मंगरोहन (नान्हें कहिनी)
------------–------------------
बीस बछर होग ये बड़े सहर म रहत, फेर नौकर चाकर मिले के अतेक परेसानी कभू नइ होइस । रइपुर ह रजधानी का बनिस, काम-बुता के कमती नइ। भाव बढ़गे काम करईया मन के ! घर के काम बर घलो कोनो नइ मिलय। कहुं मिलगे एकाध झन, त सिर ऊपर करके, जबान लड़ाके , बराबरी म बात करथे । उड़िया बस्ती अब्ब्ड़ होगे। रइपुर सहर ह उड़ीसा राज ले सीधा -सीधा जुड़े हे । सड़क, रेल, जंगल सबो डहार ले उड़िया मनखे मन आथें, अउ जाथें । सीधा जगन्नाथ भगवान करा पहुंच जथें । उड़ीसा ले बेपारी, मन, अउ काम खोजईया, बुता करइया मन अब्बड़ आथें। आदमी जात रिक्सा चलाथे अउ औरत जात घर-घर बरतन मांजथे । काम बुता करे ले पइसा मिलथे । पइसा ले चाणूर दार आथे । चांउर दार ले पेट भरथे। पेट भरे ले जिनगी चलथे ---ये बात ला खूब समझथें उड़िया मन। जल्दी-जल्दी काम सिखथें अऊ चलता-पुरजा बन जथें । मनखे के जरूरत ह, ओला हुसियार बना देथे ।
छत्तीसगढ़ के रजधानी ये रइपुर। चारों। खूंट गांव । गांव के मन घलो बुता खोजे बर आथें । गांव म किसानी काम खतम करके सहर कोती आथें । का आदमी, का औरत, का लइका ? अब तो पूरा परिवार आके बसत जाथे । कोनो डेरी मं दूध अउ गाय गरुआ के काम करथे, अउ सड़क बनइ म घलो आदमी, औरत काम करथें । भाव बढ़गे। पहिली दू सौ रुपिया म घर के काम करंय, बरतन चौका, झाडू पोंछा। अब एक हजार रुपिया म करथें । हमला ओ मन जवाब देथे, जानो मानों हम ओखर करा काम मांगथन। कहिथें - "सुनव मां जी, तुहंर तनखा बाढ़थे, मंहगई बाढ़थे । हमर तनखा कइसे नई बाढ़ही ? तुंहर गरज हे त काम करावव, नइ ते हम दूसर घर काम लग जबो । काम के कमती नइये, बिलडिंग बनत जाथे । मोरो करा बात करेके टेम नइये ।" अउ रेंगत बनथे कामवाली ।
धन्न रे रजधानी ! काली, सुखिया नांव के बाई अइस । कहिस - "एक हजार रूपिया महिना देबे ,त बुता करहूं। ए नोनी ल घलो संग में लाने हव ।तुंहर गमला के फूलपान म पानी दे दिही। पाइप लगा देबे । तोर अटके-पटके छोटे - छोटे बूता कर दिही। जूता-चप्पल म बरस मार देही । तुंहर सोफा मन ल झर्रा देही-धुर्रा , माड़ जथे न ? मंय ह बड़े काम ल कर दुहूं। दूनों झन के बूता ल मिला के एक हजार रुपिया देबे । "
सुखिया ह गांव ले आये हे, फेर सहर के हवा लगे बाई लगिस । सोचेंव, जऊन आथे तउन ह आठ सौ, बारा सौ अइसने मांगत रहिथें, चलव, इही ल लगा लेथंव, सोच के केहेंव- "ठीक है, काली ले आ जबे । सुखिया ।" सुखिया "हां" कहिके चल दिस। रात के सोचेंव । ओखर संग आय नोनी करा 'का'-'का' काम कराहुं? अऊ सुखिया करा 'का' - 'का' काम कराहुं ?
बिहनिया चाय पानी होगे। बेटा मन कॉलेज चल दिन । साहेब घलो आफिस चल दिस । नौ बजे के बाद सुखिया नोनी संग अइस । बाहिर मं चप्पल उतारिन दूनों झन । मोर केहे के पहिलीच् अंगना के कोंटा मं माड़े पाइप ल नल मं फिट करके नोनी ल धरइस अउ कहिस --"जा सब गमला मन म पानी दे, झाड़ झरोखा ल बने नहवा, तहां ले अंगना ल धो, बांस बहिरी में घर के पानी ल बहारबे अउ खोर ल घलो बहारबे ।" नोनी "हव" कहि के कूदत नाचत पाइप लेके चल दिस ।
सुखिया ह, बरतन ल बाहिर निकालिस अंगना मं । पहिली पानी डार के भिगोइस । तहां ले मोर करा फुलबहिरी मांगिस । "कुरिया के ठन हे मांजी बता दे, कचरा कती फेंकहुं? इहु ल बता दे रहा"-- कहिके चारों कुरिया ल बहारिस । सुपली म कचरा भर के एक ठन कचरा बाल्टी म डारिस । बाल्टी ल तिरिया के मड़इस । पोंछा लगइस सबो कुरिया म । देखत रेहेंव-- कोना-काना सबो ल पोंछिस । तहाँ ले बरतन मांजे बर बइठिस । साबुन मं रगड़-रगड़ के बरतन मांजिस धोईस। तहां ले ,कनिहा ले पोलिंथिन निकालिस, ओमा छेना के राख लाने रहाय, तवा अउ कराही ल घस-घस के मांजिस । चकाचक बरतन दिखे ले लागिस । मोर मन खुस होगे।
दु कप चाय बनायेंव । काम बूता खतम होगे। नोनी घलो अंगना-दुवार धो डरिस । बाहिर निकरके देखेंव । मन खुस होगे। जिनगी मं पहिली बेर अईसन कामवाली पायेंव जऊन बिन टोका-टाकी के अपन घर जइसे काम करिस । दुनों झन बर दू कप चाय ढारेंव -
"सुखिया, नोनी, आव चाय पी ले"। सुखिया कहिथे "कचरा फेंक के आवथंव मांजी"
ओतके मं नोनी ह चहुंके, हांसत हांसत कहिथे "दाई मंय तो कचरा घलो फेंक के आ गेंव । बाल्टी ल धो के मंड़ा-देंव ।"
"सिरतोन ? "
"हाँ" तारी बजाके नोनी हाँसथे ।
"हाय रे मोर "मंगरोहन" ! आगु आगु ले बुता करथस ? "- सुखिया ओला पोटार के चूमिस ।
मंय अइसन मयारुक सुघ्घर संसार पहिली बेर देखेंव अउ जानेंव ।
दूनों झन चाय पिइन । मय पूछेंव "मंगरोहन" काला कइथे ?"
"जउन आगु-आगु काम ल निपटा देथे । बाधा ल भगाथे ।"
सुखिया मोला सुख देइस । मंय ओखर तनखा ला आज डेढ़ हजार कर देय हंव - पांच बछर मं पांच सौ बढ़ा देंव । ओला देखथंव त महूं ल केहे के मन लागथे -
"हाय रे मोर मंगरोहन !!"
--------------------------------
No comments:
Post a Comment