*कहिनी*
*// पानी //*
- *डोरेलाल कैवर्त*
"' *बिन पानी नि हे जिनगानी* " ए कहना सोलाआना सिरतोन आय । पानी के बिना जिनगी जिए के कल्पना घलो नि करे जा सके ? हमन सबो जानत हांवन भुइँया , पानी , आगी , अगास अऊ हवा ए पाँच जिनिस के मिंझरा ले मनखे देहें के सिरजन होए हावे । विज्ञान के मुताबिक मनखे के देहें म दस ले बाराआना तक पानी रहिथे ते पाय के पाँचो जिनिस के जरुरत परथे । एकोठन के कमतियाय ले जिनगी जिए बर मुसकुल हो जाथे । सांस लेहे बर हवा के जरुरत परथे , बिन हवा के जिनगी नि जिए जा सके ठीक ओइसनेच पानी के बिना घलो जिनगी बिरथा आय । एमा कोनों भरम के बात नि हे।
हमर छत्तीसगढ़ राज म नल जल योजना शुरु नि होय रहिस तेकर पहिली के बात आय । एक बछर बारिस कम होय रहिस । सावन-भादो बरसा के महीना म घलो कमसलहा पानी गिरिस । अगास कोती ल निहारत कोनों गनेश चउंथ म पानी गिरही कहंय , कोनों पीतर पाख म पीतर मन पानी गिराही कहंय अऊ कोनों दुरगा-दसेरा म गिरबेच करही घलो कहंय । अइसे करत पूरा चम्मास के महीना बुलक गे फेर पानी तो ठगवा कस ठग दिस । बीच-बीच म देखा-ताखा ठांवां-ठिपका कभू ए मूड़ा त कभू ओ मूड़ा पानी गिर देवत रहिस ।
अगास कोती निहारे म करिया बादर छाए रहय फेर बादर बिन बरसे आँखी ओलम हो जावय । बादर के गरजइ-घुमरइ ल देख के अइसे लागय कि पानी गिरबेच करही ।' *जेन ह गरजथे तेन नि बरसे* ' हाना सहिच होगे । बादर म सोखाबोर्रा (इन्द्रधनुष) घलो उवत दिखय फेर कोनों काम नि आवय । पानी ल सोख देवय अइसन लागय । गनेश चउंथ ले पानी गिरे बर छोड़े रहय । बरसा कम होय रहिस ते पाय के तरिया म जादा पानी नि भर पाय रहिस । कुआँ घलो नि अधियाय पाय रहिस । तरिया के ठेल धरे ले कुआँ म पानी भराय रहय ।
कतको झन आल्हा पढ़े म पानी गिरथे कहिन । गाँव म महेत्तर कका जबर आल्हाइक रहिस ओहर सुग्घर आल्हा बांचय । बने ऊतार-चढ़ाव के मुताबिक कभू कड़क कभू सेवर स्वर म आल्हा पढ़य । उहाँ पानी गिराय के उदीम घलो करिन फेर कका के आल्हा पढ़े म पानी नि गिरिस । पानी नि गिरे के खातिर गाँव म अकाल जइसन होगिस ।
गाँव म तरिया , डबरी , पयठू अऊ कुआँ के अलावा पानी के कोनों जरिया नि रहिस बस सरग के भरोसा रहंय । उहाँ सरग के पानी के भरोसा म खेती होवय । पानी थोरउचा गिरे के कारन ओ बछर लटपट बीजहा के पूरती धान होइस । कुंवार महीना के लगती ले पानी छोड़े रहिस ते पाय के भुइँया घलो दरगान हन दे रहिस । तरिया मन भरे रहंय त ओकर चुहका के कारन कुआँ मन भरे रहंय फेर तरिया नि भरे रहिस ते पाय के कुआँ म घलो पानी जादा नि रहिस।
गाँव म पानी के स्रोत तरीच-तरी खाल्हे कोती चल दे रहिस ते पाय के कुआँ घलो जल्दी सुखा जावत रहिस । गाँव के बोरिंग ल टेड़त-टेड़त थक जांवय फेर तीन-चार गघरी पानी निकलय । गाँव तीर म एकठन घेंसरा नरवा बोहावत रहिस फेर ओहू एसो के थोरउचा पानी गिरे म एकोदिन पूरा नि आइस । कुआँ के सुखाय ले उही नरवा म गाँव के मनखे मन खंचवा खन के पानी पीवंय ।
पानी के बिना गाँव म करलाई होय रहिस । बइसाख-जेठ के महीना लकलकावत जबर घाम धरती के अंतस घलो फाट गे रहिस । तलाव डबरी तो सुक्खा पर गे रहिस । खेत-खार के रुखराई मन सूरुज के कटही सांट ल ठाढ़े-ठाढ़ सहत रहंय । घाम के खातिर भुइँया म भोंभरा चट ले जरय । अइसे लागत रहय कि भुइँया म मुर्रा घलो फूट जाही । मंझनिया के झोलहा घाम कनपट ल मारे कस जनावत रहय । बेर बूड़े के पाछू थोरिक अँधियार होवय तभे गाल म घी चुपरे कस लागय ।
बइसाख-जेठ के घाम म तरिया के पानी अटाय रहे त कोकड़ा मन के बतरे रहय । कोकड़ा मन इहीच मउका मिले हावे कहिके तरीच-तरी खुश रहंय । ओमन बर तिहार बरोबर होय रहिस । टपटपउन मछरी ल रोज खावंय । कुंवरहा सोहागी कांदी ल खाके गरुवा भइंसा मन चर के चिकनाय अऊ मोटाय रहिथे तइसनहे कोकड़ा मन घलो मोटावत रहिन ।
चिराई-चिरगुन अऊ जानवर मन के पानी बिना टोंटा सुखा जावत रहिस । गाँव के उत्ती कोती दू कोस दूरिहा पहार के धरी म एकठन कोलिहामुड़ा बांध बधाय रहिस । पाछू बछर कस एसो बांध म पानी ओतका जादा नि भराय रहिस फेर तीर-तखार के मन ल गुजारा करे के पूरती भराय जरुर रहिस । उही कोलिहामुड़ा बांध ले टेंकर म पानी भर-भर के गाँव लानय । गाँव भर म एक दू टेंकर काय पूरतिस । *हाथी के मुँहू म सोंहारी* कस जनावय । सबोझन भंड़वा बरतन बाल्टी , डेगची , मरकी , डब्बा ल लाइन म लगाय सबो टेंकर के अगोरा म बइठे रहंय ।
गाँव म पानी के जबर किल्लत रहय । टेंकर आतिस तहं ले पानी झोंकाय बर झपट परंय जइसे हाड़ा देख के कुकुर मन दउंड परथे । अपन-अपन भंड़वा बरतन ल धर के पानी झोंकाय बर कूद परंय ।कभू-कभू पानी झोंकाय बर झगरा घलो मात जावय । पानी के टेंकर म लिखाय रहय "*जल ही जीवन है,इसे व्यर्थ न गवांए* " फेर पानी के टेंकर के खाल्हे कोती छोटकून सांसी रहिस जेमा ले पानी ह थोर -थोर टपत रहय ।
टेंकर ड्राइवर के सुभाव ओतका जादा अच्छा नि रहिस । ओहर जबर गुसेलहा रहय । ओकर चेहरा म कोनों किसिम के दया भाव नि झलकत रहिस । कभू अपन टेंकर ल जेन जघा म बरतन के लाइन लगे रहय तेन मेर नि खड़ा करय दूसर जघा म टेंकर ले जाके खड़ा कर देवय । बरतन के लाइन मेर लाने बर कहंय तभो ले ओहर नि लाने । जेन जघा म टेंकर खड़े करे हंव उहीच मेर आके पानी भर लेवौ कहय । 'मनखे ल समे अऊ परिस्थिति ल देख के काम करना चाही ।' 'मरता काय नि करता'।
उही गाँव म एकझन डोकरी दाई रहय । जेकर कनिहा धनुष कस नेव गे रहिस । बिचारी ओहर लवठी धर के टेकत रेंगय । ओहू टेंकर ले पानी झोंकाय बर आय रहिस । टेंकर के खाल्हे ले नानचुक सांसी ले पानी थोर-थोर थीपत रहिस अऊ भुइँया म बगरत रहय । भीड़ ल देख के सियानिन दाई सोचिस अऊ अपन माटी के मरकी ल उही जघा म मढ़ा दिस जेन जघा टेंकर ले पानी गिरत रहिस । मरकी म पानी भर जाही कहिके डोकरी दाई खुश नजर आवत रहिस । टेंकर के नानचुक छेदा ले पानी मरकी म धीरे-धीरे भरत जावत रहिस । मरकी भरे बर थोरिक बांचे रहिस ।
थोरिक समे के पाछू म ओ टेंकर के ड्राइवर आइस ओकर नजर जइसे टेंकर के खाल्हे म माढ़े मरकी म परिस चिल्लावत बोलिस-' काकर मरकी आय ' ?' कोन ए जघा म रखे हावय ' ?..डोकरी दाई अपन लवठी ल टेकत ओ मेर आइस,' मोर मरकी आय बेटा '!...डोकरी कहिस ।' सब लाइन म लगाय हावंय तेन ल नि देखत हस का ' ?...डांटत ड्राइवर फेरेच कहिस ।' पानी गंवात हावे कहिके मढ़ा पारेव बेटा !'..डोकरी दाई डरावत कहिस ।
फेर का ओ निर्दयी ड्राइवर ह उनिस न गुनिस एकठन लवठी ल धर के जोर से मरकी ल मारीस ते पाय के मरकी फूट गिस अऊ ओमा आधा पानी भराय पाय रहिस होही ओहू भूइँया म बगर गिस । ओमेर जेतका लाइन म लगे रहिन सबो के मानसिकता ओ ड्राइवर पक्ष कोती दिखत रहिस , अऊ कोनों मन बढ़िया बनिस कहिके हाँसत घलो रहिन।
ए डोकरी ल देखा तो रे कहिके कान म एक-दूसर संग फुसफुसावत घलो रहंय । डोकरी दाई के आँखी के दूनों कोर ले आँसू टपके लागिस । ' पानी चुहत रहिस तेन जघा मरकी ल मढ़ा दिस त का होगिस ' ?..एकझन सातवीं कक्षा म पढ़इया लइका डोकरी दाई कोती बोलिस ।' नि देखत हावस का '? टेंकर म बड़का आखर म अमोल बानी लिखाय हावे *" जल ही जीवन है* " बूंद-बूंद को बचाकर रखिए ".....पढ़इया लइका लिखना कोती इशारा करत कहिस ।
भगवान ल सुमरत फेर लाइन म लगके डोकरी दाई अपन मन म गुनत-गुनत कहिस कि अपन मरकी ल मढ़ाके पानी बचा के गलती कर पारेंव का......?
✍️ *डोरेलाल कैवर्त*
*तिलकेजा, कोरबा (छ.ग.)*
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