Thursday, 30 April 2026

लोक कथा सतवंतीन वीरेन्द्र ‘सरल‘

 लोक कथा

सतवंतीन

वीरेन्द्र ‘सरल‘

बहुत जुनना बात आय। एक गांव में सात भाई अउ एके झन बहिनी के परिवार रहय। सब ले छोटे भाई के नाव संतु अउ बहिनी के नाव सतवंतीन रहय। छै झन भाई मन के बिहाव होगे रहय। संतु भर के बिहाव होय बर बांचे रिहिस। बिचारी सतवंतीन अपन दाई-ददा मन ला जानबे नइ करय, काबर कि वोहा जब बहुत छोटे रिहिस तभे ओखर दाई-ददा मन सरग सिधार गे रिहिन। भाई-भौजई मन ओखर पालन-पोषण करे रिहिन अउ पर्रा में भांवर किंजार के ओखर बिहाव घला कर दे रिहिन। अभी सतवंतीन के गौना नइ होय रिहिस, तिही पायके वोहा मइके में रहत रहिस। बिचारी मुरही-पोटरी सतवंतीन ह निचट गउ असन सीधी-साधी अउ फुलकैना असन गजब सुंदर रिहिस। भाई-भौजाई मन जइसन बुता करे बर कहय वइसनेच करे अउ जउन खाय-पिये बर दे उही ला खावत-पियत कलेचुप रहय। अइसने-अइसने उखर जिनगी के गुजर-बसर चलत रहय। सबले छोटे भाई संतु अभी कुवांरा रिहिस तिही पाय के ओहा सतवंतीन बर अउ भाई मन ले जादा मया करे।

खेती किसानी के काम चलत रहय। सब भाई-भौजी मन दिन भर खेत में काम करय अउ संझाती घर आवय। सतवंतीन ह घर के सबो बुता-काम ला कर के रांधे-गढ़े अउ भात धर के खाना पहुँचाय बर खेत जावय। एक दिन के बात आय। 

भौजई मन सतवंतीन ला चेतावत किहिन-‘‘बखरी के चना भाजी ला टोड़ के चना भाजी के साग रांधबे अउ लानबे।‘‘ भाई-भौजी मन के खेत जाय के बाद सतवंतीन ह बखरी ले भाजी टोड़ के लानिस अउ निमारे के बाद ओला रांधहूँ कहिके हँसिया मेें काटत रहिस। भाजी ला काटत-काटत हँसिया के धार में सतवंतीन के अंगरीच ह कटागे। हाथ ले तर-तर लहू बोहाय ला धर लिस। लहू ला पोंछे बर ओहा अड़बड़ चेन्दरी खोजिस फेर चेन्दरी मिलबे नइ करिस। सतवंतीन डर्रागे, ओहा मन में सोचिस कहूं भाई मन के धोती में पोंछहूं तब भाई मन गारी दिही अउ भौजाई मन के लुगरा में पोंछहूं तब भौजाई मन, हे भगवान मय काय करव? डर के मारे बपरी सतवंतीन ह अपन कटाय अंगरी के लहू ला भाजीच में पोंछ दिस अउ ओला रांध दिस।

मंझनिया के होवत ले घर के काम-बुता ला करिस अउ फेर बासी धर के खेत में आगे। जब सबो झन बासी खाय बर खेत के मेड़ में बइठिन अउ खइन तब आज के भाजी साग ह गजब मिठाय रहय। साग के अतेक मिठई म सब झन अड़बड़ खुश होगे फेर एखर कारण ह कोन्हों ला समझ में नइ आइस। तब ओमन सतवंतीन ला पूछिन। उखर डर के मारे सतवंतीन ह सब बात ला सफा-सफा बता दिस। सुनके सब झन दंग रहिगे। कोन्हों कुछु नइ किहिन अउ खेत के काम करके सबो झन घर आगे।

रतिहा के बेरा में सतवंतीन के सुते के पाछू छयो भाई-भौजी मन एक जगह सकलाके गोठियाय लगिन जब सतवंतीन के लहू में सनाय चना के भाजी ह अतेक मिठाय रिहिस। तब ओखर मास ह कतेक मिठाही? अब कुछु होवय फेर काली बिहनिया ले सतवंतीन ला बासी धर के खेत में बलाबो अउ ओला मार के ओखर मास ला रांधके खाबो। 

उखर गोठबात ला छोटे भाई संतु ह लुका के सुनत रहय। ओहा मने-मन में कहत रहय-‘‘वाह रे हत्यारा हो। मंँहु के सुवाद बर तुमन बहिनी ला मारके खाय के उदिम करत हो। तुमन मइनखे अव कि राक्षस? फेर मोर रहत ले तुमन मोर दुलौरिन बहिनी ला कइसे मारथो महूं देखथवं।‘‘

रतिहा होगे रहय, संतु ह अपन बहिनी के जीव बचाय बर उपाय सोचे फेर ओला कहीं उपाय नइ सूझत रहय। संतु ह भगवान ला सुमरत किहिस-‘‘हे भगवान! मैं तो घर में सब ले छोटे हवं। घर के सियानी इही चंडाल मन के हाथ में है। मैहा येमन ला छेकहूं तब तो येमन महूं ला मार के खा डारही। मोर दुलौरिन बहिनी के जिनगी ला बस तिही बचा सकथस, भगवान ओखर रक्षा कर।‘‘ सतवंतीन के जीव कइसे बांचही, इही बात के संशो-फिकर करत रतिहा पोहाय ला धर लिस अउ पोहाती-पोहाती संतु के नींद पड़गे।

रतिहा पोहाइस तहन अपन योजना के मुताबिक छयो भाई-भौजाई मन नून-तेल, हरदी-मिरचा, दार-चांउर सब समान धरके खेत डहर चल दिन। खेत जाय के पहिली ओमन संतवतीन ला जल्दी बासी धरके आबे कहिके चेता दिन। अब बपरी सतवंतीन ह उखर चाल ला काय जाने? उखर खेत जाय के पाछू लकर-धकर घर के काम ला निपटा के बासी धर के खेत पहुँचगे।

जइसने सतवंतीन खेत में पहुँचिस वइसनेच ओमन ह ओला मार डारिन अउ बोकरा-भेड़ा कस गोंदा-गोंदा काट डारिन। जीव छूटे के बेरा सतवंतीन ह मोला बचा भैया संतु कहिके चिचियाय रिहिस। भगवान के किरपा ले कोनजनी कइसे ओखर गोहार ह संतु के कान में पड़िस।

संतु हड़बड़ा के जठना ले उठिस। बेरा चढ़गे रहय। घर ह निचट मनखे मरे अस सुनसुनहा लागत रहय। जब संतु ला घर में सतवंतीन के आरो नइ मिलिस तब वोहा तुरते खेत डहर दौड़िस। खेत में पहुँच के संतु ह देखिस, भाई-भौजाई मन सतवंतीन ला मार के साग रांध डारे रहय। संतु के आँखी ले तरतर-तरतर आँसू बोहाय लगिस। ओहा मुड़ धर के बइठगे अउ कलप-कलप के रोय लगिस।

संतु ला रोवत देख के हत्यारा भाई-भौजाई मन डर्रागे। ओमन संतु ला डरा-धमका के चुप करावत किहिन-‘‘तैहा कोन्हों हमर मन के करनी ला दूसर तीर बताबे तब हमन तहू ला अइसने मार के खा डारबो। जीना-खाना हे तब अपन मुहूं में तारा लगा के राख।‘‘ 

उखर राक्षसी हाव-भाव ल देख के अउ धमकी ला सुनके संतु डर्रागे। मंझनिया के बेरा में सब झन बासी खाय बर मेड़ में एक ठन रूख के छइहां में बइठिन तब सबो के थारी में संतवतीन के देहे के मास के साग ला परोसे गिस। छयो भाई-भौजाई मन ओ साग ला बने मजा ले के खाय लगिन फेर बहिनी के सुरता करके संतु के आँखी ले आंसू बोहाय लगिस। फेर काय करे डर के मारे वोहा साग ला कंवरा बनाके खाय असन करे अउ सब के नजर बचा के मेड़ के दनगरा में डार देवय।

खा-पी के सब झन अपन-अपन काम-बुता में लगगे अउ संझाती होईस तहन घर लहुटगे। रतिहा फेर सबो झन सुन्ता होईन कि संतवतीन के दूल्हा जब ओला ले बर आही अउ कहाँ हे कहि के पूछही तब वोहा पेट पीरा में मरगे कहिके ठग देबो अउ गाँव वाले मन पूछही तब अपन ससुरार चल दिस कहिके लबारी मारबो। संतु बपरा उखर डर के मारे कोन्हों ला कुछु नइ बताइस फेर बहिनी के सुरता कर-करके वोहा बइहा-भुतहा असन होगे। अइसने-अइसने दू-तीन साल बीतगे।

जब सतवंतीन के दूल्हा पठौनी बारात धर के अइस तब भाई-भौजाई मन ओला सतवंतीन ह पेट पीरा में मरगे कहिके ठग दिन। बिना दुलहीन के बारात ह लहुटत रिहिस। रददा के जउन खेत के मेंड़ के दरगना में संतु ह सतवंतीन के हाड़ा-मांस के साग ला डारे रिहिस तउने ठौर में एक ठिन सुंदर फूल के पेड़ जागगे रिहिस। फूल के सुघरई ला देख के बरातिया मन के जीव ह ललचागे। एक झन बरातिया ह फूल ला टोड़हूं कहिके अपन हाथ ला लमाइस तब फूल ह ऊपर कोती टंगागे अउ पेड़ ले अवाज अइस- 

‘‘ओली भर तोड़ ले मुड़ भर खोंचले,

हो कुरा ससुरे, डार पवन झन नवे,

झन नवे भूली झन नवे‘‘

ये अवाज ला सुनके बरातिया मन अचरज में पड़गे। काबर कि कोन्हों पेड़ ला गाना गावत ओमन पहिली बेर देखत रिहिन। अब तो ओखर रहस्य ला जाने बर बहुत झन बरातिया मन ओ फूल ला टोड़े के उदिम करिन फेर नाता-गोत्ता के हिसाब ले पेड़ ले अइसनेच गाना सुनाय अउ फूल ह ऊपर डहर टंगा जावय अउ ओमन हटे तहन फूल ह खाल्हे में आ जावय। सब झन फूल ला टोड़े के उदिम करिन फेर ओहा काखरो से नइ टूटिस आखिर में दूल्हा राजा ह फूल ला अमरे बर अपन हाथ ला लमाइस। दूल्हा ला आवत देख के ओ पेड़ के सब फूल अपने-अपन खाल्हे डहर नवगे। दूल्हा ह सब फूल ला टोड़ के अपन बिहतरा झाँपी में भर दिस अउ बारात संग अपन घर लहुटगे।

जब ले सतवंतीन के मइके ले बिन दुल्हिन के बरतिया ह लहुटे रिहिस तब ले दूल्हा के घर एक विचित्र घटना घटे ल धर लिस। दूल्हा के दाई-बहिनी अउ भौजाई मन जब बिहिनया उठय ओखर पहिलीच ले घर के साफ-सफाई, लिपई-पोताई, गोबर-कचरा अउ पानी-कांजी भरे के बुता-काम मन हो जाय रहय। सब झन एक-दूसर ला पूछय कि ये बुता ला कोन करे हे? फेर बुता करने वाली के पता नइ चलय।

घर के मनखे मन रात कन पहरा दे तब ले पता नइ चलत रहय। एक रतिहा के बात आय। दूल्हा ह पहरा देवत अपन कुरिया के जठना में कलेचुप मिटका के सुते रहय। जागते-जागत रतिहा पोहाय ला धर ले रिहिस। तभे बड़े मुंढारहा ले ओहा देखिस जउन झाँपी में फूल ह रखाय रिहिस उही झाँपी ले जीयत-जागत सतवंतीन ह निकलिस अउ घर के सब काम-बुता ला करके फेर उही झाँपी में खुसरगे। पोहाइस तहन दुल्हा ह घर के सब मनखे ला बता दिस कि घर के काम ला सतवंतीन ह करथे।

बात कोन्हो ला समझ में नइ आइस। सब झन कहय सतवंतीन ह तो इहाँ आयच नइहे। ओखर मइके के मन तो ओला मरगे हावे कहिथे। कहीं येहा सतवंतीन के आत्मा तो नोहे? 

सब झन आपस में विचार करिन अउ ओ तराप के जदुवन्ता बबा ला अपन घर में बला के विचार कराइन। सतवंतीन ला जियाय के उपाय पूछिन। जदूवन्ता बबा ह बने विचार करके एक ठिन उपाय बताइस।

दूसरइया रात के मुढहरा सतवंतीन ह घर के बुता-काम करके जब फेर झाँपी में खुसरे लगिस तब दूलहा ह ओखर हाथ ला टप ले धर लिस अउ जदुवन्ता बबा के बताय मंत्र के जाप करिस। अउ पहिली ले घोर के राखे चंदन-मलागर ला सतवंतीन ऊपर छित दिस। सतवंतीन ह राम-राम कहत जिन्दा होगे।

सतवंतीन के जिन्दा होय के बात ह बिहिनया गाँव भर बगरगे। राज भर के मनखे ओला देखे भर उखर घर में सकलागे। सतवंतीन ह सबला अपन राम कहानी ला बता दिस ओखर कहिनी ला सुनके सुनइया मनके आँखी में आँसू डबडबागे। 

जदुवन्ता बबा ह किहिस-‘‘ले देखव बेटी के मन में मइके अउ ससुरार बर कतेक परेम होथे। मरे के बाद घला बेटी के आत्मा घर-परिवार के हित चाहथे। बेटी अउ बहू के हत्या करने वाला हत्यारा मन बेटी के मया ला आखिर कब समझही? आज इहाँ जतेक झन सकलाय हव सब किरिया खावव कि हमन सब झन बेटी-बहू के रक्षा करबो। ओमन ला उचित मान-सम्मान देबो। बेटी बचाबो, सृष्टि बचाबो।‘‘ मोर कहिनी पुरगे, दार भात चुरगे।


वीरेन्द्र ‘सरल‘

बोड़रा, मगरलोड़

जिला-धमतरी, छत्तीसगढ़

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