हमर संस्कृति के चिन्हारी गहना - गुरिया
धरती दाई के अँचरा ल निहार के देखबे, त प्रकृति के अद्भुत सुघरई, सब ला अपन कोती खींच लेथे । ओरी-ओर रिकिम-रिकिम के पेड़, सबके आने-आने सुग्घर-सुग्घर फूल पात । दूर-दूर तक फइले जंगल, खेत- खार, कल-कल करत झरना, घाटी, नरवा,नदिया इहाँ के सुग्घर अलग-अलग बनावट । रहन-सहन, कोस-कोस म बदलत बोली । प्रकृति अलग-अलग रूप म सबके मन ल मोह लेथे । बिहिनिया होत ही सुरुज के सोनहा बिहान ह मानो धरती के चराचर जीव जगत उठावत हें। ओस के बूंद-पाना म मोती कस चमकथे। चिरई-चिरगुन के मीठ आवाज ले-मन आनंदित हो जथे, तभे तो अइसन अद्भुत सुघरई ल देख मयूर तको नाचे ले धर लेथे । अउ जब भारत भुइर्याँ के श्रृंगार के गोठ करथन त प्रकृति के मनोहारी सुघरई, आँखी के आगू झूले ले धर लेथे। उत्तर कोती हिमालय मुकुट कस सऊँरे, तीनों-डाहर समुद्र के लहर जइसन महतारी के गोदी म अठखेली करत हे। हरियर धरती धानी अइसे लागत हे, जइसन पूरा धरती के सुघरई ल अपन अँचरा म समा ले हे। जब इतिहास के पन्ना ल हम पलट के देखथन त सुग्घरता-चाहे काँहीं भी जिनिस के होवय, अपन कोती जरुर खीचथे अउ प्रकृति तो स्वयं म कतेक सुग्घर हे।तभे तो कइथे न--
-सत्यम, शिवम, सुंदरम ।
अउ जब छत्तीसगढ़ महतारी कोती ल देखथन त छत्तीसगढ़ महतारी सुग्घर हरियर लुगरा पहिरे सोला सिंगर करे माँग म सेंदूर, बाल गजरा ले सजे, भाल म गोल बिंदी चमकत, कान म खिनवा, झुमका झूलत रहिथे,जउँन उँखर रूप ल निखार देथे। नाक म नथनी, गला म हँसली-सुतिया, हाथ म चूड़ी कंगन, बहुँटा खनखनावत, एक हाथ म हँसिया धरे - जउँन मेहनत अउ कर्मठता के चिन्हारी आय। त-दूसर हाथ म धान के सुनहरी बाली ।बदन सम्मृद्धि अउ अन्न के बरकत ल दरशाथे। कमर म करधन, पाँव म बिछिया- पायल छन-छन करत मानो मधुर संगीत के लय बिखेरत हे। ओखर रूप ल देखके अइसे जनाथे, सोला सिंगार करे महतारी के रूप सहीच म ममता के भाव झलकत दिखथे, अउ अइसे लागथे हमर महतारी अपन लइका मन ल अपन गोदी म बइठारे हे।
देख सुग्घरता नारी मन के, दर्पण घलो लजाथें।
माथ के बिंदी, बेनी के गजरा, जब मुच-मुच मुसकाथें।
सुग्घरता तो नारी परानी के नैसर्गिक गुण हरे, अउ जब-हम प्राकृतिक सुग्घरई के बात करथन त छत्तीसगढ़िहिन नारी के श्रृंगार के सादगी विश्व म प्रसिद्ध हे।हमर संस्कृति म नारी मन के श्रृंगार करे के चलन प्राचीन काल ले चले आवत हे। ऐतिहासिक मूर्तिशिल्प म नायक-नायिका के श्रृंगार ल देख के, कतेक भाव-विभोर हो जथन आज उही गहना सब ला प्रभावित करत हें।
इतिहास कार मन कइथे नारी श्रृंगार के प्रथा, गोदना ले शुरु होय रिहिस होही। जेन वो समे के श्रृंगार राहय । आज फेर उही ह अपन रूप बदल के आय हवय। जेला आज के पीढ़ी के लइका मन टैटू कहिथे। धीरे-धीरे फूल, मोर पाँख, कौड़ी, घोंघी, रंग बिरंग के पथरा, मोती-मूंगा जइसन जिनिस के, श्रृंगार करें ले धरिस तभे तो कहिथे न बहुत कम म श्रृंगार के जिनिस होय के बाद भी बड़ सुग्घर दिखे के प्रकृति ह नारी मन ल अइसे बनाय हें, जइसे लगथे प्रकृति ह नारी के श्रृंगार म दिखत हे।
हमर पुरखा मन इहाँ के मनखे मन बर अलग- अलग राज उँखर रहन-सहन, रीति-रिवाज के हिसाब ले पहिरे-- ओढ़े, सजे सँवारे के जिनिस बनाय हे। जेन नारी व प्रकृति-ले जोड़े राखथे अउ धीरता, परिवार बर आदर्श अउ समरपन के भाव सिखोथे । काँहीं भी तीज तिहार, मड़ई मेला म जब महिला मन सोला श्रृंगार करके निकलथे त ओखर रूप म चार चाँद लग जथे।वइसे तो नारी अउ पुरुष दूनों अपन रूप ल सँवारे के उदिम आदिकाल ले करत आवत हे। फेर नारी मन के सऊँख पुरुष मन ले कतको जादा होथे। तभे कइथे तको नारी के सोला सिंगार करे ले सुख-समृद्धि आथे। पैरी के झुनुर-झुनुर आवाज ले घर म ऊर्जा के संचार होथे ।श्रृंगार सकारात्मकता भरथे, खुशी अउ मया-पिरित के बढ़वार करथे।
चूड़ी खनकय हाथ म, पायल गावय गीत ।
बिंदी सोहय माथ म, लागय सुग्घर मीत ॥
छत्तीसगढ़ के संस्कृति म गहना गुठा बड़ समृद्ध नजर आथे 'गहना-गुठा सिरिफ श्रृंगार भर नोहय, बल्कि ये हमर संस्कृति-परंपरा अउ पहिचान के जीयत- जागत चिन्हारी आय । गाँव-होवय ते शहर, खासकर तिहार, बर-बिहाव अउ पारंपरिक अवसर म अपन गहना ल पहिन के अपन संस्कृति ल जिंदा राखथे, इहाँ अंगरी ले लेके मुड़ी के खोपा तक नारी श्रृंगार देखे बर मिलथे । जाति सम्प्रदाय अउ क्षेत्र के हिसाब ले येमा फरक जरूर होथे। जइसन विश्व पटल म जब छत्तीसगढ़ के बात होथे, त बस्तर के नारी मन के श्रृंगार जरूर झलकथें। उहाँ के वनांछादित प्रदेश म आदिवासी-जन-जीवन प्रकृति ल पूजत आवत हे। ओखरे सेती उहाँ के श्रृंगार म तको प्रकृति झलकथे। उहाँ के नारी मन ल देखथन त सुग्घर गोदना, गोदाय, मुड़ म सीप-कौड़ी-मोर पंख लगाय, जुड़ा म फूल गजरा अउ बेनी म फुँदरा-झाबा, बनुरिया लगाय, नाक के दूनो कोती बड़े-बड़े फुल्ली पहिरे, सुर्रा कंकनी, नागमोरी अउ कनिहा म घुँघरू वाला करधन पहिरे रहिथे। आदिवासी जन जीवन म कंघी के बड़ महत्तम हे। वोमन बाँस के बने कंघी जरूर राखथे इहाँ के ग्रामीण अंचल के मन कंघी ल प्रेम निवेदन के चिन्हारी तो मानथे ।
अइसने मैदानी क्षेत्र के गोठ करथन त वो चाहे रायपुर होवय या बिलासपुर सब जगा क्षेत्र अनुसार ओकर स्वरूप म थोरको या कोनों जगा बहुत अंतर देखे बर मिलथे । फेर गहना के जेन मूल रूप हे तेन सबो जगा एके हे । पर सुग्घर दिखे के चाह तो हमर जनम जात हरे, हमर करा सोन के गहना राहय या चांदी या फेर गिलवट धातु के, फेर जेन हे-तेने म हमन सुग्घर दिखे के उदिम करते रहिथन ।
माथ माँग म मोती पहिरे, कान फभे तुरकी!
गहना फभये नारी मन ला, झुमका अउ लुरकी।
पहिन नाक म नथली मोती, गहना हे सुतिया।
कान खींनवा लटकन सोहय, पहिरय जब रुपिया॥
आज भी हमर पुरखा मन के चिन्हारी गहना गुठा हम ला अपन कोती प्रभावित करथे, अतका सुग्घर- सुग्घर ओखर बनावट डिजाइन आज के आधुनिक युग म तको ओखर अलग पहचान हे । अउ ये सिरिफ नारी मन के श्रृंगार के जिनिस नोहय, येकर पाछू उँखर गहिर सोच रिहिन । तभे तो शुभता के प्रतीक, सुहाग के चिन्हारी संग आज के समे म येकर वैज्ञानिक प्रमाण तको देखब-म मिलत हे।
बिहाता महिला मन सेंदूर, टिकली. चूड़ी, महुर-नखपालिश, मेंहदी, काजर, पावडर, क्रीम, मुहरंगी, कउँड़ी, पाँख, फूल अउ तो अउ कान म दवना पान खोंचे – चुकचुक से दिखत रहिथे।जइसे लुगरा पाटा के पहिरई ह अलग अलग राज के हिसाब ले नारी-के श्रृंगार म मिंझरथे । ओइसने साज श्रृंगार तको मिंझर जथे।जइसन नारी मन अपन चुंदी ल सुग्घर खोपा पारे या बेनी गाथे, पुँदरा लगाय, फूल पाँख अउ गजरा ले सजाथें-सँवारथें। अपन बेनी म चाँदी या डालडा चाँदी के पिन लगाथें। झाबा,बिनुरिया जेन ल बर बिहाव म शुभता मानथन तेन ल लगाके बाल ल सुघराथे ।नारी के साज श्रृंगार गहना केवल परंपरा अउ सुघरई भर ल नइ बढ़ावँय, बल्कि येमा वैज्ञानिक प्रमाण तको मिलथे, जेन नारी के रूप ल सजाथे- सँवारथे अउ ओखर मन ल तको संतुलित राखे म मदद करथे।जइसे
माँग टीका- जेन ल कई जगा माँग-मोरी 'घलो केहे जाथे ये महिला मन के एकदम खास अउ पवित्र गहना आँय । ये माथा के बीच माँग म पहिरे जाथे, जेन मेर सेंदूर लगाय जाथे । माँग टीका सुघरई ल तो बढ़ाबे करथे, बल्कि ये नारी के सम्मान, गरिमा अउ सुहाग के प्रतीक तको माने जाथे। बिहाव अउ तीज तिहार बार म ये गहना नारी मन के रूप ल निखार देथें
माँग टीका जेन मेर पहिरे जाथे, वो जगा गाथा के बीच आज्ञा चक्र माने जाथे। जेन जगा म हल्का दबाव ले मन शांत अउ तनाव कम होथे। येला पहिरे ले शरीर के तापमान तको सामान्य होथे,अइसे कहिथे लोगन मन।
नथली - नथली सुहाग, सुग्घरता अउ सम्मान के चिन्हारी आय। येला पहिरे ले रूप निखर जाथे, बिहाव के बेरा नववधु के जरूरी श्रृंगार होथे। कई जगा तो नथ, बिहाव म जरूरी हो जथे । फुल्ली नथ सुहागिन मन के सुहाग के चिन्हारी हरे। ये हमर परम्परा अउ संस्कार के तको चिन्हा आय। ये सुघरई ल तो बढ़ाबेच करथे, फेर वैज्ञानिक रूप म तको येकर प्रमाण मिलथे, नाक के बाँया हिस्सा के संबंध महिला के गर्भाशय ले होथे, काबर नाक के नस गर्भाशय ले जुड़े-होथे, जेखर ले जचकी संबंधी समस्या कम होथे।अइसने कान म--
करणफूल
कई प्रकार के सुग्घर-सुग्घर कान म पहिने के खिनवा, ढार, लवंगपूल तरकी, लुरकी, आयरिंग पहिनथे । अउ अइसे कहे जाय करणफूल ले कान ढकाय रहिथे जेखर ले नारी परानी मन बुराई ल सुने ले दूर राहय।अउ कान के बाहिर म कई ठन नस जुड़े रहिथे, जेन गहना के दबाव ले दबे रहिथे, जेन गुर्दा-अउ कई अंग ल स्वस्थ राखथे । जेन ल आज के भाखा म एक्युप्रेशर पाइंट कहिथे ।
तितरी
तितरी अतका सुग्घर गोलहूँ, कई रंग के मोती जड़े कान के उपर भाग म पहिनथे अइसने खोटिया ल तको महिला अउ पुरुष दुनो झन पहिनथे इहू ल एके कान म पहिनय अउ सुग्घर फभय।
मंगलसूत्र
मंगलसूत्र बिहाव के सबले पवित्र गहना माने-जाथे, ये बिहाता के सौभाग्य, सुहाग, अउ पति-पत्नी-के अटूट संबंध के चिन्हारी आय । जब वर अपन दुल्हन के गला म मंगलसूत्र पहिनाथे,त वचन लेथे संग निभाय के रक्षा करे के, जीवन भर साथ रेहे के।ये परंपरा अउ शुभता के संग मानसिक संतुलन बनाय राखथे,शरीर म सोना पहिरे ले रक्त संचार म सुधार होथे।अउ करिया पोत नकारात्मक उर्जा ल सोखथे, अइसे केहे जाथे हमर छत्तीसगढ़ के कई जनजातीय समुदाय के मन मोहर या कलदार पहिनथे, जेन सोना चाँदी या रुपिया ले बने होथे, अउ रेशम या कोसा के धागा ले गुँथाय रहिथे ।
पुतरी –
करिया या लाली पोत म गुँधाय सोना के ठप्पा रुपिया कस या गिलट के बने या सिक्का के बने होथे जेन ल महिला मन अपन छत्तीसगढ़ी वेषभूषा म पूरा गहना ल पहिनथे, अउ अपन परंपरा संस्कृति के चिन्हारी ल बड़ मया ले संजोथे।
सुतिया
ये गोल मोटा असन अउ कड़ा जइसन गला के गहना होथे, जेन गला म एकदम चिपके रहिथे, ये चांदी या गिलेट धातु ले बने गोलहूँ असन दिखथे।
सुर्रा
सुर्रा ल तको गला म पहिनथे, जेन गोल-गोल बड़े माला कस लाख म सोनहा परत चढ़े कई ठन लाल अउ कई ठन सोनहा रंग के रहिथे, जेन ल नौ या ग्यारह विषम संख्या म पहिने जाथे। जेन रेशम के धागा म गुँथाय रहिथे।अइसने हँसली, पटली, कंठा, अउ आजकल ल देखन त किसम-किसम के डिजाइन, लक्ष्मी हार, चोकर ये सब गहना हमर गला मा चिपके रहिथे तब शरीर ले घर्षण करके हमर खून के संचार ल बढ़िया राखथे।
बाजुबंद या बाँहटा –
ये हमर पुरखौती गहना आय, जेखर ले बाँहीं सजथे, जेन ल महिला मन खास मउँका म पहिनथे कुछ जगा येला पुरुष मन तको पहिनथे। ये सोना, चाँदी या गिलेट धातु ले बने, बड़ सुग्घर-सुग्घर डिजाइन के बने होथे।
नागमोरी
नागमोरी ल तको बाँहीं म पहिनथे जेन साँप के डिजाइन असन होथे।हरैया तको येकरे एक प्रकार हरे
बहुँटा, पहुँची कंकनी करधन, पहिरे सुग्घर पुतरी।
बाँही सजे हे नागमोरी ले, अंगरी म पहिले हे मुंदरी ।
साँटी, टोड़ा, बिछिया, पैरी, अइठी हाथ के हवय गहना ।
गहना फभथे नारी मन ला, सिरतो हवय कहना।
करधन
करधन हमर श्रृंगार के अहम हिस्सा आय। महिला मन येला साड़ी या लहंगा के उपर, कोनो भी तीज-तिहार. बर-बिहाब म पहिनथे, लोकगीत मन म भी करधनिया के सुग्घरता के वर्णन देखब म मिलथे। (अलग अलग जगा म येकर अलग-अलग नाम तको हे) ये सोना, चांदी या कोनो भी धातु ले बने होथे, कई डिजाइन अउ कई लर के बने ये करधन सौंदर्य ल तो बढ़ाबे करथे, अउ अइसे घलो केहे जाथे, येला पहिरे ले पेट संबंधी समस्या दूर होथे। मोटापा म राहत मिलथे, महवारी के समय दरद म आराम मिलथे ।
पायल
पायल के नामे सुनके पायल के छम-छम सुग्घर आवाज के एहसास हो जथे, जब नान-नान लइका मन घुँघरू वाला पायल ल पहिन के रेंगथे त अपने आप सकारात्मकता आ जथे। जब नवा बहुरिया के पायल के छम-छम ले घर गुँजथे त खुशी के उर्जा प्रवाहित होथे । पायल, पैरी, पाजेब तोड़ा, पैजन, जिहाँ गोड़ के सुघरई ल बढ़ाथे उहें ये हमर सुहाग के चिन्हारी संग, सेहत के तको रक्षा करथे, चाँदी के पायल उर्जा के संवाहक होथे, जेन हमर शरीर म उर्जा के संचय म मदद करथे ।उहें हड्डी ल मजबूत करके खून के संचार ल नियंत्रित करके,पाँव के दरद म आराम पहुँचाथे।
बिछिया
बिछिया ल गोड़ के अंगरी म, खासकर अँगूठा के बाद वाला दूसरइया अंगरी म पहिने जाथे। फेर आजकल सबो अंगरी-म पहिनत हे, जेन बिहाता महिला मन के सुहाग के चिन्हारी आय, बिहाव में बिछिया पहिनाय के खास रस्म तको होथे, बिहाता महिला मन सौभाग्य के प्रतीक अपन सुहाग के चिन्हारी ल हरदम पहिने रहिथे । ये पाँव के सुघरई ल तो बढ़ाबे करथे, फेर येकर वैज्ञानिक पहलू इहू आय येला पहिरे ले गोड़ के नस सीधा गर्भाशय ले होवत हृदय तक जाथे। जेन ह गर्भाशय ल स्वस्थ बनाय रखथे, मासिक चक्र ल नियमित राखथे अउ ब्लड प्रेशर ल तको नियंत्रित करथे । अउ चांदी शरीर के उर्जा ल संतुलित करे म बहुत मदद करथे।
ये गहना गुठा मन ल जब हमन अपन दाई-परदाई मन ल पहिने देखन त कतका सुग्घर जग-जग ले दिखँय । आजो हम सिर ले नख तक गहना पहिने, सियान मन के फोटू ल देखथन त मन भाव-विभोर हो जथे ।आज आधुनिकीकरण के युग म हमर पुरखौती गहना मन अपन चमक ल थोकन खोवत जात हे। अउ ये सिरतोन-- बात तको आय बदलाव तो प्रकृति के नियम आय। आज के भागमभाग कामकाजी जमाना म कम वजन के, कमल लागत के। नवा-नवा डिजाइन कोती महिला मन के झुकाव होवत हे। ओखर सेती वजनी भारी आभूषण म कमी आवत जात हे। पहिली मनखे मन करा नगद पइसा-कौड़ी नइ राहत रिहिस, त इही, कीमती धातु गहना उँखर पूँजी राहय । जेन ल बेरा बखत भँजा तको लेवय।
आज विकास के दौर म लोगन के आना जाना दूर-दूर शहर-यहाँ तक सात समुंदर पार म होवत हे। तेखर सेती बहुत -अकन गहना के रूप बदल गेहे, अउ हल्का-फुल्का गहना -अपन जगा ले, लेहे। अउ समय के माँग तको इही आय, फेर अइसे भी नइ हो सकय हमर संस्कृति अउ संस्कार के वाहक गहना गूठा , कहूँ, नँदा तो नइ जही।
फेर आजो देखे बर मिलथे कई ठन सामाजिक संस्था के-महिला मन, काँहीं सामाजिक आयोजन, अपन तीज- तिहार म अपन पारंपरिक गहना-गुठा ल पहिनत हे। अउ सबो ल येला बचाय बर प्रेरित तको करत हे। हमर तो इही प्रयास-हे, हम सब ला अपन संस्कृति के संदेश देवइया, संस्कार के बोध करइया, हमर पुरखा के चिन्हारी ये गहना गुठा ल सँभाल के, सँजो के राखे के जरूरत हे।
गहना गुठा चमके देह म, मया के रंग रचावय।
माटी के महक संग, अपनों खुशबू बगरावय।
गंगा कस पावन सुग्घर, नारी के मान बढ़ावय।
संस्कार के सोनहा चिन्हारी, जनम-जनम संग निभावय।
संगीता वर्मा
आशीष नगर रिसाली भिलाई
No comments:
Post a Comment