Thursday, 30 April 2026

कहानी *अपन गांव अपन घर*

 कहानी


 *अपन गांव अपन घर*




               

            

गैस सिलेंडर हा आज घलौ नी मिलिस का।सरजू ला भरे मंझनिया घर आवत देख शान्ति हा थोरिक चिंता करत पूछिस।

       नी मिलिस शांति।माथा के पसीना ला पंछा मा पोछत सरजू हा कहिस। 

  करसी के पानी ला एक लोटा लान के शांति हा सरजू के हाथ मा धराइस ।जावव हाथ मुँह धो के भात खा लेवव।

घर मा घलौ  तो सिलेंडर नी रहिस घर के सिलेंडर ला तो मैं हा अपन होटल मा लेग गे रहेंव उहूँ खतम हो गिस ,ता तै हा भात कइसे राँधे हस  सरजू किहिस । 

     मै हा घलौ जुगाड़ करे रहेंव शांति हा मुचकात कहिस।

 कखरो करा माँगे हस का ।सरजू शांति के मुँहे मुँह ला देखे लागिस ।

     नहीं जी एती ओती ले झिटिया टोर के लाये हवँ,खुल्ला गरुवा बछरू मन घूमरत रहिथें उँखर गोबर हा सूखा के बिनवा  छेना बन जाथे तेला बिन लेहे रहेवँ।अउ मेंहा कपड़ा सिलथवँ तेकर नान नान कुटी ला बोरी मन मा भर के राखे रहेंव।

ओही मन ला बार के दू दिन हो गिस भात राँधत हवँ।

 तभे तो मै हा कहिथवँ तै  हा मोर घर के लक्ष्मी हावस शांति  ढकर ढकर लोटा के पानी ला पीके सरजू हा कहिस।

  अबड़े घाम हावय मैहा नहाहवँ शांति।सरजू हा कहिस।

जावव ना नहानी में पानी भराय हावय। शांति हा कहिस।

   बिलासपुर जिला के पोंड़ी गाँव के रहइया सरजू कमाय खाय बर  दस बछर पहिली रायपुर आय रहिस ।शुरू मा इहाँ आके एक ठिन होटल मा  कप प्लेट माँजे के बुता करे लगिस  फेर कलेक्टर आँफिस करा एक ठन ठेला मा चाय बेचे ला धरिस ।धीरे धीरे चार पइसा कमाई होइस ता एक ठिन छोट कुन होटल खोल लिहिस हे बने रोजी रोटी चलत रिहिस फेर कोरोना काल मा बड़ परशानी होइस।जइसे तइसे जिनगानी हा लाइन मा आइस हावय।फेर ये दरी ये लड़ाई(युद्ध) के कारण गैस सिलेंडर के कमी हा सरजू के कनिहा टोर दिहिस हे। शहर के खरचा अबड़े रहिथे।घर के किराया, लइकन के फीस,फेर रायपुर हा मँहगा शहर घलौ आय।कहाँ घर ले आय रिहिस ता हर महिना पइसा भेजहूँ कहे रिहिस ,आज तक दू रुपिया नई भेजे सकिस कभू कभू सोच के अबड़े दुख होथे फेर अपन लाचारी ला सोच मन ला मसोस लेथे।

     मनखे हा लडा़ई झगरा काबर करथे जी।बने प्रेम व्यवहार ले रहितीस ,ता काय होतिस।थारी मा भात ला निकालत शान्ति हा किहिस।

     सब स्वारथ के मारे आय शांति।बड़े आदमी अउ बड़े होय बर चाहथे भले कखरो नरी ला मुरकेटे बर पड़े ता पड़ जाय ।अइसने बड़े देश हा छोटे देश के ऊपर अपन कब्जा जमाय के कोशिश करत रहिथें।बड़का देश हा दुनिया के दादा बन गे हे। मोर होटल मा अइसने गोढ़ियावत रिहिन हे ग्राहक मन ।

   अउ कोन बड़का देश जी हमर देश खुद बड़का देश आय।

शान्ति हा किहिस।

      ये दुनिया मा अउ कतको बड़का देश हावय शान्ति, अमरीका, चीन, रूस।फेर अमरीका  हा बड़ हदरहा हावय।सरजू हा किहिस।उँखर लड़ाई मा हमर करलाई हो गिस शांति।सरकार हा अभी व्यवसायिक सिलेंडर मा रोक लगाय हावय तेपाय के अठवाहि हो गिस मोर होटल ला बंद हो गिस ।कहूँ बिलेक मा मिल  जाहि सोच के रोज कोशिश करत हवँ  फेर ज्यादा पइसा देके घलौ नई मिलत हे।

       अइसन में तो भूख मरे बर पर जाही जी।कमाई नइ होही ता घर के खरचा कइसे चलही हमन तो छोटे धंधा वाले अन रोज कमाथन रोज खाथन।चार पइसा जोरे रहेन तेनो अब तो खरचा होय लगिस।शांति हा फिकर करत किहिस।

       महूँ ला अबड़े फिकर होवत हे शांति।सरजू हा अचोवत कहिस।

मै तो फेर कहिथवँ जी।चलव घर लहुट जाथन।हमर खेत के लकड़ी अउ घर के छेना अलमल के हावय।अउ अम्मा बाबू घलौ तो अब सियनहा हो गिन हे।

अम्मा बाबू के  चेहरा हा आँखी आँखी मा झूले लगिस हे।पीपर के पेंड़ लीम के चौरा सबके सुरता आय लगिस।कोला के बोइर के मिठास मन मा घुर गे।कतका दिन हो गिस अम्मा के हाथ के अँगाकर रोटी खाय।सरजू के आँखी के कोर मा पानी आ गिस जेला चुपे चुप कुरथा के बाहीं मा पोंछ लिहिस।

      फेर शांति ये बात ले अनजान नइहे।आखिर वोहा सरजू के सुख दुख के  साथी अर्धांगनी जो आय।

   संझा के बेरा आय गरुवा मन चरके कोठा मा लहुट आँय हे।परछी मा खटिया मा रामरतन ढलगे  हावय। लक्ष्मीन

हा चुल्हा मा लाल चाय ला चढ़ाय हावय।तभेच एक ठन आटो आके दुआरी मा रुकिस। कोन आय ग रामरतन हा उठ के बैठत कहिस आज कल ओला झुकुर झाकर दिखथे।लइकन मन आय ,लक्ष्मीन हा किहिस।सुन के रामरतन हा खुशी के मारे लउठी ला टेकत दुआरी मा जाय लगिस।तभेच दादा कहत दुनो लइकन रामरतन ला पोटार लिहिन।सरजू पाँव परके मुड़ी ला झुकाय बइठ गिस।शांति हा जम्मो सुख दुख के गोठ ला बताइस।

   मै तो कब के घर लहुटे बर कहत रहेंव बेटी फेर येहा मोर बातेच नइ सुनय।रामरतन हा खखारत कहिस ।

लक्ष्मीन सब झिन ला चाय ला के दिहिस।देवव अम्मा भात ला मै राँधिहृवँ,शांति हा कहिस। हाथ गोड़ ला धो के थोरिक सुस्ता ले फेर तोर घर तोर दुआर बेटी लक्ष्मीन  हा कहिस।

शांति देखत हे पटाव मा लकड़ी छेना भराय हे उज्जवला योजना के गैस सिलेंडर अभी अधियाय नइ हे।

    मै  अब इहे रइहवँ बाबू रायपुर नइ जाववँ। सरजू हा कहिस।

     हवँ बेटा ये भुइयाँ हा हमर महतारी ये ।येखर जतके तै सेवा करबे ओखर कई गुना हमला लहुटा दिही।हमर खेत हा हमला साल भर खाये के पुरतन दे  देथे।रामरतन हा कहिस।

      सरजू जी तोड़ के मेहनत करे लगिस ओखर मेहनत के फसल खेत मा लहलहावत हे।घर के परछी मा छोट कन राशन के दुकान खोले हे जेला शांति हा देखथे।उही मेर गाँव के बहिनी बेटी मन के कपड़ा घलौ सिलथे।अपन गाँव  अपन घर आखिर अपन होथे।

  





 चित्रा श्रीवास

सिरगिट्टी बिलासपुर

छत्तीसगढ़

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