*होरी के रंग* (त्वरित टिप्पणी)
*सुकुवा तारा* (लघुकथा)
-डाॅ विनोद कुमार वर्मा
' तोर स्टेटस् ला देखेंव मितान। बढ़िया लिखे हस। भाई सुशील भोले ला सुकुवा तारा के संज्ञा देहे हस। '
' हाँ मितान! छत्तीसगढ़ी साहित्य के सुकुवा तारा हे भाई सुशील भोले। ओकर असामयिक निधन के समाचार ले पूरा साहित्य विरादरी व्यथित हे।आज होरी तिहार के दिन लोकसदन समाचार पत्र सा भाई सुशील भोले उपर दू पृष्ठ के विशेष परिशिष्ट निकाले हे। ओही मा मोर लेख छपे हवय। '
' ओ तो ठीक हे मितान। फेर एक बात मोला समझ मा नि आइस ? '
' का बात ? '
' कतकोन साहित्यकार अउ कृषि वैज्ञानिक मन ला तँय अपन लेख मा सुकुवा तारा के संज्ञा दे हस। मँय सब ला पढ़थँव अउ गुनथँव। सुकुवा तारा तो एक्का ठिन हे! '
' सुन मितान, ये-सब-मन मोर बर सुकुवा तारा हें। तँय तो जानतेच्च हस कि साहित्यकार मन कतकोन लिखथें या कृषि वैज्ञानिक मन कतकोन अपन गोठ-बात किसान मन ला बताथें फेर ओमन ला एकर कोई पइसा-कौड़ी नि मिलय। अइसने महूँ ला नि मिलय। हमन उजियार मा नि घूमन बल्कि अंधियार मा कोई बात -कोई सूत्र ला ढूढ़थन जेकर ले किसान, आम आदमी या अंधियार मा दिन बितइया लोगन मन ला उजियार मिले। कभू -कभू वो सूत्र मिल जाथे अउ समाज अउ देश ला फायदा मिलथे। चालीस बरस पहिली एक इकड़ मा 15 बोरा घलो धान नि उपजत रहिस।आज चालीस बोरा उपजत हे। एहा तो कोनो वैज्ञानिक के ही कोशिश के परिणाम होही कि जादा उपज देने वाला धान के जाति बनाइस। अइसने साहित्यकार मन समाज अउ देश के अंधियार कोती के बात ला सामने लाथें त सरकार अउ बड़े लोगन मन सचेत होथे अउ उहाँ उजियार लेके जाथें। एकरे खातिर साहित्यकार अउ वैज्ञानिक मन ला सुकुवा तारा कहिंथँव! '
' बात तो ठीक कहत हस मितान! '
' एहा कोनो मजाक के बात नि होवय मितान, तँय हाँस झन! ...... साहित्यकार मन करा बड़े संसाधन नि रहे। ओमन हवाई जहाज या बीस लाख के गाड़ी मा नि घूँमय! ओमन अपन जाँगर के भरोसा मा ही अपन काम करिथें। ..... भाई सुशील भोले कस कतकोन साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ी साहित्य मा अंजोर बगराय हें। ओही अंजोर मा महूँ देख-टमर के अंधियारी रात मा घलो रेंग देथँव। जादा सुकुवा तारा रहे मा तो मोइच्च ला फायदा हे! '
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