(लघुकथा )
दोगला
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स्टेशन के टी स्टाल मा चाय पियत खड़े रहेंव ओतके बेर एक झन बुजुर्ग जेन पहनावा ले कोनो गाँव के रहइया कस दिखत रहिसे आइस अउ दू ठो बिस्कुट के पैकेट खरीद के दुकान वाला ला कहिच--
"बाबू दे दवई ला गाड़ी के आवत ले तोर फ्रिज मा रख देबे का? डाक्टर हा येला गरम झन होवय कहे हे।एक दू घंटा बर ठंडा हो जही।"
"नहीं। इसमें दवाई वगैरह रखने की इजाजत नहीं है। वहीं से आइस पैक करवा के लाना था।"--दुकानदार कहिस।
"लकर धकर मा भुलागेंव बाबू। स्टेशन के मेडिकल दुकान मा नइ मिलीच। कोनो जगा ठंडा पानी पाउच तको नइ मिलिच। तोर करा होही त बिसा लेहूँ।"
"यहाँ नहीं मिलेगा। जाओ उधर खोज लो।"
हव बाबू काहत बुजुर्ग हा चल दिच। ओतके बेर एक झन अउ अइच तहाँ ले आन भाषा मा बात करिन जेन मोला समझ मा नइ आइच। तहाँ ले वो मनखे हा बेग ले दू ठो बाटल जेला देखेंव ता बियर के रहिसे निकाल दे दिच अउ दुकानदार हा फ्रिज मा रख देइच।
दुकानदार हा तो निचट दोगला निकलिच।
चोवा राम वर्मा 'बादल '
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