पानी के पीरा
- डुमन लाल ध्रुव
हप्ता दिन पहिली घर के भीतरी कोठरी मा एक अजीब हलचल चलत रिहिस।
दाई अपन पुराना संदूक खोले बइठे रिहिन अऊ मोटरी उपर मोटरी बांधत रिहिन। कभु एकठन मोटरी ला खोले त कभू दू ठन मा सामान धरे। कोन मोटरी मा पूजा के फूल, धूप अऊ अगरबत्ती, कोन मा रद्दा भर भूंजे - चना, गुड़ अऊ टिकिया, त कोन मा कपड़ा-लत्ता। हर जिनिस ला वो अइसने सहेज-सहेज के धरत रिहिन जइसे कोनो बहुमूल्य धरोहर होवय।
जमुना हा ओ कोठरी के दुवार मा खड़े-खड़े सब देखत रिहिस।
दाई के हाथ कांपत रिहिस, फेर आंखी मा एक अजीब चमक झलकत रिहिस।
ओ चमक मा बरिस भर ले दबे एक अधूरा सपना के उजाला रिहिस।
उदुपहाइ दाई हा एक ठन छोटे मोटरी ला धिरलगहा खोलिन।
ओ मोटरी मा एक ठन नीला पगड़ी रिहिस।
दाई ओला हाथ मा धरके कुछ देर तक निहारत रिहिन।
ओ पगड़ी सिरिफ कपड़ा नइ रहिस; ओमा सियान बबा के सुरता, ओखर संग बिताय जिनगी अऊ एक पूरा समय बंधे रिहिस।
थोरिक देर बाद दाई चुपचाप पगड़ी ला फेर बांध के मोटरी मा धर दीन।
जइसे कोनो स्मृति ला फिर से मन के भीतर सहेज लेवय।
गरमी के छुट्टी मा जमुना गांव आय रिहिस।
रइपुर के एक हाईस्कूल मा वो शिक्षिका रिहिस। पढ़े-लिखे, समझदार अऊ आधुनिक सोच वाली लड़की।
घर पहुंचते ही ओखर मइया धीरे से कही दिस -
“देख बेटी, डोकरी के बात मा जादा धियान मत देबे।
अब उमर होगे हे ओखर। कहिथे के कोनो मोला राजिम संगम नहाय बर ले चल दे, त मोर आत्मा ला चैन मिल जाही।”
जमुना कुछू नइ किहिस।
मइया फेर कहिस -
“इतना पढ़-लिख गे हस, मास्टरनी बन गे हस, फेर अब अइसन बात मा यकीन करथस? नदी मा नहाय ले कोनो पाप धुलथे ?”
जमुना चुपचाप मइया के मुंह देखत रिहिस।
ओखर मन मा धीरे-धीरे एक प्रश्न उठिस -
का बूढ़ा होय के बाद मनखे के इच्छा के कोनो कीमत नइ रहे ?
उही दाई तो रिहिन जेन रतन के जनम पर पूरा गांव भर लड्डू बांटे रिहिन।
उही दाई तो रिहिन जेन ददा के बीमारी के बखत चार दिन तक खुद भूखे रहिके पूजा-पाठ करत रिहिन।
आज वही दाई…
घर मा “डोकरी” कहे जाथे।
जमुना के मन मा एक कसक उठिस।
सांझा जब रतन खेत ले लहुटिस अऊ ददा हा ट्रैक्टर ला गैरेज मा रखके घर आइन, तब जमुना धीर से अपन निरनय ला बता दिस -
“दाई ला मंय राजिम संगम नहाय बर ले जावंव।”
घर मा कुछ देर बर सन्नाटा छा गे।
रतन उछाह मा किहिस -
“दीदी, मंय घलो संग चलहूं।”
जमुना मुस्कुरा के किहिस -
“तंय अभी छोटे हस।
अतेक लंबा सफर मा तोला संभालना मुश्किल हो जाही।”
रतन चुप होगे।
मइया के मुंह उतरगे।
रात मा धीर लगाके किहिस -
“पूरा महीना के तनखा लाइ खरचा कर देबे?
नदी मा नहाय ले कोन पाप धुलही ?”
जमुना खिड़की ले बाहिर अंधियार देखत रिहिस।
फेर धीर लगा के किहिस -
“मइया, पाप धुले या नइ धुले, ए बात अलग आय।
पर दाई के मन मा बरिस भर ले जऊन इच्छा दबे हे, ओला पूरा हो जाना चाही।”
दूसर दिन दूनो राजिम परयाग बर निकल गेन।
रात भर छुकछुकिया के आवाज अऊ झटका मा सफर कटिस।
दाई खिड़की ले बाहिर अंधियार मा भागत खेत-खार देखत रिहिन।
कभू-कभू अपन मोटरी छूवत रहय।
जइसे पगड़ी के भीतरी सियान बबा के उपस्थिति महसूस करत होही।
जमुना समझ जात रिहिस -
दाई के मन अभीच राजिम संगम पहुंच गे हे।
बिहनिया जब सूरुज नरायण के पहिली किरन नदी के पानी ऊपर चमकिस, तब घाट मा हजारों मनखे भीड़ लगाए खड़े रिहिन।
कोनो मंत्र पढ़त रिहिस,
कोनो फूल पतरा बोहावत रिहिस,
कोनो श्रद्धा ले डुबकी लगावत रिहिस।
दाई धीरे-धीरे पानी काठे आइन।
जमुना किहिस -
“दाई, ओ डहर चल। उहां भीड़ कम हे।”
दाई मुस्कुरा दिस।
ओ मुस्कान मा अजीब विश्वास रिहिस।
जइसे उहां सच मा सियान बबा के आत्मा कहीं पास मा होवय।
जइसे ही दाई पानी मा पांव धरिन, वो अचानक ठिठक गइन।
“ जमुना … कुछू टकराइस।”
जमुना पानी मा उतरिस।
पानी मा फूल, माला, पत्तल, दीया अऊ फूटहा मटकी तैरत रिहिन।
पानी रंगीन जरुर रिहिस,
पर साफ नइ।
जमुना अंदर हाथ डारिस।
अचानक ओखर हाथ कोनो नरम चीज ले टकराइस।
वोहर घबरा के चीख पड़िस।
हाथ मा नवजात शिशु के निरजीव देह रिहिस।
इतना छोट…
इतना शांत…
जइसे अभी-अभी नींद मा डूबे हवय।
जमुना के आंखी ले आंसू गिर पड़िस।
“दाई… लोगन अइसन काबर करथे ?”
दाई कुछ देर चुप रिहिन।
फेर भारी आवाज मा कहिन -
“जब मनखे अपन करम गति ले डर जाथे,
त नदी ला अपन पाप के बोझ ढोए के साधन बना लेथे।”
दूनो दूसर घाट मा चल दिस।
फेर उहां घलो विही हालत।
कचरा, कपड़ा, माला, दीपक।
उदुपहा एक ठन मुरदा देह पानी मा बोहात दिखिस।
नंगा अऊ असहाय।
जमुना घृणा ले नजर फेर लिहिस।
दाई हा कुछ देर ओ दृश्य ला देखत रिहिन।
फेर धीरे-धीरे अपन मोटरी ला खोलेन।
सियान बबा के नीला पगड़ी निकालिन।
अऊ बिना कुछ कहे ओ पगड़ी ला लाश ऊपर उछाल दीन।
अब ओ देह के कुछ हिस्सा ढका गे।
दाई के आंखी भींज गे।
मन ही मन किहिस -
“हे सियान बबा…
अगर तोर आत्मा कहीं हे,
त देख…
आज तोर पगड़ी एक अउ मनखे के लाज ढांकिस।”
जमुना धीर लगाके पूछिस -
“दाई… नदी मा नइ नहाबे का ?”
दाई नदी के पानी ला देर तक देखत रिहिन।
फेर किहिन -
“नइ बेटी …
ये अब वो राजिम परयाग नइ रिहिगे जेन मा श्रद्धा उतर सके।
अब येमा मनखे के लापरवाही बहत हे।”
दूनो झन धरमशाला मा गिन।
नल के पानी ले नहा के अऊ मंदिर दर्शन कर वापस लहुट गिन।
गांव पहुंचते ददा पूछिन -
“अम्मा, राजिम संगम ले नहा के आगेव ?”
दाई हल्का मुस्कुरा दिस।
“हां… होगे।”
फेर कुछ देर बाद धीर लगा के किहिन -
“देख बेटा, जब मंय मर जावंव,
त मोर अस्थी राजिम मा मत डालिहा।”
सब चौंक गिन।
दाई किहिन -
“ राजिम दाई हा पहिलीच ले बहुत दुख सहत हे।
मोर गंदा शरीर ले ओला अउ मत सताव।”
ओ दिन ले दाई अऊ जमुना रोज गांव के गल्ली मुहल्ला साफ करे लगिन।
नदिया खंड़ मा कचरा उठाथे।
लोगन कभू हांस देथे, कभू अनदेखा कर देथे।
पर दाई के आंखी मा अब अजीब शांति रहिथे।
जमुना कई बार सोचथे -
राजिम संगम मा स्नान जरुरी नइ रिहिस।
जरुरी रिहिस -
राजिम के पीरा ला समझना।
काबर के
नदी के गंदगी सिरिफ पानी मा नइ बोहात हे,
ओ तो मनखे के सोच मा बोहात हे।
- डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)
पिन - 493773
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