मानवता बर बुद्ध जरूरी हे
भारतवर्ष हा युद्ध नहीं बुद्ध के धरती आय। तेकर सेती हमर देश हा बम,गोला,बारूद नाम के हथियार मन ले युद्ध लड़े मा ज्यादा ला कहिबे थोरको रुचि नइ लेवय। अउ न अड़ोस-पड़ोस के दूसर देश-मन ला कभू हुदरे-कोचके के बूता करय। हमला मतलब भी का हे, काकर सन फोकट लड़बे-मरबे। सब खइत्ताच-खइत्ता तो आय। हमर बर तो उही सूक्ती वाक्य मन हा धरोहर आय जेन ला तथागत बुद्ध हा "अप्प दीपो भव" अउ भक्तिकाल के महान कवि अउ समाज सुधारक कबीर दास जी हा हमन ला कतको पहिली बता-चेता के चल देहे।
"कबीरा खड़े बजार में, माँगे सबकी खैर।
ना काहूँ से दोसती, ना काहूँ से बैर।।
आखिर लड़े-खपे मा नुकसानेच नुकसान तो हवय। ये अलग बात आय कि हमर परोसी देश पाकिस्तान हा अपरोक्ष रूप ले युद्ध के नेत-घात बनाय बर लाइफटाइम पुच्च-पुच्च कूदत रहिथे। फेर ओला का कहिबे "नक्टा के नाक कटाय सवा हाथ बाढ़े।" अस्सी साल होगे हे तभो ले ओकर जीछुट्ठई हा आज ले नी गेहे। पता नइ ओकर झोझपरूक इमेज ला देखे के ये विश्व के नजरिया हा का हे तेला उही मन जाने। फेर येमे कोई दोमत नइहे ये घेक्खर-बानी के डिंगहा पड़ोसी हा आतंकवाद के खतरनाक पाठशाला आय। येकर एकसूत्रीय कार्यक्रम रहिथे आतंकवादी-मन ला पाल-पोष के हमर डहर बरोना अउ शांति के टापू मा अशांति के बीज बोना। ये नक्टा ले भला अउ का उम्मीद कर सकथस। फेर सदा तटस्थ रहइय्या हमर देश हा जादा लाहव लेथें तेन मन ला चुक्ता निपटाय के कलेजा घलव रखथे।
येती बाकी दुनिया ला झाँक के एक नजर देख लेहूँ कहिबे ता तँय काला देख डारबे। सही कहिबे ते अब तो एक नजर नहीं पूरा नजर भर जगजग ले देखे के जरवत हे। कहुँ दुनिया ला नजर भर के नइ देखेस मतलब "आ बैल मुझे मार" वाले समस्या पैदा होय के संभावना प्रबल हो सकथे। विज्ञान अउ तकनीक के युग मा एक देश ला दूसर देश ले हमेशा मिलजुल के रहना पड़थे। आपस मा जरवत के चीज-बस के लेनी-देनी के बिना ककरो गाड़ी हा कैसे आगू बढ़ सकथे भला.। फेर यहू मेर टैरिफ के लफड़ा हा बड़े जन समस्या बनके आगू मा खड़े हो जथे। मादबर (शक्तिशाली) देश मन लिल्हर देश-मन ला मनमाने टैरिफ लगाके उनकर कनिहा ढिल्ला कर देथें। "जेकर लउठी तेकर भैंस" के दशा मा टुटपूँजिया मन ला सबे डहर ले गुदलानाच पड़ जथे।
ये दुनिया के रीत हा घलव बड़ अजीब हवय। छोटे कहस चाहे बड़े सबो देश मन बड़े-बड़े मिसाइल ला पोटार के बैठे हवँय। उनला कन्हो पूछ परबे तब उनकर एके जुवाब रहिथे " हमला शांति स्थापित करे बर येकर जरवत पड़थे तेकर सेती येला पोटार के धरे हन।" मने शांति बर हथियार, असल मा आजकल इही हा हर देश के 'टैग लाइन' बनगे हे। मादबर देश-मन के चाल-चरित्तर हा बड़ खतरनाक रहिथे। दू पड़ोसी देश के बीच मा आपसी मित्रता ला दुश्मनी मा बदलना जइसे इनकर-मन के जन्म सिद्ध अधिकार होगे हे। दू पड़ोसी ला आपस मा लड़वाव अउ परेटहा परे अपन मुरचाहा हथियार-मन ला मनमाने कीमत मा बेचके क्षेत्रीय असंतुलन के रोपा लगाव। दू देश ला मुनुबिलई कस लड़वा के रोटी पोवई के बूता ला कोई इही बेंदरा मन ले सीखे। सही कहिबे ते ये युद्धवादी दुष्ट-मन बेंदरा नहीं रेड़वा आँय। रोटी पोवई के बात ला सुन के तो आजकल तन-बदन मा कारी पसीना छूट जथे।
जिहाँ तक युद्ध के सवाल हे, येकर गोठ-बात करे मा हुरहा इतिहास के सुरता घलव आ जथे। काला गोठियाबे पहिली के राजा-महराजा मन अपन वर्चस्व स्थापित करे बर आपस मा रात-दिन युद्ध लड़त रहँय। इतिहास ला पढ़बे तब अचंभो के संग गुस्सा घलव आ जथे। राजा-महराजा मन कन्हो सुंदर राजकुमारी ला देख डरतीन । तब ओकर संग जबरदस्ती बिहाव करे बर युद्ध के मैदान मा कूद परँय। एक राजा हा दूसर राजा ला निपटायेच के सोचत रहँय। मने आपस मा एक-दूसर ले लड़त रहँय। तेकर सेती ये देश मा सिकंदर, शक, हूण, ले लेके बाबर, नादिरशाह जैसे आक्रांता मन इहाँ धमक दीन। अउ इहाँ के राजा मन ला युद्ध मा परास्त करके अपन साम्राज्य स्थापित करत गीन। येकर ले भारत के अखंडता हा धरे के धरे रहिगे। आज लोकतंत्र मा राजा-महराजा मन तो नइहें। फेर जात-धरम के कुटेलहा-मन हा इहाँ समय-समय मा अपन फन फैलावत देश के भाईचारा ला डसे के उदीम मा लगे रहिथें।
आज विश्व के घलव इही दशा हे। सैन्य क्षमता मा ताकतवर देश अपन ले कमजोर देश ला ऐन-केन प्रकारेण दबाय के उदीम मा लगे रहिथे। इनकर-मन के एके मकसद रहिथे या तो हथियार बेचव नइते ओ देश उपर कब्जा करव। उदाहरण सरूप रूस अउ यूक्रेन के युद्ध ला देख लव। ईसराइल अउ फिलिस्तीन, अमेरिका अउ ईरान के बीच युद्ध के मुख्य कारण तो इहीच हे न। येमन अपन हित के खातिर दूसर ला घाटा सहे बर मजबूर कर देथें।जब पेट्रोलियम उत्पादक देश-मन हा ये युद्ध मा शामिल हो जथे।तब तो येकर पीड़ा ला सरी दुनिया ला सहनाच पड़थे।आज अमेरिका अउ इजराइल हा मिलजुल के ईरान मा युद्ध के स्थिति पैदा कर दे हें। अमेरिका के तो एके उद्देश्य रहिथे खुद के हित। अपन हित पर वोहा कुछ भी कर गुजरे बर तैयार रहिथे। वोकर बर न तो कोई स्थाई मीत हे अउ न कोनो स्थाई बैरी। मने "अपन काम बनता, भाड़ मा जाय जनता।"ये दुनिया हा दू ठन विश्व-युद्ध के दंश ला दस साल तक झेल चुके हे तभो ले ककरो चेत नइ चढ़े हे।अभी रूस अउ यूक्रेन के बीच लगभग चार साल ले युद्ध चलत हे। ये लंबा अउ थकाऊ युद्ध ले रूस हा यूक्रेन के क्रीमिया अउ डोनवास मा कब्जा जमा चुके हे। ड्रोन अउ मिसाइल ले हमला जारी हे।
एक मार्च 2026 के वो काला दिन के सुरता करई हा घलव बड़ महत्व के हवय। जब मानवता के ढोंग रचइया अमेरिका हा खुद युद्ध के अँधरौटी मा अमानवीय अत्याचार करे ले पीछू नइ घूचिस। ओ दिन बिहनियाच ले स्कूल गय ईरान के एक सौ बहत्तर झन विद्यार्थी बेटी-मन उपर बम गिराके खुलेआम नरसंहार कर दिस। दुनिया मा येकर ले बढ़के अमानवीय अत्याचार अउ का हो सकथे। ओती रूस अउ यूक्रेन मा घमासान मातेच हवय। पड़ोसी देश के व्यवहार ले अइसे लगथे कि कब युद्ध के हालात बन जही कुछु कहे नइ जा सके। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच मा युद्ध के हालात तो बनेच हवय। सोचबे तब अइसे लगथे जनो- मनो पूरा दुनिया हा युद्ध के मुहड़ा मा माढ़े हवय।कहुँ महाशक्ति संग तोर मितानी होगे तब तो बल्ले-बल्ले हे, तँय कुछ भी कर सकथस। काबर कि महाशक्ति हा तो उही मितान ला अपन अस्त्र-शस्त्र बेचे के जुगाड़ मा रहिथे। इही मितानी के परसादे अफगानिस्तान उपर होय हमला ला आत्मरक्षा के अधिकार कहिके पाकिस्तान ला क्लीन चिट दे दिस। सबे मन जानथव पाकिस्तान हा अमेरिका के पोसवा आय। मतलब "चित भी मेरा पट भी मेरा अंटा मेरे बाप का"।
संचार के जमाना मा घर बैठे सरी दुनिया के शोर-खबर ला देख सुन सकथव। फेर मनखे-मन के आदत हा पड़ोसी घर ला ताँके-झाँके के जादा रहिथे। पुरखा-सियान मन के कहना रहिस कि कभू अपनो घर ला झाँक के देख ले करव रे बाबू हो। शुरू-शुरू मा हमला ये बात के रहस्य हा समझे मा नइ आत रहिस। फेर सोशल मीडिया ला झाँके मा जम्मों बिसकुटा के खइरपा हा अपने-अपन खुलत गीस।
इही सोसल मीडिया हा आजकल धरम-जात अउ वर्ग-भेद के नवा अध्याय वाला अखाड़ा बनगे हवय। येकरे आड़ मा दबंगई के खुलेआम खेल चलत हे।गाली-गलौच के उत्पादन अउ वितरण केंद्र के रूप मा येकर इस्तेमाल हद ले जादा होवत जात हे। मनखे समाज मा अब समरसता के भाव हा खंडित होय कस जनाथे। काबर कि कोई ला जातिगत गाली देना हे, तलवार लहरावत प्रदर्शन करना हे तेकर बर अब ये धरती हा बड़ उर्वरा होगे हे। कते हा प्रधानमंत्री जैसे पद मा बैठे व्यक्ति ला जातिगत गाली देवत समाज मा अपन विशिष्टता प्रमाणित करे के होड़ मा लगे हे। कते हा बाबा अंबेडकर ला गरियावत हे, त कते हा समाज-सुधारक महापुरुष मन के मान-मर्दन करके अपन औकात दिखावत हे। तब लिल्हर लुरू-बुटु मन के का हालत होवत होही तेकर सहज अंदाजा लगाय जा सकथे।समझ मा ये नइ आवय कि येमन ला अइसन करे के साँस-पानी कहाँ ले मिलत हे। तलवार लहरावत कोई भी ला मारे-काटे के फतवा जारी करे के हिम्मत हा तो जगजाहिरे हे। अउ कमजोरहा मनखे-मन अंगरीच दिखा दिही ओतकीच मा अइसे ओइला देथे ते ओकर जमानत मिलना मुश्किल हो जथे। कते हा हिंदू देवी-देवता उपर अभद्र टिप्पणी करत हें ता कते हा दूसर धरम उपर घटिया टिप्पणी करके सुर्खी बटोरत हे। इहाँ संविधान अउ धार्मिक ग्रंथ मन ला चीर-फाड़ करे ले बाज घलव नइ आत हें।महापुरुष मन के मूर्ति-मन ला खंडित करके धौंस जमाय के नवा संस्कृति के उदय होवत हे।
आजकल अइसे लगथे मानो सोसल मीड़िया मा अपन विशिष्टता सिद्ध करे बर साइबर युद्ध लड़े जात हे। आप-मन खुदे अनुमान लगा सकथो कि येहा डिजिटल इंडिया मा दबंग लोकतंत्र के नवाचार आय कि अत्याचार। या कि राजतंत्र के लहुटती के आरो। सोचव सुम्मत,समता ,एकता अउ भाईचारा के भाव ला खंडित करे के हिम्मत कहाँ ले आवत हे। दुनिया ला झाँक के देखस चाहे अपन घर ला। सबो मूड़ा मा वर्चस्व के युद्ध छिड़े हवय। दुनिया ला सुधारे बर तो नाटो जैसे बड़े-बड़े संस्था हवय। फेर वोहा अपन ऑंखी ला मुँदे हे कि उघारे हे उही जाने। येती अपन घर के समस्या-समाधान बर कोई मसीहा के इंतजार करे ले अच्छा अपन हिस्सा के समरसता के काम ला खुद ला करना पड़ही। नइते अइसन विध्वंसक सोच के कीमत ला ये देश हा आखिर के घाँव ले चुकाही।
महेंद्र बघेल डोंगरगांव
No comments:
Post a Comment