मन के मिलौना
गांव मा सूरुज नरायण के घाम हा अइसे उतरिस जइसे अंगना मा कोनो चुपचाप मेहमान आके बइठगे हवय। खेत के मेड़ पार मा हरियर हरियर कांदी हा चमकत रिहिस अउ बखरी मा कुम्हड़ा के नार हा लहरावत रिहिस।
कंठी ठेठवार हा अंगना के ओसरी मा बइठके दूरिहा ले देखत रिहिस। ओखर आंखी मा कुछु खोजे के भाव रिहिस। दाई कहिथे - “मनखे के मन जेन दिन भर जुगत करत रहिथे ओ दिन ओखर चैन हर उड़ जाथे।”
कंठी ठेठवार के मन घलो अइसने जुगत करत रिहिस।
ओ दिन गांव मा हाट बाजार रिहिस। लोगन सब हाट बाजार जावत रिहिन। कोनो महुआ बेचत रिहिस, कोनो कोदो-कुटकी, कोनो लकड़ी। कंठी ठेठवार के मन हाट बाजार जाय बर नई होवत रिहिस।
ओखर दाई पूछिस -
“का होगे रे? हाट बाजार नई जाबे का?”
कंठी ठेठवार धिरलगहा किहिस -
“जाहूं तो दाई, फेर मन नई लागत हे।”
दाई हांसे लगिस -
“अरे, मन ला लगाय ला परथे। मन घोड़ा नइहे, जिहां चाही उहां भाग जाही।”
कंठी ठेठवार चुप होगे।
असल मा ओखर मन मा कुछु अउ बात चलत रिहिस।
गांव मा फुलबसिया नाव के एक नोनी रिहिस। बचपन ले कंठी ठेठवार के संग खेले-कूदे रिहिस। फेर अब दुनो बड़े होगे रिहिन। अब गांव के बोली-बानी बदलगे रिहिस।
लोगन कहिथे -
“लइका जब जवान हो जाथे, त गांव के नजर घलो बदल जाथे।”
कंठी ठेठवार के मन म फुलबसिया बर अजीब कस अपनापन रिहिस। फेर वो अपन मन के बात कहे के हिम्मत नइ जुटा पावत रिहिस।
गांव के जिनगी अइसने होथे जइसे धीरे-धीरे बोहावत नदी। ऊपर ले सब शांत दिखथे, फेर भीतर बहुते कुछ चलत रहिथे।
कंठी ठेठवार के संग घलो अइसनेच होवत रिहिस।
एक दिन ओहर खेत जावत रिहिस। रद्दा मा फुलबसिया मिल गे।
फुलबसिया मुस्कुरा के किहिस -
“कइसे हस कंठी, आजकल बड़ चुप-चुप रहिथस?”
कंठी ठेठवार हंसी रोकत किहिस -
“कुछु नई, काम जादा हे।”
फुलबसिया किहिस -
“काम जादा नई, मन मा बात जादा हे।”
कंठी ठेठवार चौंकगे।
“का ?”
फुलबसिया धिरलगहा हांसिस -
“गांव मा सब देखत हें। जेन बात ला लुकाय जाथे, ओ बात सबले पहिली दिख जाथे।”
कंठी ठेठवार के गला सूखगे।
ओ दिन ले कंठी ठेठवार के मन अउ जादा उलझगे।
रात मा वो खटिया मा सुते रिहिस। चंदा ऊपर चमकत रिहिस। हवा मा महुआ के गंध रिहिस।
वो सोचत रिहिस -
“का सच मा फुलबसिया समझत हे ?”
दाई के बात याद आइस -
“मनखे के मन हा मछरी जइसन होथे, पानी बिना टिके नई।”
कंठी ठेठवार सोचिस -
“मोर मन के पानी फुलबसिया हे का ?”
दूसर हफ्ता हाट बाजार के दिन रिहिस।
गांव के सब लोग जावत रिहिन। कंठी ठेठवार घलो चल दिस।
हाट बाजार मा भीड़ रिहिस। कोनो गाना गावत रिहिस, कोनो बांसुरी बजावत रिहिस।
कंठी उदुपहा देखिस -
फुलबसिया महुआ बेचत बइठे रिहिस।
ओहर धीरे बांधे तीर मा पहुंचिस।
फुलबसिया किहिस -
“का लेबे?”
कंठी हांसे लगिस -
“महुआ।”
फुलबसिया किहिस -
“महुआ लेबे त दाम देबे, मुस्कान लेबे त का देबे?”
कंठी चुप होगे।
गांव मा बात बिजली जइसन बगरगे।
दू दिन बाद लोगन कहे लगिन -
“ कंठी अउ फुलबसिया के बात जादा होवत हे।”
एक झन सियान बबा घलो किहिस -
“जिहां धुंआ उठथे, उहां आग घलो होथे।”
कंठी के दाई सुनिस।
ओ रात वो कंठी ला बुलाइस -
“सच-सच बता, का बात हे?”
कंठी चुप।
दाई किहिस -
“मनखे के मन ला जियादा देर दबाके रखबे, त ओ फूट जाही।”
कंठी धिरलगहा किहिस -
“दाई… मोर मन फुलबसिया मा लाग गे हे।”
दाई मुस्कुराइस -
“बस इही बात?”
कुछ दिन बाद दाई खुद फुलबसिया के घर चल दिस।
गांव के रीति मा अइसनेच होथे।
फुलबसिया के दाई किहिस -
“अगर दुनो के मन राजी हे, त हमन ला का दिक्कत?”
गांव मा धीरे-धीरे बात तय होगे।
कंठी जब सुनिस, ओखर मन हल्का होगे।
वो सोचिस -
“जेन बात बर मन बरिस भर ले भटकत रिहिस, ओ बात आज ठिकाना पागे।
बिहाव के दिन गांव मा मड़ई लगिस। दफड़ा - डमऊ , मोहरी बाजिस। लोगन नाचे लगिन।
कंठी अउ फुलबसिया एक-दूसर ला देखके मुस्कुराइन।
दाई धिरलगहा किहिस -
“देखव, मन के मिलौना सबसे बड़े मेला होथे।”
कंठी समझ गे -
सच मा मन जब अपन जगह पा जाथे, त जिनगी के सब उलझन अपने-आप सुलझ जाथे।
- डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी ( छ.ग.)
पिन - 493773
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