Thursday, 30 April 2026

डिस्पोज़ेबल/डिस्पोज़ल

 डिस्पोज़ेबल/डिस्पोज़ल 


"कइसे करबो जी घर म ओतका बरतन भॉंड़ा कहॉं हे जतका मनखे हम घर म खाय बर बलाए हन। अउ फेर पारा परोस ले मॉंग के कहूं ले भी आबो त मॉंजे धोए के लफड़ा।" राम प्रसाद के गोसइनिन केहे लगिस जब दूनों के बीच घर म सत् नराएन भगवान के कथा पूजा करवाए बर अउ पारा परोस ल नेवते के बारे म गोठ बात होत रहिस।


राम प्रसाद हॉंसत हॉंसत कथे;  हत रे बही। तॅंय कोन दुनिया म रथस ओ। रॉंधे पसाए भर बर बरतन लगथे। खवाए पियाए बर किसिम किसिम के अइसे लोटा थारी गिलास चम्मच पलेट बने हे के ओला मॉंजे धोए के झंझटे नइए। खा पी अउ फेंक दें ओला। जेला अंग्रेजी म कथें "यूज़ एण्ड थोरो।" 


कोनो गलत बात नइ बोले हे रामप्रसाद हर।

आज गॉंव गॉंव म एकर चलन बाढ़ गे हे। डिस्पोज़ल कहना सरल परथे बजाय डिस्पोज़ेबल के। जम्मो झन चाहे वो शहरिया होय या गॅंवइहा सबो के मुॅंह म रटा गे हे डिस्पोज़ल।


एक बात ध्यान देके लाइक हे के ये फेंकाए डिस्पोज़ल मन ल कचरा सकलइया मन सकेल के धो धा के कारखाना म दे आथें जेला गला उला के शायद फेर उही थारी लोटा गिलास 

चम्मच पलेट बनाए जा सकथे। एला देख के सोचथॅंव ए मटेरियल ह कतका भागमानी हे कहिके। रिसाइकिल होत तो रथे। मनखे के सेवा म दिन रात लगे त रथे।  इहॉं त मनखे के ओतको कदर नइ रहय। मतलब के बेरा म मिठ मिठ बोल के ओकर जतका उपयोग लेना हे ले ले। मान सम्मान के बात तो छोंड़ दौ धन्यवाद के शब्द घलो नइ निकलय। हॉं! फेर मतलब के बेरा म ओकर सुरता कर लेथें।  मंदरस कंस मिठ बोल बोल के, चना के झाड़ म चढ़ा के, काम निकालिच लेथें। तहॉं ले फेर जस के तस। कहूॅं ना नुकर कर दिस बपुरा, उहू अपन मजबूरी म, त फेर ओ हा घी म परे माछी कस निकाल दे जाथे। डिस्पोज़ल ले गये बीते हो जथे ओकर हालत। हो सकत हे अपन किस्मते म लिखवा के लाय रथे काय। अइसनेच मन ल कहत होहीं "करमछड़हा".....


जोहारत.....🙏🙏🙏🌹🌹


सूर्यकान्त गुप्ता, जुनवानी, भिलाई 

(छत्तीसगढ़)

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