Thursday, 30 April 2026

“आदर्श शिक्षिका” – डाॅ. विनोद कुमार वर्मा

 

.                *आदर्श शिक्षिका* (छत्तीसगढ़ी कहानी)


                                 - डाॅ विनोद कुमार वर्मा     


                                (01)    


        सामाजिक विज्ञान के नवा शिक्षिका डाॅ ममता कुँअर जइसे कक्षा मा पहुँचिस- 10 वीं कक्षा के विद्यार्थी मन खड़े होके ताली पीट के ओकर वेलकम करिन। 35 बरस के ओ, गोरी-चिट्टी, चंदा मा चढ़े मधुरस कस देह, सब्बो सुन्दरता मानो बड़े-बड़े आँखी मा समा गे रहिस। चुम्बकीय व्यक्तित्व, राष्ट्रपति ले पुरस्कृत ममता मा शिक्षिका के सबो गुण कुटकुट ले भराय रहिस। 

          ' धन्यवाद, सब बने-बने हावव ? '

     ' हाँ बने-बने मैम! ' - समवेत स्वर सुनई परिस।

        ' बने-बने नि अन मैम! '- एक लइका के जोरहा आवाज सुनाई परिस। पूरा कक्षा मा हाँसी के लहर दउड़ गे। 

       ' का होगे, बता भाई का बात हे? '

      ' मोर नाम श्याम एक्का हे। रमेश टोप्पो मोला कठफोड़वा कहिके चिढ़ाथे! '

     ' मैम, पहिली एहा मोला कछुआ बोलिस त मँय ओला कठफोड़वा बोलेव! '

     कक्षा मा फेर हाँसी के लहर दउड़ गे। तभे एक झन लड़की बोलिस- 'मैम, मोर नाव धनेश्वरी वैष्णव हे। लालू तिग्गा मोला बंदरिया कहिथे! ' 

      पूरा कक्षा मा फेर हाँसी के लहर दौड़ गे।

      ' मैम, धनेस्वरी वैष्णव मोला मुंडक कहिके चिढ़ाथे! अब मोर मुड़ मा कम बाल हे त मँय का करँव? ' - लालू तिग्गा बोलिस। 

       कक्षा मा फेर हाँसी के लहर दौड़ गे। नवा शिक्षिका ममता कुँअर घलो हाँसे लगिस। थोरकुन देर बाद बोलिस- ' लइका हो,  सबो जीव-जन्तु हमर सहोदर हें। हमन सहअस्तित्व के भावना के कारण ही आज जीवित हन। अगर एक-दूसर ले लड़त रहितेन त आज कोनो नि रहितिस! न ओमन न हमन! ....  हमन ला जम्मो चर-अचर, पेड़-पौधा अउ जीव-जंतु के सम्मान करना चाही! हमन ला एक-दूसर के घलो सम्मान करना चाही। '

       ' मैम, का शेर, बाघ भालू घलो हमर सहोदर हे? '

      ' हाँ फेर नरभक्षी जानवर मन ले अपन रक्षा करना भी जरूरी हे। जंगली जानवर मन के बुद्धि- विवेक मनुष्य जइसन नइ रहे। '

        ' अउ कुछु पूछे बर हे? '

         ' नो, मैम! '

       ' मँय आज अउ कुछु नइ 

पढ़ावँव। आज के बाद तीन दिन के छुट्टी हे। खेलव-कूदव अउ पढ़व घलो।  ..... कक्षा मा सबले होशियार कोन हे ?। ' 

      ' मैम, धनेश्वरी वैष्णव। चार दिन पाछू इंटर-स्टेट वाद-विवाद  प्रतियोगिता मा इनाम जीते हे! '

        ' शाबास धनेश्वरी, एक होम वर्क देवत हँव। ये कक्षा के पढ़इया जम्मो विद्यार्थी मन के सरनेम ला तो जानतेच्च होबे। ओमन के अर्थ अपन बाबूजी ले पूछके या  इंटरनेट मा खोजके सोमवार के कक्षा मा बताबे। '

      ' ठीक हे मेम, मँय तैयारी कर लेहूँ। '

     ' लालू तिग्गा,  तुम मंडूक के बारे मा जानकारी सोमवार को बताओगे! धनेश्वरी तोला मंडूक कहिथे न! '

      ' जी मैम। '

           सोमवार के मँय छत्तीसगढ़ के आदिवासी मन के सामाजिक जनजीवन उपर गोठ-बात करहूँ। एहा तुँहर कोर्स के बहुत महत्वपूर्ण चैप्टर हे।'


.                             (02)


             कक्षा मा पिन-ड्राप साइलेन्स रहिस। सबले पाछू लाइन मा  प्राचार्य डाॅ भारद्वाज बइठे रहिन। ओमन देखना चाहत रहिन कि अतेक बहुचर्चित शिक्षिका कइसे  पढ़ाथे? ..... ममता कुँअर के व्याख्यान चलत रहिस।- 

       '  पौराणिक भूज्ञान के अनुसार हजारों बरस पाछू जंबू द्वीप के अन्तर्गत विशाल भारत वर्ष अवस्थित रहिस। वर्ष के अर्थ ही पृथ्वी के एक बड़े भूखंड होथे। तब इहाँ जंगल-पहाड़ अउ नदियाँ के लकठा मा मनखे मन रहँय। ओ समे हमर देश मा कृषि, ऋषि अउ अरण्य संस्कृति फलत-फूलत रहिस। लोक संस्कृति ले लोक साहित्य, ऋषि संस्कृति ले श्लोक साहित्य अउ अरण्य संस्कृति ले वनौकस नृत्य कला उपजिस। वो समे आज जइसन बंगला, मोटर-गाड़ी नइ रहिस। लोगन-मन घास-फूस के झोपड़ी, खोह-गुफा या पेड़ के उपर मचान बनाके नदिया के तीर मा समूह बनाके रहत रहिन। एक समूह ले दूसर समूह के दूरी सैकड़ों मील रहिस। ओमन ला जंगली जानवर ले घलो जान जाय के बहुत खतरा रहिस एकरे खातिर बिहनिया ले लेके रात तक घर के लकठा मा अलाव जलाके राखें। आगी ले जंगली जानवर मन बहुत डर्राथें! '

         ' बहुत बढ़िया! ' - प्राचार्य डाॅ भारद्वाज कुछ ऊँचा आवाज मा बोलिस। 

      ' धन्यवाद सर!  लोगन मन समूह मा रहत रहिन, ताकि हिंसक जंगली जानवर ले मुकाबला कर सकें। एहा जीवित रहे अउ पीढ़ी ला आघू बढ़ाय के संघर्ष रहिस। जम्मो समूह के अलग-अलग नाम रहिस। कोई ऋषि-मुनि के नाम रखँय जइसे शांडिल्य, भारद्वाज, अगस्त्य। कोई नदी के जइसे गंगाजल सरस्वती, कोई पर्वत के जइसे सुमेर, बिन्ध्य त कोई पेड़-पौधों या जानवर के। ताकि ओकर समूह के कोनो आदमी आन समूह के आदमी ले कभू-कहूँ भेंट हो जावय त ओकर पहचान हो सके कि कोन समूह के मनखे हे! '

        ' बहुत इन्ट्रेसटिंग  है मैम! ये तो हमन कभू सोचेच्च नइ रहेंन! '

      ' हाँ बच्चों। घनघोर जंगल मा रहइया वनवासी मन पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, कीट-पतंगा, मछली, फल, निर्जीव वस्तु जइसे लोहा, नमक, फल आदि ला घलो अपन पहिचान बनाय रहिन। इही ला पाछू बेरा मा गोत्र कहि दिन। वनवासी मन घनघोर जंगल मा रहँय। ओमन पशु-पक्षी अउ पेड़-पौधा ले बहुत मया करें। '

' नोनी धनेश्वरी, वनवासी मन के गोत्र के बारे मा का पढ़ के आये हस तेला मोर लक्ठा मा आके  सब ला बता! '

       ' जी मैम, बतावत हँव। छत्तीसगढ़ के वनवासी या आदिवासी मन के गोत्र के सुग्घर-सुग्घर अर्थ हे। एला इंटरनेट मा खोजेंव त घंटो पढ़त रहेंव। ओमन के गोत्र के अर्थ ला बतावत हँव। 

          कुजुर = लता, तिर्की =चील पक्षी, खाखा = कौआ पक्षी, केरकेटा = केकड़ा, खलखो = कबूतर, तिग्गा = बंदर, एक्का = कछुआ, मिंज = मछली, लकड़ा = शेर, बखला = बगुला पक्षी, खेस = धान, बेक = नमक, पन्ना = लोहा, टोप्पो = कठफोड़वा पक्षी, किन्द्रो = फल, बारा/बड़ा = बरगद, बरवा = जंगली कुत्ता ये सबो हमर छत्तीसगढ़ के वनवासी मन के गोत्र हें। '

       जोरहा ताली परिस। प्राचार्य डाॅ भारद्वाज बोलिस- ' शाबास बेटी! तँय हमर स्कूल के आन-बान अउ शान अस। '

.    ' लालू तिग्गा! तोला मुंडक कहिके धनेश्वरी चिढ़ाथे! ' - मैडम ममता पूछिस।

     ' हाँ मैम! '

     ' मुंडक के बारे का पढ़के आय हस? '

     ' मैम, एहा उपनिषद के एक नाम आय। उपनिषद मन के रचना काल ईसापूर्व 1000 ले ईसापूर्व 300 माने जाथे। ये हा वेद के अंतिम भाग हे एकरे सेथी एला बेदान्त घलो कहिथें। एकर कुल संख्या 108 हे। ओमे ले 13 मन प्रसिद्ध हें- ईश, केन, माण्डूक् ,     तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, श्वेताश्वतर, बृहदारण्यक,  कौषीतकि, मुंडक, प्रश्न, मैत्रायणीय। कुछ उपनिषद  के रचना गद्य मा हे त कुछ उपनिषद के रचना पद्य मा! '

        प्राचार्य साहब खड़े होके ताली बजाय  लगिन। - ' वाह बेटा, शाबास! '

    तभे मैडम डाॅ ममता कुँअर बोलिस- ' सर! अतेक कुछ तो महूँ ला नि मालूम फेर दुनों लइका अपन स्तर ले ये जानकारी जुटाय हें! '

      ' मैडम, ममता आपके पढ़ाय के तरीका ला देख लेहें। आप एक आदर्श शिक्षिका हॅव। मोर सौभाग्य हे कि आप हमर स्कूल मा पदस्थ होय हॅव। '

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Story written by-


डाॅ विनोद कुमार वर्मा 

व्याकरणविद्, कहानीकार,  समीक्षक 

बिलासपुर छत्तीसगढ़ 


मो- 98263 40331



कहानी समीक्षा (छत्तीसगढ़ी)

“आदर्श शिक्षिका” – डाॅ. विनोद कुमार वर्मा


छत्तीसगढ़ी साहित्य म कहानीकार डाॅ. विनोद कुमार वर्मा के लिखे कहानी “आदर्श शिक्षिका” एक प्रेरणादायक अउ ज्ञानवर्धक कहानी आय। ये कहानी म लेखक ह एक आदर्श गुरु के व्यक्तित्व, शिक्षा के महत्व अउ विद्यार्थी मन के जिज्ञासा ला बहुत सुंदर ढंग ले प्रस्तुत करे हवय।

कहानी के मुख्य पात्र डाॅ. ममता कुँअर हें, जेन ह सामाजिक विज्ञान के नवा शिक्षिका बनके स्कूल म आथें। ममता कुँअर के व्यक्तित्व आकर्षक, व्यवहार मधुर अउ पोठ गुनी हवय। ओहर विद्यार्थी मन संग अपनापन के साथ गोठियाथें अउ पढ़ई ला रोचक बनाथें।

कहानी के सुरूआत म विद्यार्थी मन एक-दूसर ला जानवर के नाम ले चिढ़ाथें। ए स्थिति ला देखके ममता कुँअर ह बहुत समझदारी ले लइका मन ला समझाथें कि प्रकृति के जम्मो जीव-जंतु हमर सहोदर हें अउ हमन ला सबो के सम्मान करना चाही। ए बात कहानी म सहअस्तित्व अउ मानवता के सुंदर संदेश देथे।

लेखक ह कहानी म छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज के गोत्र परंपरा के बारे म घलो जानकारी दे हवय। जइसे – तिग्गा (बंदर), एक्का (कछुआ), टोप्पो (कठफोड़वा), लकड़ा (शेर), मिंज (मछली) आदि। ए जानकारी के माध्यम ले पाठक मन ला आदिवासी संस्कृति अउ परंपरा के झलक मिलथे। ये बात कहानी ला सिरिफ मनोरंजक नइ, बल्कि ज्ञानवर्धक घलो बनाथे।

कहानी के भाषा बहुत सरल अउ बोलचाल के छत्तीसगढ़ी आय। संवाद शैली म लिखे गे होय के कारण कक्षा के माहौल बहुत जीवंत लगथे। पाठक ला अइसने अनुभव होथे जइसे वो खुद कक्षा म बइठ के पढ़ई सुनत हवय।

कहानी के एक खास बात ए घलो आय कि ममता कुँअर ह विद्यार्थी मन ला रटंत पढ़ई के बदला खोज अउ अध्ययन के आदत सिखाथें। ओमन लइका मन ला अपन सरनेम के अर्थ खोजे बर कहिथें। ए तरीका शिक्षा के सही उद्देश्य ला दिखाथे।

कहानी के अंत म प्राचार्य डाॅ. भारद्वाज ह ममता कुँअर के पढ़ाय के तरीका देखके ओला “आदर्श शिक्षिका” कहिथें। एही से कहानी के शीर्षक घलो सार्थक बन जाथे।

“आदर्श शिक्षिका” एक अइसन कहानी आय जेन म शिक्षा, संस्कृति अउ मानवीय मूल्य मन के सुंदर समन्वय दिखथे। ये कहानी शिक्षक मन बर प्रेरणा अउ विद्यार्थी मन बर ज्ञान के स्रोत आय। डाॅ. विनोद कुमार वर्मा के ये रचना छत्तीसगढ़ी कहानी साहित्य म एक सुग्घर अउ उपयोगी योगदान कहे जा सकथे।

– कवि मिलन मलरिहा

मल्हार, जिला बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 🙏

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