Thursday, 30 April 2026

सोंच ------- हलो!

 (लघुकथा )


सोंच

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हलो!

हाँ--हलो।

मनसुख हा देखिच ता ओकर छोटे बहन दमाँद पंकज हा फोन करे राहय।

"हलो भइया--मैं पंकज बोलत हँव। तोर तबियत अभी कइसे हे?"

"ठीक हे भाई फेर उतार-चढ़ाव चलत हे।कमजोरी अबड़ लागथे। दू-चार दिन मा बुखार तको आ जथे।"

"ओह!-- देख भइया, जान हे त जहान हे। तबियत कोती बने ध्यान रखबे। जादा कोनो चिंता झन करबे। पइसा-कौड़ी लागही त बता, पहुँचाले ला आ जहूँ।"

"नहीं भाई, अइसे कोनो बात नइये। तैं परेशान झन हो। जरूरत परही तब तो गोहराबे करहूँ"--मनसुख हा कहिच।

"अभी कहाँ हच भइया --ट्रेन कस अवाज आवत हे?"

"हाँ भाई, ट्रेन मा हँव--डॉ सो चेक करवाये बर भिलाई आवत हँव।"

"कोन कोन हव भइया?सेवक हा होही त बात करवा तो?"

अब तो मनसुख हा भारी असमंजस मा परगे।कइसे बतावय के बेटा सेवकराम हा संग मा नइये। उही हा तो ट्रेन मा ये कहिके अकेल्ला भेजे हे के अब पापा ह आये-जाये के लइक होगे हे। ईलाज करवाके आ जही।थोकुन सोंच के बोलिच-- "अकेल्ला आवत हँव भाई। कतेक दिन ले कोन हा संग मा आही-जाही। "

" तैं कइसन आदमी हच गा। तोर शरीर हा एकदम कमजोर होगे हे।चककर -उक्कर आगे त? घर के मन ला तको सोंचना रहिसे। तैंहा भिलाई मा उतर के स्टेशने मा रहिबे। मैं आवत हँव- गाँव ले आये मा आधा घंटा ले जादा नइ लागय। " --- कहिके वो मोबाइल ला काट दिच।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

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