Thursday, 30 April 2026

सुंदरी ला लाते मंय बिहाव - डुमन लाल ध्रुव

 सुंदरी ला लाते मंय बिहाव

                  - डुमन लाल ध्रुव 


गांव के बिहान मा कुछ अलग बात रिहिस।

धान के खार अभी-अभी कटके खाली होय रिहिन, माटी मा नई नमी रिहिस  फेर हवा मा पिरित के गंध तउरत रिहिस। अंगना अंगना हा  गोबर ले लिपाय पुताय भुइंया कस चमकत रिहिस, बांस के मड़वा गड़ियाय रिहिस, महुआ के सूखत फुलवारी ऊपर रंगीन कपड़ा झूलत रिहिस।

  आजेच कुम्हारखान गांव मा  दाऊ गुलाबचंद के बेटा फूलचंद के बिहाव रिहिस । घर मा दफड़ा ,गुदुम, मोहरी बाजत रिहिस, मोटियारी टूरी मन गावत रिहिन -

“दे तो दाई, दे तो दाई अस्सी रुपईया,

ओ सुंदरी ला लाते मंय बिहाव...”

गीत जइसे हंसी रिहिस, फेर हर आदमी अपन-अपन मतलब ले सुनत रिहिस।

कोनो ला लगत रिहिस  दाई ले नेग मांगे बर गीत आय।

कोनो कहत रिहिस  जमाना महंगाई के आय, अस्सी रुपइया मा अब का होही?

कोनो मुसकात रिहिस  गीत त गीत आय, बिहाव मा मजा चाही।

फेर एक आदमी रिहिस जेन ये गीत ला सुनके चुप हो जावत रिहिस।

ओ रिहिस - रामखिलावन।

रामखिलावन गांव के गरीब किसान। दू एकड़ बंजर, आधा जिनगी मजदूरी, आधा जिनगी उधारी। घर मा बूढ़ी दाई, एक छोटी बहिनी - सुंदरी।

हवय तो नाम सुंदरी, फेर गांव भर कहिथे - नाम जइसे मन। आंखी मा उजियारी, चाल मा संकोच, बात मा मिठास। जेन घर जाथे, ओ घर के बूढ़ी दाई तक कहिथे - “ यहा काखर घर जाही ते, ओखर घर के भाग खुल जाही।”

फेर भाग सबके नई खुलय।

रामखिलावन ला बरिस भर ले चिंता रिहिस - सुंदरी के बिहाव।

जिहां जाथे, लड़का पक्ष के आदमी पूछंय -

“का देहू?”

“कितना खेत हवय?”

“गाय-भैंस?”

“सोन के गहना?”

“मोटर साइकिल नई सही, साइकिल त देहू?”

रामखिलावन हा मुसकावत कहिथे - “भाई, मनखे देथन, मया देथन, लड़की देथन।”

सामने वाला कहिथे - “हमन दुकान नई खोले हवन, फेर रिवाज त रिवाज आय।”

रिवाज!

रामखिलावन  ला ये शब्द हा जहर महुरा कस लगय।

ओ दिन बिहाव घर मा गीत फेर गाइस -

“दे तो दाई, दे तो दाई अस्सी रुपईया...”

फूलचंद के फूफा हंसत किहिन - “अब अस्सी नई, अठ्ठासी हजार बोलव!”

सब हंस परिन।

रामखिलावन नई हंसिस।

ओखर दाई धीरे ले पूछिस - “का होगे?”

रामखिलावन  किहिस - “दाई, गीत मा मजाक हवय, जिनगी मा सजा।”

दाई चुप।

रामखिलावन रात मा घर लहुटिस। सुंदरी चूल्हा फूंकत रिहिस। उजाला कम, धुंआ जियादा। ओखर चेहरा धुंआ मा घुरत रिहिस।

“ददा, बिहाव घर गेय रेहे?” सुंदरी पूछिस।

“हव।”

“गीत गावत रिहिन?”

“हव।”

“मोर बिहाव मा घलो गाहीं?”

रामखिलावन ओखर मुंहू ला देखत रहिगे।

जवाब नई दे पाइस।

सुंदरी मुसकाइस - “मंय मजाक करत हंव।”

रामखिलावन के भीतरी कुछ दंभ टूटिस।

गांव मा एक अउ आदमी रिहिस - नरबदा प्रसाद मास्टर। पढ़े-लिखे, रिटायर, आंखी मा चश्मा, बात मा आगी।

ओहर कहिथे - “गांव तब सुधरही जब बिहाव बजार नई रहिही।”

लोगन हंसथें - “मास्टर, तुमन किताब के बात करथव।”

मास्टर कहिथे - “किताब नई, जिनगी के बात करत हंव।”

रामखिलावन एक दिन ओखर तीर गीस।

“मास्टर, सुंदरी बर बात चलत रिहिस -  खपरी गांव मा। फेर मांग दिस  पचास हजार रुपिया।”

मास्टर पूछिस - “तंय का कहेस?”

“का कहितेंव ? उठके आ गेवं।”

“ बनेइ करेस।”

“ सुंदरी के उमर बढ़त जात हवय।”

मास्टर चुप होगे। फेर धिरलगहा किहिस -

“ रामखिलावन, बिहाव लड़की के उमर ले नई, समाज के समझ ले रुकथे।”

रामखिलावन ला समझ नई परिस, फेर ओ सब्द मन भीतर उतर गिन।

बरसात आय गीस। धान बोइस, सुखाइस।

सुंदरी अब कम बोलय।

पहिली ओ गाना गावत रिहिस, कोदो पीसत-पीसत। अब चुपचाप जांता घुमावय। रामखिलावन ला डर लगय - लड़की के चुप्पी सबसे भारी बोझा आय।

एक रात दाई किहिस -

“बेटा, घर के पिछला बाड़ी बेच दे। बिहाव कर दे।”

रामखिलावन तिलमिला उठिस – “बाड़ी बेच देहूं? फेर खाबो का?”

“लड़की घर मा बइठे रहिही त मोर आंखी कइसे मुंदही?”

रामखिलावन बाहिर निकल गीस। बर छइंहा बइठ गीस।

दूर कोनो घर मा फेर गीत  रिहिस -

“ओ सुंदरी ला लाते मंय बिहाव...”

ओला लगिस, गीत ओखर मजाक उड़ावत हे।

इही बीच गांव मा नया नौजवान आय शंभूनाथ। शहर मा पढ़हे रिहिस, नौकरी खोजत रिहिस, घर किसान के।

शंभूनाथ हर सुंदरी ला देखे रिहिस, फेर नजर झुकाके निकल जात रिहिस। गांव के संस्कार मा सीधा बात नई होय।

एक दिन कुआं पार मा पानी भरत सुंदरी के गगरी गिरगे। 

शंभूनाथ गगरी ला उठाय लगिस।

“धन्यवाद,” सुंदरी धीरे ले किहिस।

“धन्यवाद नई, गांव वाले मन हाबे,” शंभूनाथ किहिस।

बस इही बात। फेर सुंदरी दिन भर मुसकावत रिहिस।

कुछ दिन बाद शंभूनाथ अपन दाई संग रामखिलावन के घर आइस।

रामखिलावन चौंकिस।

शंभूनाथ के दाई किहिस - “बात कहे बर आय हवन।”

रामखिलावन समझगे, फेर भरोसा नई होइस।

शंभूनाथ सीध्धा किहिस - “कका, मोला सुंदरी पसंद हवय।”

घर मा सन्नाटा।

दाई के हाथ कांपत रिहिस।

रामखिलावन पूछिस - “तोर घर वाले मन...?”

“मोर घर मा दाई हवय। ददा नइहे। फइसला हमन करथन।”

रामखिलावन के गला सूखागे।

“का चाही?”

शंभूनाथ हंसिस - “सुंदरी।”

रामखिलावन फिर पूछिस - “अउ?”

“अउ कछु नई।”

रामखिलावन के आंखी भर आइस।

उही बेरा ओखर कतरो साल के जमाय जहर पिघलना शुरु होइस।

फेर गांव इतना आसान कहां रहिथे।

दूसर दिन चौपाल मा बात उठगे।

“ शंभूनाथ पगला गे हवय।”

“बिना दहेज बिहाव?”

“लड़की मा कुछ गड़बड़ होही।”

“गरीब घर ले नाता जोड़े बर कोनो कारण होथे।”

लोगन ला सीधा अच्छाई पर भरोसा नई होवय।

मास्टर नरबदा प्रसाद हंसिन - “जब चोरी होथे, सब मान लेथें। जब भलाई होथे, सब शक करथें।”

शंभूनाथ के कका आ धमकिस।

“हमर खानदान के नाक कट जाही।”

शंभूनाथ पूछिस - “नाक कहां लगाय हव ? गाड़ी मा ?”

“बिना लेन-देन बिहाव नई होवय।”

“त आप मन लेन-देन कर लव, मंय बिहाव करत हंव।”

“हमर बर कुछ नई?”

“आशीर्वाद देवव।”

कका तमतमाके चल दिस।

राखिलावन घबराय लागिस।

“ शंभूनाथ, मोर कारन तोर घर मा झगड़ा नई होवय।”

शंभूनाथ किहिस - “कका, झगड़ा मंय नई करत हंव। झगड़ा पुराना सोच करत हवय।”

सुंदरी चुपचाप ओ बात सुनत रिहिस। ओखर आंखी मा पहली दफा भरोसा चमकिस।

बिहाव के दिन तय होगे - फागुन मास, दूज के दिन।

गांव मा हलचल।

कतको लोगन मन देखना चाहत रिहिन - बिना दहेज बिहाव कइसने होथे?

जइसे कोनो तमाशा होय।

मड़वा सधारन बनिस। न जियादा सजावट, न बैंड बाजा के दिखावा। गांव के मोटियारी टूरी मन, महिलामन, अपन मन ले जुट गिन।

सुंदरी के दाई किहिस - “कुछ त देना चाही।”

रामखिलावन किहिस - “देहूं, अपन मान।”

दाई चुप होगे।

फेर रात मा चुपके ले पुरखा के चांदी के पायल निकाल दिस - “एला पहिरा देबे।”

रामखिलावन मना नई कर पाइस।

बिहाव के दिन बिहान ले गीत गावन लगिस -

“दे तो दाई, दे तो दाई अस्सी रुपईया...”

फेर आज सुर बदलगे रिहिस।

हंसी नई, चुटकी नई।

आज गीत मा अपनापन रिहिस।

मास्टर किहिन – “आज अस्सी रुपइया के मतलब नेग नई, प्रतीक हवय। समाज ले मांग  थोकिन समझ दे, थोकिन इंसानियत दे।”

बारात आय।

न घोड़ा, न डीजे, न पटाखा।

शंभूनाथ साधारण धोती-कुरता मा। संगी संगवारी मन संग हंसत-गावत।

गांव के बूढ़वा सियान मन कानाफूसी करत रिहिन - “एला बारात कहिथे ?”

मास्टर जवाब दिन - “जेन मा शोर कम, सम्मान जियादा  ओला बारात कहिथे।”

मंडप मा सुंदरी आइस। पीला लुगरा, माथा मा सिंदूर के आस, आंखी मा डर अउ उजाला दूनो।

रामखिलावन ओखर हाथ पकड़िस। हाथ कांपत रिहिस।

“डर मत,” किहिस।

सुंदरी मुसकाइस – “तंय डरथस।”

रामखिवावन हंस परिस, बरसों बाद खुलके।

फेरे शुरु होइस।

पंडित मंत्र पढ़त रिहिस, फेर गांव के महिलामन के गीत जियादा असरदार रिहिस।

“ओ सुंदरी ला लाते मंय बिहाव...”

रामखिलावन ला लगिस, ये गीत अब ओखर पीड़ा नई, विजय गाथा आय।

फेरा के बाद शंभूनाथ सबके सामने किहिस -

“आज मंय एक बात कहत हंव। जेमन सोचथें दहेज ले घर बनथे, ओ मन देखंव  घर भरोसा ले बनथे। सुंदरी हमर घर आवत हवय, समान नई।”

सन्नाटा।

फेर मास्टर ताली बजाइन। धीरे-धीरे सब बजाइन।

फेर एक घटना होइस।

शंभूनाथ के कका उठके किहिस - “कम से कम रस्म बर कुछ नगद देवव।”

रामखिलावन के चेहरा उतर गे।

सुंदरी के आंखी भर गिस।

शंऊ आगू बढ़िस - “कका, जरुर देही।”

सब चौंक गिन।

शंभूनाथ अपन जेब ले अस्सी रुपईया निकालिस, काका के हाथ मा धरा दिस।

“लेवव। गीत मा जऊन अस्सी रुपईया हवय, ओही सही। अब संतोष होइस?”

पूरा मंडप हंसी ले गूंज उठिस।

कका लाज के मारे चुप होगे।

मास्टर किहिन – “आज इतिहास बनिस।”

विदाई के बेरा सबसे कठिन घड़ी आय।

दाई रोवत रिहिस।

रामखिलावन रोना रोकत रिहिस।

सुंदरी किहिस - “ददा, मंय बोझा रेहेंव का?”

रामखिलावन चौंकिस - “का कहितस बेटी सुंदरी ?”

“तोर आंखी देखके लगथे।”

रामखिलावन फूट परिस।

“तंय बोझा नई रेहेस ओ ... समाज के सोच बोझा रिहिस। तंय तो मोर सहारा रेहेस।”

सुंदरी घलो रो परिस।

बारात चल दिस।

धुर्रा उड़ियाय लगिस। 

बइलागाड़ी के चक्का घूमिस। गीत दूर जावत रिहिस।

रामखिलावन परछी मा खड़े होके देखत रहिगे।

मास्टर ओखर कंधा मा हाथ धरिन - “अब हलका लागथे?”

रामखिलावन किहिस - “हव... फेर खाली घलो।”

“खालीपन नई, जगह बनिस। अब दूसर बदलाव भरही।”

दिन बीतिन।

सुंदरी अपन घर मा सुख के जिनगी बिताय लगिस । शंभूनाथ ओखर पढ़ई ला फेर शुरु करवाइस।

 गांव के पढ़इया लइका मन बर संझा पढ़ई केंद्र खोलिन। सुंदरी अब दूसर लइका मन मन ला लिखना-पढ़ना सिखावय।

गांव के लोगन कहे लगिन - “गरीब घर के लड़की मास्टरनी बनगे।”

मास्टर हंसिन - “लड़की हा नई, सोच हा मास्टरनी बनगे।”

धीरे-धीरे गांव मा असर परे लागिस।

पड़ोसी घर के बिहाव मा एक किसान किहिस  “हमन दहेज नई लेबो।”

दूसर किहिस - “हमर बेटी बर मांग करे वाला घर नई चाही।”

तीसर किहिस - “बिहाव मा खरचा आधा करबो।”

जऊन बात असंभव लगत रिहिस, ओहर धीरे-धीरे रिवाज बनत गिस।

एक बछर बाद फागुन मा फेर गांव मा बिहाव रिहिस।

रामखिलावन अब गीत सुनके मुसकावत रिहिस।

गांव के नारी परानी मन गावत रिहिन -

“दे तो दाई, दे तो दाई अस्सी रुपईया,

ओ सुंदरी ला लाते मंय बिहाव...”

कोनो  पूछिस - “कका, ए गीत मा अस्सी रुपईया काबर?”

रामखिलावन किहिस -

“बेटी, रकम बर नई।

सुरता राखे बर।

जेन दिन मनखे पइसा ले जियादा इज्जत ला चुनिस, ओ दिन के सुरता बर।”

नोनी हा नई समझिस, फेर मुसका दिस।

रात मा रामखिलावन अपन परछी मा अकेल्ला बइठिस। चांद ऊपर रिहिस। हवा मा महुआ के गंध।

ओला सुंदरी के बचपन सुरता आगे - नंगे पांव दौड़ना, माटी के गुड़िया बनाना, दाई के पाछू छुपना, चूल्हा फूंकते-फूंकते गुनगुनाना।

फेर ओ सोचिस - बेटी मन घर ले जाथें, फेर घर खाली नई करय। ओ मन घर के मतलब बदल देथें।

दूरिहा ले शंभूनाथ अउ सुंदरी आइन। उदुपहा।

“ददा!” सुंदरी आवाज देइस।

रामखिलावन उठके खड़ा होगे।

“अरे, बताय बिना?”

सुंदरी किहिस - “आज फागुन हवय। अपन गांव मा गीत सुने बर आ गेवं।”

शंभूनाथ नगाड़ा ले आइस।

परछी मा सब जुट गिन -

 दाई, मास्टर, पड़ोसी  अउ तीर तखार के लइका मन।

फेर गीत शुरु होइस।

“दे तो दाई, दे तो दाई अस्सी रुपईया...”

फेर ये दफा सुंदरी बीच मा नई रुकिस। ओ अपन पंक्ति जोड़ दिस -

“दे तो दाई, दे तो दाई थोकिन समझदारी,

ओ बेटी ला देवव मान-सम्मान भारी...”

सब ताली बजाइन।

मास्टर किहिन -  “अब गीत पूरा होइस।”

रामखिलावन आसमान देखिस।

ओला लगिस, कुम्हारखान गांव अब पहिली जइसे नई रिहिस।

माटी उही, लोग उही, खेत उही  फेर सोच बदलना शुरु होगे रिहिस।

अउ बदलाव हमेशा नारा ले नई,

कभू-कभू एक बिहाव ले घलो सुरु  होथे।

          - डुमन लाल ध्रुव 

    मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

        पिन - 493773

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