*"विश्व स्वास्थ्य दिवस" -*
*छत्तीसगढ़ी काव्य मा - छत्तीसगढ़ के बासी*
कहूँ पढ़े रहेंव कि अमरीकन न्यूट्रीशन एसोसियेशन के कहना हे कि ‘बासी भात’ मा आयरन, पोटेशियम, कैल्शियम तथा विटामिन घलो मिल जाथे। एमा विटामिन बी 12 घलो रहिथे।.बासी के वैज्ञानिक अउ अंग्रेजी नाम हे - होल नाइट वाटर सोकिंग राइस। अमरीका के शोध कहिथे कि बासी खाए ले गर्मी और लू नइ लगय। हाइपरटेंशन अउ बीपी घलो नियंत्रण मा रहिथे। नींद बर घलो ए बढ़िया होथे। अमेरिका का कहिथे, हम ला का लेना देना हे ? हमर छत्तीसगढ़ मा बासी एक परम्परा बन गेहे। कुछ शहर वाला मन टेस बताए बर भले नइ खाँय फेर बहुत झन शहर मा अउ जम्मो झन गाँव मा नेत नियम ले बासी खाथें।
छत्तीसगढ़ के कवि मन घलो अपन कविता मा बासी के महिमा ला गावत रहिथें। आवव कुछु कवि मन के कविता के झलक देखे जाय -
सब ले पहिली लोकगीत ददरिया सुनव -
बटकी मा बासी अउ चुटकी मा नून
मँय गावsथौं ददरिया, तँय कान दे के सुन।
जनकवि कोदूराम "दलित" के कुण्डलिया छन्द मा बासी के सुग्घर महिमा बताए गेहे -
बासी मा गुन हे गजब, एला सब झन खाव।
ठठिया भर पसिया पियौ, तन ला पुष्ट बनाव।।
तन ला पुष्ट बनाव, जियो सौ बछर आप मन
जियत हवयँ जइसे कतको के बबा-बाप मन।
दही-मही सँग खाव शान्ति आ जाही जी - मा
भरे गजब गुन हें छत्तिसगढ़ के बासी मा।।
जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिया जी के सुप्रसिद्ध गीत चल चल गा किसान बोए चली धान असाढ़ आगे गा, मा बासी के वर्णन हे -
धंवरा रे बइला कोठा ले होंक रै।
खा ले न बासी बेरा हो तो गै।।
भिलाई के कवि रविशंकर शुक्ल के सुप्रसिद्ध लीम अउ आमा के छाँव, नरवा के तीर मोर गाँव के एक पद बासी ला समर्पित हे -
खाथंव मँय बासी अउ नून,
गाथंव मँय माटी के गुन।
मँय तो छत्तीसगढ़िया आँव।।
खुर्सीपार भिलाई के कवि विमल कुमार पाठक के कविता मा बोरे बासी के सुग्घर प्रयोग देखव -
छानी चूहय टप टप टप टप
परछी मं सरि कुरिया मा।
बोरे बासी रखे कुंडेरा मा,
बटुवा मं, हड़िया मा।।
गंडई के लोकप्रिय कवि पीसी लाल यादव के गीत मा गँवई के ठेठ दृश्य देखव -
चँवरा में बइठे बबा, तापत हवै रऊनिया।
चटनी बासी झड़क़त हे, खेत जाय बर नोनी पुनिया।।
शिक्षक नगर, दुर्ग के कवि रघुवीर अग्रवाल "पथिक" के कविता मा बासी के प्रयोग देखव -
जनम धरे हन ये धरती मा, इहें हवा पाए हन।
गुरमटिया चाँउर के बासी, अउ अँगाकर खाए हन।।
छन्द के छ परिवार के कवि मन घलो अपन रचना मा बासी के वर्णन करिन हें -
कचलोन सिमगा के छन्द साधक मनीराम साहू "मितान" के रचना मा पहुनाई ला देखव -
हाँस के करथे पहुनाई ,
एक लोटा पानी मा।
बटकी भर बासी खवाथे,
नानुक अथान के चानी।
कभू तसमई कभू महेरी,
भाटा खोइला मही मा कढ़ी जी ।
चंदैनी बेमेतरा के छन्द साधक ज्ञानुदास मानिकपुरी के घनाक्षरी के अंश मा बासी के महिमा देखव -
नाँगर बइला साथ, चूहय पसीना माथ
सुआ ददरिया गात, उठत बिहान हे।
खाके चटनी बासी ला,मिटाके औ थकासी ला
भजके अविनासी ला,बुता मा परान हे।
सारंगढ़ के छ्न्द साधक दुर्गाशंकर इजारदार कहिथें कि चैत के महीना मा सबो झन बासी खाथें - (रोला के अंश)
अड़बड़ लगथे घाम, चैत जब महिना आथे
रोटी ला जी छोड़, सबो झन बासी खाथें।
बलौदाबाजार के छन्द साधक दिलीप कुमार वर्मा के कुण्डलिया छन्द के अंश मा बासी के प्रयोग -
खा के चटनी बासी रोटी अब्बड़ खेलन।
गजब सुहाथे रोटी बेले चौकी बेलन।।
डोंड़की,बिल्हा के छन्द साधक असकरन दास जोगी के उल्लाला छन्द मा बासी के स्वाद लेवव -
बोरे बासी खास हे, खाना पीना नीक जी।
गर्मी लेथे थाम गा, होथे बोरे ठीक जी।।
हथबंद के छन्द साधक चोवाराम "बादल" के रोला छन्द मा बासी के महिमा -
बासी खाय सुजान, ज्ञान ओखर बढ़ जावय
बासी खाय किसान, पोठ खंती खन आवय।
बासी पसिया पेज, हमर सुग्घर परिपाटी
बासी ला झन हाँस,दवा जी एहा खाटी।।
बाल्को मा सेवा देवत ग्राम खैरझिटी के छन्द साधक जितेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया" बासी गीतिका छन्द मा देखव -
चान चानी गोंदली के, नून संग अथान।
जुड़ हवै बासी झड़क ले, भाग जाय थकान।।
बड़ मिठाथे मन हिताथे, खाय तौन बताय।
झाँझ झोला नइ धरे गा, जर बुखार भगाय।।
खैरझिटिया जी के आल्हा छन्द के एक अंश -
तन ला मोर करे लोहाटी, पसिया चटनी बासी नून।
बइरी मन ला देख देख के, बड़ उफान मारे गा खून।।
धमधा मा कार्यरत ग्राम गिधवा के युवा छन्द साधक हेमलाल साहू के गीतिका छन्द के अंश देखव -
लान बासी संग चटनी, सुन मया के गोठ गा।
खा बिहिनिया रोज बासी, होय तन हा पोठ गा।।
एन टी पी सी कोरबा के छन्द साधिका आशा देशमुख के चौपाई के एक अर्द्धाली मा बासी अउ अथान के संबंध के सुग्घर बखान -
आमा लिमउ अथान बना ले।
बासी भात सबो मा खा ले।।
बिलासपुर के छन्द साधिका वसंती वर्मा के चौपाई छन्द के एक अर्द्धाली मा बासी के प्रयोग -
लाली भाजी गजब मिठाथे।
बासी संग बबा हर खाथे।।
नवागढ़ के छन्द साधक रमेश कुमार सिंह चौहान के एक गीत के हिस्सा मा बासी के प्रयोग देखव -
जुन्ना नाँगर बुढ़वा बइला, पटपर भुइँया जोतय कोन।
बटकी के बासी पानी के घइला, संगी के ददरिया होगे मोन।।
दुरुग के छन्द साधक अरुण कुमार निगम के छन्द मा बासी के महिमा देखव -
मँय बासी हौं भात के, तँय मैदा के पाव।
मँय गुनकारी हौं तभो, तोला मिलथे भाव।।
(दोहा)
बरी बिजौरी के महिमा ला।पूछौ जी छत्तिसगढ़िया ला।।
जउन गोंदली-बासी खावैं। सरी जगत बढ़िया कहिलावैं।।
(चौपाई)
छत्तिसगढ़िया सबले बढ़िया , कहिथैं जी दुनियाँ वाले।
झारा-झार नेवता भइया , आ चटनी-बासी खा ले।।
(ताटंक)
माखनचोर रिसाय हवे कहिथे नहिं जावँ करे ल बियासी
माखन, नाम करे बदनाम अरे अब देख लगे खिसियासी
दाइ जसोमति हाँस कहे बिलवा बिटवा तँय छोड़ उदासी
श्री बलराम कहे भइया चटनी सँग खाय करौ अब बासी
(सवैया)
छत्तीसगढ़ी भाषा के हर कवि के एक न एक रचना मा बासी के वर्णन जरूर मिलही। आज मोर करा उपलब्ध रचना मन के उन डाँड़ के संकलन करे हँव जेमा "बासी" शब्द के प्रयोग होए हे।
*आलेख - अरुण कुमार निगम*
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