Thursday, 30 April 2026

सुरता सुशील भोले

 सुरता सुशील भोले


छत्तीसगढ़ी भाखा ल बढ़ावा देवइया, कला संस्कृति अउ साहित्य के संग-संग भाषा बर स्वाभिमान 

के सकेला करइया सुशील वर्मा “भोले“ जी के जनम 2 जुलाई सन 1961 म भाठापारा म होय रहिस हे। उंखर पिता जी स्व. श्री रामचन्द्र  वर्मा जी, माता स्व. श्रीमती उर्मिला देवी वर्मा जी, के घर म दूसर संतान के रूप म जनम लेय रहिस हे। श्री भोले जी मन चार भाई अउ दू बहिन हावंय। श्री भोले के पिता श्री प्राथमिक शाला म गुरुजी रिहीन। ओमन आदर्श शिक्षक रहिन अउ उंखर लिखे हिन्दी व्याकरण के किताब मिडिल स्कूल म चलत रहिस हे। पिता के शिक्षा अउ संस्कार सुशील ल मिले रहिस हे। अउ एकर से भोले जी ल अड़बड़ लाभ मिलिस। उंखर प्रतिभा सबो डाहर दिखे ले लगगे।आध्यात्मिक रुचि घलो ओखर चिन्हारी रहिस हे। वरिष्ठ साहित्यकार के संग संग पत्रकार, स्तम्भकार, साहित्य के पुरोधा रहिन हें।


 जेन मनखे म  प्रतिभा होथे ओ ह हर परिस्थिति म अपन ल साबित करत जाथे। कखरो मोहताज नइ राहय। प्रतिभा ह मौका मिलते ही उजागर होय ले लग जथे। सुशील के चौथी तक के पढ़ाई जनम स्थान भाठापारा  म होइस ओखर बाद सातवीं तक के पढ़ाई नगरगांव म अउ ८वीं ले 11वीं तक के पढ़ाई रायपुर म होय रहिस हे। ऐखर पिताजी ह एक प्रिंटिंग प्रेस खोले रहिस हे। ओला इही म रुचि होगे  प्रिंटिंग प्रेस लाइन वाला विषय म आई टीआई के कोर्स ल पास कर लीन। कंपोजिंग के काम करे ले लगगें।


 सुशील भोले ह अपन साहित्यिक यात्रा सबले पहिली दैनिक अग्रदूत समाचार पत्र ले शुरू करे रहिस हे।  सन 1983-84 म स्वयं के कविता, कहानी के प्रकाशन शुरु करे ले लगगें। ये लेखन के शुरुआत सरलग चलत रहिस हे जेन अंतिम सांस तक "कोंदा भैरा के गोठ" तक चलिस। ये बीच म दैनिक अग्रदूत, दैनिक तरुण छत्तीसगढ़ म सहसम्पादक के रूप म अपन सेवा दिन। समाचार, पत्र-पत्रिका म काम करत करत घर के प्रिंटिंग प्रेस के संचालन शुरू कर दिन। एक स्टूडियो स्थापित करिस। मासिक समाचार पत्रिका “मयारू माटी” के रुप म पहिली छत्तीसगढ़ी पत्रिका निकाले ले लगगें। 9 दिसम्बर 1987 ले निकलत रहिस हे। इहाँ ले साहित्यिक समाचार पत्र के प्रकाशन तो शुरु होबे करिस, येखर अलावा अपन स्टूडियो म ऑडियो गीत, कैसेट म रिकॉर्डिंग घलो होय ले लगगे। 


भोले जी  के जीवन के एक पक्ष आध्यात्मिक जीवन के घलो रहिस हे जेमा कठिन तप ,धियान, साधना ह सरलग 1994 ले 2000 तक 14 बच्छर तक चलिस। ओ ह शिव भक्त रहिस हे, शिवजी के साधना करिस। ए साधना के बाद सुशील वर्मा ले सुशील भोले लिखे ले लगगें। साधना ले आध्यात्मिक रहस्य ल जानिन अउ ओला आत्मज्ञान मिलिस। ओहर हमेंशा काहय "बिना आध्यात्म के जिनगी ल मुक्ति नई मिलय।”


छत्तीसगढ़ राज बने के बाद हमेंशा इंहा के आदिधर्म अउ मूल संस्कृति के बात करय।येखर बर एक संस्था के स्थापना करिस अउ  जोर दरहा काम शुरु करे रहिस हे। अपन हर लेख म इंहा के तीज तिहार म हमर आदि संस्कृति के बात ल बतावय। "आज जेन तरिका ले तीज तिहार ल मनाथन ओ हर हमर सँस्कृति नोहय।ओ ह उत्तर भारत ले आए हावय जेन ल हमर ऊपर थोपे गे हावय। हमन ल अपन सँस्कृति के रक्षा करना हे, अउ ओखर प्रचार-प्रसार करना हे। बाहरी पूजा विधि जेन ल हमर उपर थोपे गे हावय ओला बदलव। हमर संस्कृति ल चिन्हव अउ बचावव।"


भोले जी ह छत्तीसगढ़ के निर्माण बर घलो काम करिस। । इंहा के अस्मिता अउ संस्कृति बर अपन आप ल समर्पित कर दिस।  भोले ह अपन बात ल छत्तीसगढ़ी  भाखा साहित्य के माध्यम से पोट्ठ ढंग ले रखय ले लग गीन। भोले जी जब अपन मासिक पत्रिका “ मयारू माटी” के शुरुवात करिन त सबसे पहिली येमा छतीसगढ़ी भाखा के उपयोग करिन।ये छत्तीसगढ़ी भाषा के पहिली पत्रिका रहिस हे। ये ह उंखर भाषा के प्रति प्रेम ल देखाथे। ऐमन जिनगी भर छत्तीसगढ़ी भाखा के उपयोग करे के बात करिन, अउ अपन राज के बोली भाखा के चिन्हारी ल जिनगी भर निभाइन।  भाषा के अतेक सेवा के बाद भी ओला ओ सम्मान नइ मिलिस जेन मिलना रहिस हे।


सुशील ह हर अखबार म छत्तीसगढ़ी भाषा के बीज ल बोये के काम करिन। जईसे ही ओ अखबार म छत्तीसगढ़ी स्थापित हो जतिस त छोड़ के दूसर अखबार म आ के फेर छत्तीसगढ़ी शुरु करतिस। "इतवारी" साप्ताहिक पत्रिका जेन ह शुद्ध हिन्दी के रहिस हे उंहा के सह सपादक रहिस हे। ओखर हर अंक म छत्तीसगढ़ी कहानी, निबंध, पुस्तक समीक्षा निकालत रहिस हे। सुशील ह जिंहा जिंहा छत्तीसगढ़ी भाषा के बीज डारे हावय ओ ह आज लहलहावत हावय।


ओखर हिंदी के कविता कहानी मन घलो बहुत ही स्तरीय रहिस हे। ऐखर कविता मन ल देशबन्धु के प्रधान संपादक ललित सुरजन जी बहुत पसंद करय। कइ बेर ओखर कविता मन ल सुनय घलो अउ छापय घलो। ओमा के एक कविता खास रहिस हें...


पत्थर-पत्थर बोल रहा है,

मन की आंखें खोल रहा है,

तेरे श्रम का हर-एक पल,

इतिहास बन बोल रहा है।।

चलो आज फिर दीप जला दें

श्रम के सभी ठिकानों पर..।


भोले जी के प्रकाशित साहित्य 

छितका कुरिया(काव्य संग्रह (1988)

दरस के साथ(लंबी कविता (1989)

जिनगी के रंग ( गीत व भजन संग्रह (1995)

ढेंकी (कहिनी संकलन (2006)

आखर अँजोर (छ ग के सँस्कृति उपर आलेख  (2006) दूसर संस्करण (2017)

भोले के गोले ,काव्य संग्रह (2015)

सब ओखरे संतान (चार गोड़िया के संकलन 2021-22)

सुरता के संसार (संस्मरण के संकलन 2021-22)

कोंदा भैरा के गोठ 2024

भोले जी ह कइ अखबार अउ पत्रिका म कॉलम लिखे रहिस हे...

बेंदरा बिनास (साप्ताहिक छत्तीसगढ़  सेवक 88-89)

किस्सा कलयुगी हनुमान के (मयारू माटी 88-89)

तरकश अउ तीर (दैनिक नव भास्कर 1990)

आखर अँजोर (दैनिक तरुण छ. ग. 2006-2007)

डहर चलती(दैनिक अमृत सन्देश 2009)

गुड़ी के गोठ (साप्ताहिक इतवारी 2010 लोगों 2015 तक)


राष्ट्रीय स्तर के अनेक पत्र-पत्रिका मन म अउ छत्तीसगढ़ म कविता कहानी लेख, समीक्षा साक्षात्कार मन के नियमित प्रकाशन होवत रहिस हे।

“लहर” अउ “फूल बगिया” ऑडियो कैसेट म गीत लेखन अउ गायन करे रहिस हे।

अनेक साहित्यिक,सांस्कृतिक मंच मन म गीत अउ भजन गायव।


भोले जी ल छत्तीसगढ़ राज भाषा आयोग दूवारा राज भाषा सम्मान 2010 म मिलिस। कइ ठन सामाजिक,धार्मिक,साहित्यिक संस्था ले घलो सम्मान मिलिस।

भारत सरकार साहित्य अकादमी दूवारा

गुजराती एउ छत्तीसगढ़ी भाषा 2017 के सम्मेलन म भागीदारी घलो करे रहिस हे। 

मोर ले ओखर बहुत ही अच्छा सम्बंध रहिस हे। मोर छोटे भाई आये, बहुत ही लाड़ दुलार ले मोर घर साइकिल ले आ जावय। बहुत जुवर ले बइठय घलो। हमेंशा साहित्यिक चर्चा ही करय। मैं ओखर घर बेटी मन के बिहाव म गेंव। ओखर अलावा बइठे बर भी गेंव। जब तबीयत खराब रहिस हे तब दू बेर देखे बर भी गेंव।  अभी मोर पुस्तक के विमोचन म चार जनवरी के बलाये रहेंव त कोई लेगही तब जाहुँ कहिस। अभी  बारह फरवरी के फोन करे रहेंव पुस्तक समीक्षा बर तब कहिस के "तबीयत ठीक नइये कमजोरी आगे हे, अभी पढ़ना लिखना बंद कर दे हंव दीदी।"

मैं ह "आराम कर भाई।" कहेंव 

मोला का पता रहिह हे के छोटे भाई सुशील लम्बा आराम करे बर चल दिही। मोर बर ओ ह इनसाइक्लोपीडिया रहिस हे। बहुत कुछ जानकारी लेवत राहंव। ओ ह छत्तीसगढी भाषा अउ संस्कृति बर अपन पूरा जीवन दे दिस। आज भी मोला ओखर साधना के बाद के समय के सुरता आवत हें। जब मोर घर आके बहुत कुछ बतावय। मोर आध्यात्मिक रुचि ल देखके बहुत खुलके बात करय। ओखर घर के एक कुरिया के कोना म रखे करिया रंग के बड़े से शिवलिंग मोर आंखी के आगू म आ गे। जेखर ओ ह पूजा करय अउ ओखर सामने म साधना करय। कोनो ल ओला देखाये बर नइ लेगत रहिस हे। आज सुशील उही शिवलिंग म समागे। जेन सम्मान ओला मिलना रहिस हे तेन सम्मान ओला सरकार ले नइ मिलिस। 

सुधा वर्मा 25/2/2026

ठग-जग* (छत्तीसगढ़ी कहानी) '

 .                       *ठग-जग* (छत्तीसगढ़ी कहानी) '


                           - विनोद कुमार वर्मा 


          ' रानी दुर्गावती योजना मा प्रदेश के नोनी मन ला 18 साल पूरा होय के पाछू डेढ़ लाख रूपया मिलही। एक अप्रैल 2026 ले एहा लागू किए जाही। एही सत्र मा विधेयक लाए जाही।  ' - ये छत्तीसगढ़ी समाचार ला रेडियो मा सुनके जब्बर उछाह मा रामलाल अपन सुवारी ले कहिस- ' अरे सुनत हस! हमर बिटिया सतरा के हो गे हे। ओला डेढ़ लाख मिलही! छै महीने बाद दिवाली हे। उही दिन तो 2008 में जनमे रहिस! '

         ' का सही मा रानू के बाबू? भगवान भला करे! सरकार हा कतका कुछु करत हवय हमर बर! ...... अपन कमाई ले तो तँय ढेला घलो नि खरीदे सकस! '

      ' का बात करथस ओ रानू के दाई, सकरो-दिन लड़े के जुगत बनाय  रहिथस! ......  पाछूच्च महीना तो बिटिया बर नावा सेंडिल खरीदे रहेंव! '

     ' हाँ हाँ,  बिटिया बड़े होवथ हे त सैंडिल तो खरीदबेच्च! ....ओकर सहेली के पापा अपन बेटी ला जनम-दिन मा पचास हजार के नया आई फोन दे हवय! '

    ' त मँय कहाँ ले लावँव अतेक पैसा? बैंक मा एक लाख जमा हे, ओकर ले बाबू के कालेज के थर्ड इयर के फीस जमा करहूँ ! ..... ओला खर्च कइसे करँव ? '

     ' ठीक बात हे।  ...... मँय सोचत रहेंव कि बाबू के आखिरी बछर के पढ़ाई बर अपन सोन के माला ला बेच दूहूँ। ...... संसी झन कर! चार बछर के पढ़ाई खतम होय के पाछू बाबू  ला नौकरी मिलही त हमार माली हालत सुधर जाही! '

       ' आजकल नौकरी कहाँ मिलत हे भाग्यवान?  '

     ' सुनव जी! रानू बर एक ठिन लैपटाप खरीद देवा। कालि मातारानी के पूजा करत-करत मन्नत माँगत रहिस, एला मँय सुने रहेंव। .... ओकर पढ़ाई मा बहुत काम आही न ? .....  फेर नोनी हा बोलय कुछु निहीं। '

      घड़ी भर सोचे के बाद रामलाल बोलिस- ' ठीक हे लैपटाप खरीद देहूँ अउ एक ठिन नावा मोबाईल घलो! बैंक मा पइसा हे उही ले खरीद देहूँ। छै महीने बाद रानू ला योजना के डेढ़ लाख मिलही त ओला बैंक मा जमा कर देहूँ। ..... रानू बर तो मँय अभी तक कुछु घलो नि कर पाय हँव। वो बिचारी कुछ कहे तो घलो निहीं  ...... फेर  बाबू के पढ़ई बर अब तोला गहना बेचे के जरूरत नि परे!  '

         रानू आज बहुत खुश रहिस। ओकर मन्नत हा जो पूरा होने वाला हे। ओला नावा मोबाइल अउ लैपटाप मिलने वाला हे! ' चइत नवरात मा खरीदहूँ '- कहत रहिस बाबू हा। दाई-बाबू के गोठ-बात ला ओहा रंधनीखोली ले सुन डारे रहिस! तब उनकर गोठ-बात ला सुनके ओकर कजरारी आँखी ले आँसू के बूंदी मोती कस टप-टप टपकत रहिस। 

          एक हप्ता बाद विधानसभा मा पारित वित्त बजट के समाचार अखबार मन मा प्रमुखता ले छपिस। जेमा के एक समाचार ला स्कूल के लाइब्रेरी मा पढ़ते-पढ़त रानू के आँसू ढरके लगिस- ' रानी दुर्गावती योजना के अन्तर्गत प्रदेश के बालिकाओं को 18 साल पूरा होने पर डेढ़ लाख रूपये मिलेंगे। प्रदेश में रानी दुर्गावती योजना का लाभ एक अप्रैल 2026 के बाद जन्म लेने वाली बेटियों को मिलेगा। '

          ये तो अइसने बात होगे न! कि किसान मन ला 2042 मा मिलइया धान के बोनस बर एसों के सत्र मा विधेयक पारित करे हें!

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होरी के रंग* (त्वरित टिप्पणी) *सुकुवा तारा* (लघुकथा)

 *होरी के रंग* (त्वरित टिप्पणी)


                   *सुकुवा तारा* (लघुकथा)


                                 -डाॅ विनोद कुमार वर्मा 


          ' तोर स्टेटस् ला देखेंव मितान। बढ़िया लिखे हस। भाई सुशील भोले ला सुकुवा तारा के संज्ञा देहे हस। '

      ' हाँ मितान! छत्तीसगढ़ी साहित्य के सुकुवा तारा हे भाई सुशील भोले। ओकर असामयिक निधन के समाचार ले पूरा साहित्य विरादरी व्यथित हे।आज होरी तिहार के दिन लोकसदन समाचार पत्र सा भाई सुशील भोले उपर दू पृष्ठ के विशेष परिशिष्ट निकाले हे। ओही मा मोर लेख छपे हवय। '

        ' ओ तो ठीक हे मितान। फेर एक बात मोला समझ मा नि आइस ? '

       ' का बात ? '

       ' कतकोन साहित्यकार अउ कृषि वैज्ञानिक मन ला तँय अपन लेख मा सुकुवा तारा के संज्ञा दे हस। मँय सब ला पढ़थँव अउ गुनथँव। सुकुवा तारा तो एक्का ठिन हे! '

     ' सुन मितान, ये-सब-मन मोर बर सुकुवा तारा हें। तँय तो जानतेच्च हस कि साहित्यकार मन कतकोन लिखथें या  कृषि वैज्ञानिक मन कतकोन अपन गोठ-बात किसान मन ला बताथें फेर ओमन ला एकर कोई पइसा-कौड़ी नि मिलय। अइसने महूँ ला नि मिलय। हमन उजियार मा नि घूमन बल्कि अंधियार मा कोई बात -कोई सूत्र ला ढूढ़थन जेकर ले किसान, आम आदमी या अंधियार मा दिन बितइया लोगन मन ला उजियार मिले। कभू -कभू वो सूत्र मिल जाथे अउ समाज अउ देश ला फायदा मिलथे। चालीस बरस पहिली एक इकड़ मा 15 बोरा घलो धान नि उपजत रहिस।आज चालीस बोरा उपजत हे। एहा तो कोनो वैज्ञानिक के ही कोशिश के परिणाम होही कि जादा उपज देने वाला धान के जाति बनाइस। अइसने साहित्यकार मन समाज अउ देश के अंधियार कोती के बात ला सामने लाथें त सरकार अउ बड़े लोगन मन  सचेत होथे अउ उहाँ उजियार लेके जाथें।  एकरे खातिर साहित्यकार अउ वैज्ञानिक मन ला सुकुवा तारा कहिंथँव! '

     ' बात तो ठीक कहत हस मितान! '

    ' एहा  कोनो मजाक के बात नि होवय मितान, तँय हाँस झन! ...... साहित्यकार मन करा बड़े संसाधन नि रहे। ओमन हवाई जहाज या बीस लाख के गाड़ी मा नि घूँमय! ओमन अपन जाँगर के भरोसा मा ही अपन काम करिथें। ..... भाई सुशील भोले कस कतकोन साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ी साहित्य मा अंजोर बगराय हें। ओही अंजोर मा महूँ देख-टमर के अंधियारी रात मा घलो रेंग देथँव। जादा सुकुवा तारा रहे मा तो मोइच्च ला फायदा हे! '

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आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाए जावत हे । बने बात आय थोरकुन पीछू

 आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाए जावत हे । बने बात आय थोरकुन पीछू 

डहर जाए के मन होइस त सुरता आइस ...। 

    सन् 1900 के पहिली संसार के कोनो देश राज मं महिला मन ल बरोबरी करे के अधिकार नइ रहिस न सामाजिक न राजनैतिक न पारिवारिक स्तर मं फेर का ? महिला मन मं जागृति आए बर सुरु होइस त सन् 1909 के 28 फरवरी के बिहनिया बेरा अमेरिका मं महिला मन छोटकुन बैठक करीन । 

 1910 मं ए बैठक मं अंतर्राष्ट्रीय महिला जागरण के बात चिटिक जोरहा उठिस । 

1911 मं अमेरिकन महिला मन के संग अउ कई देश के महिला मन संगठन बनाये बर सुरू कर दिहिन ...बरोबरी के चर्चा जोर पकड़े लगिस । 

    आवागमन के असुविधा , सम्पर्क के अभाव के संग पोट्ठ नेतृत्व के कमी के चलते ए आंदोलन हर अपन अपन देश , राज , समाज तक रुंधा गिस तभो गुंगुआत तो रहिबे करिस । समय जात देरी तो लगय नहीं ...60 साल ले ऊपर होगिस ...चिंव चांव कभू काल सुना जावय फेर कोनो देश मं जबरदस्त आंदोलन नइ होइस ..। 

    सन् 1975 मं महिला मन फेर जागिन एदारी अमेरिका के महिला मन यूरोपीय देश के संगे संग भारत के जागरुक महिला मन से सम्पर्क , बातचीत , चिट्ठी पत्री के माध्यम से संगठन के उद्देश्य ल बगराइन सुरता राखे लाइक बात एहर आय के तब तक दूनों विश्व युद्ध खतम हो गए रहिस भारत असन कई देश मं नारी शिक्षा बगर गए रहिस । एतरह यूनाइटेड नेशंस हर 8 मार्च ल अंतर्राष्टीय महिला दिवस मनाए के घोषणा करिस । 

  सबले जरुरी बात जेला सुरता करत हन के 1909 के पहिली महिला मन ल ..

1 वोट देहे के अधिकार नइ रहिस 

2 पुरुष मन के बरोबर तनखा नइ मिलत रहिस । 

3 महत्पूर्ण पद मं महिला मन के स्थापना नइ होवत रहिस । 

4 महिला मन ल सामाजिक , राजनीतिक समानता नइ मिलत रहिस । 

        आज 8 मार्च 2026 आय प्रश्न हे अतका साल बाद जब महिला मन ल राष्ट्रपति असन पद मिलत हे , सेना , मेडिकल , इंजीनियरिंग मं जगह मिले बर शुरु हो गए हे त अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के जरुरत काबर हे ? दूसर बात अगर जरुरत हे त कोन क्षेत्र मं हे , ओ क्षेत्र मं कोन तरह से उदिम करना चाही ? 

      संगवारी मन ! चिटिक थिरा के सबो झन गुनव न ? एला आदेश नहीं अनुरोध समझिहव । 

       सरला शर्मा

कारी कमौत के खुशबू-1(संस्मरण)

 कारी कमौत के खुशबू-1(संस्मरण)


काली कार म हमन दुर्ग जात रहेन। सुरता आये ले लगगे के लइकापन म हमन दुर्ग जावन त जी ई रोड के दूनो डाहर खेत राहय। भिलाई जंक्शन रहिस हे त बहुत अकन रेल खड़े राहय। बस ल रोक के कोनो मेर के कुँआ म पानी पीयन। धान के फसल के बेरा म अब्बड़ खुशबू आवय। अधिकतर मढ़रिया दाऊ मन के खेत रहिस हे। सुगंधित धान 'कारी कमौत' लगावंय। हवा चलय त ये धान के खुशबू रोड तक आवय। 

हमन अपन मामा गाँव माहका जावन त भिलाई तीन म उतर जावन। मामा के नौकर आये राहय। बैलगाड़ी पटरी के ओ पार खड़े राहय। तब लोहा के पेटी चलय। गाँव पेटी ले के जावंय। हमरो माँ पेटी लेगय। पेटी ल नौकर ह मुड़ म बोह लेवय। माँ संग हमन दूनो भाई बहिनी रेंगत जावन। बहुत अकन माल गाड़ी पटरी म खड़े राहय। हमन रेल के नीचे ले झुक झुक के निकलत जान। पेटी ल सरका के नौकर ह निकालय। चार पाँच रेल पटरी पार करके ओ पार पहुँचन। बइला ल गाड़ी म फांदय। हमन बइठन। पेटी ल गाड़ी के आगू म बांध लेवय। अब छाकड़ा गाड़ी दउड़य। थोरिक देर में ही गाँव पहुँच जान।व बीच म तरिया परय त उतर के हाथ गोड़ धो लेवन। तीजन बाई के गाँव गनियानी ल पार करन त इंहाँ छींद के चटाई अउ बाहरी बनावत देखन। 

मामा गाँव पहुँचन त पीपर के छाँव म बइला गाड़ी ढिलावय। सामने म बियारा रहिस हे। ममा अगोरत खड़े राहय। हमन उतर के घर आवन। पीपर पेड़ के बाद नहर नाली रहिस हे। ये ह तरिया म पानी भरे के काम आवय।

नहर नाली के ओ पार लाइन से हमर नाना मन के घर रहिस हे। आखरी वाला हमर मामा के घर रहिस हे।


दीवाली के छुट्टी म जावन त दिन रात खुशबू म साँस भर जावय। गर्मी म जावन तभो खुशबू राहय फेर घर तक।  अँगना म कलमी आमा के रुख रहिस हे। मोर मामा घर मोर तीन चार बहिनी मोर उमर के राहंय हमर मन के धमाचौकड़ी पूरा डेढ़ महिना चलय।


नहर म नहाना, तरिया म गोड़ धोना, तरिया पार के आमा तोड़ना, कुँआ पार के चँदैनी गोंदा, बेल के मजा लेवन। सबले ज्यादा खुशी तो बरगद के जटा ल धर के झूलन अउ तरिया म कूदन। ये सब शहर म कहाँ मिलही? बियारा म बोईर के रुख रहिस हे त गर्मी म ओखर गुठली मिलय तेन ल बिन के घर लानन। मंझनिया भर ओला फोरन। सांझ के ठंडा पानी म नून अउ चिरौंजी डार के शरबत पियन अउ मामा मन ल घलो देवन। वाह अइसना स्वाद कोनो अउ शरबत म नइ मिलय, चिरौंजी ल चबा के नून पानी पियत जाव। ठंडा पानी अपन अपन बर बनावन। हाँसी के बात आये न के ठंडा पानी बनाये कइसे जाथे? हा हा हा। एक कांसा के लोटा म पानी भर के ओखर मुँह ल कपड़ा म बांध देवव अउ ओला मियार म उल्टा टांग देवव। पानी बरफ असन ठंडा हो जथे। डेढ़ महिना के बाद घर आये के बेरा म सब अब्बड़ सुरता आवय। सबले बड़े बात सुगंधित चावल ह भुलाये नइ भूलय।

 कार म बइठे बइठे सुरता आवत हे कारी कमौत धान के खुशबू के। आज बीज ह घलो नंदागे। भिलाई स्टील प्लांट के हवा सब ल निगल दिस।

सुधा वर्मा 8/3/2026

“आदर्श शिक्षिका” – डाॅ. विनोद कुमार वर्मा

 

.                *आदर्श शिक्षिका* (छत्तीसगढ़ी कहानी)


                                 - डाॅ विनोद कुमार वर्मा     


                                (01)    


        सामाजिक विज्ञान के नवा शिक्षिका डाॅ ममता कुँअर जइसे कक्षा मा पहुँचिस- 10 वीं कक्षा के विद्यार्थी मन खड़े होके ताली पीट के ओकर वेलकम करिन। 35 बरस के ओ, गोरी-चिट्टी, चंदा मा चढ़े मधुरस कस देह, सब्बो सुन्दरता मानो बड़े-बड़े आँखी मा समा गे रहिस। चुम्बकीय व्यक्तित्व, राष्ट्रपति ले पुरस्कृत ममता मा शिक्षिका के सबो गुण कुटकुट ले भराय रहिस। 

          ' धन्यवाद, सब बने-बने हावव ? '

     ' हाँ बने-बने मैम! ' - समवेत स्वर सुनई परिस।

        ' बने-बने नि अन मैम! '- एक लइका के जोरहा आवाज सुनाई परिस। पूरा कक्षा मा हाँसी के लहर दउड़ गे। 

       ' का होगे, बता भाई का बात हे? '

      ' मोर नाम श्याम एक्का हे। रमेश टोप्पो मोला कठफोड़वा कहिके चिढ़ाथे! '

     ' मैम, पहिली एहा मोला कछुआ बोलिस त मँय ओला कठफोड़वा बोलेव! '

     कक्षा मा फेर हाँसी के लहर दउड़ गे। तभे एक झन लड़की बोलिस- 'मैम, मोर नाव धनेश्वरी वैष्णव हे। लालू तिग्गा मोला बंदरिया कहिथे! ' 

      पूरा कक्षा मा फेर हाँसी के लहर दौड़ गे।

      ' मैम, धनेस्वरी वैष्णव मोला मुंडक कहिके चिढ़ाथे! अब मोर मुड़ मा कम बाल हे त मँय का करँव? ' - लालू तिग्गा बोलिस। 

       कक्षा मा फेर हाँसी के लहर दौड़ गे। नवा शिक्षिका ममता कुँअर घलो हाँसे लगिस। थोरकुन देर बाद बोलिस- ' लइका हो,  सबो जीव-जन्तु हमर सहोदर हें। हमन सहअस्तित्व के भावना के कारण ही आज जीवित हन। अगर एक-दूसर ले लड़त रहितेन त आज कोनो नि रहितिस! न ओमन न हमन! ....  हमन ला जम्मो चर-अचर, पेड़-पौधा अउ जीव-जंतु के सम्मान करना चाही! हमन ला एक-दूसर के घलो सम्मान करना चाही। '

       ' मैम, का शेर, बाघ भालू घलो हमर सहोदर हे? '

      ' हाँ फेर नरभक्षी जानवर मन ले अपन रक्षा करना भी जरूरी हे। जंगली जानवर मन के बुद्धि- विवेक मनुष्य जइसन नइ रहे। '

        ' अउ कुछु पूछे बर हे? '

         ' नो, मैम! '

       ' मँय आज अउ कुछु नइ 

पढ़ावँव। आज के बाद तीन दिन के छुट्टी हे। खेलव-कूदव अउ पढ़व घलो।  ..... कक्षा मा सबले होशियार कोन हे ?। ' 

      ' मैम, धनेश्वरी वैष्णव। चार दिन पाछू इंटर-स्टेट वाद-विवाद  प्रतियोगिता मा इनाम जीते हे! '

        ' शाबास धनेश्वरी, एक होम वर्क देवत हँव। ये कक्षा के पढ़इया जम्मो विद्यार्थी मन के सरनेम ला तो जानतेच्च होबे। ओमन के अर्थ अपन बाबूजी ले पूछके या  इंटरनेट मा खोजके सोमवार के कक्षा मा बताबे। '

      ' ठीक हे मेम, मँय तैयारी कर लेहूँ। '

     ' लालू तिग्गा,  तुम मंडूक के बारे मा जानकारी सोमवार को बताओगे! धनेश्वरी तोला मंडूक कहिथे न! '

      ' जी मैम। '

           सोमवार के मँय छत्तीसगढ़ के आदिवासी मन के सामाजिक जनजीवन उपर गोठ-बात करहूँ। एहा तुँहर कोर्स के बहुत महत्वपूर्ण चैप्टर हे।'


.                             (02)


             कक्षा मा पिन-ड्राप साइलेन्स रहिस। सबले पाछू लाइन मा  प्राचार्य डाॅ भारद्वाज बइठे रहिन। ओमन देखना चाहत रहिन कि अतेक बहुचर्चित शिक्षिका कइसे  पढ़ाथे? ..... ममता कुँअर के व्याख्यान चलत रहिस।- 

       '  पौराणिक भूज्ञान के अनुसार हजारों बरस पाछू जंबू द्वीप के अन्तर्गत विशाल भारत वर्ष अवस्थित रहिस। वर्ष के अर्थ ही पृथ्वी के एक बड़े भूखंड होथे। तब इहाँ जंगल-पहाड़ अउ नदियाँ के लकठा मा मनखे मन रहँय। ओ समे हमर देश मा कृषि, ऋषि अउ अरण्य संस्कृति फलत-फूलत रहिस। लोक संस्कृति ले लोक साहित्य, ऋषि संस्कृति ले श्लोक साहित्य अउ अरण्य संस्कृति ले वनौकस नृत्य कला उपजिस। वो समे आज जइसन बंगला, मोटर-गाड़ी नइ रहिस। लोगन-मन घास-फूस के झोपड़ी, खोह-गुफा या पेड़ के उपर मचान बनाके नदिया के तीर मा समूह बनाके रहत रहिन। एक समूह ले दूसर समूह के दूरी सैकड़ों मील रहिस। ओमन ला जंगली जानवर ले घलो जान जाय के बहुत खतरा रहिस एकरे खातिर बिहनिया ले लेके रात तक घर के लकठा मा अलाव जलाके राखें। आगी ले जंगली जानवर मन बहुत डर्राथें! '

         ' बहुत बढ़िया! ' - प्राचार्य डाॅ भारद्वाज कुछ ऊँचा आवाज मा बोलिस। 

      ' धन्यवाद सर!  लोगन मन समूह मा रहत रहिन, ताकि हिंसक जंगली जानवर ले मुकाबला कर सकें। एहा जीवित रहे अउ पीढ़ी ला आघू बढ़ाय के संघर्ष रहिस। जम्मो समूह के अलग-अलग नाम रहिस। कोई ऋषि-मुनि के नाम रखँय जइसे शांडिल्य, भारद्वाज, अगस्त्य। कोई नदी के जइसे गंगाजल सरस्वती, कोई पर्वत के जइसे सुमेर, बिन्ध्य त कोई पेड़-पौधों या जानवर के। ताकि ओकर समूह के कोनो आदमी आन समूह के आदमी ले कभू-कहूँ भेंट हो जावय त ओकर पहचान हो सके कि कोन समूह के मनखे हे! '

        ' बहुत इन्ट्रेसटिंग  है मैम! ये तो हमन कभू सोचेच्च नइ रहेंन! '

      ' हाँ बच्चों। घनघोर जंगल मा रहइया वनवासी मन पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, कीट-पतंगा, मछली, फल, निर्जीव वस्तु जइसे लोहा, नमक, फल आदि ला घलो अपन पहिचान बनाय रहिन। इही ला पाछू बेरा मा गोत्र कहि दिन। वनवासी मन घनघोर जंगल मा रहँय। ओमन पशु-पक्षी अउ पेड़-पौधा ले बहुत मया करें। '

' नोनी धनेश्वरी, वनवासी मन के गोत्र के बारे मा का पढ़ के आये हस तेला मोर लक्ठा मा आके  सब ला बता! '

       ' जी मैम, बतावत हँव। छत्तीसगढ़ के वनवासी या आदिवासी मन के गोत्र के सुग्घर-सुग्घर अर्थ हे। एला इंटरनेट मा खोजेंव त घंटो पढ़त रहेंव। ओमन के गोत्र के अर्थ ला बतावत हँव। 

          कुजुर = लता, तिर्की =चील पक्षी, खाखा = कौआ पक्षी, केरकेटा = केकड़ा, खलखो = कबूतर, तिग्गा = बंदर, एक्का = कछुआ, मिंज = मछली, लकड़ा = शेर, बखला = बगुला पक्षी, खेस = धान, बेक = नमक, पन्ना = लोहा, टोप्पो = कठफोड़वा पक्षी, किन्द्रो = फल, बारा/बड़ा = बरगद, बरवा = जंगली कुत्ता ये सबो हमर छत्तीसगढ़ के वनवासी मन के गोत्र हें। '

       जोरहा ताली परिस। प्राचार्य डाॅ भारद्वाज बोलिस- ' शाबास बेटी! तँय हमर स्कूल के आन-बान अउ शान अस। '

.    ' लालू तिग्गा! तोला मुंडक कहिके धनेश्वरी चिढ़ाथे! ' - मैडम ममता पूछिस।

     ' हाँ मैम! '

     ' मुंडक के बारे का पढ़के आय हस? '

     ' मैम, एहा उपनिषद के एक नाम आय। उपनिषद मन के रचना काल ईसापूर्व 1000 ले ईसापूर्व 300 माने जाथे। ये हा वेद के अंतिम भाग हे एकरे सेथी एला बेदान्त घलो कहिथें। एकर कुल संख्या 108 हे। ओमे ले 13 मन प्रसिद्ध हें- ईश, केन, माण्डूक् ,     तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, श्वेताश्वतर, बृहदारण्यक,  कौषीतकि, मुंडक, प्रश्न, मैत्रायणीय। कुछ उपनिषद  के रचना गद्य मा हे त कुछ उपनिषद के रचना पद्य मा! '

        प्राचार्य साहब खड़े होके ताली बजाय  लगिन। - ' वाह बेटा, शाबास! '

    तभे मैडम डाॅ ममता कुँअर बोलिस- ' सर! अतेक कुछ तो महूँ ला नि मालूम फेर दुनों लइका अपन स्तर ले ये जानकारी जुटाय हें! '

      ' मैडम, ममता आपके पढ़ाय के तरीका ला देख लेहें। आप एक आदर्श शिक्षिका हॅव। मोर सौभाग्य हे कि आप हमर स्कूल मा पदस्थ होय हॅव। '

                .............................................


Story written by-


डाॅ विनोद कुमार वर्मा 

व्याकरणविद्, कहानीकार,  समीक्षक 

बिलासपुर छत्तीसगढ़ 


मो- 98263 40331



कहानी समीक्षा (छत्तीसगढ़ी)

“आदर्श शिक्षिका” – डाॅ. विनोद कुमार वर्मा


छत्तीसगढ़ी साहित्य म कहानीकार डाॅ. विनोद कुमार वर्मा के लिखे कहानी “आदर्श शिक्षिका” एक प्रेरणादायक अउ ज्ञानवर्धक कहानी आय। ये कहानी म लेखक ह एक आदर्श गुरु के व्यक्तित्व, शिक्षा के महत्व अउ विद्यार्थी मन के जिज्ञासा ला बहुत सुंदर ढंग ले प्रस्तुत करे हवय।

कहानी के मुख्य पात्र डाॅ. ममता कुँअर हें, जेन ह सामाजिक विज्ञान के नवा शिक्षिका बनके स्कूल म आथें। ममता कुँअर के व्यक्तित्व आकर्षक, व्यवहार मधुर अउ पोठ गुनी हवय। ओहर विद्यार्थी मन संग अपनापन के साथ गोठियाथें अउ पढ़ई ला रोचक बनाथें।

कहानी के सुरूआत म विद्यार्थी मन एक-दूसर ला जानवर के नाम ले चिढ़ाथें। ए स्थिति ला देखके ममता कुँअर ह बहुत समझदारी ले लइका मन ला समझाथें कि प्रकृति के जम्मो जीव-जंतु हमर सहोदर हें अउ हमन ला सबो के सम्मान करना चाही। ए बात कहानी म सहअस्तित्व अउ मानवता के सुंदर संदेश देथे।

लेखक ह कहानी म छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज के गोत्र परंपरा के बारे म घलो जानकारी दे हवय। जइसे – तिग्गा (बंदर), एक्का (कछुआ), टोप्पो (कठफोड़वा), लकड़ा (शेर), मिंज (मछली) आदि। ए जानकारी के माध्यम ले पाठक मन ला आदिवासी संस्कृति अउ परंपरा के झलक मिलथे। ये बात कहानी ला सिरिफ मनोरंजक नइ, बल्कि ज्ञानवर्धक घलो बनाथे।

कहानी के भाषा बहुत सरल अउ बोलचाल के छत्तीसगढ़ी आय। संवाद शैली म लिखे गे होय के कारण कक्षा के माहौल बहुत जीवंत लगथे। पाठक ला अइसने अनुभव होथे जइसे वो खुद कक्षा म बइठ के पढ़ई सुनत हवय।

कहानी के एक खास बात ए घलो आय कि ममता कुँअर ह विद्यार्थी मन ला रटंत पढ़ई के बदला खोज अउ अध्ययन के आदत सिखाथें। ओमन लइका मन ला अपन सरनेम के अर्थ खोजे बर कहिथें। ए तरीका शिक्षा के सही उद्देश्य ला दिखाथे।

कहानी के अंत म प्राचार्य डाॅ. भारद्वाज ह ममता कुँअर के पढ़ाय के तरीका देखके ओला “आदर्श शिक्षिका” कहिथें। एही से कहानी के शीर्षक घलो सार्थक बन जाथे।

“आदर्श शिक्षिका” एक अइसन कहानी आय जेन म शिक्षा, संस्कृति अउ मानवीय मूल्य मन के सुंदर समन्वय दिखथे। ये कहानी शिक्षक मन बर प्रेरणा अउ विद्यार्थी मन बर ज्ञान के स्रोत आय। डाॅ. विनोद कुमार वर्मा के ये रचना छत्तीसगढ़ी कहानी साहित्य म एक सुग्घर अउ उपयोगी योगदान कहे जा सकथे।

– कवि मिलन मलरिहा

मल्हार, जिला बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 🙏

लाँघन”

 लघुकथा



“लाँघन”



अम्मा अबड़े भूख लागत हे वो।तीनों लइकन रँधिया के अचरा ला तीरे लागिन।रुकव अभी हेर के देवत हवँ गोड़ धोवत रँधिया हा कहिस।चार -पाँच घर के झाड़ू पोंछा बर्तन करत बारा बज गिस ।मैडम मन ओला खाये बर नाश्ता देहे रहिन हे तेला पन्नी मा भर के धर लेहे रहिस रँधिया हा।सबो ला एक ठन थारी मा ढार दिस।लइकन मन झपट झपट  के खाय लगिन।तभेच सोहन हा लड़बड़ लड़बड़ करत आइस अउ लइकन मन ले लूट के खा दिहिस ।लइकन मन रोये लागिन ता उँका गारी देवत बाहिर निकल गिस।लइकन मन के करलाई ला देख रँधिया के छाती फाटे लागिस। रँधिया हा महिना के पंदरा हजार कमा लेवय उही ले घर के खर्चा चलावय।उहूँ पइसा हा दारू के लग्गा लग जावय ओखर घरवाला अखंड दरुहा हावय ।सोहन होश मा राहय ता कुछु बुता काम कर लेवय तहाले पइसा मिले तेला दारू मा उड़ा देवय।मारपीट के रँधिया के पइसा ला घलौ लूट के ले जावय।लुका चोरा के धरे अपन पइसा ले रँधिया अपन घर चलावय तभो ले अइसन कोनों दिन नइ होही जब ओमन दुनो जुआर पेट भर खाइन होंही।जे घर मन मा बुता करे जावय उहाँ हर महिना रँधिया हा उधारी पइसा पहिली ले ले डारे रहय।

           चुप हो जावव लइकन मन मोर खाता मा महतारी वंदन के पइसा आ गिस हवय सुने हवँ।आज नहा धो के बैंक जाहूं तुँहर बर खाई खजेना घलो लाहूँ।आज रतिहा हमन पेट भर खाबों।

   सिरतोन अम्मा आज हमन पेट भर खाये ला पाबोन छोटकू हा पूछिस।

हाँ बेटा रँधिया हा ओला पोटारत किहिस।

सँझा ऱँधिया खाई खजेना लाइस।आज कुकरी घलौ राँधे हे।लइकन मन हाँस हाँस खावत हे रँधिया हा लइकन मन ला खावत देख मुचकात हे तभे कहाँ ले सोहन हा गरजत घूमरत बादर कस आ गिस रँधिया करा दारू बर पइसा माँगे लगिस।रँधिया हा  पइसा नी देंव कहिस ता लात घूस्सा मा मारे लगिस।रँधिया अचेत गिर गिस।आधा रतिहा रँधिया ला होश आइस त देखिस लइकन मन रोवत सुत गय हें। सोहन के कुछु पता नी हे वोहा जम्मो भात साग ला खा डारे हे अउ रँधिया के लुकोय पइसा ला लेग गिस हे।उठके एक लोटा पानी ला गट गट पी उही मेर रँधिया हा आज तीसर दिन लाँघन सुत गिस।



चित्रा श्रीवास

सिरगिट्टी बिलासपुर

छत्तीसगढ़

सोंच ------- हलो!

 (लघुकथा )


सोंच

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हलो!

हाँ--हलो।

मनसुख हा देखिच ता ओकर छोटे बहन दमाँद पंकज हा फोन करे राहय।

"हलो भइया--मैं पंकज बोलत हँव। तोर तबियत अभी कइसे हे?"

"ठीक हे भाई फेर उतार-चढ़ाव चलत हे।कमजोरी अबड़ लागथे। दू-चार दिन मा बुखार तको आ जथे।"

"ओह!-- देख भइया, जान हे त जहान हे। तबियत कोती बने ध्यान रखबे। जादा कोनो चिंता झन करबे। पइसा-कौड़ी लागही त बता, पहुँचाले ला आ जहूँ।"

"नहीं भाई, अइसे कोनो बात नइये। तैं परेशान झन हो। जरूरत परही तब तो गोहराबे करहूँ"--मनसुख हा कहिच।

"अभी कहाँ हच भइया --ट्रेन कस अवाज आवत हे?"

"हाँ भाई, ट्रेन मा हँव--डॉ सो चेक करवाये बर भिलाई आवत हँव।"

"कोन कोन हव भइया?सेवक हा होही त बात करवा तो?"

अब तो मनसुख हा भारी असमंजस मा परगे।कइसे बतावय के बेटा सेवकराम हा संग मा नइये। उही हा तो ट्रेन मा ये कहिके अकेल्ला भेजे हे के अब पापा ह आये-जाये के लइक होगे हे। ईलाज करवाके आ जही।थोकुन सोंच के बोलिच-- "अकेल्ला आवत हँव भाई। कतेक दिन ले कोन हा संग मा आही-जाही। "

" तैं कइसन आदमी हच गा। तोर शरीर हा एकदम कमजोर होगे हे।चककर -उक्कर आगे त? घर के मन ला तको सोंचना रहिसे। तैंहा भिलाई मा उतर के स्टेशने मा रहिबे। मैं आवत हँव- गाँव ले आये मा आधा घंटा ले जादा नइ लागय। " --- कहिके वो मोबाइल ला काट दिच।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

लघुकथा ) दोगला

 (लघुकथा )


दोगला

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स्टेशन के टी स्टाल मा चाय पियत खड़े रहेंव ओतके बेर एक झन बुजुर्ग जेन पहनावा ले कोनो गाँव के रहइया कस दिखत रहिसे आइस अउ दू ठो बिस्कुट के पैकेट खरीद के दुकान वाला ला कहिच--

"बाबू दे दवई ला गाड़ी के आवत ले तोर फ्रिज मा रख देबे का? डाक्टर हा येला गरम झन होवय कहे हे।एक दू घंटा बर ठंडा हो जही।"

"नहीं। इसमें दवाई वगैरह रखने की इजाजत नहीं है। वहीं से आइस पैक करवा के लाना था।"--दुकानदार कहिस।

"लकर धकर मा भुलागेंव बाबू। स्टेशन के मेडिकल दुकान मा नइ मिलीच। कोनो जगा ठंडा पानी पाउच तको नइ मिलिच। तोर करा होही त बिसा लेहूँ।"

"यहाँ नहीं मिलेगा। जाओ उधर खोज लो।"

हव बाबू काहत बुजुर्ग हा चल दिच। ओतके बेर एक झन अउ अइच तहाँ ले आन भाषा मा बात करिन जेन मोला समझ मा नइ आइच। तहाँ ले वो मनखे हा बेग ले दू ठो बाटल जेला देखेंव ता बियर के रहिसे निकाल दे दिच अउ दुकानदार हा फ्रिज मा रख देइच।

दुकानदार हा तो निचट दोगला निकलिच।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

लोक कथा सतवंतीन वीरेन्द्र ‘सरल‘

 लोक कथा

सतवंतीन

वीरेन्द्र ‘सरल‘

बहुत जुनना बात आय। एक गांव में सात भाई अउ एके झन बहिनी के परिवार रहय। सब ले छोटे भाई के नाव संतु अउ बहिनी के नाव सतवंतीन रहय। छै झन भाई मन के बिहाव होगे रहय। संतु भर के बिहाव होय बर बांचे रिहिस। बिचारी सतवंतीन अपन दाई-ददा मन ला जानबे नइ करय, काबर कि वोहा जब बहुत छोटे रिहिस तभे ओखर दाई-ददा मन सरग सिधार गे रिहिन। भाई-भौजई मन ओखर पालन-पोषण करे रिहिन अउ पर्रा में भांवर किंजार के ओखर बिहाव घला कर दे रिहिन। अभी सतवंतीन के गौना नइ होय रिहिस, तिही पायके वोहा मइके में रहत रहिस। बिचारी मुरही-पोटरी सतवंतीन ह निचट गउ असन सीधी-साधी अउ फुलकैना असन गजब सुंदर रिहिस। भाई-भौजाई मन जइसन बुता करे बर कहय वइसनेच करे अउ जउन खाय-पिये बर दे उही ला खावत-पियत कलेचुप रहय। अइसने-अइसने उखर जिनगी के गुजर-बसर चलत रहय। सबले छोटे भाई संतु अभी कुवांरा रिहिस तिही पाय के ओहा सतवंतीन बर अउ भाई मन ले जादा मया करे।

खेती किसानी के काम चलत रहय। सब भाई-भौजी मन दिन भर खेत में काम करय अउ संझाती घर आवय। सतवंतीन ह घर के सबो बुता-काम ला कर के रांधे-गढ़े अउ भात धर के खाना पहुँचाय बर खेत जावय। एक दिन के बात आय। 

भौजई मन सतवंतीन ला चेतावत किहिन-‘‘बखरी के चना भाजी ला टोड़ के चना भाजी के साग रांधबे अउ लानबे।‘‘ भाई-भौजी मन के खेत जाय के बाद सतवंतीन ह बखरी ले भाजी टोड़ के लानिस अउ निमारे के बाद ओला रांधहूँ कहिके हँसिया मेें काटत रहिस। भाजी ला काटत-काटत हँसिया के धार में सतवंतीन के अंगरीच ह कटागे। हाथ ले तर-तर लहू बोहाय ला धर लिस। लहू ला पोंछे बर ओहा अड़बड़ चेन्दरी खोजिस फेर चेन्दरी मिलबे नइ करिस। सतवंतीन डर्रागे, ओहा मन में सोचिस कहूं भाई मन के धोती में पोंछहूं तब भाई मन गारी दिही अउ भौजाई मन के लुगरा में पोंछहूं तब भौजाई मन, हे भगवान मय काय करव? डर के मारे बपरी सतवंतीन ह अपन कटाय अंगरी के लहू ला भाजीच में पोंछ दिस अउ ओला रांध दिस।

मंझनिया के होवत ले घर के काम-बुता ला करिस अउ फेर बासी धर के खेत में आगे। जब सबो झन बासी खाय बर खेत के मेड़ में बइठिन अउ खइन तब आज के भाजी साग ह गजब मिठाय रहय। साग के अतेक मिठई म सब झन अड़बड़ खुश होगे फेर एखर कारण ह कोन्हों ला समझ में नइ आइस। तब ओमन सतवंतीन ला पूछिन। उखर डर के मारे सतवंतीन ह सब बात ला सफा-सफा बता दिस। सुनके सब झन दंग रहिगे। कोन्हों कुछु नइ किहिन अउ खेत के काम करके सबो झन घर आगे।

रतिहा के बेरा में सतवंतीन के सुते के पाछू छयो भाई-भौजी मन एक जगह सकलाके गोठियाय लगिन जब सतवंतीन के लहू में सनाय चना के भाजी ह अतेक मिठाय रिहिस। तब ओखर मास ह कतेक मिठाही? अब कुछु होवय फेर काली बिहनिया ले सतवंतीन ला बासी धर के खेत में बलाबो अउ ओला मार के ओखर मास ला रांधके खाबो। 

उखर गोठबात ला छोटे भाई संतु ह लुका के सुनत रहय। ओहा मने-मन में कहत रहय-‘‘वाह रे हत्यारा हो। मंँहु के सुवाद बर तुमन बहिनी ला मारके खाय के उदिम करत हो। तुमन मइनखे अव कि राक्षस? फेर मोर रहत ले तुमन मोर दुलौरिन बहिनी ला कइसे मारथो महूं देखथवं।‘‘

रतिहा होगे रहय, संतु ह अपन बहिनी के जीव बचाय बर उपाय सोचे फेर ओला कहीं उपाय नइ सूझत रहय। संतु ह भगवान ला सुमरत किहिस-‘‘हे भगवान! मैं तो घर में सब ले छोटे हवं। घर के सियानी इही चंडाल मन के हाथ में है। मैहा येमन ला छेकहूं तब तो येमन महूं ला मार के खा डारही। मोर दुलौरिन बहिनी के जिनगी ला बस तिही बचा सकथस, भगवान ओखर रक्षा कर।‘‘ सतवंतीन के जीव कइसे बांचही, इही बात के संशो-फिकर करत रतिहा पोहाय ला धर लिस अउ पोहाती-पोहाती संतु के नींद पड़गे।

रतिहा पोहाइस तहन अपन योजना के मुताबिक छयो भाई-भौजाई मन नून-तेल, हरदी-मिरचा, दार-चांउर सब समान धरके खेत डहर चल दिन। खेत जाय के पहिली ओमन संतवतीन ला जल्दी बासी धरके आबे कहिके चेता दिन। अब बपरी सतवंतीन ह उखर चाल ला काय जाने? उखर खेत जाय के पाछू लकर-धकर घर के काम ला निपटा के बासी धर के खेत पहुँचगे।

जइसने सतवंतीन खेत में पहुँचिस वइसनेच ओमन ह ओला मार डारिन अउ बोकरा-भेड़ा कस गोंदा-गोंदा काट डारिन। जीव छूटे के बेरा सतवंतीन ह मोला बचा भैया संतु कहिके चिचियाय रिहिस। भगवान के किरपा ले कोनजनी कइसे ओखर गोहार ह संतु के कान में पड़िस।

संतु हड़बड़ा के जठना ले उठिस। बेरा चढ़गे रहय। घर ह निचट मनखे मरे अस सुनसुनहा लागत रहय। जब संतु ला घर में सतवंतीन के आरो नइ मिलिस तब वोहा तुरते खेत डहर दौड़िस। खेत में पहुँच के संतु ह देखिस, भाई-भौजाई मन सतवंतीन ला मार के साग रांध डारे रहय। संतु के आँखी ले तरतर-तरतर आँसू बोहाय लगिस। ओहा मुड़ धर के बइठगे अउ कलप-कलप के रोय लगिस।

संतु ला रोवत देख के हत्यारा भाई-भौजाई मन डर्रागे। ओमन संतु ला डरा-धमका के चुप करावत किहिन-‘‘तैहा कोन्हों हमर मन के करनी ला दूसर तीर बताबे तब हमन तहू ला अइसने मार के खा डारबो। जीना-खाना हे तब अपन मुहूं में तारा लगा के राख।‘‘ 

उखर राक्षसी हाव-भाव ल देख के अउ धमकी ला सुनके संतु डर्रागे। मंझनिया के बेरा में सब झन बासी खाय बर मेड़ में एक ठन रूख के छइहां में बइठिन तब सबो के थारी में संतवतीन के देहे के मास के साग ला परोसे गिस। छयो भाई-भौजाई मन ओ साग ला बने मजा ले के खाय लगिन फेर बहिनी के सुरता करके संतु के आँखी ले आंसू बोहाय लगिस। फेर काय करे डर के मारे वोहा साग ला कंवरा बनाके खाय असन करे अउ सब के नजर बचा के मेड़ के दनगरा में डार देवय।

खा-पी के सब झन अपन-अपन काम-बुता में लगगे अउ संझाती होईस तहन घर लहुटगे। रतिहा फेर सबो झन सुन्ता होईन कि संतवतीन के दूल्हा जब ओला ले बर आही अउ कहाँ हे कहि के पूछही तब वोहा पेट पीरा में मरगे कहिके ठग देबो अउ गाँव वाले मन पूछही तब अपन ससुरार चल दिस कहिके लबारी मारबो। संतु बपरा उखर डर के मारे कोन्हों ला कुछु नइ बताइस फेर बहिनी के सुरता कर-करके वोहा बइहा-भुतहा असन होगे। अइसने-अइसने दू-तीन साल बीतगे।

जब सतवंतीन के दूल्हा पठौनी बारात धर के अइस तब भाई-भौजाई मन ओला सतवंतीन ह पेट पीरा में मरगे कहिके ठग दिन। बिना दुलहीन के बारात ह लहुटत रिहिस। रददा के जउन खेत के मेंड़ के दरगना में संतु ह सतवंतीन के हाड़ा-मांस के साग ला डारे रिहिस तउने ठौर में एक ठिन सुंदर फूल के पेड़ जागगे रिहिस। फूल के सुघरई ला देख के बरातिया मन के जीव ह ललचागे। एक झन बरातिया ह फूल ला टोड़हूं कहिके अपन हाथ ला लमाइस तब फूल ह ऊपर कोती टंगागे अउ पेड़ ले अवाज अइस- 

‘‘ओली भर तोड़ ले मुड़ भर खोंचले,

हो कुरा ससुरे, डार पवन झन नवे,

झन नवे भूली झन नवे‘‘

ये अवाज ला सुनके बरातिया मन अचरज में पड़गे। काबर कि कोन्हों पेड़ ला गाना गावत ओमन पहिली बेर देखत रिहिन। अब तो ओखर रहस्य ला जाने बर बहुत झन बरातिया मन ओ फूल ला टोड़े के उदिम करिन फेर नाता-गोत्ता के हिसाब ले पेड़ ले अइसनेच गाना सुनाय अउ फूल ह ऊपर डहर टंगा जावय अउ ओमन हटे तहन फूल ह खाल्हे में आ जावय। सब झन फूल ला टोड़े के उदिम करिन फेर ओहा काखरो से नइ टूटिस आखिर में दूल्हा राजा ह फूल ला अमरे बर अपन हाथ ला लमाइस। दूल्हा ला आवत देख के ओ पेड़ के सब फूल अपने-अपन खाल्हे डहर नवगे। दूल्हा ह सब फूल ला टोड़ के अपन बिहतरा झाँपी में भर दिस अउ बारात संग अपन घर लहुटगे।

जब ले सतवंतीन के मइके ले बिन दुल्हिन के बरतिया ह लहुटे रिहिस तब ले दूल्हा के घर एक विचित्र घटना घटे ल धर लिस। दूल्हा के दाई-बहिनी अउ भौजाई मन जब बिहिनया उठय ओखर पहिलीच ले घर के साफ-सफाई, लिपई-पोताई, गोबर-कचरा अउ पानी-कांजी भरे के बुता-काम मन हो जाय रहय। सब झन एक-दूसर ला पूछय कि ये बुता ला कोन करे हे? फेर बुता करने वाली के पता नइ चलय।

घर के मनखे मन रात कन पहरा दे तब ले पता नइ चलत रहय। एक रतिहा के बात आय। दूल्हा ह पहरा देवत अपन कुरिया के जठना में कलेचुप मिटका के सुते रहय। जागते-जागत रतिहा पोहाय ला धर ले रिहिस। तभे बड़े मुंढारहा ले ओहा देखिस जउन झाँपी में फूल ह रखाय रिहिस उही झाँपी ले जीयत-जागत सतवंतीन ह निकलिस अउ घर के सब काम-बुता ला करके फेर उही झाँपी में खुसरगे। पोहाइस तहन दुल्हा ह घर के सब मनखे ला बता दिस कि घर के काम ला सतवंतीन ह करथे।

बात कोन्हो ला समझ में नइ आइस। सब झन कहय सतवंतीन ह तो इहाँ आयच नइहे। ओखर मइके के मन तो ओला मरगे हावे कहिथे। कहीं येहा सतवंतीन के आत्मा तो नोहे? 

सब झन आपस में विचार करिन अउ ओ तराप के जदुवन्ता बबा ला अपन घर में बला के विचार कराइन। सतवंतीन ला जियाय के उपाय पूछिन। जदूवन्ता बबा ह बने विचार करके एक ठिन उपाय बताइस।

दूसरइया रात के मुढहरा सतवंतीन ह घर के बुता-काम करके जब फेर झाँपी में खुसरे लगिस तब दूलहा ह ओखर हाथ ला टप ले धर लिस अउ जदुवन्ता बबा के बताय मंत्र के जाप करिस। अउ पहिली ले घोर के राखे चंदन-मलागर ला सतवंतीन ऊपर छित दिस। सतवंतीन ह राम-राम कहत जिन्दा होगे।

सतवंतीन के जिन्दा होय के बात ह बिहिनया गाँव भर बगरगे। राज भर के मनखे ओला देखे भर उखर घर में सकलागे। सतवंतीन ह सबला अपन राम कहानी ला बता दिस ओखर कहिनी ला सुनके सुनइया मनके आँखी में आँसू डबडबागे। 

जदुवन्ता बबा ह किहिस-‘‘ले देखव बेटी के मन में मइके अउ ससुरार बर कतेक परेम होथे। मरे के बाद घला बेटी के आत्मा घर-परिवार के हित चाहथे। बेटी अउ बहू के हत्या करने वाला हत्यारा मन बेटी के मया ला आखिर कब समझही? आज इहाँ जतेक झन सकलाय हव सब किरिया खावव कि हमन सब झन बेटी-बहू के रक्षा करबो। ओमन ला उचित मान-सम्मान देबो। बेटी बचाबो, सृष्टि बचाबो।‘‘ मोर कहिनी पुरगे, दार भात चुरगे।


वीरेन्द्र ‘सरल‘

बोड़रा, मगरलोड़

जिला-धमतरी, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ मा शक्ति अराधना अउ नवा बछर - डुमन लाल ध्रुव

 छत्तीसगढ़ मा शक्ति अराधना अउ नवा बछर

                     - डुमन लाल ध्रुव 


छत्तीसगढ़ धरती ला देवभूमि कहे जाथे  जिंहा के हर कण मा संस्कृति, परंपरा अउ भक्ति के रंग घुले हवय। इहां के लोकजीवन मा शक्ति अराधना के बहुत गहिरा महत्तम हवय। शक्ति के रूप मा माता दुर्गा, महामाया, बम्लेश्वरी, दंतेश्वरी, अउ अलग-अलग रूप मा देवी के पूजा-पाठ सदियों ले चलत आत हे। इही संग नवा बछर (नववर्ष) के स्वागत घलो बड़े उत्साह अउ श्रद्धा के संग मनाय जाथे। छत्तीसगढ़ मा शक्ति अराधना अउ नवा बछर  दूनों एक-दूसर ले जुड़के लोकजीवन ला नवा ऊर्जा अउ विश्वास देथे।

छत्तीसगढ़ मा शक्ति के पूजा बहुत पुरखौती परंपरा हवय। गांव - गांव  मा देवी-देवता के मंदिर, देवगुड़ी अउ मड़ई मा लोगन मन माता के अराधना करथे। इहां के लोग मन माता ला अपन कुलदेवी, ग्रामदेवी अउ जीवनदाता मानथे। जइसे-जइसे समय बदलत गे तभो ले शक्ति के प्रति श्रद्धा कम नई होइस  बल्कि अउ मजबूत होवत गिस।

नवरात्रि के समे शक्ति अराधना के विशेष महत्तम रहिथे। नौ दिन तक माता के अलग-अलग रुप के पूजा होथे। जंवारा बोए जाथे, घट स्थापना होथे अउ भजन-कीर्तन के संग पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाथे। महिला मन उपवास रखथे  अउ परिवार के सुख-समृद्धि बर माता ले प्रार्थना करथे।

छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाका मा माता दंतेश्वरी के पूजा खास रुप ले प्रसिद्ध हवय। बस्तर दशहरा  जेखर महत्तम पूरे देश मा अलग हवय, शक्ति अराधना के अद्भुत उदाहरण आय। इहां दशहरा मा रावण दहन नई होय  माता के आराधना होथे। येखर ले पता चलथे के इंहा शक्ति के पूजा के कतेक महत्ता हवय।

छत्तीसगढ़ मा शक्ति के पूजा सिरिफ मंदिर तक सीमित नई हे। इहां के लोकजीवन मा हर जगह शक्ति के रुप दिखथे। खेती-किसानी के समय धरती माता के पूजा, जंगल मा रहइया जनजाति मन द्वारा प्रकृति के पूजा  अउ हर छोटे-बड़े काम के शुरुआत मा देवी के स्मरण ए सब शक्ति अराधना के ही रुप आय। ग्राम देवता अउ माई के पूजा घलो शक्ति अराधना के एक अहम हिस्सा आय। गांव  मा जब कभू कोई संकट आथे त पूरा गांव मिलके देवी के पूजा करथे। एखर ले समाज मा एकता अउ सहयोग के भावना मजबूत होथे।

छत्तीसगढ़ मा नवा बछर के स्वागत घलो बड़े धूमधाम ले करे जाथे। इहां के लोगन मन अपन परंपरागत कैलेंडर के अनुसार नवा साल मनाथे जेन ला ‘ हिंदू नववर्ष ’ या ‘ चौत्र नवरात्रि ’ के शुरुआत मा मनाय जाथे। ए समे ले ही नवा ऊर्जा अउ नवा उम्मीद के शुरुआत होथे।

नवा बछर के दिन लोगन मन घर साफ-सफाई करथे, नवा कपड़ा पहनथे  अउ मंदिर जाके पूजा करथे। किसान मन अपन खेती के काम के शुरुआत बर अच्छा मुहूर्त देखथे। ए दिन लोगन अपन जीवन मा सुख, शांति अउ समृद्धि के कामना करथे।

छत्तीसगढ़ मा नवा बछर के शुरुआत अक्सर नवरात्रि के संग होथे  जेन ले शक्ति अराधना अउ नवा बछर एक-दूसर ले जुड़ जाथे। ए समय लोगन मन माता के पूजा करके नवा साल के शुरुआत करथे  जेखर ले पूरा साल शुभ होवय। नवरात्रि के पहिली दिन घट स्थापना करके माता के आवाहन करे जाथे। एला नवा बछर के शुरुआत के प्रतीक माने जाथे। जंवारा के हरियर अंकुर जीवन मा नवा शुरुआत अउ विकास के प्रतीक आय। येखरे सेती नवा बछर मा शक्ति अराधना के विशेष महत्तम हवय।

छत्तीसगढ़ के नवा बछर अउ शक्ति अराधना मा लोकनृत्य, लोकगीत अउ पारंपरिक रीति-रिवाज के सुंदर संगम देखे ला मिलथे।  गरबा जइसने कार्यक्रम मा लोगन मन बढ़-चढ़ के हिस्सा लेथें। लोगन मन एक-दूसर ले मिलथे, खुशियां बांटथें अउ अपन संस्कृति ला जिंदा रखथे। ए समे गांव के वातावरण बहुत आनंदमय हो जाथे।

शक्ति अराधना अउ नवा बछर के पर्व हा सिरिफ धार्मिक ही नई  सामाजिक दृष्टिकोण ले घलो बहुत महत्त्वपूर्ण हवय। ए समे परिवार अउ समाज के लोगन एकजुट होथे। बड़े-बुजुर्ग मन छोटे मन ला आशीर्वाद देथे अउ आपसी संबंध मजबूत होथे। नवा बछर के समय लोगन मन पुराना गलती ला भुलाके नवा शुरुआत करथे। एखर ले समाज मा सकारात्मकता अउ भाईचारा बढ़थे। ए पर्व के समे बाजार मा रौनक बढ़ जाथे। लोगन मन नवा कपड़ा, पूजा सामग्री अउ सजावट के सामान खरीदथें। कारीगर अउ छोटे व्यापारी मन बर ए समे बहुत फायदेमंद होथे। एखर ले स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होथे। आज के समे मा भले ही जीवन शैली बदलत हवय  तभो ले छत्तीसगढ़ के लोगन मन अपन परंपरा ला निभावत हवंय। शहर मा रहइया लोगन घलो नवरात्रि अउ नवा बछर के समे घर जाके परिवार संग त्योहार मनाथे। सोशल मीडिया अउ आधुनिक साधन के माध्यम ले अब ए पर्व के जानकारी अउ महत्व दूर-दूर तक पहुंचत हवय। फेर  असली आनंद त आज  भी गांव मा पारंपरिक तरीके ले मनाए मा ही मिलथे।



- डुमन लाल ध्रुव

मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

पिन - 493773

आज जिनकी पुण्यतिथि है--- छत्तीसगढ़ी हास्य के भूले बिसरे बादशाह- " उधोराम झखमार "

 आज जिनकी पुण्यतिथि है---

छत्तीसगढ़ी हास्य के भूले बिसरे बादशाह-    " उधोराम झखमार "

 साहिर लुधियानवी की एक प्रसिद्ध रचना है कि मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी कहानी है, पल दो पल मेरी हस्ती है, पल दो पल मेरी जवानी है। शायद शायर यही कहना चाहता है कि हस्ती कितनी भी बड़ी हो एक न एक दिन मिट ही जाएगी। व्यक्ति कितना भी बड़ा हो, चाहे राजा हो या रंक सबको कभी न कभी मिटना ही है। फिर जब मिटना ही है तो बचा क्या? यादें और क्या?  " आदमी मुसाफिर है आता है जाता है, आते - जाते रस्ते में यादें छोड़ जाता है। " यह सुमधुर फिल्मी गीत केवल गीत नहीं बल्कि जीवन का सत्य है।

 तो चलिए आज 19 मार्च पुण्य तिथि पर याद करते हैं छत्तीसगढ़ी हास्य के एक ऐसे बादशाह को  जो आज भी अपने चाहने वालों की दिलों में राज करते हैं, अपने समकालीनों के दिलों में बसते हैं पर दुर्भाग्य से  नई पीढ़ी  जिनका नाम तक नहीं जानती। 

  जीं हाँ। मैं बात कर रहा हूँ उधोराम झखमार जी  की। श्रोतागण उनकी कविता तो छोड़ो पहले उनका नाम सुनकर ही ठहाके लगाते थे। वैसे तो झखमार शब्द का आशय व्यर्थ समय नष्ट करने वालों से है पर जिस झखमार की चर्चा मैं कर रहा हूँ वह व्यर्थ में समय नष्ट करने वाले नहीं बल्कि समय का सदुपयोग कर छत्तीसगढ़ के लोक जीवन से चुन चुनकर हास्य निकालकर श्रोताओं को खूब हँसाते थे। मंच पर उनकी उपस्थिति ही कवि सम्मेलन के सफलता की गारंटी होती थी।

  उधोराम झखमार जी का जन्म पैरी नदी के पावन तट पर अवस्थित चतुर्भुज सिरकट्टी धाम के पूर्व दिशा में स्थित ग्राम पांडुका में 12 नवम्बर 1935 को हुआ था। पांडुका को महेश योगी जी की जन्मस्थली होने का  और छत्तीसगढ़ के प्रयाग  राजिम को देवभोग से जोड़ने का भी गौरव प्राप्त है। झखमार जी पांडुका में जन्मे, पले-बढ़े और मिडिल स्कूल तक शिक्षा प्राप्त कर स्कूल मास्टर हो गए मगर उन्हें टेलर मास्टर का काम इतना पसंद आया कि उन्होंने स्कूल की मास्टरी छोड़ दी और छोड़े भी क्यों नहीं उन्हें स्कूल शिक्षक बनने के बजाय लोकशिक्षक जो बनना था।

 एक ओर वे अपनी कविता की माध्यम से राजनीति, प्रशासन और समाज की नग्नता को उघाड़ते थे तो दूसरी ओर कपड़े सिलकर तन की नग्नता को ढांपते भी थे। वे अपने समय के लोकप्रिय मंचीय कवि थे। उन्होंने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा को नारायण लाल परमार जी जैसे ख्यातिलब्ध साहित्यकार के सानिध्य में और परिष्कृत और परिमार्जित किया।

 अपने समकालीन सभी कवियों के साथ मंच पर अपनी दमदार उपस्थिति से अपना सिक्का जमाकर मंच लूटने वाले जनप्रिय कवि झखमार जी हर दिल अजीज थे और लोकप्रियता के शिखर पर थे।

गंवइहा हीरो, मोर रेडियो बइहा होगे, बनवास झन जाबे, कौमी एकता, भगवान अउ चोर, जेठ के ठड़ीयाय घाम, पाप के कांवर, छत्तीसगढ़ी कुण्डलिया, किसबीन मंहगाई , बेंदरा बांट, का जानन, कांटा, झींको-पुदगो, गीत पैरोडी, अंधरा हे दरपन, गुरु दक्षिणा, गणपति वंदना, भूत पुराण जैसी उनकी कविताएं श्रोताओं का केवल मनोरंजन नहीं करती थी बल्कि  विसंगतियों और विद्रूपताओं पर गहरी चोंट भी करती थी। हास्य व्यंग्य का यह चितेरा कवि 19 मार्च 1993 को इस दुनिया को यह गाते हुए छोड़ गया कि एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल और सचमुच आज तक उनके बोल छत्तीसगढ़ी साहित्य की दुनिया में गूंज रहे हैं।

 उनके जीवनकाल में तो उनकी कोई कविता संग्रह प्रकाशित नहीं हो पाई थी मगर उनके देहावसान के बाद परमार जी के सहयोग से प्रांतीय छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के माध्यम से सुशील यदु जी के सम्पादन में 2001 में ररूहा सपनाय दार भात शीर्षक से काव्य संग्रह का प्रकाशन हुआ है।

 आज 19 मार्च को उनकी पुण्य तिथि के अवसर पर उन्हें सादर नमन। विनम्र श्रद्धांजलि।

वीरेन्द्र सरल

बोड़रा ( मगरलोड )

जिला-धमतरीं ( छत्तीसगढ़ )

कहिनी *// पचरतन //* - डोरेलाल कैवर्त

 कहिनी

                  *// पचरतन //*

                                              - डोरेलाल कैवर्त


                      एकठन *सोनपान* गाँव जेन ह डोंगरी के खाल्हे म सुग्घर बसे रहिस।डोंगरी के सबो रुख राई ल काट डारे रहिन पूरा के पूरा चातर होगे रहय एकोठन खुटकुरी तको नि बांचे रहिस ते पाय के कतको झन मुंडा पहिरी घलो कहि देवंय। *सोनपान* गाँव के अलगेच चिन्हारी रहिस।गाँव भलेकुन छोटे रहिस फेर सुमता के डोरी जबर लम्बा लमे रहय।गाँव म खेती किसानी के संगे-संग बारी-बिरछा अऊ गाय गरुवा पोसे रहंय।गाँव म साग-भाजी के संगे-संग गोरस घलो हो जावय।घरो-घर दूध,दही घी अऊ पेउंस खाय-पीए बर मिल जावय।

            गाँव के गरोसा ले लेके टीप खार सिवाना के छुवत ले धान उपजे।गाँव के खेत के माटी मटासी अऊ कन्हार रहय ते पाय के धान अऊ ओन्हारी भारी उपजे।खेत के मेड़ म राहेर अऊ तीली घलो उपजावत रहिन।गांँव के मनखे मन एक दूसर के काम ल जुरमिल के करंय अऊ एक दूसर ल अबड़ मया-दुलार घलो करंय।गाँव म सुमता के पीकी बाढ़े रहय अऊ उहाँ धरम-करम के काम घलो समे-समे म होबेच करय।जइसन गाँव रहिस ओइसन उहाँ के मनखे घलो रहिन।

            *सोनपान* गाँव म करम सिंह जबर मयारुक किसान रहिस ओला गाँव के मनखे मन करमू कहंय।करमू करा पाँच खांड़ी के खेत रहय जेमा धान अऊ ओनहारी घलो उपजावय।ओहर बने चेत लगाके बूता करे कोनों किसिम के ओड़राही नि करे।कोन घाम कोन बरसा अऊ कोन जाड़ सबो समे म काम-बूता करतेच रहय।मंगइया-जचइया पौनी-पसारी मन ल देहे लेहे के पाछू खाय पीए बर पीग के पीग पूर जावत रहिस।

                 करमू जबर सीधवा के संगे संग सइताधारी रहिस।करमू अपन दाई-ददा के एकेझन बेटा रहय।करमू के महतारी घेरी-बेरी बीमार पर जावय त घर कोती के काम बूता नि हो पावय ते पाय के ओकर दाई-ददा मन बिहाव थोरिक जल्दी कर दे रहिन।करमू के गोसाईंन करमीन घलो सतवंतिन रहिस।दूबर-पातर गोल मुँहरन संवरेलही चुकचुक ले फभे रहय।ओहर मोटहा कोष्टहूं लुगरा पहिरे ओकर मूड़ कभू उघरा नि रहय।दूनोंझन जादा पढ़े लिखे नि रहिन फेर जिनगी जिए के सबो गुन कूट-कूट ले भराय रहिस।ओमन काकरो संग लड़ाई झगरा कभू नि जानिन।अपन काम ले काम दूसर चारी-चुगली म कभू नि रहंय।

            बिहाव होय के एक बछर के पाछू भगवान ओला चिन्हिस।थोरिक दिन के पाछू ओहर आमा अमली खाय के सउंख करे लागिस।देखते-देखत म करमीन के कनिहा मोटाय धर लिस अऊ नौ महीना के पूरती दसवांँ के लगती म पीरा उसलगे करमू गाँव के सुइन दाई ल बला के लानिस अऊ फेर का घरेच म करमीन हरुगरु होगिस।पहलावंत सुग्घर नोनी के जनम होइस।गोल मुँहरन जोगनी कस दिखय अपन महतारी के मुँहरन म रहिस।

              एक दिन रतिहा खाय पीए के पाछू सूते के बेरा खटिया म सुते-सुते दूनोंझन गोठबात करत रहिन।' हमर घर सुग्घर लक्ष्मी आए हावे जी!'......करमीन मुचमुचावत कहिस।' लक्ष्मी तो आय हावे ठीकेच कहत हावस फेर एकोझन नंगरिहा आ जातिस त मोरो नांगर धरे के थेभा हो जातिस!'.....करमू हुंकारु देवत कहिस।' नंगरिहा के अगोरा नि करन हमर इही लक्ष्मी आय अऊ लइका के सउंख नइ करतेन!'........करमीन फेरेच कहिस।' नंगरिहा आतिस त नांगर थेभे के संगे-संग हमर वंश घलो बाढ़तिस!'......करमू मुसकावत कहिस।

             बछर दूइक गुजरे पाय रहिस कि करमीन फेरेच गरु देंहें होगिस।दस महीना के छांव छुवत म करमीन हरुगरु होइस त फेरेच पनिहारिन होइस।ओहू नोनी बड़ सुग्घर रहय अपन बहिनी के मुँहरन ल उतारे रहिस।नंगरिहा के अगोरा करत-करत करमू के घर सरलग चार झन नोनी होइस।चार झन नोनी के पाठ म एकझन बाबू होइस।नंगरिहा होइस कहिके करमू बड़ खुश होइस।पारा-परोस म मिठाई बंटवाइस।करमू के सबो लइका मन बड़ सुग्घर रहिन।

                   समे गुजरत गिस देखते-देखत म लइका मन बाढ़त गिन सबो लइका मन स्कूल जाय बर धर लिन।सबो पढ़ाई-लिखाई म बने हुशियार रहिन।ओमन पढ़ाई के संगे-संग खेलकूद म घलो चिभिक रहिस ते पाय के राज्य अऊ राष्ट्रीय स्तर के खेलकूद म ओमन के चयन होत रहिस।एतकेच भर नि रहिस पढ़ाई के संग संगीत कोती रुझान रबेच करिस।पढ़ाई संग-संग घर के सबो बूता-काम घलो बने चिभिक लगा के करंय।ओकर बेटा अपन ददा के संग खेती के काम घलो धीरे-धीरे सीखत गिस।समे के अनुसार कलम के संग-संग नांगर घलो चलावत गिस।

              बड़े नोनी के नांव सोमबती,मंझली के मंगली आंतर मंंझली के बुधवारा छोटे नोनी के गुरबारी अऊ बाबू के नांव इतवार धरे रहिन।बाबू छोटे रहिस ते पाय के सबो ओला जादा मया करंय।ओहर सबो के दुलरुआ रहय।इतवार घलो बड़ सुग्घर रहिस ओहर अपन ददा के पानी ल उतारे रहिस।सबो लइका देखते-देखत बाढ़त गिन।करमू के पाँचो लइका स्कूल पढ़े बर जावंय ओमन पढ़े-लिखे म हुशियार घलो रहिन।

            कहे गे हावे कि मनखे के सुघराई ओकर चरित्र ले होथे।मूड़ ऊपर करके रेंगे बर चरित्र ल सुग्घर रखे बर परथे।मनखे के चित्र के नइ भलुक चरित्र के अभिनंदन होथे अऊ मनखे के नइ ओकर मनखत्व के पूजा करे जाथे।चाय अऊ चरित्र गिरथे त दाग लग जाथे ते पाय के सबले बड़का धन तो चरित्र हर आय।करमू के सबो लइका मन सुघराई के संगे-संग ओमन के चरित्र अऊ सुभाव ह घलो सुग्घर रहय।चाल अऊ चरित्र सुग्घर रहे म मनखे ल आघू बढ़े बर कोनों नि रोक सकें।करमू के लइका मन के सुभाव अऊ चरित्र के गोठ गाँव म होबेच करय।

               ' बाबू के अगोरा म परिवार बाढ़ गिस,देखव तुमन ल कहत रहेंव जी अब लोग-लइका के सउंख नइ करन! '......करमीन कहिस।' पाँच झन लइका हावे त का होइस? इही पाँचो झन हमर *पचरतन* आय! '..... समझावत करमू कहिस।' बाबू के देखत म हमर परिवार बाढ गिस ! '......करमीन फेरेच कहिस।' परिवार बाढ़ गिस त का होइस? सबोझन ल बने पढ़ाबो लिखाबो! '......करमू कहे लागिस।' लइका मन के गुरुजी बतावत रहिस कि हमर लइका मन पढ़े-लिखे म बने हुशियार हावें!'.......करमीन कहिस।' बने पढ़ लिख के कुछू न कछू नौकरी पाबेच करही!'......करमू कहिस।' हमर इतवार तो इंजीनियरिंग के पढ़ाई करे हावे!.....करमू खुशी मन ले कहिस।

           बने-बने म समे कइसे पहा जाथे पता नि चले।देखते-देखत म ओकर पाँचो लइका बाढ़ गिन अऊ बने पढ़-लिख डारिन।समे कोन केरवटिया लिही कोनों नि जानय।फेर का एक-एक करके धीरे-धीरे ओकर पाँचो लइका सरकारी नौकरी पावत गिन।दूनों बड़े नोनी मन शिक्षाकर्मी एक अऊ दू होगिन।तीसरइया नोनी पटवारी अऊ चउंथइया नोनी नर्स होगिस।ओकर बेटा इतवार बिजली विभाग म इंजीनियर के नौकरी पाइस।

          समे बलवान होथे सबो ल जनवा देथे। ' देख मैं तोला कहत रहेंव हमर लइका मन नौकरी पा जाही! '......करमू कहिस।' अपन बल-बूता म पाइन हावें ओमंन के मिहनत रंग लानिस!'....करमीन कहिस।' हमर डीही म दीया बरइया घलो हावे तोला कोनों संसो करे के जरुरत  नइ हे!'......समझावत करमू कहिस।' लइका मन बाढ़ के अपन पांव म खड़े होगिन अब एमन के बर-बिहाव कर देतेंन!'...... करमीन कहिस।' ठीक कहत हावस!'....मुड़ डोलावत करमू कहिस।करमू लइका मन के बिहाव करे बर लड़का खोजे के शुरु करिस।

           सबो लइका मन के ओसरी-पारी बिहाव करत गिन।नोनी मन जइसन रहिन ठीकेच ओइसन सुग्घर दमाद घलो मिलगिस।सबो नोनी मन के बिहाव करके ससुरार भेजिन अऊ अपन बेटा बर सुग्घर बहुरिया घलो पाइस।बहुरिया घलो बने बुतकरिन रहिस।जइसन बेटा वइसन बहुरिया।कहे गे हावे भगवान जेला देहे बर रहिथे तेन ल छप्पर फोर के देथे।ठीक वइसनेच करमू के करम लिखाय रहिस।करमू अऊ करमीन के पाँचो लइका सिरतोन उंकर " *पचरतन* " निकलिन संगे-संग *सोनपान* गाँव के नांव ल सुरुज के अँजोर कर बगराइन।

✍️   *डोरेलाल कैवर्त*

     *(कवि, कहानीकार)*

      *तिलकेजा, कोरबा (छ.ग.)*

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अभागिन - डुमन लाल ध्रुव

 अभागिन

                 - डुमन लाल ध्रुव 


बरसात के बाद के दिन रहिस। धरती मा नई-नई हरियर घास फूटगे रिहिस। महुआ के पात ले टप-टप पानी झर-झर गिरत रिहिस जइसे कोनो बइठके रोवत हवय। गांव रिहिस  बारनवापारा। नांगर जोते के बाद खेत मन सुक्खागे रिहिन। पोखरी के पानी मा आसमान के नीला रंग झलकत रिहिस।

गांव के किनारे  बंबरी अउ आमा के झुरमुट के बीच एक मटियाहा रंग के घर रिहिस। घर के अंगना मा तुलसी चौरा  जऊन मा दीया के कालिख  जमे रिहिस। ओ घर मा रहत रिहिस एक नान्हे नोनी हा नाव रिहिस “ भागमानी ”। फेर गांव के लोगन ओखर नाव ले कम  “अभागिन” कहिके जियादा बुलावत रिहिन।

का कसूर रिहिस ओखर ? ये बात गांव मा कोनो साफ-साफ नई बतावत रिहिस फेर फुसफुसाहट मा सब्बो कहिथें - “जउन दिन ये जनमिस  ओही दिन ओखर ददा परदेश चले गिस। फेर लहुट के नई आइस। माई भी दू बरस बाद चल बसिस। तब ले ये घर मा अकेल्ला उजियारी खोजत रहिथे।”

भागमानी के संग ओखर बूढ़ी दाई रिहिस   ददा के माई। दाई के आंखी मा मोतियाबिंद उतर गे रिहिस  फेर मन मा उजियार कम नई रिहिस। वो हर रोज बड़े बिहनिया, बड़े बिहनिया कहिथे रहय।

“अभागिन नई, मोर भाग के बेटी हवस तंय। भागमानी हस। सुन ले, मन मा ये बात के गांठ बांध ले।”

गांव के लइका मन खेलत-खेलत ओखर घर के आगू ले गुजरथे  त कोनो कहि देथे -

“ ए अभागिन! चल गिल्ली-डंडा खेलन!”

ओ मुस्कुरा देथे, फेर आंखी के कोना गीला हो जाथे।

सावन के आखिरी सोमवार के दिन नजदीक के बड़े गांव मा मेला लगिस। ढोल-नगाड़ा, जलेबी के महक, लकड़ी के घोड़ा-गाड़ी, रंग-बिरंगा फुग्गा  सब्बो के मन ला लुभावत रिहिस। भागमानी के मन मा घलो मेला देखे के संउक उठिस।

“ दाई , मेला देखे बर जाबो ?”

दाई मुस्कुराइस  “जा रे, जाके देख आ। फेर जलदी लहुट आबे। मोर आंखी तोरेच रद्दा अगोरत रही।”

भागमानी अपन फटे - पुरानी फ्रॉक झाड़-पोंछ के पहिरिस अउ चल परिस। रद्दा भर मा धान के खेत मन हिलत रिहिन, जइसे ओखर हौसला ला बढ़ावत हवय।

मेला मा पहुंचते ही जम्मो जिनिस हा नवा - नवा लगिस। लकड़ी के बने बांसुरी मा सोंधी धुन बजत रिहिस। झूला झूलत लइका मन हंसत - चीखत रिहिन। ओ भी झूला झूलना चाहिस फेर जेब टटोलिस त खाली।

ओही बखत गांव के बनिया के लइका  रामधनी ओखर कोती आके किहिस -

“ए अभागिन, झूला झूलना हवय त पइसा दे पइसा!”

भागमानी चुप रिहिस।

तभेच एक झन सियनहा बबा कारीगर जऊन लकड़ी के खिलौना बेचत रिहिस, ओखर उदसहा चेहरा देखिस। किहिस -

“ ए नोनी, काबर उदास हवस?”

“ कुछ नई बबा…”

कारीगर मुस्कुराइस - “ले, ये लकड़ी के चिरई तोर बर। फुक मा उड़े नई, फेर सपना मा खूब उड़ही।”

भागमानी के आंखी चमक उठिस। पहिली दफा कोनो अनजान मनखे ओखर नाव नई ओखर मन देखिस।

गांव के पोखरी मा एक कहानी बसत रिहिस। कहिथे, बरसों पहिले एक चिरई रोज आके पानी मा अपन चेहरा देखत रिहिस। जऊन दिन ओखर मन उदास होवत, पानी मा तरंग उठ जाथे।

भागमानी रोज सांझ मा पोखरी किनारे जाके बइठ जाथे। लकड़ी के चिरई ला पानी मा डुबाके, फेर बाहर निकालके हंस देथे।

“देख, चिरई! आज मंय रोवत नई हंव, हंसत हंव।”

एक दिन गांव के मास्टर जी, जऊन शहर ले पढ़के आय रिहिन, ओही पोखरी किनारे किताब लेके बइठे रिहिन। भागमानी ला देखिन।

“काबर रोज इहां आके बइठ जाथस ?”

“मोर संग बात करे बर कोनो नई हवय। पानी मा अपन चेहरा देखथंव, त लागथे कोनो चिनहारी मिलगे।”

मास्टर जी चुपचाप सुनत रिहिन। फेर किहिन -

“तंय पढ़हे - लिखे बर स्कूल काबर नई आवत हस ?”

“ लोगन मन कहिथे, अभागिन के पढ़हे ले का होही ?”

मास्टर जी के आंखी चमक उठिस - 

“जऊन नोनी हा अपन दुख ला कहानी बना सकथे, वो सबले बड़े भागवान होथे। काली ले स्कूल आबे।”

दूसर दिन बिहाने दस बजे भागमानी हा कांपत कांपत स्कूल पहुंचिस। स्कूल के माटी के फर्श, काली पट्टी, खड़िया के गंध  सब्बो नया।

लइका मन फुसफुसाइस - “देखव, अभागिन आ गे!”

फेर मास्टर जी हाजिरी लेवत - लेवत जोर ले किहिन -

“भागमानी !”

ओ चंउक गे -

“ मोर नाम…?”

“हां, तोर असली नाव भागमानी हवय। आज ले कोनो ‘अभागिन’ नई कहिही।”

कक्षा मा सन्नाटा छागे। मास्टर जी किताब ले एक कहानी पढ़िन -

“एक चिरई रिहिस जऊन अपन पंख के भरोसा मा आसमान नापे बर निकलिस…”

भागमानी ला लागिस, कहानी ओखर बर लिखे गे हवय।

दिन बीतत गिस। भागमानी अब रोज स्कूल जाथे। पढ़हे - लिखे मा तेज निकलिस। गांव के लोगन धीरे-धीरे ओखर बदले रूप ला देखे लगिन।

एक दिन, पंचायत भवन मा बाल सभा रखे गीस। मास्टर जी किहिन -

“आज कविता पढ़ही भागमानी हा।”

भागमानी कांपते आवाज मा पढ़िस ।

“मैं अभागिन नई,

मोर भीतर उजियार के दीप हवय।

मोर दुख मोर साथी,

जऊन मोला मजबूत बनाय हवय…”

सभा मा ताली गूंज उठिस। दाई दूरिहा ले सुनत रिहिस, आंखी मा पानी, होंठ मा मुस्कान।

सर्दी के एक रात दाई के तबीयत बिगड़गे। भागमानी ओखर सिरहाना मा बइठ के किहिस -

“ दाई, मोला छोड़ के मत जा।”

दाई हा धिरलगहा किहिस -

“मोर बेटी, मनखे के जिनगी मा दुख - भाग, सुख - भाग सब संग - संग चलथे। तंय अभागिन नई हवस। जऊन दिन तंय दूसर के आंखी के आंसू पोछबे ओ दिन असली भाग खुलही।”

कुछ दिन बाद दाई चल बसिस। गांव के लोगन पहली दफा भागमानी ला “अभागिन” नई किहिन। सब्बो चुपचाप ओखर संग खड़े रिहिन।

बछर बीत गे। भागमानी हा अब बड़े होवत रिहिस। पढ़हे - लिखे मा अव्वल। गांव मा छोटे - छोटे लइका मन ला पढ़ाय लगिस। ओखर घर के अंगना मा फेर दीया जले लागिस।

पोखरी किनारे बइठ के ओ लकड़ी के चिरई ला देखथे अउ मुस्कुराथे -

“देख, चिरई! अब मंय उड़े बर सीख गे हंव।”

गांव के नवा लइका - लइकी जब पूछथे -

“दीदी, अभागिन का होथे?”

ओ हंस के कहिथे -

“जऊन अपन भीतर के उजियार ला नई पहिचानय, वही अभागिन होथे। जऊन पहिचान लेथे  वो भागमानी बन जाथे।”

बरसात फिर आय रिहिस। महुआ के पात ले फिर पानी टपकत रिहिस। फेर अब ओ आवाज रोवत नई  गावत जइसे लगत रिहिस।

बारनवापारा के मटियाहा रंग के घर अब उजियार ले भर गे रिहिस। लोगन कहिथें -

“देखव, जऊन ला हमन अभागिन कहत रहेन  वोहा आज गांव के सबले बड़े भाग के चिन्हा बन गे।”

अऊ भागमानी ?

ओ हर रोज तुलसी चौरा मा दीया जला के दाई ला सुरता करत कहिथे -

“अभागिन नई… मंय भागमानी हंव।”

           - डुमन लाल ध्रुव 

     मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

         पिन -493773

श्रीरामचन्द्र जी अउ छत्तीसगढ़ - ओमप्रकाश साहू "अंकुर"

 श्रीराम नवमी म विशेष 


श्रीरामचन्द्र जी अउ छत्तीसगढ़ 


                 - ओमप्रकाश साहू "अंकुर"


    हमर भारतीय संस्कृति म मान्यता हे कि जब-  जब ये भुइंया म पाप नंगत बाढ़ जाथे तब भगवान ह मनखे रूप म अवतरित होके आथे अउ अत्याचारी मन ल मारके भक्तन मन के रक्षा करथे। त्रेता जुग म भगवान श्रीरामचन्द्र जी अवतरित होइस। श्रीरामचन्द्र जी भगवान विष्णु के सातवां अवतार माने जाथे।


त्रेता जुग म पवित्र सरयू नदी के तीर म बसे अयोध्या म महान प्रतापी राजा दशरथ राज करत रिहिन।  राजा दशरथ के पूर्वज मन के अब्बड़ सोर रिहिन हे। येमा  राजा रघु,राजा दिलीप, राजा शिवि, सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र, महा प्रतापी अज , भागीरथ अउ आने राजा के नांव सामिल हे। सूर्यवंशी राजा दशरथ के तीन झन रानी रिहिन जेमा कौशल्या सबले बड़की रिहिस। दू झन अउ रानी म   सुमित्रा, कैकैयी रिहिन। राज पाठ सुघ्घर चलत रिहिस। राज्य ह धन - धान्य ले संपन्न रिहिस पर राजा दशरथ के एको झन बेटा नइ रिहिन। इही हंसो  ह राजा ल घुना कस खाय जात रिहिन। अपन ये परेसानी ल अपन कुल गुरू  वशिष्ठ के पास रखिस त राजा ल सलाह दिस कि राजन् येकर बर पुत्रेष्टि यज्ञ कराव। ये यज्ञ करे बर सबले बने महान तपस्वी श्रृंगि ऋषि रहि। ये ऋंगि ऋषि छत्तीसगढ़ के सिहावा पहाड़ी क्षेत्र म तप - जप म मगन राहय। ये इही सिहावा पहाड़ी आय जिहां ले छत्तीसगढ़ के जीवनदायिनी नदी महानदी निकले हे। राजा दशरथ ह ऋंगि ऋषि कर जाके कलौली करिन कि हे महान तपस्वी आप मन मोर बिनती ल स्वीकार करके पुत्रेष्टि यज्ञ करहू त मंय ह आप मन के जिनगी भर आभारी रहूं। श्रृंगि ऋषि ह राजा दशरथ के घर जाके पुत्रेष्टि यज्ञ करिन येकर फलस्वरूप बड़की रानी  कौशल्या ह 

रामचंद्र लला, कैकैयी ह भरत अउ सुमित्रा ह लक्ष्मण अउ शत्रुघ्न जइसे हीरा बेटा पाइन। येमा राम ह भगवान विष्णु के सातवां अवतार 

 अउ लक्ष्मण ह शेषनाग के अवतार माने जाथे। 

कतको इतिहासकार मन के मानना हे कि हमर छत्तीसगढ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी के महतारी कौशल्या के मइके हरे। छत्तीसगढ़ के जुन्ना नांव कोसल रिहिस अउ इहां के भाषा ल कोसली कहे जाय। कौशल्या के नांव भानुमति रिहिन जउन ह दक्षिण कोसल के महाप्रतापी राजा भानुमंत के बेटी रिहिन। अयोध्या के महाप्रतापी राजा दशरथ ले वोकर बिहाव होइस। भानुमति कोसल प्रदेश के होय के कारन आगू चलके कौशल्या कहलाइस। आदिकाल म छत्तीसगढ़ महाकोसल के नांव ले प्रसिद्ध रिहिस हे। श्रीराम के जनम भूमि अयोध्या हरे अउ ननिहाल छत्तीसगढ़ के चंदखुरी (आरंग)गांव हरे। हर लइका बर ममा गांव के अब्बड़ मया रहिथे त भगवान राम ल कइसे नइ रहि। येमा दू मत होय नइ हो सकय कि भगवान राम ह अपन नाना गांव नइ आइस होही।कतको बार नानपन म आइस होही। ये स्भाविक बात ये। त हम देखथन कि भगवान राम अपन नानपन म हमर छत्तीसगढ म आके अपन बाल सुलभ लीला चंदखुरी गांव म घलो दिखाइस। ये चंदखुरी गांव म महतारी कौशल्या के बड़का मंदिर हे। ये जगह ह लोगन मन के आस्था के बड़का केन्द्र हरे अउ अब पर्यटन स्थल के रूप म अपन एक अलग पहिचान बना लेहे।


 हमर छत्तीसगढ के महत्तम मअउ बढ़वार जाथे जब ये जाने ल मिलथे कि भगवान राम ह अपन  चौदह बछर बनवास म दस बछर तो इहि छत्तीसगढ़ ( सिहावा) राज्य म वो समय के सप्त ऋषि क्षेत्र म बिताय रिहिन। त ये प्रकार ले हमर छत्तीसगढ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के चरनरज ले पवित्र होय हे। तेकर सेति हमर छत्तीसगढ म भगवान राम ल भांचा राम कहे जाथे। अउ येकर असर हमर छत्तीसगढ के संस्कृति म देखे ल मिलथे। इहां के लोगन मन अपन भांचा - भांची ल भगवान कस मानथे। चरन छूके प्रनाम करथे। बिहाव से लेके कोनो खुशी के आयोजन हो या जिनगी के अंतिब बेरा होय भांचा - भांची ल अपन शक्ति अनुसार दान जरूर करथे।


 संत कवि पवन दीवान जी महतारी कौशल्या के जनम भूमि चंदखुरी के उद्धार अउ माता कौशल्या शोध पीठ बनाय बर अब्बड़ उदिम करिन। दीवान जी ह काहय कि - " भगवान राम हमर छत्तीसगढ के भांचा आय। चंदखुरी वोकर ममा गांव आय। तभे तो हमन   कहिथन -"कइसे भांचा राम। सब बने बने भांचा राम। ले तूही मन बताव ग कोनो मन कहिथे का कइसे भांचा कृष्ण। अउ मानलो कहूं कोनो अइसने कहि दिस त वो कहइया ह ल कहू !" अइसे कहिके दीवान जी ह जोरदार ठहाका लगाय।

  हमर छत्तीसगढ म भगवान राम ह जन -जन अउ सबके मन म बसे हे। इहां राम भगवान ले जुड़े कतको आयोजन होथे। छत्तीसगढ़ के सबो गांव म रामायण मंडली हावय जउन मन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के गुनगान अपन सामर्थ्य अनुसार करथे। अउ ये प्रकार ले गोस्वामी तुलसीदास बाबा के रामचरित मानस के संदेस ल जन - जन तक पहुंचाथे।नवा मकान म गृह प्रवेश होय,षट्ठी होय या दशगात्र बेरा राम नाम के चर्चा रामायण मंडली के माध्यम से या रामधुनी मंडली के माध्यम ले होथे। जिहां गीत- संगीत ले वातावरण ह भक्तिमय हो जाथे त दूसर कोति मानस टीकाकार मन राम के चरित्र के गुनगान कर परिवार,समाज अउ देस हित बर संदेश देथे। हमर छत्तीसगढ म रामधुनी प्रतियोगिता, राम सत्त , मानस गान स्पर्धा/ मानस सम्मेलन, नवधा रामायण, राम लीला के आयोजन कर भगवान राम काबर मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाथे।भगवान राम ह वर्तमान बेरा म काबर प्रासंगिक हे।ये सब बात ल जोड़ के लोगन मन ल सही रस्दा म चले बर सीख देय जाथे। ये सब आयोजन के आधार महर्षि बाल्मीकि कृत रामायण, गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस अउ आने भाषा म रचित रामायण हरे।हमर छत्तीसगढ म रामनामी संप्रदाय के लोगन मन अपन पूरा शरीर म राम दनाम के गोदना गोदाय रहिथे। अत्तिक आस्था हे भगवान राम बर। भगवान राम सबके हरे। महर्षि बाल्मीकि अउ गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार राम सगुन रूप म हे। जब- जब समाज म अतियाचार बाढ़ जाथे। जब- जब अपन महान धर्म ल हीनमान करे जाथे त भगवान विष्णु ह नर रूप म अवतार लेके पापी मन ल मारथे अउ हमर महान धर्म अउ संस्कृति के रक्षा करथे।

त दूसर कोति देखथन कि कबीर के राम निर्गुण हे। कबीर के राम कोनो मंदिर अउ पथरा म नइ हे वो तो घट -घट म विराजमान हे। निराकार हे। सबो जगह वोकर उपस्थिति हे। कबीर ह धर्म के नांव म दिखावा करइया अउ येकर आड़ म

 म लड़वइया पाखंडी मन ल जम के लताड़िस।


  राम सबो झन के हरे। वो कौशल्या के राम हरे त कैकेयी बर भगवान हरे। राजा दशरथ के घलो परान हरे। वोहा अयोध्या के मान हरे। भाई भरत , लक्ष्मण, शत्रुघ्न बर महान हरे। केंवट , सबरी माता, अहिल्या, जटायु के उद्धारक हरे। ऋषि - मुनि अउ सज्जन मन के रक्षक त अत्याचारी ,पापी मन बर महाकाल हरे। 

हनुमान के भगवान हरे त सुग्रीव अउ विभीषण के सुघ्घर मितान हरे। ताड़का, मारीच, बाली, कुंभकरण, रावण जइसन राक्षस अउ अहंकारी मन के संहारक हरे। जनकनंदिनी सीता के मर्यादा पुरुषोत्तम राम हरे।जेकर मान राखे बर अहंकारी रावण ल संहारे। राम कैकेयी,मंथरा ल ढांढस बंधवइया वो राम हरे जेहा दूनों ल ये श्रेय देथे कि राम ल मर्यादा पुरुषोत्तम बनाय म तुंहर मन के हाथ हे नइ ते मंय तो सिरिफ अयोध्या के राजा बस कहलातेंव।

    हमर छत्तीसगढ म उत्तर दिशा के सरगुजा ले लेके  दक्षिण दिशा के सुकमा तक भगवान राम ले जुड़े ठउर अउ जुन्ना अवशेष मिलथे जेमा लोगन मन के आस्था जुड़े हावय। हमर राज्य म भगवान राम ले जुड़े पछत्तर ठउर मन के पहिचान करे गे हावय।येमा सीतामढ़ी - हरचौका ( कोरिया), रामगढ़ ( सरगुजा), शिवरीनारायण ( जांजगीर-चांपा), तुरतुरिया ( बलौदाबाजार - भाटापारा), चंदखुरी ( रायपुर), राजिम( गरियाबंद), सिहावा सप्त ऋषि आश्रम ( धमतरी), जगदलपुर ( बस्तर) व रामाराम ( सुकमा) सामिल हावय‌। भगवान राम के बनवास ले जुड़े कतको ठउर मन ल सहेजे अउ पर्यटन स्थल के रुप म बढ़वार करे खातिर पहिली के कांग्रेस सरकार ह श्रीराम वन गमन पर्यटन परिपथ परियोजना बनाय रिहिन। काम घलो चालू करिन।

    बाइस जनवरी 2024 के दिन भगवान राम के जनम भूमि अयोध्या म श्रीरामलला के मूर्ति के प्रान प्रतिष्ठा करे गिस। मोदी - योगी के शासन काल म होवत ये बड़का आयोजन ले सिरिफ अयोध्या ह नइ पूरा देस के संगे -संग आने देस मन घलो राममय होइस ।

 अइसन सुघ्घर बेरा म भगवान राम के ममा ठउर छत्तीसगढ़ ह कइसे अछूता रहितिस। छत्तीसगढ़ ह अपन भांचा राम के मूर्ति ल मंदिर म करीब पांच सौ बछर बाद फिर से स्थापित करे के बेरा म उछाह होइस। भगवान राम के ननिहाल हमर छत्तीसगढ ले अयोध्या म आयोजित बड़का भंडारा खातिर बासमती चउंर , किसम- किसम के सब्जी के संगे- संग सहयोग राशि पठोय गिस। इहां के सबो शहर अउ सब गांव राममय होगे । श्रीराम हमर भारत देश के सच्चे नायक हे। राम एक आदर्श बेटा, आदर्श शिष्य, आदर्श पति,आदर्श मितान, आदर्श राजा के रूप में जनमानस में प्रतिष्ठापित हे।


। जय सिया राम।


           ओमप्रकाश साहू "अंकुर"

         सुरगी, राजनांदगांव

कहानी *अपन गांव अपन घर*

 कहानी


 *अपन गांव अपन घर*




               

            

गैस सिलेंडर हा आज घलौ नी मिलिस का।सरजू ला भरे मंझनिया घर आवत देख शान्ति हा थोरिक चिंता करत पूछिस।

       नी मिलिस शांति।माथा के पसीना ला पंछा मा पोछत सरजू हा कहिस। 

  करसी के पानी ला एक लोटा लान के शांति हा सरजू के हाथ मा धराइस ।जावव हाथ मुँह धो के भात खा लेवव।

घर मा घलौ  तो सिलेंडर नी रहिस घर के सिलेंडर ला तो मैं हा अपन होटल मा लेग गे रहेंव उहूँ खतम हो गिस ,ता तै हा भात कइसे राँधे हस  सरजू किहिस । 

     मै हा घलौ जुगाड़ करे रहेंव शांति हा मुचकात कहिस।

 कखरो करा माँगे हस का ।सरजू शांति के मुँहे मुँह ला देखे लागिस ।

     नहीं जी एती ओती ले झिटिया टोर के लाये हवँ,खुल्ला गरुवा बछरू मन घूमरत रहिथें उँखर गोबर हा सूखा के बिनवा  छेना बन जाथे तेला बिन लेहे रहेवँ।अउ मेंहा कपड़ा सिलथवँ तेकर नान नान कुटी ला बोरी मन मा भर के राखे रहेंव।

ओही मन ला बार के दू दिन हो गिस भात राँधत हवँ।

 तभे तो मै हा कहिथवँ तै  हा मोर घर के लक्ष्मी हावस शांति  ढकर ढकर लोटा के पानी ला पीके सरजू हा कहिस।

  अबड़े घाम हावय मैहा नहाहवँ शांति।सरजू हा कहिस।

जावव ना नहानी में पानी भराय हावय। शांति हा कहिस।

   बिलासपुर जिला के पोंड़ी गाँव के रहइया सरजू कमाय खाय बर  दस बछर पहिली रायपुर आय रहिस ।शुरू मा इहाँ आके एक ठिन होटल मा  कप प्लेट माँजे के बुता करे लगिस  फेर कलेक्टर आँफिस करा एक ठन ठेला मा चाय बेचे ला धरिस ।धीरे धीरे चार पइसा कमाई होइस ता एक ठिन छोट कुन होटल खोल लिहिस हे बने रोजी रोटी चलत रिहिस फेर कोरोना काल मा बड़ परशानी होइस।जइसे तइसे जिनगानी हा लाइन मा आइस हावय।फेर ये दरी ये लड़ाई(युद्ध) के कारण गैस सिलेंडर के कमी हा सरजू के कनिहा टोर दिहिस हे। शहर के खरचा अबड़े रहिथे।घर के किराया, लइकन के फीस,फेर रायपुर हा मँहगा शहर घलौ आय।कहाँ घर ले आय रिहिस ता हर महिना पइसा भेजहूँ कहे रिहिस ,आज तक दू रुपिया नई भेजे सकिस कभू कभू सोच के अबड़े दुख होथे फेर अपन लाचारी ला सोच मन ला मसोस लेथे।

     मनखे हा लडा़ई झगरा काबर करथे जी।बने प्रेम व्यवहार ले रहितीस ,ता काय होतिस।थारी मा भात ला निकालत शान्ति हा किहिस।

     सब स्वारथ के मारे आय शांति।बड़े आदमी अउ बड़े होय बर चाहथे भले कखरो नरी ला मुरकेटे बर पड़े ता पड़ जाय ।अइसने बड़े देश हा छोटे देश के ऊपर अपन कब्जा जमाय के कोशिश करत रहिथें।बड़का देश हा दुनिया के दादा बन गे हे। मोर होटल मा अइसने गोढ़ियावत रिहिन हे ग्राहक मन ।

   अउ कोन बड़का देश जी हमर देश खुद बड़का देश आय।

शान्ति हा किहिस।

      ये दुनिया मा अउ कतको बड़का देश हावय शान्ति, अमरीका, चीन, रूस।फेर अमरीका  हा बड़ हदरहा हावय।सरजू हा किहिस।उँखर लड़ाई मा हमर करलाई हो गिस शांति।सरकार हा अभी व्यवसायिक सिलेंडर मा रोक लगाय हावय तेपाय के अठवाहि हो गिस मोर होटल ला बंद हो गिस ।कहूँ बिलेक मा मिल  जाहि सोच के रोज कोशिश करत हवँ  फेर ज्यादा पइसा देके घलौ नई मिलत हे।

       अइसन में तो भूख मरे बर पर जाही जी।कमाई नइ होही ता घर के खरचा कइसे चलही हमन तो छोटे धंधा वाले अन रोज कमाथन रोज खाथन।चार पइसा जोरे रहेन तेनो अब तो खरचा होय लगिस।शांति हा फिकर करत किहिस।

       महूँ ला अबड़े फिकर होवत हे शांति।सरजू हा अचोवत कहिस।

मै तो फेर कहिथवँ जी।चलव घर लहुट जाथन।हमर खेत के लकड़ी अउ घर के छेना अलमल के हावय।अउ अम्मा बाबू घलौ तो अब सियनहा हो गिन हे।

अम्मा बाबू के  चेहरा हा आँखी आँखी मा झूले लगिस हे।पीपर के पेंड़ लीम के चौरा सबके सुरता आय लगिस।कोला के बोइर के मिठास मन मा घुर गे।कतका दिन हो गिस अम्मा के हाथ के अँगाकर रोटी खाय।सरजू के आँखी के कोर मा पानी आ गिस जेला चुपे चुप कुरथा के बाहीं मा पोंछ लिहिस।

      फेर शांति ये बात ले अनजान नइहे।आखिर वोहा सरजू के सुख दुख के  साथी अर्धांगनी जो आय।

   संझा के बेरा आय गरुवा मन चरके कोठा मा लहुट आँय हे।परछी मा खटिया मा रामरतन ढलगे  हावय। लक्ष्मीन

हा चुल्हा मा लाल चाय ला चढ़ाय हावय।तभेच एक ठन आटो आके दुआरी मा रुकिस। कोन आय ग रामरतन हा उठ के बैठत कहिस आज कल ओला झुकुर झाकर दिखथे।लइकन मन आय ,लक्ष्मीन हा किहिस।सुन के रामरतन हा खुशी के मारे लउठी ला टेकत दुआरी मा जाय लगिस।तभेच दादा कहत दुनो लइकन रामरतन ला पोटार लिहिन।सरजू पाँव परके मुड़ी ला झुकाय बइठ गिस।शांति हा जम्मो सुख दुख के गोठ ला बताइस।

   मै तो कब के घर लहुटे बर कहत रहेंव बेटी फेर येहा मोर बातेच नइ सुनय।रामरतन हा खखारत कहिस ।

लक्ष्मीन सब झिन ला चाय ला के दिहिस।देवव अम्मा भात ला मै राँधिहृवँ,शांति हा कहिस। हाथ गोड़ ला धो के थोरिक सुस्ता ले फेर तोर घर तोर दुआर बेटी लक्ष्मीन  हा कहिस।

शांति देखत हे पटाव मा लकड़ी छेना भराय हे उज्जवला योजना के गैस सिलेंडर अभी अधियाय नइ हे।

    मै  अब इहे रइहवँ बाबू रायपुर नइ जाववँ। सरजू हा कहिस।

     हवँ बेटा ये भुइयाँ हा हमर महतारी ये ।येखर जतके तै सेवा करबे ओखर कई गुना हमला लहुटा दिही।हमर खेत हा हमला साल भर खाये के पुरतन दे  देथे।रामरतन हा कहिस।

      सरजू जी तोड़ के मेहनत करे लगिस ओखर मेहनत के फसल खेत मा लहलहावत हे।घर के परछी मा छोट कन राशन के दुकान खोले हे जेला शांति हा देखथे।उही मेर गाँव के बहिनी बेटी मन के कपड़ा घलौ सिलथे।अपन गाँव  अपन घर आखिर अपन होथे।

  





 चित्रा श्रीवास

सिरगिट्टी बिलासपुर

छत्तीसगढ़

नाचा के सियान- मंदराजी दाऊ

 1 अप्रैल -116 वीं जयंती म विशेष 


नाचा के सियान- मंदराजी दाऊ 





-ओमप्रकाश साहू ‘अंकुर’


धान के कटोरा छत्तीसगढ़ के लोक कला अउ संस्कृति के अलग पहचान हवय । हमर प्रदेश के लोकनाट्य नाचा, पंथी नृत्य, पण्डवानी, भरथरी, चन्देनी के संगे संग आदिवासी नृत्य के सोर हमर देश के साथ विश्व मा घलो अलगे छाप छोड़िस हे। पंथी नर्तक स्व. देवदास बंजारे ,पण्डवानी गायक झाड़ू राम देवांगन, तीजन बाई, ऋतु वर्मा, भरथरी गायिका सुरुज बाई खांडे जइसन कला साधक मन हा छत्तीसगढ़ अउ भारत के नाम ला दुनिया भर मा बगराइस हवय. रंगकर्मी हबीब तनवीर के माध्यम ले जिहां छत्तीसगढ़ के नाचा कलाकार लालू राम (बिसाहू साहू),भुलवा राम, मदन निषाद, गोविन्द राम निर्मलकर, फिदा बाई मरकाम, माला बाई मरकाम हा अपन अभिनय क्षमता के लोहा मनवाइस. ये नाचा के नामी कलाकार मन हा एक समय नाचा के सियान मंदराजी दाऊ के अगुवाई मा काम करे रिहिन ।मंदराजी दाऊ हा नाचा के पितृ पुरुष हरय. वो हा एक अइसन तपस्वी कलाकार रिहिस जउन हा नाचा के खातिर अपन संपत्ति ला सरबस दांव मा लगा दिस ।

नाचा के अइसन महान कलाकार मंदराजी के जनम संस्कारधानी शहर राजनांदगांव ले 5 किलोमीटर दूरिहा रवेली गांव मा 1 अप्रैल 1910 के एक माल गुजार परिवार मा होय रिहिन ।मंदरा जी के पूरा नांव दुलार सिंह साव रिहिस । 1922 मा ओकर प्राथमिक शिक्षा हा पूरा होइस।दुलार सिंह के मन पढ़ई लिखई मा नई लगत रिहिस । ओकर धियान नाचा पेखा डहर जादा राहय । रवेली अउ आस पास गांव मा जब नाचा होवय तब बालक दुलार सिंह हा रात रात भर जाग के नाचा देखय ।एकर ले

ओकर मन मा घलो चिकारा, तबला बजाय के धुन सवार होगे. वो समय रवेली गांव मा थोरकिन लोक कला के जानकार कलाकार रिहिस । ऊंकर मन ले मंदराजी हा

चिकारा, तबला बजाय के संग गाना गाय ला घलो सीख गे । अब मंदरा जी हा ये काम मा पूरा रमगे ।वो समय नाचा के कोई बढ़िया से संगठित पार्टी नइ रिहिस । नाचा के प्रस्तुति मा घलो मनोरंजन के नाम मा द्विअर्थी संवाद बोले जाय ।येकर ले बालक दुलार के मन ला गजब ठेस पहुंचे ।वोहा अपन गांव के लोक कलाकार मन ला लेके 1928-29 मा रवेली नाचा पार्टी के गठन करिस ।ये दल हा छत्तीसगढ़ मा नाचा के पहिली संगठित दल रिहिस ।वो समय खड़े साज चलय । कलाकार मन अपन साज बाज ला कनिहा मा बांधके अउ नरी मा लटका के नाचा ला करय ।

मंदराजी के नाचा डहर नशा ला देखके वोकर पिता जी हा अब्बड़ डांट फटकार करय ।अउ चिन्ता करे लगगे कि दुलार हा अइसने करत रहि ता ओकर जिनगी के गाड़ी कइसे चल पाही । अउ एकर सेती ओकर बिहाव 14 बरस के उमर मा दुर्ग जिले के भोथली गांव (तिरगा) के राम्हिन बाई के साथ कर दिस ।बिहाव होय के बाद घलो नाचा के प्रति ओकर रुचि मा कोनो कमी नइ आइस ।शुरु मा ओकर गोसइन हा घलो एकर विरोध करिन कि सिरिफ नाचा ले जिनगी कइसे चलहि पर बाद मा

वोकर साधना मा बाधा पड़ना ठीक नइ समझिस ।अब वोकर गोसइन हा घलो वोकर काम मा सहयोग करे लगिन अउ उंकर घर अवइया कलाकार मन के खाना बेवस्था मा सहयोग करे लगिन ।

सन् 1932 के बात हरय ।वो समय नाचा के गम्मत कलाकार

सुकलू ठाकुर (लोहारा -भर्रीटोला) अउ नोहर दास मानिकपुरी (अछोली, खेरथा) रिहिस ।कन्हारपुरी के माल गुजार हा सुकलू ठाकुर अउ नोहर मानिकपुरी के कार्यक्रम अपन गांव मा रखिस ।ये कार्यक्रम मा मंदरा जी दाऊ जी हा चिकारा बजाइस ।ये कार्यक्रम ले खुश होके दाऊ जी हा सुकलू

अउ नोहर मानिकपुरी ला शामिल करके रवेली नाचा पार्टी के ऐतिहासिक गठन करिन ।अब खड़े साज के जगह सबो वादक कलाकार बइठ के बाजा बजाय लागिस ।

सन् 1933-34 मा मंदराजी दाऊ अपन मौसा टीकमनाथ साव ( लोक संगीतकार स्व. खुमाम साव के पिताजी )अउ अपन मामा नीलकंठ साहू के संग हारमोनियम खरीदे बर कलकत्ता गिस ।ये समय वोमन 8 दिन टाटानगर मा घलो रुके रिहिस ।इही 8 दिन मा ये तीनों टाटानगर के एक हारमोनियम वादक ले हारमोनियम बजाय ला सिखिस ।बाद मा अपन मिहनत ले दाऊजी हा हारमोनियम बजाय मा बने पारंगत होगे । अब नाचा मा चिकारा के जगह हारमोनियम बजे ला लगिस ।सन् 1939-40 तक रवेली नाचा दल हमर छत्तीसगढ़ के सबले प्रसिद्ध दल बन गे रिहिस ।

सन् 1941-42 तक कुरुद (राजिम) मा एक बढ़िया नाचा दल गठित होगे रिहिस ।ये मंडली मा बिसाहू राम (लालू राम) साहू जइसे गजब के परी नर्तक रिहिस । 1943-44 मा लालू राम साहू हा कुरुद पार्टी ला छोड़के रवेली नाचा पार्टी मा शामिल होगे ।इही साल हारमोनियम वादक अउ लोक संगीतकार खुमान साव जी 14 बरस के उमर मा मंदराजी दाऊ के नाचा दल ले जुड़गे ।खुमान जी हा वोकर मौसी के बेटा रिहिस ।इही साल गजब के गम्तिहा कलाकार मदन निषाद (गुंगेरी नवागांव) पुसूराम यादव अउ जगन्नाथ निर्मलकर मन घलो दाऊजी के दल मा आगे ।अब ये प्रकार ले अब रवेली नाचा दल हा लालू राम साहू, मदन लाल निषाद, खुमान लाल साव, नोहर दास मानिकपुरी, पंचराम देवदास, जगन्नाथ निर्मलकर, गोविन्द निर्मलकर, रुप राम साहू, गुलाब चन्द जैन, श्रीमती फिदा मरकाम, श्रीमती माला मरकाम जइसे नाचा के बड़का कलाकार मन ले सजगे ।

नाचा के माध्यम ले दाऊ मंदराजी हा समाज मा फइले बुराई छुआछूत, बाल बिहाव के विरुद्ध लड़ाई लड़िस अउ लोगन मन ला जागरुक करे के काम करिस ।नाचा प्रदर्शन के समय कलाकार मन हा जोश मा आके अंग्रेज सरकार के विरोध मा संवाद घलो बोलके देश प्रेम के परिचय देवय ।अइसने आमदी (दुर्ग) मा मंदराजी के नाचा कार्यक्रम ला रोके बर अंग्रेज सरकार के पुलिस पहुंच गे रिहिस । वोहर मेहतरीन, पोंगा पंडित गम्मत के माध्यम ले छुअाछूत दूर करे के उदिम, ईरानी गम्मत मा हिन्दू मुसलमान मा एकता स्थापित करे के प्रयास, बुढ़वा बिहाव के माध्यम ले बाल बिहाव अउ बेमेल बिहाव ला रोकना, अउ मरानिन गम्मत के माध्यम ले देवर अउ भौजी के पवित्र रिश्ता के रुप मा सामने लाके समाज मा जन जागृति फैलाय के काम करिन ।

1940 से 1952 तक तक रवेली नाचा दल के भारी धूम राहय ।


सन् 1952 मा फरवरी मा मंड़ई के अवसर मा पिनकापार (बालोद )वाले दाऊ रामचंद्र देशमुख हा रवेली अउ रिंगनी नाचा दल के प्रमुख कलाकार मन ला नाचा कार्यक्रम बर नेवता दिस । पर ये दूनो दल के संचालक नइ बुलाय गिस। अइसने 1953 मा घलो होइस ।ये सब परिस्थिति मा रवेली अउ रिंगनी (भिलाई) हा एके म सामिल (विलय) होगे ।एकर संचालक लालू राम साहू बनिस ।मंदराजी दाऊ येमा सिरिफ वादक कलाकार के रुप मा शामिल करे गिस । अउ इन्चे ले रवेली अउ रिंगनी दल के किस्मत खराब होय लगिस ।रवेली अउ रिंगनी के सब बने बने कलाकार दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा संचालित छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल म सामिल होगे ।पर कुछ बछर बाद  छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल के कार्यक्रम सप्रे स्कूल रायपुर म होवत रिहिस।ये कार्यक्रम हा गजब सफल होइस ।ये कार्यक्रम ला देखे बर प्रसिद्ध रंगककर्मी हबीब तनवीर हा आय रिहिन ।वोहर उदिम करके रिंगनी रवेली के कलाकार लालू राम साहू, मदन लाल निषाद, ठाकुर राम, बापू दास, भुलऊ राम, शिवदयाल मन ला नया थियेटर दिल्ली म सामिल कर लिस ।ये कलाकार मन हा दुनिया भर मा अपन अभिनय ले नाम घलो कमाइस अउ छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य नाचा के सोर बगराइस । पर इंकर मन के जमगरहा नेंव रवेली अउ रिंगनी दल मा बने रिहिस ।

एती मंदरा जी दाऊ के घर भाई -बंटवारा होगे ।वोहर अब्बड़ संपन्न रिहिस ।वोहर अपन संपत्ति ला नाचा अउ नाचा के कलाकार मन के आव भगत म सिरा दिस ।दाऊ जी हा अपन कलाकारी के सउक ला पूरा करे के संग छोटे -छोटे नाचा पार्टी मा जाय के शुरु कर दिस । धन दउलत कम होय के बाद संगी साथी मन घलो छूटत गिस । वोकर दूसर गांव बागनदी के जमींदारी हा घलो छिनागे ।स्वाभिमानी मंदरा जी कोनो ले कुछ नइ काहय ।


मंदराजी दाऊ ला नाचा मा वोकर अमूल्य योगदान खातिर जीवन के आखिरी समय म भिलाई स्पात संयंत्र के सामुदायिक विकास विभाग द्वारा मई 1984 मा सम्मानित करिस । अंदर ले टूट चुके दाऊ जी सम्मान पाके भाव विभोर होगे ।

सम्मानित होय के बाद सितंबर 1984 मा अपन दूसर गांव बागनदी के नवाटोला म पंडवानी कार्यक्रम मा गिस । इहां वोकर तबियत खराब होगे ।वोला रवेली लाय गिस । 24 सितंबर 1984 मा नाचा के ये पुजारी हा अपन नश्वर शरीर ला छोड़के सरग चल दिस ।

स्व. मंदरा जी दाऊ हा एक गीत गावय – ”


दौलत तो कमाती है दुनिया पर नाम कमाना मुश्किल है “.दाऊ जी हा अपन दउलत गंवा के नांव कमाइस ।

मंदराजी के जन्म दिवस 1 अप्रैल के दिन हर बछर 1993 से लगातार मंदरा जी महोत्सव आयोजित करे जाथे ।1992 मा ये कार्यक्रम हा कन्हारपुरी मा होय रिहिस । कन्हारपुरी म घलो  मंदरा जी के जयंती म दिनमान लोक कलाकार अउ साहित्यकार मन सकला  के उंकर योगदान याद करके श्रद्धा के फूल अर्पित करथे।जन्मभूमि रवेली के संगे- संग कन्हारपुरी मा घलो मंदराजी दाऊ के मूर्ति स्थापित करे गेहे ।वोकर सम्मान मा छत्तीसगढ़ शासन द्वारा लोक कला के क्षेत्र मा उल्लेखीन काम करइया लोक कलाकार ला हर साल राज्योत्सव मा मंदराजी सम्मान ले सम्मानित करे जाथे ।नाचा के अइसन महान कलाकार ल शत्- शत् हे। विनम्र श्रद्धांजलि।


           ओमप्रकाश साहू अंकुर

        सुरगी, राजनांदगांव

अप्रैल फूल के तिहार"

 "अप्रैल फूल के तिहार"


हमर देस मा तिहार मनाये के गजब सऊँख। सब्बो किसिम के तिहार ला हमन जुरमिल के मनाथन। तमाम जातपात, धरम-सम्प्रदाय के तिहार मन ला एकजुट होके मनाये के कारण सांप्रदायिक सदभाव अउ एकता के नाम मा हमर दुनिया मा अलगेच पहिचान हे। तिहार मनाये बिना हमर बासी-भात तको हजम नइहोवय। तिहार मनाये के सऊँख मा हमन प्रगतिशील होगेन। बिदेस के तिहारो ला नइ छोड़न। भूमंडलीकरण के जमाना मा नवा पीढ़ी हर "वेलेन्टाइन-तिहार" मनाये बर पगलागे। "वेलेन्टाइन-तिहार",  मया करइया जोड़ा के बिदेसी तिहार आय। एमा पुलिस संग "रेस-टीप" खेल के अपन मया ला जग-जाहिर करे के पवित्र भावना कूट कूट के भरे रहिथे। कभू कभू तो कुटकुट ले मार घला खाना परथे तिही पाय के ये तिहार मा बरा, सोंहारी, ठेठरी, खुरमी बनाय-खाय के परम्परा नइ रहय। रद्दा साफ मिलगे तो कोन्हों-कोन्हों  मन अपन जोड़ी-संगवारी ला चीन-देस के आनीबानी के नुन्छुर्रा चिजबस के भोग लगाथें। ये भोग दीखे मा गेंगरवा साहीं दिखथे। पताल के लाल-लाल झोर डार के येखर रंग ला घला लाल कर डारथें। कोन्हों-कोन्हों भोग अंगाकर रोटी साहीं घला दिखथे फेर अंगाकर जैसे वोमा दम नइ रहाय। एला पीज्जा कहिथें फेर खाथें।"वेलेन्टाइन-तिहार" हमर देस मा नवा-नवा आये हे।


जुन्ना बिदेसी तिहार मा "अप्रैल फूल के तिहार" हमर देस मा अप्रैल महिना के पहली तारीख के मनाये जाथे।" अप्रैल फूल के तिहार" के माई-भुइयाँके बारे में कोन्हों बिद्वान मन इंगलैंड बताथे तो कोन्हों मन फ़्रांस देस बताथे। हमला येखर माई-भुइयाँ से का लेने देना? बिदेसी तिहार हे, त सगा बरोबर मन सम्मान तो मिलबे करही। ये तिहार मा लोगन मन ला बुद्धू बनाये जाथे। पहिली के जमाना मा मोबाइल-टेलीफोन नई रहिस तब बैरंग लिफाफा मा कोरा कागद भेज के बुद्धू बनाना, झुठ्हा समाचार दे के हलकान करना, जीयत मनखे के मरे के झुठ्हा खबर दे के परेशान करना, नौकरी लगे के झुठ्हा खबर देना, अइसन कई प्रकार के हरकत करके तिहार के मजा लूटे जात रहिस। यहू तिहार मा पकवान बनाय-खाय के रिवाज नई हे। जुन्ना बिदेसी तिहार होये के कारण अप्रैल फूल के महक साल भर बगरे रहिथे। चपरासी मन बाबू ला, बाबू मन साहेब ला, साहेब मन बड़े साहेब ला, बड़े साहेब मन, अउ बड़े साहेब ला बुद्धू बनावत हें। एखर महक के बिना न भाषण लिखे जा सकथे, न पढ़े जा सकथे। कश्मीर ले कन्याकुमारी तक, अटक ले कटक तक अप्रैल फूल के महमही महसूस करे जा सकथे। बुरा लगे के बाद भी बुरा नई मानना, मामूली बात नोहय। "बुद्धू बनात हे" जान के भी चुप्पेचाप रहिना सहनशीलता के निशानी आय। अप्रैल फूल के तिहार अपन दुःख पाके दूसर ला सुख देना के संदेस देथे कि अपन सुख बर दूसर ला दुःख देना के समर्थन करथे, ये भेद अभीन ले सुलझे नइ हे। खैर, तिहार ला तिहार के नजर मा देखना चाही तब्भे मजा आही।


मजा लूटना, जिनगी मा आनंद लाना तिहार के खास लच्छन होथे। चार दिन के जिनगी मा कतिक टेंसन पालबो। इही सोच के हम हर दिन तिहार मनाये के बहाना खोजत रहिथन। १ अरब ४० करोड़ मनखे ला कोन खुशी दे सकथे? मनखे ल अपन खुशी के रद्दा ला खुद निकालना पड़थे। मँय घर मा खुसरे खुसरे अपन जुन्ना बियंग ला नवा पैकिंग मा परोस के तिहार मनाए के रद्दा निकाल डारे हँव, आपो मन कुछु बहाना सोचव।


*अरुण कुमार निगम*

मन के मिलौना

 मन के मिलौना


    गांव मा सूरुज नरायण के घाम हा अइसे उतरिस जइसे अंगना मा कोनो चुपचाप मेहमान आके बइठगे हवय। खेत के मेड़ पार मा हरियर हरियर कांदी हा चमकत रिहिस अउ बखरी मा कुम्हड़ा के नार हा लहरावत रिहिस।

कंठी ठेठवार हा अंगना के ओसरी मा बइठके दूरिहा ले देखत रिहिस। ओखर आंखी मा कुछु खोजे के भाव रिहिस। दाई कहिथे -  “मनखे के मन जेन दिन भर जुगत करत रहिथे  ओ दिन ओखर चैन हर उड़ जाथे।”

कंठी ठेठवार के मन घलो अइसने जुगत करत रिहिस।

ओ दिन गांव मा हाट बाजार रिहिस। लोगन सब हाट बाजार जावत रिहिन। कोनो महुआ बेचत रिहिस, कोनो कोदो-कुटकी, कोनो लकड़ी। कंठी ठेठवार के मन हाट बाजार जाय बर नई होवत रिहिस।

ओखर दाई पूछिस -

“का होगे रे? हाट बाजार नई जाबे का?”

कंठी ठेठवार धिरलगहा  किहिस  -

“जाहूं तो दाई, फेर मन नई लागत हे।”

दाई हांसे लगिस -

“अरे, मन ला लगाय ला परथे। मन घोड़ा नइहे, जिहां चाही उहां भाग जाही।”

कंठी ठेठवार चुप होगे।

असल मा ओखर मन मा कुछु अउ बात चलत रिहिस।

गांव मा फुलबसिया नाव के एक नोनी रिहिस। बचपन ले कंठी ठेठवार के संग खेले-कूदे रिहिस। फेर अब दुनो बड़े होगे रिहिन। अब गांव के बोली-बानी बदलगे रिहिस।

लोगन कहिथे -

“लइका जब जवान हो जाथे, त गांव के नजर घलो बदल जाथे।”

कंठी ठेठवार के मन म फुलबसिया बर अजीब कस अपनापन रिहिस। फेर वो अपन मन के बात कहे के हिम्मत नइ जुटा पावत रिहिस।

 गांव के जिनगी अइसने होथे जइसे धीरे-धीरे बोहावत नदी। ऊपर ले सब शांत दिखथे, फेर भीतर बहुते कुछ चलत रहिथे।

कंठी ठेठवार के संग घलो अइसनेच होवत रिहिस।

एक दिन ओहर खेत जावत रिहिस। रद्दा मा फुलबसिया मिल गे।

फुलबसिया मुस्कुरा के किहिस -

“कइसे हस कंठी, आजकल बड़ चुप-चुप रहिथस?”

कंठी ठेठवार हंसी रोकत किहिस -

“कुछु नई, काम जादा हे।”

फुलबसिया किहिस -

“काम जादा नई, मन मा बात जादा हे।”

कंठी ठेठवार चौंकगे।

“का ?”

फुलबसिया धिरलगहा हांसिस -

“गांव मा सब देखत हें। जेन बात ला लुकाय जाथे, ओ बात सबले पहिली दिख जाथे।”

कंठी ठेठवार के गला सूखगे।

ओ दिन ले कंठी ठेठवार के मन अउ जादा उलझगे।

रात मा वो खटिया मा सुते रिहिस। चंदा ऊपर चमकत रिहिस। हवा मा महुआ के गंध रिहिस।

वो सोचत रिहिस -

“का सच मा फुलबसिया समझत हे ?”

दाई के बात याद आइस -

“मनखे के मन हा मछरी जइसन होथे, पानी बिना टिके नई।”

कंठी ठेठवार सोचिस -

“मोर मन के पानी फुलबसिया हे का ?”

 दूसर हफ्ता हाट बाजार के दिन रिहिस।

गांव के सब लोग जावत रिहिन। कंठी ठेठवार घलो चल दिस।

हाट बाजार मा भीड़ रिहिस। कोनो गाना गावत रिहिस, कोनो बांसुरी बजावत रिहिस।

कंठी उदुपहा देखिस -

फुलबसिया महुआ बेचत बइठे रिहिस।

ओहर धीरे बांधे तीर मा  पहुंचिस।

फुलबसिया किहिस -

“का लेबे?”

कंठी हांसे लगिस -

“महुआ।”

फुलबसिया किहिस -

“महुआ लेबे त दाम देबे, मुस्कान लेबे त का देबे?”

कंठी चुप होगे।

 गांव मा बात बिजली जइसन बगरगे।

दू दिन बाद लोगन कहे लगिन -

“ कंठी अउ फुलबसिया के बात जादा होवत हे।”

एक झन सियान बबा घलो किहिस -

“जिहां धुंआ उठथे, उहां आग घलो होथे।”

कंठी के दाई सुनिस।

ओ रात वो कंठी ला बुलाइस -

“सच-सच बता, का बात हे?”

कंठी चुप।

दाई किहिस -

“मनखे के मन ला जियादा देर दबाके रखबे, त ओ फूट जाही।”

कंठी धिरलगहा किहिस -

“दाई… मोर मन फुलबसिया मा लाग गे हे।”

दाई मुस्कुराइस -

“बस इही बात?”

 कुछ दिन बाद दाई खुद फुलबसिया के घर चल दिस।

गांव के रीति मा अइसनेच होथे।

फुलबसिया के दाई किहिस -

“अगर दुनो के मन राजी हे, त हमन ला का दिक्कत?”

गांव मा धीरे-धीरे बात तय होगे।

कंठी जब सुनिस, ओखर मन हल्का होगे।

वो सोचिस -

“जेन बात बर मन बरिस भर ले भटकत रिहिस, ओ बात आज ठिकाना पागे।

बिहाव के दिन गांव मा मड़ई लगिस। दफड़ा - डमऊ , मोहरी बाजिस। लोगन नाचे लगिन।

कंठी अउ फुलबसिया एक-दूसर ला देखके मुस्कुराइन।

दाई धिरलगहा किहिस -

“देखव, मन के मिलौना सबसे बड़े मेला होथे।”

कंठी समझ गे -

सच मा मन जब अपन जगह पा जाथे, त जिनगी के सब उलझन अपने-आप सुलझ जाथे।

          - डुमन लाल ध्रुव 

    मुजगहन, धमतरी ( छ.ग.)

        पिन - 493773

पानी के पीरा - डुमन लाल

 पानी के पीरा

                   - डुमन लाल ध्रुव 

हप्ता दिन पहिली घर के भीतरी कोठरी मा एक अजीब हलचल चलत रिहिस।

दाई अपन पुराना संदूक खोले बइठे रिहिन अऊ मोटरी उपर मोटरी बांधत रिहिन। कभु एकठन मोटरी ला खोले त कभू दू ठन मा सामान धरे। कोन मोटरी मा पूजा के फूल, धूप अऊ अगरबत्ती, कोन मा रद्दा भर  भूंजे - चना, गुड़ अऊ टिकिया, त कोन मा कपड़ा-लत्ता। हर जिनिस ला वो अइसने सहेज-सहेज के धरत रिहिन जइसे कोनो बहुमूल्य धरोहर होवय।

 जमुना हा ओ कोठरी के दुवार मा खड़े-खड़े सब देखत रिहिस।

दाई के हाथ कांपत रिहिस, फेर आंखी मा एक अजीब चमक झलकत रिहिस।

ओ चमक मा बरिस भर ले दबे एक अधूरा सपना के उजाला रिहिस।

उदुपहाइ दाई हा एक ठन छोटे मोटरी ला धिरलगहा खोलिन।

ओ मोटरी मा एक ठन नीला पगड़ी रिहिस।

दाई ओला हाथ मा धरके कुछ देर तक निहारत रिहिन।

ओ पगड़ी सिरिफ कपड़ा नइ रहिस; ओमा सियान बबा के सुरता, ओखर संग बिताय जिनगी अऊ एक पूरा समय बंधे रिहिस।

थोरिक देर बाद दाई चुपचाप पगड़ी ला फेर बांध के मोटरी मा धर दीन।

जइसे कोनो स्मृति ला फिर से मन के भीतर सहेज लेवय।

गरमी के छुट्टी मा जमुना गांव आय रिहिस।

रइपुर के एक हाईस्कूल मा वो शिक्षिका रिहिस। पढ़े-लिखे, समझदार अऊ आधुनिक सोच वाली लड़की।

घर पहुंचते ही ओखर मइया धीरे से कही दिस -

“देख बेटी, डोकरी के बात मा जादा धियान मत देबे।

अब उमर होगे हे ओखर। कहिथे के कोनो मोला राजिम संगम नहाय बर ले चल दे, त मोर आत्मा ला चैन मिल जाही।”

जमुना कुछू नइ किहिस।

मइया फेर कहिस -

“इतना पढ़-लिख गे हस, मास्टरनी बन गे हस, फेर अब अइसन बात मा यकीन करथस? नदी मा नहाय ले कोनो पाप धुलथे ?”

जमुना चुपचाप मइया के मुंह देखत रिहिस।

ओखर मन मा धीरे-धीरे एक प्रश्न उठिस -

का बूढ़ा होय  के बाद मनखे के इच्छा के कोनो कीमत नइ रहे ?

उही दाई तो रिहिन जेन रतन के जनम पर पूरा गांव भर लड्डू बांटे रिहिन।

उही दाई तो रिहिन जेन ददा के बीमारी के बखत चार दिन तक खुद भूखे रहिके पूजा-पाठ करत रिहिन।

आज वही दाई…

घर मा “डोकरी” कहे जाथे।

जमुना के मन मा एक कसक उठिस।

सांझा  जब रतन खेत ले लहुटिस अऊ ददा हा ट्रैक्टर ला गैरेज मा रखके घर आइन, तब जमुना धीर से अपन निरनय ला बता दिस -

“दाई ला मंय राजिम संगम नहाय बर ले जावंव।”

घर मा कुछ देर बर सन्नाटा छा गे।

रतन उछाह मा किहिस -

“दीदी, मंय घलो संग चलहूं।”

जमुना मुस्कुरा के किहिस -

“तंय अभी छोटे हस।

अतेक लंबा सफर मा तोला संभालना मुश्किल हो जाही।”

रतन चुप होगे।

मइया के मुंह उतरगे।

रात मा धीर लगाके किहिस -

“पूरा महीना के तनखा लाइ खरचा कर देबे?

नदी मा नहाय ले कोन पाप धुलही ?”

जमुना खिड़की ले बाहिर अंधियार देखत रिहिस।

फेर धीर लगा के किहिस -

“मइया, पाप धुले या नइ धुले, ए बात अलग आय।

पर दाई के मन मा बरिस भर ले जऊन इच्छा दबे हे, ओला पूरा हो जाना चाही।”

दूसर दिन दूनो राजिम परयाग बर निकल गेन।

रात भर छुकछुकिया के आवाज अऊ झटका मा सफर कटिस।

दाई खिड़की ले बाहिर अंधियार मा भागत खेत-खार देखत रिहिन।

कभू-कभू अपन मोटरी छूवत रहय।

जइसे पगड़ी के भीतरी सियान बबा के उपस्थिति महसूस करत होही।

जमुना समझ जात रिहिस -

दाई के मन अभीच राजिम संगम पहुंच गे हे।

बिहनिया जब सूरुज नरायण के पहिली किरन नदी के पानी ऊपर चमकिस, तब घाट मा हजारों मनखे भीड़ लगाए खड़े रिहिन।

कोनो मंत्र पढ़त रिहिस,

कोनो फूल पतरा बोहावत रिहिस,

कोनो श्रद्धा ले डुबकी लगावत रिहिस।

दाई धीरे-धीरे पानी काठे आइन।

जमुना किहिस -

“दाई, ओ डहर चल। उहां भीड़ कम हे।”

दाई मुस्कुरा दिस।

ओ मुस्कान मा अजीब विश्वास रिहिस।

जइसे उहां सच मा सियान बबा के आत्मा कहीं पास मा होवय।

जइसे ही दाई पानी मा पांव धरिन, वो अचानक ठिठक गइन।

“ जमुना … कुछू टकराइस।”

जमुना पानी मा उतरिस।

पानी मा फूल, माला, पत्तल, दीया अऊ फूटहा मटकी तैरत रिहिन।

पानी रंगीन जरुर रिहिस,

पर साफ नइ।

जमुना अंदर हाथ डारिस।

अचानक ओखर हाथ कोनो नरम चीज ले टकराइस।

वोहर घबरा के चीख पड़िस।

हाथ मा नवजात शिशु के निरजीव देह रिहिस।

इतना छोट…

इतना शांत…

जइसे अभी-अभी नींद मा डूबे हवय।

जमुना के आंखी ले आंसू गिर पड़िस।

“दाई… लोगन अइसन काबर करथे ?”

दाई कुछ देर चुप रिहिन।

फेर भारी आवाज मा कहिन -

“जब मनखे अपन करम गति ले डर जाथे,

त नदी ला अपन पाप के बोझ ढोए के साधन बना लेथे।”

दूनो दूसर घाट मा चल दिस।

फेर उहां घलो विही हालत।

कचरा, कपड़ा, माला, दीपक।

उदुपहा एक ठन मुरदा देह पानी मा बोहात दिखिस।

नंगा अऊ असहाय।

जमुना घृणा ले नजर फेर लिहिस।

दाई हा कुछ देर ओ दृश्य ला देखत रिहिन।

फेर धीरे-धीरे अपन मोटरी ला खोलेन।

सियान बबा के नीला पगड़ी निकालिन।

अऊ बिना कुछ कहे ओ पगड़ी ला लाश ऊपर उछाल दीन।

अब ओ देह के कुछ हिस्सा ढका गे।

दाई के आंखी भींज गे।

मन ही मन किहिस -

“हे सियान बबा…

अगर तोर आत्मा कहीं हे,

त देख…

आज तोर पगड़ी एक अउ मनखे के लाज ढांकिस।”

जमुना धीर लगाके पूछिस -

“दाई… नदी मा नइ नहाबे का ?”

दाई नदी के पानी ला देर तक देखत रिहिन।

फेर किहिन -

“नइ बेटी …

ये अब वो राजिम परयाग नइ रिहिगे जेन मा श्रद्धा उतर सके।

अब येमा मनखे के लापरवाही बहत हे।”

दूनो झन धरमशाला मा गिन।

नल के पानी ले नहा के अऊ मंदिर दर्शन कर वापस लहुट गिन।

गांव पहुंचते ददा पूछिन -

“अम्मा, राजिम संगम ले नहा के आगेव ?”

दाई हल्का मुस्कुरा दिस।

“हां… होगे।”

फेर कुछ देर बाद धीर लगा के किहिन -

“देख बेटा, जब मंय मर जावंव,

त मोर अस्थी राजिम मा मत डालिहा।”

सब चौंक गिन।

दाई किहिन -

“ राजिम दाई हा पहिलीच ले बहुत दुख सहत हे।

मोर गंदा शरीर ले ओला अउ मत सताव।”

ओ दिन ले दाई अऊ जमुना रोज गांव के गल्ली मुहल्ला साफ करे लगिन।

नदिया खंड़ मा कचरा उठाथे।

लोगन कभू हांस देथे, कभू अनदेखा कर देथे।

पर दाई के आंखी मा अब अजीब शांति रहिथे।

जमुना कई बार सोचथे -

राजिम संगम मा स्नान जरुरी नइ रिहिस।

जरुरी रिहिस -

राजिम के पीरा ला समझना।

काबर के 

नदी के गंदगी सिरिफ पानी मा नइ बोहात हे,

ओ तो मनखे के सोच मा बोहात हे।

           - डुमन लाल ध्रुव 

      मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

          पिन - 493773

प्रतिभा संपन्न समीक्षक अउ कवि रिहिस यशवंत मेश्राम ह

 प्रतिभा संपन्न समीक्षक अउ कवि रिहिस यशवंत मेश्राम ह 


हिंदी काव्य संग्रह "खो गया मिल गया" के  रचनाकार,प्रतिभा संपन्न समीक्षक अउ आलोचक , साकेत साहित्य परिषद सुरगी,राजनांदगांव के वरिष्ठ सदस्य रहे श्रद्धेय यशवंत मेश्राम जी ल उंकर पांचवीं पुण्य तिथि म शत् शत् नमन हे।


यशवंत मेश्राम के जनम 21 नवंबर 1960 म होय रिहिस। शंकरपुर , वोहा मानपुर -मोहला- अंबागढ़ चौकी के गोटाटोला म व्याख्याता रिहिस।


       श्रद्धेय यशवंत मेश्राम अब्बड़ किताब पढ़य। राष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक पत्रिका नियमित मंगवाय।  बुक डिपो अउ रेल्वे स्टेशन राजनांदगांव के बुक स्टॉल म जाके नवा -नवा किताब ल बिसाय।

   हमर साकेत साहित्य परिषद सुरगी के मासिक कवि गोष्ठी अउ परिचर्चा के समाचार ल अखबार मन म पढ़ के 

वोहा मासिक गोष्ठी म आय के चालू करिस अउ परिषद म शामिल होय के निवेदन करिस।तीन- चार गोष्ठी म आय के बाद मेश्राम जी ल सदस्यता प्रदान करे गिस।  

    श्रद्धेय मेश्राम जी ह साकेत साहित्य परिषद सुरगी के मासिक काव्य गोष्ठी अउ परिचर्चा के संगे संग वार्षिक सम्मान समारोह म सक्रियता ले भाग लेवय। उंकर समीक्षा, आलोचना,कविता लेख साकेत साहित्य परिषद सुरगी, राजनांदगांव द्वारा प्रकाशित "साकेत स्मारिका" म प्रकाशित होवत गिस। राष्ट्रीय स्तर के पत्र पत्रिका म उंकर समीक्षा प्रकाशित होवय अउ अब्बड़ सराहे गिस।

    राजनांदगांव म श्रद्धेय नरेश कुमार वर्मा, कुबेर सिंह साहू, सुरेश सर्वेद अउ आने साहित्यकार मन संग भेंट करके सरलग साहित्यक चर्चा करे म रमे राहय।

  साकेत साहित्य परिषद सुरगी अउ आने संस्था द्वारा आयोजित मासिक परिचर्चा अउ वार्षिक समारोह म एक वक्ता के रूप म वोहा खूब सराहे गिस। मेश्राम जी ह वीरेन्द्र कुमार तिवारी वीरू जी अउ श्रद्धेय नंद कुमार साहू साकेत के" तीजा -पोरा"कविता के तुलनात्मक समीक्षा करिस जउन ह प्रकाशित घलो होइस।


    श्रद्धेय मेश्राम जी ह अपन निवास स्थान शंकरपुर, राजनांदगांव म साकेत साहित्य परिषद सुरगी, राजनांदगांव के दू - तीन बेर मासिक गोष्ठी अउ परिचर्चा के मेजबानी करिस। जेमा एक बार महान कहानीकार अउ उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के रचना संसार उपर चर्चा करे गिस जेमा सुप्रसिद्ध समीक्षक प्रो. थान सिंह वर्मा जी माई पहुना के रूप म आमंत्रित रिहिस।

  मेश्राम जी के एक निश्चित विचार धारा रिहिस। वोहा अंबेडकरवादी विचार धारा ल जादा महत्व देय।आपसी चर्चा -परिचर्चा के दौरान उंकर विचार धारा ह अउ लेखन म स्पष्ट झलकय। वोहा मनुवादी विचार धारा के विरोधी राहय एकरे सेति वोहा पशु पक्षी मन के नांव ल घलो जाति आधारित रखे के विरोध करिस। "बाम्हन चिरई" ल लेके वोहा कुबेर सिंह साहू ले अब्बड़ तर्क -वितर्क करिस अउ कुबेर जी के तर्क वितर्क ले वोहा सहमत नि हो पाइस।

      साहित्य के क्षेत्र म अपन माता पिता ल प्रेरणा माने के संगे- संग वोहा साकेत साहित्य परिषद सुरगी के पूर्व अध्यक्ष भाई लखन लाल साहू लहर के कविता शैली ले विशेष प्रभावित रिहिस। कविता लिखे के प्रेरणा वोहा लहर जी ल मानिस हे। मेश्राम जी ह "खो गया मिल गया"कविता संग्रह म येकर उल्लेख करे हावय। साकेत साहित्य परिषद सुरगी के संरक्षक अउ वरिष्ठ साहित्यकार कुबेर सिंह साहू संग उंकर जोड़ी खूब जमिस। वोहा कुबेर जी संग सरलग साहित्य चर्चा करय। साहित्य चर्चा बर एक दूसरा के घर आना जाना होय। सुरेश सर्वेद के प्रेस ठउर अउ मानव मंदिर राजनांदगांव म चाय के चुसकी के संग जय स्तंभ चौक म एमन घंटों साहित्यक चर्चा करय। महू ह कुछ बेरा ये चर्चा -परिचर्चा के साक्षी रेहे हंव।

    साकेत साहित्य परिषद सुरगी ह मेश्राम जी के साहित्य म योगदान खातिर साकेत साहित्य सम्मान ले सम्मानित करिस। मेश्राम जी ह कोनो भी समीक्षा, आलोचना,लेख,कविता लिखय त कुबेर सर जी कर छोंड़य। सर जी ह येला अपना कंप्यूटर म टाइपिंग करके संरक्षित कर लेवय। 

     कुबेर सर जी अउ यशवंत मेश्राम के सुपुत्र श्री अविना शंकर मेश्राम के उदिम ले मेश्राम जी के दू किताब मानसी पब्लिकेशन्स दिल्ली ले प्रकाशित होय हे। किताब के नाव हावय - कुबेर की रचनाओं में समकालीनता और समकालीन समीक्षा दृष्टि ( आलोचना), एवं आलोचना का मापदंड: हत्या ( आलोचना)। ये दूनों किताब अउ कुबेर सर जी के किताब के विमोचन कार्यक्रम 1 अप्रैल के प्रेस क्लब राजनांदगांव म साकेत साहित्य परिषद सुरगी डहन ले रखे गिस। कार्यक्रम म उपस्थित वरिष्ठ साहित्यकार डा. जयप्रकाश साव, दादू लाल जोशी, विनोद साव, संजीव तिवारी, कुबेर सिंह साहू ह जिहां यशवंत मेश्राम जी के भाषा अउ शैली पर प्रकाश डालिस त दूसर कोति उंकर व्यक्तित्व ऊपर चर्चा करिस। कुबेर जी कहिथे कि -" मुक्तिबोध, विनोद कुमार शुक्ल जइसे मेश्राम के घलो अलग भाषा - शैली हे।"

      5 अप्रैल 2021 म कोरोना के चलते उंकर देहावसान होगे। श्रद्धेय मेश्राम ल शत् -शत् नमन हे। 


            ओमप्रकाश साहू 'अंकुर "

         सुरगी, राजनांदगांव।

चार पर्यटन स्थल एक दिन म-4( यात्रा संस्मरण) -----------------------

 चार पर्यटन स्थल एक दिन म-4( यात्रा संस्मरण)

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एक ही दिन म चार जगह महादेव अउ देवी माँ के दर्शन के कल्पना नइ करे जा सकय  फेर हमन करेन।


बहुत दिन ले सोचत रहेंव के घटा रानी और जतमाई  जा सकतेंव  त जातेंव।  घटारानी म पहाड़ी चढ़ना परथे अउ जतमाई म तीन चार सौ सीढ़ी उतरे बर परथे। ये  दूनों जगह झरना वाला आये।  कई जगह म पानी बोहावत रहिथे। बारीश के दिन म तो सीढ़ी उपर ले ऊपर के पत्थरा ले नीचे पानी बोहावत रहिथे। नवम्बर दिसम्बर तक इहाँ पानी बोहावत देख सकथन। जब मैं गे रहेंव त बहुत कम पानी दिखाई दिस।


25 मार्च के आशा गुप्ता  कहिस काली रविवार के पंचमी हे त कोनो जगह घूमे बर चलबो। मै हाँ कहि देंव फेर मोला  चिंता होगे काबर के  जिहाँ भी घूमे बर जाबो त वंउहाँ चले बर तो पड़ही, सीढ़ी चढ़ना उतरना नइ कर सकत रहेंव हंव।


कल 26 मार्च पँचमी के दिन फोन  करिस करीब सवा नौ बजे " भाभी आधा घंटे में तैयार हो जाना अपन कहीं बाहर चलते हैं। आप मिर्च खाते नहीं हैं तो होटल का नहीं खायेंगे इस कारण अपने लिये कुछ खाने का रख लेना।" मैं उही समय चाय रोटी  खाये रहेंव , मोर तो बिहनिया के इही नाश्ता राहय। जल्दी से आधा कटोरी चावल बनायेंव अउ चार रोटी बनायेंव। दूनो ल आचार अउ दूध के साथ पैक करके रख लेंव। सवा दस बज गे, ग्यारह बज गे जब साढ़े ग्यारह बजिस त मैं दूध भात अउ आचार  खा लेंव। बारह बज गे तब मैं आशा ल फोन करेंव त ओ ह  बोलिस "आप घर के बाहर आ जाओ हम लोग आ रहे हैं।"


मैं बाहर आ के खड़े हो गेंव उही बेरा म तुरंत आशा अउ ओखर पति दुर्गेश कार लेके आ गें। मैं बइठ गेंव फेर अंजू अग्रवाल के घर गेन । वहु तैयार रहिस हे। अब हम चार झन हो गेन। हमन दोस्त आन, हमर दोस्ती ल पैतीस साल हो गे हावय।


कार म बइठे के बाद पता चलिस के हमन  घटारानी जाथन। राजिम ल पार करके हमन आगे बढ़ेन। नदी म ये बछर बढ़िया पानी भरे रहिस हे। लक्ष्मण झूला बहुत सुंदर दिखत रहिस हे। हमन जइसे जइसे आगू बढ़त गेन त जंगल दिखे ले लग गे। ओखर गहनता घलो दिखे ले लगगे। हमन करीब ढाई बजे  घटारानी पहुँच गेन। उहाँ दू डाहर ले जाथें एक ऊपर डाहर ले जाके नीचे उतरथें अउ दूसर रद्दा आये जिहाँ  नीचे ले ऊपर डाहर  जाथें। हमन नीचे वाला रास्ता ले गेन।


कार ले उतरते ही सामने में भी पार्किंग रहिस हे। ओखर बाद दूनों डाहर दुकान रहिस हे।  सीढ़ी ले चढ़त -चढ़त  हमन  आगू बढ़त रहेन। दो तीन फीट चौड़ा सीढ़ी रहिस हे। मैं धीरे धीरे चलत रहेंव। सामने रास्ता में ही लोगन मन खाना खावत रहिन हें। भंडारा चलत रहिस हे। पुराने तरिका के चूल में लोहा के बरतन चढ़े रहिस हे। ओमा बड़े बड़े कुंदा लगे रहिस हे जेला पकड़ के उतारत चढ़ावत रहिन हें। दू बांस म टोकनी ल बांध के ओ बरतन के पानी म डुबावत रहिन हें। बरतन म पानी भरे रहिस हे। टोकनी म चावल डालत रहिन हें। छै फीट ले भी लम्बा बरतन म चार या पाँच टोकनी डुबे रहिस हे। सब म चावल बनत रहिस हे। चावल जब पक जाये त ओमा बंधे बांस ल पकड़ के   निकाल लेवत रहिन हें। गर्म गर्म खाना सब खावत रहिन हें। दाल भात अउ सब्जी रहिस हे।


ओखर आगे ही एक देवी के मंदिर रहिस हे। ओ मंदिर के सीढ़ी म मैं बइठ गेंव। ओखर सामने में ही दूसर डाहर शिवजी के मंदिर रहिस हें। मैं उहाँ जाके दर्शन करके आ गेंव अउ देवी के मंदिर के सीढ़ी उपर बइठ गेंव। बाकी तीनो झन पहाड़ी के ऊपर देवी मंदिर म देवी के दर्शन बर चल दिन। बहुत ही घुमावदार अउ खड़ा खड़ा सीढ़ी रहिस हे। मैं थक गे रहेंव अउ अतेक खड़ी ऊंचा सीढ  चढ़ना कठिन रहिस हे त नीचे में ही बइठे रहेंव। एक घंटे के बाद म सब झन दर्शन करके वापस आ गेन।  उंखर संग मैं कार तक आ गेंव। उहाँ अपन-अपन टिफिन खाना चाहत रहेंन फेर जतमाई म खाबो  कहिके जतमाई डाहर बढ़ गेन। लहुटत रहेन त मंदिर के तीर में ही एक बोर म सबमर्सिबल पम्प चलत रहिस हे त हमन सब झन उहाँ हाथ पैर धो के ताजा हो गेन अउ कार म आगे बइठ गेन, कार तेजी से बढ़ गे। 


बहुत ही घना जंगल रहिस हे। रद्दा ल देखके  केशकाल के घाटी के सुरता आगे। खड़ी चढ़ाई अउ खड़ा ढाल होये के कारण एक मोटर साइकिल वाला गाड़ी नइ चढ़ा सकिस अउ गिर गे। उही बेरा म तीन झन पैदल आवत रहिन हे तेने मन ओला उठाइन। हमन  इहाँ ले सात किलोमीटर दूरिहा जतमाई माता के दर्शन बर जावत रहेन। रद्दा म "दातरैंगा गाँव का डैम " घलो देखेन। जंगल के बीच म पानी के बहुत ही सुविधा रहिस हे। बिहनिया ले बदली रहिस हे, इहाँ ले निकलेन वइसने ही तेज हवा चले ले लग गे। अइसे लगत रहिस हे के बारीश होही। मोला लगत रहिस हे के मोर मन के खुशी ल इंद्र देव महसूस करत हावय अउ मोर से मिले बर आवत  हावय। पर मैं तो कार के अंदर म रहेंव।


इहाँ  " जतमाई सात किलोमीटर "के बोर्ड लगे रहिस हे इहाँ ले एरो ल देखत- देखत हमन साढ़े तीन बजे जतमाई पहुँच गेन। पूरा मंदिर रोड ले ही दिखत रहिस हे। लेफ्ट में मंदिर जाये के रद्दा रहिस हे अउ राइट डाहर बहुत अकन दुकान अउ होटल रहिस हे। हमन पहली एक होटल म बइठ गेन खाना खाये बर। हमन  सबो झन अपन- अपन घर ले रोटी सब्जी लेके आये रहेन। हमन उहाँ बइठ के खाना खायेन अउ उहाँ  टॉयलेट नवा बने रहिस हे ओखर घलो उपयोग करेन। खाना खाये के बाद चाय पीयेन। मैं राजगीर के लड्डू खरीदे रहेंव ओला ले के आये रहेंव, ओला खायेंव। अब हमन  रोड पार करके मंदिर जाये के रद्दा म आ गेन। इहाँ बड़े से गेट लगे रहिस हे। एक बरगद के पेड़ लगाये हावंय अउ ओखर चबुतरा बनाये हावंय जिहाँ लोगन बइठ सकथें। येखर बाद म जतमाई लिखे हावय अउ बड़े से गेट हावय। गेट के बाद नीचे उतरे बर सीढ़ी शुरु हो जाथे। बहुतेच्च जंगल असन पेड़ उगे हावय।हा हा हा जंगल ही है। आगू बढ़ते गेन रद्दा म एक शिव मंदिर रहिस हे, ओखर दूसर डाहर बड़े से कमरा अउ बरामदा रहिस हे। जिहाँ  ज्योत जलत रहिस हे। 'ऊ ' के आकार म कलश रहिस हे। दो ढाई हजार के करीब ज्योत जलत रहिस हे


फेर आगू बढ़ते गेन एक जगह म कुछ ज्यादा बड़े गढ्ढा रहिस हे उहां तीन मंदिर रहिस हे। उहाँ सामने म कुंड रहिस हे ओखर सामने ही तीन में से एक मंदिर ह जतमाई देवी के हावय। उहां माँ के  दर्शन करेन। माता जी के मूर्ती के तीर ले पानी बोहावत रहिस हे। जेन ह सीधा सामने के कुण्ड में जावत रहिस हे। इहाँ ये गुफा सरिख मंदिर के ऊपर म घलो देवी के मंदिर रहिस हे। मैं थक गे रहेंव त उहां नइ गेंव। इँहें ले दशर्न करके लहुटे ले लग गेंव। इहाँ ले नीचे के गहराई ह देखे के लायक रहिस हे। ये जगह ह कभू- कभू पचमढ़ी के सुरता देवावत रहिस हे। वापसी म मैं अकेल्ला ही सीढ़ी चढ़े ले लग गेंव। सबो झन एक के पाछू एक आवत रहेन। रद्दा म ज्योति कक्ष के दर्शन करेन। इहाँ दो हजार के करीब ज्योति जलत रहिस हे जेला "ऊ" के आकार म रखे रहिन हें।


हमन उहाँ ले फेर ऊपर चढ़ेन अउ पहिली वाले गेट के पास म बइठ गेन। इहाँ  फोटो खिचवायेन। साथ ही एक अजूबा देखेन-- बेल के पेड़ म नीबू के आकार के सैकड़ों बेल लगे रहिस हे। देखे म नीबू के धोखा होवत  रहिस हे। पत्ता ले पहचानेन के ये ह बेल आये।

इहाँ ले हमन सीधा रोड म आ गेन। कार के आवत ले हमन बरगद के चबूतरा म बइठ  के मजा घलो ले लेन। कार अइस अउ बदले मौसम के संग हमन  कार भितरी आ गेन। तेज ठंडा ठंडा हवा चलत रहिस हे त बने लगत  रहिस हे। अइसे लगत रहिस हे के इंद्र भगवान घलो आशिर्वाद देय बर पानी बरसा  दिही। कइ बछर ले देखे के ईच्छा रहिस हे अउ ये तरह ले अचानक चढ़ के देखे बर मिलही सोचे नइ रहेंव। देखे के सुख छुपत नइ रहिस हे। मन के लहरा ह इंद्र तक पहुँच गे लगत रहिस हे तभे बादल मंडरावत रहिस हे।


अचानक दुर्गेश गुप्ता जी ह ड्राइवर ल कहिस  के "कार गरियाबंद तरफ मोड़ लो। भूतेश्वर महादेव चलेंगें। "पाँच बज चुके रहिस हे। "रात हो जायेगी तो महादेव के दर्शन ठीक से नहीं हो पायेगा " अइसे ड्राइवर बोलत रहिस हे फेर दुर्गेश के मन बन गे रहिस हे के भूतेश्वर महादेव जाना है। मैं चुप बइठे रहेंव। आज के दिन कइसे हे? मन म तीसरा खुशी, एक ही दिन म तीन ईच्छा पूरा हो जाना अइसना तो जीवन म कभू नइ होय रहिस हे। दुर्गेश ह हिम्मत देके अउ हाथ पकड़ के मोला उतारिस चढ़इस।  मोर संतुलन बिगड़ जात रहिस हे त दू बेर गिरत रहेव त ओ ह मोला पकड़िस घलो। हर बेर अतेक शांति से काहय "इतना तो आप चढ़ लेंगें चलो" अउ मैं आगू बढ़ जांव।

29 किलोमीटर के दूरी म गरियाबंद रहिस हे। हमन  खाली रास्ता होये के कारण तेजी से भागत भागत छः बजे उहाँ पहुँच गेन।


रद्दा म गाँव पड़त गीस हमन बहुत जल्दी म रहेन त गाँव के नाम  तरफ ध्यान घलो नइ देन। हमन गरियाबंद पहुँच गेन। अब इहाँ ले आठ किलोमीटर दूरिहा म महादेव रहिस हे। हमर गाड़ी तेजी से भागत रहिस हे त अइसे लगिस के तुरंत पहुँच गेन।  कार ले उतरते ही बायें हाथ डाहर बड़े से महादेव दिखाई दिस। आठ दस झन दर्शन करे बर रहिन हे। कुछ दुकान बंद हो गलत रहिस हे। हमन सीधा महादेव तीर पहुँच गेन। फेर कार ले उतरते ही दाहिना डाहर नंदी जी रहिस हे। वहु ह बहुत बड़े से पत्थर के रहिस हे। हमन जब महादेव तीर पहुँचेन त विश्वास ही नइ होवत  रहिस हे के अतेक बड़ भी महादेव हो सकत हे। ये ह लगातार बाढ़त  हावय। ये ह सबसे ऊंचा महादेव के रिकार्ड म दर्ज हावय। सामने जलहरी घलो रहिस हे। हमन ओखर  आगू म गेन त एक अलग से शिवलिंग रखे रहिस हैं जेखर पूजा लोगन मन करत रहिन हें। हमन घलो पानी डारेंन अउ आक के फूल चढ़ायेन। अगरबत्ती जलायेन। ओ शिवलिंग के बाजू म सीढ़ी ले उतर के गुफा म जाये जा  सकथे। नीचे म छोटे से साफ सुथरा गुफा हावय।


ये लिंग के पाछू म शंकर पार्वती के मूर्ती बने हावय। नवा वर वधु मन इहाँ दर्शन करे बर  आथें अउ आशिर्वाद ले के जाथें। ये अनोखा भूतेश्वर महादेव सच म अनोखा हावय।

ये लिंग के तीर में ही वनदेवी के मूर्ती बने हावय। जंगल के बीच म महादेव हावय त वनदेवी घलो आगे।

बाहिर म बहुत से मंदिर बने हावय। गणेश, हनुमान जी घलो हे। इहाँ हमन ल सात बजगे। अब इंहा ले निकल के सीधा रायपुर ही जाना रहिस हे। 

सालों के ईच्छा ये तरह से एक झटका म पूरा हो जही सोचे भी नइ रहेंव। लोगन कहिथें  के दर्शन बर जब भगवान के ईच्छा होही तभे जा पाबो वरना कोई न कोई रुकावट आते रहिही। मोरो संग अइसने कुछ होइस होही। मोर ये दर्शन के माध्यम बनिन आशा अउ दुर्गेश गुप्ता। मोर संग छोड़बे नइ करिन।


इहाँ ले निकल के " अमृततुल्य चाय " पीये बर राजिम डाहर निकल परेन। पुल ले लक्ष्मण झूला बहुत ही सुंदर लगत रहिस हे। हमन उतर के फोटो खिंचवायेन। ओखर सुंदरता ल देख के अपने आप ल रोक नइ पायेन। उहाँ पुल म  उतर गेन।  मौसम ठंडा होगे रहिस हे। बहुत ठंडा ठंडा हवा चलत रहिस हे। हमन बहुत अकन फोटो खिंचवायेन। फोटो खिंचवावत बेरा म पुल कांपत रहिस हे याने हिलत रहिस हे। मन म  डर आवत रहिस हे। भूकम्प के आभास होवत रहिस। उहाँ ले हमन अभनपुर बर निकल गेन। आठ बज चुके रहिस हे।

घड़ी के सूई हमर अनुसार न चलके हमर समय ल बचावत चलत रहिस हे। ड्राइवर के संतुलित गाड़ी चलाना अउ घड़ी के हमर समय ल बचा के चलना एक साथ होवत रहिस हे।


राजिम म उतरे के बाद अइसे लगिस के मन की संतुष्टि ल ही मौसम ह बतावत हावय। अभनपुर जावत तक बारीश होय ले लगगे अउ अभनपुर ले पहिली ही बारीश हो गे रहिस हे। गढ्ढा मन म पानी भरे रहिस हे। रविवार होये के कारण बाजार दुकान सब बंद रहिस हे। गाड़ी अपनी मर्जी से भागत रहिस हे। भीगे मन ह बाहिर पानी बन के बरसत रहिस हे। इंद्र के सेना  हमर स्वागत करत रहिस हे। बने बारीश होगे तब हमन अभनपुर पहुँचेन। अचानक ड्राइवर राजू ह  कहिस " मेरे घर के पास की चंडी देवी के दर्शन कराता हूँ।"वाह अब घर जावत जावत फेर एक देवी के दर्शन। अभनपुर ले सात किलोमीटर म राजू ड्राइवर के घर रहिस हे अउ ओखर घर के बाद ही चंडी मंदिर रहिस हे। हमन मंदिर गेन। बहुत बड़े  मंदिर रहिस हे।  बहुत ही खूबसूरत मूर्ती रहिस हे। बहुत ही व्यवस्थित मंदिर रहिस हे। उहां कथा के संग संग नाचा घलो चलत रहिस हे। सालों बाद हमन नाचा देखेन।  देवी म चढ़े साड़ीमन ल तुरंत बेचत रहिन हें। 100,150,200₹ कीमत रहिस हे। कन्या भोज बर 300₹ अउ भंडारा बर 100₹ रखे गे रहिस हे। हर मनखे पइसा देय के हिम्मत कर सकत रहिस हे। इहाँ ले निकल के हमन  कमल विहार ले होवत साढ़े नौ बजे रायपुर पहुँच गेंन।


एक लम्बा यात्रा अउ चार दर्शनीय स्थल ल एक ही दिन म शांति के साथ घूम लेन। मौसम ह साथ दिस, बदली रहिस, बारीश घलो होगे। भगवान ह मोर दिल के पूरा ध्यान रखिस।  मोर संगवारी मन संग तीस बछर  के साथ रहिस हे तभे तो ये कठिन यात्रा ल पार लगा दिन। शायद ये दोस्ती उपर घलो इंद्र देव खुशी म बरस परिस होही।

सुधा वर्मा, रायपुर

28/3/2023