अभागिन
- डुमन लाल ध्रुव
बरसात के बाद के दिन रहिस। धरती मा नई-नई हरियर घास फूटगे रिहिस। महुआ के पात ले टप-टप पानी झर-झर गिरत रिहिस जइसे कोनो बइठके रोवत हवय। गांव रिहिस बारनवापारा। नांगर जोते के बाद खेत मन सुक्खागे रिहिन। पोखरी के पानी मा आसमान के नीला रंग झलकत रिहिस।
गांव के किनारे बंबरी अउ आमा के झुरमुट के बीच एक मटियाहा रंग के घर रिहिस। घर के अंगना मा तुलसी चौरा जऊन मा दीया के कालिख जमे रिहिस। ओ घर मा रहत रिहिस एक नान्हे नोनी हा नाव रिहिस “ भागमानी ”। फेर गांव के लोगन ओखर नाव ले कम “अभागिन” कहिके जियादा बुलावत रिहिन।
का कसूर रिहिस ओखर ? ये बात गांव मा कोनो साफ-साफ नई बतावत रिहिस फेर फुसफुसाहट मा सब्बो कहिथें - “जउन दिन ये जनमिस ओही दिन ओखर ददा परदेश चले गिस। फेर लहुट के नई आइस। माई भी दू बरस बाद चल बसिस। तब ले ये घर मा अकेल्ला उजियारी खोजत रहिथे।”
भागमानी के संग ओखर बूढ़ी दाई रिहिस ददा के माई। दाई के आंखी मा मोतियाबिंद उतर गे रिहिस फेर मन मा उजियार कम नई रिहिस। वो हर रोज बड़े बिहनिया, बड़े बिहनिया कहिथे रहय।
“अभागिन नई, मोर भाग के बेटी हवस तंय। भागमानी हस। सुन ले, मन मा ये बात के गांठ बांध ले।”
गांव के लइका मन खेलत-खेलत ओखर घर के आगू ले गुजरथे त कोनो कहि देथे -
“ ए अभागिन! चल गिल्ली-डंडा खेलन!”
ओ मुस्कुरा देथे, फेर आंखी के कोना गीला हो जाथे।
सावन के आखिरी सोमवार के दिन नजदीक के बड़े गांव मा मेला लगिस। ढोल-नगाड़ा, जलेबी के महक, लकड़ी के घोड़ा-गाड़ी, रंग-बिरंगा फुग्गा सब्बो के मन ला लुभावत रिहिस। भागमानी के मन मा घलो मेला देखे के संउक उठिस।
“ दाई , मेला देखे बर जाबो ?”
दाई मुस्कुराइस “जा रे, जाके देख आ। फेर जलदी लहुट आबे। मोर आंखी तोरेच रद्दा अगोरत रही।”
भागमानी अपन फटे - पुरानी फ्रॉक झाड़-पोंछ के पहिरिस अउ चल परिस। रद्दा भर मा धान के खेत मन हिलत रिहिन, जइसे ओखर हौसला ला बढ़ावत हवय।
मेला मा पहुंचते ही जम्मो जिनिस हा नवा - नवा लगिस। लकड़ी के बने बांसुरी मा सोंधी धुन बजत रिहिस। झूला झूलत लइका मन हंसत - चीखत रिहिन। ओ भी झूला झूलना चाहिस फेर जेब टटोलिस त खाली।
ओही बखत गांव के बनिया के लइका रामधनी ओखर कोती आके किहिस -
“ए अभागिन, झूला झूलना हवय त पइसा दे पइसा!”
भागमानी चुप रिहिस।
तभेच एक झन सियनहा बबा कारीगर जऊन लकड़ी के खिलौना बेचत रिहिस, ओखर उदसहा चेहरा देखिस। किहिस -
“ ए नोनी, काबर उदास हवस?”
“ कुछ नई बबा…”
कारीगर मुस्कुराइस - “ले, ये लकड़ी के चिरई तोर बर। फुक मा उड़े नई, फेर सपना मा खूब उड़ही।”
भागमानी के आंखी चमक उठिस। पहिली दफा कोनो अनजान मनखे ओखर नाव नई ओखर मन देखिस।
गांव के पोखरी मा एक कहानी बसत रिहिस। कहिथे, बरसों पहिले एक चिरई रोज आके पानी मा अपन चेहरा देखत रिहिस। जऊन दिन ओखर मन उदास होवत, पानी मा तरंग उठ जाथे।
भागमानी रोज सांझ मा पोखरी किनारे जाके बइठ जाथे। लकड़ी के चिरई ला पानी मा डुबाके, फेर बाहर निकालके हंस देथे।
“देख, चिरई! आज मंय रोवत नई हंव, हंसत हंव।”
एक दिन गांव के मास्टर जी, जऊन शहर ले पढ़के आय रिहिन, ओही पोखरी किनारे किताब लेके बइठे रिहिन। भागमानी ला देखिन।
“काबर रोज इहां आके बइठ जाथस ?”
“मोर संग बात करे बर कोनो नई हवय। पानी मा अपन चेहरा देखथंव, त लागथे कोनो चिनहारी मिलगे।”
मास्टर जी चुपचाप सुनत रिहिन। फेर किहिन -
“तंय पढ़हे - लिखे बर स्कूल काबर नई आवत हस ?”
“ लोगन मन कहिथे, अभागिन के पढ़हे ले का होही ?”
मास्टर जी के आंखी चमक उठिस -
“जऊन नोनी हा अपन दुख ला कहानी बना सकथे, वो सबले बड़े भागवान होथे। काली ले स्कूल आबे।”
दूसर दिन बिहाने दस बजे भागमानी हा कांपत कांपत स्कूल पहुंचिस। स्कूल के माटी के फर्श, काली पट्टी, खड़िया के गंध सब्बो नया।
लइका मन फुसफुसाइस - “देखव, अभागिन आ गे!”
फेर मास्टर जी हाजिरी लेवत - लेवत जोर ले किहिन -
“भागमानी !”
ओ चंउक गे -
“ मोर नाम…?”
“हां, तोर असली नाव भागमानी हवय। आज ले कोनो ‘अभागिन’ नई कहिही।”
कक्षा मा सन्नाटा छागे। मास्टर जी किताब ले एक कहानी पढ़िन -
“एक चिरई रिहिस जऊन अपन पंख के भरोसा मा आसमान नापे बर निकलिस…”
भागमानी ला लागिस, कहानी ओखर बर लिखे गे हवय।
दिन बीतत गिस। भागमानी अब रोज स्कूल जाथे। पढ़हे - लिखे मा तेज निकलिस। गांव के लोगन धीरे-धीरे ओखर बदले रूप ला देखे लगिन।
एक दिन, पंचायत भवन मा बाल सभा रखे गीस। मास्टर जी किहिन -
“आज कविता पढ़ही भागमानी हा।”
भागमानी कांपते आवाज मा पढ़िस ।
“मैं अभागिन नई,
मोर भीतर उजियार के दीप हवय।
मोर दुख मोर साथी,
जऊन मोला मजबूत बनाय हवय…”
सभा मा ताली गूंज उठिस। दाई दूरिहा ले सुनत रिहिस, आंखी मा पानी, होंठ मा मुस्कान।
सर्दी के एक रात दाई के तबीयत बिगड़गे। भागमानी ओखर सिरहाना मा बइठ के किहिस -
“ दाई, मोला छोड़ के मत जा।”
दाई हा धिरलगहा किहिस -
“मोर बेटी, मनखे के जिनगी मा दुख - भाग, सुख - भाग सब संग - संग चलथे। तंय अभागिन नई हवस। जऊन दिन तंय दूसर के आंखी के आंसू पोछबे ओ दिन असली भाग खुलही।”
कुछ दिन बाद दाई चल बसिस। गांव के लोगन पहली दफा भागमानी ला “अभागिन” नई किहिन। सब्बो चुपचाप ओखर संग खड़े रिहिन।
बछर बीत गे। भागमानी हा अब बड़े होवत रिहिस। पढ़हे - लिखे मा अव्वल। गांव मा छोटे - छोटे लइका मन ला पढ़ाय लगिस। ओखर घर के अंगना मा फेर दीया जले लागिस।
पोखरी किनारे बइठ के ओ लकड़ी के चिरई ला देखथे अउ मुस्कुराथे -
“देख, चिरई! अब मंय उड़े बर सीख गे हंव।”
गांव के नवा लइका - लइकी जब पूछथे -
“दीदी, अभागिन का होथे?”
ओ हंस के कहिथे -
“जऊन अपन भीतर के उजियार ला नई पहिचानय, वही अभागिन होथे। जऊन पहिचान लेथे वो भागमानी बन जाथे।”
बरसात फिर आय रिहिस। महुआ के पात ले फिर पानी टपकत रिहिस। फेर अब ओ आवाज रोवत नई गावत जइसे लगत रिहिस।
बारनवापारा के मटियाहा रंग के घर अब उजियार ले भर गे रिहिस। लोगन कहिथें -
“देखव, जऊन ला हमन अभागिन कहत रहेन वोहा आज गांव के सबले बड़े भाग के चिन्हा बन गे।”
अऊ भागमानी ?
ओ हर रोज तुलसी चौरा मा दीया जला के दाई ला सुरता करत कहिथे -
“अभागिन नई… मंय भागमानी हंव।”
- डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)
पिन -493773
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