कारी कमौत के खुशबू-1(संस्मरण)
काली कार म हमन दुर्ग जात रहेन। सुरता आये ले लगगे के लइकापन म हमन दुर्ग जावन त जी ई रोड के दूनो डाहर खेत राहय। भिलाई जंक्शन रहिस हे त बहुत अकन रेल खड़े राहय। बस ल रोक के कोनो मेर के कुँआ म पानी पीयन। धान के फसल के बेरा म अब्बड़ खुशबू आवय। अधिकतर मढ़रिया दाऊ मन के खेत रहिस हे। सुगंधित धान 'कारी कमौत' लगावंय। हवा चलय त ये धान के खुशबू रोड तक आवय।
हमन अपन मामा गाँव माहका जावन त भिलाई तीन म उतर जावन। मामा के नौकर आये राहय। बैलगाड़ी पटरी के ओ पार खड़े राहय। तब लोहा के पेटी चलय। गाँव पेटी ले के जावंय। हमरो माँ पेटी लेगय। पेटी ल नौकर ह मुड़ म बोह लेवय। माँ संग हमन दूनो भाई बहिनी रेंगत जावन। बहुत अकन माल गाड़ी पटरी म खड़े राहय। हमन रेल के नीचे ले झुक झुक के निकलत जान। पेटी ल सरका के नौकर ह निकालय। चार पाँच रेल पटरी पार करके ओ पार पहुँचन। बइला ल गाड़ी म फांदय। हमन बइठन। पेटी ल गाड़ी के आगू म बांध लेवय। अब छाकड़ा गाड़ी दउड़य। थोरिक देर में ही गाँव पहुँच जान।व बीच म तरिया परय त उतर के हाथ गोड़ धो लेवन। तीजन बाई के गाँव गनियानी ल पार करन त इंहाँ छींद के चटाई अउ बाहरी बनावत देखन।
मामा गाँव पहुँचन त पीपर के छाँव म बइला गाड़ी ढिलावय। सामने म बियारा रहिस हे। ममा अगोरत खड़े राहय। हमन उतर के घर आवन। पीपर पेड़ के बाद नहर नाली रहिस हे। ये ह तरिया म पानी भरे के काम आवय।
नहर नाली के ओ पार लाइन से हमर नाना मन के घर रहिस हे। आखरी वाला हमर मामा के घर रहिस हे।
दीवाली के छुट्टी म जावन त दिन रात खुशबू म साँस भर जावय। गर्मी म जावन तभो खुशबू राहय फेर घर तक। अँगना म कलमी आमा के रुख रहिस हे। मोर मामा घर मोर तीन चार बहिनी मोर उमर के राहंय हमर मन के धमाचौकड़ी पूरा डेढ़ महिना चलय।
नहर म नहाना, तरिया म गोड़ धोना, तरिया पार के आमा तोड़ना, कुँआ पार के चँदैनी गोंदा, बेल के मजा लेवन। सबले ज्यादा खुशी तो बरगद के जटा ल धर के झूलन अउ तरिया म कूदन। ये सब शहर म कहाँ मिलही? बियारा म बोईर के रुख रहिस हे त गर्मी म ओखर गुठली मिलय तेन ल बिन के घर लानन। मंझनिया भर ओला फोरन। सांझ के ठंडा पानी म नून अउ चिरौंजी डार के शरबत पियन अउ मामा मन ल घलो देवन। वाह अइसना स्वाद कोनो अउ शरबत म नइ मिलय, चिरौंजी ल चबा के नून पानी पियत जाव। ठंडा पानी अपन अपन बर बनावन। हाँसी के बात आये न के ठंडा पानी बनाये कइसे जाथे? हा हा हा। एक कांसा के लोटा म पानी भर के ओखर मुँह ल कपड़ा म बांध देवव अउ ओला मियार म उल्टा टांग देवव। पानी बरफ असन ठंडा हो जथे। डेढ़ महिना के बाद घर आये के बेरा म सब अब्बड़ सुरता आवय। सबले बड़े बात सुगंधित चावल ह भुलाये नइ भूलय।
कार म बइठे बइठे सुरता आवत हे कारी कमौत धान के खुशबू के। आज बीज ह घलो नंदागे। भिलाई स्टील प्लांट के हवा सब ल निगल दिस।
सुधा वर्मा 8/3/2026
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