Thursday, 30 April 2026

गांव के गूढ़ रहस ]

 [ गांव के गूढ़ रहस ]


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*"अकती, अउव्वल, आखा तीज, बीज पंडुम"(माटी जात्रा)।*

     

   गाँव के ठाकुर देव दुलरवा ल जोहार करके नवा खेती किसानी ल सुरवात करेके परब आय अकती "बीज पंडुम"।  हर साल अकती तिहार बईसाख महिना के शुक्ल पक्ष के तीज के दिन मनाय जाथें। अहू तिहार हर हमर गँवई गाँव के किसान मन ले जुरे हाबे। 

     अक्ती, अउव्वल, आखा- तीज, बिजरी संजोरी, जेला किसान के पहिली तिहार कहे जाथे। आजकल सुने ला मिलथे कि रंग -रंग के तिहार ला पहिली तिहार कही देथें ।

    किसान मन के तिहार मउसम आधारित हे। छत्तीसगढ़िया मूलनिवासी समाज (ST,OBC,SC) मा बारह महीना म तेरह परमुख तिहार मनाय के परम्परा होथे। हर मउसम के सुरुआती मा पहिली तिहार मनाय जाथे। बरसात म हरेली(हरियाली) बरसात जइसे आखिर होइस अउ जड़काला के सुरुआत होथे वही बेरा सुरोहोती (दीवाली) तिहार। जड़काला जब पूर्ण रूप ले बिदा हो जथे, तब भईनकर गरमी तीपत भोंभरा मा ये अक्ती (अक्षय तृतीया)तिहार ला मनाए जाथे।

किसान सृष्टि के कोनो भी जिनीस ला बउरे के पहिली वो जीनिस के ,देबि - देवता ला भोग लगाथे। कृषि परम्परा मा कुँवारी अन्न ला खाय के नियम नइ हे , बिहाती अनाज ल खाय जाथे।

 अकती तिहार के पाछू कईठन कथा, कहनी , किवंदती जुरे हाबे। भारत देश के अलग - अलग भाग मा अलग -अलग कथा,कहनी के मानता ले ये तिहार ल मनाथें।

     आवव अकती तिहार मनाय के असल उद्देश्य काय हे तेला जानन। ये तिहार कोनो जाति - धरम ले संबंधित नइ हे। अनाज उगईया किसान ले जूरे हे। किसान के सब्बो देवी - देवतन गाँवे मा बसे हे। गाँव के बड़का देवता आय ठाकुर देव, इहि ला गाँव के पहिली किसान माने जाथे। येकर बिना गाँव नइ बसे।

  अकती तिहार किसानी बुता के शोध, बिज्ञान ले जुरे हे। जेमा किसान ला कृषि बेवस्था के जानकारी मिलथे।

  "ठाकुर देव गुड़ी " बीजोपचार के प्रयोगशाला आय, जिहाँ भण्डारी, अन्नकुँवारी, अउ सिंगासन माटी तीनों के पूजा होथे। पुरातन मा गाँव म सामूहिक खेती "झूम खेती" करे के परम्परा रिहीस हे। मिलजुल के सुख -दुख ला बाँट के जिंनगी जीयय।

   किसानी शुरू करे ले पहिली किसान ला बीज निमारे (चयन) करे ल परथे। पोख्खा अउ बदराहा दाना ल छाँटे ला परथे। इही जम्मो प्रक्रिया ल गाँव के ठाकुर देव मेरन जाके किसान भाई मन सरधा भक्ति ले प्रदर्शन करथें।

अपन- अपन घर ले नवा परसा पान  के दोना बनाके ओमा महुआ, चना, बटरा, मूँग, लाखड़ी, उरीद जइसन दलहन अनाज अउ एकठन दोहना मा धान के बीज ल धरके बिहिनिया बेरा गाँव बस्ती के जम्मो समुदाय के किसान भाई ठाकुर देव के ठऊर मा जाके सँघरथे।

जब सबोझन सकला जथे तहाँ ले बइगा - गुनिया, हुमदेवा अउ गाँव के सियान मिलके ठाकुर देव ला हुम -जग ,सेवा ,अर्जी -बिनती करके जय जोहार करथें।

    तेकर पाछू किसानी के सब्बो प्रक्रिया ल कुछ मन करके देखाथें। जइसे काँटा -खुटी बीनना, करसा के पानी ला सीतना, दू झन ला बईला बनाके नागर के नास संग जोतना, हसिया-कुदारी ले निंदई कोड़ाई करना। फेर धान लूना, भारा बाँधना, कोठार बनाके नीम के डारा म मिंजना । अउ दलहन अनाज ल माटी के हड़िया मा भुँजना, परसाद मान के सबो झन ला बाँटना अउ खाना।

  अउ आखिर म गाँवभर के सकलाय धान बीज ल दोहना मा बईगा के हाथ ले ठाकुर देव के आसीरबाद मान के झोंकना अउ संझा अपन खेत मा जाके बोना।

ये किसम ले ये दिन ग्रामीण कृषि संस्कृति ला देव बिधि - बिधान पूर्वक किसान स्बीकार कर लेथें। ये तिहार ल मनाए के बाद किसान खेती -किसानी ले जुरे काम-धाम  ला शुरू कर देथे। ये दिन ला "मूठ धरई"  तको कहे जाथे । किसान ले जुरे आन - आन जाति लोहार, राऊत, नाऊ, बरेठ मनके हियाव करे जाथे। गाँव के ठाकुर देव हा अन्न भण्डार के रक्षक माने जाथे।

    पुरातन समय मा इही दिन - तिथि के किसान बिज्ञानिक मन गरमी मउसम के ताप ले हवा, पानी, अउ फसल के कम -जादा होय के अनुमान तको लगा लेवयँ।

 गाँव मा कोनो जिनिस ल परब ले पहिलि बउरे के मनाही हे। जइसे जबतक गाँव , घर के देवी - देवता मा धान, गँहूं, के बाली नइ चघाही तबतक नवा अनाज ल नइ खाना चाही। वइसने परसा पान अउ करसा के पानी ल बिना अकती तिहार मनाय नइ पीना चाही।

     ये दिन ला किसान मन बड़ शुभकारी मानथे। कहीं -कहीं पुतरा -पुतरी के बिहाव तको करथे। कोनो -कोनो समाज मा अपन पुरखा ल अकती पानी देये के रिवाज घलोक हे। जेकर बाद सुभ कारज करथें। ये ढंग ले हमर पुरातन संस्कृति के अकती "बिजरी संजोरी" तिहार ग्रामीण कृषि बेवस्था के संग बिधी -बिधान पूर्वक संपन्न हो जाथे। जबतक धरती के भगवान इहाँ जियत हें तबतक ए कृषि परम्परा चलही जेन दिन नइ रहिं वो दिन अहु परम्परा नंदा जाहि।

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आलेख --------------

                 *मदन मंडावी*

ढारा, डोंगरगढ़ राजनांदगांव।

🪢🙏🏻

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