Thursday, 30 April 2026

टेलीपैथी

 टेलीपैथी 


महिना दिन होगे रहिसे,  भाई  बहिनी ल गोठियाए। सबो झन जानत हन आज कल सबके हाथ म मोबाइल रहनाच हे। मुॅंह ले झन बात करौ, व्हाट्सएप म चैटिया लौ। मैं चैटियाए घलो नइ रेहेॅंव। भाई मन मुॅंगेली म रहिथें त बहिनी मन भाटापारा,  रायगढ़ मा। 


रायगढ़ वाले बहिनी के मोबाइल  नंबर डायल करेॅंव। उठाइस बहिनी, ओती ले कुछु कहितिस ओकर ले पहिली मोरे मुॅंह ले निकलिस "पा लगत हौं बहिनी" बहिनी चाहे छोटे होय या बड़े, बड़ पबरित रिश्ता होथे। 

तुरते आशीर्वाद मिलिस "खुश रहिए भैया। कितने दिनों से आपको याद कर रही थी... और तो और, अभी अभी ही आपके नाम की चर्चा भी हो रही थी। टेलीपैथी कितनी तगड़ी है न। हमने याद किया और आपका कॉल आ गया।"


मैं मन मा सोचेॅंव टेलीपैथी के नाव लेके  कइसे भुलवावत हे मोला। खुद बात नइ करय, महीनों सुरता नइ आवय। एती ले भैया सुनावय झन कहिके बोचकत हे। कहत हे मोर अभिच्चे सुरता करते रेहेॅंव। 


का बतावॅंव अइसन जवाब घेरी बेरी सुने बर मिलय त समझ म आथे के बहिनी के तकिया कलाम आय अइसन कहई हर। टेली-ओली-पैथी कॉंही नोहै कहिके। फेर पतियाये ल परथे जब एकर प्रमाण ऑंखी के आघू म दिखथे। मैं खुद परछो पाय हॅंव। एक दिन लइकइ के सुरता करत मगन रहॅंव। भाई बहिनी के गॉंव म बीते बचपना के। खैरागढ़ ले आठ किलोमीटर दुरिहा वो पॉंड़ादह गॉंव जिहॉं मैं आठवीं तक पढ़ेंव। फेर हाई स्कूल बर मुॅंगेली आ गेॅंव। त कइसे भाई बहिनी झगरन, संग म खेलन।


ए सुरता म मैं बूड़े रहॅंव के मोबाइल नरियाये लगिस। देखथॅंव रायगढ़ वाले बहिनी फोनियाय हे। पैलगी करत अतेक हॅंसेंव। ओहू हॅंसे लगिस अउ कहत हे "भैया क्यों हॅंस रहे हैं? लगता है आप भी मुझे ही याद कर रहे थे। देखा न टेलीपैथी का कमाल"। अइसे नइए के ओला छत्तीसगढ़ी नइ आवय। फेर ओकर बिहाव होय हे उत्तर प्रदेश वाले सगा मन इहॉं, जहॉं छत्तीसगढ़ी म बात नइ करॅंय। तेकरे पाय के ओ कथे के ओला हमर गुरतुर बोली म गोठियाए बर अलकर लगथे।


खैर! त मोला ए भगवान के बनाए टेलीपैथी ए लगथे।  जब हम अपन रिश्ता नाता, संगी सॅंगवारी के दिल से सुरता करथन त उंकर तक संदेश पॅंहुचबे करथे। सोचथौं, फरियाये मन से अपन अपन भगवान ल सुमिरबो त ओकरो मेर खबर पॅंहुचबे करही, मैं कथौं खच्चित पॅंहुचथे।

मनखे के संकटकाल म रक्षा करे बर हमरे बीच के कोनों न कोनों ल अपन दूत बना के भेजथेच।


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सूर्यकांत गुप्ता, जुनवानी, भिलाई (छत्तीसगढ़)

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