हसदेव के डोंगर
- डुमन लाल ध्रुव
“हय्या रे हय्या … जोर लगा के हय्या…”
हसदेव जंगल के भीतरी डोंगर मा आवाज गूंजत रिहिस। साल, साजा अऊ बीजा के ऊंच-ऊंच रुख राई मन हवा मा डोलत रिहिन अऊ मजदूर मन के हांफत हांफत सांस जइसे जंगल भर मा सुनाई देत रिहिस।
शिवरतन डोंगर के ऊपर खड़े रिहिस। वो अपन पांचो संगवारी मन ला हिम्मत देत रिहिस।
“चलव संगवारी मन… थोड़ा अउ जोर लगावव… बस थोड़ेच ऊपर रहि गे हे।”
नीचे खेमू, भैरव, सुखराम, लखन अऊ भीखू मिलके तीस फीट लम्बा लोहा के भारी खंभा ला डोरी ले खींचत रिहिन।
खंभा भारी रिहिस जइसे सुते अजगर डोंगर मा पसार के लेटे हवय।
थोड़ा ऊपर खिसकथे…
फेर फिसल के नीचे आ जाथे।
“अरे ददा… अब नई होही…”
खेमू हा जमीन मा बइठत किहिस।
सबके बदन पसीना ले तर बतर होगे रिहिस।
काम के लालच
शिवरतन ला वो दिन याद आइस जब वो घटबर्रा गांव ले आवत रिहिस।
रद्दा मा एकठन जीप खड़े रिहिस। जीप ले उतरे ठेकेदार धीरेन्द्र बाबू पूछिन -
“काम करबे?”
शिवरतन पूछिस -
“का काम साब?”
“डोंगर मा खंभा चढ़ाना हे। ऊपर कारखाना बनही। तीन सौ रुपिया रोजी।”
तीन सौ रुपिया सुनके शिवरतन के आंखी चमक उठिस।
गांव मा त डेढ़ सौ रुपिया मा दिन कटथे।
वो तुरते किहिस -
“हम करबो साब… अऊ पांच आदमी अउ ला सकत हंव।”
ठेकेदार मुस्कुराइस -
“बस इही चाही।”
शिवरतन दौड़त गांव आइस अऊ अपन संगवारी मन ला काम के खबर दे दिस।
कठिन काम
सबेरे आठ बजे ले काम सुरु होइस।
ग्यारह बज गे -
पर एक खंभा घलो ऊपर नई पहुंचिस।
डोंगर खड़े रिहिस।
डोरी मा हाथ फोरा पर जात रिहिस।
ऊपर खड़े ठेकेदार चिल्लाइस -
“आज बीस खंभा ऊपर जाना चाही… समझे?”
मजदूर मन चुप।
डर घलो रिहिस।
सेठ के सलाह
सरी मंझनिया एक जीप आइस।
एकझन मोटा सेठ उतरिस अऊ ठेकेदार संग धीरे-धीरे बात करे लागिस।
दोनो कभू खंभा गिनथे, कभू मजदूर मन ला देखथे।
शिवरतन दूर ले देखत रिहिस।
थोरिक देर बाद सेठ चल दिस।
पर ठेकेदार के चेहरा बदल गे रिहिस।
अब वो मुस्कुरात रिहिस।
“सुनव…” ठेकेदार आवाज लगाइस।
“आज घर नई जावव।
यहीं तंबू लगही।
मुर्गा बनही… दारु मिलही… अऊ जादा पइसा घलो देहूं।”
मजदूर मन एक-दूसर ला देखिन।
अइसे ठेकेदार पहली कभू नई बोलिस।
पर सब मान गेन।
दारु के ताकत
रात के सात बजिस।
देसी मुर्गा बन गे रहिस।
दारुल के बोतल खुलिस।
ठेकेदार घलो संग बइठके पीइस।
शिवरतन ला अचरज होइस -
आज ठेकेदार दोस्त जइसन व्यवहार करत रिहिस।
थोड़ी देर बाद वो खड़े होइस -
“चलव… अब काम करबो।”
मजदूर मन दारु के घूंट गटकिस।
फेर खंभा उठाइन।
अऊ अचानक जइसे शरीर मा आग भर गे।
वो दउड़त-दउड़त डोंगर चढ़ गे।
शिवरतन ला पता तक नई चलिस कब वो डोंगर के माथा मा खड़ा हो गे।
ठेकेदार हंसत किहिस -
“देखेव … तुंहर मन मा ताकत कम नई हे।”
दू दिन के चमत्कार
दारु पी-पी के मजदूर मन रात-रात भर काम करिन।
दिन मा आराम…
रात मा काम।
दू दिन मा सौ खंभा डोंगर मा खड़े हो गिन।
ठेकेदार बहुत खुश होइस।
असली नुकसान
काम एक महीना चलिस।
ठेकेदार दारु देत रिहिस।
धीरे-धीरे दारु मजदूर मन के आदत बन गे।
काम खतम होइस।
ठेकेदार चल दिस।
पर मजदूर मन के जिनगी बदल गे रिहिस।
अब बिना दारु काम नई होय।
मजदूरी के सब रुपिया दारु मा उड़े लागिस।
घर के टूटन
एक दिन शिवरतन के घरवाली किहिस -
“सुनव जी…
पहिली जब काम करके आवत रेहेव त तुंहर पसीना महकत रिहिस।
मोला वो महक हा बहुत भाथे।
अब तो दारु के बास आवत हे।”
शिवरतन चुप रहिगे।
कुछ दिन बाद वो अपन मइके चल दिस।
दू महीना बाद शिवरतन अऊ ओखर साथी मन काम खोजत फिरत रिहिन।
एक दिन तालाब खोदई के काम मिलिस।
पर रापा कुदारी चलावत-चलावत हाथ कांपे लागिस।
ठेकेदार गुस्सा मा किहिस -
“भागो इहां ले… कामचोर हो।”
शिवरतन धीर से किहिस -
“साब… थोड़ा दारु मिल जाही त दू दिन मा खोद देबो…”
ठेकेदार जोर ले हांस परिस -
“दारु ले तुमन खोखला होगे हवव।”
शिवरतन चुपचाप खड़े रहिगे।
दूर डोंगर दिखत रिहिस।
ऊपर खड़े लोहा के खंभा चमकत रिहिन।
जइसे हांसत हवय।
तभे ओखर घरवाली के बात के सूरता आइस -
“मोला तुंहर पसीना के महक पसंद हे… दारु के बास नई।”
शिवरतन उदुपहा उठिस।
अऊ दउड़ परिस -
सीधा अपन ससुराल डहर ।
वो दउड़ना चाहत रिहिस…
इतना के शरीर ले पसीना बह जाय।
अऊ जब ओखर घरवाली देखे
त कहे -
“आज फेर …
तुंहर शरीर के पसीना हा महकत हे…
- डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)
पिन - 493773
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