(लघुकथा )
जिम्मेदारी
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"कइसे कका--ये भयंकर गर्मी,बियालिस-तिरालिस डिग्री तापमान हे--लू चलत हे, उपर ले भरे दोपहरी हे तेमा तैं बुजुर्ग आदमी पेपर बाँटत हस। बँटइया लइका मन कहाँ चल दे हें?"--पेपर ला झोंकत एजेंसी वाले कका ला पूछेंव।
"का बताववँ बाबू, सब बिहाव मनावत हें। दस झन मा कोनों नइ आये हें"--वो कहिस।
"ठीक हे कका आज लोगन ला पेपर नइ मिलतिच अउ तोला एक दिन के पइसा नइ मिलतिच अतेकच बस होतिच न?''
"नहीं बाबू पइसा के बात नइये, मैं अपन जिम्मेदारी ले चूक जतेवँ"-- अइसे काहत वो आगू बढ़गे।
चोवा राम वर्मा 'बादल '
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