैं कहेंव।
" त ये लइका मन का मोबाइल ला चालू कर डरथें कका"-वोहा बक्कखाके पूछिस।
" टिकटाक करत मन नहीं फेर उहू मन सीख जहीं। अभी तो ऊँकर दाई मन चालू करके धराथें।"
सुन के ओकर मुँह उलगे।
चोवा राम वर्मा 'बादल '
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